दिल्ली के अखबारों में राष्टï्रपति के पति के महाराष्टï्र दौरे के इंतजाम की खबरें हैं। आजादी के बाद पहली बार देश पति के पति को देख रहा है। इसलिए यह इंतजाम लोगों की निगाहों में भी आ रहा है। राष्टï्रपति भवन से महाराष्टï्र सरकार को भेजे गए निर्देश जगह-जगह सरकारी विश्रामगृह (सर्किट हाऊस) में पति-पति के लिए कमरे, उनके अफसरों के लिए कमरे, एसटीडी, टेलीफोन, इंटरनेट, फोटोग्राफर, कारों का काफिला, सब गिनाया गया है।
महाराष्ट्र पहली बार अपने एक विधायक के लिए यह सब इंतजाम करने जा रहा हे। आज यह कांगे्रस विधायक राष्ट्रपति का पति है लेकिन पांच बरस बाद इन दोनों में से हो सकता हे कि एक भी ओहदा उसके पास न बचे। उस दिन क्या इन पांच बरसों का यह इंतजाम यादों को, बुरी यादों का बोझ नहीं बन जाएगा।
लेकिन सत्ता में बैठे लोगों का क्षणिक सहूलियतों के लिए ये इसी एक मामले में नहीं दिखता, कुर्सी छोडऩे के महीने भर पहले तक लोग अपनी पसंद से दीवारें रंगवाते हैं, मानो वह उनकी कब्र रहने जा रही है। लोग अपने लोगों के बीच लालबत्ती से समंदर चीरते हुए निकलते हैं मानो वह बत्ती जिंदगी भर के लिए उन्हें मिली हो।
लेकिन आज मैं इससे परे की भी कुछ सोच रहा था। एक अधिकारी मित्र के साथ मैं बात कर रहा था कि बहुत होनहार लोग इन दिनों सरकारी नौकरियों में क्यों नहीं आ रहे, क्यों वे निजी कंपनियों या अंतरराष्टï्रीय संस्थानों में चले जा रहे हैं?
उनका कहना था कि सरकारी नौकरी में खूबियां कम और खामियां अधिक रह गई हैं। जो औसत दर्जे के लोग हैं उनको तो सरकारी नौकरी के साथ जुड़ी सुविधाएं, नौकरी की सुरक्षा और काम न करके भी रेलगाड़ी के बीच के डिब्बे की तरह कतार में आगे बढऩे का मौका, यह सब हासिल रहता है। दूसरी तरफ काम करने वाले, होनहार लोग रहते हैं जो सरकारी नौकरी में चुनौती मंजूर करने महत्वपूर्ण काम करते हैं और गलती का खतरा भी झेलते हैं।
इस अफसर का कहना था कि निजी कंपनी में काम करते हुए किसी व्यक्ति का भूतकाल, वर्तमान और भविष्य, तीनों देखा जाता है, लेकिन सरकारी नौकर सिर्फ वर्तमान में जीता है। बहुत महान काम करने वाला अफसर भी हजार रुपए की खरीदी की गड़बड़ी में सजा पा सकता है। जब किसी के काम का पूरा मूल्यांकन नहीं होता तो वह कैसे अपनी पूरी ताकत, पूरी दिलचस्पी, पूरी प्रतिभा सरकारी नौकरी में लगा सकता है?
उनके मुताबिक जब किसी को सिर्फ उसके मौजूदा काम के आधा पर सम्मान का अपमान, सजा या ईनाम मिले, तो वह लंबी रेस में बोझ उठाकर कब तक दौड़ सकता है और क्यों दौड़ेगा।
कमोबेश इसी किस्म की बात पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े नेताओं में से एक ने महिला आरक्षण को लेकर कही। उनका कहना था कि महिला आरक्षण लागू होने पर सीटें बारी-बारी से महिलाओं के लिए रखी जाएंगी। ऐसे में पुरुष सांसद या विधायक को यह पता नहीं होगा कि कब तक उसकी सीट उसके पास रहेगी? ऐसे में वह अतिरिक्त मेहनत क्यों करेगा?
चुनाव होते पांच बरस के लिए हैं, एक कार्यकाल खत्म हो जाने के बाद दूसरे कार्यकाल की फिक्र करके अधिक दिलचस्पी या अधिक उदासीनता दिलाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? लोग सहूलियतों के लिए जायज-नाजायज, लोकतांत्रिक-अलोकतांत्रिक विशेषधिकारों के लिए तो एक-एक दिन जीने को तैयार हैं, लेकिन मेहनत की बात जब आती है तो वे पांच साल बाद तलवार की तरह सर पर टंगी औरत को वजह बताने लगते हैं।
महाराष्टï्र निजा घर हो वे आज राष्टï्रपति के पति बनते ही वहां एक अलग दर्जा पाकर घूमेंगे, अपनों के बीच अपनी बनते हुए उन्हें कुछ अटपटा नहीं लगेगा? पांच बरस बाद क्या उन्हें इसी तरह का महत्व मिल पाएगा?
लोग पता नहीं कैसे बहुत अस्थायी, बहुत क्षणिक, बहुत महत्वहीन प्रतिष्ठïा के चिन्हों के फेर में पड़ते हैं। कोई अपनी इंसानियत खोकर ही ऐसा कर सकता है।
मैं यह देखकर हैरान होता हूं कि सम्मान सौ बरस का, छठवें बरस की खबर नहीं, जैसी बात को लोग समझ क्यों नहीं पाते?
इतनी बात में कुछ विरोधाभासी बातें भी दिख सकती हैं। कोइ्र सोच स्थायी तो कोई सोच अस्थायी, कहीं स्थायी से फायदा दिख रहा है तो कहीं अस्थायी से। लेकिन लोग हैं कि यह अपने ही फायदे की सोचते रहते हैं। और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो राजनीति में हों या सरकारी नौकरी में, बेधड़क अपना काम किए चलते हैं।
अखबार के धंधे में भी कभी-कभी लगता है कि लंबी दूरी की सोचे बिना एक दिन की घटना को लेकर एक खबर छापना घाटे का, खतरे का हो सकता है। लेकिन अखबार अपना खुद का दीर्घकालीन भला-बूरा सोचकर अपने इर्द-गिर्द कांटों का घना जंगल खड़ा कर लेगा तो खुद ही उसमें फंस कर रह जाएगा। एक खरा अखबार अपना भला-बुरा सोचते हुए खरा बना रह सके, ऐसा आसानी से नहीं हो सकता। एक खरे अफसर और खरे नेता पर भी यही बात लागू होती है।
- सुनील कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें