संपादकीय
27 दिसंबर 2018

देश में आतंकी घटनाओं को रोकने का एक खास जिम्मा और खास अधिकार एनआईए, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, को दिया गया है जिसने कल दिल्ली और उत्तर भारत में एक बड़े आतंकी गिरोह का भांडाफोड़ करने का दावा किया है। सत्रह जगहों पर एनआईए ने छापे मारे, दस संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया गया, और उनके पास से जब्त सामानों की नुमाइश की गई। इसमें हाथ से घर पर बनाए गए कुछ देसी कट्टे हैं, कुछ बारूद और बम बनाने के रसायन हैं, और साढ़े सात लाख रूपए नगद भी जब्त किए गए हैं। एनआईए का कहना है कि वे लोग हमलावर दस्ता तैयार कर रहे थे, और इसके लिए इन लोगों ने सोना चोरी करके हथियार और सामान खरीदे थे।
यह खबर आने के बाद से कुछ बातें अटपटी लग रही हैं। सत्रह जगहों पर छापे मारने के बाद अगर मुट्ठी भर घरेलू हथियार मिले हैं, जो पिस्तौलें मिली हैं, कारतूस किसी और साईज के मिले हैं, और इतनी जगहों पर बम बनाने के पच्चीस किलो रसायन मिले हैं। लोगों ने सोशल मीडिया पर याद दिलाया है कि अभी कुछ दिन पहले ही मेरठ के एक गिरोह के हथियार दिल्ली में पकड़ाए थे जिसमें शानदार क्वालिटी की विदेशी पिस्तौलें थीं, और दर्जनों की संख्या में थीं। ऐसे में क्या महीनों से काम करने वाले संदिग्ध आतंकी चार महीने की निगरानी के बाद महज इतने से सामानों के साथ पकड़ा सकते हैं? एनआईए के दावे को गलत कहना यहां मकसद नहीं है, लेकिन देश की इस सबसे बड़ी आतंक-रोधी एजेंसी की इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद, महीनों की निगरानी के बाद इतना सा हासिल चौंकाता है। और इसके साथ-साथ कई लोगों के मन में यह संदेह भी पैदा करता है कि क्या यह मीडिया में लगातार मोदी सरकार के खिलाफ चल रही सुर्खियों की तरफ से ध्यान हटाने के लिए की गई कार्रवाई है?
दरअसल समय-समय पर विपक्ष में रहने वाली पार्टियों ने सत्ता के तहत काम करने वाली तोता-मैना जैसी साख वाली निगरानी और जांच एजेंसियों पर हमले करके उनकी विश्वसनीयता को पर्याप्त घटा दिया है। इस काम में कोई एक पार्टी मुजरिम नहीं है, बल्कि जो पार्टी विपक्ष में रहती है उसे सीबीआई से लेकर आईबी तक और एनआईए तक सत्ता के काबू में मिट्ठू-मिट्ठू बोलने वाले तोता लगते हैं। ऐसे में कई लोगों के मन में यह शक पैदा होता है कि क्या समय-समय पर थलसेनाध्यक्ष के अटपटे और अवांछित बयानों से लेकर, कई एजेंसियों की कार्रवाई तक का काम सुर्खियां बदलने के लिए होता है? उत्तर भारत के जिस हिस्से में एनआईए की इतनी बड़ी और व्यापक कार्रवाई हुई है, उसमें छोटे-छोटे से मुजरिम भी इतने हथियार लिए बैठे रहते हैं। और पता नहीं यह कहां की समझदारी थी कि जब्त हथियारों की नुमाइश में एनआईए ने इन कथित आतंकियों के पास से जब्त दीवाली के सुतली बम भी सजाए हैं, जिनसे शायद एक कुत्ते को भी नहीं मारा जा सकता।
यह पूरा सिलसिला अटपटा लग रहा है, और इस मामले में हिरासत में लिए गए तमाम लोग मुस्लिम समुदाय के हैं। ऐसे में कई लोगों के मन में यह शक भी पैदा होता है कि क्या किसी एक धर्म या सम्प्रदाय के लोगों को बदनाम करने के लिए, परेशान करने के लिए ऐसी कार्रवाई की गई है? क्योंकि भारत का ताजा इतिहास बताता है कि जांच एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को अपनी कार्रवाई के लिए मुस्लिम अल्पसंख्यक लोग पसंदीदा शिकार दिखते हैं, और ऐसे लोग पांच-दस बरस गुजारकर अदालत से छूटकर जब घर लौटते हैं, तो उनकी जिंदगी तबाह हो चुकी होती है। हम चाहते हैं कि एनआईए की कार्रवाई ईमानदार हो, अदालत में साबित होने लायक हो, और उसकी विश्वसनीयता बनी रहे। देश की बड़ी-बड़ी संस्थानों के राजनीतिक इस्तेमाल का संदेह लोकतंत्र को कमजोर करता है। खुफिया एजेंसियां और जांच एजेंसियां देश-प्रदेशों में राजनीतिक दबाव के तले गीली मिट्टी की तरह मुड़ जाने, दब जाने की आदी हो चुकी हैं, और इस बार की इस बड़ी और व्यापक कार्रवाई की जब्ती बड़ा और व्यापक संदेह भी पैदा करती है। (Daily Chhattisgarh)
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