विदेशों में भारतीयों पर हमले सिर्फ नस्लीय नफरत से नहीं


02 जनवरी 2012
संपादकीय
ब्रिटेन में एक भारतीय छात्र की हत्या के बाद वहां की पुलिस ने इसे एक नस्लीय हत्या मान लिया है। इसके बाद कल कनाडा में एक भारतीय छात्र की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पिछले एक-डेढ़ बरस में आस्ट्रेलिया में बहुत से भारतीय लोगों पर हमले हुए हैं जिन्हें कुछ लोग नस्ल की वजह से हुए हमले मानते हैं और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इसके पीछे दूसरे किस्म के तनाव हैं या फिर ये सीधे-सीधे अपराध की घटनाएं हैं।
भारत के लोग आज जिस तरह दुनिया के बहुत से देशों में जाकर पढ़ रहे हैं, काम कर रहे हैं और बसे हुए हैं, उन सबको देखते हुए यह जाहिर है कि वहां के समाज के भीतर भारत के लोगों को लेकर अच्छी और बुरी कई तरह की बातें हो रही होंगी। इसके पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक फर्क की वजहें तो ही सकती हैं, बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें आर्थिक कारणों से स्थानीय लोग बाहरी लोगों का विरोध करते हैं। ऐसे तनाव देखने के लिए हमको दूर जाने की जरूरत नहीं है, भारत के भीतर ही कभी मुंबई में उत्तर भारतीयों का विरोध होता है तो कभी असम में बड़ी संख्या में हिन्दी भाषी लोग मार डाले जाते हैं। छत्तीसगढ़ में ही बिहार से आए मजदूरों को लेकर कभी विरोध होता है तो कभी उड़ीसा में मारवाड़ी भगाओ आंदोलन चला था। जब स्थानीय लोग काम नहीं पाते और बाहर से आए हुए लोग अधिक मेहनत से काम करते हैं क्योंकि वे बाहर से आए हुए होते हैं और उनका परिवार, समाज उस दूसरी जगह पर बड़ा सीमित होता है, वे अपनी घरेलू जिंदगी की चुनौतियों के साथ नई जगह पर अधिक घंटे, अधिक कड़ा काम करने को तैयार रहते हैं इसलिए वे स्थानीय लोगों के बीच कुछ तनाव की वजह भी बनते हैं।
इन तमाम विकसित देशों के लोगों से बात करें तो यह समझ आता है कि भारत या एशिया के इस हिस्से से गए हुए कामकाजी लोग वहां पर स्थानीय तौर-तरीकों के खिलाफ जाकर बहुत अधिक घंटे काम कर लेते हैं और पाई-पाई को बचाकर रखने की कोशिश करते हैं ताकि उसे घर भेज सकें। ये चूंकि कम मजदूरी पर, कम तनख्वाह पर काम करने को राजी हो जाते हैं इसलिए वे उन विकसित देशों के लोगों के रोजगार के मौकों को कम भी करते हैं। और ऐसा सिर्फ वहां पूरे वक्त काम करने वाले लोगों के साथ नहीं होता, वहां पर पढऩे के लिए गए हुए बच्चे दिन के कुछ घंटे काम करके अपना खर्च निकालते हैं, और इसमें भी वे उनके लिए बांधी गई सीमा से अधिक काम करने लगते हैं, सस्ते में काम करने लगते हैं और उन देशों के स्थानीय बच्चों के लिए एक अनचाहा तनाव भी खड़ा कर बैठते हैं। इसके अलावा कुछ स्थानीय बेरोजगार ऐसे रहते हैं जो खुद मेहनत करना नहीं चाहते लेकिन बाहर के लोगों को मेहनत से आगे बढ़ते देखकर जो बौखलाए रहते हैं। ऐसे निठल्ले लोग हमको छत्तीसगढ़ में भी दिखते हैं जो अपने आपको बेहतर बनाने के बजाए बाहरी लोगों को गालियां देते हुए खाली बैठे रहते हैं। इंसानी मिजाज सभी जगहों पर कमोबेश एक सा होता है इसलिए कई देशों में जब भारतीय लोगों के खिलाफ कोई तनाव होता है तो उसके पीछे ऐसे आर्थिक कारण भी हो सकते हैं जो कि नस्ल के बजाय रोजगार से जुड़े हुए अधिक होते हैं।
