हरियाणा की जेलों में गौसेवा के फैसले से सूझती कई बातें

15 जनवरी  2018

हरियाणा सरकार ने तय किया है कि वहां की जेलों में गौशाला खोली जाएंगी, कैदी गायों की सेवा करेंगे, और गोबर से गैस बनेगी, दूध से कई तरह के सामान बनेंगे, और कैदियों की, जेल की कमाई भी होगी, गायें सड़कों पर भटकने से बचेंगी। इसके पीछे हरियाणा सरकार की नीयत चाहे गाय के अपने हिन्दुत्व के एजेंडे की क्यों न हो, यह सोच सही है, और इससे कई किस्म के फायदे हो सकते हैं, होंगे।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मैंने अपने बचपन से शहर की सेंट्रल जेल के सामने जेल की बहुत बड़ी जमीन पर कैदियों को लकड़ी के ल_े कुल्हाडिय़ों से काटकर जलाऊ लकड़ी तैयार करते देखा है, जिसे लकड़ी के ही तराजू पर तौलकर बेचा जाता था। जेल के पास बहुत सी खाली जमीन रहती थी जिस पर इस तरह के कई काम होते थे। बाद में शहर के बीच खाली जमीन पर दूसरी जरूरतें आकर खड़ी हो गईं, और उस जगह पर मेडिकल कॉलेज, कॉलेज का हॉस्पिटल, और हॉस्टल वगैरह सब बन गए। जेल के कैदियों के पास से रोजगार का वह एक जरिया खत्म हो गया। इसी जमीन के बगल में म्युनिसिपल की एक गरीब स्कूल में मेरी पढ़ाई होती थी, और वहां से घूमते हुए हम लोग कैदियों के इस बाड़े में भी पहुंचते थे, और इसके ठीक पीछे एक तालाब था जिसमें कैदियों को नहाने के लिए किस्तों में लाया जाता था, और उसका नाम भी कैदी तालाब पड़ गया था।
बाद के बरसों में जब मैंने अखबार में काम शुरू किया, तो जेल को लेकर एक दिलचस्पी बनी हुई थी, और अठारह-उन्नीस बरस की उम्र में एक छोटे रिपोर्टर की हैसियत से मुझे जेल में जाने का मौका मिला, तो वहां पर कई तरह के काम होते दिखते थे। वहां का लकड़ी टाल तो बंद हो चुका था, लेकिन भीतर कैदी गिनीपिग पालते थे जिन्हें मेडिकल कॉलेज के छात्रों की पढ़ाई के लिए बेचा जाता था। कैदी वहां पर बकरियां भी पालते थे, मुर्गी और बत्तख भी पालते थे, और डेयरी तो चलती ही थी। जेल के पीछे बहुत सी खाली जगह थी जहां पर कैदी खेती करते थे। जैसे-जैसे शहर घना होता गया, जेल की जमीन छिनती चली गई, और कैदियों के रोजगार के मौके घटते चले गए। लेकिन शहर के बीच जेल होने का एक फायदा यह भी हुआ कि जेल ने अपने अहाते में एक पेट्रोल-डीजल पंप खोल लिया जो कि शहर बंद होने पर भी चालू रहता है। इसके अलावा कैदी इस पंप के बगल में ही मंगौड़े की एक दुकान चलाते हैं, जो बड़ी कामयाब है, और लोग यहां खाने आते हैं। जेल के भीतर उस वक्त भी कपड़ा बुना जाता था, और आज भी बुना जाता है, कैदियों के कपड़े सिले जाते हैं, फर्नीचर बनाया जाता है।
शहर के बीच होने का एक नुकसान जेल को हुआ कि उसके हाथ से जमीन जाती रही। जिस तरह एग्रीकल्चर कॉलेज के लिए जमीन खेती के प्रयोग के लिए जरूरी होती है, उसी तरह जेल के लिए जमीन रोजगार की आदत के लिए जरूरी होती है ताकि कैदी जब सजा काटकर निकलें, तो बाहर की दुनिया में जिंदा रह सकें, और बस सकें। लेकिन जमीन घटती चली जाने से ऐसी संभावनाएं कम होती जा रही हैं।
हरियाणा की भाजपा सरकार का यह फैसला चाहे गायों को बचाने की नीयत से हो, इसके बारे में सोचने की जरूरत है। एक बात तो यह समझ आती है कि जेलों को शहरों के बाहर ले जाने की जरूरत है ताकि उन्हें बड़ी सी जमीन मिल सके, और वहां पर कैदियों को इंसानों की तरह कामकाज में लगाया जा सके। आज जहां-जहां जेलें शहरों के बीच हैं, वहां उनकी जमीन की कीमत इतनी बढ़ चुकी है कि उस जमीन को किसी प्रमोटर बिल्डर को नीलाम करके उससे शहर के बाहर बहुत बड़ी सरकारी जमीन पर इमारतें बनवाई जा सकती हैं, या सरकार खुद भी अपनी लागत से बाहर ऐसी जेल बनवा सकती है, और शहर के भीतर जेल की इमारत को कोई संग्रहालय बनाया जा सकता है।
