फौजी वर्दी के अगले ही दिन चुनावी खादी के नुकसान

11 जून 2014
संपादकीय

भारत में थलसेना के भीतरी मामलों को लेकर पिछले एक-दो बरस से यूपीए सरकार के तहत कई तरह की बखेड़े की खबरें आ रही थीं। पिछले थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह अपनी जन्मतिथि के झगड़े से लेकर कुछ और मामलों तक केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट से लगातार टकराव मोल लेते आ रहे थे, और कभी वे अन्ना हजारे के साथ, तो कभी बाबा रामदेव के साथ होते हुए सड़क-फुटपाथ से भाजपा मुख्यालय पहुंचे, उम्मीदवार बने, चुनाव जीता, और अब मंत्री बन गए। कल तक वे सुप्रीम कोर्ट में फटकार झेलते हुए खड़े थे, अपने मातहत आला फौजी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए खड़े थे, और अब वे सरकार का हिस्सा हैं। वर्दी से खादी तक पहुंचने में उन्होंने इतना कम वक्त लगाया कि सुबह वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सलामी दे रहे थे, और मानो शाम को यूपीए सरकार के खिलाफ राजनीतिक मंच से भाषण दे रहे थे। आज जब मोदी सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में जनरल वी.के. सिंह के फौजी फैसले को गलत ठहराते हुए उनके खिलाफ सरकारी रूख दिखाया गया है, तो अब सरकार इस परेशानी में पड़ गई है कि सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे को बचाए, या अपने मंत्री के कल के सबसे चर्चित फैसले को? 
हम इस मामले की बारीकियों में गए बिना इसके दूसरे एक पहलू पर लिखना चाहते हैं। वर्दी से खादी तक का सफर जिस लोकतंत्र में इतनी रफ्तार से होगा, वहां पर रक्षामंत्री अरूण जेटली की इस गुजारिश की बहुत अहमियत नहीं रह जाती कि आज के थलसेनाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर राजनीति न की जाए। फौज की नौकरी के अगले ही दिन अगर राजनीति इस लोकतंत्र में मंजूरी पाती रहेगी, तो उससे ऐसी बहुत सी दिक्कतें आएंगी। हम लंबे समय से यह लिखते आ रहे हैं कि ऊंची सरकारी नौकरी, ऊंची अदालती कुर्सी, ऊंची फौजी-पुलिस वर्दी के अगले ही दिन अगर राजनीति में जाने की छूट रहेगी, तो उससे न सिर्फ कुर्सी पर रहते हुए बड़े ओहदेदारों के फैसले उनकी भावी राजनीति की तरफ झुके रहेंगे, बल्कि सरकारी राज भी राजनीतिक लाउडस्पीकरों पर गूंजते रहेंगे। हमारे हिसाब से सरकारी और संवैधानिक कुर्सियों और चुनाव की उम्मीदवारी के बीच कुछ बरसों का फासला तो होना ही चाहिए। पिछले बरसों में बहुत सी पार्टियों ने बहुत से सरकारी-अदालती आला-अफसरों को राजनीति में बढ़ावा दिया है, और इसके बहुत खतरनाक नतीजे सामने आएंगे। 
आज मोदी सरकार के सामने जो एक राजनीतिक दुविधा आकर खड़ी हुई है, वैसी नौबत इस लोकतंत्र में कई मौकों पर आएगी, अगर राजनीति को सरकारी मामलों से अलग नहीं रखा जाएगा। और यह बात सिर्फ लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति पर ही लागू नहीं होती, भारत सरकार के किसी सार्वजनिक उपक्रम से निकलकर जब लोग रातों-रात किसी निजी कारखाने में नौकरी करने लगते हैं, तो यह शक जायज रहता है कि उसी किस्म के धंधे वाले निजी कारखाने का फायदा पहले से तो नहीं किया जा रहा था? प्राकृतिक न्याय यह सुझाता है कि हितों के टकराव की नौबत नहीं आने देनी चाहिए। और अखबारनवीसी करते-करते अगले दिन चुनाव लडऩा भी इसी दर्जे का मामला है, और लोगों को चाहिए कि पेशा बदलने के पहले यह सोच लें कि पिछले पेशे के आखिरी बरस उनके पास ऐसी गुंजाइश तो नहीं थी कि वे अगले पेशे में अपनी जगह बना सकें। 
जनरल वी.के. सिंह जैसे बड़बोले फौजी अफसर हिन्दुस्तान में शायद ही कोई और हुए हों। उन्होंने जिस तरह अदालत से लेकर सरकार तक, और अपने मातहत अफसरों तक के लिए हर किसी के लिए जिस तरह की हिकारत दिखाई है, वह रूख एक रिटायर्ड फौजी के लिए भी अच्छा नहीं था, और आज सरकार के मंत्री के रूप में भी अच्छा नहीं है। यह मामला सिर्फ मोदी सरकार का नहीं है, इस बारे में तमाम पार्टियों को सोचना चाहिए, और देश को ऐसी नीति की जरूरत है कि जनता के पैसों की नौकरी के अगले ही दिन चुनाव लडऩे पर रोक लगे। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें