अच्छे क्यों नहीं हो सकते


कुछ दिन पहले रूस की एक खबर आई थी जिसका प्रिंट निकालकर मैंने रखा था कि इस मुद्दे पर कुछ लिखूंगा। लेकिन फिर वह कागज समंदर में कहीं दब गया जो आज मिला। रूस के एक शहर के मेयर ने अपनी म्युनिसिपल के कर्मचारियों पर पचीस बातें कहने पर रोक लगाई है। इसकी एक फेहरिस्त जारी हुई हे कि उनके पास आने वाले लोगों से ये वाक्य कभी नहीं कहे जाएं।
इनमें मुझे नहीं पता, नहीं कर सकता, मैं क्या कर सकता हूँ, ये मेरा काम नहीं है, ये असंभव है, मैं लंच ले रहा हूँ, इसके लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं, मैं बीमार था, मैं छुट्टïी पर था, जैसे वाक्य शामिल हैं।
एलेक्जेंडर कजमिन नामक मेयर पेशे से व्यापारी है और मेयर चुन कर आया है। उसका मानना है कि स्थानीय शासन लोगों को बेबस, असहाय, कमजोर लगे यह ठीक नहीं है। जनता के आत्मविश्वास के लिए यह अंदाज खतरनाक है।
कुछ हफ्ते पहले मेयर ने यह आदेश जारी करने के साथ ही यह फेहरिस्त दीवार पर चस्पा भी कर दी है। जनता को भी यह बताया गया है कि म्युनिसिपल कर्मचारी उनसे केसा व्यवहार नहीं कर सकते, कौन सी बातें नहीं कह सकते। कर्मचारियों को भी कह दिया गया है कि उनका रूख नहीं सुधारा तो उनकी रवानगी करीब होगी।
मेयर का कहना है कि म्युनिसिपल लोगों की जिंदगी को आरामदेह बनाने के लिए है, इसने अधिकारियों को शहर की दिक्कतें सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए न कि उन्हें अनदेखा करने की।
हिन्दुस्तान में बैठकर, खासकर जिस इलाके में मैं रहता हूँ वहां टीवी पर आने वाला एक सीरियल अधिक सही लगता है जिसमें एक सीधा और शरीफ इंसान सरकारी दफ्तर के भ्रष्टïाचार, लालपीताशाही, बाबूराज के बीच धक्के खाते रहता है। इस सीरियल में तो अब तक श्याम बेनेगल की फिल्म की तरह का आक्रोश नहीं है, लेकिन असल जिंदगी में लोगों के मन सरकार के नाम से नफरत और हिकारत से भरे हुए हैं। इस देश में जो सबसे घटिया क्वालिटी के सामान होते हैं वे सरकारी खरीद के सामान कहे जाते हैं। दूकानदार पहचान का, या भला, हो तो वह ग्राहक के कुछ सामान लेने से रोक देता है कि वे सिर्फ गवर्नमेंट सप्लाई के लिए बने हैं।
सरकारी दफ्तरों और अमले का बर्ताव और रूख देखते ही बनता है और एक बड़ा नुकसान यह है कि इनसे अधिक वास्ता पडऩे वाले निजी संस्थानों में भी लोगों का बर्ताव बिगड़ते चलता है, उन्हें लगता है कि दफ्तरों में कुर्सी पाने वालों के काम करने का यही तरीका रहता है। मैं अपने खुद के दफ्तर में इश्तहार देने आए लोगों को सामने खड़ा रखकर कुर्सी तोड़ते अपने लोगों को देखकर स्तब्ध रह गया। यह हाल मुझे बहुत से निजी व्यापारी संस्थानों में दिखता है जहां नौकरी सरकारी नौकरी की तरह स्थायी नहीं होती।
देश में काम करने के तौर-तरीके तबाह हो गए हैं। जब तक किसी ताकतवर बंदूक की नोंक न टिकी हो, या सामने कोई गाजर न लटका हुआ हो, सरकारी घोड़ा दौड़ता ही नहीं। जहां उसे कोई निजी फायदा दिखे, वहीं वह उत्साह दिखता है और कमाई मोटी हो, सरकार को चूना लगाने के लिए ब्रश और सीढी का जुगाड़ भी करके देता है और दफ्तर आने वाले से पूछता है कि सीढी पकडूं क्या?
सरकारी कामकाज में जालसाजी और धोखाधड़ी कभी भी बाहरी लोग नहीं करते, कर सकते भी नहीं। यह पूरी साजिश हमेशा इन दफ्तरों के भीतर तैयार होती है। इन साजिशों में कमाई इतनी रहती है और खतरा इतना कम रहता है कि सरकारी अमला इसमें मगन रहता है या इस ताक में रहता है।
ऐसा भी नहीं कि रूस में भ्रष्टïाचार कम होगा या सरकारी अमले का तौर-तरीका हिंदुस्तान से बेहतर होगा, लेकिन मैं यहां चर्चा सिर्फ एक पहल की कर रहा हूँ। जो सरकार में स्थायी रूप से नहीं है, कुछ बरसों के लिए जिसे यह मौका मिला है उसी से तो उम्मीद की जा सकती है कि वह लीक से हटकर कुछ करने की सोचेगा। ऐसे मेयर से जब मैं अपने प्रदेश के मेयरों की तुलना करता हूँ तो लगता है कि वे नियमित अफसरों से बड़े अफसरों से हो गए हैं, काम न करने का उनका रूख सरकारी बाबुओं सा हो गया है और कमाई की साजिश में वे सजा के खतरों की तरफ से भी बेफिक्र हूँ। ऐसा ही हाल दीगर स्थगन या संस्थाओं में चुनकर आने वाले लोगों का है।
कल छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल मंत्री दिन भर बैठक लेते रहे लेकिन वे भी बड़े खर्च वाली योजनाओं से परे ऐसी महीन बातों पर नहीं गए कि कर्मचारियों का बर्ताव कैसा हो, म्युनिसिपलें बिना खर्च क्या-क्या कर सकती हैं। यूं तो यह चुनाव के ठीक पहले का साल है जब बहुत तरह के प्रयोग या फेर बदल नहीं हो सकते, लेकिन इसके पहले के बरसों में ही क्या हो गया? दूसरे मंत्रियों ने ही क्या कर दिया? या दूसरे राज्यों ने ही क्या कर दिखाया?
मैं उम्मीद करता हूँ कि देश के कम से कम कुछ दूसरे राज्यों में तो काम की संस्कृति छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश से बेहतर होगी। गुजरात की तारीफ सुनने मिलती है कि वहां कोई अफसर-कर्मचारी कोई उम्मीद करती भी है तो काम हो जाने के बाद। हालांकि उसी गुजरात में बड़े-बड़े पुलिस दफ्तर सुपारी हत्यारों की तरह जेल में हैं।
लेकिन अगर वहां कुछ बेहतर नहीं हो तो भी हम अपने-आपमें अच्छे क्यों नहीं हो सकते?