और जहां तक नस्ल के आधार पर हमलों की बात है तो भारत के भीतर ही दलितों और आदिवासियों को अपनी जाति की वजह से कितने किस्म की सामाजिक प्रताडऩा, सामाजिक भेदभाव और हिंसक हमले नहीं झेलने पड़ते? यह तो रोजाना की बात है जब देश में कहीं न कहीं जाति या धर्म के आधार पर हमले होते हों। इसलिए यह मान लेना कि अधिक पढ़े-लिखे या अधिक विकसित देश नफरत से आजाद हो गए हों, यह व्यावहारिक बात नहीं होगी। ऐसे तमाम हमलों को इस बात के साथ जोड़कर देखना चाहिए कि वहां पर भारत से गए हुए कितने लोग बसे हैं, वे कितनी आजादी के साथ वहां बराबरी के मौके पाते हैं, आगे बढ़ते हैं, कमाते हैं, बस जाते हैं और अपनी तरक्की का फायदा देश को भी वापिस भेजते हैं। ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और कनाडा, इन तमाम जगहों पर हिन्दुस्तान के लोग दसियों लाख बसे हुए हैं। इसलिए उनमें से किसी न किसी के साथ कभी न कभी ऐसे तनाव हो जाते होंगे जो कि नस्ल पर भी कभी-कभी आधारित होते हों। हिन्दुस्तान में क्या कोई ऐसा एक भी हफ्ता गुजरता है जब किसी न किसी विदेशी पर्यटक पर हमला न होता हो या उससे बलात्कार न होता हो? इसलिए ऐसी बातों को एक अनुपात में ही, संतुलित नजरिए से ही देखना चाहिए और इन्हें नस्लीय नफरत बढऩे के किसी सुबूत की तरह देखना गलत होगा।

मुफ्त की दुधारू गाय का फायदा उठाने से सरकारें अब तक बेखबर


आजकल
2 जनवरी 12
सुनील कुमार
अन्ना हजारे और दिग्विजय सिंह के बारे में इंटरनेट पर छोटे-छोटे, एसएमएस जैसी लंबाई वाले ट्विटर पिछले महीनों में भरे रहे। अन्ना हजारे की तरफ से कबीर बेदी जैसे जाने-माने लोगों से लेकर उनके दसियों हजार समर्थक इस सबसे लोकप्रिय हो चुकी वेबसाइट पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखते रहे और मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और उनकी तरफ से लगभग अकेले लड़ रहे दिग्विजय सिंह के खिलाफ रात-दिन तरह-तरह के नारे गढ़े जाते रहे। दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे के अभियान पर जो लिखते रहे, वे उत्तरप्रदेश के चुनाव और राहुल गांधी की ट्रेनिंग से बचे हुए समय में लिखी बातें रहीं, कांग्रेस की तरफ से उसके कोई हमदर्द विरोधियों पर हमला करने वाले यहां नहीं दिखे। अन्ना हजारे के मुद्दों से सहमत कुछ नामी-गिरामी पत्रकार निखिल वागले चौबीसों घंटे ट्विटर पर उनके पक्ष में लिखते रहे और इस हद तक लिखते रहे कि वे मुझ जैसे लोगों को अभियान का एक हिस्सा लगे, और दोस्ताना हमलों में मैंने बार-बार निखिल को यह लिखा भी कि वे अन्ना हजारे का साथ देते हुए लोकतंत्र के खिलाफ चले जा रहे हैं।
ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अभी कुछ शोधकर्ताओं ने ट्विटर पर जन आंदोलनों को चलाने पर काम किया है। स्पेन में मई के महीने में हुए एक बड़े आंदोलन को ट्विटर से बढ़ावा देने के लिए किस तरह एक छोटा सा समर्पित समूह एक रणनीति के साथ लगे रहा और उसने कैसे धीरे-धीरे इस आंदोलन के बीज दूसरे लोगों में बोए, कैसे समर्थन जुटाया इस पर यह पूरी रिसर्च हुई है। इसी तरह पिछले कुछ महीनों में अरब दुनिया में कई देशों में क्रांतिकारी घटनाएं हुईं, सत्ता पलटी गई, और इस दौरान भी इंटरनेट के ट्विटर जैसे माध्यम में सड़कों से परे एक ऐसा बड़ा आंदोलन चला जिसकी वजह से लाखों लोग सड़कों पर जुटे। तीसरी बड़ी घटना अमरीका में वहां के वित्तीय संस्थानों और वॉलस्ट्रीट नाम के वहां के शेयर बाजार के खिलाफ जनता का एक प्रतीकात्मक आंदोलन रहा। आकुपाई वॉलस्ट्रीट नाम से शुरू हुआ यह आंदोलन बाद में अमरीका के दूसरे शहरों में भी उन शहरों पर कब्जा करने के प्रतीक के रूप में फैला और वहां के जनमत को उसने इस बात के लिए झकझोरा कि कुछ गिनी-चुनी वित्तीय संस्थाएं किस तरह पूरी दुनिया की जिंदगी को कब्जा कर चुकी हैं।
