पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत होने की जरूरत


26 दिसंबर 2011
संपादकीय
पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत होने की जरूरत

भारत और पाकिस्तान के बीच आज-कल दो दिन फिर बातचीत होने वाली है। जिसमें जम्मू कश्मीर, मिसाइल परीक्षण और सीमा पार व्यापार और यात्रा को बढ़ावा देने के उपायों पर चर्चा होगी। परमाणु और आपसी विश्वास बहाली के उपायों पर पिछली बैठक अक्टूबर 2007 में हुई थी। मुंबई में 2008 में पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर ए तैबया की ओर से किए गए आतंकी हमलों के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच ठप पड़ी वार्ता इस वर्ष की शुरूआत में शुरू हुई थी। यह बातचीत ऐसे वक्त होने जा रही है जब पाकिस्तान एक नई अस्थिरता में घिरते दिख रहा है। वहां पर सरकार और सेना के बीच गहरे मतभेद और तनाव की खबर आ रही है और सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ इमरान खान की पार्टी खुलकर खड़े होते भी दिख रही है और लोकप्रियता पाते भी दिख रही है। किसी भी देश में एक मजबूत विपक्ष में कोई बुराई नहीं है, इससे लोकतंत्र मजबूत ही होता है, लेकिन पाकिस्तान जैसे कमजोर और जर्जर हो चुके लोकतंत्र में आज किसी भी फेरबदल का मौका आने पर कभी आतंकी, कभी सेना, कभी खुफिया एजेंसियां, कभी विदेशी ताकतें, फेरबदल को प्रभावि करने की खुली या ढंकी-छुपी कोशिश करने लगते हैं। ऐसे बाहरी असर मतदाता के फैसले को या तो मतदान के पहले प्रभावित करते हैं या फिर मतदान के बाद सरकार बनाने के समय इनका असर दिखता है।

पाकिस्तान की किसी भी किस्म की बदहाली से भारत में लोगों का एक तबका खुश सा होते दिखता है। इसमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने मुम्बई हमले जैसे बहुत से जख्म खा-खाकर पाकिस्तान से नफरत करना जरूरी समझ लिया है। इसमें ऐसे लोग भी हैं जिनको पाकिस्तान पर हमले के बहाने मुसलमानों पर हमला करना एक आसान मौका लगता है और वे इससे नहीं चूकते। बहुत से ऐसे साधारण लोग इन दोनों तबकों के बाहर के ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि भारत को एक हमला करके पाकिस्तान नाम के सिरदर्द को मिटा देना चाहिए। इसमें हमें अधिक हैरानी इसलिए नहीं होती कि एक जटिल अंतरराष्ट्रीय मामले की समझ तो बहुत अधिक लोगों में होने की उम्मीद करना सही नहीं होता, किसी भी मामले में समझदार लोगों की गिनती गिनी-चुनी होती है और बेसमझ, कमसमझ या अनजान लोग ही अधिक होते हैं। भारत में पाकिस्तान के बारे में जो जनमत है, उसमें ऐसे लोग ही अधिक हैं। हम संदेह का लाभ देते हुए यह मानते हैं कि इनमें बहुतायत अनजान लोगों की ही है।
 
पाकिस्तान की आज की हालत भारत के लिए बहुत फिक्र की बात भी है। हमारी सरहद से लगे हुए दो ही परमाणु देश हैं जिनमें से पाकिस्तान ऐसा है जो कि सरकार के काबू से बाहर की नौबतें झेलता है और वहां पर आतंकियों का एक तबका, फौजी तानाशाही में भरोसा रखने वाला एक तबका, और हथियारों के सौदागरों के सत्ता में बैठे हुए दलाल ऐसे हैं जो कि युद्धोन्माद को बढ़ावा देने में भरोसा रखते हैं। ऐसे में एक बड़े देश के रूप में, सफल लोकतंत्र के रूप में भारत की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह पाकिस्तान को लोकतंत्र की पटरी पर लौटने में मदद करे और उसका हौसला बढ़ाए। जिस तरह फिलीस्तीनियों को यह मानकर चलना चाहिए कि इजराइल अब एक हकीकत बन चुका है और उसे मिटाने की शर्त पर कोई बात आगे नहीं बढ़ सकती। इसी तरह भारत के युद्धोन्मादियों को यह मान लेना चाहिए, समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान को मिटाना अब मुमकिन नहीं है, न ही ऐसी कोई हरकत सही भी होती, होगी। ऐसे में उसे अमरीका की जेब से निकलकर चीन की जेब में जाने देना भारत के फौजी हितों के खिलाफ होगा। अंतरराष्ट्रीय संबंध दो और दो चार की तरह, या शतरंज की तयशुदा चालों की तरह नहीं बढ़ते। ऐसे संबंध बहुत सी बातों को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं, और हम ऐसी बातों के बीच भी बजाय देश के हितों को ही ध्यान में रखकर काम करने के, पूरी दुनिया के, पूरे मानव समाज के हितों को ध्यान में रखकर काम करने पर अधिक भरोसा रखते हैं। ऐसे में पाकिस्तान की आज की अस्थिरता और वहां चल रहे तनाव को कम करने की जरूरत है क्योंकि एक परिपक्व लोकतंत्र, स्थायी लोकतंत्र भारत के हित में है। इतने पड़ोस में बसा हुआ कोई देश अगर आतंकियों से अपने आपको नहीं बचा पा रहा है तो वह कल के दिन वहां से भारत आकर हमला करने वाले आतंकियों को, अगर चाहेगा तो भी, कैसे रोक पाएगा? और अगले किसी मुम्बई हमले की नौबत आने पर भी भारत के लिए यह आसान नहीं होगा कि वह पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारे। वैसे भी चीन जैसे नए दोस्त की ताकत जब पाकिस्तान के साथ आज भी है तब यह शक्ति संतुलन ऐसे किसी बड़े हमले की संभावना पैदा नहीं होने देगा। इसलिए आज भारत के लोगों को यही मनाना चाहिए कि पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत हो।

धर्म और कर्म की कुछ चर्चा


25 दिसंबर 2011
संपादकीय
धर्म और कर्म की कुछ चर्चा

ईसाई धर्म से जुड़ी हुई संस्कृति में क्रिसमस के मौके पर एक काल्पनिक सांता क्लॉज रात में आकर बच्चों के लिए तोहफे छोड़ जाता है। शायद यह रिवाज इसलिए शुरू किया गया है कि ऐसे तोहफे अच्छे बच्चों को ही मिलने की बात उनके ध्यान में डाली जाती है और ऐसा बताया जाता है कि खराब काम करने वाले बच्चों को सांता क्लॉज कोई तोहफे नहीं देता। धर्म से जुड़ी हुई बहुत सी बातें इस किस्म की होती हैं जो लोगों को सपनों में जीने का मौका देती हैं। कहीं पर पूर्वजन्म के किए का फल इस जन्म में, और इस जन्म में किए का फल अगले जन्म में पाने की बात सिखाई जाती है तो कहीं यह सिखाया जाता है कि जिनको कम मिल रहा है, वह उनके कर्मों का फल है। सांता क्लॉज की धारणा तो कम नुकसानदेह है क्योंकि यह ईसाई संस्कृति में या पश्चिमी जीवन-शैली में समारोह को मनाने के एक तरीके के रूप में इस्तेमाल की जाती है और छोटे बच्चों को तोहफे देने का यह एक रास्ता होता है। लेकिन धर्म जब बहुत सी दूसरी बातों को कर्म से अलग करके स्थापित करने की कोशिश करता है तो वह कार्ल माक्र्स के शब्दों में अफीम की तरह लोगों को सुस्त और मंद करके सोचने और संघर्ष करने से दूर कर देता है। 

हम किसी एक धर्म के त्यौहार के मौके पर इस चर्चा को नहीं छेड़ रहे हैं क्योंकि बहुत से धर्मों में, या शायद सभी धर्मों में, धर्म लोगों को कर्म से दूर रखने का एक जरिया रहता है, और इस कर्म में जागरूकता और संघर्ष भी शामिल रहते हैं। यह सिलसिला भारत सहित बहुत से देशों में बहुत खतरनाक हद तक लोगों को ऐसा भाग्यवादी और ऐसा निराश बना देता है कि लोग अपने साथ हो रहे किसी भी किस्म के अन्याय को अपनी किस्मत मान बैठते हैं और उसके लिए जो अच्छा-बुरा कहना रहता है वह ईश्वर को कहकर, उसके लिए असल जिम्मेदार इंसानों को बख्श देते हैं, जिससे कि समाज के भीतर अन्याय के खिलाफ संघर्ष की संभावना खत्म हो जाती है। धर्म को बनाया इसी हिसाब से गया है कि वह ताकतवर शोषक को कमजोर बहुसंख्यक तबके का निशाना कभी न बनने दे। इसलिए हम भारत में लगातार देखते हैं कि जनता को, देश को और धरती को लूटने वाले सबसे बड़े लोगों से किसी धर्मगुरू को कोई परहेज नहीं होता और उनके प्रवचनों में, धार्मिक अनुष्ठानों में हर किस्म के अपराधी ताकतवर लोग सबसे ऊपर, सबसे सामने जगह पाते हैं और एक किस्म से प्रवचन करने वाले गुरू ऐसे लोगों का सम्मान करते भी दिखते हैं, इन्हीं के डेरों में महीनों गुजारते हैं। यह पूरा सिलसिला माक्र्स की जुबान की अफीम की तरह लोगों को सामाजिक और आर्थिक शोषण और अन्याय को समझने से भी दूर रखता है और इस तरह धर्म, और उसकी एक दूसरी शक्ल आध्यात्म, में पूंजी निवेश करके ताकतवर, अत्याचारी और शोषक तबके उसी तरह एक बीमा पॉलिसी और चौकीदार खरीद लेते हैं जिस तरह वे अपने कारखानों और दुकानों के लिए खरीदते हैं।

ईश्वर को न मानने वाले हमारे किस्म के नास्तिक इतने कम हैं, और उनकी प्रचार की ताकत इतनी कम है कि वे ईश्वर की धारणा का भांडाफोड़ नहीं कर पाते। दूसरी बात यह कि ईश्वर की धारणा, धर्म की बातें दिमाग पर जोर नहीं डालतीं, वे चूंकि तर्कों से परे की होती हैं इसलिए वे लोगों को कीर्तन में सिर हिलाने की तरह का आसान काम लगती हंै। धर्म पर सवाल खड़े करना, उसकी वैज्ञानिकता और उसकी सामाजिक उपयोगिता के बारे में बात करना बहुत तकलीफ का काम होता है। और किसी भी जगह किसी भी आबादी या भीड़ में यह न तो लोकप्रिय काम होता और न ही लुभावना काम। लेकिन हम ऐसा काम करने से परहेज नहीं करते और लोगों को धर्म के बजाय कर्म की तरफ देखने को सलाह देते रहते हैं। धर्म का राज जब तक समाज के लोगों के दिल-दिमाग पर चलता रहेगा तब तक समाज के सबसे ताकतवर लोग सबसे कमजोर तबकों पर राज करते रहेंगे, उनके हक लूटते रहेंगे। कबीलों के जमाने से लेकर आज की 21वीं सदी तक धर्म ने कमजोर लोगों को लूटने का, लुटवाने का काम ही किया है, और जब हिटलर ने लाखों को मारा, तब भी पोप चुप ही रहा। कहने को यह बात कही जा सकती है कि ईश्वर, धर्म और धर्मगुरूओं में फर्क है। किसी तर्क से बचने के लिए, किसी बहस से बचने के लिए धर्म के झंडाबरदार अक्सर यह तर्क उठा लेते हैं कि धर्म का यह बिगड़ा हुआ चेहरा ईश्वर नहीं है। लेकिन समाज पर राज तो धर्म का बिगड़ा हुआ चेहरा ही करता है। यह चर्चा हमने छेड़ी तो आज है लेकिन इसका किसी एक धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और हर धर्म के लोग अपने-अपने भीतर यह झांक सकते हैं कि वहां पर किस-किस किस्म का शोषण उनके ईश्वर और धर्म के बैनर तले चल रहा है, चलता रहेगा।