अविकसित सोच और अफसोस




देशभर से रैगिंग की प्रताडऩा की डरावनी खबरें आ रही हैं। कहीं किसी जूनियर को इमारत से फेंक दिया तो कहीं उसके हाथ-पांव जला दिए गए। कुछ ही वक्त तो हुआ है इंदौर में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली, वह लिख छोड़ गया कि रैगिंग की प्रताडऩा से वह आत्महत्या कर रहा है। हर बरस ऐसी कुछ दर्जन आत्महत्याएं इस देश में होती हैं। कानून ने अपने-आपको खासा कड़ा बना लिया है लेकिन यह बड़ा और कड़ा डंडा खूंटी से टंगा ही रह गया है, इस्तेमाल होते नहीं दिखता।
मैं यह सोचकर दहशत में आ जाता हूँ कि जिनके बच्चों का बहुत कड़े मुकाबिले के बाद जाकर किसी कॉलेज में दाखिला होता होगा, वहां हॉस्टल में प्रताडऩा झेलते बच्चे के मां-बाप दूर अपने घर में कैसी नींद सोते होंगे। एक बाप की हैसियत से मैं सोचता हूँ तो लगता है कि जिस कॉलेज या हॉस्टल में प्रताडऩा होती हो वहां के प्रिंसिपल, वार्डन के खिलाफ अदालत में जाना चाहिए। लेकिन जब कॉलेजों की हकीकत तो देखें तो दिखता है कि क्लासरूम में पढ़ाते जिन लोगों को सबसे अधिक बरस हो गए हैं, वे प्रिंसिपल बन जाते हैं, जो हॉस्टल के करीब रहते हैं वे वार्डन बन जाते हैं। उनका मैनेजमेंट, प्रशासन, मानवीय संबंधों का अनुभव शून्य रहता है। एक इंसान के रूप में सामान्य समझ-बूझ से वे जो सीखते हैं, वही उनके काम आता है लेकिन अब तो प्रबंधन और प्रशासन एक अलग ही काबिलीयत की बात हो चुकी है, इसके लिए छोटे-बड़े कई कोर्स पूरी दुनिया में चलते हैं
हॉस्टल और कॉलेज को छोड़ें तो अस्पतालों का यही हाल है। जो सबसे सीनियर डॉक्टर होता हे वह अस्पताल सुपरिंटेंडेंट बन जाता है, फिर चाहे उसे दवा खरीदी से लेकर ड्यूटी लगाने तक किसी भी काम के लिए प्रशिक्षण न मिला हो।
भारत के सरकारी संस्थानों के कामकाज में यह एक बहुत बड़ी खामी मुझे दिखती है जो निजी संस्थानों तक उतर आई है। मेरे परिचित बहुत से ऐसे डॉक्टर हैं जो अपने निजी नर्सिंग होम के मालक-चालक हैं। वे डॉक्टर भी हैं और मैनेजर भी। सर्जरी करके निकलते हैं और किसी को कमीशन भेजने का लिफाफा बनाते हैं तो कभी कर्मचारियों की ड्यूटी लगाने की मशक्कत करते हैं। ऐसे सौ किस्म के गैर-डॉक्टरी काम करते हुए भी वे अपनी टकसाल को चलाने के लिए एक मैनेजर भी नहीं रखना चाहते। अस्पताल-प्रबंधन एक बड़ी खास काबिलीयत का काम बन चुका है लेकिन इसका चलन नहीं बढ़ा।
मुझे लगता है कि स्कूल के हेडमास्टर से लेकर विश्वविद्यालय के कुलपति तक और हॉस्टल के वार्डन से लेकर अस्पताल अधीक्षक तक, हर किसी के लिए कुछ महीनों से लेकर बरस भर तक के प्रशिक्षण को जरूरी कर देना चाहिए। जैसे-जैसे लोग ऐसे प्रशासनिक-प्रबंधकीय पाठ के करीब पहुंचते हैं उनको ऐसे कोर्स में शामिल होने का मौका मिलना चाहिए, खासकर संभावित प्रमोशन के पहले तीन बरसों में। जो लोग ऐसे कोर्स न कर लें, उन्हें गैर शिक्षकीय, गैर चिकित्सकीय प्रबंधन-प्रशासन के लायक नहीं मानना चाहिए।
मुझे देश के पढ़ाई, इलाज और ऐसे कई दूसरे जरूरी कामों वाले सरकारी या निजी संस्थानों में यह एक बड़ी खामी लगती है और इससे देश की उत्पादकता कम हो रही है। एक प्रिंसिपल अगर अपने स्कूल या कॉलोनी के शिक्षकों से ड्यूटी पूरी नहीं करवा पाता, संस्था का एजेंडा पूरा नहीं करवा पाता, कॉलेज और हॉस्टल में अनुशासन नहीं रखवा पाता, नकल नहीं रोक पाता, कोर्स पूरा नहीं करवा पाता, बच्चों में मानसिक तनाव दूर नहीं करवा पाता, संस्था से साम्प्रदायिकता, भेद-भाव दूर नहीं रख पाता, चोरी-भ्रष्टïाचार को रोक नहीं पाता, तो उसे शिक्षक ही बने रहना चाहिए। महज बुजुर्गियत या लंबी नौकरी किसी को बेहतर प्रशासक नहीं बना देती। पांच-सात साल के प्रशिक्षण और अनुभव के बाद एक कलेक्टर पर किसी बड़े कॉलेज के प्राचार्य के मुकाबिले दस हजार गुना अधिक बोझ होता है, लेकिन प्रशासन और मैनेजमेंट के गुर जानकर ही वह ऐसी जिम्मेदारी पूरी कर पाता है।
जो सरकार जिले चलाने के लिए आईएएम का पूरा ढांचा अंगे्रजों की तर्ज पर चलाती है, उसके लाखों कॉलेज, दसियों लाख स्कूल बिना प्रशासनिक अनुभव चलते हैं। यही हाल सरकारी अस्पतालों का है और कुछ और विभागों में भी ऐसा ही होगा।
चूंकि प्रबंधन, प्रशासन, मानव-संबंध, इन सबकी कमी पहली नजर में बिना खटके रह जाती है इसलिए आखिरी असफलता तक इसे खपा दिया जाता है। सोने-चांदी की दूकान में काम करने वाले सेल्समैन को औजार थमाकर गहने गढऩे इसलिए नहीं बिठाया जाता कि उसकी कमजोरी पल भर में समझ आ जाएगी। लेकिन मुझे मलाल इस बात का है कि हर बरस दर्जनों छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं के बाद भी न केन्द्र सरकार, न कोई राज्य सरकार, कॉलेजों में प्रशासनिक अनुभव की कमी को समझ रही।
इससे परे एक और कमी मुझे खलती है, पूरे देश में ही मनोवैज्ञानिक परामर्श की। स्कूल-कॉलेजों से परे भी देशभर में तनाव चल रहा है, लेकिन मनोविज्ञान, मनोचिकित्सा की पढ़ाई में बढ़ोतरी नहीं हो रही। शहरीकरण, औद्योगीकरण, महिला-स्वतंत्रता और बच्चों के कम उम्र में व्यस्त होने जैसे बहुत से मामले हैं जिनके चलते तनाव बढ़ रहा है। एक आत्महत्या के पीछे मुझे आत्महत्या की कगार पर खड़े कुछ सौ लोग दिखते हैं और उनके पीछे कई हजार निराश और हताश लोग। ऐसे भयावह पिरामिड को अनदेखा करने वाली सरकार आने वाले अधिक कड़े ग्लोबल मुकाबिले में कमजोर ही बनती जाएगी। भारत जैसा देश और समाज, कीचड़ में खिले प्रतिभा के कमल की चर्चा करते नहीं थकते और उसे देश का आम हल मानने की खुशफहमी में भी जीता है। हर सफल के पीछे सैकड़ों असफल लोगों की भीड़ है, वह इसलिए कि जिस कॉलेज में दिन काटकर वे निकले, वहां के प्राचार्य का कोई प्रशासकीय अनुभव नहीं था और कॉलेज की उत्पादकता बहुत कम थी। साल में सौ दिन भी पूरी पढ़ाई नहीं हुई और जवानी के तीन, पांच, या अधिक बरस चले गए। गिने-चुने काबिल प्रिंसिपल जिन कॉलेजों में रहते हैं वहां के काम, माहौल और उनकी उत्पादकता में फर्क साफ दिखता है।
सरकारों को अपने घिसे-पिटे, नाकामयाब और बेअसर साबित हो चुके तरीकों को बदलना होगा। ऐसा न होने तक न मौतें थमेंगी न जिंदगियां बनेंगी, चाहे वे कॉलेजों में हों या अस्पतालों में। लेकिन सरकारी सोच पर जमी चर्बी फौलाद सी कड़ी होती है, लोहे के घिसने की धीमी रफ्तार से ही वह पिघलती है, अगर पिघलती है तो।
मैं इंतजार कर रहा हूँ सरकार में ऐसे मुखिया का जो मैनेजमेंट से लेकर मनोविज्ञान तक की दुनियाभर में साबित भूमिका का महत्व समझे। न राजा में व्यवस्था की चर्बी छांटने का उत्साह न जनता को अच्छे और बुरे में फर्क की परवाह। ऐसे में बड़ी संभावना यही है कि मेरे लिखने, पाठकों के पढऩे के समय की बरबादी के अलावा कागज और स्याही की बरबादी के साथ यह मुद्दा थम जाएगा क्योंकि न सिर्फ हमारा देश विकसित नहीं है, हमारी सोच भी विकसित नहीं है।
-सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़



एक बरस बाद के चुनाव को लेकर छत्तीसगढ़ गर्म होने लगता है। पहले भारतीय जनता पार्टी ने घमासान बैठकें करके अपना घर सुधारने की मशक्कत की, और अब कांगे्रस बांस-बल्लियां लाकर अपनी छत सुधार रही है। एक-एक का रमन सरकार की तरफ से कम से कम एक अफसर, बिजली को मुखिया या तो उनके कहे या बिना कहे, सबको काटने दौड़ता है और कांगे्रस, और भाजपा के भी, बड़े-नेताओं को पिछले बरसों में मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलने का सबसे बड़ा मौका दिया हे। आरएसएस के एक बड़े नेता ने मुख्यमंत्री के इस मनोनीत, बाहरी, गैर छत्तिसगढिय़ा अफसर के लिए अफसोस के साथ कहा- जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसके दुश्मन की क्या दरकार? अपने लिए इस सबसे बड़े राजनीतिक, नुकसान को मुख्यमंत्री अपनी पसंद से झेलते हैं या फिर बिहार-झारखंड के एक नेता की वजह से जो कि राजनाथ सिंह के करीबी हैं और सीएसईबी चेयरमैन राजीव रंजन के भी, यह तो मुख्यमंत्री ही जानें। लेकिन मुख्यमंत्री के नंबर एक के प्रतिद्वंन्द्वी, भाजपा के सबसे वरिष्ठï छत्तीसगढ़ी सांसद रमेश बैस के सरकार पर हमला करने के आधे से ज्यादा मौके यही एक अफसर देता है।
लेकिन छत्तीसगढ़ के अगले विधानसभा चुनाव की बात यहीं पर खत्म नहीं होती और बात सिर्फ सरकार या भाजपा तक सीमित भी नहीं रह सकती। अतिमहत्वाकांक्षी, अतिआत्मविश्वासी, अतिआत्म मुग्ध और अतिआत्मकेन्द्रित कांगे्रस पार्टी इस राज्य में पूरी तरह से बोगस पार्टी साबित हुई है। इसका सारा ईंधन इसके नेताओं के बुलडोजरों में खप जाता है एक-दूसरे को ठहरते हुए। सड़क किनारे राज्य की जनता खड़ी रह जाती है यह राह देखते हुए कि शायद कोई कांगे्रसी अपनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में उसे भी राशन दूकान, अस्पताल या दाल-भात केन्द्र तक छोड़ देगा, लेकिन काले बंद शीशें वाली कांगे्रस पार्टी के नेता भीतर एसी बाहर सायरन चलाते हुए लगभग सत्ता सुख में मदहोश हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में अगले विधानसभा चुनाव के नतीजे जो भी हों, उनको सोचकर आज भाजपा के कई नेता महमूद गजनवी की लौटती सेना की तरह लूट-पाट कर रहे हों या कांगे्रसियों की तरह बयान ले रहे हों, जनता का अधिक भला नहीं दिखता। कांगे्रस तो जोगी राज में अपने को परले दर्जे की भ्रष्टï और घटिया दर्जे की अपराधी साबित कर ही चुकी है, रमन सरकार के कांटे की टक्कर के भ्रष्टïाचार के बाद अगर कांगे्रस सत्ता में लौटती है तो वह कांगे्रस की और अधिक कातिल बददिमागी के लिए काफी होगा, और अगर वह नहीं लौटती है तो वह भाजपा के डामरखोरों, धान चोरों के लिए मरीजों का खून, राजा हरिश्चन्द्र के दस्तखत वाला चरित्र प्रमाणपत्र होगा।
कांगे्रस और भाजपा का राजनीतिक संगम जब गंदे नाले के पानी की तरह बह रहा है तो इसे साफ कौन करे? किनारे पर बैठी राजनीतिक पार्टियां अपनी बेअसर ताकत की वजह से हाशिये पर तो हैं, लेकिन वहां बैठकर वे एक पत्थर भी उछालते नहीं दिखतीं।
राष्टï्रवादी कांगे्रस पार्टी के अकेले नेता, अकेले विधायक का मुंह भी डामर से चिपककर बंद हो चुका लगता है। विधानसभा में वे धूमकेतु की तरह किसी मुद्दे को उठाते हैं और फिर वह मुद्दा धूमकेतु की तरह की जरा सी जिंदगी जीकर खत्म हो जाता है।
बहुजन समाज पार्टी अपने मायने इस राज्य में खो चुकी दिखती है क्योंकि उसकी दलित जमीन पर अजीत जोगी ने पता नहीं कैसे पट्टïा पाकर अपनी एक इमारत खड़ी कर रखी है। यह इमारत पता नहीं असली है या फिल्मी सेट की तरह बोर्ड की लेकिन कांगे्रस का कोई विधायक इसे खट खटाकर देखने की जुर्रत नहीं करता। हर विधायक डरा-सहमा रहता है कि जोगी के खफा होते ही उसके विधानसभा क्षेत्र में दलित मतदाता उसे उखाड़ न फेंके। ये इमारत ईंट की हो या प्लाई बोर्ड की, ये राज्य की राजनीति में दलित जमीन पर तनी अकेली इमारत है और मायावती की बसपा अपनी जमीन से बेदखल सी लगने लगी है।
छत्तीसगढ़ में वापमंथी दलों के बारे में पिछले सांठ बरसों में लिखने के महज एक बात है कि बंगाल, केरल और त्रिपुरा से परे वामपंथियों को कोई टापू शायद चाहिए ही नहीं, इसीलिए आज इस राज्य में एक भी वामपंथी विधायक नहीं है, और तो और, माक्र्सवादी संजय पराते को छोड़कर कोई वामपंथी बयानबाज भी नहीं है। यह देखकर हैरानी होती है कि जब सरकारी अस्पतालों में मरीजों को नकली पाईप लगाकर उसका खून पीते नेता-अफसर बैठे रहते हैं, तब भी वामपंथी बहसबाजों को एक बयान टाईप करवाने की फुरसत नहीं रहती।
यह चुप्पी सार्वजनिक जीवन के हिसाब से अमानवीय और लोकतांत्रिक भ्रष्टïाचार भी है। ऐसे वामपंथ के छत्तीसगढ़ में पैर जमाने के पहले रायपुर की इमारतों की छतों पर बर्फ जमने लगेगी।
और किस पार्टी की चर्चा करें? अपार संभावनाओं वाले छत्तीसगढ़ मुक्तिमोर्चा ने अपनी राजनीतिक जमीन लगभग खोदी है और उससे जुड़े राजेन्द्र सायल जैसे कुछ नेताओं ने अपने को मानवाधिकार जैसे गैर-चुनावी मुद्दों में कैद कर लिया है। यह एक संगठन वामपंथियों से हजार गुना अधिक असर वाला, खालिस छत्तीसगढ़ी संग्र हो सकता था, लेकिन यह चुनाव से बाहर हो चुका दिखता है।
एक ताजा-ताजा राजनीतिक दल एक बर्खास्त सिपाही के मातहत एक रिटायर्ड आईएएस ने मिलकर बनाया है जो फिलहाल कागजों पर रोपा गया है। इससे एक उम्मीद की जाती है कि मुख्य सचिव तक न पहुंच सके राघवन अपने पास रखे साथियों के भ्रष्टïाचार का भांडा फोड कर सकते हैं। इस गंदगी के बिखरने से राज्य साफ होगा, जिस तरह अखबारी पन्नों पर काली स्याही बिखरने से लोकतंत्र साफ होता है। लेकिन यह फिलहाल तो महज एक उम्मीद है।
वसूली और उगाही पर जिंदा एक आध और संगठन छत्तीसगढ़ की राजनीति में भयादोहन करने जिंदा रह लेते हैं लेकिन वे सिर्फ भ्रष्टïाचार के भागीदार होकर काली कमाई पर एकाधिकार तोडऩे का काम करते हैं, उससे अधिक कुछ नहीं।
छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में यहां पर मीडिया भी एक पार्टी बन गया है और पिछले कुछ चुनावों में सम्पन्न दलों और सम्पन्न नेताओं ने इसे एक चुनावी खर्च मान लिया है। नेताओं और पार्टियों ने भी मीडिया के अच्छे और बुरे तबकों के बीच यही फर्क रखा है कि जो चाकू टिका दे, उसने लिए टेंट ढीली कर दो। इसलिए छत्तीसगढ़ की चुनावी-पत्रकारिता आने वाले बरसों में किसी बाहरी शोधकर्ता के काम करने का सामान बन जाएगी। चुनाव के वक्त मीडिया के कुछ लोगों को मुंह पर गमछा बांधकर चलने की जरूरत पिछले कुछ चुनावों में सामने आ चुकी है, लूटना ही है तो लुटेरा वर्दी में तो रहे। लुटने वाले को भी लगे कि किसी कायदे के लुटेरे से लुटा, आखिर महंगे रेस्तरां में वेटर वर्दी में रहते हैं, चाहे ग्राहक को वर्दी खाना न हो।
छत्तीसगढ़ में भ्रष्टïाचार के छत्तीसगढ़ बन गए हैं और जनता रियासत के दिनों में अधिक लुटनी थी या आज के इन राजे-महाराजों के हाथ अधिक लुट रही है, यह कहना कुछ मुश्किल है। राजनीतिज्ञों के अलावा उद्योगपतियों, ठेकेदारों, अफसरों के अपने-अपने साम्राज्य यहां स्थापित हो गए हैं।  दरअसल इन छत्तीस गढ़ों के बीच बिखरी जमीन ने इस राज्य को इतनी कमाई दी है कि आज की सम्पन्नता से यह अहसास कम हो चला है कि आज भी जनता लुट रही है। लोग फुरसत में कागज-पेन लेकर बैठें और हिसाब लगाएं कि उनकी नजर में कौन से छत्तीस सबसे बड़े लुटेरे हैं। और अपनी-अपनी फेहरिस्त चुनाव तक दीवारों पर लिखते चलें। उस पर लिख दें कि सो जा बेटा, सो जा, नहीं तो इस गिरोह में से कोई आ जाएगा।

-सुनील कुमार

कुनबों की कैद... और कबीरवादी




अभी-अभी दिल्ली की एक पत्रकार की एक किताब आई है जिसमें सीआईए के दस्तावेजों के हवाले से बताया गया है कि नेहरू इंदिरा को अपनी राजनीतिक वारिस बनाना नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि इससे उन पर कुनबापरस्ती का आरोप लगेगा, और उनका यह भी मानना था कि कांगे्रस पार्टी अपना नेता तय करने की काबिलीयत रखती है।
लेकिन नेहरू आरोपों से बच भी नहीं पाए। उनके बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने लेकिन उनके तुरंत बाद से देश में नेहरू-गांधी परिवारवाद की बात शुरू हुई। नेहरू की बेटी ने विरासत तो नेहरू की या उनकी पार्टी की, पाई थी लेकिन नाम गांधी का भी जुड़ गया, इंदिरा के पति फिरोज गांधी के कारण। हालांकि गांधी नाम से महात्मा गांधी नाम याद पड़ता है जिन्होंने अपने गांधीवाद का कोई वारिस नहीं छोड़ा, नेहरू उनके अकेले राजनीतिक वारिस बने रहे। यह एक अलग बात है कि गांधी के कुनबे का कोई नेहरू की पार्टी के खिलाफ लड़कर मंत्री बना तो किसी ने राजनीतिक मनोनयन मंजूर करके राजनायिक पद लिया।
आज सुबह यह बात दो-तीन वजहों से फिर कौंधने लगी। कल-परसों ही राहुल गांधी को कांगे्रस में महासचिव बनाया गया ओर आज सुबह की खबर है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे को प्रदेश भारतीय जनता युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया है। बात यहीं नहीं थमी, अजीत जोगी ने टाईम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए प्रियंका गांधी के लिए लंबी-चौड़ी भूमिका सुझाई है।
उत्तरप्रदेश में ही मुलायम सिंह यादव के बेटे, भाई, सबने सत्ता पा ली। बिहार में लालू यादव, उनकी पत्नी, पत्नी के भाई वगैरह सभी सत्ता पर आ गए। हरियाणा में देवीलाल का पूरा कुनबा हरियाणा को दुहने के लिए सत्ता पर आ गया। मध्यप्रदेश के रविशंकर शुक्ल का कुनबा पहले नागपुर, फिर भोपाल और अब छत्तीसगढ़ में सत्ता पर काबिज रहा। मध्यप्रदेश में ही सिंधिया घराने ने कांगे्रस, भाजपा दोनों पर कब्जा रखा जो राजस्थान तक फैल गया।
दक्षिण में भी एमजीआर, एनटीआर, करणानिधि की राजनीतिक विरासत कुनबे में या पे्रम संबंध में बंटी। उड़ीसा में नवीन पटनायक, कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला जैसी वसीयतें देश के हर राज्य के स्टाम्प पेपरों पर लिखी मिल जा रही हैं।
यह पूरा सिलसिला चाहे कितना ही मासूम हो, इस बारे में सोचते ही मुंह बदमजा हो जाता है। इतने बड़े-बड़े नेता, इतनी ताकतवर और सफल पार्टियां, लेकिन जब राजनीतिक की बात आती हे तो लोग घूम-घूमकर अपने का ही तब तक देते चलते हैं जब तक राजा बेटा या रानी बेटी अघा न जाए। यह कैसा खानदानी पेशा है जिसमें लोगों को मानस-पुत्री या मानस-पुत्र नहीं मिलते? यह कैसा लोकतत्र है जिसमें अब कुनबापरस्ती की चर्चा भी होनी बंद हो गई है।
छत्तीसगढ़ को मैं देखता हूँ तो एक के बाद दूसरे भूतपूर्व राजे-महाराजे राजनीति में होवी हैं। कांगे्रस और भाजपा दोनों बाकी नामों को तभी सोचती हैं जब उन्हें ऐसे कोई भूतपूर्व सामंत नसीब न हों या फिर किसी पुराने नेता के कुनबे में कोई सत्ता के काबिल न हो। ऐसे ही मामले इस छोटे से राज्य में निकल जाएंगे जिसमें संगठन के पद, पार्टी की टिकट, सत्ता की कुर्सी या सुविधाभोगी मनोनयन में लोगों ने अपने कुनबे को ही चुना। इसमें वामपंथी दल अपनी परंपराओं के चलते नीति-सिद्घांतों के कारण बाकी देश की तरह छत्तीसगढ़ में भी मुक्त रहे, लेकिन उनके पास बांटने को यहां कुछ भी नहीं था। लेकिन यह बात कम लोगों को मालूम होगी कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राज्य सचिव कॉमरेड चित्तरंजन बख्शी अपने राज्य कार्यालय को ही रायपुर से उठाकर भिलाई ले गए थे क्योंकि उन्हें वहां अपने बेटे के पास रहना था। वे बेटे को पार्टी में नहीं ला सकते थे इसलिए पार्टी मुख्यालय को बेटे के घर ले गए।
लेकिन मैं ठीक-ठीक कुनबापरस्ती पर भी लिखना नहीं चाहता। अभी-अभी एक परिचित अफसर से बात हो रही थी तो उन्होंने याद दिलाया कि देश में सत्ता किस तरह एक सीमित तबके के हाथों में घूमती हे और बाकी जनता के एक बड़े हिस्से को तो कोई लोकतांत्रिक अधिकार भी नहीं मिलते।
यह हालत इसलिए भी लगती है कि खानदानी नेता जनता के बजाय अपने कुनबे से राजनीतिक समझ लेकर आते हैं। उन्हें जनता पर कई बातों के लिए निर्भर भी नहीं होना पड़ता। जनता में उनकी लोकप्रियता या पकड़ से उनकी तरक्की का अधिक लेना-देना नहीं रहता। छत्तीसगढ़ के विधायकों-सांसदों में जितने महल-वासी रहते आए हैं उनको देखें तो लगता है कि अपने-आपको जनकल्याणकारी मानने की खुशफहमी से ये बाहर ही नहीं आ पाते। सरदार पटेल ने रियासतें देश में मिला दीं लेकिन उनके वारिस आज देश-प्रदेश पर काबिज हो गए।
कुनबों में कैद लोकतंत्र का आजाद होना कैसे हो पाएगा, यह सोचना मेरे लिए आसान नहीं। देश के कानून में यह रोक नहीं लगाई जा सकती कि एक सांसद या विधानसभा में एक कुनबे के एक से अधिक लोग न रहें। ऐसा करना कुनबे के बाकी चिरागों के मौलिक अधिकार छीनना होगा। लेकिन वंशवाद को क्या भारतीय विचारक, भारतीय राजनीति उसी तरह किनारे बैठकर देखेंगे जैसा कि हम वर्मा को देख रहे हैं कि यह उसका अंदरूनी मामला है?
क्या कानून से परे कुछ परंपराएं विकसित होने की गुंजाइश भी अब नहीं बची? क्या अब सब कुछ मेरा घर, उसका घर, कानून में इजाजत, जैसे दायरों में बंटी बातें हो गई हैं? क्या कुनबों, सामंतों के खिलाफ चुनाव में कोई गैर-चुनावी संगठन मुद्दे उठा सकता है? क्या हर चुनाव क्षेत्र में जनता को सोचने को मजबूर करने वाले मुद्दे उठाने वाले जनसंगठन, जनमंच तैयार हो सकते हैं? कड़वी और असुविधा की बात करने वाले कबीरवादी कुछ हैं?