अन्ना हजारे के उठाए हुए जनलोकपाल के मुद्दे को देश के बाहर बसे हुए हिन्दुस्तानियों के एक तबके ने इतना बढ़ावा दिया कि अमरीका के कैलिफोर्निया में जब वहां के भारतीय समुदाय के लोगों ने दांडीमार्च-2 का आयोजन किया तो उसमें शामिल होने के लिए हिन्दुस्तान से अमरीका जाकर करीब 20 दिन मैंने भी लगाए। उस वक्त मुझे जनलोकपाल आंदोलन और अन्ना हजारे की इस बारे में सोच की जानकारी कम थी। लेकिन वहां पन्द्रह दिनों तक रोजाना 18-19 मील पैदल चलते हुए भारतीय समुदाय के लोगों से मिलते हुए, उन्हें यह सुझाते हुए कि किस तरह वे भारत में अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखें और किस तरह अपनी पहचान के लोगों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होने के लिए लिखें। लिखने का यह पूरा सिलसिला अब सिर्फ इंटरनेट पर ही रह गया है और तब से लेकर अब तक दांडीमार्च-2 के हमारे साथ लगातार भारत में भी इस आंदोलन को वहां बैठे हुए बढ़ावा दे रहे हैं।
ब्रिटेन में अभी हुए इस रिसर्च के पहले भी, मैंने कुछ मौकों पर यह लिखा है कि इन दिनों लगातार फिल्मों के लोग, टेलीविजन के लोग और अखबारों के भी लोग किस तरह लगातार अपने काम को ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों के मार्फत बढ़ावा देते चल रहे हैं। किसी अखबार में एक स्तंभकार के कॉलम को हो सकता है कि लाख लोग पढ़ते हों, लेकिन जब ऐसे स्तंभकार ट्विटर पर करोड़ों लोगों तक अपने कॉलम के बारे में सूचना पहुंचाते हैं, और उस कॉलम तक पहुंचने का ऐसा हॉटलिंक साथ में देते हैं जिससे कि एक क्लिक करते ही लोग उनके पेज तक पहुंच सकें, तो वे अपनी पहुंच को सैकड़ों गुना बढ़ा लेते हैं। भारत के समाचार टीवी चैनलों के कुछ जाने-माने चेहरों के ट्विटर पर पांच-पांच लाख फॉलोअर हैं, और जब ऐसे टीवी प्रस्तुतकर्ता एक लाइन ट्विटर पर डालते हैं तो उन पांच लाख लोगों तक तो वह लाइन सीधे ही पहुंच जाती है, उनमें से जिन लोगों के और दूसरे फॉलोअर हैं, उन तक भी वह बात पहुंच जाती है। मतलब यह कि पांच लाख से कई गुना अधिक लोग उस सूचना को पल भर में देख लेते हैं।
अमिताभ बच्चन से लेकर दूसरे बहुत से लोगों तक, हर किसी को अब यह जरूरी हो गया है कि अगर उन्हें प्रचार चाहिए तो वे टीवी और अखबारों से परे भी इस तरह लगे रहें, और अब अपने-अपने मोबाइल फोन से जब लोग ट्विटर पर पल-पल कुछ डाल सकते हैं, तो यह प्रचार बहुत मायने रखता है। अब दक्षिण भारत के किसी शहर में अगर किसी मरीज को खून की जरूरत है तो उसकी मांग लोग ट्विटर पर डालते हैं, उसके आखिर में आरटी (रीट्वीट) की अपील करते हैं और खून की यह जरूरत ट्विटर पर दुनिया के अलग-अलग कोनों से अलग-अलग लोग अपने सारे फॉलोवरों  को पल भर में भेज देते हैं और बिखरे हुए पेट्रोल की आग की तरह कोई भी बात चारों तरफ फैल जाती है।
एक वक्त था जब टीवी समाचार चैनल अपनी खबरों के बीच नीचे एक पट्टी पर ब्रेकिंग न्यूज दिखाते थे। अब कोई भी खबर पहली बार किसी चैनल पर नहीं आती, वह अमूमन हर बार ट्विटर पर पहले आती है क्योंकि किसी भी संवाददाता के पहले उस घटना के गवाह, उस घटना के भागीदार लोग ही ट्वीट कर देते हैं। किसी हादसे के शिकार लोग पुलिस और एम्बुलेंस आने के पहले भी घटना और अपने बारे में इंटरनेट पर डालना शुरू कर देते हैं और सूचना इतनी तेजी से देने का काम कोई समाचार माध्यम कैसे कर सकता है?
