10 जून 2014
संपादकीय
हिंदुस्तान के मीडिया में इन दिनों बड़ी दिलचस्प बातें हो रही हैं। मुकेश अंबानी ने कुछ टीवी चैनलों वाले एक मीडिया समूह में चार हजार करोड़ रुपये का पूंजीनिवेश किया है, और इसे लेकर अखबारनवीसों में यह हड़कंप मचा हुआ है कि इतनी बड़ी पूंजी का कारोबार हो जाने के बाद अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा? कौन-कौन से सितारों-पत्रकार टीवी चैनल या अखबार छोड़कर जाएंगे, और मीडिया किस तरह अपने खरबपति मालिकों के कारोबारी-हितों को बढ़ाने के लिए पसीना बहाने लगेगा? इसके साथ-साथ एक दूसरा मामला पिछले करीब एक बरस से खबरों में बना हुआ था कि किस तरह एक टीवी समाचार चैनल के साथ कांगे्रस के तबके सांसद और आज के खरबपति उद्योगपति नवीन जिंदल का सौ करोड़ से अधिक का मानहानि का एक मामला चल रहा था, और ब्लैकमेलिंग के आरोप का एक आपराधिक मामला अलग से चल ही रहा है। आज की ताजा खबर यह है कि देश की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस ने देश के तीन बड़े अंगे्रजी अखबारों पर दो-दो हजार करोड़ रुपये का मुकदमा किया है कि इन अखबारों ने इस कंपनी की छवि बिगाडऩे का काम किया है।
अब इसके साथ-साथ हम लगे हाथों एक और मामले को जोडऩा चाहते हैं कि किस तरह भाजपा के अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी ने अपनी मानहानि को लेकर कांगे्रस के प्रवक्ता और केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी से अदालत में माफी मंगवाकर ही दम लिया, और किस तरह उन्होंने आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को जेल भिजवाकर दम लिया। आज इन तमाम खबरों के बीच मानहानि की बातों को लेकर तो कम, लेकिन साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के आरोपों को लेकर सोशल मीडिया भी खबरों में है कि किस तरह इंटरनेट पर नफरत फैलाई जा रही है, जो कि हिंसा में तब्दील हो रही है।
इन सारी बातों को देखें तो लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर मीडिया के कारोबार तक, और परंपरागत मीडिया से लेकर नए-नए सोशल मीडिया की नई संभावनाओं तक बहुत से मुद्दों और उनके पहलुओं पर अभिव्यक्ति की आजादी पर बात करने वाले लोगों के बीच चर्चा की जरूरत है जो कि बरसों से ठंडी पड़ी हुई है। दरअसल हिंदुस्तान में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के साथ ही ऐसी चर्चा जुड़ी हुई थी, और जैसे-जैसे यह आंदोलन ठंडा पड़ा, अखबारनवीसी पर टीवी चैनल भारी पड़ते चले गए, जैसे-जैसे मीडिया का कारोबार बड़ी पूंजी पर टिकते चले गया, वैसे-वैसे किसी भी तरह की आजादी की बात हाशिए पर जाती चली गई। नतीजा यह है कि आज टीवी चैनलों के भीतर टीआरपी के पैमाने पर दर्शक संख्या की उत्कृष्टता और कामयाबी मापने में इस्तेमाल हो रही है। अखबारों के बीच प्रसार संख्या ही अखबारनवीसी की कामयाबी गिन ली जा रही है। ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दंभ भरने वाला मीडिया कारोबार, देश का एक कारोबार होकर रह गया है, और उसे लोकतंत्र के किसी भी स्तंभ पर दावा करने का हक नहीं रह गया है। ऐसे में मीडिया में आजादी का जो शून्य खड़ा हुआ है, उसे भरने के लिए सोशल मीडिया ने एक तूफान की तरह दाखिला लिया, और अभिव्यक्ति की असंगठित स्वतंत्रता के नए पैमाने गढऩा शुरू किया। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरा खतरा जुड़ा रहा, जिस पर भी लगे हाथों बात होनी चाहिए। इंटरनेट अपनी तकनीकी संभावनाओं और अपने मिजाज की वजह से बुरी तरह अराजक रहता है, और ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जो जिम्मेदारी जुड़ी रहनी चाहिए, वह बिल्कुल भी नहीं रह पाती। इसलिए परंपरागत अखबारी मीडिया के साथ पत्रकारिता की जो जिम्मेदारी रहते आई थी, वह इंटरनेट पर लापता है। ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की साख भी गड़बड़ाती है, और जब इंटरनेट पर लिखी गई बातों के खिलाफ पुलिस और अदालत की कार्रवाई हो रही है, तो उसे पहली नजर में ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान लिया जा रहा है। यह नई-नई डिजिटल स्वतंत्रता उसे इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच किसी जिम्मेदारी को लेकर नहीं आई है, और उसे कानून के दायरे को समझने में कुछ वक्त भी लगेगा।
हम टुकड़ा-टुकड़ा इन बातों को एक साथ इसलिए लिख रहे हैं कि ये एक-दूसरे जुड़ी हुई बातें हैं और इन तमाम पहलुओं पर एकमुश्त ही चर्चा हो सकती है। आज पत्रकारों के मंच ऐसी चर्चा करने के लिए बाकी नहीं रह गए हैं, इसलिए उनसे परे के ऐसे लोगों को ही इस पर बात शुरू करनी चाहिए, जिनके लिए विचारों की आजादी मायने रखती है। आज मीडिया और सोशल मीडिया, इन दोनों के बीच कंटीले तारों की कोई बाड़ नहीं है, इन दोनों के बीच एक सलेटी फासला बिखरा हुआ है, और कोई सरहद नहीं है। इसलिए बातचीत में बहुत से सामाजिक समूह हिस्सेदार रहेंगे। हजारों करोड़ के पूंजीनिवेश से लेकर हजारों करोड़ के नोटिसों तक की वजह से आज मीडिया पर एक लंबी-चौड़ी बातचीत जरूरी है।

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