संपादकीय
30 दिसंबर 2018

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने तकरीबन हर दिन एक बड़ा फैसला लेने का सिलसिला जारी रखते हुए कल यह आदेश निकाला है कि पांच डिसमिल (2178 वर्गफीट) से कम की जमीन की खरीदी-बिक्री पर लगी रोक खत्म की जाती है। पिछले कई बरस से राज्य में यह प्रतिबंध लागू किया गया था, और बाईस सौ वर्गफीट से कम की जमीन की न बिक्री होती थी, न रजिस्ट्री होती थी, न ही उनका नामांतरण होता था। ऐसे में छोटे-छोटे लाखों लोग अपनी ही जमीन का कुछ नहीं कर पा रहे थे। जो लोग मुसीबत या जरूरत में रहते थे, उनके भी किसी काम की उनकी जमीन नहीं रह जाती थी। कांगे्रस ने अपने चुनाव जनघोषणा पत्र में भी इसका वायदा किया था, और सरकार के पहले पखवाड़े में ही यह आदेश जारी हो गया है।
दरअसल राज्य में पटवारी का दफ्तर, तहसील और राजस्व विभाग के बाकी दफ्तर, और रजिस्ट्री ऑफिस, इन सबको ऐसे नियमों में बांधकर रखा गया था कि उनसे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था। जमीन का बटांकन हुए बिना, पटवारी रिकॉर्ड में नाम चढ़े बिना रजिस्ट्री नहीं होती थी, और छोटी जमीन खरीदने की ताकत रखने वाले लोगों के सामने बड़ी कॉलोनियां बनाने वाले कारोबारियों से प्लॉट खरीदने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। लोग अपने मालिकाना हक की छोटी जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे। अब राज्य सरकार ने रजिस्ट्री के लिए खसरा नंबर में बटांकन की अनिवार्यता खत्म कर दी है और इससे इन विभागों का भयानक भ्रष्टाचार घट सकता है, खत्म हो सकता है। आज प्रदेश में लाखों ऐसे मामले सरकारी दफ्तरों के नियमों के जाल में फंसे हुए हैं, और इनको राहत मिलने से गरीब और मध्यम वर्ग को उनका जायज हक मिलेगा।
राज्य सरकार के गैरजरूरी प्रतिबंधों के बारे में दो-तीन दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा है कि नया रायपुर के आसपास की कई किलोमीटर जगह पर राज्य सरकार ने नाजायज प्रतिबंध लगा रखे हैं, और भू-स्वामी अपनी ही जमीन का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। नया रायपुर विकास प्राधिकरण ने ऐसे नियम लादे हुए हैं जिनसे जमीन का टुकड़ा पांच एकड़ से अधिक होने पर ही वहां कोई अपना मकान बना सकते हैं, वरना उस जमीन का और कोई इस्तेमाल छोड़ा नहीं गया है। सरकार ने शायद उजाड़ पड़े हुए नया रायपुर को बसाने के फेर में दसियों हजार दूसरे भू-स्वामियों को उनके जायज हक से दूर कर दिया है, और यह मनमानी भी खत्म होनी चाहिए।
रमन सिंह सरकार के शायद दूसरे कार्यकाल का एक और फैसला ऐसा है जिसके खिलाफ हमने इसी जगह पहले लिखा है। राज्य में पहले कॉलोनियां बनाने वाले लोगों पर यह नियम लागू किया गया था कि वे कुल रिहायशी इलाके का पन्द्रह फीसदी हिस्सा ईडब्ल्यूएस, गरीबों के लिए छोड़े। लेकिन बाद में इसमें फेरबदल करके यह किया गया कि बिल्डर या कॉलोनाईजर इस पन्द्रह फीसदी जमीन के बदले सरकार के पास एक रकम जमा करा दे तो सरकार उससे किसी सरकारी जमीन पर गरीबों के लिए मकान बनाएगी, और बिल्डर अपनी कॉलोनी की सौ फीसदी जमीन बड़े मकानों के लिए बेच सकेगा या उस पर मकान बना सकेगा। यह बात सामाजिक हकीकत को अनदेखी करने वाली थी क्योंकि कॉलोनियों के बड़े मकानों में रहने वाले लोगों को भी घरेलू कामकाज के लिए गरीब कामगारों की जरूरत पड़ती है, और कॉलोनी में गरीबों के लिए जगह खत्म कर दी गई। सरकार की गरीब-कॉलोनियां दूर-दूर बसती हैं, और वहां से काम करने के लिए लोगों का दूर की कॉलोनियां तक जाना मुश्किल रहता है। खासकर महिला कामगारों को अपने घर से बहुत दूर काम करने जाने पर न तो अपने बच्चों की देखरेख के लिए बीच में घर लौटने की सुविधा रहती है, और न ही अपना घरेलू कामकाज निपटाने की भी। नई सरकार को ऐसे गरीब-विरोधी प्रावधान को खत्म करना चाहिए और हर कॉलोनी में गरीबों के लिए निर्धारित अनुपात में जमीन छोडऩे या मकान बनाने की शर्त फिर से लागू करनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के पहले से भी यह देखने में आया है कि मास्टरप्लान के तहत जमीनों का इस्तेमाल जिस तरह निर्धारित किया जाता है, जैसे बदला जाता है, उससे सत्ता के आसपास के जमीन कारोबारियों का बड़ा भला होता है, और बिना पहुंच वाले छोटे-छोटे भू-स्वामियों का बड़ा नुकसान होता है। राज्य सरकार को अपनी मास्टरप्लान की नीति को न्यूनतम सरकारी दखल का रखना चाहिए और अगर लोगों को अपनी जमीन के इस्तेमाल की छूट न हो तो वैसे जमीन पहले सरकार खरीदे और फिर उसका मनचाहा भू-उपयोग करे। आज के कांगे्रस मंत्रिमंडल में ऐसे मंत्री हैं जो कि प्रदेश के पहले कांगे्रस मंत्रिमंडल में थे, और उन्होंने जमीनों पर ऐसी मनमानी रोक-टोक के मामले देखे हुए हैं। उस वक्त किसी की भी निजी जमीन को मास्टरप्लान में आमोद-प्रमोद कर दिया जाता था, और दूसरों की जमीनों को रिहायशी या कारोबारी बना दिया जाता था। अजीत प्रमोद जोगी सरकार में ऐसे कामकाज को लेकर यह नारा चल निकला था कि सरकार किसी की भी जमीन को आमोद-प्रमोद जोगी बना सकती है। मनमानी की ऐसी चली आ रही नीतियों को खत्म करना चाहिए और आम जनता के व्यक्तिगत अधिकार का सम्मान दुबारा कायम करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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