जापानियों से अपनी तुलना करें तो हिंदुस्तानी गटर में डूब मरें

17 जून 14
संपादकीय
ब्राजील में चल रहे विश्वकप फुटबॉल की एक तस्वीर है जिसमें मैच हार जाने के बाद जापान के दर्शकों को स्टेडियम के अपने पूरे हिस्से से कचरा उठाते देखा जा सकता है। इस खबर के साथ यह जानकारी भी है कि जापान में मैचों के बाद यह आम सांस्कृतिक परंपरा है। दूसरी तरफ मुंबई की एक खबर है कि सड़क पर कार से कूड़ा फेंकने वाले बददिमाग रईसों को जाकर उनकी गलती बताने वाले को उन लोगों ने किस बुरी तरह पीटा है। हमने अभी लगातार तस्वीरें छापी हैं कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन पर किस तरह की गंदगी रहती है कि लोग नल से पानी न भर सकें, और मजबूरी में बोतलें खरीदें। महीनों से हर अखबार में इस राजधानी की खबरें छप रही हैं कि किस तरह पूरा शहर घूरा बना हुआ है, और म्युनिसिपल सफाई नहीं करवा पा रही है।
अब जापानियों की मिसाल को लें, तो क्या सचमुच हर कचरे को साफ करने के लिए म्युनिसिपल की जरूरत पडऩी चाहिए? लोग आसपास का कचरा उठाकर कूड़ेदान में फेंकें, वैसी जापानियत की उम्मीद हम अपनी जिंदगी में हिंदुस्तान जैसे गंदे देश में नहीं करते, लेकिन कम से कम अपने खुद के कूड़े को कूड़ेदार या घूरे में फेंकना भी जिन लोगों से नहीं होता, उन लोगों को यह अंदाज ही नहीं है कि नालियों और गटर में उतरकर इंसानों को किस तरह कचरा निकालना पड़ता है। हमारा यह पुख्ता अंदाज है कि कूड़ा पैदा करने वाले रईसों को अगर एक बार ऐसे गटर में उतरना पड़े, तो उससे बचने के लिए वे अपनी दौलत का एक खासा बड़ा हिस्सा देने को तैयार हो जाएंगे। जो लोग दूसरे इंसानों को गटर में उतारने के लिए इस तरह से कूड़ा फेंकते हैं, नालियों को जाम कर देते हैं, वे इंसान किसी सभ्य समाज में रहने के लायक नहीं हैं, दिक्कत यह है कि पैसे वालों को हिंदुस्तानी जुबान में बड़ा आदमी या अच्छा आदमी कहा जाता है। जबकि पैसों का इन दोनों ही खूबियों से कोई लेना-देना नहीं होता, और हमारा अंदाज तो यह है कि पैसा अधिकतर लोगों को उनकी जिम्मेदारी से दूर कर देता है, और उन्हें दूसरों के हक छीन लेने की खुशफहमी दे देता है। कारों से जो लोग सड़कों पर अपना कचरा फेंकते हैं, वे बड़ी कारों के बावजूद बड़े लोग नहीं होते, वे बहुत ही छोटी समझ वाले घटिया लोग होते हैं। 
हिंदुस्तान में लोगों को सामाजिक जिम्मेदारी सिखाने की बहुत जरूरत है। हर किसी को अपने हक का बहुत ख्याल है, और दूसरों की जिम्मेदारी का भी उतना ही। लेकिन हिंदुस्तानियों से अगर पूछा जाए कि दूसरों के हक, और अपनी खुद की जिम्मेदारी के बारे में उनकी क्या सोच है, तो इस बारे में उनको मानो सिखाया ही नहीं जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। कुछ लोग अपनी आपराधिक लापरवाही और बेफिक्री के चलते दूसरे लोगों को गटर में उतरने पर मजबूर करें, तो ऐसे लोगों के खिलाफ बड़े जुर्माने और सजा का इंतजाम होना चाहिए। कोई भी समाज इतनी गंदगी के साथ नहीं जी सकता, और हिंदुस्तान में अधिक कचरा पैदा करने वाला संपन्न तबका शहरी ढांचे के भीतर गंदगी पैदा करने का जिम्मेदारी सबसे अधिक रहता है। इस बारे में सरकार और समाज दोनों को सोचना चाहिए। 

हेलमेट सिरों से फटने और कटने की आजादी तो छीनता है, लेकिन...

16 जून 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ बनने के बाद हेलमेट लागू करने का हौसला जुटाने में यहां की सरकार को पूरे चौदह बरस लग गए। जब जोगी सरकार ने लागू करने की कोशिश की तो उस समय विपक्ष की गैरजिम्मेदारी निभा रही भारतीय जनता पार्टी को यह लगा था कि हेलमेट सिरों की फटने और कटने की आजादी को छीन रहा है। तुरंत सड़कों पर विरोध हुआ, मानो कि कांगे्रस सरकार होती कौन है लोगों के सिर फुड़वाने का हक छीनने वाली। फिर रमन सरकार आई, कुछ अधिक जिम्मेदारी से कांगे्रस के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, दोनों से हेलमेट लागू करने के लिए सहमति लेकर, उनसे अपील जारी करवाकर भाजपा सरकार ने हेलमेट लागू करने की कोशिश की, तो पूरे प्रदेश में सबसे अधिक राजधानी रायपुर की कांगे्रस पार्टी को इससे चोट पहुंची, और इसके शहर अध्यक्ष गाली-गलौच पर उतर आए। उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं सहित सरकार के खिलाफ नारा बनाया कि हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को। 
यह कांगे्रस का अंदरूनी मामला था कि प्रदेश अध्यक्ष चरण दास महंत और नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे के खिलाफ उन्हीं की पार्टी के पदाधिकारी ऐसा नारा सार्वजनिक रूप से लगा रहे थे, लेकिन ऐसी गंदी और घटिया राजनीति से सबसे बड़ा नुकसान जनता का हुआ, जो कि गैरजिम्मेदार नेताओं के झांसे में आकर यह मान बैठी कि हेलमेट का नियम सरकार और पुलिस का है। पहले भाजपा के नेताओं ने, और फिर कांगे्रस के नेताओं ने विपक्ष की गैरजिम्मेदारी निभाते हुए जनता को ऐसे झांसे में रखा कि उनका सिर भी मानो सरकार की संपत्ति है, और उसके फूटने से उनका भला क्या नुकसान होगा। 
लोगों को बेवकूफ बनाकर अपनी राजनीति चलाने वाले घटिया दिमाग के छोटे-छोटे नेताओं के असर में एक समय अजीत जोगी ने हेलमेट लागू नहीं किया, और एक समय रमन सिंह ने। नतीजा यह हुआ कि यह राज्य बनने के बाद हजारों लोग सड़कों पर सिर्फ सिर फटने से मारे गए, जो कि हेलमेट रहने से बच सकते थे। हम यह देखकर हैरान होते हैं कि पूरे पांच बरस के लिए प्रदेश को चलाने की जिम्मेदारी और अधिकार जिस निर्वाचित सरकार को मिलते हैं, वह सरकार जरा से सड़कछाप नारों से सहमकर किस तरह मौत को खुली छूट दे देती है। इसी देश में बहुत से प्रदेशों में बहुत से शहरों में बरसों से हेलमेट इस तरह चल रहे हैं, कि वे लोगों को बोझ नहीं लगते, हिफाजत लगते हैं। राजस्थान के जयपुर जैसे शहर में बरसों से दुपहियों के पीछे बैठने वाली घाघरा और चुनरी-घूंघट वाली महिलाएं भी हेलमेट लगाकर बैठती हैं। 
हेलमेट से हादसों की नौबत में न सिर्फ सिर सलामत रहते हैं, बल्कि सड़कों पर लोगों को जिम्मेदारी का अहसास भी होता है, दुपहिया चलाते मोबाइल फोन पर बातचीत भी कम होती है, सामने चलती गाडिय़ों से थूकने वाले लोगों से बचाव भी होता है, धूल-धूप-धुएं से भी बचाव होता है, और तेज हवा से होने वाला नुकसान भी घटता है। सड़कों पर जिम्मेदारी दिखाने और अपने को बचाने के लिए यह अखबार बरसों से लगातार जनजागरण के लिए इश्तहार छापते आया है, और हमारी साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबारÓ में भी हम इसके विज्ञापन बनाकर छापते हैं। लोगों को उल्लू बनाकर राजनीति चलाने का जुर्म अब खत्म होना चाहिए, दूसरी तरफ अपनी कानूनी जिम्मेदारी से कन्नी काटने की राज्य सरकार की लंबी कोशिश भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तीसरे कार्यकाल में जाकर तो बंद होनी चाहिए, और जनता को हिफाजत सिखाने के लिए बार-बार केंद्र सरकार ने, और सुप्रीम कोर्ट ने हेलमेट की जो सख्ती बताई है, कानून बनाया है, जुर्माना रखा है, उसे कड़ाई से लागू न करना हमारे हिसाब से बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी है, और राज्य सरकार को इसे खत्म करना चाहिए। 