दूसरी बात यह कि बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोग ट्विटर पर जो लिखते हैं, उस पर पल भर के भीतर लोगों की लिखी बातें भी आने लगती हैं और बात शुरू करने वाले ऐसे नामी-गिरामी लोग सीधे-सीधे अपने चाहने वालों से, या नफरत करने वालों से रूबरू हो जाते हैं। देश के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री, नामी-गिरामी इतिहासकार, दुनिया के आज के वक्त के बड़े-बड़े दार्शनिक और विचारक, बड़े-बड़े लेखक और कलाकार, खिलाड़ी और पत्रकार अपनी लिखी बातों पर जब पूरी दुनिया के लोगों की प्रतिक्रिया सीधे-सीधे पाने लगते हैं, उनमें से कुछ बातों का जवाब देकर वे जवाब में और भी कुछ पाने लगते हैं, तो लोगों की नब्ज टटोलने का इससे अधिक कारगर और कौन सा तरीका हो सकता है?
लेकिन मैंने पिछले कुछ महीनों में ट्विटर जैसे धारदार, असरदार औजार पर जितना देखा है, मुझे लगता है कि भारत की सरकारें अब तक इसकी ताकत का अंदाज नहीं लगा पाई हैं। दो-चार मुख्यमंत्री इस पर दिखते हैं और उनमें जम्मू कश्मीर के नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला खुलकर अपनी बात कहते हैं, लोगों से बहस में उलझते हैं, लेकिन वे अपनी, पार्टी और सरकार की सोच को असरदार तरीके से तकरीबन रोजाना लोगों के सामने रख देते हैं। केन्द्र सरकार के दो-चार मंत्री हैं जो कि अपनी बातों को यहां पर कहते हैं। कांग्रेस पार्टी की तरफ से दिग्विजय सिंह अकेले ही यहां सक्रिय दिखते हैं और कई बार मुझे ऐसा लगता है कि जिन मुद्दों पर कांग्रेस सही रहती है, और वैसे मौकों पर उसकी हिमायत में जो तर्क हम लिखते हैं, वैसे तर्कों को भी कांग्रेस की तरफ से ट्विटर पर लिखने वाले कोई नहीं रहते। दूसरी तरफ भाजपा के नेताओं और उनके समर्थकों की भीड़ इंटरनेट पर दिखती है और सुषमा स्वराज जैसे नेता पल-पल यह बताते रहते हैं कि वे कितने मिनट के भीतर संसद में किस मुद्दे पर भाषण देने वाले हैं, या भंडारा की आमसभा की मंच से सुषमा यह ट्वीट करते रहती हैं कि किस तरह वे रमन सिंह और नितिन गडकरी के साथ शक्कर कारखाने के कार्यक्रम में हैं और ये दोनों नेता क्या कह रहे हैं।
बाजार प्रचार का कोई भी मौका नहीं चूकता। इसलिए लाखों-करोड़ों नामों से बाजार अलग-अलग सामानों और सेवाओं को ढंके-छुपे अंदाज में लोगों तक ट्वीट करते रहता है और इनसे बचकर रहना एक बड़ी चुनौती रहती है ताकि लोग सिर्फ अपनी पसंद की बातों को वहां पढ़ सकें। इसी तरह धार्मिक, आध्यात्मिक और तरह-तरह की नफरत वाली बातें भी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों से दुनिया के एक तबके तक लगातार पहुंच रही हैं और इस टेक्नालॉजी की सुविधा के चलते ऐसी बातें समर्थकों से आगे हजार-हजार गुना बढ़ती भी जा रही हैं।
भारत की सरकार, यहां के राज्यों की सरकारें, केन्द्र और राज्य के बहुत से सार्वजनिक प्रतिष्ठान, संवैधानिक संस्थाएं मुफ्त में हासिल ऐसी वेबसाइटों का इस्तेमाल करते नहीं दिख रहीं जबकि कम्प्यूटर-इंटरनेट या मोबाइल-इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले तमाम लोगों तक पहुंचने के लिए यह एक बहुत कारगर तरीका हो सकता है। सरकारी प्रचार के परंपरागत तरीके पत्र-पत्रिकाओं और रेडियो-टीवी के लायक तो हैं, लेकिन सामाजिक अंतरजाल को खड़ा करने और उसके माध्यम से अपनी बात को एक बढ़ते चल रहे तबके तक पहुंचाने का काम अभी नहीं दिख रहा है। एक तरफ तो केन्द्र सरकार के पास सैम पित्रोदा से लेकर नंदन निलेकेणी तक बहुत से ऐसे जानकार लोग हैं जो कि अपनी तकनीकी खूबियों के चलते ही सरकार तक पहुंचे हैं। और फिर आज तो सोशल नेटवर्किंग की क्षमता को दुहने का काम तो बहुत कम जानकार, बेरोजगार नौजवान भी करते दिखते हैं।