मेरी सबसे बड़ी फिक्र




कुछ समय पहले तक भारत के बाजार में 'किलरÓ जीन्स आती थी। कपड़ा और सिलाई दोनों ठीक होने से मैंने भी इस मार्के के जीन्स और डेनिम शर्ट लिए। यह शायद दस बरस पहले की बात रही होगी। कायदे की बात तो यह है कि उस वक्त मुझे जो बात सूझनी थी वह कई बरस बाद सूझी। किलर का तो सीधा-सीधा मतलब हत्यारा होता है। जीन्स के पीछे और शर्ट के सीने पर हत्यारा लिखकर घूमने का क्या तुक था? और फिर ऐसे ब्रांड से परहेज क्यों नहीं जो अपराध को महिमा मंडित करता है?
धीरे-धीरे मैंने उन कपड़ों का इस्तेमाल बंद किया लेकिन मुझे लगा था कि बात आई गई हो गई। इन दिनों अपने शहर के बाजार में 'आऊट लॉÓ (अपराधी) और 'लूटÓ जैसे ब्रांड देख रहा हूं तो फिर 'किलरÓ की याद आ रही है। अभी कुछ और भी ऐसे ब्रान्ड बाजार में हैं जो एकाएक याद नहीं पड़ रहे लेकिन वे भी अपराधों से जुड़े नाम हैं। अब जब मैं एक महीन संवेदनशीलता के साथ यह सब देख रहा हूँ तो लगता है कि सरकार ऐसे ब्रांड रोक सकती है, या उसे रोकने चाहिए।
एक सभ्य समाज में लोकतांत्रिक लीचलेपन की भी एक सीमा होनी चाहिए। अपराधों के नाम पर सामानों के नाम रखने का, ऐसे ब्रांड बनाने और बढ़ाने का अंत क्या होगा? क्या आगे चलकर रेप जैसे ब्रांड के कपड़े नहीं आने लगेंगे?
कुछ बरस पहले मैं लंदन गया तो लोगों के बदन पर 'एफसीयूकेÓ ब्रांड के कपड़े देखने पर शुरू में तो लगा कि आंखें धोखा दे रही हैं, लेकिन फिर नामी-गिरामी ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर ब्रांड की दूकान ही दिखी। लगा कि अंगे्रजी भाषा में सभ्य समाज में प्रतिबंधित शब्द से इस कदर, इस तरह मिलता-जुलता यह नाम क्यों रखा गया? बाद में किसी जगह पता लगा कि इस कंपनी का पूरा नाम 'फे्रंच कनेक्शन यूकेÓ है और इसी के पहले अक्षरों को लेकर यह मार्का बनाया गया है जो पहली ही नजर में अश्लील लगता है। क्या भारतीय बाजार में यह ब्रांड भी आ जाएगा? और इससे सार्वजनिक सोच पर क्या असर पड़ेगा?
पहले शायद मैं कहीं लिख चुका हूँ कि किस तरह टी शर्ट पर अंगे्रजी और पश्चिमी संस्कृति में उत्तेजक मतलब रखने वाली बातें छपी रहती हैं और उनके मतलब से अनजान, या जानते-बूझते हुए लड़के-लड़कियां वे कपड़े पहनने लगे हैं। जब ऐसे लोग सामने पड़ जाते हैं तो मैं भी बरबस उन शब्दों को पढऩे लग जाता हूँ, क्योंकि वे तो छपे ही सामने, वाले के पढऩे के लिए हैं। कभी समझाने की गुंजाइश दिखती हैं। तो समझा देता हूँ, वरना चुप रह जाता हूँ, यह सोचकर कि कोई यह न कहे कि सारे बाल सफेद हो गए लेकिन नजरें लोगों के कपड़ों को पढ़ती रहती हैं।
एक और बात जिसे मैं पिछले कुछ महीनों या कुछ हफ्तों के दौरान दुहरा रहा हूँ, वह है शहर में लड़कियों और महिलाओं के कपड़ों के बारे में। यूं मैं अधिक उदार लोगों में, दुस्साहसी लोगों में गिना जाता हूँ और इस मुद्दे पर यूं खुलकर लिखना भी कई लोगों को खटक सकता है, लेकिन कोई बात मुझे अधिक खटकी है तो मैं उसकी चर्चा कर लेना जरूरी समझता हूँ, फिर चाहे लोग मुझे खारिज ही कर दें।
पिछले दिनों कुछ ऐसी अधेड़ महिलाएं दुपहियों पर दिखीं जिनके खासे पारदर्शी कपड़ों के भीतर से बिलकुल अलग ढंग के भीतरी कपड़े कौंधते दिख रहे थे। उनकी उम्र देखकर मुझे एकदम से यह तो नहीं लगा कि उन्होंने सोच समझकर ऐसा किया हो, लेकिन फिर कुछ और लोगों से पता लगा कि कॉलेजों में लड़कियां भी इसी तरह जाने लगी हैं। मैं नहीं जानता कि इस उम्र में मेरा ध्यान ऐसी बातों की तरह जा रहा है और जवानों या बाकी लोगों को ये दिखते हैं या नहीं, लेकिन नजर पडऩे पर मेरा तो ध्यान जाता है और मैं सोचता हूँ कि छेडख़ानी, पीछा करने के कुछ मामले ऐसे पारदर्शी, ऊंचे, नीचे, कारणों से भी होते होंगे।
लोगों को अपने दायरे को भी देखना चाहिए। जब खुली जगह पर हों तो फिर बहुतायत लोगों की सोच की भी फिक्र करनी चाहिए। मैं मोटे तौर पर महज लड़कियों और महिलाओं के फैशन की बात इसलिए कर रहा हूँ कि आमतौर पर भारत में छेडख़ानी से लेकर बलात्कार तक की शिकार सिर्फ लड़की या महिला होती है। अपने वक्त और अपने माहौल से बहुत अधिक दूस्साहसी कपड़े पहनकर निकलना परेशानी और खतरे को न्यौता देना भी होता है।
जब मुझे बहुत झीने सलवार कुर्ते में दो दिन पहले ही बड़े खतरनाक अंदाज वाले भीतरी कपड़ों वाली महिला दिखी तो एक पल को मैं यह भी सोचने लगा कि क्या इसने जानबूझ कर ऐसा किया है? हालांकि उस दुपहिये को उसकी बेटी की उम्र की लड़की चला रही थी। कोई और उम्र होती, कोई और मिजाज होता, कोई और दुस्साहस होता तो शायद मैं अपनी राह छोड़ उसने पीछे हो लेता, और मेरा ख्याल है कि कुछ और परेशानियां पीछे लगी भी होंगी।
दूसरी तरफ लड़कियों की नीचे जाती जीन्स और ऊपर चढ़ते टी शर्ट के बीच का फासला भी खतरनाक होते जा रहा है। सड़कों पर ऐसे नजारे के पीछे लगी मोटरसायकिलों पर उत्साही लड़कों से ये लड़कियां बिलकुल अनजान हों ऐसा भी मुझे नहीं लगता।
इस खुलेपन पर दिल्ली और मुम्बई में तो नजर नहीं जाती, लेकिन अपने इस कस्बाई शहर में पहले खुले मॉल में भी लड़के ऐसी लड़कियों को लेकर चुहलबाजी करते दिख जाते हैं। मुझे लगा है कि या तो मेरे उदार होने की रफ्तार कुछ धीमी पड़ गई है या फिर लड़कियों की गाडिय़ों की रफ्तार कुछ अधिक ही बढ़ गईं है। यह भी हो सकता है कि दस-पन्द्रह बरस से फिल्मों से दूर रहने के कारण मैं आज की फैशन से उतना वाकिफ नहीं रह गया हूँ जितना कि मुझे होना चाहिए था।
मैं यह भी सोचता हूँ कि बेटे की जगह या उसके अलावा इस उम्र की मेरी जवान बेटी होती तो उसे मैं उसके कपड़ों के बारे में क्या कहता? यह भी सोचती हूँ कि मैं गर ऐसे किसी स्कूल या कॉलेज का प्रिंसिपल होता तो क्या कहता? शायद मेरा सोचना दो कपड़ों के फासले को नहीं, दो पीढिय़ों के फासले तो बता रहा हो! मेरी सोच, जाहिर है कि एक पीढ़ी पुरानी है, उसमें यह अफसोस भी समाया रहती है कि हमारी पीढ़ी में ऐसी फैशन, ऐसी पार्टियां, ऐसे मोबाइल-मोबाइक नहीं थे और अब अपनी वह उम्र लौटकर कभी आती भी नहीं है। हो सकता हे कि मेरा यह पूरा लिखना उस खूसट और दकियानूसी पाखंड से मरा हुआ हो जो अपना मौका निकल जाने के बाद आए मौकों को कोसता है। लेकिन मेरी पीढ़ी के लोग भी तो आज इस समाज में रहेंगे। नई पीढ़ी के फैशन के साथ पुरानी पीढ़ी के मलाल का मेल क्या खतरे पैदा नहीं करेगा?
खैर मैं मौजूदा फैशन को अधिक कोस भी नहीं रहा, मेरी इस उम्र में सबसे बड़ी फिक्र यह है कि बेख्याल पीछा करते लोग सड़कों पर कहीं मुझसे न टकरा जाएं.... और यह भी कि मेरी गाड़ी किसी से न टकरा जाए।
- सुनील कुमार