बात इंसानियत, और कुछ हिंसानियत की भी

15 जून 2014
संपादकीय

हिंदुस्तानी मीडिया हिंसा की खबरों से भरा हुआ है। कई लोग लिखते हैं कि अखबार के पन्ने से रोटी लपेटना भी मुमकिन नहीं है, क्योंकि उस पर इतना लहू बिखरा हुआ है। रात-दिन बलात्कार की खबरें भले लोगों का हौसला पस्त करती रहती हैं, और मां-बाप, खासकर लड़कियों के मां-बाप यह नहीं सोच पाते कि बच्चियों को आगे बढऩे के लिए, पढऩे के लिए, खेलने-कूदने के लिए कितनी दूर तक कैसे बढ़ावा दिया जाए, और कहां पर सावधानी के नाते उनको रोक लेना ठीक होगा? 
इसके अलावा बहुत से ऐसे सेक्स-हिंसा के जुर्म सामने आते हैं जिनमें यह समझ नहीं आता कि तीन बरस की बच्ची से, या पैंसठ बरस की बूढ़ी महिला से, किसी मानसिक विचलित लड़की से, या किसी विकलांग से बलात्कार करने वालों को अपनी खुद की हरकत के बारे में कुछ भी हिचक होती है, या नहीं? ऐसे में इंसान के मिजाज को समझने की जरूरत है, जिससे कि इंसानियत नाम का एक शब्द गढ़ा गया है। अब अगर लोग इंसान को ऐसे मिजाज वाला मानकर चलते हैं कि वह इंसानियत से भरा हुआ होगा, तो उनको नाउम्मीद हाथ लगना तय है। इंसान दरअसल उन तमाम किताबी और कागजी खूबियों से परे होते हैं जो कि मानवीयता या इंसानियत के नाम पर दर्ज हैं। 
लोगों के भीतर झांककर देखने की कोई मशीन बने, तो हमारा अंदाज है कि वह ऐसे लोगों के बीच भी हैवानियत कही जाने वाली खामियां दिखाएगी, जो कि अब तक किसी जुर्म से दूर रहते हैं, और जो दिखने में भले दिखते हैं। कई बार हमको लगता है कि बुजुर्गों की कही हुई यह बात अधिक सही है कि इंसान गलतियों का पुतला है। हमको यह भी लगता है कि लोगों का एक बड़ा हिस्सा इसलिए भला बने रहता है कि वह अपने-आपको बुरा बनने से रोकने की लड़ाई में अपने बुनियादी मिजाज से जीत जाता है। इंसान के भीतर का मिजाज और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य, इन दोनों के बीच हमारे हिसाब से एक तगड़ा मुकाबला चलते रहता है, और जब तक सामाजिकता का तकाजा जीतता है, तब तक अधिकतर लोग जुर्म या हिंसा से बचे रहते हैं। और जब यह तकाजा हार जाता है, तो लोग खुद पर से बेकाबू होकर जुर्म कर बैठते हैं, या जुर्म करते हैं। कुछ लोगों को हमारी यह बात अटपटी और गलत या खराब लग सकती है कि हम अब तक बेकसूर बने हुए लोगों के भीतर भी हिंसा और जुर्म का एक खतरा देखते हैं, और यह सुझा रहे हैं कि लोग बेबसी में भी शरीफ बने रहते हैं। लेकिन हम अपनी बात को समझाने के लिए इसे कुछ अधिक नाटकीयता के साथ कहें, तो हकीकत कुछ ऐसी लगती है कि अधिकतर इंसानों के भीतर वे तमाम खामियां कम या अधिक मजबूती के साथ भरी रहती हैं, जिन पर से जरा सा सामाजिक और निजी दबाव हटा, और जुर्म हुआ। जुर्म इसलिए कम हैं, कि अधिकतर इंसानों का अपने-आप पर काबू चल रहा है। इसलिए हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि इंसान इंसानियत से भरे हुए हैं, और हैवानियत जिसे कहा जाता है, वह उन्हीं इंसानों के भीतर है, जिनके सिर पर सींग होते हैं। 
लोगों को भला इंसान बने रहने के लिए खासी कड़ी लड़ाई लडऩी पड़ती है। कभी सेक्स के सुख की चाह, तो कभी काली क माई से मिलने वाले ऐशोआराम, कभी दूसरों पर धाक जमाने की हसरत, तो कभी अपने धर्म या अपनी जाति की ताकत दिखाने की बेसब्री, ऐसी कई वजहें होती हैं जो लोगों को गलत या बुरा करने के लिए उकसाती हैं। अब किसका अपने पर कितना काबू हो सकता है, किसे कितने मौके मिल सकते हैं, इस पर आगे की बात टिकी रहती है। इसलिए इंसानों को कुछ काल्पनिक खूबियों को इंसानियत कहना बंद भी करना चाहिए, और इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि हर इंसान के भीतर वे तमाम खामियां होने का पूरा खतरा है जिनको लेकर हैवान की एक काल्पनिक तस्वीर बनाई गई है। 

भ्रष्ट और जालसाज सांसदों को कड़ी सजा से कम कुछ नहीं

14 जून 2014
संपादकीय
राज्यसभा के आधा दर्जन सदस्यों पर कल सीबीआई ने छापा मारा है और इन पर यह आरोप है कि इन्होंने जालसाजी-धोखाधड़ी से गलत यात्रा-भत्ते निकाले। इनमें तीन मौजूदा सदस्य हैं, और तीन भूतपूर्व। और ये सभी के सभी अलग-अलग आधा दर्जन पार्टियों के हैं। यह अधिक तकलीफ की बात इसलिए है कि राज्यसभा को लोकतंत्र में लोकसभा से ऊपर, उच्च सदन का दर्जा मिला हुआ है, और इस मनोनीत सदन में देश के समाज के बेहतर लोग आएंगे, ऐसा माना जाता है। 
सांसदों के बीच जुर्म कोई अनहोनी बात नहीं है, और इसके पहले भी कई पार्टियों के सांसद सदन में मतदान करने के लिए रिश्वत लेते पाए गए हैं, और सदन के भीतर सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते हुए, महीना बांध देने की मांग करते हुए कैमरों पर पकड़ाए सांसदों की बर्खास्तगी भी हुई है। भारतीय लोकतंत्र में संसद के विशेषाधिकारों का पाखंड इतना भयानक है कि जैसी रिश्वतखोरी या जालसाजी-धोखाधड़ी पर देश के सबसे छोटे कर्मचारी भी दस-बीस बरस तक मुकदमा झेलकर, उसके बाद कुछ महीने या बरसों की सजा पाते हैं, उससे हजार गुना बड़ी रिश्वतखोरी-धोखाधड़ी करने के बाद इस देश के सांसद गरीब जनता के खून-पसीने से संसद की आलीशान कैंटीन में मिट्टी के मोल  छप्पन भोग पाते हैं। ऐसी विशेषाधिकार वाले सांसद जब मुफ्त में मिलने वाले हवाई सफर की टिकटों में जालसाजी करके लाखों की कमाई और ऊपर से कर लेना चाहते हैं, तो इस चाहत को क्या कहा जाए? इस पर क्या सजा दी जाए? 
देश की सबसे बड़ी पंचायत, भारतीय संसद, और उसमें भी मनोनीत उच्च सदन, राज्यसभा को देश के सामने एक आदर्श पेश करना चाहिए, और इस सदन के लोग देश के सामने साजिश के नए-नए मौलिक तरीके पेश कर रहे हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोगों को किसी सोचे-समझे जुर्म के लिए आम मुजरिम के मुकाबले अधिक सजा इसलिए मिलनी चाहिए क्योंकि ऊंचे ओहदों की वजह से ऐसे लोगों के खिलाफ किसी तरह की रिपोर्ट, जांच और कार्रवाई आसान नहीं रहती। इनके खिलाफ न गवाह जुट पाते और न सुबूत, और न ही इनके भाड़े के महंगे वकीलों का मुकाबला अदालत में आसान होता है। 
आज इस देश में भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ जनता के मन में नफरत का जो सैलाब उमड़ा हुआ है, उसी सैलाब पर सवार होकर नरेन्द्र मोदी आसमान तक पहुंचे हैं। उन्होंने अपने सांसदों को, या शायद सभी सांसदों को यह सलाह दी है कि वे अदालत में उनके खिलाफ चल रहे मुकदमों को सालभर में निपटाने के लिए अदालत में अर्जी दें। उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों को यह भी कहा है कि वे अपने बंगलों के हिस्से किराए पर न दें, रिश्तेदारों को निजी स्टाफ में न रखें। कुल मिलाकर सांसदों को अब यह समझ लेने की जरूरत है कि उनके साथ किसी की कोई हमदर्दी नहीं रह गई है, खासकर तब, जब उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। जिस तरह की जालसाजी इन सांसदों ने हवाईसफर की फर्जी टिकटें बनवाकर कमाई करने के लिए की हैं, उन पर कड़ी सजा दी जानी चाहिए। इस काम में अगर संसद के कोई विशेषाधिकार बचाव के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश होती है, तो पूरी संसद के खिलाफ जनभावनाएं खड़ी होंगी। सीबीआई को एक मिसाल के तौर पर इन आधा दर्जन सांसदों को सजा दिलवानी चाहिए, ताकि लोग जालसाजी का हौसला आसानी से न कर सकें।

भिलाई औद्योगिक हादसे से सबक-सुधार की जरूरत

13 जून 2014
संपादकीय

एशिया के सबसे बड़े फौलाद कारखाने भिलाई इस्पात संयंत्र में कल शाम हुए एक औद्योगिक हादसे में आधा दर्जन से अधिक लोग अब तक गुजर चुके हैं, और दर्जनों लोग अस्पताल में हैं। एक गैस के रिस जाने से यह हादसा हुआ है, और जांच से पता लगेगा कि यह पूरी तरह एक तकनीकी दुर्घटना थी, या इसके पीछे कोई इंसानी लापरवाही जिम्मेदार थी। इस बारे में हम अभी अपना कोई निष्कर्ष निकालना नहीं चाहते, क्योंकि न तो वह मुमकिन है, और न ही हमारे पास ऐसी तकनीकी काबिलीयत है। लेकिन कल शाम से जो खबरें अब तक आ रही हैं वे बताती हैं कि भिलाई इस्पात संयंत्र का मैनेजमेंट ऐसे किसी हादसे की नौबत पर बचाव के लिए ठीक से तैयार नहीं था। उसके पास ऐसे मौके के लिए गैस-मास्क नहीं थे, जरूरत के लायक एंबुलेंस नहीं थीं, और भी कुछ कमियां जांच में सामने आ सकती हैं। हम इसी पहलू पर आगे लिखना चाहते हैं। 
दरअसल पूरा छत्तीसगढ़ भिलाई इस्पात संयंत्र की तरफ एक आदर्श की तरह देखता है। नेहरू के वक्त के इस औद्योगिक तीर्थ से छत्तीसगढ़ की शक्ल जितनी बनी और बदली है, उतनी किसी भी दूसरे किसी एक संस्थान से नहीं। इसलिए इस ऐतिहासिक और बेमिसाल योगदान की वजह से यह राज्य और इसके लोग हर मौके-बेमौके बीएसपी की तरफ देखते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि पिछली करीब आधी सदी में जब-जब लोगों को किसी गंभीर इलाज की जरूरत पड़ी, तो बीएसपी का अस्पताल ही इस विशाल छत्तीसगढ़ के पास था, और राज्य बनने के बाद ही इस अस्पताल से परे सरकारी और निजी अस्पताल विकसित हो पाए। इसलिए बीएसपी की सामाजिक जिम्मेदारी कम नहीं रही। दूसरी तरफ हम कल के औद्योगिक हादसे को अनुपात से बढ़ाकर भी देखना नहीं चाहते। जिस कारखाने में दसियों हजार लोग काम करते हैं, और हर बरस लाखों टन फौलाद जहां बनता है, वहां पर औद्योगिक दुर्घटना कभी भी न हो, ऐसा सिर्फ एक काल्पनिक आदर्श में हो सकता है। इसलिए इस हादसे की वजह से बीएसपी को एक पूरी तरह लापरवाह मान लेना भी ठीक नहीं है। औद्योगिक सुरक्षा जब लागू होती है, तो वह खबर नहीं बनती। और जब वह नाकामयाब होती है, तभी वह खबर बनती है। इसलिए बीएसपी के औद्योगिक आकार को देखते हुए ही वहां की दुर्घटना के आकार को तौलना चाहिए। 
लेकिन यह लिखते हुए भी हम बीएसपी को यह याद दिलाना चाहते हैं कि हर इंसानी जिंदगी पर से खतरा टालने के लिए जो-जो किया जाना चाहिए था, उसमें जो कमी रही हो, उससे तुरंत सीख लेने की जरूरत है। दूसरी तरफ न सिर्फ छत्तीसगढ़ के लिए, बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लिए बीएसपी को औद्योगिक सुरक्षा और बचाव की एक मिसाल पेश करनी चाहिए। इसलिए कल के हादसे के बाद जो-जो कमियां और खामियां सामने आई हों, उन पर तुरंत ही कार्रवाई करने की जरूरत है। लेकिन इस मौके पर केंद्र और राज्य सरकारों के औद्योगिक सुरक्षा से जुड़े हुए विभागों के सामने यह एक चुनौती भी सामने आई है कि बाकी छत्तीसगढ़, और बाकी देश में औद्योगिक सुरक्षा को ठोक-बजा लिया जाए। ऐसे ही मौकों पर बाकी जगहों के इंतजाम परख लेने चाहिए, और किसी हादसे के बाद ऐसी नसीहत खुद होकर लेनी चाहिए। भिलाई छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र है, और इस मौके पर हम किसी भी तरह की राजनीतिक-राजनीति या मजदूर-राजनीति के बजाय सबक और सुधार पर जोर देंगे।

