नया रायपुर और नई सरकार, नए सिरे से फैसले की जरूरत

संपादकीय
23 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़ में नई सरकार को पिछली सरकार के जिन खर्चीले फैसलों पर सोचना चाहिए, उनमें से एक अटल नगर नाम की राजधानी भी है। नया रायपुर के नाम से इसे बनाना तो राज्य बनने के बाद से शुरू हुआ था, लेकिन तीन बरस की कांग्रेस सरकार के वक्त बस एक शिलालेख रखा गया था, उसकी पूरी योजना और उस पर पूरा खर्च पिछले पन्द्रह बरसों में हुआ है। इन बरसों में राज्य सरकार ने इसे शहर बनाने के लिए, और पांच लाख की आबादी वाला शहर बनाने के लिए लाख कोशिशें कीं, लेकिन उसका कोई नतीजा निकल नहीं पाया है। नया रायपुर में तकरीबन सौ फीसदी खर्च सरकार का खुद का हुआ है, और इक्का-दुक्का निजी कंपनियों ने दो-चार इमारतें बनाई भी हैं, तो भी वह राजधानी किसी तरह बस या पनप नहीं पा रही है। राज्य सरकार ने लोगों को वहां भेजने के लिए अपने कर्मचारियों को बाकी प्रदेश में मिलने वाले आवास भत्ते से दोगुना आवास भत्ता देना शुरू किया, शासन के हाऊसिंग बोर्ड ने सैकड़ों या हजारों करोड़ से वहां बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बनाईं, लेकिन वे बस नहीं पाईं। इन मकानों को सरकार ने खुद ही पुलिस विभाग को बेचना चाहा, लेकिन पुलिस ने इन्हें खरीदने से मना कर दिया क्योंकि उसके पास अपना पुलिस हाऊसिंग बोर्ड है जो जरूरत के मुताबिक जगहों पर कॉलोनियां बनाता है, और नई राजधानी में पुलिस को बसाने का कोई तुक नहीं है। नया रायपुर या अटल नगर, जो भी कहें, उसमें सड़कों और फुटपाथों का इतना बड़ा ढांचा तैयार किया गया है कि उसकी उपयोगिता इन पन्द्रह बरसों में भी बढ़ते-बढ़ते एक फीसदी भी नहीं हो पाई है, और निर्माण की अपनी एक जिंदगी होती है जो कि इन सबको खत्म कर ही देगी। इसके बाद इनका रख-रखाव एक सफेद हाथी को पालने जैसा है जिसे खिलाना भी महंगा पड़ता है, और नहलाना भी। 
नया रायपुर को अधिक से अधिक बड़ा बनाने में सत्ता में बैठे अफसरों और नेताओं की बराबरी से दिलचस्पी थी। और हमने इसी जगह इसे एक महंगे ताजमहल जैसा खर्चीला बताया था, और इस पर फिजूलखर्ची रोकने की नसीहत भी दी थी। लोगों ने देश और दुनिया की सबसे बड़ी योजनाबद्ध राजधानी बनाने का एक रिकॉर्ड कायम करने के लिए नया रायपुर पर हजारों करोड़ रूपए खर्च किए, लेकिन उसके बाद भी न तो मौजूदा पुराने रायपुर शहर से उसका कोई रिश्ता कायम हो सका,और न ही बिना मजबूरी शहर के कोई लोग नया रायपुर जाते हैं, वहां जाकर बसने की बात तो दूर ही रही। राज्य सरकार ने कुछ बरस पहले एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय सेमीनार भी करवाया था जिसमें कई देशों के विशेषज्ञों ने आकर पुराना रायपुर और नया रायपुर के बीच रिश्ता कायम करने की योजनाएं भी बनाई थीं, लेकिन वह बात नामुमकिन थी, और कुछ हो नहीं सका। 
हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को अपने अफसरों से परे के कुछ शहरी योजना विशेषज्ञों को बुलाकर अटल नगर पर आगे खर्च के पहले यह तैयारी करनी चाहिए कि वह खर्च किस तरह उत्पादक भी हो। जिस प्रदेश में गरीबों को एक रूपए किलो चावल मिलने से वे दो वक्त खा पाते हैं, उस प्रदेश में ऐसी राजधानी पर ऐसा आसमान छूता खर्च ठीक नहीं है, और अब चूंकि यह ढांचा छाती पर वजन की तरह बैठा हुआ है, इसलिए मौजूदा शहर को उससे जोडऩे के लिए राज्य सरकार को भूमि उपयोग को इस तरह बदलना चाहिए कि शहर से मंत्रालय तक का 25 किलोमीटर का फासला आबाद हो सके। इन डेढ़ दशकों में राज्य सरकार ने इस राजधानी को आबाद करने के लिए इसके आसपास की जमीनों के इस्तेमाल पर बहुत बुरी बंदिशें लगाईं जो कि असंवैधानिक भी थीं, लेकिन लोग अदालत तक नहीं गए, इसलिए वे चल रही हैं। लोग अपनी निजी जमीन का कैसा उपयोग करें, इस पर एक सीमा से अधिक रोकटोक सरकार की नहीं होना चाहिए वरना सत्ता में बैठे लोग ऐसे नियंत्रण से ही करोड़ों की जमीन की अरबों का बना लेते हैं, या किसी की करोड़ों की जमीन बाजार में लाखों की भी नहीं रह जाती। राजनीतिक या प्रशासनिक मनमानी से लोगों की जिंदगी पर ऐसा फर्क करना ठीक नहीं है। नया रायपुर के आसपास का भू-उपयोग ऐसी ही मनमानी का शिकार रहा है, और इसे किसी भूमाफिया, या किसी गिरोह की मर्जी से परे सरकार को लोगों के ऊपर छोडऩा चाहिए कि वे अपनी संपत्ति का अपनी जरूरत का इस्तेमाल कर सकें। बीते बरसों में राज्य सरकार ने लोगों को निर्माण की इजाजत इसलिए नहीं दी कि वह नया रायपुर को आबाद करना चाहती थी। सरकार की अपनी योजनाएं लोगों की निजी जिंदगी को कुर्बान करने की कीमत पर नहीं बननी चाहिए। नई सरकार को नया रायपुर को लेकर एक व्यापक जनसुनवाई करनी चाहिए, और इसके आगे के भविष्य को नए सिरे से तय करना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें