कांगे्रस-यूपीए आत्मघाती राह पर, राष्ट्रहित के खिलाफ ताजा बयान

21 अक्टूबर 20111
संपादकीय
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी को उटपटांग बातें कहने और खुद के लिए परेशानी खड़ी करने की एक लत पड़ गई है। सुबह से शाम हो जाए और अगर यह पार्टी या सरकार अगर इस किस्म का कोई आत्मघाती काम न करे तो यह मानना चाहिए कि इसके नेता, मंत्री और अफसर छुट्टी मना रहे होंगे। और लोगों को तो छोड़ दें, अब तो लगभग मौनव्रत पर चलने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने ही गोल पोस्ट में गोल दागने की कोशिश करते हुए दिख रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में उन्होंने दो ऐसे काम किए। सूचना के अधिकार पर एक सरकारी संबोधन में उन्होंने कहा कि इस अधिकार से ईमानदार और अच्छी नीयत वाले जनसेवकों का हौसला पस्त होने का एक खतरा है और इस कानून पर एक आलोचनात्मक नजर डालने की जरूरत है। उनकी इस बात पर सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की एक प्रमुख सदस्य अरूणा राय ने मनमोहन सिंह की धज्जियां उड़ाते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री का यह बयान पूरी तरह से गलत है। अरूणा राय इस कानून का मसौदा बनाने वाली प्रमुख व्यक्ति रही हैं और उन्होंने कहा कि सरकारी व्यवस्था को सूचना के अधिकार में नहीं उसके भीतर के भ्रष्टाचार ने प्रभावित करके रखा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को फिक्र तो उन मौतों की करनी चाहिए जो कि सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं को जगह-जगह मिल रही है, न कि नौकरशाहों की असुविधा की।
मनमोहन सिंह का यह बयान एक ऐसे वक्त आया है जब ईमानदारी और बेईमानी की बहस में उनकी सरकार की विश्वसनीयता आजादी के बाद से अब तक किसी भी सरकार की सबसे कम विश्वसनीयता है, और जब उनकी खुद की अगुवाई वाली केंद्र सरकार चोर, बेईमान और डकैत की तरह जनता की नजरों में गिर चुकी है, तब उस सूचना के अधिकार को कोसना हैरान करने वाला लगता है जिसने कि सारे बड़े भांडाफोड़ के पीछे अपना योगदान दिया है। फिर मानो गुपचुप रहने वाले मनमोहन सिंह के लिए अरूणा राय का कहना काफी नहीं था तो उन्होंने भाजपा के लाल कृष्ण आडवानी को यह नसीहत दे डाली कि वे अपनी रथयात्रा के दौरान कड़े या कड़वे शब्द कहने से बचें। अब राजनीति में कोई एक-दूसरे को कड़े या कड़वे शब्द से बचने को कहे, तो यह बात राजनीति से अनजान कोई इंसान ही कर सकता है। इसके जवाब में आडवानी ने जो कहा वह बहुत जायज बात थी कि उन्होंने तो महज इतना कहा था कि नेहरू से लेकर आज तक तमाम प्रधानमंत्री उन्होंने देखे हैं और मनमोहन सिंह उनमें से सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं। आडवानी ने पूछा कि इसमें कड़ी या कड़वी बात क्या है?
इस बात पर भी आज हम शायद यह संपादकीय नहीं लिखते लेकिन कल की एक दूसरी खबर और चौंकाने वाली है। अमरीका और पाकिस्तान के रिश्ते आज सबसे भयानक हालत में हैं। अमरीका ने आतंकियों की सरकारी मदद के लिए पाकिस्तान को बुरी तरह से घेर लिया है और अमरीकी सरकार के भीतर उस पाकिस्तानी आतंक पर भारी तमतमाए हुए तेवर हैं, जिस आतंक ने भारत पर हमले करके सैकड़ों जानें ले ली हैं। ऐसे मौके पर जब अमरीकी विदेश मंत्री पाकिस्तान पहुंच रही हैं और भारत की जनता सहित बाकी दुनिया भी यह देख रही है कि एक नाकामयाब लोकतंत्र पाकिस्तान को उसके अन्नदाता अमरीका की लताड़ कैसे पड़ती है तब भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने बेमौके का यह बयान दिया है कि भारत अमरीका और पाकिस्तान जैसे दोस्त देशों के बीच कोई मतभेद देखना नहीं चाहता और इन दोनों को बातचीत की मेज पर अपने मतभेद निपटा लेना चाहिए जिससे कि दूसरे देशों, खासकर भारत के लिए दिक्कतें खड़ी न हों। भारतीय विदेश मंत्री का यह बयान हाल के महीनों में उनकी पाकिस्तान की एक खूबसूरत, नौजवान और नई विदेश मंत्री से कुछ बार की मुलाकातों के उत्साह से पैदा हुआ अधिक दिख रहा है, भारत की विदेश नीति की समझदारी से उपजा हुआ कम। सच तो यह है कि यह बयान भारत के राष्ट्रीय और विदेशी हितों के ठीक खिलाफ है और यह पाकिस्तानी आतंक के खिलाफ भारत के लगातार खड़े किए जा रहे एक ठोस मामले को किनारे करते हुए एक ऐसी नौबत ला रहा है जिसके चलते अमरीका पाकिस्तान के खिलाफ अधिक खफा होने से बच भी सकता है। अमरीका और पाकिस्तान के बीच मतभेद अगर अमरीकियों पर पाकिस्तानी मदद से होने वाले आतंकी हमलों की वजह से खड़े हुए हैं, तो उन पर नरमी बरतकर भारत का विदेश मंत्री क्या साबित कर रहा है? आज तो पाकिस्तान जब सरकार, सेना और खुफिया एजेंसियों की आतंक में भागीदारी के सुबूतों से घिरते चले गया है तब भारत को अपनी पूरी कूटनीतिक ताकत इस बात में लगा देनी थी कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा फौजी मददगार अमरीका उसके सिर पर से अपना हाथ हटाए। एक तरफ पाकिस्तानी फौज और कुख्यात पाकिस्तानी फौजी खुफिया एजेंसी, आईएसआई, अमरीका के साथ एक टकराव का दंभ भरते हुए खड़े हैं, खुद अमरीकी विदेश मंत्री अभी कुछ घंटे पहले पाकिस्तान में वहां की सरकार को यह कह चुकी है कि आप अपने घर के पिछवाड़े में सांप पालकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सिर्फ आपके पड़ोसी को डसेगा, ऐसे में भारत की पाकिस्तान के साथ हमदर्दी और नरमी हक्का-बक्का कर देने वाली है। अब तक पता नहीं क्यों भाजपा के भी किसी भूतपूर्व विदेश मंत्री का ध्यान इस पर नहीं गया है, लेकिन हम इसे मनमोहन सरकार का एक और आत्मघाती बयान मानते हैं जो पूरी तरह से भारत के लिए आत्मघाती है। एस.एम. कृष्णा इसके पहले भी कई किस्म की कूटनीतिक चूकें कर चुके हैं और अब तो जब प्रधानमंत्री कई किस्म के अवांछित बयान देना शुरू कर चुके हैं तो फिर बाकी मंत्रियों को तो मानो गलतियां और गलत काम करने का एक हक ही मिल जा रहा है।

