जापानियों से अपनी तुलना करें तो हिंदुस्तानी गटर में डूब मरें

17 जून 14
संपादकीय
ब्राजील में चल रहे विश्वकप फुटबॉल की एक तस्वीर है जिसमें मैच हार जाने के बाद जापान के दर्शकों को स्टेडियम के अपने पूरे हिस्से से कचरा उठाते देखा जा सकता है। इस खबर के साथ यह जानकारी भी है कि जापान में मैचों के बाद यह आम सांस्कृतिक परंपरा है। दूसरी तरफ मुंबई की एक खबर है कि सड़क पर कार से कूड़ा फेंकने वाले बददिमाग रईसों को जाकर उनकी गलती बताने वाले को उन लोगों ने किस बुरी तरह पीटा है। हमने अभी लगातार तस्वीरें छापी हैं कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन पर किस तरह की गंदगी रहती है कि लोग नल से पानी न भर सकें, और मजबूरी में बोतलें खरीदें। महीनों से हर अखबार में इस राजधानी की खबरें छप रही हैं कि किस तरह पूरा शहर घूरा बना हुआ है, और म्युनिसिपल सफाई नहीं करवा पा रही है।
अब जापानियों की मिसाल को लें, तो क्या सचमुच हर कचरे को साफ करने के लिए म्युनिसिपल की जरूरत पडऩी चाहिए? लोग आसपास का कचरा उठाकर कूड़ेदान में फेंकें, वैसी जापानियत की उम्मीद हम अपनी जिंदगी में हिंदुस्तान जैसे गंदे देश में नहीं करते, लेकिन कम से कम अपने खुद के कूड़े को कूड़ेदार या घूरे में फेंकना भी जिन लोगों से नहीं होता, उन लोगों को यह अंदाज ही नहीं है कि नालियों और गटर में उतरकर इंसानों को किस तरह कचरा निकालना पड़ता है। हमारा यह पुख्ता अंदाज है कि कूड़ा पैदा करने वाले रईसों को अगर एक बार ऐसे गटर में उतरना पड़े, तो उससे बचने के लिए वे अपनी दौलत का एक खासा बड़ा हिस्सा देने को तैयार हो जाएंगे। जो लोग दूसरे इंसानों को गटर में उतारने के लिए इस तरह से कूड़ा फेंकते हैं, नालियों को जाम कर देते हैं, वे इंसान किसी सभ्य समाज में रहने के लायक नहीं हैं, दिक्कत यह है कि पैसे वालों को हिंदुस्तानी जुबान में बड़ा आदमी या अच्छा आदमी कहा जाता है। जबकि पैसों का इन दोनों ही खूबियों से कोई लेना-देना नहीं होता, और हमारा अंदाज तो यह है कि पैसा अधिकतर लोगों को उनकी जिम्मेदारी से दूर कर देता है, और उन्हें दूसरों के हक छीन लेने की खुशफहमी दे देता है। कारों से जो लोग सड़कों पर अपना कचरा फेंकते हैं, वे बड़ी कारों के बावजूद बड़े लोग नहीं होते, वे बहुत ही छोटी समझ वाले घटिया लोग होते हैं। 
हिंदुस्तान में लोगों को सामाजिक जिम्मेदारी सिखाने की बहुत जरूरत है। हर किसी को अपने हक का बहुत ख्याल है, और दूसरों की जिम्मेदारी का भी उतना ही। लेकिन हिंदुस्तानियों से अगर पूछा जाए कि दूसरों के हक, और अपनी खुद की जिम्मेदारी के बारे में उनकी क्या सोच है, तो इस बारे में उनको मानो सिखाया ही नहीं जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। कुछ लोग अपनी आपराधिक लापरवाही और बेफिक्री के चलते दूसरे लोगों को गटर में उतरने पर मजबूर करें, तो ऐसे लोगों के खिलाफ बड़े जुर्माने और सजा का इंतजाम होना चाहिए। कोई भी समाज इतनी गंदगी के साथ नहीं जी सकता, और हिंदुस्तान में अधिक कचरा पैदा करने वाला संपन्न तबका शहरी ढांचे के भीतर गंदगी पैदा करने का जिम्मेदारी सबसे अधिक रहता है। इस बारे में सरकार और समाज दोनों को सोचना चाहिए। 

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