15 जून 2014
संपादकीय
हिंदुस्तानी मीडिया हिंसा की खबरों से भरा हुआ है। कई लोग लिखते हैं कि अखबार के पन्ने से रोटी लपेटना भी मुमकिन नहीं है, क्योंकि उस पर इतना लहू बिखरा हुआ है। रात-दिन बलात्कार की खबरें भले लोगों का हौसला पस्त करती रहती हैं, और मां-बाप, खासकर लड़कियों के मां-बाप यह नहीं सोच पाते कि बच्चियों को आगे बढऩे के लिए, पढऩे के लिए, खेलने-कूदने के लिए कितनी दूर तक कैसे बढ़ावा दिया जाए, और कहां पर सावधानी के नाते उनको रोक लेना ठीक होगा?
इसके अलावा बहुत से ऐसे सेक्स-हिंसा के जुर्म सामने आते हैं जिनमें यह समझ नहीं आता कि तीन बरस की बच्ची से, या पैंसठ बरस की बूढ़ी महिला से, किसी मानसिक विचलित लड़की से, या किसी विकलांग से बलात्कार करने वालों को अपनी खुद की हरकत के बारे में कुछ भी हिचक होती है, या नहीं? ऐसे में इंसान के मिजाज को समझने की जरूरत है, जिससे कि इंसानियत नाम का एक शब्द गढ़ा गया है। अब अगर लोग इंसान को ऐसे मिजाज वाला मानकर चलते हैं कि वह इंसानियत से भरा हुआ होगा, तो उनको नाउम्मीद हाथ लगना तय है। इंसान दरअसल उन तमाम किताबी और कागजी खूबियों से परे होते हैं जो कि मानवीयता या इंसानियत के नाम पर दर्ज हैं।
लोगों के भीतर झांककर देखने की कोई मशीन बने, तो हमारा अंदाज है कि वह ऐसे लोगों के बीच भी हैवानियत कही जाने वाली खामियां दिखाएगी, जो कि अब तक किसी जुर्म से दूर रहते हैं, और जो दिखने में भले दिखते हैं। कई बार हमको लगता है कि बुजुर्गों की कही हुई यह बात अधिक सही है कि इंसान गलतियों का पुतला है। हमको यह भी लगता है कि लोगों का एक बड़ा हिस्सा इसलिए भला बने रहता है कि वह अपने-आपको बुरा बनने से रोकने की लड़ाई में अपने बुनियादी मिजाज से जीत जाता है। इंसान के भीतर का मिजाज और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य, इन दोनों के बीच हमारे हिसाब से एक तगड़ा मुकाबला चलते रहता है, और जब तक सामाजिकता का तकाजा जीतता है, तब तक अधिकतर लोग जुर्म या हिंसा से बचे रहते हैं। और जब यह तकाजा हार जाता है, तो लोग खुद पर से बेकाबू होकर जुर्म कर बैठते हैं, या जुर्म करते हैं। कुछ लोगों को हमारी यह बात अटपटी और गलत या खराब लग सकती है कि हम अब तक बेकसूर बने हुए लोगों के भीतर भी हिंसा और जुर्म का एक खतरा देखते हैं, और यह सुझा रहे हैं कि लोग बेबसी में भी शरीफ बने रहते हैं। लेकिन हम अपनी बात को समझाने के लिए इसे कुछ अधिक नाटकीयता के साथ कहें, तो हकीकत कुछ ऐसी लगती है कि अधिकतर इंसानों के भीतर वे तमाम खामियां कम या अधिक मजबूती के साथ भरी रहती हैं, जिन पर से जरा सा सामाजिक और निजी दबाव हटा, और जुर्म हुआ। जुर्म इसलिए कम हैं, कि अधिकतर इंसानों का अपने-आप पर काबू चल रहा है। इसलिए हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि इंसान इंसानियत से भरे हुए हैं, और हैवानियत जिसे कहा जाता है, वह उन्हीं इंसानों के भीतर है, जिनके सिर पर सींग होते हैं।
लोगों को भला इंसान बने रहने के लिए खासी कड़ी लड़ाई लडऩी पड़ती है। कभी सेक्स के सुख की चाह, तो कभी काली क माई से मिलने वाले ऐशोआराम, कभी दूसरों पर धाक जमाने की हसरत, तो कभी अपने धर्म या अपनी जाति की ताकत दिखाने की बेसब्री, ऐसी कई वजहें होती हैं जो लोगों को गलत या बुरा करने के लिए उकसाती हैं। अब किसका अपने पर कितना काबू हो सकता है, किसे कितने मौके मिल सकते हैं, इस पर आगे की बात टिकी रहती है। इसलिए इंसानों को कुछ काल्पनिक खूबियों को इंसानियत कहना बंद भी करना चाहिए, और इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि हर इंसान के भीतर वे तमाम खामियां होने का पूरा खतरा है जिनको लेकर हैवान की एक काल्पनिक तस्वीर बनाई गई है।
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