छोटी सी बात


20 अक्टूबर
इन दिनों टेलीविजन की खबरों में नफरत के साथ बोलने वाले लोग बढ़ गए हैं। हिंदी के अधिकतर टीवी सीरियलों में पहले से यह बात रही है। इन सबसे अपने बच्चों को बचाएं। उनके स्वभाव में अगर ऐसी नफरत घर कर गई तो किसी दिन आसपास के लोग भी उसका शिकार हो सकते हैं।

वे करें तो लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला है...



20 अक्टूबर
संपादकीय
अन्ना हजारे के साथ इन दिनों जमकर खड़ी हुईं किरण बेदी को लेकर एक नया मामला अभी उजागर हुआ है कि वे जिन कार्यक्रमों में जाती हैं, उनके आयोजकों से विमान का सबसे महंगा भाड़ा लेती हैं लेकिन वे सस्ती टिकट पर सफर करती हैं। इस रिपोर्ट के छपने पर उन्होंने यह सफाई दी है कि ऐसी बचत को वे अपने एनजीओ में लगा देती हैं और बहुत से आयोजकों को यह बात मालूम भी रहती है। यह मामला 'छत्तीसगढ़Ó के पास कई महीने पहले आया था जब वे रायपुर के दो-तीन कार्यक्रमों में आकर लौटी थीं। लेकिन उस समय देश में अन्ना हजारे का आंदोलन जोरों पर था और इस अखबार ने सोच-समझकर उस समय इस रिपोर्ट को रोका था क्योंकि उसे छापने का एक असर अन्ना हजारे के आंदोलन को नुकसान पहुंचाना भी हो सकता था और उस समय जिन बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के मामले हवा में थे, उनके मुकाबले किरण बेदी का यह मामला उस वक्त अधिक चर्चा का हकदार नहीं था। लेकिन आज जब दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में पूरी रिपोर्ट छापी है तो उस समय से हमारे पास रखी हुई जानकारी की खबर भी हम बनाकर एक्सप्रेस की रिपोर्ट के साथ-साथ आज छाप रहे हैं। इस पूरे मामले को देश के अन्ना-समर्थक उनकी टोली पर एक और हमला मान रहे हैं लेकिन हमारा यह मानना है कि ईमानदारी और पारदर्शिता का झंडा उठाकर जो लोग पूरे देश को जगाने में लगे हैं, जो लोकतंत्र के सभी संगठनों को आरोपों के घेरे में खड़ा करके उनसे जवाब-तलब कर रहे हैं, उन लोगों को अपने सार्वजनिक कामकाज के बारे में जवाबदेह तो रहना ही चाहिए। इसलिए किरण बेदी से उनके सार्वजनिक हिसाब-किताब को लेकर अगर मीडिया कुछ पूछ रहा है, उनके अपने तरीके के हिसाब-किताब और किफायत को गलत मान रहा है तो इस पर उन्हें तो सफाई देनी ही चाहिए, किसी और को इसमें साजिश नहीं देखनी चाहिए। आखिर ये पूरे हिसाब-किताब तो किरण बेदी और उनके उस संगठन के हैं जो कि अपने सार्वजनिक कामकाज, कमाई और खर्च के लिए देश के कानून के तहत सरकार और जनता दोनों के प्रति जवाबदेह हैं। यह किरण बेदी का कोई निजी कारोबार तो है नहीं जिसके लिए कि वे सिर्फ टैक्स विभागों के प्रति जवाबदेह हों, इसलिए हम अभी उनकी सामने आई सफाई को काफी नहीं मानते और पूरे हिसाब-किताब के खुलासे की उम्मीद करते हैं।
उनका यह तर्क सही और सच शायद हो सकता है कि ऐसी बचत को वे अपने एनजीओ को दे देती हैं, और यह तर्क भी शायद सही और सच हो सकता है कि उनका एनजीओ समाजसेवा में इसे खर्च करता हो, लेकिन देश के कानून के मुताबिक दान या खर्च लेने और उसे खर्च करने के कुछ नियम बने हुए हैं। और देश के कानून और नियमों की जिन कसौटियों पर राजा, कलमाड़ी या अमर सिंह को कसा जा रहा है, वही कसौटियां तो नेहरू, गांधी या अन्ना-बाबा की टोलियों के लिए रहेंगी। दो अलग किस्म के कानून तो इस देश में नहीं हो सकते, जिनमें से एक उन लोगों पर लागू हो जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, और दूसरा उन लोगों पर लागू हो जो भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं। केन्द्र सरकार अगर अन्ना हजारे और उनके साथियों से नाखुश है तो वह उनके मामलों की जांच करा सकती है, किरण बेदी ने अपने सफर के लिए अगर पिछले बरसों में संस्थाओं से जरूरत से कई गुना पैसे लिए तो यह तो केन्द्र सरकार की किसी साजिश के तहत नहीं हो सकता, यह किरण बेदी का अपना फैसला था। अब अपने इस फैसले को नैतिक और वैधानिक साबित करने की जिम्मेदारी भी उनकी इसलिए है क्योंकि वे पूरे देश को नैतिकता और वैधानिकता की पटरियों पर चलाने के लिए रात-दिन एक कर रही हैं।
हमारे पास अपने समाचार की जो जानकारी है और जो इंडियन एक्सप्रेस ने छापा है उन दोनों को देखते हुए हमें किरण बेदी का यह फैसला नैतिक और सही तो नहीं लगता कि वे एक सफर का पैसा दो-दो संस्थाओं से मांगें, सस्ता सफर करके महंगा भाड़ा वसूलें। वे अपने एनजीओ में कोई नेक काम करती हो सकती हैं, लेकिन उन्हें बुलाने वाली संस्थाएं भी जब नेक काम करने वाली हों तो उनसे अधिक वसूली करके उसके अपनी मर्जी के इस्तेमाल का कोई नैतिक हक उन्हें हो सकता है? अन्ना हजारे नैतिकता की बात करते हुए एक बहुत ही बुजुर्ग और समझदार इंसान हैं। इसी टीम में कर्नाटक में हाईकोर्ट के जज रहे हुए और लोकायुक्त रहे हुए संतोष हेगड़े भी हैं। अब देखना यह है कि गांधीवादी नैतिकता और पारदर्शिता की कसौटी पर पूरे देश को रगड़ते हुए बैठे अन्ना हजारे किरण बेदी के इस काम को किस रंग का और कितना खरा सोना पाते हैं। दूसरी तरफ जस्टिस हेगड़े इस मामले को कानून और लोकायुक्त के पैमानों पर नाप सकते हैं कि यही काम अगर किसी नेता या अधिकारी ने किया होता तो एक जज या लोकायुक्त इस मामले को कैसा पाता।
जब सार्वजनिक जीवन में बहुत ऊंचे नैतिक मूल्यों को लेकर लोग आंदोलन करते हैं, बेईमानों के खिलाफ पूरे देश के सामने मसखरी के अंदाज में उनका मखौल उड़ाते हैं तो वे अपने आपको भी कांच के एक मर्तबान में जनता के सामने रखने को मजबूर रहते हैं। किरण बेदी के साथ भी आज यही दिक्कत है। उनका किया हुआ काम किसी साधारण इंसान के लिए तो बच निकलने का तर्क हो सकता था, लेकिन उन्होंने रामलीला मैदान से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की खिल्ली उड़ाते हुए घूंघट काढ़ कर जिस तरह जनता का मनोरंजन किया था, उससे वे सार्वजनिक जीवन के प्रति कुछ अधिक जवाबदेह हैं। और हम उम्मीद करते हैं कि उनके जवाब देश के कानून, नियम और नैतिक मूल्यों, सबको चुप करा पाएं।
इस बारे में इंटरनेट पर कुछ लोगों का लिखा हुआ यह ट्वीट हमें दिलचस्प लगा- वे करें तो लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला है...

छोटी सी बात

19 अक्टूबर 11
जब कमाई और खर्च का हिसाब करना हो तो बारीकी से सही-सही आंकड़े लिखें। इसके बाद कमाई को आधा कर लें और खर्च को दुगुना। इतने बुरे दिन भी तैयारी कर लें, तो फिर धोखा नहीं होगा।

संपन्न लोगों को हज-अनुदान क्यों?

18 अक्टूबर 20111
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह नोटिस जारी किया है कि वह वीआईपी कहे जाने वाले प्रभावशाली लोगों की हज यात्रा पर सबसिडी क्यों दे रही है? अल्पसंख्यक धर्मों के धार्मिक रीति-रिवाजों में सरकारी खर्च से अनुदान देने के भारत के संवैधानिक प्रावधान के चलते भारत के संपन्न मुसलमान भी हज जाने के लिए सरकारी अनुदान पा रहे हैं। हम सुप्रीम कोर्ट की इस आपत्ति से पूरी तरह सहमत हैं। पहले भी हम कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सरकारी पैसों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। कानून के कुछ जानकार लोगों का यह कहना है कि बहुसंख्यक धर्मों के लिए संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है लेकिन अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों के लिए ऐसा इसलिए जरूरी है कि वे भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए भी हैं और बहुसंख्यक समाज की तरह वे अपने धार्मिक कार्यक्रम नहीं कर पाते।
जब कभी जनता के पैसों से किसी धर्म को बढ़ावा देने की बात आती है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले या धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाले देश में राज करने वाली सरकारें अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं के मुताबिक या अपनी-अपनी चुनावी प्राथमिकताओं के मुताबिक खर्च करने में जुट जाती हैं। छत्तीसगढ़ में हम राजिम कुंभ के नाम पर सरकार का बहुत बड़ा खर्च होते देखते हैं और हिंदू धर्म के कार्यक्रम सरकारी खर्च पर इस राज्य में इतने अधिक होते हैं कि बाकी धर्मों के लोगों को एक शिकायत बनी ही रहती है। भारत की संवैधानिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के धर्म के लिए सरकारी खर्च की जो बात रखी गई है उसमें यह फेरबदल करने की जरूरत है कि ऐसी कोई भी मदद सिर्फ उसी काम के लिए की जाए जो कि उस धर्म के बहुत गरीब लोगों के लिए जरूरी हो। गरीबी की रेखा के नीचे के किसी इंसान के लिए अगर सरकार हज जाने के लिए कुछ अनुदान देती है तो उसे एक बार समझा जा सकता है। लेकिन बाकी लोगों को, जिनके पास अपने खर्च से हज करने की ताकत है, उनको क्यों सरकार हज कराए? नतीजा यह होता है कि भाजपा के राज वाले छत्तीसगढ़ सहित शायद एक-दो और राज्यों में भी अब मानसरोवर की यात्रा के लिए हिंदुओं को (या शायद सभी को) अनुदान देना शुरू किया गया है। और यह अनुदान सभी आय वर्ग के लोगों को मिल रहा है। सरकार को धर्म से अपने-आपको अलग करना चाहिए। जो संपन्न लोग हैं उनको अपनी निजी आस्था के लिए, अपने निजी इलाज के लिए सरकारी मदद क्यों लेनी चाहिए?
दूसरी तरफ देश भर में सुप्रीम कोर्ट इस बात की निगरानी कर रहा है कि सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक अवैध कब्जे और अवैध निर्माण सरकारें हटा रही हैं या नहीं? इसके बावजूद हम लगातार यह देख रहे हैं कि सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने के लिए जहां मजबूरी में किसी धार्मिक स्थल को हटाना पड़े तो भी शासन-प्रशासन इससे बचकर रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। जनता की जिंदगी को जहां धर्म के नाम पर गैरकानूनी काम मुश्किल कर रहे हैं, वहां भी नेता-अफसर डरे-सहमे दिखते हैं। सरकार के इस तरह दहशत में रहने से धार्मिक कट्टरता, आक्रामकता, हिंसा और बाकी किस्म के धार्मिक अपराध बढ़ते चलते हैं। ऐसी बातों से यह भी स्थापित होता है कि धर्म कानून से ऊपर है। और यह सोच आगे बढ़कर धार्मिक हमलों और दंगों तक पहुंचती है। सरकार की धर्मनिरपेक्षता का यह मतलब नहीं होना चाहिए कि वह सभी धर्मों की धर्मान्धता को एक बराबरी से बर्दाश्त करे।
दूसरी गड़बड़ी हम यह देख रहे हैं कि भारत में सरकारी कुर्सियों पर मजा करने वाले लोगों से लेकर सभी धर्मों के मठाधीशों तक, किसी की भी दिलचस्पी सुधारवाद और उदारवाद में नहीं दिखती। पे्रम के बजाय नफरत का जोड़ अधिक मजबूत मानकर ऐसे तमाम धार्मिक लोग अपने लोगों को किसी दूसरे अज्ञात, काल्पनिक या झूठे दुश्मन के खिलाफ डराते हुए जोड़कर रखते हैं। धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और जाति आधारित संगठन सुधार की बातें करते शायद ही दिखते हैं। यह सिलसिला इस देश को पत्थर युग की तरफ ले जाने की कोशिश करता है। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा नोटिस से एक बहस शुरू होनी चाहिए और अल्पसंख्यक समुदायों के ताकतवर और संपन्न लोगों से सरकारी खर्च पर दी जाने वाली सारी रियायतें छीन लेनी चाहिए। यह बात हमारी उसी सोच से उपजी हुई है कि आरक्षण का फायदा भी मलाईदार तबके को नहीं मिलना चाहिए।

छोटी सी बात


18 अक्टूबर
बाजार हर कुछ दिनों में आपको थोड़ी सी नई खूबियों वाले सामान पेश करते रहता है। लेकिन उनकी तरफ लपकने के पहले सोच लें कि उस सामान के पुराने मॉडल का आपने कितना इस्तेमाल किया है? और नई खूबियों से क्या आपको कोई फर्क पडऩे वाला है? अलमारी में बंद 10 मेगापिक्सल कैमरे की जगह 14 मेगापिक्सल का कैमरा लेकर बंद रखे रहने का क्या फायदा?

