संपादकीय
7 दिसंबर 2018

हाल ही में कुछ चर्चित शादियों या सगाईयों को लेकर भारत में बड़े जोर-शोर से यह बहस छिड़ी है कि अरबपति-खरबपति अपने निजी आयोजनों पर किस तरह और किस कदर फिजूलखर्ची करते हैं। पता नहीं यह बात सच है या नहीं, लेकिन मुकेश अंबानी की बेटी की शादी या सगाई का कार्ड ही तीन लाख रूपए का बताया जा रहा है। प्रियंका चोपड़ा की शादी पर जिस तरह करोड़ों रूपए खर्च किए गए, और उन्होंने जिस तरह शादी की तस्वीरें खींचने का पहले से सौदा एक किसी खास एजेंसी से कर रखा था, उससे शायद शादी का खर्च वसूल भी हो चुका है। लेकिन इस पूरी बहस में बार-बार यह बात सामने आ रही है कि यह फिजूलखर्ची है।
अब यह समझने की जरूरत है कि मान लें कि ये लोग किसी आर्य समाज मंदिर या किसी गुरुद्वारे में जाकर शादी कर लेते, तो उससे इनके पास बच गया पैसा किसके काम आता? क्या वह पैसा हिन्दुस्तान के गरीबों के काम आता? यहां के सार्वजनिक कामकाज में इस्तेमाल होता? या फिर वह इनके बैंक खातों में रहता, और ये लोग दुनिया के दूसरे देशों में उससे बंगले खरीदते, दुनिया के सबसे महंगे गहने खरीदते? उससे हिन्दुस्तान में किसका भला होता? ऐसी फिजूलखर्ची जब जनता के पैसों से सरकार करती है, तब तो वह जनता को नुकसान पहुंचाने वाली रहती है क्योंकि एक बरस में चौथी बार राजपथ पर डामर की एक और तह चढ़ाने में जो खर्च आता है, उससे किसी गांव तक पहली बार सड़क बन सकती थी। लेकिन अंबानी अगर बीस मंजिला मकान बनाता है, या प्रियंका चोपड़ा अमरीका में बड़ा सा बंगला खरीदती है, तो उसमें जनता का पैसा तो लगा नहीं है। न ही ये लोग जनता पर अपनी कमाई खर्च करने के लिए जाने जाते हैं।
इसलिए अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था को कुछ समझने की जरूरत है कि लोगों के बैंक खातों में, उनके बैंक लॉकरों में, या उनकी जायदाद में लगा हुआ पैसा देश के काम का नहीं रहता। जब वे शादी में या किसी और दावत में फिजूलखर्ची करते हैं, तो उससे ऊपर से लेकर नीचे तक हजारों लोगों को रोजगार मिलता है, जिसके बिना उनका घर नहीं चला होता। अगर तीन लाख रूपए का निमंत्रण पत्र बक्से की तरह किसी को भेजा गया है, तो उसे पहुंचाने के लिए भी किसी को हजार-पांच सौ रूपए मिले होंगे। हर दावत के लिए पकाने, उसे सजाने में भी कई लोगों की कमाई होती है, और वह कमाई धीरे-धीरे नीचे की तरफ बहकर गरीब कामगारों तक भी किसी न किसी तरह पहुंचती है। इसलिए फिजूलखर्ची अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा ही फिजूल नहीं होती अगर वह किसी देश के ढांचे को बनाने में इस्तेमाल होने वाली नहीं रहती, खेतों को उत्पादक बनाने में इस्तेमाल होने वाली नहीं रहती, या गरीब बच्चों के लिए स्कूल-कॉलेज बनाने वाली नहीं रहती। रईसों की फिजूलखर्ची समाज के भीतर की असमानता को तो चीख-चीखकर बताती है, लेकिन वह गरीबों के लिए नुकसानदेह नहीं रहती। नुकसानदेह तो वह अमीरी रहती है जो दूसरे देशों में खर्च होती है, या तिजोरियों में बंद रह जाती है। अपने देश में की गई फिजूलखर्ची देश की अर्थव्यवस्था में कुछ जोड़ती ही है, बजाय इटली जाकर शादी करने के। इसलिए भारत में होने वाले महंगे समारोहों को लेकर लोगों पर हमले नहीं करने चाहिए क्योंकि ये लोग अपनी निजी दौलत समाज को तो देने जा नहीं रहे थे। ये समारोह खर्चीले जरूर होते हैं, लेकिन ये फिजूलखर्ची नहीं होते।
(Daily Chhattisgarh)
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