मीडिया के कार्पोरेट कारोबार और सरोकार पर चर्चा


24 दिसंबर 2011
संपादकीय
मीडिया के कार्पोरेट कारोबार और सरोकार पर चर्चा

जिंदगी के बहुत से असल मुद्दों पर लगातार लिखने वाली एक महिला पत्रकार दोस्त ने आज लिखा कि वह एक स्थानीय अखबार में पढ़ रही थी कि किस तरह हाथियों ने एक बस्ती में तोड़-फोड़ की। और साथ यह लिखा कि ऐसी खबरों के बाद उसे शाहरूख खान के डॉन-2 के बारे में पढऩे की क्या जरूरत है? यह बात रोज ही हमारे सामने आती है क्योंकि अखबार के कई पन्ने रोज तैयार करते हुए दिन की शुरूआत से लेकर रात काम खत्म होने तक दुविधा खत्म ही नहीं होती। अखबार पढऩे वालों की उम्मीदों के मुताबिक अखबार निकाला जाए, या उन्हें उनकी उम्मीदों के बारे में कुछ सलाह देता हुआ अखबार निकाला जाए, अखबार का मकसद कारोबार हो, या सरोकार हो? ऐसे बहुत से सवाल बहुत सी खबरों को लेकर और उन खबरों से छांटे गए किसी मुद्दे पर इस तरह का, इस जगह पर संपादकीय लिखते हुए सामने आकर खड़े हो जाते हैं। जब हम जिंदगी की तकलीफों और समाज में बेइंसाफी के बारे में लिखते हैं तो बहुत से लोगों को लगता है कि लिखने को कोई अच्छी बात बची ही नहीं है क्या? कुछ अखबारों ने अपनी यह नीति बना रखी है कि वे पहले पन्ने पर दुख-तकलीफ की कोई खबर नहीं छापते हैं, जब तक कि वह किसी बड़ी ताजा घटना की खबर न हो, और जिसे छोड़ देना लापरवाही लगे। 

जो जुबान खबरों को छांटने के लिए इस्तेमाल होती है वह बहुत दिलचस्प है। हिंदुस्तान में हिंदी में अंगे्रजी के बहुत से शब्द घुल-मिल चुके हैं और ऐसा ही एक शब्द अखबारनवीसी में इस्तेमाल होता है-पब्लिक इंटरेस्ट। बारीकी से देखें तो हिंदी में इसके दो अलग-अलग मायने निकलते हैं, एक तो इसका मतलब जनहित होता है और दूसरा मतलब जनरूचि होता है। अखबार की खबरें तय करते हुए, विचारों के मुद्दे और विचारों को तय करते हुए, इन सबकी प्राथमिकताएं और इनका महत्व तय करते हुए जब बात पब्लिक इंटरेस्ट की होती है तो कारोबारी अखबार (बिजनेस न्यूजपेपर नहीं, बिजनेस के लिए फिक्रमंद न्यूजपेपर) उसे जनरूचि मानकर एक ऐसा अखबार पाठकों के सामने रखता है जैसा कि दस-बीस बरस पहले एक तांत्रिक अंगूठी के इश्तहार में दावा किया जाता था-जो मांगोगे वही मिलेगा। और पब्लिक इंटरेस्ट का यह मतलब अखबार की रगों में दौडऩे वाले इश्तहार वाले फायदे की बात भी होती है। दूसरी तरफ जो लोग अखबार को कारोबार से कुछ अधिक और सरोकार से जुड़ा हुआ मानते हैं, वे पब्लिक इंटरेस्ट के जनहित वाले अर्थ को ढोकर चलते हैं, जो कि खासा भारी होता है और कमर भी तोड़ देता है। हम अभी बात मोटे तौर पर अखबारों की इसलिए कर रहे हैं कि देश का लंबा अनुभव इन्हीं के बारे में अधिक है और टीवी के समाचार चैनलों को आए कम दिन हुए हैं और उनका सरोकारों से, जनहित से लेना-देना उसी वक्त जरा सी देर के लिए शुरू होता है जब कोई स्टिंग ऑपरेशन उनके हाथ ऐसा लग जाता है जो लोगों को टीवी के सामने कुछ देर बांध सके। भारत के समाचार चैनलों को हम आज के इस गंभीर विश्लेषण में जोडऩे की कोशिश करने पर भी नहीं जोड़ पाएंगे। 

आज इस बात पर लिखने की कुछ जरूरत इसलिए भी लग रही है कि पाकिस्तान में एक कमजोर और खतरे में चल रहे लोकतंत्र के भीतर वहां के मीडिया को लेकर खुली बहस चलती है और लोग जिस तरह उसकी आलोचना भी करते हैं, वह बात हिंदुस्तान में शायद इसलिए कम है क्योंकि यहां मीडिया उस तरह के किसी फौजी, खुफिया, आतंकी और कट्टरपंथी हमलों का शिकार नहीं है। अधिक आजादी ने भारत के मीडिया को आत्ममंथन से परे कर दिया है और तरह-तरह के दबावों के तले पाकिस्तानी मीडिया चर्चा का सामान बनता है। अखबारों के पन्नों के लिए रोजाना धरती के अनगिनत पेड़ कटते हैं, ये पन्ने कम से कम ऐसे तो हों कि वे पेड़ों की कुर्बानी को सही ठहरा सकें! पे्रस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने अपनी कुछ बातों को लेकर मीडिया के बीच एक हलचल खड़ी की है, और एक नाराजगी भी। लेकिन 'उनकीÓ बातों को लेकर उन्हें भला-बुरा कहने के साथ-साथ, उनके नाम को अलग करके 'उनÓ बातों पर चर्चा की जरूरत क्या आज नहीं है? न सिर्फ उनकी कई बातें खरी हैं, बल्कि मीडिया में आज जो खोट है उसे लेकर आपस में ही कुछ खरी-खोटी करने की जरूरत है ताकि अगर किसी किस्म की बेहतरी मुमकिन है तो वह तो हासिल हो सके। 

