बॉबी जिंदल के बहाने, उनकी-अपनी चार बातें

27 जुलाई 08
अमरीका को उसकी अलोकतांत्रिक आक्रामकता और विस्तारवाद की उसकी नीति के लिए आए दिन कोसने के बावजूद उसकी कुछ खूबियों की चर्चा भी करने को जी चाहता है। ऐसी एक संभावना वहां खड़ी हो रही है राष्टï्रपति चुनाव को लेकर। परंपरागत रूप से राष्टï्रपति पद का प्रत्याशी अपनी पार्टी के साथ मिलकर अपने लिए उपराष्टï्रपति पद का उम्मीदवार छांटता है। और यह माना जाता है कि मतदाताओं और अमरीकी समाज के अलग-अलग तबकों की भावनाओं को ध्यान में रखकर यह जोड़ी बनाई जाती है। भारत के लोकतंत्र में भी पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्टï्रपति, जैसे कई पदों पर मनोनयन या चयन के पहले ऐसे पैमाने ध्यान में रखे जाते हैं। अमरीका में इन दिनों भारतीय मूल के एक नौजवान बॉबी जिंदल का नाम रिपब्लिकन पार्टी की उपराष्टï्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए चल रहा है।
बॉबी जिंदल भारत के पंजाब से अमरीका में जाकर बसे एक व्यापारी के बेटे हैं और अमरीकी संसद से होते हुए वे अब लुईसियाना राज्य के गवर्नर हैं। अमरीकी राज्य के गवर्नर का मतलब भारत के रबर स्टैम्प गवर्नर जैसा नहीं होता, वह राज्य की सरकार का मुखिया होता है और राज्य चलाता है। 37 बरस के बॉबी को अमरीका में तंगख्याल मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक ऐसा नौजवान चेहरा माना जा रहा है जिसे अगर आगे लाया गया तो उससे पार्टी की छवि बदल सकती है। आज अमरीका में इस पार्टी को गोरे बूढ़ों की पार्टी माना जाता है। एक गैर गोरा, एशियाई नस्ल का बिल्कुल नौजवान उम्मीदवार इस पार्टी के आज के राष्टï्रपति पद के प्रत्याशी जॉन मैककेन के लिए मददगार भी साबित हो सकता है। वह विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्टï्रपति पद प्रत्याशी अश्वेत बराक ओबामा से दस बरस छोटा भी है।
भारत की राजनीति को अगर देखें तो मरणासन्न लोग ताबूतनुमा सिंहासनों पर बैठकर भी राज करने को बेताब हैं और जो नई पीढ़ी नई सोच को लेकर, नए ज्ञान से लैस होकर काम करना चाहती है उसे कोई जगह देने को तैयार नहीं है। मुझे अपने बचपन से लेकर अभी तक दिया छाप पर अटल-अडवानी की जोड़ी राम-लक्ष्मण की तरह पेश की हुई याद है। उम्र की आधी सदी गुजर गई लेकिन जनसंघ के सबसे ऊपर के दो लोगों में से एक अडवानी अब तक धनुष लिए मैदान में डटे हैं और रामचंद्र भी वोट डालने संसद के गलियारे तक तो पहुंच ही गए थे। कांगे्रस में इंदिरा गांधी बेमौत नहीं मारी जातीं तो हो सकता है कि आज नब्बे बरस की उम्र में वे प्रधानमंत्री होतीं या जैसा कि कुछ लोगों का अंदाज था कि बेटे को प्रधानमंत्री बनाकर वे राष्ट्रपति बन जाएंगी। वामपंथी दलों में देखें तो सीपीएम में ज्योति बसु को पच्चीस बरस मुख्यमंत्री रहने के बाद भी छुट्टïी नहीं मिल रही थी और हरिकिशन सिंह सुरजीत के बारे में यह लगता था कि ऐतिहासिक भूल आधा दर्जन कर लेने के बाद ही वे बिदा होंगे।
अमरीका की आज की दानवाकार सफलता के बारे में सोचने की जरूरत है। जब यह बात लिखी जा रही है उसी वक्त छत्तीसगढ़ में कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के नाम पर छंटाई चल रही है और इस बार भी यह मुद्दा बन रहा है कि किसी छत्तीगढिय़ा को ही इस पद पर बिठाया जाए। यह बात और भी बहुत से दफ्तरों के लिए नाम तय करते समय उठती है। और सरकार या राजनीति के पद ही नहीं अखबारों में संपादक तय करने के पहले भी काबिलीयत में इसे एक जरूरी हिस्सा माना जाता है कि संपादक पर्याप्त बूढ़ा हो चुका है या नहीं।
तो कोई यह देखे कि मुखिया उसी इलाके का है या नहीं, कोई यह देखे कि वह पर्याप्त बूढ़ा है या नहीं, तो फिर बाकी बातें धरी रह जाती हैं। भारत में एक तरफ तो अमरीका के मुकाबले इस बारे में बहुत विशाल उदारता है कि यहां विदेशी मूल का कोई व्यक्ति भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हो सकता है। दूसरी तरफ अलिखित और अघोषित रिवाज यह चले आ रहा है कि अधेड़ होने के पहले राजनीति में किसी को तभी गंभीरता से लिया जाता है जब उसकी रगों में किसी चुनिंदा राजनीतिक परिवार का खून दौड़ रहा हो। क्या भारत में कोई यह कल्पना कर सकता है कि 37 बरस के एक नौजवान को उपराष्टï्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार बनाकर कोई पार्टी अपना खुद का भविष्य सुधारने का सोच सकती है? और खासकर ऐसा नौजवान जिसके कुनबे से कोई देश में किसी बहुत बड़े पद पर काबिज न रहा हो।
यह बात हम इसलिए कर रहे हैं कि अमरीका ने जिस तरह पूरी दुनिया से वहां पहुंची हर नस्ल के लोगों में से सबसे होनहार और सबसे हुनरमंद लोगों को जिस तरह अपने सिर पर बिठाया और फिर उनकी ताकत से अपने पूरे कद को ऊंचा उठाया, यह सोचने की बात है। हम इस बात पर अमल करने की नसीहत देने की हड़बड़ी नहीं कर रहे लेकिन इसे एक प्रयोग के रूप में तो देखा ही जाना चाहिए कि उसमें बाकी दुनिया के लिए क्या-क्या सबक हैं। अपने पास मौजूद लोगों में से किस-किससे देश के लिए क्या-क्या लिया जा सकता है, इसका ख्याल न करने वाला देश या प्रदेश या समाज कैसे आगे बढ़ सकता है? और यह केवल सरकार की बात नहीं है, किसी निजी दुकान में भी, किसी अखबार में भी जब तक अपने मौजूद लोगों में मौजूद संभावनाओं को नहीं देखा जाएगा तो उसका आगे बढऩा मुश्किल ही रहता है।
अमरीका जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर देश में उपराष्टï्रपति पद का मतलब चार या आठ बरस बाद राष्टï्रपति पद का उम्मीदवार बनना भी होता है। वहां राष्टï्रपति दो बार से अधिक उस पद पर नहीं रह सकता। आज रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद प्रत्याशी को देखें तो जॉन मैककेन की उम्र (72 बरस) इतनी हो चुकी है कि उनसे जीत के बाद भी राष्टï्रपति के एक कार्यकाल से अधिक की उम्मीद कम ही लोग करेंगे। बॉबी जिंदल अगर उपराष्टï्रपति बनते हैं तो उस वक्त वे 41 या 42 बरस के होंगे और कोई ऐसी स्थिति बनती है कि वे राष्टï्रपति बनें तो 50 बरस के होने तक वे दो बार कार्यकाल पूरा करके रिटायर भी हो चुके होंगे।
भारत के राजनीतिक समाज को यह भी सोचना होगा कि अगर इस देश में लोकतंत्र का नेतृत्व हमेशा ही बूढ़ों से लदा हुआ रहेगा तो वह हमेशा ही भविष्य की सोच से 25-50 बरस पीछे भी चलता रहेगा। हर नई पीढ़ी के पास पुरानी पीढ़ी के अनुभव से सीखने का तो काफी कुछ होता है, उसके पास आने वाले दिनों को लेकर बूढ़ों के मुकाबले 25-50 बरस आगे तक की फिक्र और सोच भी रहती है। हिन्दुस्तान में एक दिक्कत यह लगती है कि अनुभव को ही भविष्य मान लेने का दुराग्रह करते बूढ़ी पीढ़ी आखिरी सांस तक सत्ता की आस में लगी रहती है, मानो नींव के पत्थर यह खुशफहमी पाल बैठे हैं कि वे ही छत भी रहेंगे और छत के ऊपर की टंकी भी।
हम एक ही पार्टी और एक ही कुनबे की बात करें तो यह बात साफ है कि कम्प्यूटर और कम्युनिकेशन को जो महत्व राजीव गांधी ने दिया था, और जिसकी वजह से देश में आज एक क्षेत्र में इतनी अधिक तरक्की हो सकी, वह महत्व इंदिरा गांधी नहीं दे सकती थीं। यह हर पीढ़ी के साथ जुड़ी हुई एक दिक्कत है।
लोगों को कुदरत से बहुत कुछ सीखने की जरूरत होती है। पतझड़ में पेड़ पत्तों को गिरा देता है ताकि नए पत्ते के निकलने की गुंजाइश बन सके। फूल तनों की तरह स्थाई नहीं होते और खुद झड़कर वे अपने बीज के आगे बढऩे का रास्ता खोलते हैं। अगर फूल अपनी ही खूबसूरती पर बदगुमां होकर झडऩे से ही इंकार कर देते तो कुदरत ही आगे नहीं बढ़ती। हिन्दुस्तान की लीडरशिप को राजनीति, समाज, व्यापार और बाकी दायरों में भी नई पीढ़ी के लिए जगह बनानी होगी, आज एक बड़ी दिक्कत यह है कि जब तक लोगों की अपनी सांस चलती रहती है तब तक वे नई पीढ़ी की जरूरत महसूस नहीं करते। भारत के लोग रिटायर होना भी सीखें तो शायद नई कोंपलों के साथ पेड़-पौधे अधिक विकसित हो सकेंगे। और आखिरी नसीहत यह कि किसी भी जगह बाहरी से परहेज करके स्थानीय प्रतिभाएं आगे नहीं बढ़ सकतीं।

-सुनील कुमार
(कवर पेज पर बॉबी जिंदल को महान क्रांतिकारी चे गुएरा की तरह दिखाते हुए टी-शर्ट पहनी एक युवती।)

