आम चुनाव में यह समझने की जरूरत कि गठबंधन हो कांग्रेसरहित या कांग्रेससहित

संपादकीय
29 दिसंबर 2018


देश में आज दो किस्म के गठबंधनों की शुरुआती सुगबुगाहट चल रही है जिसमें से एक कांग्रेस के साथ चल रहा है, और वह मोदी-एनडीए के खिलाफ है। दूसरी तरफ तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर एक ऐसे गठबंधन की पहल कर रहे हैं जो कि गैरकांग्रेसी-गैरभाजपाई होगा, और इसके लिए वे एक विशेष विमान लेकर अलग-अलग राज्यों में जा रहे हैं, और इसी बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी मुलाकात की तस्वीरें भी सामने आती हैं। यूं तो मुख्यमंत्रियों का प्रधानमंत्री से मिलना एक सामान्य बात है, लेकिन कुछ राज्यों में मुख्यमंत्रियों से मुलाकात के बाद जब केसीआर की तस्वीरें प्रधानमंत्री को शॉल ओढ़ाते आती हैं, तो अनायास यह लगता है कि क्या गैरकांग्रेस-गैरभाजपा गठबंधन दरअसल मोदी का काम आसान करने का काम तो नहीं है? 
भारतीय राजनीति की जमीनी हकीकत को अगर देखें तो यह साफ है कि आज भाजपा-एनडीए के पास देश में सबसे अधिक वोट लोकसभा चुनाव में जुटने की संभावना है। ऐसे एनडीए के खिलाफ कांग्रेस को साथ रखकर जो विपक्षी गठबंधन बनेगा, उसकी एक संभावना हो सकती है, लेकिन कांग्रेस से परहेज करके, अपने आपको एनडीए के खिलाफ बताते हुए जो गठबंधन बनेगा, वह शायद एनडीए का काम आसान ही करेगा। फिर भी आज के दिन इस बात को बिना शायद कहे कहना ठीक नहीं है क्योंकि उत्तरप्रदेश के दो सबसे बड़े दल, सपा और बसपा, ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि वे किस गठबंधन में जाएंगे, कांग्रेसरहित में, या कांग्रेससहित में? अब यह एक ऐसा नाजुक मौका है कि कांग्रेस को खुद भी बाकी दलों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनानी होगी, और इसके लिए एक बड़े दल की हैसियत से हो सकता है कि उसे कुछ दरियादिली भी दिखानी है। हम राज्यों के स्तर की बारीकियों पर गए बिना भी सतह पर तैरती जो खबरें देख रहे हैं, उनके मुताबिक मध्यप्रदेश में बसपा और सपा ने कांग्रेस की अल्पमत सरकार को साथ देकर कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनने दिया, लेकिन इसके एवज में इन दोनों पार्टियों के विधायकों को कुछ नहीं मिला। इसे लेकर सपा के अखिलेश यादव ने खासी नाराजगी भी जाहिर की है, और व्यंग्य भरे बयानों से आगे का एक अलग रास्ता गिनाया भी है। 
मोदी और एनडीए की कामयाबी इसी में होगी कि उसके खिलाफ दो ऐसे गठबंधन मैदान में रहें जो कि आपस में बराबरी जैसे भी रहें, और इनमें से किसी एक की जीत की अधिक संभावना न बन सके। पिछले चुनावों में तीन बड़े हिन्दी भाषी राज्यों में जिस तरह कांग्रेस ने कामयाबी पाई है, और भाजपा जिस तरह से कमजोर और अलोकप्रिय साबित हुई है, उसे देखते हुए लोकसभा चुनाव में इन तीनों राज्यों में मोदी के सामने एक बड़ी चुनौती जाहिर तौर पर साफ-साफ दिखती है। राज्यों के चुनावों में तो पार्टियों के प्रादेशिक संगठन भी अपने इलाके में गठबंधन के फैसले में हिस्सेदारी रखते हैं, लेकिन लोकसभा के चुनाव में कम से कम कांग्रेस को क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से उबरना होगा, और एक अधिक व्यापक और अधिक स्वीकार्य गठबंधन के लिए कोशिश करनी होगी। हमारा ऐसा ख्याल है कि इस बार के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को जो नुकसान झेलना पड़ा है उसमें मोदी सरकार के रूख, भाजपा की नीतियों, नोटबंदी और जीएसटी से उपजे नुकसान का भी खासा योगदान रहा है। छत्तीसगढ़ में तो पन्द्रह बरस से सत्तारूढ़ भाजपा जिस तरह पन्द्रह सीटों पर सिमट गई, वह पार्टी के लिए बड़ा सदमा होना चाहिए। और फिर चुनावी आंकड़ों को लेकर बैठें तो यह साफ-साफ दिखता है कि कांग्रेस और भाजपा अगर आमने-सामने लड़ी होतीं तो भाजपा को पन्द्रह भी नहीं, कुल तीन सीटें मिली होतीं। इस एक मिसाल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करके देखने की जरूरत है तो यह समझ आएगा कि जिस तरह छत्तीसगढ़ में जोगी, बसपा, या बागी तीसरे उम्मीदवारों ने भाजपा को दर्जन बर सीटों पर जीत दिला दी, कुछ वैसा ही मामला राष्ट्रीय स्तर पर मोदी-एनडीए के साथ भी हो सकता है, और केसीआर जैसा एक गठबंधन कांग्रेसयुक्त गठबंधन की संभावनाओं को घटा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टियों को यह समझने की भी जरूरत होगी कि कौन सी पार्टी या कौन सा गठबंधन एनडीए की बी टीम की तरह रहेंगे, और वोटकटवा का काम करेंगे।  (Daily Chhattisgarh) 

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