संपादकीय
25 जनवरी 2018

आज जब हिन्दुस्तान का मीडिया देश और हर प्रदेश की राजधानियों में गणतंत्र दिवस परेड की तैयारियों से भरा हुआ है, तब देश में आज सड़कों पर ऐसी ठोस वजह मौजूद है कि यह गणतंत्र दिवस नाकामयाब करने की एक राष्ट्रविरोधी साजिश है। आधा दर्जन से अधिक प्रदेशों में दर्जनों शहरों में सड़कों पर सुप्रीम कोर्ट का मखौल बनाते हुए अपने आपको राजपूत कहने वाले लोग एक फिल्म को देखे बिना उसका ऐसा हिंसक विरोध कर रहे हैं कि स्कूल बसों पर भी हमला कर रहे हैं। जिस राजपूती आन, बान, और शान के लिए लोग सिर कटाने और सिर काट लेने के फतवे दे रहे हैं, सिनेमाघरों वाले मॉल जला रहे हैं, गाडिय़ों को जला रहे हैं, बसों को जला रहे हैं। और यह सब तब हो रहा है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दावोस में पूरी दुनिया के नेताओं और कारोबारियों, पूंजीनिवेशकों और मीडिया को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत किस तरह चीजों को शांतिपूर्वक सुलझाता है। और आज हाल यह है कि जिन राज्यों में सबसे अधिक उत्पात हो रहा है, सुप्रीम कोर्ट के साफ-साफ और बार-बार के आदेश के बावजूद जहां पर एक अनदेखी फिल्म के खिलाफ, अनसुने इतिहास की कहानी से बिना किसी रिश्ते वाले सिनेमा के खिलाफ हिंसा चल रही है, उन तमाम जगहों पर मोदी की भाजपा का राज है। ऐसे में पहली बात जो सूझती है वह यह है कि क्या महज भाजपा के राज्यों में ऐसा होना एक संयोग या दुर्योग ही है?
कल गणतंत्र दिवस मनाने का क्या औचित्य है अगर यह देश धीरे-धीरे एक अराजकता की ओर बढ़ते चल रहा है, केंद्र सरकार के मंत्री संविधान को बदल डालने का बयान दे रहे हैं, सत्ता से जुड़े संगठन लगातार ये फतवे दे रहे हैं कि धर्म संविधान से ऊपर है। गणतंत्र दिवस देश का संविधान लागू होने की सालगिरह है, और अब ऐसा लगता है कि यह इस संविधान की हेठी करने का जलसा बनकर रह जा रहा है। ऐन इस जलसे के वक्त देश में जो माहौल बना हुआ है वह संविधान के लिए हिकारत का है, लोकतंत्र के लिए नफरत का है, और जाति-धर्म की हिंसा के बोलबाले का है। ऐसे में गणतंत्र दिवस मनाने जा रही है केंद्र सरकार की तरफ से क्या देश में चल रही और फैलाई जा रही अराजकता के खिलाफ एक लफ्ज भी किसी केंद्रीय मंत्री ने या किसी केंद्रीय सचिव ने कहा है? क्या प्रधानमंत्री की ओर से देश भर में हिंसा के खिलाफ कोई ट्वीट किया गया है? देश भर में जिन राज्यों में जाति के एक गौरव का नाम लेकर हिंसा की जा रही है, उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों में से किसने इस हिंसा के खिलाफ कुछ कहा है?
आज ऐसा लगता है कि खाप पंचायतें देश की सड़कों पर राज कर रही हैं, और राजनीतिक ताकतें दुबकी पड़ी हैं, इक्का-दुक्का पार्टियों को छोड़कर बाकी की बोलती बंद है। मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांगे्रस के एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह पिछले कई महीनों से पार्टी से छुट्टी लेकर नर्मदा परिक्रमा पर हैं, वे राजनीति पर कुछ बोल नहीं रहे हैं, वे आमतौर पर साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक हमलावर तेवर के लिए जाने जाते हैं, लेकिन आज सुबह उनका बयान साफ-साफ दकियानूसी लोगों की खुली आलोचना से बचता हुआ था, और वह फिल्मकारों को सिखा रहा था कि ऐतिहासिक विषयों पर फिल्म बनाते हुए किसी जाति या धर्म की भावनाओं को आहत करने से बचना चाहिए। अब उनकी इस बात में और किसी साम्प्रदायिक नेता की बात में शब्दों का ही फर्क रह गया है, बाकी तो दोनों ही किसी कला, साहित्य, या फिल्म को जाति और धर्म की भावनाओं को आहत न करने की सलाह दे रहे हैं। साम्प्रदायिक लोग जो चेतावनी दे रहे हैं, साम्प्रदायिकता-विरोधी दिग्विजय सिंह वह सलाह दे रहे हैं। हम इसके पीछे की वजहों को देखने के लिए इतने नीचे गिरना भी नहीं चाहते कि उनके इस बयान को उनके राजपूत होने से जोड़कर देखें, लेकिन बहुत से लोग ऐसा देखेंगे, और बहुत से लोग यह भी देखेंगे कि किस तरह कांगे्रस पार्टी का एक नेता एक नाजुक मौके पर एक फिल्मकार की आजादी के खिलाफ बयान दे रहा है।
गणतंत्र दिवस के मौके पर इस बार देश में पहली बार एक से अधिक विदेशी मेहमानों को न्यौता दिया गया है। बहुत से देशों के प्रमुख कल भारत में गणतंत्र दिवस की परेड देखेंगे। लेकिन वे होटलों के अपने कमरों में टीवी पर यह देखेंगे कि संविधान को किस तरह सड़कों पर जलाया जा रहा है। आज के हालात देखकर यह लगता है कि जिस वक्त संविधान लागू हुआ था, उस दिन शायद हिंदुस्तान में कानून की आज के मुकाबले अधिक इज्जत थी। (Daily Chhattisgarh)

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