अधिक इंसानों का अधिक भला

20 जुलाई 08
खेल के बारे में मेरी जानकारी नहीं के बराबर रहती है। न कभी कुछ खेला और न अधिक कुछ देखा। ऐसे में इस हफ्ते खेल पर लिखना कुछ दुस्साहस का काम है। लेकिन खेल जिस तरफ बढ़ रहे हैं, जिस तरह बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए यह लगता है कि क्या यह इस धरती के खेल हैं या खिलाडिय़ों के बीच के खेल हैं। मामला कुछ इस तरह का है जैसा कि कुछ बहुत ही जटिल, कठिन, क्लिष्टï या अमूर्त किस्म का लिखने वाले नामी-गिरामी लेखकों के बारे में कहा जाता है कि वे कवियों के कवि हैं या लेखकों के लेखक हैं। मतलब यह कि वे आम लोगों के पढऩे के लायक नहीं रहते। इसी तरह इन दिनों खेल ऐसे होते चले जा रहे हैं कि उन्हें केवल पेशेवर खिलाड़ी खेल सकते हैं और बाकी लोग उन्हें केवल देख सकते हैं।
जिस तरह समाज में साक्षर और निरक्षर के बीच एक गहरी खाई रहती है, जिस तरह कम्प्यूटर सहित और कम्प्यूटर रहित समाज के बीच कभी न पटने वाला जो फासला रहता है उसी तरह शौकिया खिलाडिय़ों और पेशेवर खिलाडिय़ों के बीच एक चौड़ी खाई दिखाई पड़ती है। खेल मानो खिलाडिय़ों के लिए रह गए हैं या फिर रह गए हैं खेल संघों की राजनीति करने वालों के लिए, या फिर टेलीविजन कंपनियों के लिए, या फिर इश्तहार देने वालों के लिए। इन सभी की प्राथमिकताओं को देखें तो उनमें कहीं भी आम खिलाडिय़ों की जगह नहीं है। किसी को भी खेल में आगे बढ़ाना इनकी सोच से बाहर है और जब कोई आसमान पर पहुंच जाता है तब उसे चमकाकर सितारा बनाने के लिए बहुत से बड़े लोग लग जाते हैं।
कुल मिलाकर बात यह कि गरीब देश, गरीब प्रदेश, गरीब स्कूल या कॉलेज, गरीब परिवार के बच्चों के लिए किसी खेल में आगे बढऩा खासा मुश्किल रहता है। गिनाने के लिए इरफान पठान जैसे कुछ उदाहरण जरूर मिल जाएंगे जिनमें गरीबी से उठकर कोई खिलाड़ी आसमान तक पहुंचा। लेकिन ऐसी मिसालें कम ही मिलेंगीं, अधिक मामले ऐसे मिलेंगे जिनमें दुनिया की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को इन खेलों तक पहुंचने का मौका उसी तरह नहीं मिलता जिस तरह गांव की किसी गरीब खूबसूरत लड़की को किसी सौंदर्य स्पर्धा में जाने का मौका नहीं मिलता। लेकिन इसके बाद भी जो लड़कियां सौंदर्य स्पर्धा तक पहुंच पाती हैं उन्हीं में से लड़की अपने देश या दुनिया की सबसे सुंदर लड़की करार दे दी जाती है।
खेलों के बारे में यह बात बड़ी अजीब लगती है कि आज भारी तकनीक और बहुत महंगी ट्रेनिंग से ही कोई अंतरराष्टï्रीय मुकाबले तक पहुंच सकता है। यह खर्च और यह सहूलियत कितने लोगों को मिल पाती है? खासकर भारत जैसे देश में, जहां प्रदेश से लेकर देश तक खेल संघों में बैठे हुए मगरमच्छ मछलियों के हक का सारा दाना खा लेते हैं।
फिर एक बड़ी अजीब सी बात यह है कि अब किसी खेल में ऊंचाई पर पहुंचने वाले खिलाड़ी के पास चौबीसों घंटे बारहों महीने लगातार खेलने या तैयारी करने का ही विकल्प बचता है। मतलब यह कि खेल अब इंसानों के लिए नहीं, खिलाडिय़ों के लिए रह गए हैं और उन खिलाडिय़ों के लिए खेलने के अलावा और कोई काम नहीं रहना चाहिए। यह कमोबेश उस तरह की हालत लगती है जिसमें अगर कोई इंसान चौबीसों घंटे और पूरी जिंदगी अगर केवल खेल में न लगा सके तो खेल के आसमान पर उसकी कोई जगह नहीं है। अगर खेल से परे सोचें तो कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि पढ़ाई के आसमान पर भी चौबीसों घंटे पढ़ाई में लगाने वाले से परे किसी के लिए कोई जगह नहीं है। यही बात हमारे जैसे अखबारनवीसी के धंधे में लगे लोगों के लिए कही जा सकती है कि चौबीसों घंटे अगर यही काम न सूझें तो इस धंधे में आगे बढऩे की गुंजाइश कम है। लेकिन खेल तो एक ऐसा काम है जिसके साथ खेल भावना के जुड़े होने की बात कही जाती है। वैसी बात तो किसी और काम के लिए नहीं कही जाती। जैसे कि डॉक्टरी के अलावा किसी और पेशे को एक पवित्र पेशा नहीं कहा जाता। किसी पत्रकार से कोई यह उम्मीद नहीं करता कि वह खेल भावना से काम करेगा। और पत्रकार भावना तो कुछ होती ही नहीं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अपने किस्म का एक अकेला दायरा जो खेलों का था वह अब पेशेवर होते-होते इतना अधिक पेशेवर हो गया है कि बाकी इंसान दूर से देखकर ताली ही बजा सकते हैं।
इस बहुत ही महीन दिक्कत के बारे में लिखने की एक वजह यह है कि भारत जैसे सौ करोड़ के देश से निकलकर जब लोग ओलंपिक में जाते हैं और बोरियों में भरकर निराशा, हताशा और असफलता वापिस लाते हैं तो यह बात लगती है कि सितारों से नीचे जहां और भी है, और उसकी कोई कदर हिन्दुस्तान में नहीं है। देश का सारा फोकस गिने-चुने खेलों के गिने-चुने दायरों में थोड़े से खिलाडिय़ों पर बना हुआ है। आसमान के स्तर पर पहुंच चुके इन सितारा खिलाडिय़ों से खेल संघों और बाकी तमाम दुकानदारों को उसी तरह का फायदा हो रहा है जिस तरह का फायदा किसी अच्छे भले चलते कारखाने से कारखानेदार को होता है या किसी बेशकीमती खदान से खुदाई करने वाले को होता है। इसलिए नीचे के तमाम दायरों से अपने-आप निकलकर जो भी आ जाए उनमें से बेहतर लोगों को छांटकर उन पर पूरी मेहनत करने और उनसे पूरी कमाई करने का माहौल ही रह गया है। लेकिन इस कारखाने या खदान की कमाई से स्कूल-कॉलेज के स्तर पर खर्च करके नए होनहारों को ढूंढा जाए, उन्हें बढ़ाया जाए ऐसा भारत जैसे देश में नहीं दिखता।
क्रिकेट जैसे खेल में सैकड़ों-हजारों करोड़ की चर्चाओं के बीच जिस तरह के राजसी ठाठ-बाट तमाम पदाधिकारियों को भोगते देखा जाता है वह इस मैदानविहीन, बॉल और बल्लाविहीन, जूता और ड्रेसविहीन देश में बहुत ही अश्लील और हिंसक अपराध लगता है। लेकिन आज इस देश में मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री के पद के दावेदार भी क्रिकेट की दुकान के गल्ले पर बैठने के लिए मारामारी करते दिखते हैं। लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में भी कहीं ओलंपिक की तैयारी में लगे साइकिल चालक के लिए कोई कंपनी करोड़ों रुपए की साइकिल बना रही है तो कोई दूसरी कंपनी किसी खिलाड़ी के लिए कपड़े तैयार करने में दुनिया के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर लगा रही है। ऐसे में पूरी बाजार व्यवस्था की दिलचस्पी गिने-चुने सितारा खिलाडिय़ों के एकाधिकार में उसी तरह की रहती है जिस तरह मुंबई के फिल्म जगत में संघर्ष कर रहीं हजारों लड़कियों के बीच पूरा उद्योग दर्जनभर से भी कम लड़कियों को आसमान पर जगह देना चाहता है।
यह पूरा सिलसिला ऐसा अमानवीय हो गया है कि अब खेल आम इंसानों की जिंदगी से बाहर निकल गए हैं और खेल खेलना अब पूरे वक्त का एक धंधा होकर रह गया है। मगरमच्छों से भरे तालाबों में नई मछलियों के लिए जगह कम ही खेलों में, कम ही जगह निकल सकती है। ऐसे में अभी जब फ्रांस में साइकिल का एक लंबा मुकाबला चल रहा है तब कुछ लोगों ने पेशेवर खेलों से परे बिना मुकाबले वाला एक माहौल बनाने की राय सामने रखी है जिसमें साधारण जूते-कपड़ों और साधारण साइकिल के साथ ही लोग मेहनत कर सकें, बिना किसी महंगी ट्रेनिंग के और बिना अपना दूसरा काम-धंधा बंद किए हुए। शायद सितारों की चकाचौंध के बिना, बिना मुकाबलों और इश्तहारबाजी वाले ऐसे खेल शायद इंसानों का अधिक भला कर पाएं, अधिक इंसानों का अधिक भला।

सच बताने वालों के झूठ का सच

13 जुलाई
दस एक दिन पहले एक खबर देश-विदेश के बड़े-बड़े अखबारों में बड़ी प्रमुखता से छपी कि गोवा में हिटलर की नाजी सेना का एक ऐसा फरार अफसर पकड़ाया जो 50 बरस पहले हजारों यहूदियों को मारने का जिम्मेदार था। इस फरार युद्घ अपराधी को तलाशने में इजराइल के यहूदियों का एक संगठन शामिल था और इसे गोवा-कर्नाटक सीमा से गिरफ्तार करके जर्मनी ले जाया गया है। कई बड़े अखबारों के इंटरनेट संस्करण पर यह खबर देखकर हमने भी 'छत्तीसगढ़Ó के संपादकीय में इसका जिक्र किया कि गलत काम करने वाला 50 बरस की फरारी के बाद भी पकड़ा जाता है इसलिए लोगों को भला इंसान बने रहना चाहिए।
अब यह बात सामने आई कि गोवा में सालभर पहले शुरू हुए एक इंटरनेट ब्लॉग में मीडिया की बेईमानी, उसकी मूर्खता और उसकी लापरवाही को उजागर करने के लिए यह झूठी खबर एक जर्मन पे्रस नोट की तरह देश-विदेश के सभी प्रमुख अखबारों को भेजी गई और उन अखबारों ने उस खबर में किस-किस तरह की नमक-मिर्च लगाकर उसे छापा, कैसे अपनी कल्पनाशीलता से इस खबर को कुछ का कुछ बना दिया। यह ब्लॉग मोटेतौर पर गोवा के अखबारों को लेकर बेईमानी उजागर करता है। उसमें इसे चलाने वालों के बारे में ऐसा अंदाज लगता है कि ये वहीं के कुछ सुधारवादी पत्रकार हैं या ऐसे लोग हैं जो पत्रकारिता में बेहतरी चाहते हैं। इनके नाम ब्लॉग में नहीं लिखे हैं लेकिन इन्होंने गोवा और गोवा के बाहर के बहुत से अखबारों के पेशेवर दीवालियापन का भांडाफोड़ किया है।
यह साबित करने के लिए कि अखबार किस कदर लापरवाह हैं पेनप्रिक्सडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम नामक इस ब्लॉग ने जर्मनी का एक ईमेल एड्रेस गढ़ा और उससे भारत के बड़े अखबारों को, गोवा के अखबारों को प्रेस नोट भेजा। यहां पर उन तमाम अखबारों के अलग-अलग नाम देकर उनकी नमक-मिर्च या उनकी लापरवाही का जिक्र ठीक नहीं है, और यहां यह लिखना भी ठीक होगा कि कुछ किस्म की लापरवाही कभी-कभी हमसे भी होती है, लेकिन नमक-मिर्च लगाना और झूठी बातें जोड़ देना तो एक भयानक स्थिति है। गोवा के इन ब्लॉगर्स ने द्वितीय विश्वयुद्घ के वक्त के नाजी युद्घ अपराधी की छवि गढऩे के लिए इंटरनेट से एक बूढ़े जर्मन की तस्वीर भी छांट ली जो 88 बरस का दिखे और फिर एक कहानी गढ़ी कि किस तरह हिटलर का यह अफसर आकर गोवा में बसा हुआ था और जब उसने गोवा के अखबारों में अपना एक पुराना पियानो बेचने का इश्तहार निकलवाया तो उसे यहूदी संगठन चौकन्ना हुआ। इस पे्रस नोट के हिसाब से इस किस्म का पियानो का मॉडल हिटलर के वक्त जर्मनी के एक संग्रहालय से गायब हुआ था और उसके अब बिक्री के लिए सामने आने का मतलब हिटलर के किसी अफसर से रिश्ता हो सकता था। इंटरनेट पर गोवा के अखबार में इश्तहार देखकर नाजी युद्घ अपराधी तलाशने वाला यहूदी संगठन सक्रिय हुआ और ढूंढते हुए पता लगा कि यह जर्मन हिटलर की सेना में कर्नल रहा हुआ है और एक किसी यहूदी कैंप का इंचार्ज था जिसमें शायद 12 हजार लोगों को मारा गया था।
यह पे्रस नोट पाने के बाद भारत के बड़े-बड़े अखबारों ने कर्नाटक और गोवा की पुलिस, जर्मन दूतावास, और केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों से संपर्क किया, जिनमें से किसी ने भी इस खबर की पुष्टिï नहीं की। कुछ अखबारों ने तो उन तमाम देशों के नाम अपने मन से जोड़ दिए जहां से होते हुए यह जर्मन गोवा तक पहुंचा था। गोवा के एक अखबार ने पूरी खबर को छापने के बाद इस काल्पनिक जर्मन प्रेस नोट भेजने वाले से ईमेल से पत्र व्यवहार भी किया कि उन्होंने पूरी खबर छापी है और आगे की क्या जानकारी है।
देश के एक प्रमुख अखबार 'हिन्दूÓ ने वहां के एक वरिष्ठï पत्रकार ने कुछ दिनों बाद इस पूरे फर्जी मामले के बारे में और गोवा के इस ब्लॉग के बारे में लिखा। मीडिया के काम करने के लापरवाह, सनसनीखेज, और बदनीयत से भरे तरीके कोई नए नहीं हैं। मीडिया के बहुत बड़े हिस्से की सुर्खियों को देखकर ही उसके अपने रूख का अंदाज लगाया जा सकता है। भाषा को थोड़ा सा देखा जाए तो समझ आ जाता है कि अखबार या टीवी की अपनी हसरत क्या है। चुनावों की रिपोर्टिंग तो छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के मीडिया में जिस कीमत पर होती है उसका अंदाज लगाने के लिए समझदार रिपोर्टर मोर्चे पर निकलने के पहले मालिक, मैनेजर, या अगर मायने रखने वाला हो तो संपादक, से पूछ लेता है कि किस पार्टी या प्रत्याशी को कितनी अधिक लीड दिलवानी है।
एक बात यह लगती है कि पूरी दुनिया के बारे में लिखने वाले मीडिया के बारे में एक तो बहुत कम लिखा जाता है, दूसरा मीडिया की ऐसी पत्रिकाओं में लिखा जाता है जिन्हें साधारण पाठक कभी नहीं पढ़ता। हम कभी-कभार टीवी-समाचार चैनलों की बहुत अधिक ज्यादती होने पर उनके बारे में लिखते हैं और अपने खुद के दायरे के मीडिया के बारे में मोटी-मोटी बातें अपने संपादकीय या कालम में लिखते हैं। लेकिन हिचकते-झिझकते हुए लिखना एक अलग बात होती है। अपने धंधे के लोगों के बारे में, या मीडिया के बारे में लिखना कभी ऐसा भी लगता है कि बाजार के मुकाबले को इस तरह चुकाया जा रहा है।
ऐसे में मीडिया पर नजर रखने के लिए अगर एक स्वतंत्र संगठन ऐसा बने जो इंटरनेट के मुफ्त माध्यम का इस्तेमाल करके मीडिया की व्याख्या करे तो शायद मीडिया का कुछ भला हो और अंतत: लोकतंत्र का भी। गोवा में जिस तरह की यह शुरूआत हुई है वैसी शुरूआत छत्तीसगढ़ के भी कुछ पत्रकार, या मीडिया की समझ रखने वाले लोग कर सकते हैं। हो सकता है कि काफी हद तक वे अपनी पहचान भी छुपाए रख सकें। भारत के साइबर कानून अभी बहुत मजबूत नहीं हैं इसलिए गुमनामी में भी बहुत सा काम रखा जा सकता है।
और केवल मीडिया की बात क्यों करें, राजनीति, उद्योग-व्यापार, सामाजिक संगठन, सरकार, नेता-अफसर-ठेकेदार जैसे बहुत से तबके हैं जिनके बारे में कई बातें मीडिया अपनी विज्ञापनों की कमाई के कारण नहीं लिख पाता, या नहीं लिखता, या विज्ञापनों से परे भी कमाई का कोई रास्ता निकाल लेता है। ऐसी तमाम बातें कोई ऐसा व्यक्ति बेहतर तरीके से उजागर कर सकता है जिसे बहुत किस्म के दबावों की फिक्र न हो। जो लोग इंटरनेट पर बैठते हैं वे इस ब्लॉग द्धह्लह्लश्च://222.श्चद्गठ्ठश्चह्म्द्बष्द्मह्य.ड्ढद्यशद्दह्यश्चशह्ल.ष्शद्व/ को देखकर अंदाज लगा सकते हैं कि ऐसी कोई कोशिश देश के दूसरे हिस्सों में भी वहां के पत्रकारों, मीडिया मैनेजरों और मालिकों को सावधान कर सकती है। आज तो मीडिया का लिखा या कहा बिना किसी चुनौती के बाजार में खप जाता है और जब तक इसके खिलाफ कोई बात उठे मीडिया कोई नई गलती या लापरवाही करने में जुट जाता है। नीचे मैं 'हिन्दूÓ में सिद्घार्थ वरदराजन का लिखा लेख भी दे रहा हूं जो गोवा की इस खबर-मजाक और भारत के मीडिया के हाल पर अधिक विस्तार से जानकारी देता है।