ऐसी बेईमानी, उनमें नहीं




एक परिचित का फोन आया, वे एक जटिल, उलझे हुए मुद्दे पर एक बैठक रखना चाहते थे और मुझसे वे कुछ ऐसे लोगों के नाम जानना चाहते थे जो इस मुद्दे पर बोल सकें। काफी सोच विचार कर मुझे एक नाम सूझा तो मैंने बताया, लेकिन वो उन्हें पसंद नहीं आया। उनका कहना था कि नाम ऐसा हो जो उस मुद्दे के इस तरफ या उस तरफ का न हो। वे एक तटस्थ वक्ता चाहते थे। मैंने सुझाया कि अगर वे बिल्कुल ही विचारहीन तथ्य चाहते हैं तो इंटरनेट से दस्तावेज निकाल लें और उन्हें ही बैठक में पढ़ लें।
विचारों से उन्हें खासा परहेज लगा इसलिए विचारहीन लोगों के नाम और तलाशने की जहमत मैंने नहीं उठाई। दरअसल एक पूरी जिंदगी हो गई, मैंने तय किया है कि दुश्मन को भी सलाह गर देनी हो तो सही दो, वरना न दो। ये सज्जन तो मेरे दुश्मन नहीं हैं, साधारण परिचित हैं, इसलिए एक विचार गोष्ठïी के लिए विचारहीन लोगों की फेहरिस्त तैयार करने में मैं हाथ बंटाकर भला अपने ही फैसले के खिलाफ काम क्यों करता?
उनकी बैठक वे जानें, मैं तो बुद्घिजीवियों के तमगे लगी बैठकों से कोशिश करके दूर रहता हूं। अपने आप को बुद्घिजीवी कहने या समझने वाले तबके को मैं देखता हूं कि अगर वैचारिक बेईमानी, संघर्ष से पलायन, शोषण पर चुप्पी ही बुद्घिजीवी होना है, तो इससे अनपढ़, मेहनतकश लोग ही ठीक हैं। कम से कम अपने भीतर किसी बुद्घि के होने की और उसके  भरोसे जीने की खुशफहमी मजदूर तो नहीं फैलाते।
मैं यह भी देखता हूं कि जिस पढऩे-लिखने को लोग बुद्धिजीवी होने का तमगा समझ बैठते हैं, उस पढऩे-लिखने के बाद लोग बेईमानी के रास्ते आसानी से निकालते हैं, भ्रष्टï और कामचोर हो जाते हैं और खुद तो शोषक बनने की तरफ बढ़ जाते हैं लेकिन शोषण से लडऩे का उनका हौसला कम हो जाता है। बात-बात में उन्हें अपना भला-बुरा दिखता है, न कि सामाजिक सरोकार। पढ़-लिखकर लोग अधिकारों के बारे में जागरूक हो जाते हैं और जिम्मेदारी पूरी करना वे औरों का जिम्मा समझ लेते हैं। पढऩे लिखने से वे कानून में औरों की जिम्मेदारी समझ पाते हैं और अपने अधिकार भी। इस तरह वे मेहनतजीवी से बुद्घिजीवी हो जाते हैं।
मुझे कुछ शब्द जो बड़े अपमानजनक लगते हैं उनमें वीआईपी की तरह का ही शब्द है बुद्घिजीवी। यह लफ्ज बताता है कि बाकी मेहनतकश लोग मानो बुद्घिहीन बुद्घूजीवी हों। जब कोई ऐसे तमगाधारियों की बैठक की बात करता है तो मुझे लगता है कि हजारों बरस बाद मनु आकर फिर से एक कुलीन ब्राम्हण सभा का गठन कर रहे हैं।
कुछ विद्वान ऐसे हैं जो पढ़े-लिखे व्यक्ति को लडऩे में कमजोर मानते हैं। जिंदगी और दुनिया का कैसा भी संघर्ष हो, उसमें कीचड़ में उतरकर लडऩे या खून में लथपथ होने से सफेदपोश पढ़े-लिखों का परहेज करना स्वाभाविक ही लगता है। ऐसे लोगों की बैठक में शायद बहुत से या अधिकतर लोग अपने अपने धंधे की, अपनी कमाई और कुनबे की अपने सामाजिक मुखौटे की, अपनी साख की फिक्र करने के बाद ही मुंह खोलते होंगे। किसी धर्म, सम्प्रदाय, संगठन, पार्टी या तबके के प्रति प्रतिबद्घता के दायरे से निकलकर ईमानदार बात बोलना भी बहुतों के बस का नहीं होता होगा। खेमेबाजी को अनदेखा करके अंतरात्मा की आवाज कौन बोल पाता होगा? ऐसे में अपने पल्लू को चारों तरफ से बचाते हुए किस महफिल में कौन कैसे बैठ जाता होगा और कैसे उठ पाता होगा इसका अंदाज भी लगाया जा सकता है।
बुद्घिजीवी का बिल्ला बिना किसी लायसेंस-रजिस्ट्रेशन घर पर ही बनाया जा सकता है। कई लोग घर बैठे अपने को आचार्य लिखने लगते हैं तो कुछ चिंतक हो जाते हैं, फिर चाहे उनकी सारी चिंता महज अपने तमगे की चमक बरकरार रखने में ही क्यों न खर्च हो जाए।
मैं तथाकथित बुद्घिजीवियों की इस विचारहीन बैठक की कल्पना कर रहा हूं। एक गंभीर और जटिल, विवादास्पद मुद्दे पर चर्चा में स्वघोषित बुद्घिजीवियों को विचारों से जिस तरह का परहेज है वह देखते ही बनता है। दरअसल विचार आपके दिमाग से मशक्कत करवाते हैं, उसकी चर्बी छांटते हैं। जिस तरह हमारा तन कसरत से बचने में लगा रहता है, उसी तरह मन भी मेहनत नहीं करना चाहता। ऐसे में हैरानी नहीं कि अपने हाथों अपने गले में बुद्घिजीवी का तमगा टांगकर भी लोग बुद्घि को बांस से भी छूना नहीं चाहते। यह डर, यह आतंक उसी बुद्घि से है जिसका मुखौटा  लगाकर लोग अपने को ज्ञान-शूद्रों से परे का उच्च वर्ण ब्राम्हण बताते हैं।
ऐसी बेईमानी मेहनतकशों में नहीं होती।

- सुनील कुमार


 

सम्मान सौ बरस का...