पूरी दुनिया में आंदोलनों के लिए कहीं औजार और कहीं हथियार की तरह इस्तेमाल होने वाली सोशल नेटवर्किंग की क्षमता का जनहित में इस्तेमाल सरकारों, स्थानीय संस्थाओं और जनकल्याणकारी संगठनों को सोचना चाहिए।

रत्न और कंकड़

01 जनवरी 2012
संपादकीय

नए साल में लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की अधिक समझ पैदा हो यह शुभकामना हम सबको देना चाहते हैं। आज दूसरा कोई बहुत बड़ा मुद्दा इस जगह लिखने को नहीं है इसलिए कुछ हफ्ते पहले प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस काटजू के कहे एक बयान पर हम चर्चा करना चाहते हैं कि फिल्मी सितारों और क्रिकेट खिलाडिय़ों को भारत रत्न देने के बजाय गालिब सरीखे महान शायर को भारत रत्न देना बेहतर होगा। उनके इस बयान के कई महीने पहले हमने अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसे लोगों को भारत रत्न देने की मांग का विरोध इसी जगह इसी संपादकीय कॉलम में किया था और हमारा यह तर्क था कि अपने पेशे से अरबपति बने हुए इन लोगों का समाज के लिए इतना कम योगदान है कि इन्हें भारत रत्न देने का कोई औचित्य नहीं है। इन्हें अपने अभिनव और अपने खेल से इतना कुछ मिल चुका है कि उस दौलत और शोहरत के बाद वे और किसी अतिरिक्त सम्मान के हकदार नहीं है। अमिताभ बच्चन के बारे में लंबे समय से हमारी यह शिकायत रही है कि अपने ससुराल-गांव भोपाल की गैस त्रासदी के बारे में कभी उनका मुंह नहीं खुला और न ही उन्होंने वहां के तकलीफजदा मरते हुए लोगों के लिए कुछ किया। दरअसल बच्चन परिवार में कारखानों की चिमनियों की तरह हर सदस्य टकसाल सा कमाता है लेकिन समाज के जरूरतमंद लोगों के लिए एक धेला कभी देते हुए उन्हें नहीं देखा गया, सिर्फ मंदिरों में कभी-कभार का चढ़ावा तस्वीरों में आता है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए अमिताभ बच्चन ने उत्तरप्रदेश में अपनी बहू ऐश्वर्या राय बच्चन के नाम पर एक कॉलेज खोलने की घोषणा की थी, लेकिन मुलायम राज जाने के बाद वह घोषणा भी खत्म हो गई। हमारे लिए यह भी एक अजीब बात थी कि अपने स्वर्गीय माता-पिता के नाम पर स्कूल-कॉलेज का नाम रखने की भारतीय परंपरा से परे जाकर अमिताभ बच्चन ने जाने क्या सोचकर अपनी बहू के नाम पर इस कॉलेज की घोषणा की थी। लेकिन अजीब होने के अलावा इस बात में गलत कुछ नहीं था, और यह उनकी अपनी मर्जी थी कि वे नाम किसके नाम पर रखें, लेकिन समाज सेवा का वह एक काम भी नहीं हुआ। दूसरी तरफ हमने सचिन तेंदुलकर की कई बार इस बात को लेकर आलोचना की थी कि जब उन्हें विदेश में कई करोड़ रूपए की एक लक्जरी कार तोहफे में मिली तो उन्होंने भारत सरकार से इसके आयात शुल्क में लगने वाले कुछ करोड़ रूपए की माफी मांगी थी। इसके पहले भी सचिन अरबपति हो चुके थे। 
अखबारों में आए दिन खबरें छपती हैं कि यह देश किस कदर गरीब है, गरीबी के रेखा के नीचे 70 फीसदी आबादी होने का अंदाज भारत सरकार के एक रिपोर्ट में आ चुका है। अर्जुन सेन गुप्ता की ऐसी रिपोर्ट को स्वर्गीय अदम गोंडवी की एक गजल से जोड़कर भी देखा जाता है कि सौ में सत्तर आदमी जब मुल्क में नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए मुल्क क्या आजाद है...। ऐसे देश में एक अरबपति खिलाड़ी जब कुछ करोड़ की रियायती ऐसी सरकार से मांगता है जो अपनी तीन