इजराइल-फिलस्तीन की सरहद से सबक लेने की जरूरत

18 अक्टूबर 20111
मध्य-पूर्व एशिया में इस वक्त एक ऐतिहासिक घटना घट रही है। एक इजराइली सैनिक बरसों के बाद फिलस्तीन के गाजा वाले हिस्से से रिहा किया जा रहा है और इसके बदले इजराइल की जेलों से सरकार और वहां की अदालत दोनों की मंजूरी से करीब हजार फिलस्तीनी कैदी रिहा किए जा रहे हैं। सात बरस से यह इजराइली सैनिक फिलस्तीन के इस हिस्से पर काबिज और राज कर रहे वहां के हथियारबंद संगठन हमास का कैदी था। हमास इजराइल के साथ फिलस्तीन के ऐतिहासिक झगड़े को निपटाने में सैनिक कार्रवाई पर भरोसा रखने वाला संगठन है और उसे कुछ लोग एक आतंकी संगठन भी गिनते हैं। हमास के रिश्ते फिलस्तीन के दूसरे हिस्से, पश्चिम तट, के प्रधानमंत्री महमूद अब्बास से बहुत खराब हैं और अब्बास की बातचीत से समझौते की सोच को हमास खारिज करता है। पिछले दिनों अब्बास ने संयुक्त राष्ट्र संघ में फिलस्तीन को एक देश का दर्जा देने का जो प्रस्ताव रखा था, उस पर हमास असहमत था, और यह माना जा रहा है कि कैदियों की अदला-बदली का यह ताजा काम हमास ने अब्बास की संयुक्त राष्ट्र पहल का मुकाबला करने के लिए और अपने अस्तित्व को दिखाते चलने के लिए किया है। जो भी हो, फिलस्तीन और इसराइल के बीच सरहद के दोनों तरफ हथियारबंद हमलों और जवाबी हमलों में पिछले दशकों में अनगिनत मौतें हुई हैं और इजराइल की फौजी ताकत के मुकाबले गाजा के नौसिखिए लड़के बहुत अधिक जानें खो चुके हैं।
लेकिन हम उस मुद्दे की अधिक बारीकियों में जाने के बजाय कैदियों की अदला-बदली की इस पहल पर बात करना चाहते हैं। दो देश हों या एक देश के भीतर किसी सरकार या किसी संगठन के बीच का तनाव हो, उसे कम करने के जो-जो रास्ते हो सकते हैं, उनका इस्तेमाल होना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच कैदियों को लेकर आधी सदी से कई किस्म के तनाव चल रहे हैं। दोनों तरफ से दिल छू लेने वाली तकलीफदेह असली कहानियां आती ही रहती हैं। पाकिस्तान का एक मरणासन्न, बहुत बूढ़ा प्रोफेसर भारत में एक मामले में फंसकर यहां की जेल में मर जाने के करीब है, और ऐसी ही बहुत सी जिंदगियां पाकिस्तान की जेलों में कैद है। सआदत हसन मंटो अब नहीं रहे नहीं तो वे 'टोबा टेकसिंहÓ जैसी और बहुत सी कहानियां लिख पाते। दुनिया में आज सरहद के आरपार जो सबसे बुरे किस्म की दुश्मनी की मिसाल है वह इजराइल और फिलस्तीन की है। और अगर आज उनके बीच इंसानी जिंदगियों के लेन-देन का कोई रास्ता निकल सकता है, तो भारत और पाकिस्तान के बीच की दुश्मनी तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं है।
अब दूसरा सवाल यह उठता है कि सरहदों से परे भी, एक ही देश और एक ही जमीन पर, दो राजनीतिक दलों के बीच, अन्ना और यूपीए सरकार के बीच, कांगे्रस और भाजपा के बीच, कुकुरहाव किस्म की नोंक-झोंक के बिना क्या सभ्य, समझदार और जिम्मेदार इंसानों की तरह बातचीत नहीं हो सकती? आज मुलाकात की जहां जरूरत है वहां मुक्कालात के अलावा कुछ नहीं दिखता, और बहुत आम लोग भी जहां यह देखकर महसूस करते हैं कि अपने-आपको दिल-दिमाग वाला होने का दावा करने वाले इंसान, पूरी बेदिली से सांडों की तरह सिर टकराते हुए यह साबित करते हैं कि खोपड़ी की कड़ी खोल अधिक महत्वपूर्ण है बजाय भीतर के नरम दिमाग के। पहले भी हमने एक-दो बार यह लिखने की कोशिश की कि जो लोग अपने-आपको राजनीति, सरकार या समाज के नेता कहते हैं वे अपने अहंकार को छोड़कर व्यापक जनहित में समझदारी की बात करने को तैयार क्यों नहीं होते? हमारा ऐसा भरोसा है कि आने वाले बरसों में भारत की शब्दावली में जिद, बददिमागी और घमंड के समानार्थी शब्दों में केजरीवालिज्म जैसा एक शब्द और जुडऩे जा रहा है। कुछ अरसा पहले अन्ना को लेकर हमने कुछ शब्द सुझाए थे लेकिन अब पिछले महीने इस बात के गवाह हैं कि केजरीवाल अन्ना की चीनी मिट्टी के बरतनों की दूकान में उनके अपने पालतू सांड हैं। कैसे भारत की जहरीली हवा साफ हो और कैसे इस किस्म के पचीस-पचास बकवासी लोग देश के वक्त को बर्बाद करने के ओवरटाईम काम से बेदखल किए जाएं, और कैसे गांधी के नामलेवा इस लोकतंत्र में गांधीवाद और लोकतांत्रिक तरीके से आपस में बातचीत हो सके, इसके बारे में इन गिरोहबंदियों से आजाद होकर इस देश को व्यापक जनकल्याण के रास्ते निकालने चाहिए। उदार और खुली समझ और सोच रखने वाले लोगों को मनीष तिवारी, केजरीवाल जैसे लोगों को हाशिए पर धकेलने के लिए सार्वजनिक बहस छेड़कर कोशिश करनी चाहिए।

छोटी सी बात

17 अगस्त 2011
घडिय़ों का समय आगे रखना ठीक नहीं होता। ऐसे में कभी सही समय से चलती घड़ी के मुताबिक चलकर आप धोखा भी खा सकते हैं।

