अविकसित सोच और अफसोस




देशभर से रैगिंग की प्रताडऩा की डरावनी खबरें आ रही हैं। कहीं किसी जूनियर को इमारत से फेंक दिया तो कहीं उसके हाथ-पांव जला दिए गए। कुछ ही वक्त तो हुआ है इंदौर में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली, वह लिख छोड़ गया कि रैगिंग की प्रताडऩा से वह आत्महत्या कर रहा है। हर बरस ऐसी कुछ दर्जन आत्महत्याएं इस देश में होती हैं। कानून ने अपने-आपको खासा कड़ा बना लिया है लेकिन यह बड़ा और कड़ा डंडा खूंटी से टंगा ही रह गया है, इस्तेमाल होते नहीं दिखता।
मैं यह सोचकर दहशत में आ जाता हूँ कि जिनके बच्चों का बहुत कड़े मुकाबिले के बाद जाकर किसी कॉलेज में दाखिला होता होगा, वहां हॉस्टल में प्रताडऩा झेलते बच्चे के मां-बाप दूर अपने घर में कैसी नींद सोते होंगे। एक बाप की हैसियत से मैं सोचता हूँ तो लगता है कि जिस कॉलेज या हॉस्टल में प्रताडऩा होती हो वहां के प्रिंसिपल, वार्डन के खिलाफ अदालत में जाना चाहिए। लेकिन जब कॉलेजों की हकीकत तो देखें तो दिखता है कि क्लासरूम में पढ़ाते जिन लोगों को सबसे अधिक बरस हो गए हैं, वे प्रिंसिपल बन जाते हैं, जो हॉस्टल के करीब रहते हैं वे वार्डन बन जाते हैं। उनका मैनेजमेंट, प्रशासन, मानवीय संबंधों का अनुभव शून्य रहता है। एक इंसान के रूप में सामान्य समझ-बूझ से वे जो सीखते हैं, वही उनके काम आता है लेकिन अब तो प्रबंधन और प्रशासन एक अलग ही काबिलीयत की बात हो चुकी है, इसके लिए छोटे-बड़े कई कोर्स पूरी दुनिया में चलते हैं
हॉस्टल और कॉलेज को छोड़ें तो अस्पतालों का यही हाल है। जो सबसे सीनियर डॉक्टर होता हे वह अस्पताल सुपरिंटेंडेंट बन जाता है, फिर चाहे उसे दवा खरीदी से लेकर ड्यूटी लगाने तक किसी भी काम के लिए प्रशिक्षण न मिला हो।
भारत के सरकारी संस्थानों के कामकाज में यह एक बहुत बड़ी खामी मुझे दिखती है जो निजी संस्थानों तक उतर आई है। मेरे परिचित बहुत से ऐसे डॉक्टर हैं जो अपने निजी नर्सिंग होम के मालक-चालक हैं। वे डॉक्टर भी हैं और मैनेजर भी। सर्जरी करके निकलते हैं और किसी को कमीशन भेजने का लिफाफा बनाते हैं तो कभी कर्मचारियों की ड्यूटी लगाने की मशक्कत करते हैं। ऐसे सौ किस्म के गैर-डॉक्टरी काम करते हुए भी वे अपनी टकसाल को चलाने के लिए एक मैनेजर भी नहीं रखना चाहते। अस्पताल-प्रबंधन एक बड़ी खास काबिलीयत का काम बन चुका है लेकिन इसका चलन नहीं बढ़ा।
मुझे लगता है कि स्कूल के हेडमास्टर से लेकर विश्वविद्यालय के कुलपति तक और हॉस्टल के वार्डन से लेकर अस्पताल अधीक्षक तक, हर किसी के लिए कुछ महीनों से लेकर बरस भर तक के प्रशिक्षण को जरूरी कर देना चाहिए। जैसे-जैसे लोग ऐसे प्रशासनिक-प्रबंधकीय पाठ के करीब पहुंचते हैं उनको ऐसे कोर्स में शामिल होने का मौका मिलना चाहिए, खासकर संभावित प्रमोशन के पहले तीन बरसों में। जो लोग ऐसे कोर्स न कर लें, उन्हें गैर शिक्षकीय, गैर चिकित्सकीय प्रबंधन-प्रशासन के लायक नहीं मानना चाहिए।
मुझे देश के पढ़ाई, इलाज और ऐसे कई दूसरे जरूरी कामों वाले सरकारी या निजी संस्थानों में यह एक बड़ी खामी लगती है और इससे देश की उत्पादकता कम हो रही है। एक प्रिंसिपल अगर अपने स्कूल या कॉलोनी के शिक्षकों से ड्यूटी पूरी नहीं करवा पाता, संस्था का एजेंडा पूरा नहीं करवा पाता, कॉलेज और हॉस्टल में अनुशासन नहीं रखवा पाता, नकल नहीं रोक पाता, कोर्स पूरा नहीं करवा पाता, बच्चों में मानसिक तनाव दूर नहीं करवा पाता, संस्था से साम्प्रदायिकता, भेद-भाव दूर नहीं रख पाता, चोरी-भ्रष्टïाचार को रोक नहीं पाता, तो उसे शिक्षक ही बने रहना चाहिए। महज बुजुर्गियत या लंबी नौकरी किसी को बेहतर प्रशासक नहीं बना देती। पांच-सात साल के प्रशिक्षण और अनुभव के बाद एक कलेक्टर पर किसी बड़े कॉलेज के प्राचार्य के मुकाबिले दस हजार गुना अधिक बोझ होता है, लेकिन प्रशासन और मैनेजमेंट के गुर जानकर ही वह ऐसी जिम्मेदारी पूरी कर पाता है।
जो सरकार जिले चलाने के लिए आईएएम का पूरा ढांचा अंगे्रजों की तर्ज पर चलाती है, उसके लाखों कॉलेज, दसियों लाख स्कूल बिना प्रशासनिक अनुभव चलते हैं। यही हाल सरकारी अस्पतालों का है और कुछ और विभागों में भी ऐसा ही होगा।
चूंकि प्रबंधन, प्रशासन, मानव-संबंध, इन सबकी कमी पहली नजर में बिना खटके रह जाती है इसलिए आखिरी असफलता तक इसे खपा दिया जाता है। सोने-चांदी की दूकान में काम करने वाले सेल्समैन को औजार थमाकर गहने गढऩे इसलिए नहीं बिठाया जाता कि उसकी कमजोरी पल भर में समझ आ जाएगी। लेकिन मुझे मलाल इस बात का है कि हर बरस दर्जनों छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं के बाद भी न केन्द्र सरकार, न कोई राज्य सरकार, कॉलेजों में प्रशासनिक अनुभव की कमी को समझ रही।
इससे परे एक और कमी मुझे खलती है, पूरे देश में ही मनोवैज्ञानिक परामर्श की। स्कूल-कॉलेजों से परे भी देशभर में तनाव चल रहा है, लेकिन मनोविज्ञान, मनोचिकित्सा की पढ़ाई में बढ़ोतरी नहीं हो रही। शहरीकरण, औद्योगीकरण, महिला-स्वतंत्रता और बच्चों के कम उम्र में व्यस्त होने जैसे बहुत से मामले हैं जिनके चलते तनाव बढ़ रहा है। एक आत्महत्या के पीछे मुझे आत्महत्या की कगार पर खड़े कुछ सौ लोग दिखते हैं और उनके पीछे कई हजार निराश और हताश लोग। ऐसे भयावह पिरामिड को अनदेखा करने वाली सरकार आने वाले अधिक कड़े ग्लोबल मुकाबिले में कमजोर ही बनती जाएगी। भारत जैसा देश और समाज, कीचड़ में खिले प्रतिभा के कमल की चर्चा करते नहीं थकते और उसे देश का आम हल मानने की खुशफहमी में भी जीता है। हर सफल के पीछे सैकड़ों असफल लोगों की भीड़ है, वह इसलिए कि जिस कॉलेज में दिन काटकर वे निकले, वहां के प्राचार्य का कोई प्रशासकीय अनुभव नहीं था और कॉलेज की उत्पादकता बहुत कम थी। साल में सौ दिन भी पूरी पढ़ाई नहीं हुई और जवानी के तीन, पांच, या अधिक बरस चले गए। गिने-चुने काबिल प्रिंसिपल जिन कॉलेजों में रहते हैं वहां के काम, माहौल और उनकी उत्पादकता में फर्क साफ दिखता है।
सरकारों को अपने घिसे-पिटे, नाकामयाब और बेअसर साबित हो चुके तरीकों को बदलना होगा। ऐसा न होने तक न मौतें थमेंगी न जिंदगियां बनेंगी, चाहे वे कॉलेजों में हों या अस्पतालों में। लेकिन सरकारी सोच पर जमी चर्बी फौलाद सी कड़ी होती है, लोहे के घिसने की धीमी रफ्तार से ही वह पिघलती है, अगर पिघलती है तो।
मैं इंतजार कर रहा हूँ सरकार में ऐसे मुखिया का जो मैनेजमेंट से लेकर मनोविज्ञान तक की दुनियाभर में साबित भूमिका का महत्व समझे। न राजा में व्यवस्था की चर्बी छांटने का उत्साह न जनता को अच्छे और बुरे में फर्क की परवाह। ऐसे में बड़ी संभावना यही है कि मेरे लिखने, पाठकों के पढऩे के समय की बरबादी के अलावा कागज और स्याही की बरबादी के साथ यह मुद्दा थम जाएगा क्योंकि न सिर्फ हमारा देश विकसित नहीं है, हमारी सोच भी विकसित नहीं है।
-सुनील कुमार

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