चौथाई जनता को भूख से आजादी भी नहीं दिला पा रही है, तो वह कम से कम हमें तो इस देश का ऐसा रत्न नहीं दिखाई पड़ता जिसे कि देश का सबसे बड़ा सम्मान दिया जाए। इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि चार दिन पहले ही यह खबर आई है कि सचिन तेंदुलकर ने मुंबई के अपने नए मकान का सौ करोड़ का बीमा करवाया है। जिसका घर सौ करोड़ का हो, बाकी जायदाद और पूंजी निवेश अलग हों, और कमाई अभी जारी ही हो, वह सरकार से टैक्स की छूट मांगे! और ऐसे देश में वह उस आयात शुल्क से छूट मांगे जिस छूट के बिना दवाईयां और कई तरह के इलाज के सामान इतने महंगे हो जाते हैं कि गरीब उन्हें खरीद पाने के बजाय मौत को खरीदने को बेबस होते हैं, ऐसे देश में करोड़ों के तोहफे पर करोड़ों की छूट पाने की सोच क्या इस देश का रत्न है? कोई व्यक्ति अपने पेशे में बहुत कामयाब और शायद बहुत महान हो सकता है। लेकिन हम कामयाबी के दाने-दाने को भुना लेने वाले और देश की जरूरतों को पूरी तरह से भुला देना वालों को किसी तरह के रत्न में नहीं गिनते। एक बार फिर जस्टिस काटजू के बयान के बाद रत्नों की चर्चा होने लगी है, सिनेमा और टीवी के पर्दे पर, खेल के मैदान में और इश्तहारों के बाजार में जो रत्न हैं, उनका वहीं कारोबारी सम्मान हो रहा है। हमारे हिसाब से देश के जरूरतमंदों के लिए योगदान के मामले में ये दोनों लोग और इस तरह के और लोग कंकड़ हैं। 

यह टाइमपास नहीं, दिमागफेल


31 दिसंबर 2011
संपादकीय

एक साल पूरा होने और दूसरा साल शुरू होने का मौका यूं तो जश्न से परे के लोगों के लिए किसी भी एक दूसरे दिन की तरह का होता है, लेकिन चूंकि कैलेंडर बदलता है, इस मौके पर लोग बहुत सी बातों तय करते हैं। कुछ अपने मन में और कुछ दूसरे लोगों के बीच, कि इस नए साल में कौन-कौन सी बातें नहीं करेंगे और कौन-कौन सी बातें करेंगे। ऐसे में कुछ लोग हमसे भी पूछते हैं कि नए साल के लिए हमारी क्या राय है।
पिछले एक बरस में भारत में एक बड़ी चीज यह देखी कि  खबरों का सैलाब किस तरह लोगों को बहाकर ले जाता है और किसी ऐसी जगह खड़ा कर देता है जिस मंजिल के बारे में, जहां तक पहुंचने की राह के बारे में उन्होंने पहले कभी सोचा भी न रहा हो। समाचारों और विचारों की आज की बाजार व्यवस्था अपने कारोबार से और अधिक किसी की आगे ले जाने के लिए फिक्रमंद नहीं होती। कहने को तो मीडिया न्यूज और व्यूव्ज, खबर और खयाल, से जुड़ा हुआ कारोबार है लेकिन सच और टीआरपी (टीवी की दर्शक संख्या का पैमाना) के बीच जब पसंद की बात आती है तो भारत के अधिकांश टीवी समाचार चैनलों की असली पसंद के बारे में कोई शुबहा नहीं रह जाता। इसी तरह अखबारों का जो गलाकाट मुकाबला चलता है, उसमें सतह पर तैरती सनसनीखेज जानकारी उसी तरह काम की मानी जाती है जिस तरह किसी कोल्ड ड्रिंक की बोतल में भरे हुए बुलबुलों की सनसनी को जरूरी माना जाता है। लेकिन यह तो एक आजाद और उदार अर्थव्यवस्था के भीतर का खुला कारोबार है जिसे किसी भी तरह का कोई मिशन या लोकतंत्र का पाया मानना फिजूल की बात है और हम न इस कारोबार के लिए किसी अतिरिक्त सम्मान को ठीक समझते हैं और न ही इस कारोबार से आदर्शों की किसी अतिरिक्त उम्मीद को जोडऩा ठीक समझते हैं।
