मध्यप्रदेश की मजबूरी आगे एक व्यापक तालमेल बनाने की संभावना बन सकती है

संपादकीय
12 दिसंबर 2018


मध्यप्रदेश में कल रात तक यह असमंजस जारी था कि वोटों की गिनती के बाद अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनते दिख रही कांग्रेस को राज्यपाल सरकार बनाने का न्यौता देती हैं या नहीं। देश में कई केन्द्र सरकारों के रहते हुए राज्यपालों ने कई मौकों पर गलत फैसले भी लिए हैं जो कि सुप्रीम कोर्ट तक गए और अदालत को राज्यपाल का फैसला पलटना भी पड़ा है। लेकिन सभी लोगों की समझदारी मध्यप्रदेश में काम आते दिख रही है, और मतदाताओं से सीटों का बहुमत न मिलने पर जाते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आज सुबह यह घोषणा की है कि वे सरकार बनाने का दावा नहीं करेंगे। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष और भावी मुख्यमंत्री समझे जा रहे कमलनाथ ने कल रात ही राज्यपाल को पत्र लिखकर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया था, और लिखा था कि जो अन्य विधायक जीते हैं उन्होंने कांग्रेस को समर्थन का पूरा भरोसा दिया है। लेकिन कल रात तक चुनाव आयोग की गिनती पूरी नहीं हो पाई थी, इसलिए कानूनी रूप से राज्यपाल पर कांग्रेस को तुरंत न्यौता देने का बोझ नहीं था, और आज शायद वे ऐसा करें। मध्यप्रदेश में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी तो है, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे दो और विधायकों की कमी है, इस मौके पर बसपा की मुखिया मायावती ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में अपने विधायकों का समर्थन कांग्रेस को देने की घोषणा की है। राजस्थान में कांग्रेस अपने बूते पर स्पष्ट बहुमत पा चुकी है, ठीक छत्तीसगढ़ की तरह। लेकिन बसपा की यह घोषणा उन दोनों प्रदेशों के लिए एक साथ की गई है जिसका एक रणनीतिक महत्व भी है। अगर मध्यप्रदेश में कांग्रेस को बसपा का समर्थन चाहिए तो उसे राजस्थान में भी सरकार में बसपा को साथ रखना होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह एक वक्त स्कूल की जरूरी किताब बाल भारती के साथ एक गैरजरूरी पहाड़े की किताब दुकानदार जबर्दस्ती थमाते थे। 

कल जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत के जश्न के बीच प्रदेश के पार्टी प्रभारी पी.एल. पुनिया ने पत्रकारवार्ता की, तो उन्होंने बसपा और जोगी के गठबंधन के खिलाफ आलोचना के भारी-भरकम विशेषण इस्तेमाल करते हुए उसे एक अनैतिक गठबंधन करार दिया। और कुछ घंटों के भीतर ही उनकी पार्टी को मध्यप्रदेश में बसपा के साथ की जरूरत पड़ गई। अब कांग्रेस पार्टी के सामने दो तरह की दुविधाएं दिखाई पड़ती हैं। राज्यों में वह अपने स्थानीय नेताओं की पसंद और नापसंद से बसपा के साथ गठबंधन पर फैसला कर रही है, और इसी के चलते छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में कांग्रेस ने बसपा को साथ नहीं रखा। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तो पार्टी को बसपा की जरूरत नहीं पड़ी, लेकिन डांवाडोल मध्यप्रदेश में हाथी की सवारी के बिना हाथ खाली ही रह जाने वाला था। इस नौबत से इन दोनों पार्टियों को अपनी रणनीति के बारे मेें फैसला करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में ऐसी चर्चा है कि जोगी के साथ बसपा का राज्य स्तर का एक गठबंधन करवाने में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने दिलचस्पी ली थी, और इसे करवाया था। चुनावी रणनीति के हिसाब से यह एक ठीक दांव था, और इसी के चलते हुए छत्तीसगढ़ में जोगी-बसपा ने बहुत सी सीटों पर कांग्रेस के परंपरागत वोटर-तबके के इतने वोट बिगाड़े, या हासिल किए कि भाजपा दहाई के अंक तक पहुंच पाई। 

आने वाले महीने राष्ट्रीय स्तर पर कई तरह के व्यापक तालमेल और गठबंधन के रहने वाले हैं। तेलुगुदेशम के चन्द्राबाबू नायडू ने एक पहल करके दिल्ली में सवा दर्जन राजनीतिक दलों को एकजुट किया, और मोदी की अगुवाई वाले एनडीए के खिलाफ साथ खड़े रहने के लिए लोगों से बातचीत की। इस बातचीत के अगले ही दिन जिस तरह से राज्यों के चुनावी नतीजे आए, और उनमें जनता का फैसला भाजपा के खिलाफ रहा, कांग्रेस को अभूतपूर्व, और उम्मीद से अधिक समर्थन मिला, उससे ऐसे विपक्षी तालमेल को ताकत मिली। लेकिन चन्द्राबाबू की पहल से समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और बसपा की मायावती ने अपने आपको अलग रखा। इन दोनों के बिना देश का ऐसा कोई विपक्षी गठबंधन नहीं बन सकता जो कि शर्तियां एनडीए को हरा सके। इसलिए भाजपा के खिलाफ जो लोग लडऩा चाहते हैं, उन्हें हाथ में हाथ डालकर चलना होगा, और अखिलेश-मायावती को साथ रखना होगा। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को जिस मजबूरी के साथ बसपा का समर्थन लेना पड़ रहा है, या मायावती खुद होकर दो राज्यों में कांग्रेस को समर्थन दे रही है, उस सहमति को एक व्यापक तालमेल तक बढ़ाना चाहिए, और इन दोनों पार्टियों के जो मित्र दल हैं, उन्हें इन दोनों पर जोर डालकर इनके मतभेद घटाने चाहिए। (Daily Chhattisgarh) 

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