खारिज कर दी गई कांग्रेस के आत्ममंथन का वक्त

17 अक्टूबर
संपादकीय
हरियाणा के हिसार उपचुनाव की खबर चर्चा में कुछ अधिक रही वरना देशभर में अलग-अलग राज्यों में होने वाले इक्का-दुक्का उपचुनाव इतनी बड़ी खबर नहीं बनते। लेकिन सभी राज्यों के करीब आधा दर्जन उपचुनावों के नतीजे पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ गए हैं। मतदाताओं ने एक किस्म से पंजे को मरोड़कर रख दिया है। इससे देशभर में कांग्रेस के खिलाफ चल रही एक लहर, एक जनमत दोनों का एक संकेत मिलता है। हम अकेले हिसार के नतीजों को महत्वपूर्ण इसलिए नहीं मानते क्योंकि वहां पर चुनाव शुरू होने के पहले ही कांग्रेस हारी हुई थी और कोई अगर यह सोचता है कि अन्ना हजारे की टोली के प्रचार से वहां जीती हुई कांग्रेस बाजी हार गई, तो ऐसा सोचना एक नासमझी होगी। लेकिन दो हिसाब से उपचुनावों के इन नतीजों को देखने की जरूरत है। एक तो यह कि कांग्रेस कैसे अपना घर सुधारे जो कि घरवाली के बाहर रहने से महीने दो महीने में ही उजाड़-बर्बाद हो गया है, दूसरी बात यह कि राजनीतिक चुनावों में जब गैर राजनीतिक ताकतें, संगठन और लोग किसी को जिताने और हराने पर अमादा हो जाते हैं तो उसे लोकतंत्र पर किस तरह का खतरा खड़ा हो सकता है। इन उपचुनावों से किसी भी प्रदेश या देश में कोई संतुलन नहीं बिगड़ रहा, लेकिन चुनावों को अपनी जिद्द से प्रभावित करने का सिलसिला आगे भी चल सकता है और वह अपनी बदनीयत तो पूरी कर सकता है, लोकतंत्र का कोई भला नहीं कर सकता।
यह दूसरी बात हम इसलिए कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा लेकर उत्पात कर रही अन्ना टोली ने हरियाणा के चुनाव में कांग्रेस को हरवाने का काम नहीं किया है बल्कि वहां पर कांग्रेस के सबसे बुरे नाम वाले नेताओं में से एक, आयाराम गयाराम शब्दावली को जन्म देने वाले दलबदल के जन्मदाता भजनलाल के बेटे को जिताने का काम किया है। बिना किसी कारोबार के भजनलाल का बेटा आधे अरब का तो घोषित रूप से मालिक हैं और अघोषित की बात का अंदाज जनता खुद लगा सकती है। ऐसे में बेईमान और भ्रष्ट पार्टी को हराने का सारा नारा बोगस रहा और जैसा कि एक टीवी पत्रकार ने अभी-अभी इंटरनेट पर लिखा कि अरविंद केजरीवाल अपने खुद के शहर हिसार से लड़कर जीतकर बताते तो वह अन्ना टोली की जीत होती। हम पिछले दिनों में लगातार अन्ना हजारे के अभियान को उजागर करते आए हैं, भाजपा के भ्रष्टों के खिलाफ अन्ना हजारे की चुप्पी को कोई भी समझदार एक मौन व्रत नहीं मानेगा इसलिए उनकी चुनावी कोशिशों को हम कोशिश के बजाए साजिश मानने को बेबस हैं।
लेकिन दूसरी बात यह भी है कि कांग्रेस पार्टी को यह देखना है कि आज पूरे देश के तेवर उसके खिलाफ क्यों हैं? उसके अगुवाई वाले यूपीए गठबंधन की चोरी और डकैती को देखकर देश हक्का-बक्का है और ऐसी भ्रष्ट पार्टी के लोगों का बड़बोलापन देख-देखकर लोग और हक्का-बक्का हैं। उस वक्त तो सोनिया गांधी देश में नहीं थीं जब उनकी पार्टी के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दाऊद इब्राहिम की डी कंपनी की तर्ज पर अन्ना हजारे की टोली को ए कंपनी कहा था और इतनी भद्दी जुबान का इस्तेमाल किया था कि बाद में उन्हें अदालती मुकदमे से बचने के लिए और प्रवक्ता का पद बचाने के लिए लिखकर अन्ना हजारे से माफी मांगनी पड़ी थी। लेकिन आज तो सोनिया गांधी बैठकर टीवी देखती होंगी जब उनके निजी सिपाही दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे को आरएसएस का एहसानफरामोश करार दे रहे हैं, बयान के अलावा ऐसी चिट्ठी भी लिख रहे हैं। दिग्विजय सिंह के तर्क और उनके तीर वैचारिक आधार पर कोई जायज चाहे ठहरा ले, भारतीय संस्कृति और भारतीय उदारता के हिसाब से दिग्विजय के हमले बहुत ओछे और घटिया माने जा रहे हैं। अब सोनिया गांधी अगर इस पर चुप हंै तो हम इस चुप्पी को कर्नाटक के भाजपाई भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे की चुप्पी से अलग किस्म की चुप्पी कैसे मान लें?
कांग्रेस को यह भी सोचना चाहिए कि एक अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री रहते हुए आज पूरे देश में महंगाई को लेकर यह बुरा हाल क्यों हैं? गांधी और नेहरू के वारिस होने का दावा करने वाली इस पार्टी के इतने लोग और इतने साथी जेलों में क्यों हैं? इस पार्टी के इतने नेता बिना कारोबार भजनलाल और वाईएसआर कैसे बन जाते हैं? और क्या भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में कोई पार्टी अपने मुखिया और अपने प्रधानमंत्री दोनों की चुप्पी के साथ जनता का विश्वास जीत सकती है, उसे भरोसा दिला सकती है? इन उपचुनावों से कांग्रेस को आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का एक मौका मिल रहा है और उसे अपना घर, अपनी भाषा और अपनी नीयत इन सबको सुधारना चाहिए वरना अगले आमचुनाव के नतीजे तो अभी से देश की दीवारों पर लिखे हुए दिख रहे हैं।

वॉल स्ट्रीट से पगडंडी इधर भी आएगी?