नेता-अफसरों के हिंसक बयानों के खिलाफ, सभी जुबानदार तबकों के उठकर खड़े होने की जरूरत

12 जून 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश मेें पुलिस विभाग के मुखिया ने बलात्कार पीडि़तों के खिलाफ अपने झूठे और आक्रामक बयान जारी रखे हैं। दो-चार दिन पहले उन्होंने मानो समाजवादी पार्टी की सरकार को बचाने के लिए, बहुत से बलात्कारियों के खिलाफ चल रहे सामाजिक तनाव के बीच यह बयान दिया था कि मारकर टांग दी गई लड़कियों में से एक के साथ बलात्कार नहीं हुआ था, और वह शायद घर के भीतर की कोई साजिश थी। इतने पर भी मानो उनका जी नहीं भरा तो उन्होंने कल फिर बयान दिया कि बलात्कार आम बात है, और ऐसे जुर्म होते रहते हैं। 
हम पहले भी अलग-अलग राज्यों के नेताओं और अफसरों की किस्म-किस्म की बकवास के खिलाफ यह लिखते आए हैं कि राष्ट्रीय और प्रादेशिक मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल आयोग, और हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इन बयानों पर गौर करना चाहिए, और ऐसी बकवास करने वाले लोगों को नोटिस जारी करना चाहिए। भारत में सामाजिक स्थितियां महिलाओं के बहुत खिलाफ है, उनको बराबरी के हक मिलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में जब सत्ता हांक रहे लोग संवेदनाशून्य ही नहीं, बल्कि बहुत ही हिंसक बयान महिलाओं के खिलाफ देते हैं, तो इन लोगों पर कार्रवाई की जरूरत है, और उसके न होने पर उनके मातहत काम करने वाले लोग बलात्कार को एक मामूली जुर्म मानकर ही लापरवाह बने रहेंगे। महिला आयोगों और मानवाधिकार आयोगों की सहूलियत और वेतन-भत्ते वाली कुर्सियों पर जिन लोगों को सत्ता मनोनीत करती है, उनको भी अपनी जिम्मेदारी पूरी न करते हुए शर्म क्यों नहीं आती? और जब मनोनीत करने वाली ताकतें ही राज्यों की सरकार चलाती हैं, वे ही हिंसक बयान देती हैं, वे ही मुजरिमों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बचाने में लग जाती हैं, तो फिर उनकी मर्जी से कुर्सियों पर बिठाए गए पुतले चुप्पी साध लेते हैं, तो यह तकलीफदेह तो है, लेकिन हैरान करने वाली बात नहीं है। 
देश में लगातार राज्य और केन्द्र के नेता और अफसर बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के साथ किसी हमदर्दी के बिना बयान देते आ रहे हैं, और पूरी दुनिया में इससे हिन्दुस्तान को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। यह तो ठीक है कि भारतीय समाज अपने आप में महिलाओं के साथ हिंसा करने वाले, उनको पैरों की जूतियां समझने वाले मर्दों के दबदबे वाला समाज है, लेकिन अगर सदियों पुरानी वाली यही सोच जारी रखनी है तो संविधान का ढकोसला क्यों करना चाहिए? ऐसा पाखंड क्यों करना चाहिए जिसके तहत सरकार लोगों को कुर्सियों पर बिठाए और फिर ऐसे लोग अपना जिम्मा पूरा करने के बजाय मुजरिमों के हिमायतियों जैसे काम करें? यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आज हिन्दुस्तान में मीडिया अगर मुद्दों को इतनी आक्रामकता के साथ नहीं उठाता, तो बलात्कार खबरों और बहस में आ ही नहीं पाता। मीडिया के दबाव के चलते नेता और अफसर फिजूल की बातें कहने के बाद कभी-कभी शर्मिंदगी जाहिर भी करते हैं, और कभी-कभी वे मुलायम और अखिलेश बने भी रहते हैं। 
आज देश में सभी जुबानदार तबकों को और अधिक आक्रामकता के साथ हिंसक बयानों के खिलाफ उठकर खड़े होना पड़ेगा। और ऐसा करना हर उस इंसान की जिम्मेदारी है जिसकी मां एक औरत थी। 

फौजी वर्दी के अगले ही दिन चुनावी खादी के नुकसान

11 जून 2014
संपादकीय

भारत में थलसेना के भीतरी मामलों को लेकर पिछले एक-दो बरस से यूपीए सरकार के तहत कई तरह की बखेड़े की खबरें आ रही थीं। पिछले थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह अपनी जन्मतिथि के झगड़े से लेकर कुछ और मामलों तक केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट से लगातार टकराव मोल लेते आ रहे थे, और कभी वे अन्ना हजारे के साथ, तो कभी बाबा रामदेव के साथ होते हुए सड़क-फुटपाथ से भाजपा मुख्यालय पहुंचे, उम्मीदवार बने, चुनाव जीता, और अब मंत्री बन गए। कल तक वे सुप्रीम कोर्ट में फटकार झेलते हुए खड़े थे, अपने मातहत आला फौजी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए खड़े थे, और अब वे सरकार का हिस्सा हैं। वर्दी से खादी तक पहुंचने में उन्होंने इतना कम वक्त लगाया कि सुबह वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सलामी दे रहे थे, और मानो शाम को यूपीए सरकार के खिलाफ राजनीतिक मंच से भाषण दे रहे थे। आज जब मोदी सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में जनरल वी.के. सिंह के फौजी फैसले को गलत ठहराते हुए उनके खिलाफ सरकारी रूख दिखाया गया है, तो अब सरकार इस परेशानी में पड़ गई है कि सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे को बचाए, या अपने मंत्री के कल के सबसे चर्चित फैसले को? 
हम इस मामले की बारीकियों में गए बिना इसके दूसरे एक पहलू पर लिखना चाहते हैं। वर्दी से खादी तक का सफर जिस लोकतंत्र में इतनी रफ्तार से होगा, वहां पर रक्षामंत्री अरूण जेटली की इस गुजारिश की बहुत अहमियत नहीं रह जाती कि आज के थलसेनाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर राजनीति न की जाए। फौज की नौकरी के अगले ही दिन अगर राजनीति इस लोकतंत्र में मंजूरी पाती रहेगी, तो उससे ऐसी बहुत सी दिक्कतें आएंगी। हम लंबे समय से यह लिखते आ रहे हैं कि ऊंची सरकारी नौकरी, ऊंची अदालती कुर्सी, ऊंची फौजी-पुलिस वर्दी के अगले ही दिन अगर राजनीति में जाने की छूट रहेगी, तो उससे न सिर्फ कुर्सी पर रहते हुए बड़े ओहदेदारों के फैसले उनकी भावी राजनीति की तरफ झुके रहेंगे, बल्कि सरकारी राज भी राजनीतिक लाउडस्पीकरों पर गूंजते रहेंगे। हमारे हिसाब से सरकारी और संवैधानिक कुर्सियों और चुनाव की उम्मीदवारी के बीच कुछ बरसों का फासला तो होना ही चाहिए। पिछले बरसों में बहुत सी पार्टियों ने बहुत से सरकारी-अदालती आला-अफसरों को राजनीति में बढ़ावा दिया है, और इसके बहुत खतरनाक नतीजे सामने आएंगे। 
आज मोदी सरकार के सामने जो एक राजनीतिक दुविधा आकर खड़ी हुई है, वैसी नौबत इस लोकतंत्र में कई मौकों पर आएगी, अगर राजनीति को सरकारी मामलों से अलग नहीं रखा जाएगा। और यह बात सिर्फ लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति पर ही लागू नहीं होती, भारत सरकार के किसी सार्वजनिक उपक्रम से निकलकर जब लोग रातों-रात किसी निजी कारखाने में नौकरी करने लगते हैं, तो यह शक जायज रहता है कि उसी किस्म के धंधे वाले निजी कारखाने का फायदा पहले से तो नहीं किया जा रहा था? प्राकृतिक न्याय यह सुझाता है कि हितों के टकराव की नौबत नहीं आने देनी चाहिए। और अखबारनवीसी करते-करते अगले दिन चुनाव लडऩा भी इसी दर्जे का मामला है, और लोगों को चाहिए कि पेशा बदलने के पहले यह सोच लें कि पिछले पेशे के आखिरी बरस उनके पास ऐसी गुंजाइश तो नहीं थी कि वे अगले पेशे में अपनी जगह बना सकें। 
जनरल वी.के. सिंह जैसे बड़बोले फौजी अफसर हिन्दुस्तान में शायद ही कोई और हुए हों। उन्होंने जिस तरह अदालत से लेकर सरकार तक, और अपने मातहत अफसरों तक के लिए हर किसी के लिए जिस तरह की हिकारत दिखाई है, वह रूख एक रिटायर्ड फौजी के लिए भी अच्छा नहीं था, और आज सरकार के मंत्री के रूप में भी अच्छा नहीं है। यह मामला सिर्फ मोदी सरकार का नहीं है, इस बारे में तमाम पार्टियों को सोचना चाहिए, और देश को ऐसी नीति की जरूरत है कि जनता के पैसों की नौकरी के अगले ही दिन चुनाव लडऩे पर रोक लगे। 