अखबारों के बाजारू मुकाबले के चलते कुछ ऐसी हरकतें हो रही हैं जो कि हमारी इस फिक्र को जायज और जरूरी ठहराती हैं। किसी का नाम लेकर उसे बुरा कहने या बदनाम करने का आज कोई मौका नहीं है इसलिए बिना नाम दो अलग-अलग मामलों की चर्चा यहां करना हमें माकूल लग रहा है। एक शहर में एक बड़े अखबार का स्थानीय संस्करण शुरू होने को था। वहां पहले से निकल रहे एक अखबार को यह फिक्र खड़ी हो गई थी कि नए अखबार के आने से लोग उसकी तरफ ध्यान न दें। उसने नए अखबार के पहले ही दिन, अपने अखबार में शहर की एक इतनी सनसनीखेज खबर छापी कि जिस पर पूरा देश हिल उठा। और तीन हफ्ते बीतते न बीतते देश के एक तीसरे, बड़े और जिम्मेदार अखबार ने यह रिपोर्ट छापी कि वह सनसनीखेज रिपोर्ट पूरी की पूरी झूठी थी, और सोच-समझकर उसे सच से दूर महज सनसनीखेज बनाया गया था। एक दूसरा प्रदेश और दो दूसरे अखबारों के बीच का मुकाबला। वहां भी पुराने जमे हुए अखबार ने नए अखबार के पांव न जमने देने के लिए एक इतनी बड़ी खबर छापी, जिसे पढ़कर लोग हिल जाएं। एक बेटे ने अपने मां को मारकर, काटकर, पकाकर खा लिया। इससे बड़ी खबर किसी इलाके के लिए और क्या हो सकती है? और फिर वहां शायद चौथाई या आधी सदी से निकलते अखबार में अगर यह सबसे बड़ी सुर्खी हो, तो फिर लोग और क्या पढऩा चाहेंगे? कम से कम इसके मुकाबले किसी नए अखबार को तो पढऩा नहीं ही चाहेंगे। नतीजा यह हुआ कि नया अखबार बुरी तरह से पिटा हुआ सा लगने लगा। लेकिन उस प्रदेश के पाठकों की हैरानी की कोई सीमा न रही जब नए अखबार ने उस औरत को लाकर पुलिस और पाठकों के सामने पेश कर दिया जिसे कि मार, काट, पकाकर खा चुका गया बताया गया था।
 
लेकिन मीडिया के ऐसे झूठ पर बात आमतौर पर तभी होती है जब बाजार में मुकाबले के लिए किसी को किसी दूसरे अखबार को नीचा दिखाना हो। लेकिन जहां कोई बाजारू टकराव न हों, और जहां अखबारी परंपरागत जुबान के मुताबिक, कुत्ता, कुत्ते को न काट रहा हो, वहां पर लोगों को झूठ की ऐसी साजिशों का क्या पता लगेगा? हम उसी बात पर लौटें, जिस बात से हमने आज लिखना शुरू किया था। जनहित और जनरूचि के फर्क को लेकर मीडिया पर अगर बात नहीं होगी तो यह तो वैसे भी संसद की परसों की बहस के मुताबिक कार्पोरेट हाऊसों का एक कारोबार बन ही चुका है। कार्पोरेट कारोबार की जुबान में सरोकार सिर्फ हाथीदांत की तरह का होता है। यहां पर चलते-चलते हम एक और अखबार और उसकी खबर का जिक्र करना चाहेंगे। टाईम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली के संस्करण में नोएडा इलाके के लिए निकलने वाले पन्नों पर फरवरी 2008 में एक खबर छपी थी जिसमें एक कार दुर्घटना में मारे गए एक युवक और एक युवती के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें थीं। इस पर अखबार ने अपनी कुछ जानकारियों का खंडन उसी बरस अक्टूबर के महीने में कर दिया था। लेकिन अभी इस खबर को लेकर एक बड़ा सा माफीनामा अखबार ने एक रिपोर्ट की तरह छापा है कि उसकी खबर में कौन-कौन सी बातें झूठी थीं। एक मीडिया वेबसाईट ने हिसाब लगाया है कि करीब सवा दो सौ वर्ग सेंटीमीटर जगह में छपे इस माफीनामे का इस अखबार के विज्ञापन रेट से बिल बनता तो वह करीब आठ लाख रूपए का होता। हम अभी रूपयों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन हम मीडिया की गलतियों, उसके गलत कामों, और उनमें सुधार की ऐसी मिसालों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

टोपी से मुंदी हुई आंखों के लिए


23 दिसंबर 2011
संपादकीय
टोपी से मुंदी हुई आंखों के लिए

भारत का लोकतंत्र इस मामले में बहुत अनोखा है और बहुत कामयाब भी है कि जब इसके तीन घोषित स्तंभों और पे्रस नाम के चौथे अघोषित स्तंभ में से कोई कमजोर पड़ता है तो बाकी तीन में से कोई न कोई लडख़ड़ाते हुए उस स्तंभ को उसी अंदाज में थाम लेते हैं जिस अंदाज में पिए हुए या चक्कर खा रहे किसी साथी को कोई दूसरा थाम लेता है। आज शोहरत की जिस शराब के नशे में अन्ना हजारे और उनके साथी अपने-आपको इस विशाल और महान लोकतंत्र के अकेले भाग्यविधाता मान बैठे हैं और इसे हांकने के लिए रालेगान सिद्धि से कोड़ा लेकर निकले हुए हैं, उस शराब के नशे को आज मुंबई हाईकोर्ट ने ठंडा पानी डालकर उतारने की कोशिश की है। उसने अन्ना हजारे की ओर से मुंबई में मुफ्त मैदान पाने के लिए लगाई गई याचिका पर जो कुछ कहा है वह हम आज के ही पहले पन्ने पर खुलासे से दे रहे हैं इसलिए उस पूरी बात को यहां दुहराना ठीक नहीं है और यह संपादकीय पढऩे वाले लोग उस खबर को पढऩे के बाद ही इसे पढ़ें।
 
मुंबई हाईकोर्ट अपनी जागरूकता के लिए, नागरिक अधिकारों के लिए पहले से एक लंबी परंपरा के साथ चल रहा है। लेकिन उसने जो कड़े सवाल टीम अन्ना के सामने खड़े किए हैं वे इस देश की जनता के एक मंत्रमुग्ध तबके की आंखें खोलने के लायक तो हैं, अब शराब का नशा कितना टूटता है और यह मोह कितना टूटता है यह देखने की बात है। अदालत ने यह साफ किया कि जब बिल संसद में पेश हो चुका है और संसद में जब इस पर बहस हो रही है तो इस पर समानांतर आंदोलन की क्या जरूरत है? हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से संसद को काम करने दीजिए।  यह बात हमारे पाठकों को याद होगी कि हम लगातार उठाते आ रहे हैं और कल संसद में दिन भर जो बहस चली है उस बहस में लालू यादव जैसे लोगों ने जिस धाकड़ अंदाज में अन्ना हजारे के तौर-तरीकों पर वार किया है वह सुनने लायक था। कुछ वामपंथी नेताओं ने भी कल जो मुंह खोला है वह भी उनकी पार्टियों के कुछ नेताओं के उस रूख के खिलाफ था जो कि उन्होंने अन्ना के आंदोलन में शामिल होकर सामने रखा था और जिसके खिलाफ हमने कुछ दिन पहले यह लिखा था कि यह वामपंथियों की एक और ऐतिहासिक गलती के रूप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज किया जाएगा। लेकिन कल संसद में जिस तरह से अन्ना हजारे के आंदोलन की धज्जियां उड़ाई गईं उससे हमारे सरीखे आलोचक का कलेजा ठंडा हुआ है और हमें यह भी लगा कि अपनी सोच में हम पूरी तरह अकेले नहीं हैं। कल की संसद के बाद आज का मुंबई हाईकोर्ट और राहत लेकर आया है। 

हम पाठकों से यह बात फिर कहना चाहेंगे कि संसद की पूरी जिम्मेदारी और पूरे हक को खारिज करते हुए जिस तरह से आज अरविंद केजरीवाल का एक बयान सामने आया है कि उन्हें संसद पर कोई भरोसा नहीं है, इस खतरे को जनता को समझने की जरूरत है। एक वक्त था जब आपातकाल लगाने के लिए संजय गांधी और इंदिरा गांधी के मातहत गिरोह ने इंदिरा इज इंडिया का नारा लगाया था और भारतीय लोकतंत्र पर विदेशी हाथ के खतरे का फर्जी नारा देते हुए देश के लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए थे। उस दौर में भाजपा सहित जिन पार्टियों ने जेल काटी थी, वे लोग आज अन्ना हजारे नाम की एक दूसरी ऐसी तानाशाही का साथ दे रहे हैं जो कि आज तो कांगे्रस और यूपीए के लिए तो परेशानी का सबब बनी हुई है लेकिन कल वह अपने-आपमें लोकतांत्रिक संस्थाओं के हत्यारे के रूप में गलत परंपराओं के साथ अगली सरकार के सामने भी खड़ी रहेगी। भाजपा को आज अगर संसद के भीतर कांगे्रस और यूपीए की फजीहत अच्छी लग रही है तो उसे यह याद रखना चाहिए कि उसके भीतर भी आने वाले कल में किसी सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया बनने की संभावनाएं हैं और उसकी राजनीति किसी मंजिल को लेकर चल रही है। कुछ दिन पहले हमने एक दूसरे नामीगिरामी पत्रकार की बात यहां लिखी थी कि भाजपा के आज के तौर-तरीके ऐसे लग रहे हैं मानो अब वह सत्ता में नहीं आने वाली है। हम तो अन्ना नाम के खतरे को सिर्फ सत्ता पर खतरा मानकर नहीं चलते, हमारा मानना है कि यह पूरे लोकतंत्र पर एक खतरा है, और आज मुंबई हाईकोर्ट ने जो कहा है उसे लोगों को ध्यान से पढऩा चाहिए और उसके बारे में सोचना चाहिए। गांधी टोपी में एक तह मुड़ी हुई होती है। जिन सिरों पर से टोपी की यह तह खिसककर नीचे आकर आंखों को ढाक चुकी है, उन सिरों को भी किसी और से खबर में हाईकोर्ट की आज की फटकार पढऩी चाहिए।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
22 दिसंबर 11
रिश्तों की लंबाई कोई मायने नहीं रखती, लंबाई चाहे कम हो, गहराई अधिक होनी चाहिए।

