आज का यह संपादकीय अदम गोंड़वी की कलम से

संपादकीय
19 दिसंबर 2011
आज का यह संपादकीय अदम गोंड़वी की कलम से
एक जाने माने शायर अदम गोंड़वी के गुजरने से भी उनकी मौत नहीं हुई। अपनी लिखी बातों को लेकर वे हिंदुस्तान के बहुत तकलीफजदा लोगों की आवाज बनकर हमेशा बने रहेंगे। उनकी गज़लें और उनके शेर किसी दूसरे शायर से अलग, पूरी तरह लोगों के दुख-दर्द से उपजे हैं और दो-दो लाईनों में तकलीफ को इस कदर साफ-साफ बयां करना हमारे लिए भी आसान नहीं है। कमोबेश इसी किस्म की बातें हम आए दिन इस कॉलम में लिखते हैं और आज हमें यह लग रहा है कि हम एक दिन में इतनी जगह में इतनी बातें और किस तरह कह सकते हैं, बजाय अदम गोंड़वी को यह जगह दे देने के। हम उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हैं और जुड़े हुए हैं, इसलिए आज का संपादकीय उन्हीं का लिखा हुआ है।
सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है।
कोठियों से मुल्क के मेयार को मत आंकिये
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है।
सत्ताधारी लड़ पड़े है आज कुत्तों की तरह
सूखी रोटी देखकर हम मुफ्लिसों के हाथ में!
जो मिटा पाया न अब तक भूख के अवसाद को
दफन कर दो आज उस मफ्लूज पूंजीवाद को।
बूढ़ा बरगद साक्षी है गांव की चौपाल पर
रमसुदी की झोपड़ी भी ढह गई चौपाल में।
जिस शहर के मुन्तजिम अंधे हों जलवामाह के
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है।
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
रोशनी वो गांव तक पहुँचेगी कितने साल में।
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आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
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घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।
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ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब
जि़न्दगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया
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ज़ुल्फ़-अंगडाई-तबस्सुम-चाँद-आईना-गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब
पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है पढ़े दिल की कि़ताब
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जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
ये बन्दे-मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
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तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
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सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
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बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरखान को
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
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वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
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हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ्ऩ है जो बात, अब उस बात को मत छेडि़ए
गऱ ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेडि़ए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेडि़ए
छेडि़ए इक जंग, मिल-जुल कर गऱीबी के खिलाफ़
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेडि़ए

छोटी सी बात

18 दिसंबर
छोटी सी बात
कागज के एक तरफ खाली पन्नों, इस्तेमाल हो चुके लिफाफों का भी कुछ अनौपचारिक इस्तेमाल हो सकता है। ऐसी कोशिश से ही धरती बच पाएगी।