Bat ke bat, बात की बात,

10 june2014

मीडिया में हजारों करोड़ का पूंजीनिवेश, और मानहानि के हजारों करोड़ के नोटिस

10 जून 2014
संपादकीय
हिंदुस्तान के मीडिया में इन दिनों बड़ी दिलचस्प बातें हो रही हैं। मुकेश अंबानी ने कुछ टीवी चैनलों वाले एक मीडिया समूह में चार हजार करोड़ रुपये का पूंजीनिवेश किया है, और इसे लेकर अखबारनवीसों में यह हड़कंप मचा हुआ है कि इतनी बड़ी पूंजी का कारोबार हो जाने के बाद अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा? कौन-कौन से सितारों-पत्रकार टीवी चैनल या अखबार छोड़कर जाएंगे, और मीडिया किस तरह अपने खरबपति मालिकों के कारोबारी-हितों को बढ़ाने के लिए पसीना बहाने लगेगा? इसके साथ-साथ एक दूसरा मामला पिछले करीब एक बरस से खबरों में बना हुआ था कि किस तरह एक टीवी समाचार चैनल के साथ कांगे्रस के तबके सांसद और आज के खरबपति उद्योगपति नवीन जिंदल का सौ करोड़ से अधिक का मानहानि का एक मामला चल रहा था, और ब्लैकमेलिंग के आरोप का एक आपराधिक मामला अलग से चल ही रहा है। आज की ताजा खबर यह है कि देश की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस ने देश के तीन बड़े अंगे्रजी अखबारों पर दो-दो हजार करोड़ रुपये का मुकदमा किया है कि इन अखबारों ने इस कंपनी की छवि बिगाडऩे का काम किया है।
अब इसके साथ-साथ हम लगे हाथों एक और मामले को जोडऩा चाहते हैं कि किस तरह भाजपा के अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी ने अपनी मानहानि को लेकर कांगे्रस के प्रवक्ता और केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी से अदालत में माफी मंगवाकर ही दम लिया, और किस तरह उन्होंने आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को जेल भिजवाकर दम लिया। आज इन तमाम खबरों के बीच मानहानि की बातों को लेकर तो कम, लेकिन साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के आरोपों को लेकर सोशल मीडिया भी खबरों में है कि किस तरह इंटरनेट पर नफरत फैलाई जा रही है, जो कि हिंसा में तब्दील हो रही है। 
इन सारी बातों को देखें तो लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर मीडिया के कारोबार तक, और परंपरागत मीडिया से लेकर नए-नए सोशल मीडिया की नई संभावनाओं तक बहुत से मुद्दों और उनके पहलुओं पर अभिव्यक्ति की आजादी पर बात करने वाले लोगों के बीच चर्चा की जरूरत है जो कि बरसों से ठंडी पड़ी हुई है। दरअसल हिंदुस्तान में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के साथ ही ऐसी चर्चा जुड़ी हुई थी, और जैसे-जैसे यह आंदोलन ठंडा पड़ा, अखबारनवीसी पर टीवी चैनल भारी पड़ते चले गए, जैसे-जैसे मीडिया का कारोबार बड़ी पूंजी पर टिकते चले गया, वैसे-वैसे किसी भी तरह की आजादी की बात हाशिए पर जाती चली गई। नतीजा यह है कि आज टीवी चैनलों के भीतर टीआरपी के पैमाने पर दर्शक संख्या की उत्कृष्टता और कामयाबी मापने में इस्तेमाल हो रही है। अखबारों के बीच प्रसार संख्या ही अखबारनवीसी की कामयाबी गिन ली जा रही है। ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दंभ भरने वाला मीडिया कारोबार, देश का एक कारोबार होकर रह गया है, और उसे लोकतंत्र के किसी भी स्तंभ पर दावा करने का हक नहीं रह गया है। ऐसे में मीडिया में आजादी का जो शून्य खड़ा हुआ है, उसे भरने के लिए सोशल मीडिया ने एक तूफान की तरह दाखिला लिया, और अभिव्यक्ति की असंगठित स्वतंत्रता के नए पैमाने गढऩा शुरू किया। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरा खतरा जुड़ा रहा, जिस पर भी लगे हाथों बात होनी चाहिए। इंटरनेट अपनी तकनीकी संभावनाओं और अपने मिजाज की वजह से बुरी तरह अराजक रहता है, और ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जो जिम्मेदारी जुड़ी रहनी चाहिए, वह बिल्कुल भी नहीं रह पाती। इसलिए परंपरागत अखबारी मीडिया के साथ पत्रकारिता की जो जिम्मेदारी रहते आई थी, वह इंटरनेट पर लापता है। ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की साख भी गड़बड़ाती है, और जब इंटरनेट पर लिखी गई बातों के खिलाफ पुलिस और अदालत की कार्रवाई हो रही है, तो उसे पहली नजर में ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान लिया जा रहा है। यह नई-नई डिजिटल स्वतंत्रता उसे इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच किसी जिम्मेदारी को लेकर नहीं आई है, और उसे कानून के दायरे को समझने में कुछ वक्त भी लगेगा।
हम टुकड़ा-टुकड़ा इन बातों को एक साथ इसलिए लिख रहे हैं कि ये एक-दूसरे जुड़ी हुई बातें हैं और इन तमाम पहलुओं पर एकमुश्त ही चर्चा हो सकती है। आज पत्रकारों के मंच ऐसी चर्चा करने के लिए बाकी नहीं रह गए हैं, इसलिए उनसे परे के ऐसे लोगों को ही इस पर बात शुरू करनी चाहिए, जिनके लिए विचारों की आजादी मायने रखती है। आज मीडिया और सोशल मीडिया, इन दोनों के बीच कंटीले तारों की कोई बाड़ नहीं है, इन दोनों के बीच एक सलेटी फासला बिखरा हुआ है, और कोई सरहद नहीं है। इसलिए बातचीत में बहुत से सामाजिक समूह हिस्सेदार रहेंगे। हजारों करोड़ के पूंजीनिवेश से लेकर हजारों करोड़ के नोटिसों तक की वजह से आज मीडिया पर एक लंबी-चौड़ी बातचीत जरूरी है।