जेलों के बारे में अभी कल ही एक रिपोर्ट आई है कि किस तरह देश की जेलों में क्षमता से बहुत अधिक कैदियों को रखा गया है। ऐसे में यह जरूरी है कि जेलों को बाहर ले जाएं, वहां कैदियों को खुले में काम करने के लिए बढ़ावा दिया जाए, तरह-तरह के रोजगार से उनकी उत्पादकता बढ़ाई जाए, वहां आसपास ऐसे गेस्ट हाऊस बनाए जाएं जिनमें कैदियों के परिवारों के लोग पहुंचकर एक-दो दिन अपने घरवालों से मिलकर उनके साथ रह सकें, और उनका हौसला बढ़ा सकें।
जेल की ऐसी बहुत सी बातों के लिए सबसे पहली शर्त तो बड़ी सी जमीन है, और अगर शहर के बाहर ऐसा किया जा सकता है, तो फिर जेलों से लगकर ही वृद्धाश्रम बनाए जा सकते हैं, और वहां रखे गए गरीब, बेघर, बेसहारा, या बीमार लोगों की मदद और सेवा करने के काम में कैदियों को लगाया जा सकता है। जब एक प्रदेश की सरकार गायों की सेवा के लिए कैदियों को लगाने का सोच सकती है, तो दूसरे प्रदेशों की सरकारें भी इंसानों की सेवा के लिए कैदियों की क्षमता का इस्तेमाल कर सकती है।
जेलों को कहने को तो सरकारें सुधारगृह कहती हैं लेकिन आज जेलों का जो माहौल सुनाई पड़ता है, वह इस सोच के साथ मेल नहीं खाता। इसलिए सचमुच ही सुधार अगर करना है, तो भीड़ भरी जेलों के बजाय ऐसे खुले ढांचे विकसित करने का एक बुनियादी फर्क लाना पड़ेगा जो कि समाज के लिए भी अधिक उत्पादक होगा। जेलों में बंद कैदी बाहर के कामगारों की तरह छुट्टी या त्योहार नहीं मनाते, रिश्तेदारियों में नहीं जाते, वे तकरीबन पूरे ही वक्त, तकरीबन हर दिन काम करते हैं, और वे बाहर खुले में काम करने वाले लोगों के मुकाबले अधिक उत्पादक भी रहते हैं, या कि रह सकते हैं।
आज जब देश में कौशल विकास या कौशल उन्नयन नाम से केन्द्र और राज्य सरकारों की अनगिनत योजनाएं चल रही हैं, जब स्किल डेवलपमेंट को देश को आगे बढ़ाने का एक बड़ा औजार मान लिया गया है तब कैदियों का स्किल डेवलपमेंट, या उनके हुनर का इस्तेमाल करते हुए बाकी लोगों को तरह-तरह के काम सिखाना आसानी से किया जा सकता है। देश में और कहीं भी कैदियों सरीखी संगठित वर्कफोर्स नहीं हो सकती जिनकी रोजाना की जिंदगी का एक-एक मिनट सरकार के हाथ में होता है।
जेल का बाकी दुनिया से मोटे तौर पर दो किस्म का रोजाना का कामकाज रहता है, एक तो वहां से कैदियों को अदालत या अस्पताल लाने ले जाने की नौबत आती है, दूसरा यह कि उनसे मिलने के लिए उनके परिवार के लोग आते हैं। ये दोनों ही काम थोड़ी सी बसों को लगाकर आसानी से किए जा सकते हैं, और इसके लिए शहर के बाहर से आना-जाना बहुत महंगा भी नहीं पड़ेगा। हकीकत तो यह है कि अगर सरकार शहर के बाहर की ऐसी जेलों के आसपास सरकारी अस्पताल बनाए, तो कैदी वहां पर काम कर सकते हैं, अगर सरकार इनके आसपास आईटीआई या पॉलीटेक्निक जैसे औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान खोलती है, तो ये कैदी वहां पर ट्रेनिंग दे सकते हैं, ये कैदी पशुपालन, मछलीपालन, पेड़ों की नर्सरी जैसे काम कर सकते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि सरकार के भीतर अगर कुछ उत्साही और कल्पनाशील लोग रहेंगे, तो शहर के बाहर की ऐसी बड़ी जेलों के आसपास एक पूरी बस्ती ऐसी बढ़ा सकते हैं जो कि पूरी तरह से उत्पादक हो।
इसके लिए पहली जरूरत यह लगती है कि अंग्रेजों के वक्त में जेलों के आसपास जिस तरह बड़ी-बड़ी जमीनें रखी जाती थीं, उस तरह की बड़ी जमीनों वाले किसी खुले इलाके में जेलों को ले जाया जाए। एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की राजधानी में जेल के लकड़ी टाल की जमीन पर मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, हॉस्टल बने थे, आज वक्त आ गया है कि पूरी की पूरी जेल इसी मेडिकल कॉलेज को देकर जेल को शहर के बाहर बना दिया जाए, और उससे इसी एक जेल में बंद हजारों कैदियों की एक नई जिंदगी शुरू हो सकती है। (Daily Chhattisgarh)

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