दिल्ली के अखबारों में राष्टï्रपति के पति के महाराष्टï्र दौरे के इंतजाम की खबरें हैं। आजादी के बाद पहली बार देश पति के पति को देख रहा है। इसलिए यह इंतजाम लोगों की निगाहों में भी आ रहा है। राष्टï्रपति भवन से महाराष्टï्र सरकार को भेजे गए निर्देश जगह-जगह सरकारी विश्रामगृह (सर्किट हाऊस) में पति-पति के लिए कमरे, उनके अफसरों के लिए कमरे, एसटीडी, टेलीफोन, इंटरनेट, फोटोग्राफर, कारों का काफिला, सब गिनाया गया है।
महाराष्ट्र पहली बार अपने एक विधायक के लिए यह सब इंतजाम करने जा रहा हे। आज यह कांगे्रस विधायक राष्ट्रपति का पति है लेकिन पांच बरस बाद इन दोनों में से हो सकता हे कि एक भी ओहदा उसके पास न बचे। उस दिन क्या इन पांच बरसों का यह इंतजाम यादों को, बुरी यादों का बोझ नहीं बन जाएगा।
लेकिन सत्ता में बैठे लोगों का क्षणिक सहूलियतों के लिए ये इसी एक मामले में नहीं दिखता, कुर्सी छोडऩे के महीने भर पहले तक लोग अपनी पसंद से दीवारें रंगवाते हैं, मानो वह उनकी कब्र रहने जा रही है। लोग अपने लोगों के बीच लालबत्ती से समंदर चीरते हुए निकलते हैं मानो वह बत्ती जिंदगी भर के लिए उन्हें मिली हो।
लेकिन आज मैं इससे परे की भी कुछ सोच रहा था। एक अधिकारी मित्र के साथ मैं बात कर रहा था कि बहुत होनहार लोग इन दिनों सरकारी नौकरियों में क्यों नहीं आ रहे, क्यों वे निजी कंपनियों या अंतरराष्टï्रीय संस्थानों में चले जा रहे हैं?
उनका कहना था कि सरकारी नौकरी में खूबियां कम और खामियां अधिक रह गई हैं। जो औसत दर्जे के लोग हैं उनको तो सरकारी नौकरी के साथ जुड़ी सुविधाएं, नौकरी की सुरक्षा और काम न करके भी रेलगाड़ी के बीच के डिब्बे की तरह कतार में आगे बढऩे  का मौका, यह सब हासिल रहता है। दूसरी तरफ काम करने वाले, होनहार लोग रहते हैं जो सरकारी नौकरी में चुनौती मंजूर करने महत्वपूर्ण काम करते हैं और गलती का खतरा भी झेलते हैं।
इस अफसर का कहना था कि निजी कंपनी में काम करते हुए किसी व्यक्ति का भूतकाल, वर्तमान और भविष्य, तीनों देखा जाता है, लेकिन सरकारी नौकर सिर्फ वर्तमान में जीता है। बहुत महान काम करने वाला अफसर भी हजार रुपए की खरीदी की गड़बड़ी में सजा पा सकता है। जब किसी के काम का पूरा मूल्यांकन नहीं होता तो वह कैसे अपनी पूरी ताकत, पूरी दिलचस्पी, पूरी प्रतिभा सरकारी नौकरी में लगा सकता है?
उनके मुताबिक जब किसी को सिर्फ उसके मौजूदा काम के आधा पर सम्मान का अपमान, सजा या ईनाम मिले, तो वह लंबी रेस में बोझ उठाकर कब तक दौड़ सकता है और क्यों दौड़ेगा।
कमोबेश इसी किस्म की बात पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े नेताओं में से एक ने महिला आरक्षण को लेकर कही। उनका कहना था कि महिला आरक्षण लागू होने पर सीटें बारी-बारी से महिलाओं के लिए रखी जाएंगी। ऐसे में पुरुष सांसद या विधायक को यह पता नहीं होगा कि कब तक उसकी सीट उसके पास रहेगी? ऐसे में वह अतिरिक्त मेहनत क्यों करेगा?
चुनाव होते पांच बरस के लिए हैं, एक कार्यकाल खत्म हो जाने के बाद दूसरे कार्यकाल की फिक्र करके अधिक दिलचस्पी या अधिक उदासीनता दिलाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? लोग सहूलियतों के लिए जायज-नाजायज, लोकतांत्रिक-अलोकतांत्रिक विशेषधिकारों के लिए तो एक-एक दिन जीने को तैयार हैं, लेकिन मेहनत की बात जब आती है तो वे पांच साल बाद तलवार की तरह सर पर टंगी औरत को वजह बताने लगते हैं।
महाराष्टï्र निजा घर हो वे आज राष्टï्रपति के पति बनते ही वहां एक अलग दर्जा पाकर घूमेंगे, अपनों के बीच अपनी बनते हुए उन्हें कुछ अटपटा नहीं लगेगा? पांच बरस बाद क्या उन्हें इसी तरह का महत्व मिल पाएगा?
लोग पता नहीं कैसे बहुत अस्थायी, बहुत क्षणिक, बहुत महत्वहीन प्रतिष्ठïा के चिन्हों के फेर में पड़ते हैं। कोई अपनी इंसानियत खोकर ही ऐसा कर सकता है।
मैं यह देखकर हैरान होता हूं कि सम्मान सौ बरस का, छठवें बरस की खबर नहीं, जैसी बात को लोग समझ क्यों नहीं पाते?
इतनी बात में कुछ विरोधाभासी बातें भी दिख सकती हैं। कोइ्र सोच स्थायी तो कोई सोच अस्थायी, कहीं स्थायी से फायदा दिख रहा है तो कहीं अस्थायी से। लेकिन लोग हैं कि यह अपने ही फायदे की सोचते रहते हैं। और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो राजनीति में हों या सरकारी नौकरी में, बेधड़क अपना काम किए चलते हैं।
अखबार के धंधे में भी कभी-कभी लगता है कि लंबी दूरी की सोचे बिना एक दिन की घटना को लेकर एक खबर छापना घाटे का, खतरे का हो सकता है। लेकिन अखबार अपना खुद का दीर्घकालीन भला-बूरा सोचकर अपने इर्द-गिर्द कांटों का घना जंगल खड़ा कर लेगा तो खुद ही उसमें फंस कर रह जाएगा। एक खरा अखबार अपना भला-बुरा सोचते हुए खरा बना रह सके, ऐसा आसानी से नहीं हो सकता। एक खरे अफसर और खरे नेता पर भी यही बात लागू होती है।
- सुनील कुमार

