छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़



एक बरस बाद के चुनाव को लेकर छत्तीसगढ़ गर्म होने लगता है। पहले भारतीय जनता पार्टी ने घमासान बैठकें करके अपना घर सुधारने की मशक्कत की, और अब कांगे्रस बांस-बल्लियां लाकर अपनी छत सुधार रही है। एक-एक का रमन सरकार की तरफ से कम से कम एक अफसर, बिजली को मुखिया या तो उनके कहे या बिना कहे, सबको काटने दौड़ता है और कांगे्रस, और भाजपा के भी, बड़े-नेताओं को पिछले बरसों में मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलने का सबसे बड़ा मौका दिया हे। आरएसएस के एक बड़े नेता ने मुख्यमंत्री के इस मनोनीत, बाहरी, गैर छत्तिसगढिय़ा अफसर के लिए अफसोस के साथ कहा- जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसके दुश्मन की क्या दरकार? अपने लिए इस सबसे बड़े राजनीतिक, नुकसान को मुख्यमंत्री अपनी पसंद से झेलते हैं या फिर बिहार-झारखंड के एक नेता की वजह से जो कि राजनाथ सिंह के करीबी हैं और सीएसईबी चेयरमैन राजीव रंजन के भी, यह तो मुख्यमंत्री ही जानें। लेकिन मुख्यमंत्री के नंबर एक के प्रतिद्वंन्द्वी, भाजपा के सबसे वरिष्ठï छत्तीसगढ़ी सांसद रमेश बैस के सरकार पर हमला करने के आधे से ज्यादा मौके यही एक अफसर देता है।
लेकिन छत्तीसगढ़ के अगले विधानसभा चुनाव की बात यहीं पर खत्म नहीं होती और बात सिर्फ सरकार या भाजपा तक सीमित भी नहीं रह सकती। अतिमहत्वाकांक्षी, अतिआत्मविश्वासी, अतिआत्म मुग्ध और अतिआत्मकेन्द्रित कांगे्रस पार्टी इस राज्य में पूरी तरह से बोगस पार्टी साबित हुई है। इसका सारा ईंधन इसके नेताओं के बुलडोजरों में खप जाता है एक-दूसरे को ठहरते हुए। सड़क किनारे राज्य की जनता खड़ी रह जाती है यह राह देखते हुए कि शायद कोई कांगे्रसी अपनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में उसे भी राशन दूकान, अस्पताल या दाल-भात केन्द्र तक छोड़ देगा, लेकिन काले बंद शीशें वाली कांगे्रस पार्टी के नेता भीतर एसी बाहर सायरन चलाते हुए लगभग सत्ता सुख में मदहोश हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में अगले विधानसभा चुनाव के नतीजे जो भी हों, उनको सोचकर आज भाजपा के कई नेता महमूद गजनवी की लौटती सेना की तरह लूट-पाट कर रहे हों या कांगे्रसियों की तरह बयान ले रहे हों, जनता का अधिक भला नहीं दिखता। कांगे्रस तो जोगी राज में अपने को परले दर्जे की भ्रष्टï और घटिया दर्जे की अपराधी साबित कर ही चुकी है, रमन सरकार के कांटे की टक्कर के भ्रष्टïाचार के बाद अगर कांगे्रस सत्ता में लौटती है तो वह कांगे्रस की और अधिक कातिल बददिमागी के लिए काफी होगा, और अगर वह नहीं लौटती है तो वह भाजपा के डामरखोरों, धान चोरों के लिए मरीजों का खून, राजा हरिश्चन्द्र के दस्तखत वाला चरित्र प्रमाणपत्र होगा।
कांगे्रस और भाजपा का राजनीतिक संगम जब गंदे नाले के पानी की तरह बह रहा है तो इसे साफ कौन करे? किनारे पर बैठी राजनीतिक पार्टियां अपनी बेअसर ताकत की वजह से हाशिये पर तो हैं, लेकिन वहां बैठकर वे एक पत्थर भी उछालते नहीं दिखतीं।
राष्टï्रवादी कांगे्रस पार्टी के अकेले नेता, अकेले विधायक का मुंह भी डामर से चिपककर बंद हो चुका लगता है। विधानसभा में वे धूमकेतु की तरह किसी मुद्दे को उठाते हैं और फिर वह मुद्दा धूमकेतु की तरह की जरा सी जिंदगी जीकर खत्म हो जाता है।
बहुजन समाज पार्टी अपने मायने इस राज्य में खो चुकी दिखती है क्योंकि उसकी दलित जमीन पर अजीत जोगी ने पता नहीं कैसे पट्टïा पाकर अपनी एक इमारत खड़ी कर रखी है। यह इमारत पता नहीं असली है या फिल्मी सेट की तरह बोर्ड की लेकिन कांगे्रस का कोई विधायक इसे खट खटाकर देखने की जुर्रत नहीं करता। हर विधायक डरा-सहमा रहता है कि जोगी के खफा होते ही उसके विधानसभा क्षेत्र में दलित मतदाता उसे उखाड़ न फेंके। ये इमारत ईंट की हो या प्लाई बोर्ड की, ये राज्य की राजनीति में दलित जमीन पर तनी अकेली इमारत है और मायावती की बसपा अपनी जमीन से बेदखल सी लगने लगी है।