राशन कार्डों की जांच होने तक गरीबों का राशन रूकना गलत

9 जून 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कलेक्ट्रेट से आए दिन हमारे सामने ऐसी तस्वीरें आती हैं जिनमें राशन कार्ड लिए हुए सैकड़ों गरीब इस तपती धूप में वहां पहुंचे रहते हैं, क्योंकि उनके राशन कार्ड का सत्यापन हुए बिना उस पर उन्हें राशन नहीं मिल रहा। छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के तीन-तीन बार चुनाव जीतने के पीछे सबसे हाथ उनकी रियायती अनाज की योजना का माना जाता है, और साथ-साथ यह भी कि छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सबसे कम चोरी, और सबसे अधिक कामयाबी भी बरसों से दर्ज होते आई है। ऐसे में आज अगर राशन कार्ड की जांच के दौरान अगर बड़ी संख्या में लोगों को महीनों से राशन नहीं मिल रहा है, तो ऐसे में गरीबों का हाल खराब होना तय है।
यह एक अलग बात है कि इस राज्य में लाखों लोग रियायत के हकदार न रहते हुए भी रियायती अनाज पा रहे थे, और उसका बोझ सरकार पर बरसों से पड़ रहा था। पहले तो गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों की शिनाख्त के पैमाने एक से अधिक चल रहे थे, और छत्तीसगढ़ सरकार का यह फैसला सही था कि इन पैमानों में से किसी पर भी जो गरीब साबित होता है, उसे रियायती अनाज मिलना चाहिए। हम आज भी यही सोच रखते हैं कि सरकार अगर शिनाख्त करने में कमजोर है, अगर राशन कार्ड की जांच होने में किसी वजह से देर हो रही है, तो ऐसी नौबत में गरीबों का राशन जारी रहना चाहिए, और जब तक सरकार के पास ठोस वजह न आ जाए, तब तक गरीब का राशन बंद नहीं होना चाहिए। सरकार की नाकामयाबी, उसकी सीमित क्षमता, उसके चुनाव जैसे कई तरह के अतिरिक्त बोझ, इन सबके चलते हुए भी इस मामले में संदेह का लाभ गरीब को उसी तरह मिलना चाहिए जिस तरह भारतीय न्यायपालिका में सुबूत न मिलने पर संदेह का लाभ आरोपी को मिलता है। यह तय करना और साबित करना सरकारी जांच का काम है, कि कौन-कौन से अपात्र लोग राशन पा रहे हैं। और फिर अगर उनमें गैरगरीब तबके के लोग जालसाजी से रियायती राशन कार्ड बनवाकर राशन पा रहे हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई का हक और जिम्मा भी सरकार का है। लेकिन जब तक सरकार ऐसी कार्रवाई नहीं कर पाती, तब तक राशन बंद होने के बजाय जारी रहना चाहिए।
सरकार की योजनाओं में से जो भी योजनाएं गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों के लिए हैं, जो योजनाएं बीमार, बूढ़े, अकेली रह गई महिलाओं, विकलांगों के लिए हैं, उन सबमें सरकार देर का नुकसान सरकार खुद झेले। ऐसे तबकों की ऐसी हालत नहीं होती कि वे सरकार की देर का नुकसान झेल सकें। छत्तीसगढ़ में राशन इस सरकार की लगातार कामयाबी का एक बड़ा मुद्दा रहा है। कई मंत्री और कई सचिव इस विभाग में आकर चले गए, लेकिन मुख्यमंत्री ने अपनी निजी दिलचस्पी से और अपनी निगरानी में रियायती राशन को सफल बनाकर रखा। आज इस मोर्चे पर गरीबों को अगर ऐसी दिक्कत हो रही है, तो उनका अनुपात गरीब आबादी के भीतर कितना भी हो, उनकी जांच में समय कितना भी लगे, यह नुकसान सरकार को ही झेलना चाहिए। आज बहुत बूढ़े-बूढ़े लोग जिस तरह लाठियां टेकते हुए झुलसाती हुई गर्मी में दिन भर सरकारी दफ्तरों में डेरा डाले हुए हैं, वे तस्वीरें छत्तीसगढ़ सरकार के जनकल्याण के दावों, और उसके पिछले रिकॉर्ड के साथ मेल नहीं खातीं। राज्य सरकार को अपने सर्वोच्च स्तर पर बिना देर किए यह आदेश करना चाहिए कि राशन कार्ड की जांच चलने तक किसी भी गरीब का राशन न रूके।