केन्द्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने एक बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि हिन्दुसतानी मर्दों पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उनकी बीवियों को घर पर कंडोम रखकर पति के साथ उसका इस्तेमाल करना चाहिए। उनका कहना है कि हिन्दुस्तानी पति बाहरी देह संबंधों से लाई गई बीमारियां अपनी बीवी को दे सकते हैं।
यह बात काफी हद तक सही है। बहस के लिए कोई कह सकता है कि बाकी देशों में भी मर्द इतने ही बदचलन होते होंगे, या हो सकता है कि इससे भी अधिक। ऐसे में सिर्फ हिन्दुस्तानी मर्द को गाली देना ठीक नहीं। लेकिन ऐसी फिजूल की बारीकी को छोड़ दें तो रेणुका चौधरी की बात सोलह आने सही है। भारतीय परिस्थितियों में अधिक खतरा पत्नी को पति से रहता है। ऐसे मामले कम ही होते हैं जिनमें पति का चाल-चलन ठीक हो और पत्नी गड़बड़ हो।
दरअसल विवाह नाम की संस्था मानवीय स्वभाव के साथ बहुत दूर तक वफादारी से चल नहीं पाती। जब दो लोगों की शादी होती है, तब की उन दोनों के बीच की परिस्थितियां बाकी तमाम जिंदगी कायम नहीं रहतीं। दोनों के बीच आपस में संबंधों के उतार-चढ़ाव के दौर आते हैं, एक दूसरे के लिए मोहब्बत, कभी रही हो तो, नफरत में बदल जाती है और जिंदगी में कभी-कभी वक्त का सैलाब वैसे नाजुक वक्त पर किसी ऐसे व्यक्ति को करीब लाकर छोड़ देता है जो सीप से निकला बेमिसाल मोती लगता है।
ऐसे नाजुक वक्त पर वफादारी बह जाती है। ऐसे मौके मर्द की जिंदगी में अधिक आते हैं क्योंकि काम के सिलसिले में उसी का बाहर निकलना अधिक होता है, उसी के लिए बाजार में भी बदन अधिक आसानी से मिलता है। भारतीय परिस्थितियों में महिला के सामने ऐसे नाजुक मौके भी कम रहते हैं और काम के सिलसिले में उसकी बाहरी आवाजाही भी मर्दों के मुकाबिले शायद एक फीसदी भी नहीं होती। नतीजा यह होता है कि जब सौ मर्द बाहर मुंह मारकर घर लौटते होंगे, तो उनमें से किसी एक को ही ऐसी महिला मिलती होगी जो बेवफा हुई हो। भारत में शहरीकरण और औद्योगीकरण की वजह से महिलाओं को बाहर निकलने के और बेवफा होने के मौके पहले से अधिक मिलते होंगे लेकिन मुझे नहीं लगता कि खरी बेवफाई का औरत-मर्द का अनुपात एक-सौ से अलग होगा। एक बेवफा मर्द दिखना तो असान बात है और वह पेशेवर महिलाओं का बदन खरीदकर भी घर लौट सकता है। भारतीय महिला यह खरीददारी आसानी से नहीं कर सकती और किसी से विवाहेतर प्रेम संबंध के बाद ही अमूमन वह बेवफा होती है।
इससे हिंदुस्तानी मर्द को बीवी की बेवफाई से तोहफे में बीमारी मिलने की गुंजाइश कम रहती है, औरत को अपने मर्द से खतरा अधिक रहता है। कई बरस हुए, मैंने अपने एक कॉलम में लिखा था कि दौरे पर निकलने वाले औरत-मर्द दोनों को अपने सामान में कंडोम के पैकेट रखना चाहिए क्योंकि वक्त और मौके का सैलाब पता नहीं कब किसकी नीयत खराब कर दे, कब कोई पिघल जाए, कब कोई बह जाए, कब कोई फिसल जाए या कोई ऐसा मिल जाए कि लगे कि सारी सावधानी को लात मार कुछ वक्त जिंदगी जी ली जाए। अपने आपको जो लोग लंगोट का पक्का मानकर बेफिक्र रखने की कोशिश करते हैं उनके मोम की तरह पिघल जाने वाले विश्वामित्र की कहानी को भी याद रखना चाहिए।
लोग जिस झांसे में रहते हैं या अपने जीवनसाथी को रखते हैं उसके बजाय रेणुका चौधरी की बात अधिक मानवीय है, अधिक खरी है। अपनी वफादारी के लोगों के दावे या दंभ खरे होते हैं, सावधानी बरतने की नीयत खरी होता है। बटुए या सामान में कंडोम लेकर चलना वैसी ही सावधानी है जैसी कि लोग घर के भीतर भी अलमारियों में ताले लगाकर बरतते हैं। घर के लोगों को एक-दूसरे पर भरोसा होता है लेकिन फिर भी हर कोई अपने-अपने सामान की संभल करने के लिए ताला लगाता है। ये ताला घर के बाकी लोगों को चोर साबित नहीं करता। इसी तरह कंडोम लेकर चलना यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति बाहर बदचलनी के लिए जा रहा है। अपने आप पर अति आत्मविश्वास रखने से बेहतर है सावधानी बरतना।
योरप के एक देश में मेरी एक दोस्त है जो जब कहीं बाहर जाती है, उसकी एक दोस्त उसे कंडोम का एक पैकेट भेंट करती है। इस साधारण सी सावधानी को भारत में ऐसी सनसनी का सामान बना लिया गया है कि बस। भारत की जेलों में सेक्स संबंध या सेक्स अपराध आम बात है, लेकिन जब कभी जेलों में कंडोम रखने की बात होती है, देश भड़क उठता है, सरकार मुंह चुराने लगती है। सबको यह अनदेखा करना सहुलियत की बात लगती है कि देश में सेक्स नामौजूद है। न स्कूल-कॉलेज में सेक्स शिक्षा हो, न सार्वजनिक रूप से कंडोम को बढ़ावा मिले, न भारतीय समाज यह मंजूर करे कि उसमें भी बेवफाई है। ढकोसलों की छत तले, पाखंड की फर्श पर सोता भारतीय समाज अपने को सुरक्षित समझता है, परले दर्जे का मूर्ख ही ऐसी खुशफहमी में रह सकता है।
रेणुका चौधरी की कही बात पर दबी-कुचली भारतीय महिला पता नहीं कितना अमल कर पाती है लेकिन यह चर्चा के लायक मुद्दा है और इससे बचकर अगर कोई निकलना चाहेगा, तो वह रास्ता सीधा खड्डï की ओर जाएगा।
-सुनील कुमार
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