नक्सलवाद, सलवा-जुडूम और मीडिया



देश में आज अगर सबसे अधिक चर्चा आतंकवाद या उग्रवाद के मोचे्र पर किसी की होती है तो वह छत्तीसगढ़ को लहूलुहान करने वाले नकसलवाद की है। छत्तीसगढ़ का बसतर इलाका जो देश के सबसे अनछुए आदिवासी इलाकों में से एक था वहां अब सरकार की पूरी मशीनरी सिर्फ नक्सली हिंसा से जूझने में या उस लड़ाई में हासिल जख्म को भरने में लगी है। पिछले एक पखवाड़े से बस्तर के एक बड़े इलाके में अंधेरा छाया हुआ था क्योंकि नक्सलियों के बीच सीधी लड़ाई जीतना आसान नहीं रह गया है। नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में सरकार द्वारा जनता को सामने रखकर शुरू करवाया गया सलवा-जुडूम नाम का अभियान सरकार और नकसलियों के बीच एक नया कोण बना चुका है। इस त्रिकोण में मरने-मारने वाले बंदूकधारियों के अलावा बड़ी संख्या में ऐसे आदिवासी हैं जो या तो सलवा-जुडूम में शामिल होकर नक्सलियों के हाथ जान गंवा रहे हैं या फिर सलवा-जुडूम में न जाकर पुलिस और सलवा-जूडूम के सशक्त आंदोलनकारियों के हाथों किसी फर्जी मुठभेड़ में मर रहे हैं।
जहां तक बस्तर के मीडिया का सवाल है तो वह इस नक्सली हिंसा को पिछले दो-तीन दशकों में धीरे-धीरे बढ़ते देख रहा था। पड़ोस के आंध्रप्रदेश में नक्सल आंदोलन किसी समय छत्तीसगढ़ से सौ कदम आगे चलता था तब भी बस्तर के पत्रकार नक्सलवाद से वाकिफ थे। लेकिन एक और बात चर्चा के लायक यह है कि बस्तर नाम से जो तस्वीर दिमाग में बनती है उस बस्तर का एक बहुत छोटा हिस्सा ही नक्सली हिंसा से रोजाना जूझता है। बस्तर के जिस मुख्यालय जगदलपुर में कुछ वरिष्ठï संवाददाता रहते हैं और कुछ स्थानीय अखबार निकलते हैं वह हिंसा की लपटों से दूर है। दूसरी तरफ जिस दंतेवाड़ा में सबसे अधिक हिंसा हो रही है वहां पर मीडिया के कुछ कम अनुभवी या अप्रशिक्षित पत्रकार हैं। लेकिन पूरे छत्तीसगढ़ के मीडिया से कोई भी वरिष्ठï पत्रकार दंतेवाड़ा जाकर लंबे समय तक नहीं रहा।
कुल जमा हाल यह है कि नक्सली हिंसा की रिपोर्टिंग में लगे अधिकांश संवाददाता ऐसे हें जो स्थानीय पत्रकार हैं और जिनमें से बहुत से अपने अखबारों के एजेंट भी हैं और इनके जिम्मे अखबार के लिए विज्ञापन जुटाना भी रहता है। कस्बों में बसे संवाददाताओं के साथ जो दिक्कत सभी जगह रहती है वह यहां भी है कि अफसर, नेता, ठेकेदार, व्यापारी, सप्लायर से उसे विज्ञापन भी लेने हैं और आए दिन इनके खिलाफ आने वाली खबरों के साथ इंसाफ भी करना है। यह एक लगभग असंभव संतुलन की बात होती है। दूसरी तरफ नक्सली हिंसा इतनी भयानक हे कि उनके नाखुश होने पर पत्रकारों का क्या हाल होगा यह सुरक्षित शहर में बैठे हम जैसे लोगों के लिए समझना नामुमकिन सा है। लेकिन नकसली ही बस्तर में अकेले हिंसक नहीं रह गए हैं। पुलिस और सलवा-जुडूम के हाथ भी जगह-जगह खून से रंगे हैं और यह दंतेवाड़ा के पत्रकारों की तारीफ हे कि वे इन सबके बीच भी काम कर रहे हैं। शहरी पत्रकार तो कुछ घंटे या एक-दो दिन के लिए वहां जाते हैं ोर उनका लिखा या दिखाया गया जब तक पुलिस, नक्सली या सलवा-जुडूम को दिखता है तब तक वे सुरक्षित दिल्ली, मुंबई या अपने देश जा चुके होते हैं। उनकी जान को उनकी कलम या कैमरे से खतरा नहीं रहता। नाम और चेहरे सब जानते हैं और जिनका अखबारनवीसी के अलावा भी कामकाज उसी इलाके में है उनके लिए तो खतरा हमेश बना ही रहता है।
छत्तीसगढ़ में खतरनाक कगार पर पहुंचे नक्सलवाद और यहां के मीडिया का मामला बड़ा जटिल है। किसी बारीक तराशे गए हीरे की तरह इसके बहुत से पहलू हैं। यह बात कुछ कड़वी लग सकती है लेकिन छत्तीसगढ़ के मीडिया के लगभग सभी संचालक-संपादक और अधिकतर बड़े पत्रकार शहरी, सवर्ण तबके के हैं। मीडिया में आदिवासियों की बुनियादी दिक्कतों को लेकर संवेदनशीलता को इस हकीकत के साथ ही देखना होगा। दूसरी तरफ नक्सली इलक्कों के बीच बसे पत्रकारों में से कुछ या तो खुद आदिवासी हैं या फिर उनकी बहुत लंबी जिंदगी शहरों से दूर इन जंगलों के बीच गुजरी है। आदिवासी जिंदगी और उसकी संस्कृति की समझ की कमी शहरियों में तब तक बहुत तेजी के साथ सामने नहीं आती है जब तक लाखों आदिवासियों का अंतहीन विस्थापन छत्तीसगढ़ के शहरों में कोई हलचल पैदा नहीं करता। राजधानी में बैठी बड़ी-बड़ी समझ मीडिया का रूख तय करती हैं। यह रूख खून में डूबे नक्सल-इलाकों से आती खबरों को महत्वहीन या महत्वपूर्ण बनाता है।
एक वक्त था जब बांग्लादेश निर्माण के समय वहां से भारत आए शरणार्थियों में से दसियों हजार छत्तीसगढ़ में बसाए गए थे और अब उनमें से हर कोई सौ फीसदी छत्तिसगढिय़ा हो चुका है। लेकिन उन दिनों देश भर में सिनेमा टिकटों पर शरणर्थी टैक्स लगता था और लोगों ने चाहे-अनचाहे विदेशी शरणार्थियों की बसाहट का बोझ उठााया था। आज बस्तर को लेकर, वहां हिंसा से अनाथ और बेघर हुए लोगों को लेकर शहरी छत्तीसगढ़ में इक्का-दुक्का हाथ ही मदद को आगे बढ़े हैं जो ऊंट के मुंह में जीरे के जितने ही हैं। अब तक ऐसा कोई भी संगठन सामने नहीं आया जो नक्सली हिंसा से किसी भी तरह जूझने के लिए या उससे हुए नुकसान की भरपाई के लिए या सलवा-जुडूम आंदोलन पर विचार-विमर्श के लिए शहरों में कोई गंभीर चर्चा के लिए तैयार हो। दो-चार बैठकें इन बरसों में उन्हीं संगठनों और बुद्घिजीवियों ने की जिन्हें बात-बात पर सरकार और समाज का एक बड़ा शहरी हिस्सा नक्सल समर्थक कहकर कोसता है।
ऐसे माहौल में मीडिया की मानसिकता को वह शहरी तबका भी तय करता है जो अखबारों का ग्राहक हे, विज्ञापनदाता है या शहरी तबके के भीतर तथाकथित 'ओपिनियन मेकरÓ है। पत्रकारों का चूंकि उठना-बैठना इसी तबके के बीच होता है इसलिए आदिवासियों की दिक्कत से रूबरू होने का उसका काम बहुत ही कम पड़ता है। लेकिन इससे एक बड़ी दिक्कत यह हुई है कि जब सलवा-जुडूम नाम के अभियान में आदिवासियों को बेघर करके नक्सलवादियों के सामने झोंक दिया गया तो उसमें शहरी मीडिया को कोई दिक्कत नहीं दिखी। जब उग्रवाद के खिलाफ एक कठोर कानूनी कार्रवाई के नाम पर छत्तीसगढ़ का विशेष जन सुरक्षा कानून बनाया गया तो छत्तीसगढ़ के मीडिया में पल भर को तो यह दहशत हुई कि क्या इसका इसतेमाल मीडिया के कुछ लोगों के खिलाफ होगा? लेकिन मुख्यमंत्री ने जब यह दिलासा दिया कि इसे पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जाएगा तो फिर इस कानून की बची खोट से छत्तीसगढ़ के मीडिया का लेना-देना ही नहीं रहा। अपने ऊपर खतरा नहीं आया तो मीडिया की फिक्र खत्म हो गई।
छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को लेकर मीडिया का रूख शायद किसी लंबे विश्लेषण का सामान नहीं बन पाता लेकिन नक्सलवाद के साथ-साथ सलवा-जुडूम और आदिवासी समाज के विस्थापन का मुद्दा इसकी जटिलता को बहुत गंभीर और दिलचस्प (फिक्र पैदा करने वाला) बनाता है। आदिवासी समाज की भावनाओं, परंपराओं और संस्कारों से काफी हद तक अछूता शहरी मीडिया सलवा-जुडूम के बाद की स्ििाति को भी साधारण नक्सलवाद की स्थिति मानकर ही चल रहा है। मीडिया के इस नजरिये को इस लोकतांत्रिक स्थिति ने भी आसान और संभव बनाया कि राज्य में नक्सलवाद को लेकर और सलवा-जुडूम को लेकर भाजपा और कांगे्रस के विचार एक हैं और ये दोनों इस अपराध में बराबरी के हिस्सेदार हैं। सलवा-जुडूम के चलते सैकड़ों बेकसूर आदिवासी दोनों पक्षों के बीच मारे गए हें। लेकिन चूंकि राज्य की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों से ही राज्य की निन्यानवे फीसदी राजनीतिक ताकत बनती है इसलिए इस राज्य में सलवा-जुडूम का किसी तरह का कोई विरोध बचा नहीं। कांगे्रस के भीतर के इक्का-दुक्का नेता निजी स्तर पर, ओर राजय में लगभग नामौजूद वामपंथी संगठन प्रतीकात्मक रूप से ही सलवा-जुडूम का विरोध करते हैं इसलिए नक्कारखाने की तूती यहां कोई मायने नहीं रखती। लोकतांत्रिक विचारों पर सत्ता और विपक्ष का मिलाजुला यह अघोषित दबाव मीडिया पर भी दिखता है। ऐसे में जो इक्का-दुक्का पत्रकार सलवा-जुडूम के खिलाफ लिखते हैं उनके बारे में सरकार में आसानी से यह कह दिया जाता है कि वे नक्सल समर्थक हैं और ऐसी चर्चाएं रहती हैं कि उनके टेलीफोन के कॉल रिकॉडर््स पुलिस निकलवाती रहती है ओर शायद टेलीफोन टैप भी किए जाते हैं। लेकिन सरकार के बारे में इतना जरूर कहना होगा कि सलवा-जुडूम की अपनी नीति पर अटल रहने के बावजूद सरकार आलोचक-पत्रकारों को अब तक किसी तरह से प्रताडि़त नहीं कर रही है। अगर किसी पत्रकार को अखबारनवीसी से परे किसी बात के लिए परेशान होना पड़ा है तो उसे सीधे-सीधे आलोचना से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

खड्डï की ओर



केन्द्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने एक बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि हिन्दुसतानी मर्दों पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उनकी बीवियों को घर पर कंडोम रखकर पति के साथ उसका इस्तेमाल करना चाहिए। उनका कहना है कि हिन्दुस्तानी पति बाहरी देह संबंधों से लाई गई बीमारियां अपनी बीवी को दे सकते हैं।
यह बात काफी हद तक सही है। बहस के लिए कोई कह सकता है कि बाकी देशों में भी मर्द इतने ही बदचलन होते होंगे, या हो सकता है कि इससे भी अधिक। ऐसे में सिर्फ हिन्दुस्तानी मर्द को गाली देना ठीक नहीं। लेकिन ऐसी फिजूल की बारीकी को छोड़ दें तो रेणुका चौधरी की बात सोलह आने सही है। भारतीय परिस्थितियों में अधिक खतरा पत्नी को पति से रहता है। ऐसे मामले कम ही होते हैं जिनमें पति का चाल-चलन ठीक हो और पत्नी गड़बड़ हो।
दरअसल विवाह नाम की संस्था मानवीय स्वभाव के साथ बहुत दूर तक वफादारी से चल नहीं पाती। जब दो लोगों की शादी होती है, तब की उन दोनों के बीच की परिस्थितियां बाकी तमाम जिंदगी कायम नहीं रहतीं। दोनों के बीच आपस में संबंधों के उतार-चढ़ाव के दौर आते हैं, एक दूसरे के लिए मोहब्बत, कभी रही हो तो, नफरत में बदल जाती है और जिंदगी में कभी-कभी वक्त का सैलाब वैसे नाजुक वक्त पर किसी ऐसे व्यक्ति को करीब लाकर छोड़ देता है जो सीप से निकला बेमिसाल मोती लगता है।
ऐसे नाजुक वक्त पर वफादारी बह जाती है। ऐसे मौके मर्द की जिंदगी में अधिक आते हैं क्योंकि काम के सिलसिले में उसी का बाहर निकलना अधिक होता है, उसी के लिए बाजार में भी बदन अधिक आसानी से मिलता है। भारतीय परिस्थितियों में महिला के सामने ऐसे नाजुक मौके भी कम रहते हैं और काम के सिलसिले में उसकी बाहरी आवाजाही भी मर्दों के मुकाबिले शायद एक फीसदी भी नहीं होती। नतीजा यह होता है कि जब सौ मर्द बाहर मुंह मारकर घर लौटते होंगे, तो उनमें से किसी एक को ही ऐसी महिला मिलती होगी जो बेवफा हुई हो। भारत में शहरीकरण और औद्योगीकरण की वजह से महिलाओं को बाहर निकलने के और बेवफा होने के मौके पहले से अधिक मिलते होंगे लेकिन मुझे नहीं लगता कि खरी बेवफाई का औरत-मर्द का अनुपात एक-सौ से अलग होगा। एक बेवफा मर्द दिखना तो असान बात है और वह पेशेवर महिलाओं का बदन खरीदकर भी घर लौट सकता है। भारतीय महिला यह खरीददारी आसानी से नहीं कर सकती और किसी से विवाहेतर प्रेम संबंध के बाद ही अमूमन वह बेवफा होती है।
इससे हिंदुस्तानी मर्द को बीवी की बेवफाई से तोहफे में बीमारी मिलने की गुंजाइश कम रहती है, औरत को अपने मर्द से खतरा अधिक रहता है। कई बरस हुए, मैंने अपने एक कॉलम में लिखा था कि दौरे पर निकलने वाले औरत-मर्द दोनों को अपने सामान में कंडोम के पैकेट रखना चाहिए क्योंकि वक्त और मौके का सैलाब पता नहीं कब किसकी नीयत खराब कर दे, कब कोई पिघल जाए, कब कोई बह जाए, कब कोई फिसल जाए या कोई ऐसा मिल जाए कि लगे कि सारी सावधानी को लात मार कुछ वक्त जिंदगी जी ली जाए। अपने आपको जो लोग लंगोट का पक्का मानकर बेफिक्र रखने की कोशिश करते हैं उनके मोम की तरह पिघल जाने वाले विश्वामित्र की कहानी को भी याद रखना चाहिए।
लोग जिस झांसे में रहते हैं या अपने जीवनसाथी को रखते हैं उसके बजाय रेणुका चौधरी की बात अधिक मानवीय है, अधिक खरी है। अपनी वफादारी के लोगों के दावे या दंभ खरे होते हैं, सावधानी बरतने की नीयत खरी होता है। बटुए या सामान में कंडोम लेकर चलना वैसी ही सावधानी है जैसी कि लोग घर के भीतर भी अलमारियों में ताले लगाकर बरतते हैं। घर के लोगों को एक-दूसरे पर भरोसा होता है लेकिन फिर भी हर कोई अपने-अपने सामान की संभल करने के लिए ताला लगाता है। ये ताला घर के बाकी लोगों को चोर साबित नहीं करता। इसी तरह कंडोम लेकर चलना यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति बाहर बदचलनी के लिए जा रहा है। अपने आप पर अति आत्मविश्वास रखने से बेहतर है सावधानी बरतना।
योरप के एक देश में मेरी एक दोस्त है जो जब कहीं बाहर जाती है, उसकी एक दोस्त उसे कंडोम का एक पैकेट भेंट करती है। इस साधारण सी सावधानी को भारत में ऐसी सनसनी का सामान बना लिया गया है कि बस। भारत की जेलों में सेक्स संबंध या सेक्स अपराध आम बात है, लेकिन जब कभी जेलों में कंडोम रखने की बात होती है, देश भड़क उठता है, सरकार मुंह चुराने लगती है। सबको यह अनदेखा करना सहुलियत की बात लगती है कि देश में सेक्स नामौजूद है। न स्कूल-कॉलेज में सेक्स शिक्षा हो, न सार्वजनिक रूप से कंडोम को बढ़ावा मिले, न भारतीय समाज यह मंजूर करे कि उसमें भी बेवफाई है। ढकोसलों की छत तले, पाखंड की फर्श पर सोता भारतीय समाज अपने को सुरक्षित समझता है, परले दर्जे का मूर्ख ही ऐसी खुशफहमी में रह सकता है।
रेणुका चौधरी की कही बात पर दबी-कुचली भारतीय महिला पता नहीं कितना अमल कर पाती है लेकिन यह चर्चा के लायक मुद्दा है और इससे बचकर अगर कोई निकलना चाहेगा, तो वह रास्ता सीधा खड्डï की ओर जाएगा।
-सुनील कुमार

