29 जनवरी 2018

अभी कुछ दिन पहले हिन्दुस्तानी गहनों के एक ब्रांड के इश्तहार में छपी एक लाईन को लेकर बड़ी बहस छिड़ी। इसमें एक लड़की यह कहते दिखती है कि मुझे अपना पति तो पसंद करने नहीं मिला, लेकिन मैं अपने गहने पसंद कर सकती हूं। यह इश्तहार मुंबई की बसों पर देखने मिला, और लोगों ने इसे महिला की आजादी का मखौल बनाने वाला बताया। एक महिला ने ट्विटर पर इसके बारे में लिखा कि गहने पसंद करने को कब से महिलाओं की आजादी करार दिया जाने लगा है?
समाज में, और महज हिन्दुस्तानी समाज नहीं सभी समाजों में, औरत का दर्जा शुरू से गैरबराबरी का रहा है। इसकी कुछ वजहें समाज बनने के पहले से इंसानी बदन से जुड़ी हुई दिखती हैं कि महिला के शरीर में एक पुरूष शरीर से सीधे लडऩे के लिए ताकत कम दिखती है, फिर चाहे महिला का शरीर लंबे दौर में एक पुरूष के शरीर से अधिक मजबूत ही क्यों न हो। इसी तरह एक औरत के बदन में कुदरत की दी हुई कुछ दिक्कतें ऐसी रहती हैं कि वह कुछ वक्त, अपनी माहवारी के दिनों से लेकर अपने गर्भ के दिनों तक पुरूष से सीधे हाथापाई की बराबरी करने के लायक नहीं रहती, और शायद यह भी पुरूष के दबदबे की एक वजह रही होगी।
उसी वक्त से शुरू हुई गैरबराबरी पुरूष प्रधान समाज में बनाई गई सामाजिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों, और परंपराओं में गहरे बैठाई गईं, और औरत को लगातार कुचला जाता रहा। तब से लेकर अब तक यह गैरबराबरी बुरी तरह और पूरी तरह जारी है, और एक कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता कि दुनिया के किसी न किसी कोने में कोई न कोई ताकतवर मर्द किसी न किसी औरत को कुचलते न पकड़ाता हो। अभी जब यह लिखा जा रहा है, उसी वक्त अमरीका से एक खबर आई है कि किस तरह वहां रिपब्लिकन पार्टी के एक बड़े नेता और बड़े पदाधिकारी को महिला के शोषण के आरोपों के सामने आने के बाद इस्तीफा देना पड़ा है। और इसी वक्त यह खबर भी टीवी की स्क्रीन पर है कि किस तरह वहां पर महिला खिलाडिय़ों के देह शोषण के सौ से अधिक मामलों में एक कोच को 175 बरस कैद की सजा सुनाई गई है।
इसलिए एक महिला का शोषण घर के बाहर, घर के भीतर, और जन्म के पहले से अपनी मां के पेट में भी होते ही चलता है, और इसलिए गहनों का यह इश्तहार बहुत से लोगों को तो, या अधिक सही यह कहना होगा कि अधिकतर लोगों को आपत्तिजनक लगेगा ही नहीं, और इसे एक महिला को गहने चुनने के अधिकारों से जोड़कर देखा जाएगा। अब महिला के चुनने के अधिकारों को देखें तो इन दिनों हिन्दुस्तान के मीडिया पर छाई हुई फिल्म पद्मावत को देखना होगा या उसकी कहानी को पढऩा होगा कि किस तरह एक राजपूत महिला को किसी गैर मर्द के हाथों से अपने को बचाने के लिए आग में कूदकर जलकर मर जाने का अधिकार दिया गया था। इससे थोड़ा ही अलग एक दूसरा अधिकार सती होने का था जो कि एक महिला के पति के गुजर जाने पर उसकी चिता में कूदकर जान देने का हक था। कहने को ये दोनों बातें एक महिला का हक या उसकी जिम्मेदारी बताती हैं, लेकिन यह एक किस्म से महिला पर लादा गया एक सामाजिक बोझ था कि उसे अगर अपनी देह को किसी पराए मर्द से बचाना मुश्किल हो, तो उसे आग में कूदकर जान दे देनी चाहिए। मतलब यह कि उसकी देह की अहमियत इतनी अधिक बताई गई कि कोई दूसरा मर्द उसे छू भी पाए, उसके पहले वह उस बदन को ही खत्म कर दे। इसी तरह किसी महिला के सती होने की जो परंपरा रही, वह भी इसी किस्म से रही कि जब पति ही नहीं रहा, तो उसकी विधवा कही जाने वाली पत्नी के बदन का इस धरती पर और क्या इस्तेमाल है? इन दोनों ही बातों में औरत की सारी इज्जत को उसके बदन से जोड़ दिया गया, और उसके पति से जोड़ दिया गया। यह एक अलग बात रही कि ऐसी महिलाओं के पिता रहे हों, या कि पति, इनमें से बहुत से ऐसे रहे जो कि मुगलों के गुलाम बनकर सहूलियत का राजपाट जारी रखने के लिए उनके ताबेदार बनकर रहे, और उनमें से बहुतों ने अपनी बहन-बेटी को मुगलों को सौंपकर उनसे रिश्तेदारी की, और सरकारी हक पाए।
