कांग्रेस को अमित शाह की ओर से धन्यवाद की चिट्ठी मिलनी चाहिए क्योंकि...

संपादकीय
11 दिसंबर 2018


विधानसभा चुनावों में कुल मिलाकर वोटरों का वोट भाजपा के खिलाफ गया है, और सबसे अधिक असमंजस से घिरे हुए दिख रहे छत्तीसगढ़ में मतदाताओं ने जिस तरह खुलकर अपना फैसला दिया है उससे राज्य में तो पन्द्रह बरस बाद भाजपा सत्ता से बाहर गई ही है, कुछ महीनों बाद के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के लिए बड़ी फिक्र का सामान खड़ा हो गया है। अभी इस पल छत्तीसगढ़ में भाजपा के मुकाबले  कांग्रेस तीन गुना से अधिक सीटों पर आगे चल रही है, उसके इतने विधायक विधानसभा में आते दिख रहे हैं कि वे बहुमत से खासे अधिक रहेंगे, और पार्टी के पास यह संभावना भी रहेगी कि इनमें से कुछ को लोकसभा का चुनाव लड़वाया जा सके। फिलहाल इस चुनाव में भाजपा की हालत देखते हुए देश की हर पार्टी को, और देश के हर प्रदेश को यह आत्ममंथन करने की जरूरत है कि पन्द्रह बरस के उल्लेखनीय कामों के बाद भी, मुखिया का चेहरा लोकप्रिय होने के बाद भी, किसी पार्टी की ऐसी दुर्गति क्यों हो सकती है। लोगों को याद होगा कि पिछले कुछ महीनों में जब राजस्थान पूरी तरह कांग्रेस के हाथ जाने की बात बार-बार सामने आ रही थी, जब मध्यप्रदेश में भी भाजपा पिछड़ती दिख रही थी, तब भी छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा और पन्द्रह बरस के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लेकर कोई भी विश्लेषक यह बात नहीं कह पा रहे थे कि उनकी पार्टी की चुनाव में ऐसी बुरी शिकस्त होगी।

छत्तीसगढ़ ने इस चुनाव में राज्य बनने के बाद से दूसरी बार ऐसा त्रिकोणीय संघर्ष देखा था जिसमें जोगी-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के सामने एक चुनौती न सही, एक उलझन खड़ी कर दी थी और अधिकतर लोगों को यह लगता था कि त्रिकोण का यह तीसरा कोण किसका पलड़ा भारी करेगा, और किसका हल्का। ऐसी चर्चा थी कि बसपा और जोगी के इस अनायास और अप्रत्याशित गठबंधन के पीछे भाजपा की राष्ट्रीय स्तर की कोशिश थी। और फिर ऐसी भी चर्चा थी कि छत्तीसगढ़ में ठीक पिछले चुनावों की तरह इस बार भी सत्तारूढ़ भाजपा जोगी पर मोटा दांव लगाएगी ताकि कांग्रेस को मोटा नुकसान हो सके। यह अलग बात है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जोगी कांग्रेस के भीतर थे, और इस बार वे कांग्रेस के बाहर, अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाकर, बसपा से गठबंधन के साथ, दोनों ही पार्टियों की नीति-रणनीति तय करते हुए मैदान में थे, और भाजपा इस बार भी उनके असर को लेकर उम्मीद से थी। लेकिन जोगी के मोर्चे पर एक बड़ा फर्क यह पड़ा कि सतनामी समाज के जो एक प्रभावशाली धर्मगुरू बालदास जो कि पिछले बार उनके साथ थे, और कांग्रेस के खिलाफ काम कर रहे थे, उनको इस बार कांग्रेस ने समय रहते अपनी पार्टी में शामिल करा लिया था, और ऐसा लगता है कि सीटों के आंकड़े इस एक मुद्दे पर कांग्रेस का भविष्य उन दस अनुसूचित जाति सीटों पर तय कर रहे हैं जिनमें से नौ सीटें पिछली बार जोगी-गुरू बालदास की कथित मदद से भाजपा को मिली थीं, और रमन सरकार को अप्रत्याशित तीसरा कार्यकाल मिला था।