बात जूतों और दर्द की...



कांगे्रस के एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह छत्तीसगढ़ आए तो विद्याचरण शुक्ल के बारे में कुछ सस्ती बात बोल गए। बड़ा नेता छोटी बात कहने से बचता है लेकिन कुछ महीने पहले भी दिग्विजय विद्याचरण के कांगे्रस प्रवेश को लेकर ऐसा कुछ कह गए थे और अभी फिर उन्होंने कहा कि विद्याचरण शुक्ल का कांग्रेस प्रवेश कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि लोग शेर की तरह सीना ताने कांगे्रस से बाहर जाते हैं और मेमने की तरह मिमियाते हुए पार्टी में वापिस आते हैं।
बात सच है लेकिन गैर जरूरी है। विद्याचरण शुक्ल को एक से अधिक बार लोगों ने कांगे्रस वापिसी के लिए बरसों कोशिश करते देखा है, और अब भी देख रहे हैं। दूसरी तरफ लोगों को यह भी याद है कि उनके बड़े भाई श्यामाचरण शुक्ल को इंदिरा गांधी का विरोध करने के बाद किस तरह बारह बरस का वनवास काटना पड़ा था। दिग्विजय सिंह का बयान लोगों को गैरजरूरी लगा क्योंकि हवा में यह सुगबुगाहट है कि विद्याचरण शुक्ल को आखिरकार कांगे्रस में दाखिला मिलने जा रहा है। लेकिन अगले दिन विद्याचरण के कुछ साथियों ने जो बयान जारी किया उससे लोगों के मन से दिग्विजय के लिए शिकायत जाती रही। उन्होंने कहा कि ये दिग्विजय का दर्द बोल रहा है जो उन्हें विद्याचरण के फॉर्म हाऊस में जूते पडऩे से हुआ था।
विद्याचरण शुक्ल के साथियों का यह बयान, और उसके बाद उसका कोई खंडन न आना बताता है कि वीसी के फार्महाऊस पर दिग्विजय को पीटने की जिम्मेदारी ये लोग ले रहे हैं। जनता को तो उस अभूतपूर्व राजनीतिक हिंसा के खुलासे पर पिछले सात बरस से भरोसा था ही। जिस रात छत्तीसगढ़ राज्य जनम ले रहा था, उसी शाम या रात को कांगे्रसी-मुख्यमंत्री बनने के लिए साम, दाम, दंड, भेद से लैस होकर आखिरी खंदक की लड़ाई लड़ रहे विद्याचरण शुक्ल के घर पर दिग्विजय सिंह को पीटा गया था। किसी भी राज्य में, मुख्यमंत्री को उसी की पार्टी के नेता के घर पर पीटा जाए, ऐसा शायद यह देश का अकेला मामला था। लोगों का यह मानना था कि उस पिटाई के पीछे विद्याचरण शुक्ल या उनके दिग्गज साथियों की सहमति थी, लेकिन राज्य निर्माण और शपथग्रहण के बीच दिग्विजय ने जूते-चप्पलों के दाग वाले कपड़े बदलकर, दर्द को सीने में दफन कर लिया था, जो अब निकल रहा है।
लेकिन विद्याचरण शुक्ल के खेमे से निकला यह ताजा बयान हक्का-बक्का करने वाला है। दिग्विजय को जूतों से पीटने की बहादूरी का आज ऐसे नाजुक मौके पर दावा किया जा रहा है जब विद्याचरण अपनी राजनीतिक जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में विद्याचरण के कांगे्रस प्रवेश से क्या होगा अगर यह अटकल लगाने वाले लोग इस बयान को वीसी कैम्प के लिए आला दर्जे का आत्मघाती बयान मानेंगे। वीसी के प्रवेश को रोकने के लिए जो कांगे्रस नेता ठेका-मजदूरों की तरह ओवर टाईम कर रहे हैं, उनके लिए तो ये बयान देने वाले वीसी समर्थक देवदूत बनकर उतरे और हाथों में हथियार थमाकर चले गए। मैंने कुछ दिन शहर से बाहर रहने के बाद लौटने पर जब दिग्विजय के शेर-मेमने देखे तो काफी हैरानी हुई, लेकिन जब उसके जवाब में शेरों द्वारा आदमखोर होने का जो प्रमाण पत्र देखा तो लगा कि हैरान होने से अधिक और अब क्या होऊं? स्तब्ध!
लेकिन कांगे्रस, और दीगर राजनीतिक दलों का हाल देखें तो सभी में दिल्ली से राज्यों में जाकर संगठन की नेतागिरी करने वाले अधिकांश लोग ऐसे हैं जो अपने इलाके में सब कुछ खो चुके हैं। जिनकी राजनीति अपने घर में कब्र में पहुंच चुकी है या जो अपनी पूरी पार्टी को अपने राज्य में गहरी कब्र में पहुंचा चुके हैं वे अब दूसरे राज्यों में संगठन के बाप बने घूमते हैं। अपने राज्य में कब्बर (कब्र), दूसरे राज्य में बब्बर!
दिग्विजय सिंह के शासनकाल से आजाद होने के बाद छत्तीसगढ़ ने जिस रफ्तार से तरक्की की है, उससे जाहिर है कि शुक्ल-बंधु, मोतीलाल वोरा और दिग्विजय के राज में गरीब के इस धान-कटोरे को उसी तरह लूटा गया था जिस तरह कोई किसी कमजोर-गरीब को लूटकर ले जाता है। यह याद रखने वाली बात है कि भोपाल से अविभाजित मध्यप्रदेश पर राज करने वाले शुक्ल बंधु और वोरा भी रहे और गैर छत्तिसगढिय़ा भी। और लोग इतिहास को याद करें कि चाहे दिग्विजय सिंह को जूते मारे गए हों या अर्जुनसिंह पर हमला किया गया हो, यह सब अपने राजनीतिक अहंकार के लिए किया गया, इस गरीब राज्य के लिए नहीं।
भोपाल पर जब छत्तीसगढ़ के माटीपुत्रों ने राज किया, तब भी इतना सा सर्वे भी नहीं कराया गया था कि इस चवन्नी इलाके को दुअन्नी का हक भी मिल रहा है या नहीं। क्या यहां के इन तीनों राजाओं ने कभी यह सोचा होगा पिछले सात बरस में, कि कैसे यह राज्य पांच बजट में ही तीन गुना बड़े बजट तक पहुंच गया और भोपाल में इनका राज रहते सिवाय इनके और इनके चापलूसों के निजी फायदे के इस राज्य का क्या भला हुआ? क्या कभी इनकी आत्मा पर यह बोझ रहेगा कि मध्यप्रदेश बनने से लेकर छत्तीसगढ़ बनने तक के दशकों में यह राज्य गरीब का गरीब रहा, इन राजाओं के कुनबे और खेमे लखपति से अरबपति हो गए!
दिग्विजय को जूतों की मार का दर्द है या नहीं यह तो पता नहीं लेकिन इस राज्य के नाम पर नेतागिरी करके दिग्विजय को पीटने और छत्तीसगढ़ के हितों को बेचने वालों की छाती पर कोई बोझ मुझे नहीं दिखता।
क्या जनता को यह पूरा राजनीतिक इतिहास कोई माटीपुत्र याद दिलाएगा? या फिर जिंदाबाद-मुर्दाबाद के शोर में जनता नासमझ बनी रहेगी, आगे और लुटने के लिए तैयार...!
-सुनील कुमार