हिन्दुस्तान में अपनी आन, बान, और शान के नारे लगाने वाले ऐसे बहुत से समाज रहे जिन्होंने अपनी बहन-बेटी की कीमत पर विधर्मी या विदेशी शासकों से समझौते किए, उनके सामने हथियार डाले, उनकी जूतियां उठाईं, और इस पूरे सिलसिले में अपनी बहन-बेटियों का इस्तेमाल सामान की तरह किया, जानवरों की तरह उनकी रस्सी अपने घर से खोलकर मुगलों के घर बांध दी थी। आज ऐसे लोग जौहर को महिमामंडित करते हुए सड़कों पर तलवारें भांज रहे हैं, और एक ऐसे गौरव के इतिहास का दावा कर रहे हैं जो कि औरत के जिस्म को आग में झोंककर रौशन होता था।
इसी तरह सतीप्रथा को देखें तो पति के गुजर जाने के बाद पत्नी को, जिंदा पत्नी को लकड़ी के एक सूखे ल_े की तरह चिता में झोंक देने का मर्दाना हक जिन लोगों को गौरव दिलाता है, उन लोगों को आज भी इस बात में गौरव हासिल हो सकता है कि वे अपनी बहन-बेटी के लिए पति तो खुद ढूंढें, लेकिन उसे गहने पसंद करने की आजादी दें। अब यह आजादी कुछ उसी किस्म की है जिस किस्म की आजादी मुस्लिम रीति-रिवाजों में बुर्का पहनने, या हिजाब बांधने की होती है। आज जब योरप के एक के बाद एक कई देशों में मुस्लिम औरतों के बुर्के के खिलाफ कानून बन रहे हैं, और इस पोशाक पर रोक लग रही है, तो मुस्लिम समाज के कई लोग इसे मुस्लिम औरत की पसंद और आजादी पर हमला बता रहे हैं। मर्द तो मर्द, मुस्लिम औरत भी इसे अपनी आजादी पर हमला मान रही हैं, क्योंकि आजादी की उनकी समझ और जरूरत को मर्दाना सोच से लदे मुस्लिम रीति-रिवाजों में हमेशा ही बुर्के के भीतर कैद करके रखा हुआ है। आज बुर्का हट जाना जिन महिलाओं को मुस्लिम महिला की आजादी में दखल और खलल लग रहा है, वे कुछ उसी किस्म की सोच की शिकार महिलाएं हैं जिनको पदमावती के दिनों में जौहर करने से रोकना दखल लगता, या कि राजस्थान में पति की चिता पर सती होने वाली महिला को रोकना उसे उसके हक से रोकना लगता।
दरअसल सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपराओं से उबरना बड़ा मुश्किल होता है। और ऐसे में कई बार गुलाम मानसिकता के शिकार समाज, लोग, या कि महिलाएं उस गुलामी के भीतर ही अपनी हिफाजत महसूस करते हैं। जिन लोगों ने मनोविज्ञान कुछ पढ़ा होगा, वे जानते हैं कि मास्टर और स्लेव मेंटलिटी, यानी मालिक और गुलाम मानसिकता के शिकार लोग एक-दूसरे को ढूंढ लेते हैं, और एक-दूसरे के साथ अपने को महफूज महसूस करते हैं। अभी कुछ अरसा पहले तक इंटरनेट पर एमएसएन के बहुत से ऐसे चैट ग्रुप थे जिसमें लोग एक-दूसरे के पूरक बने हुए जोड़ी बना लेते थे, फिर चाहे वे दुनिया के अलग-अलग कोनों में बसे हुए गुमनाम और बेचेहरा लोग ही क्यों न हों। ऐसे मालिकों के साथ कुछ लोग खुद होकर अपनी मर्जी से गुलाम बनकर शब्दों में उनके तलुए चाटते थे, उनके सामने घुटनों पर रहते थे, और उनके मालिक उन्हें कोड़े लगाते थे।
दुनिया के बहुत से समाज ऐसे हैं जहां पर लोग गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। इसमें भारत के कई समाज भी शामिल हैं जिनमें ऐसी औरतों की बहुतायत है जो कि जौहर करने और सती होने को अपना गौरव समझती हैं, आज भी उस परंपरा को, या कम से कम उसके इतिहास को, पूजती हैं, और उसकी गौरव-रक्षा के लिए तलवार लेकर सड़कों पर उतरने को तैयार रहती हैं। आज जब वर्तमान में ही गुलाम मानसिकता को तोडऩा एक मुश्किल काम हो रहा है, तो भूतकाल और इतिहास में जाकर उसे तोडऩा और भी मुश्किल काम है, और ऐसे में भविष्य या आने वाले कल में भी ऐसी गुलाम मानसिकता से आजादी आसान नहीं दिखती है।
इसलिए घूंघट हो, गैरबराबरी हो, विधवा जैसा शब्द हो, या कि पोशाक की किसी और किस्म की गुलामी हो, बोलचाल की वह भाषा हो जिसमें औरत की जगह न हो, जिसमें शेर-चीते भी महज नरभक्षी, आदमखोर, मैनईटर होते हों, मानो उन्हें औरत को खाने से भी परहेज हो, ऐसी तमाम भाषा के खिलाफ लडऩा होगा। जिन लोगों ने औरत के हक को महज गहनों की पसंद तक कैद रखने के इश्तहार का विरोध किया है, उन्होंने इस सीमित पसंद से खुश औरतों को भी झकझोरा है, और ऐसा कोई भी मौका छोडऩा नहीं चाहिए, चूकना नहीं चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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