अभी-अभी दिल्ली की एक पत्रकार की एक किताब आई है जिसमें सीआईए के दस्तावेजों के हवाले से बताया गया है कि नेहरू इंदिरा को अपनी राजनीतिक वारिस बनाना नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि इससे उन पर कुनबापरस्ती का आरोप लगेगा, और उनका यह भी मानना था कि कांगे्रस पार्टी अपना नेता तय करने की काबिलीयत रखती है।
लेकिन नेहरू आरोपों से बच भी नहीं पाए। उनके बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने लेकिन उनके तुरंत बाद से देश में नेहरू-गांधी परिवारवाद की बात शुरू हुई। नेहरू की बेटी ने विरासत तो नेहरू की या उनकी पार्टी की, पाई थी लेकिन नाम गांधी का भी जुड़ गया, इंदिरा के पति फिरोज गांधी के कारण। हालांकि गांधी नाम से महात्मा गांधी नाम याद पड़ता है जिन्होंने अपने गांधीवाद का कोई वारिस नहीं छोड़ा, नेहरू उनके अकेले राजनीतिक वारिस बने रहे। यह एक अलग बात है कि गांधी के कुनबे का कोई नेहरू की पार्टी के खिलाफ लड़कर मंत्री बना तो किसी ने राजनीतिक मनोनयन मंजूर करके राजनायिक पद लिया।
आज सुबह यह बात दो-तीन वजहों से फिर कौंधने लगी। कल-परसों ही राहुल गांधी को कांगे्रस में महासचिव बनाया गया ओर आज सुबह की खबर है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे को प्रदेश भारतीय जनता युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया गया है। बात यहीं नहीं थमी, अजीत जोगी ने टाईम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए प्रियंका गांधी के लिए लंबी-चौड़ी भूमिका सुझाई है।
उत्तरप्रदेश में ही मुलायम सिंह यादव के बेटे, भाई, सबने सत्ता पा ली। बिहार में लालू यादव, उनकी पत्नी, पत्नी के भाई वगैरह सभी सत्ता पर आ गए। हरियाणा में देवीलाल का पूरा कुनबा हरियाणा को दुहने के लिए सत्ता पर आ गया। मध्यप्रदेश के रविशंकर शुक्ल का कुनबा पहले नागपुर, फिर भोपाल और अब छत्तीसगढ़ में सत्ता पर काबिज रहा। मध्यप्रदेश में ही सिंधिया घराने ने कांगे्रस, भाजपा दोनों पर कब्जा रखा जो राजस्थान तक फैल गया।
दक्षिण में भी एमजीआर, एनटीआर, करणानिधि की राजनीतिक विरासत कुनबे में या पे्रम संबंध में बंटी। उड़ीसा में नवीन पटनायक, कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला जैसी वसीयतें देश के हर राज्य के स्टाम्प पेपरों पर लिखी मिल जा रही हैं।
यह पूरा सिलसिला चाहे कितना ही मासूम हो, इस बारे में सोचते ही मुंह बदमजा हो जाता है। इतने बड़े-बड़े नेता, इतनी ताकतवर और सफल पार्टियां, लेकिन जब राजनीतिक की बात आती हे तो लोग घूम-घूमकर अपने का ही तब तक देते चलते हैं जब तक राजा बेटा या रानी बेटी अघा न जाए। यह कैसा खानदानी पेशा है जिसमें लोगों को मानस-पुत्री या मानस-पुत्र नहीं मिलते? यह कैसा लोकतत्र है जिसमें अब कुनबापरस्ती की चर्चा भी होनी बंद हो गई है।
छत्तीसगढ़ को मैं देखता हूँ तो एक के बाद दूसरे भूतपूर्व राजे-महाराजे राजनीति में होवी हैं। कांगे्रस और भाजपा दोनों बाकी नामों को तभी सोचती हैं जब उन्हें ऐसे कोई भूतपूर्व सामंत नसीब न हों या फिर किसी पुराने नेता के कुनबे में कोई सत्ता के काबिल न हो। ऐसे ही मामले इस छोटे से राज्य में निकल जाएंगे जिसमें संगठन के पद, पार्टी की टिकट, सत्ता की कुर्सी या सुविधाभोगी मनोनयन में लोगों ने अपने कुनबे को ही चुना। इसमें वामपंथी दल अपनी परंपराओं के चलते नीति-सिद्घांतों के कारण बाकी देश की तरह छत्तीसगढ़ में भी मुक्त रहे, लेकिन उनके पास बांटने को यहां कुछ भी नहीं था। लेकिन यह बात कम लोगों को मालूम होगी कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राज्य सचिव कॉमरेड चित्तरंजन बख्शी अपने राज्य कार्यालय को ही रायपुर से उठाकर भिलाई ले गए थे क्योंकि उन्हें वहां अपने बेटे के पास रहना था। वे बेटे को पार्टी में नहीं ला सकते थे इसलिए पार्टी मुख्यालय को बेटे के घर ले गए।
लेकिन मैं ठीक-ठीक कुनबापरस्ती पर भी लिखना नहीं चाहता। अभी-अभी एक परिचित अफसर से बात हो रही थी तो उन्होंने याद दिलाया कि देश में सत्ता किस तरह एक सीमित तबके के हाथों में घूमती हे और बाकी जनता के एक बड़े हिस्से को तो कोई लोकतांत्रिक अधिकार भी नहीं मिलते।
यह हालत इसलिए भी लगती है कि खानदानी नेता जनता के बजाय अपने कुनबे से राजनीतिक समझ लेकर आते हैं। उन्हें जनता पर कई बातों के लिए निर्भर भी नहीं होना पड़ता। जनता में उनकी लोकप्रियता या पकड़ से उनकी तरक्की का अधिक लेना-देना नहीं रहता। छत्तीसगढ़ के विधायकों-सांसदों में जितने महल-वासी रहते आए हैं उनको देखें तो लगता है कि अपने-आपको जनकल्याणकारी मानने की खुशफहमी से ये बाहर ही नहीं आ पाते। सरदार पटेल ने रियासतें देश में मिला दीं लेकिन उनके वारिस आज देश-प्रदेश पर काबिज हो गए।
कुनबों में कैद लोकतंत्र का आजाद होना कैसे हो पाएगा, यह सोचना मेरे लिए आसान नहीं। देश के कानून में यह रोक नहीं लगाई जा सकती कि एक सांसद या विधानसभा में एक कुनबे के एक से अधिक लोग न रहें। ऐसा करना कुनबे के बाकी चिरागों के मौलिक अधिकार छीनना होगा। लेकिन वंशवाद को क्या भारतीय विचारक, भारतीय राजनीति उसी तरह किनारे बैठकर देखेंगे जैसा कि हम वर्मा को देख रहे हैं कि यह उसका अंदरूनी मामला है?
क्या कानून से परे कुछ परंपराएं विकसित होने की गुंजाइश भी अब नहीं बची? क्या अब सब कुछ मेरा घर, उसका घर, कानून में इजाजत, जैसे दायरों में बंटी बातें हो गई हैं? क्या कुनबों, सामंतों के खिलाफ चुनाव में कोई गैर-चुनावी संगठन मुद्दे उठा सकता है? क्या हर चुनाव क्षेत्र में जनता को सोचने को मजबूर करने वाले मुद्दे उठाने वाले जनसंगठन, जनमंच तैयार हो सकते हैं? कड़वी और असुविधा की बात करने वाले कबीरवादी कुछ हैं?
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