संसद को अपनी जिम्मेदारी और अपने हक के अहसास की जरूरत

22 दिसंबर 2011
संपादकीय
संसद को अपनी जिम्मेदारी और अपने हक के अहसास की जरूरत
लोकपाल विधेयक अभी कुछ देर में संसद में पेश होने जा रहा है और उसे लेकर लालू यादव-मुलायम सिंह जैसे कई लोगों का विरोध खुलकर सामने आ रहा है। हम अभी इस बात पर नहीं जा रहे कि इनमें से कौन कैसी साख वाले हैं, अभी मुद्दा यह है कि संसद के भीतर जिन लोगों को इस पर बहस का हक है, वे पार्टियां और वे सांसद इस बारे में खुलकर बात करें। यही संसद बहुत से दूसरे मामलों को, जैसे महिला आरक्षण को दशकों से किनारे रखते चल रही है और देश में कोई भी उस बुनियादी हक के लिए सड़कों पर इस तरह से निकलकर नहीं आया है जिस तरह से लोकपाल के लिए भीड़ सड़कों पर आई है, इसकी एक दूसरी वजह यह है कि सिर्फ महिलाओं के लिए जो मुद्दा है, उसमें देश के पुरूषों की दिलचस्पी सीमित है, और लोकपाल का मुद्दा भ्रष्टाचार की चर्चा की वजह से हर किसी तक पहुंचा हुआ है। खैर, अभी बात महिलाओं की नहीं लोकपाल की हो रही है और संसद को भी इसी पर बात करना है। इस बारे में आज हम इसलिए लिख रहे हैं कि अब संसद को दलगत राजनीतिक के साथ-साथ अपनी एक ऐसी संसदीय जिम्मेदारी भी पूरी करनी है जिसे कोई संसदीय अधिकार या एकाधिकार मान सकता है। हम इसे एक एकाधिकार या विशेषाधिकार के रूप में भी मानने को तैयार हैं, बजाय इस संसदीय हक को फुटपाथ को दे देने के। हमारी यह सोच नई नहीं है और हम पिछले कुछ महीनों में बार-बार यह लिख रहे हैं कि संसद का काम संसद को ही करना चाहिए, और बैनर-पोस्टर, अखबारी सुर्खियों और टीवी चैनलों की पट्टियों से परे, हकीकत यही है कि लोकपाल विधेयक को संसद ही तय करेगी। इसे लेकर देश में जितनी अराजकता पिछले महीनों में फैलाई गई है, और आज भी जारी है, उसे हम लोकतंत्र पर एक बड़ा हमला मानते हैं और ऐसी तानाशाह ताकतों को भारत के लोकतंत्र का इतिहास आगे जाकर दर्ज करेगा जिन्होंने अपने कुछ राजनीतिक और कुछ रहस्यमय इरादों के साथ पूरे लोकतंत्र पर से लोगों की आस्था को खत्म करने की कोशिश की, भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख दिया और संसद के महत्व को कूड़ादान में डालने की कोशिश की। हम किसी भी अच्छे मकसद से किसी अच्छी मंजिल तक पहुंचने के ऐसे खूनी रास्ते से सहमत नहीं हो सकते जो तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करते हुए तय किया जाए।
आज समय है कि संसद अपनी जिम्मेदारी पूरी करे और सड़क-फुटपाथ पर उठाए गए मुद्दों को जनमत का एक हिस्सा मानते हुए उसका जितना नोटिस लेना हो उतना जरूर ले, लेकिन अराजकता के ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर अगर संसद खुलकर इस मामले में बहस नहीं करेगी तो यह भी याद रखने की जरूरत है कि भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के दस्तावेज जिस तरह से आज भी यह दर्ज करके बैठे हैं कि किसने क्या कहा था, वैसा ही लोकपाल पर भी इस संसद में दर्ज होने जा रहा है। संसद के गंभीर भाषणों से चुनावों में वोट कम या अधिक जितनी भी दूर तक प्रभावित होते हों, उनसे परे इतिहास इन बातों को दर्ज करेगा कि भारत की लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था के इस दौर में किस पार्टी ने और किस नेता ने क्या कहा। हम आज यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि हाड़-मांस और चमड़ा जोड़कर शेर बनाकर उसमें जान फूंकने की जो कहानी हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, उसी किस्म का एक ऐसा लोकपाल बनाने की मांग चल रही है जो इस देश के लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के ऊपर एक राक्षसी ताकत वाला हो और जो बेकाबू होने पर पूरे लोकतंत्र को निगल जाने की ताकत रखता हो। जिन लोगों को देश के मौजूदा भ्रष्टाचार को देख-सुनकर थकान हो गई है उन्हें ऐसा राक्षस भी आज सुहा सकता है लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि अमरीका में भी एक वक्त कुछ एजेंसियां ऐसी ताकतवर बना दी गई थीं कि उन्होंने देश की सरकार के खिलाफ ही साजिशें शुरू कर दी थीं और अमरीकी लोकतंत्र खतरे में पड़ गया था। इतिहास से सबक की नौबत आम लोगों तक आसानी से नहीं पहुंचाई जा सकती, दूसरी तरफ भावनात्मक भड़कावे से लोगों को इस बात के लिए सहमत कराया जा सकता है कि लोकतंत्र बहुत फिजूल हो चुका है और इसे उखाड़कर फेंक देने की जरूरत है। आज यह अराजकता जिन लोगों को सुहा रही है उन लोगों को देखकर हमें इमरजेंसी के वे दिन याद पड़ रहे हैं जब भारत की शहरी आबादी के एक तबके को आपातकाल, अनुशासन पर्व लगता था। आने वाले दिनों में अन्ना नाम की तानाशाही और अराजकता, अहंकार और जिद्द को इतिहास कैसे दर्ज करेगा यह देखने के लिए आज की भारत की जनता का अधिकतर हिस्सा जिंदा रहेगा।

छोटी सी बात


छोटी सी बात
21 दिसंबर
किसी बदनीयत से बहस करना, कीचड़ में सुअर से कुश्ती लडऩे जैसा होता है। जब तक लोगों के दिमाग खुले हुए न हों, तब तक बहस में न उलझें। कड़े खोल वाले साबुत बेल से कोई स्वाद नहीं आता।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
20 दिसंबर
अपने काम के व्यस्त समय में काम का हर्जा करने के बजाय मुलाकातियों से माफी मांग लेना बेहतर है। इसमें कोई बदतमीजी नहीं होती।

यूपीए का मुंह कभी अमरीका जाकर खुलता है कभी रूस...