17 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार
अमरीका के शेयर बाजार और वित्तीय संस्थानों के प्रतीक वॉल स्ट्रीट में दुनिया की जिंदगी पर गहरी जकड़ बना चुके कारोबारी खूनी शिकंजे के खिलाफ ऐतिहासिक प्रदर्शन चल रहे हैं। इनसे बाजार की सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, दुनिया पर बाजार के एक हत्यारे कब्जे के खिलाफ एक सोच खड़ी हुई है जो कि धीरे-धीरे अमरीका से परे भी बाकी देशों में फैलती जा रही है। अमरीका के बहुत से बड़े शहरों में यह आंदोलन जोर पकड़ चुका है और आज सुबह की एक खबर बताती है कि यह चार महाद्वीपों में चल रहा है। ऑस्ट्रेलिया, इटली, ब्रिटेन, जापान, हांगकांग, कोरिया, ताईवान जैसे देश इस फेहरिस्त में जुड़ते जा रहे हैं। (नीचे की रिपोर्ट भी देखें)।
ओडब्ल्यूएस (ऑकुपाई वॉल स्ट्रीट) वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो नाम का यह आंदोलन दुनिया में आर्थिक शोषण और असमानता के खिलाफ आज एक प्रतीकात्मक आंदोलन है, लेकिन एक वक्त हिंदुस्तान की नक्सलबाड़ी में शुरू हुआ आंदोलन भी माओवादी विचारधारा का एक प्रतीकात्मक आंदोलन था जो आज दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दिया गया है।
न्यूयॉर्क शहर में अमरीका की कारोबार की सड़क से जो जख्मी चली आ रही और आज हमलावर हो गई सोच की आग आगे पता नहीं कितने दूर तक फैलेगी लेकिन  इसने इंसानों पर बाजार के लगातार हमलों के खिलाफ एक जागरूकता शुरू की है।  इस मुद्दे पर वैसे तो बहुत कुछ छप रहा है लेकिन इस पर आज लिखने के पीछे मेरी नीयत भारत से इसे किसी तरह जोडऩे की है। इस देश में किसानों और आदिवासियों की जमीनों, नदियों, खदानों को लेकर आजादी के पहले से जिस किस्म की लूट और डकैती चल रही थी वह हाल के बरसों में एक संगठित अपराध वाले माफिया के अंदाज में पहुंच गई थी। नेता-अफसर और कारखानेदार मिलकर जिस बेरहमी से जनता के हक की कुदरती दौलत को जेब कर रहे थे, उसके खिलाफ नक्सल आंदोलन ने एक जागरूकता खड़ी की और फिर गैरनक्सल संगठनों ने देश भर की अदालतों तक जाकर इस लूटमार को धीमा किया है।
कमोबेश इसी तरह का हाल भारत के उन शहरी इलाकों में भी चल रहा है जहां पर नक्सलियों की तरह की गुरिल्ला लड़ाई मुमकिन नहीं है और न ही सुविधाभोगी हो गए शहरी लोगों के बीच लडऩे का वैसा माद्दा रहता है जैसा कि जंगल में बसे हुए उन लोगों में रहता है जिनके पास खोने को कुछ नहीं रहता। लेकिन सूचना के अधिकार  का एक असर यह हुआ कि शहरी भ्रष्टाचार नाम की लूटमार के खिलाफ भी मामले अदालतों तक पहुंचे और नेता-अफसर जेल गए।
अब सवाल यह उठता है कि न्यूयॉर्क की वॉल स्ट्रीट हो या भारत के छोटे-बड़े शहरों की भीड़, ये किस तरह संगठित रूप से इंसान की हिमायत कर सकते हैं? शहरों में नक्सली तो जंगलों की तरह कामयाब हो नहीं सकते और उनके हिंसा के तरीके से दुनिया के आंदोलनकारियों में से अधिकतर असहमत भी होंगे। लेकिन सवाल यह है कि नक्सलियों के बिना अगर जंगलों में बसे आदिवासियों और गरीबों के शोषण और उन पर सरकारी, राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी जुल्म का मुद्दा ही शहरी लोकतंत्र की नजरों में नहीं आता, तो फिर शहरों में चल रहे ऐसे तमाम जुल्म किस किस्म के नक्सलवाद या किस अहिंसक आंदोलन से लोगों की नजरों में आ सकेंगे?
पिछले कुछ दिनों की खबरों को देखें तो भारत में एक भयानक हालत यह है कि अमर सिंह से लेकर येदियुरप्पा तक बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में आलीशान इलाज पा रहे हैं, और गरीब गर्भवती औरतें सरकारी अस्पतालों में जगह न पाकर आधी रात को अस्पताल के सामने फुटपाथ पर रहमदिल कारों की आड़ में बच्चा पैदा करने और फिर उसकी मौत देखने को बेबस हैं। इन दो बातों को एक साथ मिलाकर देखें तो लगता है कि सिवाय नक्सल हिंसा के कैसे शहरों में इस बेइंसाफी का मुद्दा कोई उठा सकता है? यह बात बहुत साफ है कि जंगल और खदानों वाले राज्यों में अगर नक्सली इस कदर कब्जा न कर चुके होते तो भारत की सरकारें और यहां की राजनीतिक पार्टियां भूमि अधिग्रहण के, खदानों के कानूनों पर खुद होकर इस तरह की चर्चा कभी न करतीं।
