भ्रष्ट और जालसाज सांसदों को कड़ी सजा से कम कुछ नहीं

14 जून 2014
संपादकीय
राज्यसभा के आधा दर्जन सदस्यों पर कल सीबीआई ने छापा मारा है और इन पर यह आरोप है कि इन्होंने जालसाजी-धोखाधड़ी से गलत यात्रा-भत्ते निकाले। इनमें तीन मौजूदा सदस्य हैं, और तीन भूतपूर्व। और ये सभी के सभी अलग-अलग आधा दर्जन पार्टियों के हैं। यह अधिक तकलीफ की बात इसलिए है कि राज्यसभा को लोकतंत्र में लोकसभा से ऊपर, उच्च सदन का दर्जा मिला हुआ है, और इस मनोनीत सदन में देश के समाज के बेहतर लोग आएंगे, ऐसा माना जाता है। 
सांसदों के बीच जुर्म कोई अनहोनी बात नहीं है, और इसके पहले भी कई पार्टियों के सांसद सदन में मतदान करने के लिए रिश्वत लेते पाए गए हैं, और सदन के भीतर सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते हुए, महीना बांध देने की मांग करते हुए कैमरों पर पकड़ाए सांसदों की बर्खास्तगी भी हुई है। भारतीय लोकतंत्र में संसद के विशेषाधिकारों का पाखंड इतना भयानक है कि जैसी रिश्वतखोरी या जालसाजी-धोखाधड़ी पर देश के सबसे छोटे कर्मचारी भी दस-बीस बरस तक मुकदमा झेलकर, उसके बाद कुछ महीने या बरसों की सजा पाते हैं, उससे हजार गुना बड़ी रिश्वतखोरी-धोखाधड़ी करने के बाद इस देश के सांसद गरीब जनता के खून-पसीने से संसद की आलीशान कैंटीन में मिट्टी के मोल  छप्पन भोग पाते हैं। ऐसी विशेषाधिकार वाले सांसद जब मुफ्त में मिलने वाले हवाई सफर की टिकटों में जालसाजी करके लाखों की कमाई और ऊपर से कर लेना चाहते हैं, तो इस चाहत को क्या कहा जाए? इस पर क्या सजा दी जाए? 
देश की सबसे बड़ी पंचायत, भारतीय संसद, और उसमें भी मनोनीत उच्च सदन, राज्यसभा को देश के सामने एक आदर्श पेश करना चाहिए, और इस सदन के लोग देश के सामने साजिश के नए-नए मौलिक तरीके पेश कर रहे हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोगों को किसी सोचे-समझे जुर्म के लिए आम मुजरिम के मुकाबले अधिक सजा इसलिए मिलनी चाहिए क्योंकि ऊंचे ओहदों की वजह से ऐसे लोगों के खिलाफ किसी तरह की रिपोर्ट, जांच और कार्रवाई आसान नहीं रहती। इनके खिलाफ न गवाह जुट पाते और न सुबूत, और न ही इनके भाड़े के महंगे वकीलों का मुकाबला अदालत में आसान होता है। 
आज इस देश में भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ जनता के मन में नफरत का जो सैलाब उमड़ा हुआ है, उसी सैलाब पर सवार होकर नरेन्द्र मोदी आसमान तक पहुंचे हैं। उन्होंने अपने सांसदों को, या शायद सभी सांसदों को यह सलाह दी है कि वे अदालत में उनके खिलाफ चल रहे मुकदमों को सालभर में निपटाने के लिए अदालत में अर्जी दें। उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों को यह भी कहा है कि वे अपने बंगलों के हिस्से किराए पर न दें, रिश्तेदारों को निजी स्टाफ में न रखें। कुल मिलाकर सांसदों को अब यह समझ लेने की जरूरत है कि उनके साथ किसी की कोई हमदर्दी नहीं रह गई है, खासकर तब, जब उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। जिस तरह की जालसाजी इन सांसदों ने हवाईसफर की फर्जी टिकटें बनवाकर कमाई करने के लिए की हैं, उन पर कड़ी सजा दी जानी चाहिए। इस काम में अगर संसद के कोई विशेषाधिकार बचाव के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश होती है, तो पूरी संसद के खिलाफ जनभावनाएं खड़ी होंगी। सीबीआई को एक मिसाल के तौर पर इन आधा दर्जन सांसदों को सजा दिलवानी चाहिए, ताकि लोग जालसाजी का हौसला आसानी से न कर सकें।

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