संघर्ष की एक मिसाल यह भी...


देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक क्रांति की बातें हो रही है अन्ना हजारे के अनशन के बाद बाबा रामदेव का विवादास्पद अनशन देश देख रहा है। देश में जब यह सब हो रहा है तब स्वाश्रयी महिला संगठन की संस्थापक इला भट्ट को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने समाज में बदलाव लाने के लिए उनके योगदान पर सम्मानित किया। सम्मान इला भट्ट के लिए कोई नई बात नहीं। जिन पद्म सम्मानों को लोग खरीदने की हद तक जाते हंै, वह पद्म सम्मान इला भट्ट की दराज में यंू ही पड़े रहते हंै ,क्योंकि उन्होंने अपने सम्मान  को अर्सा पहले देश की गरीब बेजुबान औरतों के सम्मान से जोड़ लिया और दुनिया में एक बेमिसाल मजदूर आंदोलन की शुरुआत की, जिसने लाखों परिवारों की आने वाली पीढिय़ों के भविष्य बदल दिए।
सेवा आज महिला सशक्तीकरण का दूसरा नाम बन चुका है जब सरकार  के तमाम गरीबी हटाओ कार्यक्रम नाकाम हो चुके, तब सेवा ने औरतों को परिवार में, समाज में फैसला करने की ताकत हसिल करने के लिए प्रेरित किया। ऐसे समय में जब नेतागिरी शब्द औरतों के लिए किसी अपमान के, यह हॅंसी उड़ाने के संदर्भ में ही इस्तेमाल होता था, सेवा ने गरीब खोमचे वालियों ,खेत मजदूरों, कारखाना मजदूरों, दस्तकारों और असंगठित  क्षेत्र में बिना किसी सुरक्षा काम करने वाली तमाम औरतों को नेता बनने की तालीम दी। उन्हें नई से नई तक्नालॉजी से मुखातिब होने के मौके दिए, हाशिये से मुख्य धारा में आने की राह दिखाई। सेवा की नेता आज दुनिया भर में महिलाओं के लिए एक मिसाल हंै। देश भर में और विदेश में भी महिलाओं के साथ अपने अनुभव बांटकर उन्हें आगे बढऩे में मदद कर रही हैं।  कभी  अहमदाबाद  में कपड़ा मिल मजदूर संगठन की वकील इला भट्ट के साथ 7 औरतों ने जो संगठन  70 के दशक की  शुरुआत में बनाया था ,आज कोई 13 लाख औरतें उसकी सदस्य हैं। दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री हों, मजदूर  संगठन या भारत के पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम या आज की अमरीकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन,  सेवा के सदस्यों ने अपनी सूझबूझ और वित्तीय प्रबन्धन की समझ का लोहा सबसे मनवाया है।
जर्रे से उठकर आसमान छूने के किस्से सेवा में आम हंै। आज के जमाने में जब तमाम तरक्की और दुनियाभर की ताकत, तमगों के बावजूद देश में गरीबी बढ़ती जा रही है सेवा की नीतियां काबिलेगौर हैं, जिन्होंने अपने सदस्यों को काली गरीबी से चक्रव्यूह से निकालकर  गरिमा और आत्मसमान से जीने के सब साधन दिए हैं- सेवा बैंक में  बैंकखाता, जरूरत पडऩे पर कजऱ् की सुविधा, जीवन जीने के लायक साक्षरता, उसके और उसके परिवार के लिए उसकी जेब को माफिक आए ऐसी स्वास्थ्य सेवा, उसे जीवन की मुसीबतों से बचाने के लिए बीमा, उसके छोटे-मोटे व्यापार धंधे के लिए बाजार, जमाने के साथ कदम मिलाने के लिए हुनर की तालीमें सब कुछ। इस संगठन की कहानी, और हमारी सरकारों की नाकामियों की कहानियों में इतना ही फर्क है कि सेवा गरीब को आवाज देती है, उसे फैसला करने  का अधिकार देती है उसकी समस्याओं को एक या दो तरफ से नहीं, हर तरफ से खत्म करती है। जैसे बनासकांठा के सूखाग्रस्त इलाकों को जल संवर्धन सिखाकर पानी की समस्या दूर करना, वहां की कसीदाकारी की परम्परा को जीवित कर के महिलाओं की आय का साधन पैदा करके  पलायन में  उल्लेखनीय कमी करने में कामयाबी हासिल करना, ऐसे कितने ही काम हैं जो सरकार शायद कभी नहीं कर पाती, लेकिन सेवा ने मुमकिन किए।
ऐसा इसलिए हुआ कि सेवा के सर्वोच्च नेतृत्व में देश में दूसरी आजादी लाने का सपना अभी जिंदा है, जिसके लिए वह जरूरत पड़े तो जद्दोजहद करने से, और जरूरत पड़े तो समझौते करने से नहीं चूकता। ऐसा इसलिए है कि उसकी सोच के केन्द्र में गरीबों की दुश्वारियां खत्म करने का मकसद हर बात से ऊपर है, ऐसा इसलिए है कि सेवा में देश की आधी आबादी को मजबूत बनाने की महज बात नहीं होती, यह काम होता है सेवा की बड़ी नेताओं, और जिनके लिए वह काम करती है, उन आम औरतों के सपनों में कोई फर्क नहीं है। जातपांत, मजहब सबसे ऊपर उठकर सेवा की सदस्य बस एक ही मकसद के लिए जुटी हुई है- दूसरी आजादी  पाने  के लिए, जो राजनीतिक नेताओं ने जनता से छीन ली। हर साल, हर मुसीबत के बीच वह अपने लिए आगे बढऩे के नए तरीके खोजती है, अपने तरीके से तक्नालॉजी पर हाथ आजमाती है, अपने तरीके से भाषा की सीमाएं लांघती है- लेकिन गरीबी से उबरने का उनका हौसला बढ़ता ही जाता है। ऐसा इसलिए है कि सेवा में जमीन पर मौजूद सदस्य की बात जितनी आसानी  से ऊपर जाती है, ऊपर बैठे नेतृत्व की बात भी उतनी ही आसानी से बिना रुकावट नीचे जमीनी स्तर तक आ जाती है।
गरीब ,आम औरतों  में यह हौसला इला भट्ट  जैसी नेताओं से आता है जो आज भी ऑटो रिक्शा में बैठकर सेवा के दफ्तर आ जाती हंै, तंबाकू के कारखानों के मशीनीकरण के कारण  बेरोजगार हुई जिन औरतों को दूसरा रोजगार जुटाने कपड़े बुनना सिखाया था, उनकी बुनी साडिय़ां, बिना कलफ किए पहनती हंै। उनके साथ बैठकर अपने डिब्बे से खाना खाती हंै, और उम्र के सातवें दशक में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के लिए वह किताब लिखती है, जो इन औरतों की कामयाबी  की कहानी है- वी आर पूअर, बट सो मैनी। इलाभट्ट से यह बात पुराने कपड़े बेचने वाली एक फेरी वाली ने कही, तो उनमें सेवा बैंक खड़ी करने का हौसला आया, लेकिन यही बात भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और अफसरों के लिए एक चेतावनी भी है। गरीब उनके बिना ही नहीं, उनके बावजूद आगे बढ़ सकते हंै। यह इलाभट्ट ने अपने कामों से, अपने जीवन से साबित किया है। आज सरकार के साथ सामाजिक संगठनों के संघर्ष के बहुत से वाकये हम देख रहे हंै जिनमें इन संंगठनों के कार्यकर्ता देश की आम जनता के हित में काम करने के लिए सरकार पर तरह तरह से दबाव डालते हैं और सरकार को एक सामाजिक एजेंडा अपनाने के लिए अपने तरीके से सरकार को मजबूर भी करते हंै, तब इला भट्ट और उनकी साथियों की कामयाबी भी अपनी तरह की एक मिसाल है।