21 दिसंबर 2011
संपादकीय
यूपीए का मुंह कभी अमरीका  जाकर खुलता है कभी रूस...
केंद्र की यूपीए सरकार जिन बहुत बड़ी-बड़ी लपटों से अभी घिरी हुई है, उनकी चर्चा हम न भी करें, तो भी इन लपटों के बाद का आग का जो घेरा इस सरकार के इर्दगिर्द बन गया है, उससे निपटना भी इसके लिए भारी है। एक तरफ कश्मीर में सेना को मिले हुए विशेष अधिकार हटाने की मांग चल रही है और ऐसी ही मांग को लेकर मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी जाने कितने महीनों से वहां की अर्थव्यवस्था और जिंदगी को तबाह किए हुए है। उत्तरप्रदेश के चार टुकड़े करने के मायावती के चुनावी-राजनीतिक दांव का कोई जवाब कांगे्रस के पास राजनीतिक स्तर पर नहीं है और वह अपने बाबुओं के मार्फत उत्तरप्रदेश को यह गिना रही है कि उसका प्रस्ताव किस तरह तर्कों और तथ्यों के बिना भेज दिया गया है। तर्कों और तथ्यों को लेकर अगर बात की जाए तो यूपीए और कांगे्रस के पास गिनाने के लिए हासिल कुछ भी नहीं है। सरकार का एक बड़ा हिस्सा अदालत के कटघरे में खड़ा है और बाकी हिस्सा जनता की अदालत के कटघरे में। नतीजा यह है कि साख पूरी तरह खो चुका यूपीए आज देश की लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था को अन्ना हजारे के हमले से बचाने की ताकत भी खो चुका है। नतीजा यह भी है कि एक तानाशाह की शक्ल ले चुके अन्ना हजारे को यह देश गांधीवादी मान रहा है। दरअसल किसी भी मोर्चे पर दोनों तरफ की साख की तुलना की जाती है और ऐसे में अन्ना हजारे की खामियां लोगों को दिख नहीं रहीं क्योंकि यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी खूबियां खो चुकी हैं।
हम फिर ठोस बात पर लौटें तो आंध्र में तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की अपनी अधकचरी घोषणा को कांगे्रस किसी किनारे तक नहीं पहुंचा पा रही और अगर चिदंबरम का कोई राजनीतिक ताबूत बनेगा तो उसमें पहली कील उनकी तेलंगाना बनाने की घोषणा रहेगी। इस राज्य में कांगे्रस के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि उसके पिछले मुख्यमंत्री वाइएसआर के गुजर जाने के बाद उनका बेटा किस तरह सैकड़ों या हजारों करोड़ की दौलत के साथ सीबीआई की जांच के घेरे है। आज कांगे्रस से बागी होकर उसके खिलाफ खड़े हुए जगन मोहन रेड्डी का किसी मामले में फंसना चाहे कांगे्रस को राजनीतिक रूप से सुहा रहा हो, लेकिन इस बात का क्या जवाब है कि उसके मुख्यमंत्री का कुनबा हजारों करोड़ का मालिक बन जाता है। देश के दक्षिण के दो राज्य तमिलनाडु और केरल एक बांध को लेकर आमने-सामने है और संघीय ढांचे के भीतर ऐसे किसी टकराव पर केंद्र सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है। केरल में कांगे्रस की अपनी सरकार है और तमिलनाडु में कांगे्रस से पूरी तरह तिरछे-तिरछे चल रही, बागी तेवरों वाली जयललिता की सरकार है। ऐसे मेें कांगे्रस की अगुवाई वाला यूपीए किस तरह बीच बचाव कर पाएगा, यह बहुत मुश्किल बात है। और तमिलनाडु में, जहां पर कि कांगे्रस ने अपने एक प्रधानमंत्री की जिंदगी खोई थी, जहां पर श्रीलंका के साथ किसी भी तरह के तनाव को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव आए दिन खड़े हो जाता है, वहां पर कांगे्रस जयललिता की विरोधी डीएमके को भी केंद्र के घोटालों के चलते लगभग खो चुकी है। मजबूरियां करूणानिधी को सोनिया के साथ जोड़कर चल रही हैं, लेकिन दिलों में दरार पड़ चुकी है।
इस तरह की कई दिक्कतें यूपीए के सामने खड़ी हैं और एक बड़ी चीज यह है कि इसके तीन सबसे बड़े कांगे्रसी नेताओं, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी में राजनीतिक मुद्दों का सीधा-सीधा सामना करने और सामने खड़े हुए सवालों का जवाब देने का माद्दा नहीं दिखता है। मतलब यह कि वे पहले से तय की हुई बातें कर सकते हैं, पहले से तैयार किए गए किसी अभियान में एक कटआऊट की तरह खड़े होकर भाषण दे सकते हैं, लेकिन इससे अधिक इन तीनों से कोई भी सोच देश को सीधे-सीधे नहीं मिल पा रही है। और कांगे्रस पार्टी, यूपीए सरकार की तरफ से कभी प्रवक्ता, कभी मंत्री और कभी इन दोनों से ऊपर के दिग्विजय सिंह इस किस्म की बातें कर देते हैं कि उनसे झगड़े-टंटे बोने का काम अधिक हो रहा है और इस फसल को काटने की हालत सोनिया गांधी की नहीं दिख रही है। हम सस्ती और फूहड़ राजनीति करने वालों के सत्ता पर काबिज होने के खिलाफ हैं, लेकिन जहां जनहित के मुद्दे, देशहित के मुद्दे सामने खड़े हों वहां पर सुरक्षा घेरे में कैद मौनी बाबा, बीबी को भी हम लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं मानते। हमें हैरानी इस बात की भी है कि भारत में जिस परमाणु बिजलीघर के खिलाफ लोग आंदोलन कर रहे हैं उस आंदोलन पर मनमोहन सिंह को अपना पहला कड़ा बयान देने की नौबत मास्को जाकर मिली। इस देश की बातों पर यहां का प्रधानमंत्री कभी अमरीका जाकर मुंह खोले और कभी रूस जाकर, यह एक शर्मनाक नौबत है।

