कुछ दिन पहले रूस की एक खबर आई थी जिसका प्रिंट निकालकर मैंने रखा था कि इस मुद्दे पर कुछ लिखूंगा। लेकिन फिर वह कागज समंदर में कहीं दब गया जो आज मिला। रूस के एक शहर के मेयर ने अपनी म्युनिसिपल के कर्मचारियों पर पचीस बातें कहने पर रोक लगाई है। इसकी एक फेहरिस्त जारी हुई हे कि उनके पास आने वाले लोगों से ये वाक्य कभी नहीं कहे जाएं।
इनमें मुझे नहीं पता, नहीं कर सकता, मैं क्या कर सकता हूँ, ये मेरा काम नहीं है, ये असंभव है, मैं लंच ले रहा हूँ, इसके लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं, मैं बीमार था, मैं छुट्टïी पर था, जैसे वाक्य शामिल हैं।
एलेक्जेंडर कजमिन नामक मेयर पेशे से व्यापारी है और मेयर चुन कर आया है। उसका मानना है कि स्थानीय शासन लोगों को बेबस, असहाय, कमजोर लगे यह ठीक नहीं है। जनता के आत्मविश्वास के लिए यह अंदाज खतरनाक है।
कुछ हफ्ते पहले मेयर ने यह आदेश जारी करने के साथ ही यह फेहरिस्त दीवार पर चस्पा भी कर दी है। जनता को भी यह बताया गया है कि म्युनिसिपल कर्मचारी उनसे केसा व्यवहार नहीं कर सकते, कौन सी बातें नहीं कह सकते। कर्मचारियों को भी कह दिया गया है कि उनका रूख नहीं सुधारा तो उनकी रवानगी करीब होगी।
मेयर का कहना है कि म्युनिसिपल लोगों की जिंदगी को आरामदेह बनाने के लिए है, इसने अधिकारियों को शहर की दिक्कतें सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए न कि उन्हें अनदेखा करने की।
हिन्दुस्तान में बैठकर, खासकर जिस इलाके में मैं रहता हूँ वहां टीवी पर आने वाला एक सीरियल अधिक सही लगता है जिसमें एक सीधा और शरीफ इंसान सरकारी दफ्तर के भ्रष्टïाचार, लालपीताशाही, बाबूराज के बीच धक्के खाते रहता है। इस सीरियल में तो अब तक श्याम बेनेगल की फिल्म की तरह का आक्रोश नहीं है, लेकिन असल जिंदगी में लोगों के मन सरकार के नाम से नफरत और हिकारत से भरे हुए हैं। इस देश में जो सबसे घटिया क्वालिटी के सामान होते हैं वे सरकारी खरीद के सामान कहे जाते हैं। दूकानदार पहचान का, या भला, हो तो वह ग्राहक के कुछ सामान लेने से रोक देता है कि वे सिर्फ गवर्नमेंट सप्लाई के लिए बने हैं।
सरकारी दफ्तरों और अमले का बर्ताव और रूख देखते ही बनता है और एक बड़ा नुकसान यह है कि इनसे अधिक वास्ता पडऩे वाले निजी संस्थानों में भी लोगों का बर्ताव बिगड़ते चलता है, उन्हें लगता है कि दफ्तरों में कुर्सी पाने वालों के काम करने का यही तरीका रहता है। मैं अपने खुद के दफ्तर में इश्तहार देने आए लोगों को सामने खड़ा रखकर कुर्सी तोड़ते अपने लोगों को देखकर स्तब्ध रह गया। यह हाल मुझे बहुत से निजी व्यापारी संस्थानों में दिखता है जहां नौकरी सरकारी नौकरी की तरह स्थायी नहीं होती।
देश में काम करने के तौर-तरीके तबाह हो गए हैं। जब तक किसी ताकतवर बंदूक की नोंक न टिकी हो, या सामने कोई गाजर न लटका हुआ हो, सरकारी घोड़ा दौड़ता ही नहीं। जहां उसे कोई निजी फायदा दिखे, वहीं वह उत्साह दिखता है और कमाई मोटी हो, सरकार को चूना लगाने के लिए ब्रश और सीढी का जुगाड़ भी करके देता है और दफ्तर आने वाले से पूछता है कि सीढी पकडूं क्या?
सरकारी कामकाज में जालसाजी और धोखाधड़ी कभी भी बाहरी लोग नहीं करते, कर सकते भी नहीं। यह पूरी साजिश हमेशा इन दफ्तरों के भीतर तैयार होती है। इन साजिशों में कमाई इतनी रहती है और खतरा इतना कम रहता है कि सरकारी अमला इसमें मगन रहता है या इस ताक में रहता है।
ऐसा भी नहीं कि रूस में भ्रष्टïाचार कम होगा या सरकारी अमले का तौर-तरीका हिंदुस्तान से बेहतर होगा, लेकिन मैं यहां चर्चा सिर्फ एक पहल की कर रहा हूँ। जो सरकार में स्थायी रूप से नहीं है, कुछ बरसों के लिए जिसे यह मौका मिला है उसी से तो उम्मीद की जा सकती है कि वह लीक से हटकर कुछ करने की सोचेगा। ऐसे मेयर से जब मैं अपने प्रदेश के मेयरों की तुलना करता हूँ तो लगता है कि वे नियमित अफसरों से बड़े अफसरों से हो गए हैं, काम न करने का उनका रूख सरकारी बाबुओं सा हो गया है और कमाई की साजिश में वे सजा के खतरों की तरफ से भी बेफिक्र हूँ। ऐसा ही हाल दीगर स्थगन या संस्थाओं में चुनकर आने वाले लोगों का है।
कल छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल मंत्री दिन भर बैठक लेते रहे लेकिन वे भी बड़े खर्च वाली योजनाओं से परे ऐसी महीन बातों पर नहीं गए कि कर्मचारियों का बर्ताव कैसा हो, म्युनिसिपलें बिना खर्च क्या-क्या कर सकती हैं। यूं तो यह चुनाव के ठीक पहले का साल है जब बहुत तरह के प्रयोग या फेर बदल नहीं हो सकते, लेकिन इसके पहले के बरसों में ही क्या हो गया? दूसरे मंत्रियों ने ही क्या कर दिया? या दूसरे राज्यों ने ही क्या कर दिखाया?
मैं उम्मीद करता हूँ कि देश के कम से कम कुछ दूसरे राज्यों में तो काम की संस्कृति छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश से बेहतर होगी। गुजरात की तारीफ सुनने मिलती है कि वहां कोई अफसर-कर्मचारी कोई उम्मीद करती भी है तो काम हो जाने के बाद। हालांकि उसी गुजरात में बड़े-बड़े पुलिस दफ्तर सुपारी हत्यारों की तरह जेल में हैं।
लेकिन अगर वहां कुछ बेहतर नहीं हो तो भी हम अपने-आपमें अच्छे क्यों नहीं हो सकते?