कुछ समय पहले तक भारत के बाजार में 'किलरÓ जीन्स आती थी। कपड़ा और सिलाई दोनों ठीक होने से मैंने भी इस मार्के के जीन्स और डेनिम शर्ट लिए। यह शायद दस बरस पहले की बात रही होगी। कायदे की बात तो यह है कि उस वक्त मुझे जो बात सूझनी थी वह कई बरस बाद सूझी। किलर का तो सीधा-सीधा मतलब हत्यारा होता है। जीन्स के पीछे और शर्ट के सीने पर हत्यारा लिखकर घूमने का क्या तुक था? और फिर ऐसे ब्रांड से परहेज क्यों नहीं जो अपराध को महिमा मंडित करता है?
धीरे-धीरे मैंने उन कपड़ों का इस्तेमाल बंद किया लेकिन मुझे लगा था कि बात आई गई हो गई। इन दिनों अपने शहर के बाजार में 'आऊट लॉÓ (अपराधी) और 'लूटÓ जैसे ब्रांड देख रहा हूं तो फिर 'किलरÓ की याद आ रही है। अभी कुछ और भी ऐसे ब्रान्ड बाजार में हैं जो एकाएक याद नहीं पड़ रहे लेकिन वे भी अपराधों से जुड़े नाम हैं। अब जब मैं एक महीन संवेदनशीलता के साथ यह सब देख रहा हूँ तो लगता है कि सरकार ऐसे ब्रांड रोक सकती है, या उसे रोकने चाहिए।
एक सभ्य समाज में लोकतांत्रिक लीचलेपन की भी एक सीमा होनी चाहिए। अपराधों के नाम पर सामानों के नाम रखने का, ऐसे ब्रांड बनाने और बढ़ाने का अंत क्या होगा? क्या आगे चलकर रेप जैसे ब्रांड के कपड़े नहीं आने लगेंगे?
कुछ बरस पहले मैं लंदन गया तो लोगों के बदन पर 'एफसीयूकेÓ ब्रांड के कपड़े देखने पर शुरू में तो लगा कि आंखें धोखा दे रही हैं, लेकिन फिर नामी-गिरामी ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट पर ब्रांड की दूकान ही दिखी। लगा कि अंगे्रजी भाषा में सभ्य समाज में प्रतिबंधित शब्द से इस कदर, इस तरह मिलता-जुलता यह नाम क्यों रखा गया? बाद में किसी जगह पता लगा कि इस कंपनी का पूरा नाम 'फे्रंच कनेक्शन यूकेÓ है और इसी के पहले अक्षरों को लेकर यह मार्का बनाया गया है जो पहली ही नजर में अश्लील लगता है। क्या भारतीय बाजार में यह ब्रांड भी आ जाएगा? और इससे सार्वजनिक सोच पर क्या असर पड़ेगा?
पहले शायद मैं कहीं लिख चुका हूँ कि किस तरह टी शर्ट पर अंगे्रजी और पश्चिमी संस्कृति में उत्तेजक मतलब रखने वाली बातें छपी रहती हैं और उनके मतलब से अनजान, या जानते-बूझते हुए लड़के-लड़कियां वे कपड़े पहनने लगे हैं। जब ऐसे लोग सामने पड़ जाते हैं तो मैं भी बरबस उन शब्दों को पढऩे लग जाता हूँ, क्योंकि वे तो छपे ही सामने, वाले के पढऩे के लिए हैं। कभी समझाने की गुंजाइश दिखती हैं। तो समझा देता हूँ, वरना चुप रह जाता हूँ, यह सोचकर कि कोई यह न कहे कि सारे बाल सफेद हो गए लेकिन नजरें लोगों के कपड़ों को पढ़ती रहती हैं।
एक और बात जिसे मैं पिछले कुछ महीनों या कुछ हफ्तों के दौरान दुहरा रहा हूँ, वह है शहर में लड़कियों और महिलाओं के कपड़ों के बारे में। यूं मैं अधिक उदार लोगों में, दुस्साहसी लोगों में गिना जाता हूँ और इस मुद्दे पर यूं खुलकर लिखना भी कई लोगों को खटक सकता है, लेकिन कोई बात मुझे अधिक खटकी है तो मैं उसकी चर्चा कर लेना जरूरी समझता हूँ, फिर चाहे लोग मुझे खारिज ही कर दें।
पिछले दिनों कुछ ऐसी अधेड़ महिलाएं दुपहियों पर दिखीं जिनके खासे पारदर्शी कपड़ों के भीतर से बिलकुल अलग ढंग के भीतरी कपड़े कौंधते दिख रहे थे। उनकी उम्र देखकर मुझे एकदम से यह तो नहीं लगा कि उन्होंने सोच समझकर ऐसा किया हो, लेकिन फिर कुछ और लोगों से पता लगा कि कॉलेजों में लड़कियां भी इसी तरह जाने लगी हैं। मैं नहीं जानता कि इस उम्र में मेरा ध्यान ऐसी बातों की तरह जा रहा है और जवानों या बाकी लोगों को ये दिखते हैं या नहीं, लेकिन नजर पडऩे पर मेरा तो ध्यान जाता है और मैं सोचता हूँ कि छेडख़ानी, पीछा करने के कुछ मामले ऐसे पारदर्शी, ऊंचे, नीचे, कारणों से भी होते होंगे।
लोगों को अपने दायरे को भी देखना चाहिए। जब खुली जगह पर हों तो फिर बहुतायत लोगों की सोच की भी फिक्र करनी चाहिए। मैं मोटे तौर पर महज लड़कियों और महिलाओं के फैशन की बात इसलिए कर रहा हूँ कि आमतौर पर भारत में छेडख़ानी से लेकर बलात्कार तक की शिकार सिर्फ लड़की या महिला होती है। अपने वक्त और अपने माहौल से बहुत अधिक दूस्साहसी कपड़े पहनकर निकलना परेशानी और खतरे को न्यौता देना भी होता है।
जब मुझे बहुत झीने सलवार कुर्ते में दो दिन पहले ही बड़े खतरनाक अंदाज वाले भीतरी कपड़ों वाली महिला दिखी तो एक पल को मैं यह भी सोचने लगा कि क्या इसने जानबूझ कर ऐसा किया है? हालांकि उस दुपहिये को उसकी बेटी की उम्र की लड़की चला रही थी। कोई और उम्र होती, कोई और मिजाज होता, कोई और दुस्साहस होता तो शायद मैं अपनी राह छोड़ उसने पीछे हो लेता, और मेरा ख्याल है कि कुछ और परेशानियां पीछे लगी भी होंगी।
दूसरी तरफ लड़कियों की नीचे जाती जीन्स और ऊपर चढ़ते टी शर्ट के बीच का फासला भी खतरनाक होते जा रहा है। सड़कों पर ऐसे नजारे के पीछे लगी मोटरसायकिलों पर उत्साही लड़कों से ये लड़कियां बिलकुल अनजान हों ऐसा भी मुझे नहीं लगता।
इस खुलेपन पर दिल्ली और मुम्बई में तो नजर नहीं जाती, लेकिन अपने इस कस्बाई शहर में पहले खुले मॉल में भी लड़के ऐसी लड़कियों को लेकर चुहलबाजी करते दिख जाते हैं। मुझे लगा है कि या तो मेरे उदार होने की रफ्तार कुछ धीमी पड़ गई है या फिर लड़कियों की गाडिय़ों की रफ्तार कुछ अधिक ही बढ़ गईं है। यह भी हो सकता है कि दस-पन्द्रह बरस से फिल्मों से दूर रहने के कारण मैं आज की फैशन से उतना वाकिफ नहीं रह गया हूँ जितना कि मुझे होना चाहिए था।
मैं यह भी सोचता हूँ कि बेटे की जगह या उसके अलावा इस उम्र की मेरी जवान बेटी होती तो उसे मैं उसके कपड़ों के बारे में क्या कहता? यह भी सोचती हूँ कि मैं गर ऐसे किसी स्कूल या कॉलेज का प्रिंसिपल होता तो क्या कहता? शायद मेरा सोचना दो कपड़ों के फासले को नहीं, दो पीढिय़ों के फासले तो बता रहा हो! मेरी सोच, जाहिर है कि एक पीढ़ी पुरानी है, उसमें यह अफसोस भी समाया रहती है कि हमारी पीढ़ी में ऐसी फैशन, ऐसी पार्टियां, ऐसे मोबाइल-मोबाइक नहीं थे और अब अपनी वह उम्र लौटकर कभी आती भी नहीं है। हो सकता हे कि मेरा यह पूरा लिखना उस खूसट और दकियानूसी पाखंड से मरा हुआ हो जो अपना मौका निकल जाने के बाद आए मौकों को कोसता है। लेकिन मेरी पीढ़ी के लोग भी तो आज इस समाज में रहेंगे। नई पीढ़ी के फैशन के साथ पुरानी पीढ़ी के मलाल का मेल क्या खतरे पैदा नहीं करेगा?
खैर मैं मौजूदा फैशन को अधिक कोस भी नहीं रहा, मेरी इस उम्र में सबसे बड़ी फिक्र यह है कि बेख्याल पीछा करते लोग सड़कों पर कहीं मुझसे न टकरा जाएं.... और यह भी कि मेरी गाड़ी किसी से न टकरा जाए।
- सुनील कुमार
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