लेकिन जब कोई सरकार तीन कार्यकाल के बाद जाती है, तो उसके पीछे महज राजनीतिक कारण नहीं होते, सरकारी और प्रशासनिक वजहें भी होती हैं। रमन सरकार ने इतने बरसों में अनगिनत अच्छे काम किए, लेकिन बहुत से काम उससे गलत भी हुए, या कि उसने गलत भी किए और उसका दाम भी अभी चुकाना पड़ा। राज्य सरकार के आधे से अधिक बड़े-बड़े दिग्गज मंत्री इस पल जिस तरह पीछे चल रहे हैं, वह भाजपा को पूरा राज्य गंवाने के टक्कर का ही सदमा दे रहा होगा, लेकिन ऐसे नतीजे इस पार्टी की आंखें अगर अगले छह महीने में खोल सकें, तो हो सकता है कि वह लोकसभा चुनाव में ऐसा ही, या इससे भी बड़ा नुकसान झेलने से बच सके। पर फिलहाल इन चुनावी नतीजों के पीछे की सरकारी वजहों को देखें तो रमन सरकार भ्रष्टाचार, व्यापक भ्रष्टाचार, और बड़े मंत्रियों के जाहिर और चर्चित भ्रष्टाचार से लेकर निचले सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार तक से बच नहीं पाई। खुद भाजपा के लोगों के बीच इस बात की खुलकर चर्चा थी कि किस तरह भ्रष्ट मंत्रियों के भागीदार भ्रष्ट अफसरों का एक छोटा सा संपन्न तबका बन गया था, और बाकी की सत्तारूढ़ पार्टी के बहुसंख्यक आम लोगों का एक विपन्न तबका रह गया था जिसने कि इस चुनाव में शायद पार्टी का काम नहीं किया। एक दूसरी बात यह रही कि छत्तीसगढ़ में पन्द्रह बरस सत्तारूढ़ रहते हुए भाजपा ने पिछले कई बरसों से एक संगठन के रूप में काम करना बंद कर दिया था, और जिलों में मुख्यमंत्री को माला पहनाने के लिए भी जिले के भाजपा नेता कलेक्टरों की तरफ हाथ बढ़ाते थे कि मालाओं का सरकारी इंतजाम तो है ही। छत्तीसगढ़ भाजपा कमल के फूल के बजाय सूरजमुखी के फूल की तरह हो गई थी जो कि सत्ता के सूरज की तरफ घूम जा रही थी, उसी तरफ निहार रही थी।

जहां तक छत्तीसगढ़ कांग्रेस का सवाल है, तो इसी जगह हमने पहले कई बार यह बात लिखी कि प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष भूपेश बघेल की अगुवाई में पार्टी का राज्य संगठन, कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन के मुकाबले भी बेहतर काम कर रहा था। पिछले पांच बरस का शायद ही कोई दिन हो जब भूपेश बघेल ने सरकार पर कोई न कोई हमला जारी न रखा हो। और सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी से उनके किसी समझौते की कोई चर्चा भी कभी नहीं रही। अगर महज संघर्ष के एवज में पार्टी किसी को सरकार का मुखिया बनाए, तो भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव उसके सबसे बड़े हकदार हैं, यह अलग बात है कि इस पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदार, और उस पद के काबिल आधा दर्जन नेता चुनाव जीतकर आ रहे हैं। 

भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर यह आत्मविश्लेषण भी करना चाहिए कि नोटबंदी और जीएसटी के दो मोदी-फैसलों का राज्यों के चुनावों पर कितना बुरा असर पड़ा। हमारा अंदाज है कि कम से कम दो फीसदी वोट इन वजहों से हर राज्य में भाजपा के बिगड़े हैं। छत्तीसगढ़ सहित सरकार गंवाने वाले सभी राज्यों में भाजपा को यह आत्ममंथन भी करना चाहिए कि उसकी ऐसी बुरी हार क्यों हुई है, और जनता ने तरह-तरह के सरकारी तोहफों के बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी को क्यों नकार दिया? खासकर छत्तीसगढ़ में हमारा यह देखा हुआ है कि अधिकारियों की मदद से सत्तारूढ़ भाजपा ने हर मतदाता परिवार के स्तर पर वोटरलिस्ट में ही उन तमाम तोहफों, फायदों, और रियायतों को दर्ज कर रखा था जो कि किसी भी परिवार को इन बरसों में सरकार ने दिए हैं। शायद ही किसी राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी ने ऐसी तैयारी की हो। लेकिन भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर इस बात का भी विश्लेषण करना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनसे अधिक भाजपाध्यक्ष अमित शाह, और उनसे भी अधिक योगी आदित्यनाथ की सभाओं की बरसात से छत्तीसगढ़ की धरती भीगी कैसे नहीं? स्मृति ईरानी की करीब दो दर्जन सभाओं की स्मृति भी मतदाताओं को वोट के दिन नहीं रह गई। शांत छत्तीसगढ़ में योगी के घोर साम्प्रदायिक और भड़काऊ-उकसाऊ भाषणों को लेकर हमने पहले भी इसी जगह पर बार-बार लिखा है, और छत्तीसगढ़ की शांत जनता ने इस भड़कावे के खिलाफ भी वोट दिया होगा ऐसा हमारा मानना है। हार के राजनीतिक विश्लेषण की बात करें तो इस बात को अनदेखा करना गलत होगा कि भाजपा की तीन चौथाई उम्मीदवारों वाली बड़ी लिस्ट मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की मर्जी के खिलाफ थी, और दिल्ली में जिस शाम यह तय हुई, उसी शाम निराश मुख्यमंत्री विशेष विमान का इंतजाम करके रायपुर लौट आए थे।

पन्द्रह बरस विपक्ष में रहने के बाद कांगे्रस के नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई मुद्दा भी इस चुनाव में नहीं था, और भाजपा के नेताओं के कपड़े दाग-धब्बों से भरे हुए थे। कांग्रेस के नेताओं ने कुछ सही वजहों, और कुछ बदनीयत कोशिशों को अनदेखा करते हुए जिस तरह की एक अभूतपूर्व एकता के साथ यह चुनाव लड़ा, वह भी देखने लायक था। राहुल गांधी की अगुवाई में जिस तरह बदलाव का नारा छत्तीसगढ़ में चला, उससे लहर का अंदाज मतदान के पहले ही लगने लगा था। एक विपन्न कांग्रेस पार्टी ने एक अतिसंपन्न भाजपा के खिलाफ जिस तरह यह चुनाव जीता है, उसके नतीजे देखने लायक हैं। कांग्रेस के घोषणापत्र का यह मुद्दा काम आया दिखता है कि सरकार बनने के दस दिन में गंगाजल की कसम, किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा, और खासे बड़े दामों पर किसानों का सारा धान खरीदा जाएगा। ऐसी घोषणा देश में किसानी पर छाए जानलेवा खतरे से लोगों को बचाने वाली थी, और उसका असर भी गिना जाना चाहिए। 

इस पल छत्तीसगढ़ की नब्बे सीटों पर लीड के जो आंकड़े आ रहे हैं, वे अविश्वसनीय हैं, कांग्रेस 66 सीटों पर आगे है, और भाजपा कुल 16 सीटों पर। जोगी और बसपा 7 सीटों पर आगे चल रहे हैं, और एक सीट पर अन्य। पूरे प्रदेश में भाजपा का एक किस्म से सफाया हो गया है, और हाथ ने कमल को मुट्ठी में कुचलकर रख दिया दिखता है। आखिर में छत्तीसगढ़ कांग्रेस अमित शाह से धन्यवाद की एक चिट्ठी की उम्मीद कर सकती है क्योंकि मिशन-65 का उनका टारगेट कांग्रेस ने पूरा किया है, भाजपा ने नहीं।  
 - सुनील कुमार     
(Daily Chhattisgarh) 

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