22 जनवरी 2018

पिछले कुछ दिनों से अपने बिल्कुल ही आसपास परिवार के भीतर हिंसा की असल जिंदगी की वारदातों को देखकर दिल हिला हुआ है। कभी-कभी तो किसी अखबार के एक ही पन्ने पर अगल-बगल तीन-तीन खबरें इसी इलाके की ऐसी छप रही हैं जिनमें एक में बाप ने दो बेटों को मार डाला, दूसरी खबर में मां ने बेटे को मार दिया, और तीसरी खबर में बेटे ने मां को मार डाला। ये खबरें देश के कुछ हिस्सों में चल रहीं उन ऑनर किलिंग से अलग हैं जिनमें परिवार के मर्जी के खिलाफ शादी करने पर लड़के-लड़कियों को बाप-भाई-चाचा मार डालते हैं। अभी की जो वारदातें दिल-दिमाग को हिला रही हैं, वे वारदातें सामाजिक प्रथाओं से परे, खालिस निजी हिंसा की हैं।
इसके साथ-साथ कुछ दूसरे किस्म की हिंसा और आत्मघाती वारदातों की खबरें भी अनायास बढ़ गई दिख रही हैं। स्कूल की एक लड़की स्कूल के ही छोटे बच्चे को इसलिए चाकू मार रही है कि स्कूल में छुट्टी हो जाए। ठीक ऐसी ही वारदात साल भर पहले भी, या कि कुछ महीने पहले भी आई थी जिसमें स्कूल की बड़ी क्लास के एक लड़के ने छोटी क्लास के एक लड़के का कत्ल कर दिया था, ताकि छुट्टी हो जाए। आज ही सुबह खबर है कि मेरे शहर के पास ही एक शादीशुदा, और बच्चों के बाप आदमी ने एक नाबालिग लड़की से प्रेम, या जैसे भी संबंध हों, के बाद शादी की संभावना न देखकर उसके साथ आत्महत्या की कोशिश की, वह लड़की मर गई, और यह आदमी फंदे पर झूलने के बाद भी बच गया। दो-तीन दिन पहले की ही खबर थी कि एक प्रेमी जोड़े ने एक साथ फांसी लगाई, और उसमें दोनों ही टंगे-टंगे मर गए।
ऐसी बहुत सी वारदातों को एक साथ देखने के बाद यह समझ पड़ता है कि परिवार का ढांचा उतना मजबूत शायद नहीं है जितना कि बाहर से दिखता है। ये तो मरने और मारने की कुछ ऐसी वारदातें हैं जो कि खबरों में आती हैं, लेकिन जो खबरों में नहीं आ पातीं, वैसी भी असल जिंदगी की अनगिनत भयानक कहानियां रहती हैं जो कि घर के किवाड़ों के भीतर ही दफन हो जाती हैं। परिवार के भीतर बच्चों के यौन शोषण, वयस्क लोगों के बीच अवैध कहे जाने वाले संबंध लोगों की कल्पना के मुकाबले अधिक आम हैं, और इन पर भरोसा करने को लोगों का दिल नहीं करता है, इसलिए इनको हकीकत मानने से इंकार कर दिया जाता है।
आज ही सुबह मेरे शहर के बगल के दो मामले सामने आए, इनमें से एक मामले में दस बरस पहले प्रेम-विवाह करने वाली एक महिला अपनी दो छोटी बच्चियों और पति को छोड़कर किसी एक ऐसे बदनाम मवाली किस्म के आदमी के पास चली गई जिससे कि वह रात-रात जागकर फोन और सोशल मीडिया में चैट किया करती थी, पति के समझाने के बावजूद। अब यह कल्पना करना लोगों को थोड़ा सा मुश्किल होगा कि दस बरस पहले का प्रेम-विवाह दो बच्चियों के होने के बाद ऐसा नाकामयाब क्यों हो रहा है कि एक महिला जानते-बूझते हुए एक शादीशुदा, मुजरिम, और मवाली के पास चली जा रही है, और वहां से अपने पति को धमकी दिलवाकर बच्चों को मांग रही है। एक दूसरा मामला इसी सुबह ऐसा आया है जिसमें एक धर्म की लड़की ने दूसरे धर्म के लड़के से तब शादी की, जब उस लड़की की सगाई हो चुकी थी। और अब वह आदमी उसे रोज पीट रहा है, और प्रताडि़त कर रहा है। कुछ महीनों के भीतर ही प्रेम या झांसा इस तरह हिंसा में तब्दील हो गया है।
ऐसे मामलों में परिवार, समाज, और पुलिस से लेकर अदालत तक का बहुत सा सरकारी वक्त जाया होता है, और सरकार का खर्च भी होता है। तो ऐसे मामलों से बचने के लिए आखिर क्या किया जाए? क्या परिवारों के और समाज के परंपरागत रीति-रिवाजों के तहत मां-बाप को शादियां तय करने दी जाएं? या फिर लोग अपनी मर्जी से शादी करें, और समाज के बंधनों को किनारे कर दें? ऐसी वारदातों को देखें तो इनमें एक बात उभरकर सामने आती है कि लोगों के बीच परिवार के ढांचे को तोड़कर निकलने की हिम्मत नहीं रहती, और लोग घुट-घुटकर भी परिवार के भीतर ही बने रहते हैं। चाहे वह आल-औलाद मां-बाप के साथ रहती हो, या फिर पति-पत्नी एक-दूसरे को ढोते हों।