सदन के भीतर से सुषमा का राष्ट्र के नाम संदेश

20 दिसंबर 2011
संपादकीय
सदन के भीतर से सुषमा का राष्ट्र के नाम संदेश
भारतीय जनता पार्टी ने रूस में हिंदू धर्म ग्रंथ भगवत गीता पर एक शहर की अदालत द्वारा लगाई गई रोक के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए आज संसद में यह मांग की कि भारत इस किताब को राष्ट्रीय गं्रथ घोषित करे।
आज जब हिंदुओं की भावनाएं रूस में इस कार्रवाई से आहत हैं तो ऐसी बात भाजपा को एक लोकप्रियता दिला सकती है, लेकिन हकीकत तो यह है कि ऐसा कहने के साथ-साथ भाजपा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य ऐसा कोई काम नहीं कर सकता। उत्तरप्रदेश के चुनावों को लेकर कोई मुसलमानों को मोहने का काम कर रहा है तो कोई दलितों को। भाजपा का यह ताजा नारा उत्तरप्रदेश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को प्रभावित करने की एक कोशिश हो सकती है लेकिन इसके पीछे एक राजनीतिक ईमानदारी नहीं है। लोकतंत्र की सीमाओं और भारत के ढांचे को ध्यान में रखते हुए कोई भी जानकार ऐसी कोई मांग नहीं कर सकता जो कि किसी एक धर्म को दूसरे धर्म पर चढ़कर बैठ जाने की इजाजत दिलाए। हम कांगे्रस या वामपंथियों की तो बात ही नहीं करते, भाजपा अपनी एक पुरानी साथी, अकाली दल से इस मुद्दे पर कोई समर्थन पा सकेगी? पल भर के लिए हम यह कल्पना भी करें कि ऐसा कोई प्रस्ताव संसद में औपचारिक रूप से मतदान के लिए आएगा, तो क्या अकाली दल अपने धर्म के गुरू माने जाने वाले गुरू ग्रंथसाहब को छोड़कर भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग का साथ देगा? फिर इस देश में बहुत से और धर्म भी हैं जिनके हक बराबरी के हैं। और रविशंकर प्रसाद से लेकर अरूण जेटली तक इतने बड़े-बड़े कानून के जानकार भाजपा में हैं कि वे अच्छी तरह यह जानते हैं कि भारत के पूरी तरह हिंदू राष्ट्र बन जाने के पहले तक सुषमा स्वराज की यह मांग सिर्फ संसद के बाहर के हिंदू बहुसंख्यक मतदाताओं में से सिर्फ उन्हीं लोगों को ध्यान में रखकर उठाई गई है जो संविधान से ऊपर धर्म को मानते हैं और जो बाबरी मस्जिद गिराने को सही मानते हैं।
हमें सुषमा स्वराज की इस मांग पर अफसोस इसलिए हो रहा है कि आज जब भारत का लोकतंत्र अपने पूरे अस्तित्व में सबसे अधिक मुद्दों से एक साथ जूझ रहा है, जब उसके सामने असल मुद्दों की भरमार है, जब अदालत से लेकर सीएजी तक और संसद से लेकर चुनाव आयोग तक सभी ने तरह-तरह के ऐसे पहलू सभी के सामने खड़े कर दिए हैं, जिनमें से अधिकतर में कांगे्रस और यूपीए कटघरे में है, तब एक भावनात्मक मुद्दे को इस तरह सामने रखकर यूपीए के लिए फजीहत खड़ी करने की कोशिश हम अपरिपक्व भी मानते हैं और ईमानदारी से परे भी। देश की संसद को भावनाओं में हिलाने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह संसद वैसे भी तरह-तरह के अपराधों के मामलों की चर्चा से घिरी हुई है और वही इन दिनों भारतीय लोकतंत्र के लिए काफी है। जब एक गैरजरूरी और नाजायज मांग उठाई जाती है तो उससे देश का और लोगों का ध्यान असल मुद्दों की तरफ से हट जाता है। हम संसद से लेकर विधानसभाओं तक कुछ सांसदों और विधायकों की ऐसी हरकत देखते हैं कि जब कोई बहुत महत्वपूर्ण चर्चा चलती रहती है तो वे खड़े होकर कोई ऐसा शिगूफा छोडऩे लगते हैं कि माहौल की संजीदगी पूरी तरह खत्म हो जाए।
भाजपा एनडीए के अपने साथियों के साथ मिलकर भी न तो राम मंदिर को किसी किनारे पहुंचा पा रही और न ही राम मंदिर की खुली मांग को लेकर अकेले किसी चुनाव में जाने की उसकी हिम्मत है। दरअसल उसे इस बात की अच्छी तरह समझ है कि इस देश के किसी भी आम चुनाव को मंदिर के मुद्दे पर जनमत संग्रह में तब्दील नहीं किया जा सकता। इसलिए इस किस्म की धार्मिक चर्चाओं को समय-समय पर छेड़कर वह अपने समर्थक मतदाताओं में से एक तबके को खुश रखने का काम करती है। लेकिन हमें ऐसी किसी भी चर्चा के समय छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान इस अखबार के एक सवाल के जवाब में कही बात याद आती है। उनसे जब पूछा गया था कि वे मंदिर, मस्जिद,  धर्मांतरण जैसे किसी भी भावनात्मक मुद्दे को चुनाव में क्यों नहीं उठा रहे तो उनका कहना था कि विकास के काम और जनकल्याण के अलावा उन्हें किसी और मुद्दे की जरूरत नहीं है। और उनका अंदाज सही भी साबित हुआ। पूरे देश में हम आज किसी तरह से धार्मिक धु्रवीकरण की जरूरत नहीं देखते और संभावना भी नहीं देखते। ऐसे में संसद की गंभीरता को खत्म करते हुए अगर सुषमा स्वराज एक ऐसी पूरी तरह अव्यवहारिक और अलोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मांग करती हैं तो हर कोई इस बात को समझ सकता है कि वे सदन को यह बात नहीं सुना रहीं, वे जनता के एक तबके को सुना रही हैं।