अक्ल की जगह कैमरा-माईक

18 दिसंबर 2011
संपादकीय
अक्ल की जगह कैमरा-माईक
राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत सी बातें मीडिया में रोज ऐसी आती हैं जिन्हें देख-सुनकर, पढ़कर आम समझ रखने वाले लोग भी यह अंदाज लगा पाते हैं कि मामले में कितना वजन है। फिर जिन लोगों का भरोसा एक प्राकृतिक न्याय पर रहता है और जो लोग तर्कसंगत और न्यायसंगत बात करने और सुनने जितनी समझ रखते हैं वे लाईनों के बीच का भी न लिखा हुआ पढ़ लेते हैं जो कि आमतौर पर बयान देने वालों की नीयत रहती है और छापने या दिखाने वालों की हड़बड़ी रहती है। हमें अधिक हैरानी इस बात पर होती है कि बड़े-बड़े दिग्गज अखबारनवीस या टेलीविजन पत्रकार लोगों की कही हुई भारी सनसनीखेज बातों को उसी अंदाज में लिखकर या रिकॉर्ड करके अपने पाठकों और दर्शकों के सामने पेश कर देते हैं जिस अंदाज में डिक्टेशन लेने वाले एक स्टेनोग्राफर से उम्मीद की जाती है। अगर काम ऐसे ही करना है तो रिपोर्टर की महंगी तनख्वाह के बजाय बहुत कम तनख्वाह पर स्टेनोग्राफर मिल सकते हैं जो कि डिक्टेशन लेने में चूक भी नहीं करेंगे। एक वक्त जब टीवी के कैमरे नहीं रहते थे, तो अखबारों के लोग भी अधिक मेहनत करते थे क्योंकि उन्हें शब्दों से ही सब कुछ पेश करना होता था। अब वह गंभीरता कम होते-होते खत्म सी हो गई है और आज ऐसा सोचने और इस मुद्दे पर लिखने के हमारे पास कुछ ठोस कारण हैं।
आज हम यहां अन्ना हजारे से बात की शुरूआत कर रहे हैं लेकिन हम उनके बारे में कुछ लिखना नहीं चाह रहे, हम मीडिया के बारे में लिखना चाह रहे हैं। पिछले कई महीनों से लगातार अन्ना हजारे यह बात कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो ठीक हैं लेकिन उन पर काबू रखने वाला रिमोट कंट्रोल खराब है। अभी कई हफ्तों से वे राहुल गांधी के बारे में कह रहे हैं कि लोकपाल बिल में फेरबदल राहुल गांधी की दखल से करके उसे कमजोर किया गया है। यह कहते हुए वे सोनिया के घर के बाहर धरने की बात भी कह रहे हैं। कुछ महीने पहले वे कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरू गए थे और वहां उस वक्त तक जेल न गए हुए भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को पूरी तरह अनदेखा करते हुए जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट को पूरी तरह अनदेखा करते हुए सिर्फ यूपीए और कांगे्रस पर हमला करते हुए वे लौट आए थे। जस्टिस हेगड़े अन्ना के साथ के ही लोकपाल मसौदा कमेटी के सदस्य थे और उनकी जांच रिपोर्ट के आधार पर इस मुख्यमंत्री को हटना पड़ा था और जेल जाना पड़ा था। हम अन्ना हजारे के बारे में आज कुछ भी कहना नहीं चाहते लेकिन किसी व्यक्ति, खासकर जो व्यक्ति आदर्श की कुतुबमीनार को एफिल टॉवर की ऊंचाई तक ले जाना चाह रहा हो, उससे कुछ सवाल करने की जिम्मेदारी मीडिया की बनती है या नहीं? वे अगर बिना किसी बुनियाद के किसी को रिमोट कंट्रोल कहते हैं, किसी को लोकपाल में दखल देने वाला कहते हैं, कल यह कहते हैं कि लोकपाल होता तो यह चिदंबरम जेल में होता, तो ऐसी बातों पर उनकी रिकॉर्डिंग करने वाले मीडिया के लोग उनसे उनके इन आरोपों की बुनियाद क्यों नहीं पूछते? हमें देश के किसी भी चैनल पर और किसी भी अखबार में बेंगलूरू में अन्ना हजारे से पूछे गए ऐसे किसी सवाल को देखना या पढऩा नसीब नहीं हुआ। एक व्यक्ति अगर आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित, अहंकारी और महत्वोन्मादी होकर रात-दिन बेबुनियाद आरोप लगा रहा है तो हमें यह लगता है कि लोकतंत्र के इस नए अंदाज के सामने क्या मीडिया अपने-आपको भी पेश करना चाहेगा? काम के बाद मीडिया के जो लोग शराब पीते हैं, क्या वे लोग अपने-आपको अन्ना के कोड़ों के सामने खड़ा करेंगे? क्या जिन लोगों के चैनल धर्म के अलावा कुछ दूसरी बातें भी दिखाते हैं, उन सबको अन्नाराज के गांव में बंद हो जाना पसंद होगा?
लोगों की आशंकाएं या उनकी बदनीयत अगर ज्यों की त्यों खबर बन रही है क्योंकि वह टीवी समाचारों की जरूरत के मुताबिक पांच-दस सेकंड के एक टुकड़े में आपत्तिजनक और सनसनीखेज बात कह देती है, तो क्या ऐसे तमाम नारे बिना किसी सवाल के सीधे-सीधे खबर हैं? अन्ना की सारी बातें नारों की शक्ल में हैं और नारों के लिए तुकबंदी काफी होती है, किसी किस्म की सच्चाई की जरूरत नहीं पड़ती। यह सिलसिला हम इसलिए शर्मनाक मानते हैं कि आज मीडिया में दिमाग की जगह कैमरों और माइक्रोफोन ने ले ली है। एक वक्त था जब अखबारनवीसी में लोग सवाल तैयार करके जाते थे और लोगों को अपने सवालों से परेशान करके, पाठक के मन में उठने वाले सारे सवालों के जवाब लेकर आना अपने पेशे की जिम्मेदारी समझते थे। उस वक्त की हमें एक याद है कि अविभाजित मध्यप्रदेश के एक सबसे बड़े पत्रकार, और प्रकाशक भी, स्व. मायाराम सुरजन से तत्कालीन मुख्यमंत्री ने यह शिकायत की थी कि उनके एक संवाददाता प्रेस कांफे्रंस में उन्हें परेशान करने वाले सवाल करते हैं। इस पर उन्होंने शिकायत से जुड़ी हुई खबरों को देखा था और मुख्यमंत्री को रूबरू कहा था- 'हमारे अखबार के संवाददाताओं को कहा जाता है कि वे सवाल तैयार करके जाएं और उन्हें पूछकर आएं, इसलिए मुझे इन सवालों में कोई गलती नजर नहीं आ रही है।Ó यह कहते हुए उन्होंने इतना जरूर कहा था कि अगर संवाददाता के बोलने के लहजे में कोई गड़बड़ी थी तो वे उसे यह दुरूस्त करने के लिए जरूर कहेंगे। लेकिन वह दौर उनके जैसे पत्रकारों के साथ खत्म हो गया है और आज न वैसे सवाल पूछने वाले संवाददाता बहुत अधिक रहते और न ही पाठक को उसकी उम्मीद के, जरूरत के सवालों के जवाब मिलते। यह सिलसिला कैसे सुधरेगा, कैसे मीडिया अपनी इस बहुत साधारण सी तकनीकी काबिलीयत का इस्तेमाल करेगा, पता नहीं।

भूख और लूट

17 दिसंबर 2011
संपादकीय
भूख और लूट
देश में इनकमटैक्स का जो बकाया है उसका नब्बे फीसदी हिस्सा कुल एक दर्जन लोगों से वसूला जाना है। इनमें बड़े-बड़े जालसाज, शेयर बाजार के धोखेबाज शामिल हैं और देश के सीएजी की रिपोर्ट में इन आंकड़ों के साथ यह भी कहा गया है कि इस वसूली के कोई आसार नहीं हैं। सरकार को 1.96 लाख करोड़ रुपये टैक्स वसूल करना है, और यह लगभग पूरे का पूरा सिर्फ दर्जन भर लोगों का डुबाया हुआ है। यह किस तरह का लोकतंत्र है जिसमें कुछ लोग इस कदर ताकतवर हो जाते हैं कि वे अपनी पूरी जिंदगी देश की दौलत को, सरकार को, जनता के हक को लूटने में लगाए रखते हैं और सरकार, कानून, और बाकी की संवैधानिक संस्थाएं मानो स्टेडियम की कुर्सी पर बैठे हुए एक सर्कस का मजा लेती रहती हैं। ऐसे देश में कुछ लोग अगर बंदूक उठाकर ऐसे लोकतंत्र के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, तो उसमें गलत चाहे जितना हो, हैरानी का क्या है? आज ही सुबह अरब दुनिया के लोकतांत्रिक आंदोलनों में लगे हुए किसी एक ने लिखा- ''अपने तमाम आक्रोश के बावजूद आज मेरी हालत पिंजरे में बंद एक चूहे जैसी है।ÓÓ
हमें लगता है कि अरब देशों से लेकर हिंदुस्तान तक साधारण इंसान की हालत अपने तमाम आक्रोश के बावजूद पिंजरे में बंद चूहे जैसी ही है। जिन देशों में आज क्रांति होते दिख रही है वहां का सच भी आगे चलकर इतिहास में क्या दर्ज होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन भारत में आज बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे घोर अलोकतांत्रिक लोगों के तानाशाह और बदनीयत, पक्षपाती राजनीति वाले आंदोलनों से लोग अगर जुड़े हैं तो यह उनकी एक भड़ास का ही नतीजा है। पिंजरे में बंद चूहों को अगर एक जगह जुटने का मौका मिलता है, और वे एक जगह जुट जाते हैं तो फिर वे बंधनों को किस तरह काट सकते हैं, इसको लेकर दुनिया के हर देश में छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी कहानियां प्रचलित हैं। हम तो बिना गलती शायद ही 1.96 लाख करोड़ की संख्या लिख पाएं, लेकिन आज सुबह जब सामने यह खबर तभी अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की यह खबर भी सामने है कि राजधानी के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में छह महीने पहले मरे दो बरस के एक बच्चे के मां-बाप पर अब पुलिस ने मामला दर्ज किया है कि उन्होंने लापरवाही से, भूख से उस बच्चे की मौत की नौबत लाई थी। यह पूरा सिलसिला भयानक है और जब इस देश में ऐसी मौतों की नौबत आ रही है तभी इस देश में तथाकथित लोकतांत्रिक सत्ता जिस तरह गिरोहबंदी और साजिश से जनता के हक पर डाका डाल रही है, उसके खिलाफ जंगलों से परे के शहर पता नहीं कब तक नक्सलियों वाले होने से बचे रहेंगे। पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हमने इसी जगह कर्नाटक के सोना खदान वाले जिले रायचूर के बारे में लिखा था जहां पर छह बरस से कम उम्र के छब्बीस सौ बच्चे पिछले दो बरस में ही कुपोषण का शिकार होकर मरे हैं। ये आंकड़े राज्य के ही महिला एवं बाल कल्याण विभाग के दिए हुए थे। यही पर एक दूसरी खबर अभी हमारे हाथों में है कि छत्तीसगढ़ से छोटे-छोटे बच्चों को इसी कर्नाटक में ले जाकर बेचकर या भाड़े पर देकर, उनको नशा कराकर किस तरह उनसे जबरिया भीख मंगवाई जाती थी और अभी किस तरह से वे वहां से आजाद किए जा रहे हैं। कल सबसे पहले हमने ही इस बारे में रिपोर्ट छापी और आज वहां दो दर्जन से अधिक बच्चों की तो छत्तीसगढ़ी होने की शिनाख्त हो चुकी है। यह अपराध का एक अलग मामला है लेकिन हम दूसरी तरफ यह देखते हैं कि इतने छोटे बच्चों को अगर कोई खरीदकर या भाड़े पर लेकर जा रहा है और उन पर ऐसी ज्यादती कर रहा है, तो इसके पीछे देश की गरीबी भी जिम्मेदार है, और यह गरीबी इस देश के हर्षद मेहताओं जैसे लुटेरों की भी खड़ी की हुई है। जब भारत की सरकार इतनी बड़ी रकम ऐसे लोगों से नहीं वसूल कर पा रही है तो वह कैसे लोगों का हक लुटेरों को दे रही है यह बात जाहिर है। जब कर्नाटक के कुपोषण के शिकार बच्चे, छत्तीसगढ़ से बिककर दूसरे प्रदेशों में जाकर भीख मांगने में लगाए गए बच्चे, ऐसी जिंदगी जी रहे हैं, और ऐसी मौत मर रहे हैं तब इस देश का नब्बे फीसदी आयकर बकाया अगर कुल एक दर्जन लोगों के पास डूब रहा है, तो हमारे पास यह मानने की कोई वजह नहीं है कि इन एक दर्जन लुटेरों के साथ सत्ता की भागीदारी नहीं है। सत्ता की हिस्सेदारी के बिना इतनी बड़ी लूट नहीं हो सकती, और ऐसी सत्ता के खिलाफ देश के बाकी हिस्सों में भी खड़े होने में नक्सलियों, या दूसरे हथियारबंद लोगों को और कितना वक्त लगेगा?

हितों के टकराव ऐसे दिग्गज वकील न समझें, तो कौन समझेगा?

16 दिसंबर 2011
संपादकीय
हितों के टकराव ऐसे दिग्गज वकील न समझें, तो कौन समझेगा?
जिन लोगों को ज्योतिष और भविष्यवाणी पर भरोसा हो वे कह सकते हैं कि यूपीए, कांगे्रस और चिदंबरम के दिन ठीक नहीं चल रहे। जिन लोगों को ऐसे पाखंड के बजाय कुदरत पर अधिक भरोसा हो, वे कह सकते हैं कि जो जैसा बोता है, वो वैसा काटता है। जिन लोगों को सार्वजनिक जीवन में नैतिकता पर अब भी भरोसा हो वे नेहरू-गांधी को याद कर सकते हैं कि एक वक्त उनकी रही पार्टी का आज ऐसा बुरा हाल हो गया है। लेकिन हम साफ-साफ लफ्जों में अगर लोकतंत्र और कानून के हिसाब से कड़ी और खड़ी बात करें तो गृहमंत्री पी. चिदंबरम एक बात के गुनहगार हैं कि उन्होंने अपनी वकालत के वक्त के मुवक्किलों में से एक के खिलाफ मामला वापिस लेने की नौबत अपने मंत्रालय में आने दी। पूरी जांच के पहले हम अभी उन्हें सोच-समझकर ऐसा करने का गुनहगार तो नहीं कहेंगे लेकिन यह बात साफ है कि जो लोग किसी एक पेशे में रहते हैं, उन लोगों को कोई भी सार्वजनिक पद संभालते हुए यह याद रखना चाहिए कि बीते कल तक वे जिस धंधे में थे, उस धंधे का कोई नफा-नुकसान तो आज उनके दफ्तर से, उनके मातहतों के हाथों से नहीं हो रहा?
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन बरस पहले जब अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री थे तब उनके मंत्रालय में स्कूली बच्चों के दोपहर के भोजन की योजना में गर्म पके भोजन के बजाय कारखानों से बने पैकेटबंद बिस्किट देने की एक साजिश चली थी। बिस्किट कारखानादारों ने इसके लिए सभी पार्टियों के सांसदों के बीच एक बड़ी लॉबिंग की थी। अर्जुन सिंह के मंत्रालय में उनकी बेटी ने जाकर एक आईएएस अफसर से बात की थी जिसने इस बात को फाईल पर दर्ज कर दिया था। वह एक मामला एक नेता के विभाग में हितों के टकराव का मामला था जिसमें तेरह हजार करोड़ रूपए से अधिक की यह सालाना योजना दसियों करोड़ बच्चों के सेहत को बेचकर धंधेबाजों को कमाई करवाने की कोशिश थी। ऐसे मेें मंत्री का परिवार किसी भी तरह से अगर दखल देता है तो विभाग का फैसला उससे खराब हो सकता है। ऐसा ही हितों का टकराव हम चिदंबरम के इस मामले में देखते हैं। केंद्र सरकार में आने के बाद किसी भी बड़े वकील को यह चाहिए कि वह अपने पुराने मुवक्किलों की एक फेहरिस्त बनाकर सरकार को दे दे ताकि उनसे जुड़े हुए कोई भी मामले सामने आने पर वे अपने को उस फैसले से अलग रखें।
सरकारों में यह जगह-जगह सामने आता है कि नेता या अफसर अपने से जुड़े हुए मामलों, अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और भागीदारों के मामलों को भी खुद देखते रहते हैं। हमारा मानना है कि किसी भी पद की जो शपथ ली जाती है, या फिर सेवा-शर्तों के तहत जो लोग नौकरी करते हैं उन सबसे यह पूरी तरह हलफनामे पर ले लेना चाहिए कि किसी भी मामले में उनके दूर के भी संबंध होने या उनके हित प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े होने पर वे खुद होकर उसकी घोषणा करेंगे और अपने-आपको फैसले से अलग कर लेंगे। अदालतों में ऐसी परंपरा हमेशा से रही है कि हर जज को यह घोषणा करनी होती है कि उनके कौन से संबंधी वकालत करते हैं। इसी तरह अपनी पुरानी फर्म के मामलों को वे जज नहीं देख सकते। एक बड़े कमाऊ वकील रह चुके चिदंबरम से यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वे अपने से जुड़े हुए मामलों को लेकर यह बात पहले ही सरकार के सामने साफ कर देते कि वे कहां किस चीज से जुड़े रहे हैं। ऐसा न करके उन्होंने एक अनैतिक काम तो किया ही है, आगे जाकर जांच में यह भी साबित हो सकता है कि उन्होंने एक पक्षपाती काम भी किया। यह उनकी पार्टी और उनके गठबंधन के लिए भी एक शर्मनाक बात होगी, आज भी है।
और यह बात सिर्फ उन्हीं के बारे में हम नहीं लिख रहे, देश और सभी प्रदेशों में लोगों को यह साफ-साफ उजागर करना चाहिए कि कहां-कहां उनके निजी हित जुड़े हुए हैं और वे अपने-आपको कुछ मामलों से अलग क्यों रखें। इन दिनों छत्तीसगढ़ में एक ऐसी चर्चा चल रही है कि एक जज का परिवार कहीं और वकालत कर रहा है, इधर जज के सामने सरकार के खिलाफ कई मामले हैं, और उधर जज के संबंधी को सरकार ने अपना वकील बनाया है। अगर ऐसी बातें सच साबित होती हैं तो ये इन तीनों पक्षों के लिए एक शर्मिंदगी की बात हो सकती है।

शराब कारोबार, जरूरत से अधिक रोक-टोक से किसी दिन बंगाल जैसी नौबत न आए...



संपादकीय
15 दिसंबर
शराब कारोबार, जरूरत से अधिक रोक-टोक से किसी दिन बंगाल जैसी नौबत न आए...

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का पीछा बड़े-बड़े हादसे छोड़ ही नहीं रहे हैं। देश में सबसे अधिक मेहनत करने वाली मुख्यमंत्रियों में से एक और शायद सबसे अधिक सादगी से रहने वाली ममता को अस्पतालों में छोटे बच्चों की थोक में मौत झेलनी पड़ रही है, अस्पताल की आग देखनी पड़ रही है और अब नकली या जहरीली शराब से पूरे सौ लोग एक साथ मारे गए हैं। देश में हाल फिलहाल में शराब से होने वाली यह सबसे बड़ी मौत है। हम इस घटना से सबक लेते हुए छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बात करना चाहते हैं जहां पर राज्य सरकार पिछले करीब एक बरस में शराब कारोबारियों पर तगड़ा वार करके उनका धंधा मुश्किल कर दिया है, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि शराब माफिया की मनमानी बंद कर दी है। जब तक कोई धंधा सरकार के दिए हुए लाइसेंस से चलता है, और जब तक उसमें कोई अपराध नहीं पकड़ाता है तब तक उसे माफिया कहने से हम सहमत इसलिए नहीं रहते क्योंकि उससे इस शब्द की गंभीरता खत्म हो जाती है। पूरी दुनिया का इतिहास गवाह है कि शराबबंदी जिस देश में या जिस प्रदेश में रही, वहां पर माफिया पनप गए और अमरीका में करीब आधी-पौन सदी पहले शराब पर रोक के चलते उस कारोबार भूमाफिया जिस तरह काबू में रखता था और पुलिस के साथ जिस तरह उसकी खुली मुठभेड़ होती थी, उस पर ढेरों फिल्में भी बनी हुई हैं। भारत में ही गुजरात का हाल देखें तो वहां लंबे समय से चली आ रही शराबबंदी के बाद भी हर तरह की शराब आसानी से मिलती है और फर्क सिर्फ यही है कि उस शराब के असली या नकली होने की कोई गारंटी नहीं होती और वह मनमाने दाम पर बिकती है जिस पर सरकार को कोई टैक्स तो नहीं मिलता लेकिन सरकार का अमला इस माफिया कारोबार के चलते इस कदर भ्रष्ट हो चुका है कि मुंह लगा हुआ यह खून शायद ही कभी छूट पाए।
हम छत्तीसगढ़ की चर्चा करना चाहते हैं। यहां सरकार ने पिछले एक-दो बरस में लगातार छोटे गांवों से शराब दुकानों को हटा दिया है और कई गांवों को 15-20 किलोमीटर दूर ही शराब दुकान पड़ती है। लोगों का शराब पीना इससे कम होगा ऐसा सरकार का मानना है, लेकिन जिनको इसकी आदत है, या जरूरत है, वे लोग किसी दूसरे की लाई हुई शराब या शराब माफिया की स्मगलिंग की शराब पर टिके रहेंगे। नतीजा यह है कि लोग शहरों में तो एक किलोमीटर पर शराब पा जा रहे हैं, गांवों में लोग 20 किलोमीटर तक जाने को बेबस किए जा रहे हैं और राज्य सरकार की यह घोषणा है कि आने वाले बरसों में वह और अधिक गांवों से शराब दुकानों को हटा देगी। शराब एक बुरी चीज है यह गांधी के समय से लेकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह  तक हर कोई कह रहा है। लेकिन शराब के जो दूसरे विकल्प नशे के आदी लोग ढूंढ लेंगे, और आज भी दबे-छुपे ढूंढ रहे हैं वे शराब से कई गुना अधिक खतरनाक हैं। तरह-तरह के नशे लोगों को खत्म कर सकते हैं। जिस अमरीका में शराब पूरी तरह खुली है, वहां पर भी अब डॉक्टरी सलाह से भांग और गांजा जैसे कम नुकसानदेह नशे को कानूनी दर्जा देकर तरह-तरह से लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है कि अगर किसी मजबूरी में उन्हें नशा करना ही है तो वे कम नुकसानदेह नशा करें, बजाय खतरनाक दवाईयों के। छत्तीसगढ़ की शराब नीति अगर बिना किसी विकल्प के, बिना किसी जागरूकता के और बिना व्यवहारिकता के सिर्फ सरकारी अमले के दम पर लागू की जाएगी तो चारों तरफ बिना शराबबंदी वाले राज्यों से शराब आना तो आज भी हो सकता है, और कल हो सकता है कि जहरीली शराब आकर बिके, और खतरनाक नशे के सामान आकर बिकें। हम हर बात पर सरकार के प्रतिबंध को जरूरी या सही नहीं मानते। लोगों के बीच में उनके अच्छे और बुरे के लिए एक जागरूकता पैदा करना अधिक जरूरी है, बजाय उन्हें एक खतरनाक जगह पर छोड़ देने के, जहां सरकार उनके दूसरे रास्तों पर कभी काबू नहीं कर पाएगी। आज तो चार-छै बोतलों को लेकर जाने वाले छोटे-छोटे शराब तस्करों को पकड़कर सरकार उनके खिलाफ बहुत कड़े कानून लागू कर रही है, जेल भेज रही है, लेकिन जेब की पुडिय़ा में रखकर जब लोग नशे का धंधा करेंगे तो उन्हें पकडऩा इतना आसान नहीं रहेगा।
छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के समय से शराब के कारोबार को सरकार इस कदर अपने काबू में रखती है कि वह जब चाहे किसी कारोबारी को माफिया साबित कर सकती है और इस धंधे से सत्ता जब चाहे तब जितनी चाहे उतनी वसूली भी दशकों से करती चली आ रही है। जरूरत से अधिक नियम और रोक-टोक, मनमानी, पक्षपात और भ्रष्टाचार सबको बढ़ाते हैं। इस राज्य में शराब के कारोबार को तर्कसंगत तरीके से तय करने की जरूरत है, आज सरकार की नीति लोगों का भला करने की नीयत से चाहे बदली जा रही हो, किसी दिन यहां पश्चिम बंगाल के आज के हादसे जैसा हादसा हो सकता है।

उनकी बेशर्मी जीतेगी या हमारा बर्दाश्त?

14 दिसंबर 2011
संपादकीय
उनकी बेशर्मी जीतेगी या हमारा बर्दाश्त?
राजस्थान के भंवरी देवी मामले को लेकर हमने एक पहलू पर अभी कल-परसों ही लिखा है कि लोगों को खुफिया कैमरों और माइक्रोफोन के इस जमाने में किस तरह चौकन्ना रहना चाहिए। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू और है। कांगे्रस सरकार का एक ताकतवर मंत्री इस महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लापता होने, और शायद मारे जाने, के मामले में गिरफ्तार है और आज सुबह सीबीआई ने कांगे्रस के एक विधायक के घर छापा मारा है जिसके बारे में इस गायब महिला के पति ने सीबीआई को ऐसा बयान दिया है कि यह विधायक उसकी पत्नी के एक बच्चे का पिता है। आज के भारत के सामाजिक पैमानों के मुताबिक यह मामला कुछ अधिक ही कालिख से घिरा हुआ होते जा रहा है। और यह सिलसिला कोई एक दिन में तो खड़ा हुआ नहीं होगा, लंबे समय से किसी बदचलन की हरकतें ब्लैकमेलिंग से लेकर हत्या तक की ऐसी नौबत तब पहुंची होंगी।
अब सवाल यह उठता है कि कांगे्रस को या कोई और राजनीतिक दल, जब पार्टियां गांव-कस्बों तक अपने लोग होने का दावा करती हैं, करोड़ों में सदस्यता बताती हैं तो अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के ऐसे चाल-चलन उनकी नजरों में पहले क्यों नहीं आते? जब घड़ा इतना भर चुका होता है कि उसके सिर पर फूटने से पूरा बदन गंदगी से लथपथ हो जाता है, तब भी अदालत के कटघरे तक पहुंचने के पहले पार्टियां अपने कुकर्मियों को बर्दाश्त करते रहती हैं और उन्हें अपने सिर पर बिठाकर रखती हैं। जिस देश में नैतिकता के पैमानों को चौराहों पर टांगकर रखा जाता है, वहां पर राजनीतिक दलों के सामने चोरी, डकैती, बलात्कार, भ्रष्टाचार जैसे तमाम मामलों में गले-गले तक डूबे हुए नेताओं को सजा के पहले तक सजाकर रखने की क्या बेबसी होती है? किसी को पद से हटा देने, चुनाव में टिकट न देने, पार्टी में कोई कुर्सी न देने को सजा तो नहीं कहा जा सकता? तो ऐसे दागी लोगों को अदालत से बरी हो जाने तक पार्टी हाशिए पर क्यों नहीं रख सकती? यह पूरा सिलसिला बताता है कि पार्टियों की सोच जब बहुत घटिया होती है तो ही वे अपने अपराधियों को ढोती हैं। एक अपराधी को अपराधी साबित होने में अदालत में दस-बीस-पचीस बरस लग सकते हैं। लेकिन अपराधों से अच्छी तरह वाकिफ और तजुर्बेकार पार्टियां तो पल भर में अपने मवालियों को पहचान सकती हैं और पार्टी के दफ्तर में बैठकर तुरंत ही अंदाज लगा सकती हैं कि वे कितने बड़े मुजरिम हैं। इसके बाद वे अगर ऐसे लोगों को राजनीति और सावर्जनिक जीवन की मूलधारा से अलग करके उन्हें व्यक्तिगत रूप से बच जाने का एक स्वाभाविक मौका दें तो उसमें कोई बात नाजायज नहीं होगी। लेकिन पार्टियों का हाल यह है कि वे अपने बदन के ट्यूमर की तरह अपने कुकर्मियों को ढोते चलती हैं। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का तकाजा अब न नेताओं को छूता है और न उनकी पार्टियों को। एक-दूसरे के देखा-देखी अब पार्टियां खुलकर दूसरी पार्टी के मवालियों की मिसालें देती हैं और यह सवाल करती हैं कि मेरा मुजरिम तुम्हारे मुजरिम से अधिक बुरा कैसे?
अभी कल ही हमने इसी पेज पर अमरीका में बसे अपने एक छत्तीसगढ़ी पाठक का भेजा पत्र छापा है जो कि इंटरनेट पर रोज इस अखबार को देखकर अक्सर अपनी राय भेजते हैं। इस अखबार के एक संपादकीय के बारे में उन्होंने लिखा है-''कोई डेढ़ सौ अपराधी और दागी लोग भारतीय संसद और विभिन्न विधानसभाओं में जनता के प्रतिनिधि बनकर घुस आये हैं। और जैसा कि आपने लिखा है इनमें से कई लोग तो सत्ता का मजा भी ले रहे हैं। चारा-घोटाला कांड में जेल की सजा काटकर भी लालू प्रसाद यादव पांच साल तक रेल मंत्री रहे इससे दुखद और हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है। गंभीरता से सोच कर देखें तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सबसे पहली गलती तो दागी लालू को रेल मंत्री बनाकर ही की थी। राजा ने तो बाद में बाजा बजाया, प्रजा को चौपट किया और उसे चूना लगाया। अमरीका में उन्हें भी (लालू को) 14 साल से कम की सजा न होती और यहां की सुप्रीमकोर्ट उनके चुनाव लडऩे पर हमेशा के लिए रोक लगा देती। जैसा कि आपने लिखा है कि यदि रावण के किए की सजा राम उसे बीस बरसों बाद देते / सीता को स्वतंत्र कराते तो उनका क्या हाल होता।ÓÓ
भारत की सत्ता की राजनीति में कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब किसी न किसी पार्टी के बारे में हमें ऐसा न लगे कि इस पार्टी के नेताओं को दिखता नहीं है या वे जुर्म के फायदों में भागीदार हैं? सच तो यह है कि खबरों को रोज देखकर दिल बैठने लगता है और लोकतंत्र पर से भरोसा खत्म होने लगता है। अब इस दौड़ में पहले लोकतंत्र की जिम्मेदार संस्थाएं पूरी तरह खत्म हो जाती हैं या उसके पहले हमारा हौसला, हमारे जैसे लोगों का हौसला उसी तरह खत्म हो जाता है जिस तरह बरसों पहले से नक्सलियों का हो चुका है?

जिनका हक नहीं है, वे खुद होकर सरकारी रियायत का लालच छोड़ें

13 दिसंबर 2011
संपादकीय
जिनका हक नहीं है, वे खुद होकर सरकारी रियायत का लालच छोड़ें
केंद्र सरकार के पेट्रोलियम राज्यमंत्री आर.पी.एन. सिंह ने संपन्न तबके से कहा है कि उसे खुद होकर रियायती रसोई गैस नहीं खरीदना चाहिए और पूरे दाम की गैस लेना चाहिए क्योंकि वह रियायत का हकदार नहीं है। आज के इस देश के माहौल में ऐसी महीन बातों के लिए हवा में कोई गुंजाइश नहीं बची है क्योंकि जनता यह मानकर चल रही है कि अगर कोई मंत्री है तो उसने सैकड़ों करोड़ों का घपला किया ही होगा और नौ सौ चूहे खाने के बाद अब बिल्ली प्रायश्चित करने चली है। हम इस सोच को मंत्री के नाम से अलग करके उस पर बात करना चाहते हैं। कोई बुरा व्यक्ति भी अगर कोई भली बात कहता है तो उस बात के भलेपन को तो आगे बढ़ाना ही चाहिए। हम ही यहां पर हर दिन कई किस्म की नसीहतें देते हैं, लेकिन जाहिर है कि बहुत सी कमजोरियों के साथ जीते हुए हम उनमें से हर किसी पर पूरी तरह अमल नहीं कर पाते होंगे। लेकिन हमारे जैसे कमजोर लोगों के नाम को अलग करके उस सोच को अपने-आपमें मजबूत मानकर उस पर बात करनी चाहिए।
देश की कोई भी रियायत नैतिक रूप से जरूरतमंद, और लगभग अनिवार्य रूप से गरीबों के लिए होती है और होनी चाहिए। ऐसे में सरकार का इंतजाम अगर अपनी अमल की सीमाओं के तहत यह फर्क नहीं कर पाता है कि गैरगरीबों को रियायत से दूर कैसे रखा जाए तो ऐसे ताकतवर तबके को खुद ही होकर रियायतों से बाहर हो जाना चाहिए। पिछले कुछ महीनों से, जब से पेट्रोलियम के दाम बढऩे का हल्ला हुआ है तब से हमने कई-कई बार यह लिखा है कि रियायत का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों तक जाता है जहां तक सरकार कोई छन्नी लगाकर मलाईदार तबके को फायदे से दूर नहीं कर पाती। ऐसे में रियायत का एक बड़ा बेजा इस्तेमाल हो जाता है जो कि गरीबों से लबालब इस देश में गरीबों के हक को छीनकर ही दिया जाता है। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए और हमारा यह मानना है कि एक सीमा से अधिक तनख्वाह वाले लोग, एक आयवर्ग के लोग रियायतों से बाहर कर दिए जाने चाहिए। जिस बात से हमने शुरू किया है, वैसे नैतिकता अब कम बची है इसलिए पता नहीं ऐसे कितने लोग मिलेंगे जो कि उस पर खुद होकर अमल करें, इसलिए सरकार को इस रियायत को इन तबकों तक पहुंचने के लिए रोकने से ऐसी सरहद तय करनी चाहिए।
कल-परसों ही हमने पर्यावरण पर बोझ बनने वाले, बड़ी खपत वाले लोगों और देशों पर खपत के अनुपात में एक टैक्स लगाने की सलाह दी थी, रियायत से ऐसे लोगों को दूर रखना तो उसके भी पहले होना चाहिए। दरअसल आर्थिक मंदी की बहुत बड़ी मार जिस देश या जिस प्रदेश पर नहीं पड़ती है, वह देश और प्रदेश किफायत में जीना नहीं सीख पाते और बर्बादी से बचना नहीं सीख पाते। जब इंसानों के खाने को दाने नहीं बचते तो फिर लोग चूहों के पेट में जाते हुए गोदाम की फिक्र करते हैं। भारत में अभी किफायत को लेकर चौकन्नापन नहीं आ रहा है, और हम यही बात छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के बारे में भी कहना चाहते हैं जो कि अपनी अतिसंपन्नता के चलते हुए किफायत की तरफ से बेफिक्र सा है। राज्य की चर्चा होने पर हमें एक बात यह भी याद पड़ती है कि केंद्र सरकार की तरह-तरह की रियायत की योजनाएं आखिरकार राज्य सरकारों को ही अमल में लानी पड़ती है और अगर राज्य की मशीनरी लापरवाही बरतती है तो वह रियायत चोरों के पेट में बहुत रफ्तार से पहुंच जाती है। छत्तीसगढ़ में ही हम लगातार इस बात को देखते हैं कि किस तरह रियायती गैस सिलेंडरों का इस्तेमाल धड़ल्ले से होटलों और कारखानों में हो रहा है। केंद्र सरकार भारत के संघीय ढांचे के तहत खुद होकर इस रियायत को लोगों तक नहीं पहुंचा सकती। इसलिए अब एक यह सोच तैयार हो गई है कि कुछ किस्म की रियायत गरीबों के बैंक खातों में सीधे जमा कर दी जाए ताकि राज्यों में रियायत को पहुंचाने में हो रहे भ्रष्टाचार से बचा जा सके। अनाज की रियायत को लोगों तक नगद पहुंचाने के खिलाफ जानकार और संवेदनशील विशेषज्ञों के एक तबके का विरोध भी है कि ऐसे पैसों का पूरा इस्तेमाल परिवार के खाने के लिए नहीं हो पाएगा। ऐसी नौबत से कैसे बचा जाए, यह एक अलग सोच की बात है जिस पर केंद्र और राज्य के सभी जिम्मेदार लोगों को मेहनत करनी चाहिए, दूसरी तरफ हम उस बात को फिर उठाना चाहते हैं कि जो तबके रियायत के हकदार नहीं हैं, उन्हें खुद होकर ऐसी रियायत की लालच से बचना चाहिए।

छोटी सी बात

12 दिसंबर
छोटी सी बात
किसी और की पसंद के टीवी कार्यक्रम देखते बैठ जाने के बजाय उससे दूर, अपनी पसंद की किताब पढ़ते बैठें, कुछ समझदार इसलिए अधिक पढ़ पाते हैं कि घर के बाकी लोग टीवी पर कूड़ा देखते रहते हैं।

