हेलमेट सिरों से फटने और कटने की आजादी तो छीनता है, लेकिन...

16 जून 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ बनने के बाद हेलमेट लागू करने का हौसला जुटाने में यहां की सरकार को पूरे चौदह बरस लग गए। जब जोगी सरकार ने लागू करने की कोशिश की तो उस समय विपक्ष की गैरजिम्मेदारी निभा रही भारतीय जनता पार्टी को यह लगा था कि हेलमेट सिरों की फटने और कटने की आजादी को छीन रहा है। तुरंत सड़कों पर विरोध हुआ, मानो कि कांगे्रस सरकार होती कौन है लोगों के सिर फुड़वाने का हक छीनने वाली। फिर रमन सरकार आई, कुछ अधिक जिम्मेदारी से कांगे्रस के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, दोनों से हेलमेट लागू करने के लिए सहमति लेकर, उनसे अपील जारी करवाकर भाजपा सरकार ने हेलमेट लागू करने की कोशिश की, तो पूरे प्रदेश में सबसे अधिक राजधानी रायपुर की कांगे्रस पार्टी को इससे चोट पहुंची, और इसके शहर अध्यक्ष गाली-गलौच पर उतर आए। उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं सहित सरकार के खिलाफ नारा बनाया कि हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को। 
यह कांगे्रस का अंदरूनी मामला था कि प्रदेश अध्यक्ष चरण दास महंत और नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे के खिलाफ उन्हीं की पार्टी के पदाधिकारी ऐसा नारा सार्वजनिक रूप से लगा रहे थे, लेकिन ऐसी गंदी और घटिया राजनीति से सबसे बड़ा नुकसान जनता का हुआ, जो कि गैरजिम्मेदार नेताओं के झांसे में आकर यह मान बैठी कि हेलमेट का नियम सरकार और पुलिस का है। पहले भाजपा के नेताओं ने, और फिर कांगे्रस के नेताओं ने विपक्ष की गैरजिम्मेदारी निभाते हुए जनता को ऐसे झांसे में रखा कि उनका सिर भी मानो सरकार की संपत्ति है, और उसके फूटने से उनका भला क्या नुकसान होगा। 
लोगों को बेवकूफ बनाकर अपनी राजनीति चलाने वाले घटिया दिमाग के छोटे-छोटे नेताओं के असर में एक समय अजीत जोगी ने हेलमेट लागू नहीं किया, और एक समय रमन सिंह ने। नतीजा यह हुआ कि यह राज्य बनने के बाद हजारों लोग सड़कों पर सिर्फ सिर फटने से मारे गए, जो कि हेलमेट रहने से बच सकते थे। हम यह देखकर हैरान होते हैं कि पूरे पांच बरस के लिए प्रदेश को चलाने की जिम्मेदारी और अधिकार जिस निर्वाचित सरकार को मिलते हैं, वह सरकार जरा से सड़कछाप नारों से सहमकर किस तरह मौत को खुली छूट दे देती है। इसी देश में बहुत से प्रदेशों में बहुत से शहरों में बरसों से हेलमेट इस तरह चल रहे हैं, कि वे लोगों को बोझ नहीं लगते, हिफाजत लगते हैं। राजस्थान के जयपुर जैसे शहर में बरसों से दुपहियों के पीछे बैठने वाली घाघरा और चुनरी-घूंघट वाली महिलाएं भी हेलमेट लगाकर बैठती हैं। 
हेलमेट से हादसों की नौबत में न सिर्फ सिर सलामत रहते हैं, बल्कि सड़कों पर लोगों को जिम्मेदारी का अहसास भी होता है, दुपहिया चलाते मोबाइल फोन पर बातचीत भी कम होती है, सामने चलती गाडिय़ों से थूकने वाले लोगों से बचाव भी होता है, धूल-धूप-धुएं से भी बचाव होता है, और तेज हवा से होने वाला नुकसान भी घटता है। सड़कों पर जिम्मेदारी दिखाने और अपने को बचाने के लिए यह अखबार बरसों से लगातार जनजागरण के लिए इश्तहार छापते आया है, और हमारी साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबारÓ में भी हम इसके विज्ञापन बनाकर छापते हैं। लोगों को उल्लू बनाकर राजनीति चलाने का जुर्म अब खत्म होना चाहिए, दूसरी तरफ अपनी कानूनी जिम्मेदारी से कन्नी काटने की राज्य सरकार की लंबी कोशिश भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तीसरे कार्यकाल में जाकर तो बंद होनी चाहिए, और जनता को हिफाजत सिखाने के लिए बार-बार केंद्र सरकार ने, और सुप्रीम कोर्ट ने हेलमेट की जो सख्ती बताई है, कानून बनाया है, जुर्माना रखा है, उसे कड़ाई से लागू न करना हमारे हिसाब से बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी है, और राज्य सरकार को इसे खत्म करना चाहिए। 

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