छत्तीसगढ़ में वापमंथी दलों के बारे में पिछले सांठ बरसों में लिखने के महज एक बात है कि बंगाल, केरल और त्रिपुरा से परे वामपंथियों को कोई टापू शायद चाहिए ही नहीं, इसीलिए आज इस राज्य में एक भी वामपंथी विधायक नहीं है, और तो और, माक्र्सवादी संजय पराते को छोड़कर कोई वामपंथी बयानबाज भी नहीं है। यह देखकर हैरानी होती है कि जब सरकारी अस्पतालों में मरीजों को नकली पाईप लगाकर उसका खून पीते नेता-अफसर बैठे रहते हैं, तब भी वामपंथी बहसबाजों को एक बयान टाईप करवाने की फुरसत नहीं रहती।
यह चुप्पी सार्वजनिक जीवन के हिसाब से अमानवीय और लोकतांत्रिक भ्रष्टïाचार भी है। ऐसे वामपंथ के छत्तीसगढ़ में पैर जमाने के पहले रायपुर की इमारतों की छतों पर बर्फ जमने लगेगी।
और किस पार्टी की चर्चा करें? अपार संभावनाओं वाले छत्तीसगढ़ मुक्तिमोर्चा ने अपनी राजनीतिक जमीन लगभग खोदी है और उससे जुड़े राजेन्द्र सायल जैसे कुछ नेताओं ने अपने को मानवाधिकार जैसे गैर-चुनावी मुद्दों में कैद कर लिया है। यह एक संगठन वामपंथियों से हजार गुना अधिक असर वाला, खालिस छत्तीसगढ़ी संग्र हो सकता था, लेकिन यह चुनाव से बाहर हो चुका दिखता है।
एक ताजा-ताजा राजनीतिक दल एक बर्खास्त सिपाही के मातहत एक रिटायर्ड आईएएस ने मिलकर बनाया है जो फिलहाल कागजों पर रोपा गया है। इससे एक उम्मीद की जाती है कि मुख्य सचिव तक न पहुंच सके राघवन अपने पास रखे साथियों के भ्रष्टïाचार का भांडा फोड कर सकते हैं। इस गंदगी के बिखरने से राज्य साफ होगा, जिस तरह अखबारी पन्नों पर काली स्याही बिखरने से लोकतंत्र साफ होता है। लेकिन यह फिलहाल तो महज एक उम्मीद है।
वसूली और उगाही पर जिंदा एक आध और संगठन छत्तीसगढ़ की राजनीति में भयादोहन करने जिंदा रह लेते हैं लेकिन वे सिर्फ भ्रष्टïाचार के भागीदार होकर काली कमाई पर एकाधिकार तोडऩे का काम करते हैं, उससे अधिक कुछ नहीं।
छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में यहां पर मीडिया भी एक पार्टी बन गया है और पिछले कुछ चुनावों में सम्पन्न दलों और सम्पन्न नेताओं ने इसे एक चुनावी खर्च मान लिया है। नेताओं और पार्टियों ने भी मीडिया के अच्छे और बुरे तबकों के बीच यही फर्क रखा है कि जो चाकू टिका दे, उसने लिए टेंट ढीली कर दो। इसलिए छत्तीसगढ़ की चुनावी-पत्रकारिता आने वाले बरसों में किसी बाहरी शोधकर्ता के काम करने का सामान बन जाएगी। चुनाव के वक्त मीडिया के कुछ लोगों को मुंह पर गमछा बांधकर चलने की जरूरत पिछले कुछ चुनावों में सामने आ चुकी है, लूटना ही है तो लुटेरा वर्दी में तो रहे। लुटने वाले को भी लगे कि किसी कायदे के लुटेरे से लुटा, आखिर महंगे रेस्तरां में वेटर वर्दी में रहते हैं, चाहे ग्राहक को वर्दी खाना न हो।
छत्तीसगढ़ में भ्रष्टïाचार के छत्तीसगढ़ बन गए हैं और जनता रियासत के दिनों में अधिक लुटनी थी या आज के इन राजे-महाराजों के हाथ अधिक लुट रही है, यह कहना कुछ मुश्किल है। राजनीतिज्ञों के अलावा उद्योगपतियों, ठेकेदारों, अफसरों के अपने-अपने साम्राज्य यहां स्थापित हो गए हैं।  दरअसल इन छत्तीस गढ़ों के बीच बिखरी जमीन ने इस राज्य को इतनी कमाई दी है कि आज की सम्पन्नता से यह अहसास कम हो चला है कि आज भी जनता लुट रही है। लोग फुरसत में कागज-पेन लेकर बैठें और हिसाब लगाएं कि उनकी नजर में कौन से छत्तीस सबसे बड़े लुटेरे हैं। और अपनी-अपनी फेहरिस्त चुनाव तक दीवारों पर लिखते चलें। उस पर लिख दें कि सो जा बेटा, सो जा, नहीं तो इस गिरोह में से कोई आ जाएगा।

-सुनील कुमार

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