संयुक्त परिवार से अलग होने कई किस्म की दिक्कतों और खतरों का एक ईलाज हो सकता है, और न पटने पर पति-पत्नी का अलग होना बहुत किस्म की हिंसा को टाल सकता है। लेकिन देश और समाज भी सांस्कृतिक और सामाजिक सोच परिवार के विघटन को बुरा मानती है। शादी के तुरंत बाद अगर बेटा-बहू अलग रहने लगते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि बहू ने आती ही बेटा छीन लिया। दूसरी तरफ पति-पत्नी अगर अलग होते हैं तो उसे एक सामाजिक दाग मान लिया जाता है, और जिंदगी में आगे उनके दुबारा घर बसाने में दिक्कतें होती हैं, या कि मान लिया जाता है कि दिक्कतें होंगी।
अभी यह लिखा ही जा रहा है कि मेरे शहर ही की एक खबर आ रही है कि एक बूढ़ी मां को घर में कैद करके इमारत के चौकीदार को चाबी देकर उसके बेटे अपने नए घर में रहने चले गए।
दरअसल हिन्दुस्तान में दिक्कत इस सोच की है कि लोगों का अलग रहना परिवार के ढांचे का कमजोर होना होता है। बहुत से मामलों में होता यह है कि लोग कुछ दूर रहने लगते हैं, अलग रहने लगते हैं, तो उनकी जिंदगी कुछ बेहतर भी हो सकती है। लोगों को यह समझना होगा कि हिंसक टकराव के साथ एक साथ रहने के बजाय बेहतर यह होता है कि लोग बिना टकराव दूरी पर रहें, और आड़े वक्त एक-दूसरे के काम आ सकें। ऐसा तनाव से गुजरने वाले पति-पत्नी भी कर सकते हैं, प्रेमी-प्रेमिका भी कर सकते हैं, और परिवार की दो पीढिय़ां तो कर ही सकती हैं। लेकिन लोगों के बीच सामाजिक दबाव के चलते जब ऐसी जिद हावी रहती है, या ऐसी मजबूरी रहती है कि उन्हें साथ रहना है, तो ऐसी नौबत हिंसा तक पहुंचने का एक बड़ा खतरा रहता है।
शादी-शुदा लोगों के अवैध कहे जाने वाले विवाहेतर संबंधों के बारे में यह समझने की जरूरत है कि ऐसे संबंध आम इंसानी मिजाज के मुताबिक ही हैं, उनसे अलग नहीं हैं। सामाजिक परंपराएं लोगों को एक ही जीवन-साथी के साथ बंधे रहने को बेबस सा करती हैं, लेकिन हकीकत में इंसान एक जीवन-साथी से हमेशा बंधा रहे, ऐसा जरूरी नहीं रहता, ऐसा कई मामलों में हो नहीं पाता है। इसलिए ऐसी तमाम नौबतों के बारे में सोचकर लोगों को दो बातें करनी चाहिए, पहली बात तो यह कि ऐसी आशंका को नकारना बंद कर देना चाहिए, और दूसरी बात यह कि ऐसी आशंका की सोचकर अपनी तैयारी भी रखनी चाहिए। जो महिलाएं अधिक आत्मनिर्भर होती हैं, आर्थिक रूप से सक्षम होती हैं, वे अपने साथ होने वाली ऐसी किसी बेइंसाफी को अधिक दूर तक झेल पाती हैं, उनसे उबर पाती हैं। लेकिन जो महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होतीं, उनके साथ बड़ी बुरी गुजरती है।
ऊपर की तमाम बातें अलग-अलग किस्म की कतरा-कतरा बातें हैं, लेकिन इनमें एक बात एक सरीखी है कि परिवार और समाज, आपसी रिश्तों के ढांचे को फौलाद सरीखा मजबूत मानना एक बड़ी चूक होती है। दूसरी बात यह कि एक दूसरे का दम घोंटते हुए साथ रहने के नुकसान के बजाय लोगों को अलग रहने के नफे समझने चाहिए। तीसरी बात यह कि लोगों को अपने भले के लिए अपने मर्जी के कुछ काम करने का हौसला भी जुटाना चाहिए। लेकिन ये बातें जटिल सामाजिक तनाव के इलाज के लिए कोई रामबाण दवा नहीं हैं, ये महज एक चर्चा है जिससे कि लोग अपनी-अपनी जिंदगी, और अपने-अपने दायरे के तनावों को समझ सकें, और उससे बचने, उससे निपटने के रास्ते सोच सकें।
लोगों को रिश्तों और जिंदगी को हमेशा के लिए मजबूत मानकर नहीं चलना चाहिए, और ऐसे में ही लोग आत्मनिर्भर हो पाएंगे, और अपना इंतजाम अधिक सुरक्षित कर सकेंगे। जैसे-जैसे लोगों के अपने निजी इंतजाम अधिक सुरक्षित हो सकेंगे, वैसे-वैसे उनके रिश्ते तनाव कम झेलेंगे। बहुत से तनाव खड़े ही इसलिए हो पाते हैं क्योंकि उन्हें झेलने वाले लोग उसके लायक तैयार नहीं होते। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि आत्मनिर्भरता बहुत किस्म के रिश्तों की मजबूती की गारंटी भी रहती है। (Daily Chhattisgarh)

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