आज सबसे बड़ा मुद्दा वह धोखा जो बाबा ने पूरे देश को दिया


5 जून 2011

सुनील कुमार
बाबा रामदेव के अनशन को देर रात दिल्ली पुलिस ने खत्म करवाया और वहां मौजूद भीड़ को हटा दिया। इसे लेकर देर रात से टीवी देख रहे लोगों के बीच एक हलचल मची रही और आज सुबह से शांतिभूषण जैसे बड़े वकील पुलिस की इस कार्रवाई को आपातकाल की याद दिलाने वाला बताने लगे और उन्होंने ऐसा लंबा-चौड़ा बयान दिया कि केन्द्र की इस सरकार को तुरंत हटाकर एक दूसरी काम चलाऊ सरकार बनाने की जरूरत है। आरएसएस और भाजपा की भी कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया बाबा रामदेव के समर्थन में है और उन्हें भी यह घटना आपातकाल जैसी लग रही है। लेकिन बाबा के साथ कल तक मंच पर रहे स्वामी अग्निवेश का कहना काफी कुछ अलग है। वे पुलिस की इस कार्रवाई को ज्यादती तो मान रहे हैं लेकिन उन्होंने बहुत खुलासे से ये सवाल उठाए कि बाबा रामदेव ने केन्द्र सरकार के साथ कोई गोपनीय लिखित समझौता आखिर क्यों किया? और ऐसा करने के बाद उन्होंने उनके साथ अनशन करने वाले लोगों को अंधेरे में क्यों रखा? देश भर के लोगों को यह बताया क्यों नहीं कि यह अनशन खत्म करने का समझौता उन्होंने पहले ही कर लिया है? स्वामी अग्निवेश ने ये सवाल उठाए कि बाबा रामदेव ने पारदर्शिता से काम क्यों नहीं किया?
आज हम दो मुद्दों पर यहां लिखने जा रहे हैं। एक तो यह कि शांतिपूर्ण दिख रहे इस अनशन को पुलिस ने इस तरह आधी रात के बाद क्यों खत्म करवाया? दूसरा यह कि बाबा रामदेव का यह पूरा अनशन कल रात तक क्या साबित हो चुका था और आज देश के सामने उनके अनशन को लेकर क्या मुद्दे रहने वाले थे, और हैं। इन दोनों बातों को अलग-अलग समझने की जरूरत इसलिए है कि पुलिस की लाठियां देखकर जिन लोगों के मन में लाठी के शिकार होने वाले लोगों के लिए हमदर्दी पैदा होती है उन लोगों को यह जानना चाहिए कि इतनी बड़ी भीड़ के खतरे क्या होते हैं। देश में जगह-जगह भीड़ की जगहों पर हादसे होते हैं और अगर इस भीड़ के बीच किसी भी वजह से भगदड़ फैली होती तो क्या होता? अगर शामियाने में आग लग गई होती, अगर बिजली बंद हो गई होती तो क्या होता? और अगर वहां 25-50 हजार की भीड़ थी तो  क्या उतने लोगों को दिन की रौशनी में दिल्ली की व्यस्त सड़कों पर वहां से हटाना समझदारी होती या नहीं होती? कुछ सवाल शांतिभूषण जैसे जानकार ने उठाए हैं कि एक शांतिपूर्ण अनशन को खत्म करवाने की पुलिस की कार्रवाई कैसे सही कही जा सकती है। शांतिभूषण आपातकाल में जेल में बंद रह चुके हैं और जनता पार्टी सरकार में वे केन्द्रीय मंत्री रहे हैं। इसलिए आपातकाल की उनकी यादों का ताजा रहना स्वाभाविक है। लेकिन पुलिस की यह कार्रवाई तो केन्द्र सरकार और बाबा रामदेव के बीच के एक गोपनीय, रहस्यमय और लिखित समझौते पर बाबा द्वारा अमल न करने से पैदा हुई नौबत से निपटने के लिए की गई दिखती है। कल शाम ही देश के सामने इस बात का खुलासा हो गया था कि देश को धोखे में रखकर बाबा रामदेव ने किस तरह अपने, उन्हीं की जुबान में एक करोड़ से दस करोड़ तक, लोगों को अनशन में झोंक दिया था। जिस अनशन की जमीन बाबा ने केन्द्र सरकार के साथ पता नहीं किन वजहों से सौदे में बेच सी दी थी, उसी जमीन को देश के लोगों को दिखाकर बाबा ने सपनों की एक अवैध कॉलोनी सी बना ली थी और लोगों को प्लॉट बांट दिए थे। यह धोखा एक छोटा धोखा नहीं था, देश के मीडिया पर एक किस्म से एकाधिकार कर लेने के बाद अगर सामाजिक जीवन का कोई नेता ऐसी बड़ी धोखाधड़ी देश के लोगों के साथ करता है तो उसने यह धोखाधड़ी उस भगवे कपड़े के साथ भी की है जिसका कि इस देश के एक बड़े तबके के बीच बड़ा सम्मान है, अपने नाम के साथ जुड़े बाबा शब्द के साथ भी धोखाधड़ी की है जिस नाम से बाबा आमटे जैसे लोग जाने जाते थे, उन्होंने अपने सन्यासी और योगी जैसे चोले के साथ भी धोखाधड़ी की है जिस पर कि इस देश की आबादी के एक हिस्से की बड़ी आस्था है, उन्होंने प्राचीन भारत से चली आ रही योग की परंपरा का भी अपमान किया है कि कोई योगी ऐसा धोखेबाज हो सकता है, और योग का नाम लेकर हो सकता है, उन्होंने आयुर्वेद के साथ भी धोखाधड़ी की है कि आयुर्वेद को बढ़ावा देने वाला कोई व्यक्ति सरकार के साथ 5-7 सितारा होटलों के भीतर बैठकर किए गए लिखित समझौतों में जनता से ऐसी धोखाधड़ी कर सकता है। इससे भी अधिक उन्होंने इस देश के सामाजिक आंदोलन के साथ धोखाधड़ी की है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने वाले लोग खुद अपने आचार व्यवहार में इस तरह भ्रष्ट हो सकते हैं कि जनता को इतना बड़ा धोखा दे दें।
हम यहां पर बाबा रामदेव की ही कही बातों को याद दिलाकर यह कहना चाहेंगे कि कल अगर सच में ही देश के करोड़ों लोगों ने अनशन किया था तो उसमें बहुत से लोग रोज कमाने-खाने वाले लोग रहे होंगे, उन्होंने कल वैसे वक्त उनको धोखा दिया जब वे तमाम लोग अपनी रोज की आदत के उल्टे, गर्मी में भूखे बैठे थे और अपनी रोजी खो रहे थे। दूसरी ओर बाबा दिल्ली की सबसे आलीशान होटल में केन्द्र सरकार की मेजबानी में एक गोपनीय समझौता कर रहे थे। इससे बड़ा धोखा इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने का दावा करने वाले आंदोलन द्वारा और क्या किया जा सकता था? हमारा मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन ने कल अपनी जो विश्वसनीयता खोई है वह किसी भी बाबा की विश्वसनीयता खोने से अधिक बड़ा नुकसान है। जनता की नजर में जब कोई मूर्तिभंजन होता है तो वह उस प्रतिमा के टुकड़े हो जाने से अधिक बड़ा नुकसान होता है। बाबा रामदेव ने कल देश के साथ जो धोखा किया है वह हाल के बरसों में सार्वजनिक जीवन में किया गया सबसे बड़ा धोखा है। हम इसे सबसे बड़ा इसलिए भी लिख रहे हैं कि खुद बाबा इसे एक करोड़ से शुरू होकर सौ करोड़ जनता तक फैल जाने वाला आंदोलन कह रहे थे और हम उनके दावे को चुनौती देने के बजाय इसे एक करोड़ से लेकर सौ करोड़ तक लोगों को धोखे के रूप में मानते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार को आधी रात के बाद भी पुलिसिया कार्रवाई की क्या जरूरत थी? बाबा तो सरकार से कह चुके थे कि उनका यह अनशन शांतिपूर्ण रहेगा। इस बारे में आज सुबह दिग्विजय सिंह के दिए हुए तर्क समझने की जरूरत है कि दिल्ली में अदालती आदेश से अनशन की जगह तय है, और रामलीला मैदान उसके लिए नहीं है। इस मैदान को बाबा ने योग शिविर के नाम पर लिया था और यह तो कल दिन भर देश ने टीवी पर देखा ही है कि बाबा ने वहां पर योग के अलावा सब कुछ किया। लेकिन यह भी एक छोटा तकनीकी भ्रष्टाचार था, जिसे अनदेखा किया जा सकता है। लेकिन बाबा के साथ इसी मंच पर साध्वी ऋतंभरा जैसे लोग बैठे हुए थे जो कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने वाले लोगों में अगुवा थे। 1992 में जब अयोध्या में इसी किस्म की भीड़ जुट रही थी तो राष्ट्रीय शांति परिषद की बैठक में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने यह भरोसा दिलाया था कि वहां पर कानून पूरी तरह काम करेगा और कोई गड़बड़ी नहीं होने दी जाएगी। लेकिन वहां पर क्या हुआ इसे पूरे देश ने देखा है और उसके बाद देश भर में जो हिंसक घटनाएं हुई हैं, उन्हें भी लोगों ने देखा कि किस तरह उनमें सैकड़ों लोगों की जानें गईं। इसलिए जब लाखों की भीड़ की कोई बात करता है तो सरकार के सामने उस भीड़ से परे भी लोगों की जिंदगी को बचाने और चलाने की जिम्मेदारी रहती है और उस भीड़ में किसी झांसे में पहुंच गए भक्तों को भी चूंकि खतरों का अंदाज नहीं रहता, इसलिए उनको भी बचाने की जिम्मेदारी सरकार पर ही आती है। इसलिए हमें सरकार की इस कार्रवाई के खिलाफ कोई तर्क नहीं दिखता और यह प्रशासन की अपनी सुविधा की बात रहती है कि ऐसी बड़ी भीड़ को रात की सूनी सड़कों पर दूर तक ले जाना आसान होगा या दिल्ली में दिन की भीड़ भरी सड़कों पर। फिर जब कभी ऐसी कार्रवाई होती है तो उससे पैदा होने वाली उत्तेजना को भी ध्यान में रखकर प्रशासन काम करता है। यह सिर्फ इसी मामले में नहीं हुआ है, देश भर में हर प्रदेश और हर शहर में जब कभी अनशन पर बैठे लोगों पर कार्रवाई होती है तो पुलिस ही उन्हें पकड़कर भी ले जाती है और अक्सर ऐसी कार्रवाई रात के अंधेरे में होती है। देश भर के राजनीतिक दलों, मजदूर और कर्मचारी संगठनों के अनशनों पर आए दिन ऐसी कार्रवाई कहीं न कहीं होती है और हमें हैरानी यह है कि शांतिभूषण जैसे समझदार व्यक्ति उस कार्रवाई को आपातकाल जैसी बता रहे हैं और केन्द्र सरकार को हटा देने की बात कह रहे हैं, जिस कार्रवाई के बिना हो सकता है कि अधिक लोगों की जान अधिक खतरे में पड़ी होती। बाबा रामदेव पर भरोसा रखने वाले लोग बिना अपनी सेहत का ख्याल किए हुए इस गर्मी में अगर अनशन पर बैठे रहते और उनमें से किसी की मौत हो जाती तो यह किस तरह का तनाव पैदा नहीं करता?
हम लोकतंत्र के भीतर ऐसी अराजकता के बिल्कुल खिलाफ हैं जिनमें बाबा रामदेव या कोई भी और व्यक्ति देश की जनता के साथ धोखाधड़ी करके कानून को तोडऩे के लिए भी तर्क ढूंढ ले और पूरी सरकार को अपने पैरों पर झुकाने का मजा सा लेते दिखे। कल ही हमने बाबा रामदेव पर लिखे संपादकीय में इसी जगह पर उन्हें आत्मकेन्द्रित, आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी और कमसमझ व्यक्ति लिखा था। तब तक केन्द्र सरकार के साथ उनका लिखित समझौता हमारी जानकारी में नहीं आया था। आज हम इसमें दो विशेषण और जोडऩा चाहेंगे, बाबा रामदेव पारदर्शिता से दूर, गैरजिम्मेदार और पूरे देश को धोखा देने वाले साबित हुए हैं। हो सकता है कि भ्रष्टाचार के उनके मुद्दे को लेकर जनता का एक तबका अब भी उन्हें भला माने और इस मुद्दे की वजह से उनका सम्मान करे। लेकिन हमारा मानना है कि एक तानाशाह के अंदाज में वे जिस कमसमझ के साथ यह अभियान चला रहे थे उसका लोकतंत्र से कुछ भी लेना-देना नहीं था और किसी भी धर्म या योग-आध्यात्म के बैनर तले एक सही दिखते मुद्दे के लिए भी चल रही तानाशाही को खारिज ही किया जाना चाहिए। भारत के लोकतंत्र में अपनी खामियों को सुधारने के लिए पर्याप्त गुंजाइश है और यहां की संवैधानिक संस्थाएं इस बारे में बहुत काम कर भी रही हैं, केन्द्र सरकार ने बाबा रामदेव को जो अभूतपूर्व और ऐतिहासिक महत्व दिया है वह भी एक किस्म से अलोकतांत्रिक रहा है। हम केन्द्र सरकार को भी इस बात के लिए दोषी मानते हैं कि वह अन्ना हजारे से लेकर बाबा रामदेव तक कुछ लोगों को संविधान की व्यवस्था से परे जाकर महत्व दे रही है और जनता के सामने एक ऐसा माहौल पेश कर रही है कि इन गिने-चुने लोगों को वह देश की जनता का प्रतिनिधि मानती है। लोकतंत्र में प्रतिनिधि बनने के लिए एक बहुत साफ-साफ रास्ता है चुनाव का। उससे परे किसी सरकार द्वारा किसी एक टोली को पूरे का पूरा, और अकेले उसी को पूरे समाज का प्रतिनिधि मान लेना गलत मानते हैं।
हम पुलिस की कार्रवाई की तस्वीरों की छाया में बाबा की धोखाधड़ी को दब जाने देना नहीं चाहते। पुलिस ने तो इतनी भीड़ को हटाते हुए कोई बड़ा नुकसान नहीं होने दिया जिससे कि उसकी नीयत साफ है लेकिन बाबा ने देश के साथ जो किया है, अगर किसी में समझ है तो उसे बाबा से इसका जवाब मांगना चाहिए। भीड़ में और कीर्तन में एक साथ हिलते हुए सिर तर्क और न्याय के बहुत सवाल नहीं करते लेकिन यह मौका ऐसे सवालों का है। बाबा रामदेव का आचरण उनके उठाए हुए मुद्दों से मेल नहीं खाता और न ही पुलिस कार्रवाई को बाबा रामदेव के आचरण को माफ कर देने वाला मान लेना चाहिए। आज देश के सामने सबसे बड़ा मुद्दा वह धोखा है जो दो दिन से बाबा रामदेव मासूम लोगों को दे रहे थे।
हम एक बात को यहां पर और जोर देकर लिखना चाहते हैं कि जो लोग धोखेबाजी के इस अनशन के समर्थन में जालियांवाला बाग की मिसालें दे रहे हैं वे इस देश के शहीदों का बहुत बड़ा अपमान भी कर रहे हैं। एक अंग्रेज अफसर ने वहां बैसाखी के दिन गोलियां चलवाई थीं जिनमें 379 लोग मारे गए थे और 1100 लोग घायल हुए थे। अंग्रेज सरकार के इन आंकड़ों के खिलाफ कांग्रेस ने इन मौतों को करीब एक हजार बताया था। इतिहास के किसी भी पन्ने को उठाकर इस तरह किसी भी घटना पर लागू कर देने वाले किसी बाबा के कीर्तन में हिलने वाले सिर तो हो सकते हैं, दिमाग नहीं।
 