इस देश और इसके प्रदेशों में जितने बड़े-बड़े घोटाले हो रहे हैं, मायावती जैसे निर्वाचित लोग जिस कदर तानाशाही, बेशर्मी और हिंसा से जनता के पैसों से आत्मस्तुति कर रहे हैं, उसके खिलाफ एक शहरी सोच खड़ी करने के लिए कौन सा रास्ता हो सकता है?
भारत में हिंदी के रोमांचक और जासूसी उपन्यास लिखने वाले एक जाने-माने लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने बहुत पहले एक किताब लिखी थी-खबरदार शहरी। इसकी कहानी मुझे कुछ धुंधली सी याद है और इसमें भारत के कानून और सरकार की नाकामयाबी से थके हुए शहरी जागरूक लोगों की एक टीम खुद ही अपराधियों को निपटाने में लग जाती है। यह तो एक कहानी की बात है, हकीकत में तो किसी भले इंसान को मारना और किसी अपराधी को मारना, एक सरीखा जुर्म है और लोकतंत्र में ऐसे किसी जुर्म की जगह नहीं हो सकती, लेकिन भारत में बहुत बार बनने वाली ऐसी फिल्में भी लोगों को याद होंगी जिनमें कोई थका हुआ पुलिस अफसर नेताओं को ही मारने पर उतारू हो जाता है।
भारत में भी शहरी और गैरगरीब तबकों के ऐसे लोग हैं जो अपनी खुद की जिंदगी में बहुत अधिक कमी न रहने के बावजूद यह मानते हैं कि हिंसा के बिना सबसे कमजोर तबके को इस देश में कभी कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। हम हिंसा के खिलाफ रहते हुए भी यह समझना चाह रहे हैं कि जेल पहुंचते ही आलीशान अस्पताल तक पहुंच जाने वाले नेताओं को निकालकर फुटपाथ पर किस तरह फेंका जाए और किस तरह फुटपाथ पर बच्चा जनती गरीब औरत को अस्पताल के भीतर जगह दिलवाई जाए? किस तरह रोज कमाने-खाने वाले लोगों की बेदखली को रोका जाए और ईश्वर के नाम पर उन्हीं जगहों के इर्दगिर्द बड़े-बड़े अवैध कब्जे, अवैध निर्माण, सुप्रीम कोर्ट के बहुत साफ आदेश के बाद भी बेदखल न होने के मुद्दे को उठाया जाए?
मीडिया तो अपने कारोबार और अपने टीआरपी, अपनी छपी हुई कॉपियों की गिनती, विज्ञापन के अपने कारोबार, इन सबकी असुविधा न होने पर ही सबसे कमजोर तबके की किसी बात को उठाने के बारे में सोच सकता है, और अन्ना हजारे जैसे आंदोलन अन्याय पर हमले के बजाय कांगे्रस की चुनावी संभावनाओं पर खुलकर केंद्रित हो चुके हैं, भाजपा की भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा कर्नाटक के चलते अपने पहिये की हवा खो चुकी है, ऐसे में वॉल स्ट्रीट का आंदोलन भारत के शहरों में कौन शुरू करेगा?
भारत के लोकतंत्र पर भारत के धनपशु किस कदर बैठ गए हैं यह नीरा राडिया और अमर सिंह के टेलीफोन की कानूनी या गैरकानूनी, जैसी भी, रिकॉर्डिंग से साबित हो चुका है और 2जी घोटाले से लेकर बेल्लारी तक यह भी साबित हो चुका है कि लोकतंत्र के तहत चुनावी जीत को देश लूट लेने का ठेका कैसे मान लिया गया है। ऐसी नौबत में फंसे हुए लोकतंत्र के पश्चिम के देशों से निकलकर बाकी जगहों तक फैलता हुआ आंदोलन यहां कैसे शुरू हो सकता है यह सोचने की जरूरत है, इसलिए ये आंदोलन अभी तक बिना हथियारों के है, और जहां पर जुल्म और ज्यादती के खिलाफ बिना हथियार के आंदोलन शुरू नहीं हो पाते, वहां पर हथियारबंद, हिंसक और जानलेवा हथियारों के लिए जगह बन जाती है। शोषण और असमानता के खिलाफ अगर लोग अपने औजार लेकर खड़े नहीं होने दिए गए तो फिर उन्हें हथियार लेकर खड़े होने से कौन रोक लेगा? पश्चिम से उठे जनचेतना के इस झोंके को हम अभी आंधी तो नहीं मानेंगे लेकिन इसकी तरफ आंखें खुली रखना भी जरूरी है और लोकतंत्र-अहिंसा के दायरे में इसे यहां शुरू करना भी जरूरी है।


वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन दुनियाभर में फैला
कारपोरेट लूट, भ्रष्टाचार और सरकारी कटौतियों के खिलाफ पिछले महीने कुछ लोगों द्वारा न्यूयार्क से शुरू हुआ वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन ने यूरोप से लेकर एशिया तक को अपनी चपेट में लिया है। न्यूयार्क और मैड्रिड की तर्ज पर दुनिया भर में ऐसे प्रदर्शन करने वालों आयोजकों ने 82 देशों में शनिवार, 15 अक्टूबर को लोगों से आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया था। इस आह्वान का असर यह हुआ कि एशिया के भी कई देशों दक्षिण कोरिया, जापान, फिलीपींस, हांगकांग, ताइवान में लोग सड़कों पर उतर आए।
इटली की राजधानी रोम में पर्यटन स्थल कालोसियम के पास भारी भीड़ जमा हुई और उसमें से कुछ छात्रों ने एक बैंक पर हमला कर दिया और गाडिय़ों में आग लगा दी। छात्रों ने वहां की दीवारों को लाल रंग में लिखे नारों से रंग दिया। इसमें प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी के खिलाफ रोष प्रकट करते हुए लिखा गया था-हमारा पैसा हमें वापस करो। अमेरिका में न्यूयार्क और ह्यूस्टन शहरों में प्रदर्शन हुए।
इसी तरह न्यूजीलैंड में ऑकलैंड, वेलिंगटन, काइस्टचर्च, यूरोप में मैड्रिड, लंदन, मिलान, रोम एथेंस, सिसली एवं आस्ट्रेलिया में सिडनी, मेलबोर्न आदि शहरों में लोगों ने प्रदर्शन किया।
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में सैकड़ों की संख्या में लोग सरकार के खिलाफ लामबंद हुए। उन्होंने शहर के सिटी स्कवायर में इक_ा होकर अपना रोष व्यक्त किया। इस दौरान देश की राजधानी वेटिलंगटन से भी प्रदर्शनों की खबर है।
सिडनी में प्रदर्शन के एक आयोजक ने विरोध के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि हम सरकार बदलने की बात नहीं कर रहे हैं, हम व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। उसने कहा कि जिस तरह पैसा राजनीति पर हावी है वह बदलना चाहिए। बड़े-बड़े व्यापारिक घराने, खनन कंपनियां राजनीतिक दलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। उसने कहा कि प्रदर्शनकारी 99 फीसदी लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और वह कारपोरेट और वित्तीय जगत के एक फीसदी लोगों के लोभ और भ्रष्टाचार को खत्म करके ही दम लेंगे।
लंदन में विरोध करने वालों का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य वित्तीय व्यवस्था को निशाना बनाना है इसलिए वह वाल स्ट्रीट घेरो की तर्ज पर लंदन शेयर बाजार पर प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं।
ताइवान में विरोध कर रही एक महिला प्रदर्शनकारी ने कहा कि 2008 में मंदी के समय छंटनी के शिकार हुए लोगों को अब तक रोजगार नहीं मिला है। लोग इस आर्थिक व्यवस्था से तंग आ चुके हैं।
जापान के टोक्यो में भी सैकड़ों लोगों ने सरकार के खिलाफ रैलियां निकालीं। उनकी प्रमुख मांग जापान से परमाणु ऊर्जा की विदाई की रही।
फिलीपींस की राजधानी मनीला स्थित अमेरिकी दूतावास के सामने भी बड़ी संख्या में लोग इक_े हुए और उन्होंने साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और फिलीपींस बिकाऊ नहीं है- जैसे नारे लगाए।