खुफिया कैमरों के साए में

12 दिसंबर 2011
संपादकीय
खुफिया कैमरों के साए में
राजस्थान का भंवरी देवी केस अपने किस्म का बहुत अनोखा नहीं है। हाल के बरसों में अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सेक्स कांड से लेकर, आंध्र के राजभवन से निकली नारायण दत्त तिवारी की वीडियो क्लिप से होते हुए खबरें अब राजस्थान तक पहुंची हैं। लेकिन इसमें न तो कोई नई शुरूआत है, और न ही कोई अनहोनी। सत्ता के इर्दगिर्द इस तरह की कई बातें जुट ही जाती हैं। सच्चे प्रशंसकों से लेकर चापलूसों तक, और खरीदे गए सेक्स से लेकर, तोहफे में जुटाकर दिए गए सेक्स तक, बहुत से मौके ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को मिलते हैं, और उनमें से कई मौकों पर लोग अपना आपा चाहे-अनचाहे खो बैठते हैं, और खुफिया कैमरों के इस जमाने में वे आगे की अपनी जिंदगी, मतलब राजनीतिक या सार्वजनिक जिंदगी, पूरी ही तरह गंवा बैठते हैं। ब्रिटेन और अमरीका में हर बरस एक-दो सांसद या वैसे ही महत्व के दूसरे लोग राजनीति और सार्वजनिक जीवन, सरकार और कुर्सी से दूर हो जाते हैं क्योंकि उनकी सेक्स जिंदगी की कुछ बातें सामने आ जाती हैं।
राजस्थान की बात करें तो जो मंत्री वहां की एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता महिला के साथ कैमरों की गिरफ्त में आया बताया जा रहा है, और उस महिला के गायब हो जाने के बाद गिरफ्तार लोगों में यह मंत्री भी शामिल है। गांधी टोपी लगाए हुए साठे पर पाठा बना हुआ यह मंत्री फिलहाल जेल में पड़ा है और इस महिला के इर्दगिर्द सीबीआई ने जो जानकारी जुटाई है वह ब्लैकमेलिंग की एक मजबूत साजिश का सुबूत है। एक ही कमरे में बहुत से लोगों के साथ सेक्स की खुफिया रिकॉडिंग और उसके बाद उससे करोड़ों की उगाही की साजिश पहली बात तो यह बताती है कि यह महिला किसी शोषण का शिकार नहीं थी, बल्कि हो सकता है कि उसके साथ इन छुपे कैमरों के सामने बंद कमरे में कैद हुए ताकतवर लोग साजिश का शिकार हुए हों। अब जब यह पूरी तरह स्थापित हो चुका है कि यह महिला एक गिरोहबंदी के साथ बड़े-बड़े सत्तारूढ़ नेताओं को फांसकर अपने साथ उनकी रिकॉर्डिंग कर रही थी, तो वह अपने लिए एक खतरा भी खड़ा कर रही थी। लोगों को इस तरह फांसने के बाद और ऐसी रिकॉर्डिंग से करोड़ों कमाने की कोशिश में हो सकता है कि यह महिला मारी गई हो। लेकिन यहां हम जुर्म की इस वारदात पर चर्चा करने नहीं बैठे हैं, हमें लगता है कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले, सरकारी कुर्सियों पर बैठने वाले, चुनाव में जनता के सामने जाने वाले लोगों को बीच-बीच में यह भी सोचना चाहिए कि वे किस खतरे में पड़ रहे हैं। न सिर्फ सेक्स को लेकर, बल्कि किसी भी तरह की गैरकानूनी या नाजायज समझी जाने वाली बात के लिए, काम के लिए लोगों को इतना चौकन्ना तो रहना चाहिए कि फंसने पर उनके सामने कहने को, सफाई देने को क्या रहेगा?
आज की आसान रिकॉर्डिंग कल और भी अधिक आसान हो जाएगी, ताकतवर लोगों को फांसने की साजिशें और भी बढ़ जाएंगी और भंवरी देवी जैसे मामले भी शायद कई जगहों पर रिकॉर्ड में आने लगेंगे। आज इस चर्चा को हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि जिन लोगों की भी जिंदगी कुछ लोगों के निशाने पर होती है, उन्हें सावधान भी रहना चाहिए और सही भी रहना चाहिए। आज मामूली सुबूतों के साथ भी अगर कोई ताकतवर गलत दिखने लगता है तो लोग उसे सीधे-सीधे गलत मान भी बैठते हैं। ऐसे में अगर कोई चर्चित व्यक्ति किसी सेक्स कांड में फंसता है तो वह अपनी तमाम संभावनाओं को बुरी तरह खो सकता है। न सिर्फ भारत में, बल्कि अमरीका सरीखे खुले माने जाने वाले देश में भी लोग शादीशुदा लोगों की बेवफाई को बर्दाश्त नहीं करते और न ही सत्ता पर बैठे लोगों का अपनी ताकत का ऐसा इस्तेमाल बर्दाश्त करते। पहले सुबूतों के साथ ही किसी भी प्रमुख व्यक्ति के ताबूत में कील ठुक जाती है। न सिर्फ संपन्नता, बल्कि सभी किस्म की ताकत से देश के कमजोर और साधारण तबके की नफरत इन दिनों देखते ही बनती है। नतीजा यह है कि लोग मानो इंतजार करते बैठे हैं कि अगला बुत किस चबूतरे से किसका गिराने मिलेगा। ऐसे में लोगों की नजरों में जो लोग हैं उनका अपना चाल-चलन ठीक रहना ही एक गारंटी हो सकती है, या फिर कुछ लोग अपनी हसरतों को पूरा करने के लिए दूसरे शहर या दूसरे देश के अनजान बदन खरीदना अधिक सुरक्षित समझते हैं। कुल मिलाकर हमारी सलाह यह है कि हर किसी को हर वक्त कैमरों और माइक्रोफोन की नजरों में होने का खतरा ध्यान में रखना चाहिए और अपने तौर-तरीके उसी हिसाब से रखने चाहिए।