बाबा के दीवानों से कुछ बातें...


4 जून 2011
बाबा रामदेव को लेकर लिखने का आज जी तो नहीं कर रहा है लेकिन खबरों में वे इस कदर छाए हुए हैं कि लोगों को यह उम्मीद होगी कि उनके बारे में कुछ और अधिक चर्चा हो। और हमारी चर्चा जनसैलाब की भावनाओं से कुछ हटकर है इसलिए उसे यहां लिखने में कोई हर्ज नहीं है और यह बात शायद पढऩे के लायक बन जाए। आज सुबह-सुबह बाबा के मंच पर साध्वी ऋतंभरा का लंबा-चौड़ा भाषण हुआ और बाबा ने साध्वी को देश की पचास-साठ करोड़ लड़कियों-महिलाओं के लिए आदर्श और पे्ररणास्रोत बताया। बाबा और साध्वी में सिर्फ एक फर्क है कि 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई तो उस वक्त बाबा का कहीं नामो-निशान नहीं था और साध्वी खुशी से कूद रही थीं। लेकिन अब जब बाबा ने साध्वी की स्तुति में उन्हें पूरे देश की न सिर्फ माताओं और बहनों का पे्रेरणास्रोत बताया बल्कि भाईयों पर भी यह बात लागू होने की बात कही तो यह जाहिर है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के बुनियादी मकसद के तहत भी साम्प्रदायिकता और हिंसा की तरफ बाबा की सोच क्या है?
इंटरनेट पर ट्विटर और फेसबुक जैसी वेबसाईटों पर आज सुबह से बहस कुछ बढ़ गई है और बहुत से नामी-गिरामी और बहुत से साधारण लोग इस शास्त्रार्थ में जुट गए हैं कि साम्प्रदायिक लोगों का इस आंदोलन में जोड़ा जाना ठीक है या नहीं है। और अभी दोपहर एक बजे जब हम यह बात लिख रहे हैं तब यह खबर आ रही है कि कल तक बाबा और अन्ना के साथ-साथ जो स्वामी अग्निवेश जुड़े हुए थे वे आज बाबा से कुछ कतराते दिख रहे हैं और शायद अन्ना भी साध्वी वाले मंच पर आने से कतरा सकते हैं। दरअसल दुनिया के इतिहास में बहुत से ऐसे तानाशाह हुए हैं जिन्होंने अपने आंदोलन, अभियान या लड़ाई की शुरुआत बहुत ही महान दिखने वाले मकसद को लेकर शुरू की, जिनकी बातें और जिनके नारे बहुत ही महान रहे, जिन्होंने अपने देश के भीतर के लोगों को एक करने के लिए एक घोर और आक्रामक राष्ट्रवाद का नारा उछाला। ऐसे इतिहास को देखने के बाद आज जब बाबा रामदेव के इस आंदोलन को समझने की कोशिश की जाए तो यह साफ होता है कि साम्प्रदायिकता से किसी भी किस्म के परहेज के बिना का यह आंदोलन उन मध्यमवर्गीय औसत राजनीतिक समझ के लोगों को बहुत जानदार और शानदार लग सकता है जिन्हें मोदी का गुजरात बहुत अच्छा लगता है। लेकिन बाबरी मस्जिद को गिराकर जिन लोगों ने इस देश को एक अभूतपूर्व हिंसा में झोंक दिया था, उन लोगों को साथ रखकर अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आंदोलन चलता है तो उसकी विश्वसनीयता इस देश के एक बहुत बड़े तबके में शून्य होगी। और यह बहुत बड़ा तबका सिर्फ उन अल्पसंख्यक मुस्लिमों का नहीं है जिन पर अयोध्या में साध्वियों ने कुदाली चलाई थी बल्कि इस देश के उन तमाम अमनपसंद लोगों का तबका भी है, धर्मनिरपेक्ष लोगों का तबका भी है जो कि अयोध्या में कानून हाथ में लेने के खिलाफ थे, और आज भी हैं। जिन लोगों को इतिहास और असल राजनीति की समझ कम है, वे लोग बाबा के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को एक सीधा-सादा आंदोलन मानने की चूक कर सकते हैं, लेकिन ऐसी नासमझी आज भीड़ बढ़ाने के अलावा और किसी काम नहीं आएगी। और एक भीड़ सब कुछ साबित नहीं करती, लोकतंत्र में जब मतपेटियों के भीतर भीड़ जुटती है तो वह मायने रखती है। आज भ्रष्टाचार से थकी हुई जनता के मन में सरकार के लिए जो नफरत है वह बाबा को समर्थन की शक्ल में सामने आ रही है, अन्ना को समर्थन की शक्ल में काम आ रही है। यह भी है कि साम्प्रदायिकता से परहेज न रखने वाले लोग, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ अधिक मुखर लोग, दिल और जुबान पर नफरत करने वाले लोग अधिक बोलते हैं और उनकी मौजूदगी असल से अधिक दिखती है। लेकिन अगर ऐसा हुआ रहता तो जनता के वोटों से ही राममंदिर बन गया होता। जब अटल सरकार का इंडिया शाइन कर रहा था तब भी जनता ने, और यह तो आंकड़े ही हैं कि मंदिर वाले धर्म के लोगों की बहुतायत वोटरों में है, मंदिरमार्गियों के खिलाफ वोट दिया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की नफरत अन्ना और बाबा की शक्ल में एक राह मिली है और यह नफरत किसी ज्वालामुखी से निकले लावे की तरह बह चली है। लेकिन न तो बाबा के पास किसी तरह की योजना है और न ही इस तात्कालिक जनसमर्थन से परे उनकी अलग से कोई ठोंकी-परखी गई विश्वसनीयता है। जब उनका आंदोलन साम्प्रदायिक लोगों की स्तुति पर चल रहा है तो चाहे उसे आज जनता के एक तबके का साथ मिल रहा हो, उसकी अपनी साख बहुत कम है। किसी विचलित या भावना से भरी हुई या उत्तेजित भीड़ में सिर बहुत होते हैं लेकिन उतने दिमाग भी हों ऐसा जरूरी नहीं होता। आज की यूपीए सरकार ने अपने अनगिनत कुकर्मों के चलते बाबा के सामने जिस तरह दंडवत होकर लोकतंत्र की साख को चौपट किया है, उससे भी आम जनता के बीच बाबा को एक नई शोहरत मिली है। लोगों को यह लगा कि जिसे इस देश की सरकार इतनी गंभीरता से ले रही है उसे जनता क्यों गंभीरता से न ले। लेकिन इस तात्कालिक सोच से परे अगर बाबा के नारों को देखें तो वे तमाम देश की अर्थव्यवस्था को लेकर हैं और उनमें अर्थव्यवस्था की समझ बहुत कम है और लोगों को राहत देने या उकसाने वाली बातें अधिक हैं।
हम ऐसा कोई आंदोलन लोकतंत्र के भीतर नहीं देखते जिसमें कि आंदोलन का मुखिया सारे वक्त सिर्फ अपने-आपको लेकर बातें करता हो और वह आंदोलन इतिहास गढ़ सके। बाबा रामदेव की बातों को अगर कुछ घंटे सुना जाए तो उनके बारे में जो विशेषण हमें सूझते हैं, वे एक आत्मकेंद्रित, आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी और कम समझ इंसान के दिखते हैं। उनकी यह बात सुनकर समझदार को सिर्फ हंसी आ सकती है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के बीच अचानक ही देश में प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव की मांग को जोड़ रहे हैं और अपनी तमाम मांगों के पूरे हो जाने तक वे अनशन जारी रखने की घोषणा कर रहे हैं। क्या भारतीय लोकतंत्र में आम्बेडकर से लेकर नेहरू और पटेल तक, देश के बड़े-बड़े संविधान विशेषज्ञों तक सबकी सारी सोच को आज रामलीला मैदान के मंच पर झूमते हुए बाबा के पैरों तले कुचल देना लोकतंत्र है? बाबा की चुनाव प्रणाली को लेकर, शासन-व्यवस्था को लेकर कितनी समझ है कि वे एक नारे के रूप में प्रधानमंत्री के सीधे चुनाव की बात कहें और इसके पूरे न होने पर देश की सरकार को आमरण-अनशन की धमकी दें? यह पूरा सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और भ्रष्टाचार से घायल जनता को इसमें एक मरहम दिख रहा है लेकिन यह मरहम किसी तरह का स्थाई इलाज नहीं है। सिर्फ एक सरकार जो कि कटघरे में खड़ी है और जिसके जेल जाने की गारंटी है, वही ऐसे बाबा को इतनी गंभीरता से लेकर दंडवत प्रणाम कर सकती है। अगर ऐसा नहीं है तो कांगे्रस पार्टी इतनी चतुर या धूर्त भी हो सकती है कि वह अन्ना के ए और बाबा के बी के बीच एक चौड़ी खाई खड़ी कर रही हो।

बेहतर और बदतर के बीच

6 जुलाई 08
टेक्नालॉजी को देखें तो सामानों का आकार छोटा होते जा रहा है। पहले एक बड़े गोदाम से अधिक क्षमता का कम्प्यूटर अब जेब में आ जाता है। मोटर सायकिलें पहले से आधे वजन की हो गई हैं। टेलीविजन की मोटाईं पहले से बीसवां हिस्सा रह गई है ओर उसकी क्वालिटी पहले से हजार गुना बेहतर हो गई है। बिजली के बल्ब पहले के मुकाबले पचीसवां हिस्सा भी बिजली नहीं खाते और रौशनी सौ गुना देते हैं। कुल मिलाकर देखें तो तीस से साठ बरस के लोगों के मुकाबिले अब पांचवीं से कम से बच्चे अधिक तेज हो गए हैं। यह साबित करने में बड़े-बड़े लोगों को पसीना आ जाता है कि वे पांचवीं के बच्चों के मुकाबिले थोड़ा-बहुत तो जानते हैं।
टे्रनें तेज हो रही हैं, टेलीफोन छोटे और बेहतर हो रहे हैं, कॉल्स सस्ती हो रही हैं, खेतों की उपज बढ़ रही है, मुर्गीखानों में अंडे बढ़ रहे हैं, फूलों का आकार बढ़ रहा है और उनके रंग बेहतर किए जा रहे हैं। लेकिन यह सब तो विज्ञान और टेक्नालॉजी की बात है। इंसान अपने-आपको क्या बेहतरी की इस रफ्तार के मुकाबिले कुछ बेहतर भी बना रहा है?
लोगों के बीच फर्क बहुत है, बहुत से लोग अपने को बेहतर बना रहे हैं लेकिन बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने बेहतरी का जिम्मा पूरे का पूरा सिर्फ मशीनों पर छोड़ दिया है। मशीनें कुछ लोगों के हाथों में हथियारों की तरह हो गई हैं और उनका इस्तेमाल करने वे और लोगों को गुलाम बनाकर कबीलाई सरदार की तरह राज कर रहे हैं। वे जंगली अंदाज में अपनी ताकत बढ़ाकर दूसरों के बल पर अपनी जिंदगी बेहतर बना रहे हैं, खुद को बेहतर बनाकर नहीं।
लेकिन ऐसी जंगली ताकत से परे बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें केवल अपने बूते जीना रहता है, जो परजीवी नहीं हैं, लेकिन ऐसे लोग भी अपने-आपको बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। यह बेहतरी जिंदगी के मूल्यों से लेकर हुनर तक और हुनर से सुधार तक, कई किस्म की हो सकती है। यह अमरीकियों की तरह बेहतर कम्प्यूटर प्रोग्राम भी हो सकता है या चीनियों की तरह सामान को सस्ती बनाने का हुनर। यह जापानियों की तरह उपभोक्ता उपकरणों को बेहतर बनाना भी हो सकता है या पंजाबियों की तरह दुनिया भर में लाकर काम करने का हुनर।
लोगों के बीच उत्कृष्टïता बढ़ाने का मतलब सिर्फ बाजारू मुकाबिले में अधिक कामयाब होना नहीं है, उत्कृष्टïता तो इंसानियत में भी हो सकती है, जहां मदर टेरेसा दुनिया के दूसरे कोने से आकर भातर के अनाथ बच्चों को जिंदगी देने का काम करती है या छत्तीसगढ़ की मितानिन जिस तरह नवजात शिशुओं और मौत के बीच ढाल बनकर खड़ी हो जाती है।
लोगों को बदले वक्त के मुताबिक सोचना होगा कि अपने बोलने, सोचने, काम करने और विचलित होने में वे कैसी किफायत वाली कटौती कर सकते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि हर हफ्ते दस के करीब लेख या  संपादकीय या कॉलम लिखते-लिखते कहीं मैं अपने सीमित हुनर के साथ ज्यादती तो नहीं कर रहा हूँ? लेकिन जब इस नौबत से अपने को बचाने के लिए मैं फिजूल की गपबाजी में बैठना भी बंद करता हूँ। जब अपने पढऩे, टीवी देखने, रेडियो सुनने, और लोगों से मिलने को लेकर चौकन्ना हो जाता हूँ, तो लगता है कि उन दिनों को सोचना कुछ बेहतर होता है। जिस दिन भी किसी अनचाही बहस में घंटे-दो घंटे खराब होते हैं, तो सोचना-विचारना तक बिगडऩे लगता है। उसका सीधा असर बहुत सतही या औसत किस्म के लिखने की शक्ल में सामने आता है।
रोज की जिंदगी में छोटी-छोटी फिजूलखर्ची को काटकर जब तक किफायत नहीं करती जाएगी, बेहतरी आएगी कहां से? आज ही मैं एक दोस्त से बातचीत में कह रहा था कि कुदरत ने इंसानी जिस्म को ऐसा बनाया है कि जब शरीर के जिस हिस्से को अनुभव करना हो, तभी दिमाग वहां से आते संकेतों को दर्ज करता है। रात में सोते हुए कानों में आवाज तो पड़ती ही है लेकिन दिमाग उनको लगभग पूरी तरह नकार देता है। कोई जोर की आवाज हो, तो ही सुनाई पड़ती है, तभी नींद खुलती है। बदन से स्पर्श, गंध, आवाज दिखाने, और चखने के सारे संकेत अगर सारे समय दिमाग में दर्ज होंगे, तो दिमाग काम का कोई काम कर ही नहीं सकेगा।
इसलिए जरूरत यह रहती है कि हम तमाम वार्ता में से गैरजरूरी हिस्सों का संपादन करते चलें और वक्त को कुद खाली रखें। खाली वक्त के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन से भी कई किस्म के सुधार होते हैं। आज जिस जिंदगी को सामाजिक दायरा माना जाता है, वह दायरा अधिकांश मामलों में उत्पादकता विरोधी, उत्कृष्टïता विरोधी होते चल रहा है। सामाजिक प्राणी होने की अपनी परिभाषा पर खरा उतरने के लिए इंसान अमूमन ऐसे सामाजिक होते चल रहा है कि उससे समाज की वक्त बरबादी ही हो रही है।
पिछले कुछ महीनों में मैंने कुछ अधिक चुप रहने कुछ कम मिलने, कुछ अनसुना करने, कुछ अनदेखा करने और कुछ मामलों में मन की बात मन में रखने के फायदे देखें हैं। इनसे समझ आया कि बहुत से लोग मौन व्रत लेकर, ध्यान करके, एकांतवास करके किस तरह अपने आपको बेहतर समझ पाते हैं।
अखबार के धंधे में तो पूरी जिंदगी ही संपादन करते गुजर गई, लेकिन, बोलने-सुनने-मिलने पर संपादन करने का फायदा मैंने अभी-अभी इतने जाहिर तरीके से देखा। मैं यह तो नहीं कहता कि इससे मेरी जिंदगी में सब कुछ बेहतर हो गया, लेकिन यह जरूर कह सकता हूँ कि कई बातें बदतर होने से बच गईं।
-सुनील कुमार

देखे सुने सब कुछ को लिखने की हड़बड़ ईमानदारी

29 जून 2008
लेखक और पत्रकार समय-समय पर इस बात को अपना हक मान लेते हैं कि किसी निजी बातचीत को वे अपने समझे जनहित के हिसाब से या अपनी किताब के अधिक बिकने की संभावना पैदा करने के लिए लिख डालें। कुछ लेखक-पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने देखें दायरे और अपने से हुई किसी की बातचीत का बहुत खुलासे से ब्यौरा देते हैं और उनकी भाषा और लिखने के अंदाज के कारण उनका वह हिस्सा बहुत लोकप्रिय भी हो जाता है। ऐसे दिग्गज लेखकों के लिखने की ऐसी आंखों देखी शैली उनके नाम के साथ जुड़ भी जाती है। पिछले दिनों एक पत्रकार की लिखी एक किताब की चर्चा निकली तो उसे पलट या पढ़ चुके एक पेशेवर पाठक ने  मुझसे कहा कि इस किताब की शैली फलां बड़े, नोबल पुरस्कार विजेता लेखक के अंदाज में है लेकिन उसकी उत्कृष्टïता को कहीं छू भी नहीं गई है।
मैंने इस किताब को उधार लेकर इसके कुछ हिस्से पढ़े। इसलिए कि उन हिस्सों में मेरे परिचित कुछ लोगों के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया था।किताब की बाकी जानकारियां तो मोटेतौर पर मेरी अलग-अलग जगहों पर पढ़ी हुई थी और उन्हीं तथ्यों को एक लेखक के बहुत स्पष्टï पूर्वाग्रह के साथ दुबारा पढऩे जितनी दिलचस्पी मुझे नहीं थी। लेकिन मैं अपने परिचित कुछ लोगों का चित्रण उस किताब में देखना चाहता था।
पढ़ते-पढ़ते एक निराशा हुई कि कोई जाना-माना पेशेवर लेखक किस तरह अप्रासंगिक और संदर्भहीन बातों को उन लोगों के खिलाफ लिख सकता है जिन लोगों ने उसे मांगने पर समय दिया और सामान्य शिष्टïाचार का सत्कार भी किया। महत्वहीन बातों पर पन्ने खराब होना मेरे लिए उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था जितना यह खतरनाक बात थी कि किसी लेखक या पत्रकार से बात करने का मतलब अपने खिलाफ उसे लिखने का एक मौका देना है और यह खतरा उठाना है कि कोई व्यक्ति किस तरह आपके शिष्टïाचार का बेजा इस्तेमाल कर सकता है।
मुझे लिखने के पेशे को लेकर यह लगता है कि लेखक या पत्रकार को बहुत सतही और तात्कालिक उपलब्धि के लिए लोगों का भरोसा नहीं तोडऩा चाहिए। इसलिए कि वह लेखक या पत्रकार तो शायद उस नेता या अफसर या अपने हमपेशा से दुबारा न मिले और उसे तो एक अघोषित विश्वास को तोडऩे का नुकसान न झेलना पड़े, लेकिन जब उसके पेशे का कोई दूसरा कलमकार वहां पहुंचेगा तो क्या उसे वैसा सामान्य शिष्टïाचार मिल सकेगा? और शिष्टïाचार से परे, क्या उसे वैसी जानकारी कोई घायल व्यक्ति देना चाहेगा? अपने नफे के लिए, अगर यह सचमुच कोई नफा है तो, पूरे पेशे को नुकसान में डालना किस तरह की ईमानदारी है? आज अगर कोई पत्रकार किसी की बताई ऐसी बात को कहीं लिख मारता है जो उसने आपसी समझ के भरोसे में कही थी तो क्या अगली बार ऐसी किसी आपसी समझ के लिए भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे पत्रकार को ईमानदारी से कोई बात कहेगा?
ऐसा काम करने वाले लेखकों और पत्रकारों, खासकर पत्रकारों, के बीच मैंने यह खतरनाक सोच देखी है कि किसी सूचना के साथ वे सामाजिक हित, जनहित या पेशे के लिए ईमानदारी का निष्कर्ष आनन-फानन निकालकर उसे पन्नों पर परोस देने को बेसब्र रहते हैं। जबकि लेखन या पत्रकारिता जैसे पेशे को नुकसान पहुंचाने वाली बातें व्यापक जनहित में नहीं हो सकतीं। इन दोनों कामों से लोकतंत्र का इतिहास भी जुड़ा हुआ है और भविष्य में भी जुड़ा रहेगा। दो-चार कलमें तो आती-जाती रहेंगी लेकिन ये अगर किडनी कांड की तरह डॉक्टरी के पेशे को बदनाम करेंगी तो उससे पूरे पेशे की साख खराब होगी और बिना साख वाला लिखने-छपने का धंधा लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
साहित्य के पाठकों को याद होगा कि तीनेक साल पहले एक लेखक-पत्रकार ने अपनी एक इलाके की यात्रा को ऐसे अंदाज में खुलासे से लिखा था मानो वह सेक्स पर्यटन के लिए कुख्यात किसी देश से लौटकर वहां के अनजान लोगों के साथ अपने देह संबंध के बारे में लिख रहे हों। अपने दायरे के शहर, समय और परिचित लोगों के बारे में खुलकर लिखते हुए जब कोई उन्हें इस कदर नंगा करने पर उतारू हो जाए तो शिष्टïाचार की बात तो अलग रही, इंसान का इंसान पर से ही विश्वास उठ जाता है। न ऐसे लेखक आगे प्रतिष्ठïा पा सकते और न ही इन लेखकों से घायल लोग किसी दूसरे लेखक को अपना वक्त देते और न ही अपनी देह।
सामान्य पाठकों को मेरी इस बात में एक बड़ी खामी लग सकती है। अखबारों में देशभर में प्रचलित और लोकप्रिय अंगे्रजी के एक स्तंभकार खुशवंत सिंह का लिखा चटखारे लेकर पढ़ा जाता है। जितने खुलासे से वे अपने जीवन के नारी पात्रों की शिनाख्त के साथ लिखते हैं उससे उन्होंने विश्वासहीन संबंधों पर आधारित संस्मरण लेखक की एक नई शैली शुरू की है। लोग यह कह सकते हैं कि मेरी तमाम बातें बहुत दकियानूसी और पुराने ख्याल की हैं, क्योंकि खुशवंत सिंह जैसे लोग तो मेनका गांधी के बारे में सेक्स शब्दावली में लिखकर भी चर्चित और सफल हैं और अखबार उन्हें छापने पर उतारू रहते हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि कोई भी गंभीर व्यक्ति कोई ईमानदार राज ऐसे लेखक के साथ कभी नहीं बांटेगा, क्योंकि ऐसा लेखक कब किसके कपड़े उघाड़ दे क्या पता?
यह तो बात हुई खुशवंत सिंह जैसे बूढ़े और तीन पीढ़ी पहले के इंसान की। लेकिन आज तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टेक्नालॉजी ने लोगों के मन में किसी भी आपसी बातचीत के लिए सम्मान पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब खुफिया कैमरा या माइक्रोफोन, या मोबाइल फोन की रिकॉर्डिंग सुविधा ने स्टिंग ऑपरेशनों का सिलसिला चलाकर आपसी समझ या 'ऑफ द रिकॉर्डÓ जैसी पेशेवर बारीकियों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसीलिए आज बहुत से दफ्तरों में, नेताओं-अफसरों के घरों में फोन लेकर घुसना भी बंद करवा दिया गया है। लेकिन इससे भी उन लेखकों के आंख-कान और दिमाग पर रोक तो नहीं लग सकती जो किसी से उन्हें मिले समय का बेवजह का बेजा इस्तेमाल उन्हीं लोगों के खिलाफ करते हुए अपने पेशे का नुकसान भी नहीं समझते।


- सुनील कुमार

देखे सुने सब कुछ को लिखने की हड़बड़ ईमानदारी

29 जून 08

लेखक और पत्रकार समय-समय पर इस बात को अपना हक मान लेते हैं कि किसी निजी बातचीत को वे अपने समझे जनहित के हिसाब से या अपनी किताब के अधिक बिकने की संभावना पैदा करने के लिए लिख डालें। कुछ लेखक-पत्रकार ऐसे रहते हैं जो अपने देखें दायरे और अपने से हुई किसी की बातचीत का बहुत खुलासे से ब्यौरा देते हैं और उनकी भाषा और लिखने के अंदाज के कारण उनका वह हिस्सा बहुत लोकप्रिय भी हो जाता है। ऐसे दिग्गज लेखकों के लिखने की ऐसी आंखों देखी शैली उनके नाम के साथ जुड़ भी जाती है। पिछले दिनों एक पत्रकार की लिखी एक किताब की चर्चा निकली तो उसे पलट या पढ़ चुके एक पेशेवर पाठक ने  मुझसे कहा कि इस किताब की शैली फलां बड़े, नोबल पुरस्कार विजेता लेखक के अंदाज में है लेकिन उसकी उत्कृष्टïता को कहीं छू भी नहीं गई है।
मैंने इस किताब को उधार लेकर इसके कुछ हिस्से पढ़े। इसलिए कि उन हिस्सों में मेरे परिचित कुछ लोगों के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया था।किताब की बाकी जानकारियां तो मोटेतौर पर मेरी अलग-अलग जगहों पर पढ़ी हुई थी और उन्हीं तथ्यों को एक लेखक के बहुत स्पष्टï पूर्वाग्रह के साथ दुबारा पढऩे जितनी दिलचस्पी मुझे नहीं थी। लेकिन मैं अपने परिचित कुछ लोगों का चित्रण उस किताब में देखना चाहता था।
पढ़ते-पढ़ते एक निराशा हुई कि कोई जाना-माना पेशेवर लेखक किस तरह अप्रासंगिक और संदर्भहीन बातों को उन लोगों के खिलाफ लिख सकता है जिन लोगों ने उसे मांगने पर समय दिया और सामान्य शिष्टïाचार का सत्कार भी किया। महत्वहीन बातों पर पन्ने खराब होना मेरे लिए उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं था जितना यह खतरनाक बात थी कि किसी लेखक या पत्रकार से बात करने का मतलब अपने खिलाफ उसे लिखने का एक मौका देना है और यह खतरा उठाना है कि कोई व्यक्ति किस तरह आपके शिष्टïाचार का बेजा इस्तेमाल कर सकता है।
मुझे लिखने के पेशे को लेकर यह लगता है कि लेखक या पत्रकार को बहुत सतही और तात्कालिक उपलब्धि के लिए लोगों का भरोसा नहीं तोडऩा चाहिए। इसलिए कि वह लेखक या पत्रकार तो शायद उस नेता या अफसर या अपने हमपेशा से दुबारा न मिले और उसे तो एक अघोषित विश्वास को तोडऩे का नुकसान न झेलना पड़े, लेकिन जब उसके पेशे का कोई दूसरा कलमकार वहां पहुंचेगा तो क्या उसे वैसा सामान्य शिष्टïाचार मिल सकेगा? और शिष्टïाचार से परे, क्या उसे वैसी जानकारी कोई घायल व्यक्ति देना चाहेगा? अपने नफे के लिए, अगर यह सचमुच कोई नफा है तो, पूरे पेशे को नुकसान में डालना किस तरह की ईमानदारी है? आज अगर कोई पत्रकार किसी की बताई ऐसी बात को कहीं लिख मारता है जो उसने आपसी समझ के भरोसे में कही थी तो क्या अगली बार ऐसी किसी आपसी समझ के लिए भी कोई व्यक्ति किसी दूसरे पत्रकार को ईमानदारी से कोई बात कहेगा?
ऐसा काम करने वाले लेखकों और पत्रकारों, खासकर पत्रकारों, के बीच मैंने यह खतरनाक सोच देखी है कि किसी सूचना के साथ वे सामाजिक हित, जनहित या पेशे के लिए ईमानदारी का निष्कर्ष आनन-फानन निकालकर उसे पन्नों पर परोस देने को बेसब्र रहते हैं। जबकि लेखन या पत्रकारिता जैसे पेशे को नुकसान पहुंचाने वाली बातें व्यापक जनहित में नहीं हो सकतीं। इन दोनों कामों से लोकतंत्र का इतिहास भी जुड़ा हुआ है और भविष्य भी जुड़ा रहेगा। दो-चार कलमें तो आती-जाती रहेंगी लेकिन ये अगर किडनी कांड की तरह डॉक्टरी के पेशे को बदनाम करेंगी तो उससे पूरे पेशे की साख खराब होगी और बिना साख वाला लिखने-छपने का धंधा लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
साहित्य के पाठकों को याद होगा कि तीनेक साल पहले एक लेखक-पत्रकार ने अपनी एक इलाके की यात्रा को ऐसे अंदाज में खुलासे से लिखा था मानो वह सेक्स पर्यटन के लिए कुख्यात किसी देश से लौटकर वहां के अनजान लोगों के साथ अपने देह संबंध के बारे में लिख रहे हों। अपने दायरे के शहर, समय और परिचित लोगों के बारे में खुलकर लिखते हुए जब कोई उन्हें इस कदर नंगा करने पर उतारू हो जाए तो शिष्टïाचार की बात तो अलग रही, इंसान का इंसान पर से ही विश्वास उठ जाता है। न ऐसे लेखक आगे प्रतिष्ठïा पा सकते और न ही इन लेखकों से घायल लोग किसी दूसरे लेखक को अपना वक्त देते और न ही अपनी देह।
सामान्य पाठकों को मेरी इस बात में एक बड़ी खामी लग सकती है। अखबारों में देशभर में प्रचलित और लोकप्रिय अंगे्रजी के एक स्तंभकार खुशवंत सिंह का लिखा चटखारे लेकर पढ़ा जाता है। जितने खुलासे से वे अपने जीवन के नारी पात्रों की शिनाख्त के साथ लिखते हैं उससे उन्होंने विश्वासहीन संबंधों पर आधारित संस्मरण लेखक की एक नई शैली शुरू की है। लोग यह कह सकते हैं कि मेरी तमाम बातें बहुत दकियानूसी और पुराने ख्याल की हैं, क्योंकि खुशवंत सिंह जैसे लोग तो मेनका गांधी के बारे में सेक्स शब्दावली में लिखकर भी चर्चित और सफल हैं और अखबार उन्हें छापने पर उतारू रहते हैं। लेकिन मेरा यह मानना है कि कोई भी गंभीर व्यक्ति कोई ईमानदार राज ऐसे लेखक के साथ कभी नहीं बांटेगा, क्योंकि ऐसा लेखक कब किसके कपड़े उघाड़ दे क्या पता?
यह तो बात हुई खुशवंत सिंह जैसे बूढ़े और तीन पीढ़ी पहले के इंसान की। लेकिन आज तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की टेक्नालॉजी ने लोगों के मन में किसी भी आपसी बातचीत के लिए सम्मान पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब खुफिया कैमरा या माइक्रोफोन, या मोबाइल फोन की रिकॉर्डिंग सुविधा ने स्टिंग ऑपरेशनों का सिलसिला चलाकर आपसी समझ या 'ऑफ द रिकॉर्डÓ जैसी पेशेवर बारीकियों को पूरी तरह खत्म कर दिया है। इसीलिए आज बहुत से दफ्तरों में, नेताओं-अफसरों के घरों में फोन लेकर घुसना भी बंद करवा दिया गया है। लेकिन इससे भी उन लेखकों के आंख-कान और दिमाग पर रोक तो नहीं लग सकती जो किसी से उन्हें मिले समय का बेवजह का बेजा इस्तेमाल उन्हीं लोगों के खिलाफ करते हुए अपने पेशे का नुकसान भी नहीं समझते।

मुद्दे के म को कुचलते बाकी चार म

22 जून
मंच पर या नीचे, किसी भी तरफ बैठकर किसी कार्यक्रम की तकलीफ को भुगतना कभी-कभी अपनी पसंद से परे की बात हो जाती है। कुछ स्थितियां ऐसी बनती हैं कि वहां जाना ही पड़ता है। हर महीने औसतन एक बार ऐसे तकलीफ से गुजरते हुए मैं यह सोचते चलता हूं कि देश का कितना समय फि जूल की बातों में खर्च होता है।
पहले तो किसी कार्यक्रम में पहुंचना अपने-आप में घंटे-आधे घंटे की बात होती है। फिर लगभग इतना ही वक्त कार्यक्रम शुरू होने के इंतजार में बर्बाद होता है। इसके बाद फूलों पर अत्याचार का दौर चलता है और लोग एक-दूसरे का लंबा स्वागत करते चलते हैं। इसके बाद बारी आती है एक-दूसरे के बारे में झूठ बोलने की। एक-दूसरे में नामौजूद खूबियों को गढ़कर उनका ऐसा लंबा-चौड़ा बखान होता है कि झूठ से मन अघाकर उबकाई खाने लगता है। लगता है कि कौन किसको बेवकूफ बना रहा है? मंच के लोग, सामने बैठे लोग और उन दोनों तबकों के बीच माला-गुलदस्ता लेकर आते-जाते लोग, हर कोई तो असलियत को जानता है। और जब तमाम लोग सच को जानते हैं तो ऐसे भूले हुए सच की याद भी मंच, माइक और माला के बीच खड़े किए जाते झूठ से एक बार फिर आ जाती है। अगर ऐसा झूठ खड़ा न किया जाए तो इंसानी मिजाज लोगों के सच को भूलने की कोशिश भी करते रहता है। क्योंकि बहुत सच के साथ जीना आसान नहीं होता इसलिए हम सब एक-दूसरे के सच को अनदेखा करने में भी लगे रहते हैं। एक-दूसरे का पूरे का पूरा सच पूरे एहसास के साथ महसूस करने लगे तो फिर केवल अनजान के साथ ही रहना हो पाएगा। लेकिन मंच से या बराबरी की जमीन वाली किसी बैठक में जो झूठ कहा जाता है वह फिर ऐसे एहसास को ताजा करता है और वैसी जगह पर बैठना मेरे लिए भारी पडऩे लगता है।
चूंकि कुछ लोगों को जिंदा रहना होता है, कुछ लोगों को जिंदा करना होता है और कुछ लोगों को आगे अपनी स्मृतियां जिंदा रखने की गारंटी करनी होती है इसलिए कार्यक्रम तो होते ही रहेंगे। लेकिन मैं सोचता हूं कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री या देश के प्रधानमंत्री अगर यह शर्त रख दें कि उनके कार्यक्रम में फूलों से सिर्फ एक स्वागत हो और संबोधन में कोई भी व्यक्ति किसी का भी नाम या पदनाम न गिनाए तो ऐसे कार्यक्रमों का समय शायद आधा ही रह जाएगा। ऐसी मूर्खतापूर्ण परंपरा कब और कैसे शुरू हुई मैं यह सोचते ही रह जाता हूं। जब पूरी तरह से अर्थहीन औपचारिकता मंच पर चलती रहे और वहां बैठे लोग मूर्खों की तरह किसी सार्थक बात के शुरू होने का इंतजार करें तो यह देश की उत्पादकता का नुकसान है।
मंच, माला, माइक और महत्व के नाम पर एक ऐसा फरेब मुझे चारों तरफ दिखता है जिसमें म से शुरू होने वाला एक और शब्द, मुद्दा, खो ही गया है। ऊपर के चारों म के पैरों तले यह पाँचवां, अकेला जरूरी म, बुरी तरह कुचला जाता है। मुद्दे का म ऐसा हो जाता है मानो किसी गरीब बच्चे के मेरिट में आने पर स्कूल के शिक्षक, प्राचार्य, अध्यक्ष-सचिव मिलकर उसके साथ तस्वीर खिंचवाएं और उसमें बच्चे का चेहरा ही गायब हो जाए। ऐसी स्थिति अगर मंच पर हो तो उसमें पता लगे कि माइक पर ऊपर के चारों महानुभाव एक-दूसरे की प्रशंसा करते रह जाएं, एक-दूसरे को माला पहनाते रह जाएं और बच्चे की कोई चर्चा ही न हो।
जिस तरह कुछ लोग अपने जिंदा रहने या अपनी स्मृतियों को जिंदा रखने के लिए इन चार म का इस्तेमाल करते हैं उसी तरह से कुछ ऐसे पेशेवर दर्शक, श्रोता और मेहमान हो गए हैं जो बिना भाड़ा पाए किसी भी कार्यक्रम में दांत निपोरते चले जाते हैं और कार्यक्रम की 'शोभा बढ़ातेÓ हैं। कुल जमा इस तरह के पेशेवर लोगों या ऐसे पेशेवर निरर्थक अंदाज के कार्यक्रमों में देश का इतना बड़ा समय बर्बाद हो रहा है कि कार्यक्रमों के नाम पर उबकाई अधिक आती है।
कुछ आयोजकों से बेतकल्लुफी के चलते मैंने यह भी कहा कि कार्यक्रम के कुल जमा समय का कम से कम आधा हिस्सा तो सार्थक बातों का रखा जाए, लेकिन उन्होंने पूरी कोशिश करके बताया कि इस बार तो सब कुछ तय हो चुका है, अगली बार इसकी कोशिश करेंगे। आज की व्यस्त जिंदगी में लोगों के पास शास्त्रीय संगीत के आलाप की तरह की लंबी शुरूआत का समय हो तो सकता है लेकिन उसका आलाप जैसा मधुर होना भी जरूरी है। कानों और आंखों में कंकड़ की तरह खटकने वाले झूठ, फरेब और मक्कार विशेषणों का आलाप कोई कैसे झेल सकता है यह मेरी समझ से परे है। ऐसे में भड़ास निकलती है वहां गिनाए जा रहे विशेषणों को झूठा साबित करने वाले तथ्यों और तर्कों को पड़ोस के साथ बांटने में। लेकिन ऐसा करते हुए मन में यह आत्मग्लानि भी रहती है कि श्मशान में आकर मुर्दें के बारे में अप्रिय चर्चा करना अच्छी बात नहीं है।
मुझे लगता है कि एक किसी मंच पर, या बैठक में इस बात पर खुली चर्चा होनी चाहिए कि एक सुधारवादी आंदोलन की तरह मंच सुधारो अभियान कैसे चलाया जा सकता है? कैसे ऋण मुक्ति अभियान की तरह झूठ मुक्ति अभियान चल सकता है? कैसे व्यसन मुक्त समाज की तरह विशेषण मुक्त समाज बनाने की मुहिम चलाई जा सकती है। और कैसे मासूम, बेजुबान फूलों पर अत्याचार खत्म किया जा सकता है? मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि मंचों के आर-पार या बैठकों में बहुत से ऐसे लोग आते-जाते हैं जिनके पास बर्बाद करने को इतना वक्त नहीं होता, और न ही झूठ को बर्दाश्त करने की क्षमता होती। ऐसे लोग ही इस बात की पहल करें कि किसी काबिल संपादक की मदद से इन कार्यक्रमों का संपादन कैसे किया जाए और फिर फिजूल को काट-छांटकर बचे कार्यक्रम की शैली को बढ़ावा देने का अभियान चलाया जाए। ऐसे एक सुधारवादी अभियान के बिना देश का समय बर्बाद होना रूकते नहीं दिखता।
कुछ और
कल तक ऊपर का लिखा हुआ लिखकर यह तसल्ली हो गई थी कि हर हफ्ते मेरी वजह से यह पत्रिका लेट होती है क्योंकि मैं भाग-दौड़ के बीच इन दो-तीन पन्नों को लिखने का समय नहीं निकाल पाता, और इस बार यह काम समय पर हो गया। लेकिन आज फिर कुछ खबरों को पढ़कर इसमें कुछ जोडऩे का दिल किया। यह आगे की बात हो सकता है कि पूरी तरह पीछे की बात से जुड़ी हुई न हो।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से इन सात-आठ बरसों में लगातार प्रदेश के इतिहास के कुछ महान लोगों की स्मृतियों को लेकर एक कीर्तन सा चल रहा है। स्मृतियां इतनी संपन्न और सुविधाजनक बनाई जा सकती हैं कि वे जनमान्यताओं से लेकर इतिहास के चुनिंदा तथ्यों तक, कई पसंदीदा बातों पर टिकी हो सकती हैं। आज जब ताजा-ताजा दिवंगत हुए इंसान के लिए स्मृतियों और श्रद्घांजलि के रूप में सर्वविदित असत्य की सुनामी लहरें बहा दी जाती हैं तो फिर इतिहास को लेकर कड़वी बात कोई कैसे कर सकता है। इसलिए रामजन्मभूमि से लेकर रामसेतु तक ईसा मसीह से लेकर घोटुल तक और जिन्ना से लेकर गांधी तक हर किसी के इतिहास को मनमाफिक ढाला जा सकता है। इतिहास जब छांटकर उठाया जाता है तो वह सवाल खड़े नहीं करता, जैसा कि वर्तमान हमेशा ही करता है और भविष्य तो सिर्फ सवाल ही रहता है।
यादों की शहनाईयों की धुन और उनका राग इस कदर लोगों को बांध लेते हैं कि लोग असुविधाजनक वर्तमान को अनदेखा करके, वर्तमान की मांग को अनसुना करके स्मृति-कीर्तन में लगे रह सकते हैं और आने वाले कल के लिए वे इतिहास का उसी तरह से गुणगान करते रह सकते हैं जिस तरह नींव के पत्थरों के बाद दीवारें खड़ी किए बिना कोई सिर्फ छत ढालने की बात करता रहे।
मैं कुछ और साफ-साफ बात करूं तो छत्तीसगढ़ के इतिहास के साहित्यकारों और पत्रकारों की जिंदगी और काम को लेकर उसी तरह का पे्रम यहां पिछले बरसों में चल रहा है जिस तरह का खेलपे्रम खेल के टेलीविजन पर प्रसारण को देखकर जाहिर किया जा सकता है। लेकिन घर के टीवी के सामने बैठे खेल दर्शकों से खेल का जितना भला हो सकता है शायद उतना ही भला छत्तीसगढ़ के स्मृति कीर्तन से यहां के वर्तमान और भविष्य का हो रहा है। आज का वर्तमान सौ-सौ सवाल लेकर खड़ा है। ये तमाम सवाल अगर सौ बरस पहले के किसी महान पत्रकार या साहित्यकार के सामने होते तो क्या वे भी केवल कालिदास-कीर्तन या तुलसीदास-कीर्तन करके खुद महान हो सकते थे, या उनका साहित्य या उनकी पत्रकारिता महान हो सकती थी?
कुछ अधिक कड़वी जुबान में कहूं तो छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व के पहले इन सात-आठ बरसों में स्मृतियां आज की जरूरतों पर, आज की जिम्मेदारियों पर, और भविष्य की चुनौतियों पर कुछ उसी तरह हावी हो गई हैं जिस तरह किसी गरीब के घर पर मृत्यु-भोज की सामाजिक जिम्मेदारी भारी पड़ती है। घर के बच्चों के सालभर के खाने-पीने का सब कुछ एक दिन के सामाजिक डांड में निकल जाता है। किसी तस्वीर से आज की हालत का मुकाबला करें तो राखी के दिन जेलों में पहुंचीं ब्रम्हकुमारियों या लॉयन्स क्लब की महिलाओं की याद आती है जो कैदियों को पहले समारोह पूर्वक राखी बांधते हुए तस्वीरें खींचवाती हैं और दूर-दूर से आईं उन कैदियों की सगी बहनें जेल के अहाते में पेड़ के नीचे अपनी बारी की राह देखती रहती हैं। आज वर्तमान के मुद्दे इसी तरह समारोहों के सभागृह वाले अहाते के पेड़ों तले बैठे रहते हैं और अपने-आपको बुद्घिजीवी, रचनाकार, सरोकार का पैरोकार, समाज का मार्गदर्शक, नीति-निर्धारक, संवेदनशील कहने वाला तबका मंच पर यादों की उस बारात में मस्त रहता है जिसका आज की कड़वी हकीकत से उसी तरह कुछ लेना-देना नहीं है जिस तरह बारातियों का सड़क की बाकी दिक्कतों से कोई लेना-देना नहीं रहता।
यह सोचने की जरूरत है कि इतिहास की ठंडी, सुविधाजनक छाया में बैठकर कब तक आज के समाज का तथाकथित जिम्मेदार तबका वर्तमान को अपना बैनर तानने से रोके रहेगा? क्या यही रूख इस बात के लिए जिम्मेदार नहीं है कि आज जनता के बीच साहित्यकार, कलाकार, नाटककार और बुद्घिजीवियों के लिए कोई खास सम्मान नहीं रह गया और इन तबकों के कुछ दर्जन या कुछ सौ लोग हर शहर में एक घेरा बनाकर एक-दूसरे की पीठ खुजाते दिखते हैं। क्या भविष्य के इतिहास में किसी युग को इसलिए याद किया जा सकता है कि उस युग ने अपने पिछले युग को महिमामंडित करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी? मूर्ति-पूजा उस दिन महत्वहीन, और शायद गैरजरूरी हो जाती है जिस दिन कुपोषण के शिकार बच्चों की बस्ती में शिवलिंग पर दूध के घड़े पलटे जाते हैं।
कुल जमा मतलब यह कि छत्तीसगढ़ के आज के बहुत कड़वे, बहुत असुविधाजनक मुद्दों को अनदेखा करने वाले इतिहास-कीर्तन से क्या कोई सभागृह खाली बचेगा जिसमें आज के साहित्य, पत्रकारिता, रचनात्मकता, सामाजिक आंदोलन, सामाजिक विसंगतियों, शोषण, भष्टï्राचार, राजनीतिक षडयंत्र, असमानता की यातना भोगने वाले लोग अपनी भी एक छोटी बैठक कर सकें और उस बैठक के लिए कीर्तनियों में से कुछ लोग आ सकें।


-सुनील कुमार