ऐसी बेईमानी, उनमें नहीं




एक परिचित का फोन आया, वे एक जटिल, उलझे हुए मुद्दे पर एक बैठक रखना चाहते थे और मुझसे वे कुछ ऐसे लोगों के नाम जानना चाहते थे जो इस मुद्दे पर बोल सकें। काफी सोच विचार कर मुझे एक नाम सूझा तो मैंने बताया, लेकिन वो उन्हें पसंद नहीं आया। उनका कहना था कि नाम ऐसा हो जो उस मुद्दे के इस तरफ या उस तरफ का न हो। वे एक तटस्थ वक्ता चाहते थे। मैंने सुझाया कि अगर वे बिल्कुल ही विचारहीन तथ्य चाहते हैं तो इंटरनेट से दस्तावेज निकाल लें और उन्हें ही बैठक में पढ़ लें।
विचारों से उन्हें खासा परहेज लगा इसलिए विचारहीन लोगों के नाम और तलाशने की जहमत मैंने नहीं उठाई। दरअसल एक पूरी जिंदगी हो गई, मैंने तय किया है कि दुश्मन को भी सलाह गर देनी हो तो सही दो, वरना न दो। ये सज्जन तो मेरे दुश्मन नहीं हैं, साधारण परिचित हैं, इसलिए एक विचार गोष्ठïी के लिए विचारहीन लोगों की फेहरिस्त तैयार करने में मैं हाथ बंटाकर भला अपने ही फैसले के खिलाफ काम क्यों करता?
उनकी बैठक वे जानें, मैं तो बुद्घिजीवियों के तमगे लगी बैठकों से कोशिश करके दूर रहता हूं। अपने आप को बुद्घिजीवी कहने या समझने वाले तबके को मैं देखता हूं कि अगर वैचारिक बेईमानी, संघर्ष से पलायन, शोषण पर चुप्पी ही बुद्घिजीवी होना है, तो इससे अनपढ़, मेहनतकश लोग ही ठीक हैं। कम से कम अपने भीतर किसी बुद्घि के होने की और उसके  भरोसे जीने की खुशफहमी मजदूर तो नहीं फैलाते।
मैं यह भी देखता हूं कि जिस पढऩे-लिखने को लोग बुद्धिजीवी होने का तमगा समझ बैठते हैं, उस पढऩे-लिखने के बाद लोग बेईमानी के रास्ते आसानी से निकालते हैं, भ्रष्टï और कामचोर हो जाते हैं और खुद तो शोषक बनने की तरफ बढ़ जाते हैं लेकिन शोषण से लडऩे का उनका हौसला कम हो जाता है। बात-बात में उन्हें अपना भला-बुरा दिखता है, न कि सामाजिक सरोकार। पढ़-लिखकर लोग अधिकारों के बारे में जागरूक हो जाते हैं और जिम्मेदारी पूरी करना वे औरों का जिम्मा समझ लेते हैं। पढऩे लिखने से वे कानून में औरों की जिम्मेदारी समझ पाते हैं और अपने अधिकार भी। इस तरह वे मेहनतजीवी से बुद्घिजीवी हो जाते हैं।
मुझे कुछ शब्द जो बड़े अपमानजनक लगते हैं उनमें वीआईपी की तरह का ही शब्द है बुद्घिजीवी। यह लफ्ज बताता है कि बाकी मेहनतकश लोग मानो बुद्घिहीन बुद्घूजीवी हों। जब कोई ऐसे तमगाधारियों की बैठक की बात करता है तो मुझे लगता है कि हजारों बरस बाद मनु आकर फिर से एक कुलीन ब्राम्हण सभा का गठन कर रहे हैं।
कुछ विद्वान ऐसे हैं जो पढ़े-लिखे व्यक्ति को लडऩे में कमजोर मानते हैं। जिंदगी और दुनिया का कैसा भी संघर्ष हो, उसमें कीचड़ में उतरकर लडऩे या खून में लथपथ होने से सफेदपोश पढ़े-लिखों का परहेज करना स्वाभाविक ही लगता है। ऐसे लोगों की बैठक में शायद बहुत से या अधिकतर लोग अपने अपने धंधे की, अपनी कमाई और कुनबे की अपने सामाजिक मुखौटे की, अपनी साख की फिक्र करने के बाद ही मुंह खोलते होंगे। किसी धर्म, सम्प्रदाय, संगठन, पार्टी या तबके के प्रति प्रतिबद्घता के दायरे से निकलकर ईमानदार बात बोलना भी बहुतों के बस का नहीं होता होगा। खेमेबाजी को अनदेखा करके अंतरात्मा की आवाज कौन बोल पाता होगा? ऐसे में अपने पल्लू को चारों तरफ से बचाते हुए किस महफिल में कौन कैसे बैठ जाता होगा और कैसे उठ पाता होगा इसका अंदाज भी लगाया जा सकता है।
बुद्घिजीवी का बिल्ला बिना किसी लायसेंस-रजिस्ट्रेशन घर पर ही बनाया जा सकता है। कई लोग घर बैठे अपने को आचार्य लिखने लगते हैं तो कुछ चिंतक हो जाते हैं, फिर चाहे उनकी सारी चिंता महज अपने तमगे की चमक बरकरार रखने में ही क्यों न खर्च हो जाए।
मैं तथाकथित बुद्घिजीवियों की इस विचारहीन बैठक की कल्पना कर रहा हूं। एक गंभीर और जटिल, विवादास्पद मुद्दे पर चर्चा में स्वघोषित बुद्घिजीवियों को विचारों से जिस तरह का परहेज है वह देखते ही बनता है। दरअसल विचार आपके दिमाग से मशक्कत करवाते हैं, उसकी चर्बी छांटते हैं। जिस तरह हमारा तन कसरत से बचने में लगा रहता है, उसी तरह मन भी मेहनत नहीं करना चाहता। ऐसे में हैरानी नहीं कि अपने हाथों अपने गले में बुद्घिजीवी का तमगा टांगकर भी लोग बुद्घि को बांस से भी छूना नहीं चाहते। यह डर, यह आतंक उसी बुद्घि से है जिसका मुखौटा  लगाकर लोग अपने को ज्ञान-शूद्रों से परे का उच्च वर्ण ब्राम्हण बताते हैं।
ऐसी बेईमानी मेहनतकशों में नहीं होती।

- सुनील कुमार


 

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