तो जब मीडिया को हम समाचारों और विचारों के कारोबार से अधिक जिम्मेदार नहीं मानते तो फिर यह पढऩे, देखने और सुनने वालों की जिम्मेदारी बन जाती है कि वे कैसे बेहतर खबरें पाएं, छांटें और पढ़ें। कैसे बेहतर खबरों को देखें। यह चर्चा जरूरी इसलिए है कि 2011 को भारत में लोगों की भावनाओं को भड़काने वाले साल की तरह भुगता है और इस कदर भुगता है कि शहरी, संपन्न, शिक्षित और मोटे तौर पर सतही समझ के शिकार तबके की लोकतंत्र पर से आस्था हट सी गई थी। मजे की बात यह थी कि यह सब लोकतंत्र के नाम पर ही हो रहा था। नए बरस में अगर हम कोई एक उम्मीद लोगों से करेंगे, तो वह यह है कि लोग अच्छे और बुरे को पढऩे और देखने-सुनने का फर्क ध्यान से करें। जिंदगी में काम और आराम के घंटों के बाद बचे वक्त में से अधिकतर लोग एक चौथाई वक्त अखबार और टीवी पर लगा देते हैं। न तो आराम पर लोगों का बस रहता, न काम के घंटों पर रहता, और बचे हुए वक्त का इस्तेमाल अगर बहुत सोच-समझकर बहुत समझदारी के अखबारों, खबरों और विचारों, टीवी के जिम्मेदार समाचार बुलेटिनों पर नहीं लगाया गया तो अगला हर दिन लोगों को जिम्मेदारी और समझदारी, सच और सरोकार की बातों से परे ले जाएगा और यह लोकतंत्र प्रोपेगंडा के असर में दबा-कुचला रह जाएगा।
इस एक बात के साथ-साथ जुड़ी हुई दूसरी बात यह है कि भारतीय समाज का सबसे मुखर तबका, जो मीडिया में जगह पाता है, और जिसके लिए मीडिया काम करता है, वह देश के बहुत से जरूरी पहलुओं से, असर मुद्दों से और दुनिया की बहुत सी जरूरी बातों से अनछुआ रह जाता है। मिसाल के लिए लोग टीवी के बाकी समाचार चैनल छोड़कर कुछ दिनों के लिए दूरदर्शन और लोकसभा चैनल-राज्यसभा चैनल को देखें तो उन्हें यह पता लगेगा कि टीआरपी की लड़ाई में रात-दिन अपने बखान करने वाले चैनलों की सनसनी भारत के एक बहुत छोटे हिस्से को ही दिखाती है। सरकार के इन चैनलों से भारत की असल जिंदगी से जुड़े हुए बहुत से ऐसे मुद्दों पर खबरें रात-दिन मिलती हैं कि जिनके साथ-साथ सत्ता के पसंदीदा एक-दो नेताओं का कुछ अधिक कवरेज देख लेना कोई नुकसान की बात नहीं होती। हम मीडिया के सामाजिक योगदान को बाजारू-कारोबारी मुकाबले के चलते बहुत बुरी तरह पिछड़ते देख चुके हैं, और यही वजह है कि प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के मुखिया जस्टिस काटजू को बहुत सी ऐसी कड़वी बातें कहनी पड़ीं जिन्होंने मीडिया के बादशाहों को बौखलाकर रख दिया है। तो देश और दुनिया की जरूरी बातों को, अहमियत वाली बातों को पाठक और दर्शक कहां पर पाएंगे, यह समझ और इसकी जरूरत आने वाले इस बरस में लोगों में बढ़े तो ही देश और दुनिया का एक बड़ा फायदा हो सकता है, या एक बड़ा नुकसान थम सकता है।
जो लोग यह समझते हैं कि अखबार और टीवी के न्यूज चैनल टाइमपास का सामान हैं, वे यह भी समझ लें कि ऐसी समझ पैदा करके एक कारोबार तो पास हो गया है लेकिन मीडिया-कारोबार का ग्राहक फेल हो गया है और उसके साथ-साथ समाज और लोकतंत्र भी फेल हो रहे हैं। बाजार में कुछ चुनिंदा कारोबार जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं वे सोची-समझी साजिश के तहत अपने ग्राहक के दिमाग को छोटा और जेब को बड़ा करने की तरकीबें रात-दिन निकालते रहते हैं और लोगों पर आजमाते भी रहते हैं। उपभोक्तावाद अब सिर्फ वॉलमार्ट से नहीं बढ़ता, मीडिया उसके लिए सबसे बड़ा उपजाऊ खेत हो गया है। लोगों को यह सावधानी रखनी होगी कि टाइमपास करते हुए उनका दिमागफेल तो नहीं हो रहा है।

राज्यसभा में कल हार किसकी हुई, यह समझने की जरूरत


30 दिसंबर 2011
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार

लोकपाल विधेयक को लेकर कल राज्यसभा में जो हुआ उसकी व्याख्या हो जाने के पहले से ही टीवी चैनलों पर शुरू हो गई थी और कुछ समाचार चैनलों में पहले से एक ऐसी साजिश की खबर दी थी कि यूपीए अपने पाले के किसी एक विपक्षी दल की मदद से सदन में ऐसा हंगामा करवाएगी जिससे कि उसे मतदान टालने का बहाना मिल जाए। राज्यसभा में जब यह विधेयक लोकसभा और राष्ट्रपति से होते हुए पहुंचा, तब भी यह बात जगजाहिर थी कि यूपीए के पास राज्यसभा में बहुमत तो है ही नहीं, गठबंधन के कुछ साथी इस विधेयक की कुछ बातों को लेकर खुलकर खिलाफ थे और उन संशोधनों के बिना वे साथ देने वाले नहीं थे। लेकिन लोकसभा के बाद विधेयक का राज्यसभा में जाना एक बहुत स्वाभाविक और नियमित संसदीय प्रक्रिया है और लोकसभा में भी इस विधेयक के पेश होने के पहले से न सिर्फ यूपीए को बल्कि गिनती जानने वाले हर भारतीय तक यह जानकारी थी कि कांग्रेस के पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत नहीं है और राज्यसभा में वह अल्पमत में है। इसके बावजूद अन्ना की धमकी से डरी-सहमी यूपीए-मुखिया कांग्रेस पार्टी ने इस विधेयक को हड़बड़ी में तैयार किया और सरकार से संसद तक का रास्ता यूपीए मंत्रियों ने एक किस्म से घुटनों पर ही तय किया। उसका एक नतीजा यह था कि इस विधेयक से कोई संतुष्ट नहीं हो पाया और इसकी खामियां-कमजोरियां उजागर होती चली गईं। लेकिन कागजी खामियों से कहीं अधिक यह उजागर होते गया कि सरकार ने अन्ना हजारे के दबाव में, देश में बने हुए बागी तेवरों को देखते हुए ऐसी हड़बड़ी में यह विधेयक बनाया जो कि देश के लोकतंत्र के ढांचे के ही खिलाफ जाते दिख रहा है। राज्यसभा में कल रात मतदान हुआ या नहीं हुआ, यह बात इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी महत्वपूर्ण बातें कल वहां रामविलास पासवान, वामपंथी सीताराम येचुरी और जदयू के शिवानंद तिवारी वगैरह ने कहीं। लेकिन उन बातों पर भी हम अभी जाना नहीं चाहते, उनके बारे में पहले भी लिखा गया है और आगे फिर लिखा जाएगा। आज हम यह चर्चा करना चाहते हैं कि कल राज्यसभा में इस विधेयक पर मतदान न होना क्या बताता है।
जैसी कि जानकारी कल आधी रात तक आती रही, लोकसभा में सभी पार्टियों के सामने पेश इस विधेयक पर बहुत से संशोधन सामने आए जिनमें से करीब पौन दर्जन संशोधन सरकार ने मान भी लिए। इसके बाद वहां से कोई विधेयक जब संशोधनों पर राष्ट्रपति सहमति को लेकर राज्यसभा में आता है तो एक संसदीय-संवैधानिक समझ  यह भी है कि पार्टियों ने लोकसभा में संशोधन पेश कर दिए हैं, और अब राज्यसभा में उतना अधिक काम नहीं बचा होगा। राज्यसभा में संशोधनों का एक और मतलब यह होता है कि विधेयक एक बार फिर लोकसभा में जाएगा और वहां पर राज्यसभा के किए हुए संशोधनों पर लोकसभा फिर से फैसला लेगी, और लोकसभा के उस ताजा फैसले पर राष्ट्रपति यह फैसला लेंगी कि लोकसभा को मान लिया जाए या फिर संसद का एक संयुक्त सत्र बुलाकर दोनों सदनों के सदस्यों को एक साथ मतदान का मौका दिया जाए।
ऐसे में कल जब राज्यसभा में पौने दो सौ से अधिक संशोधन पेश किए गए, और सरकार से यह उम्मीद की गई कि उन सब पर विचार करके, जिनको मानना है मानकर, जिनको न मानना है न मानकर रात के पहले मतदान करवा ले क्योंकि कल सत्र का आखिरी दिन था, तो यह उम्मीद हमारी साधारण संसदीय समझ से कुछ बाहर है। क्या देश में इतना बड़ा कोई कानून ऐसी हड़बड़ी में बनना चाहिए जिसमें 187 संशोधनों पर सदन की कार्रवाई के चलते-चलते सरकार बाहर विचार भी कर ले, और भीतर अपने फैसले की घोषणा भी कर दे? हम इस नौबत के मद्देनजर इस बात को कम महत्वपूर्ण मानते हैं कि सरकार के पास वहां पर कितने वोट थे और कितने नहीं थे। सरकार तो वहां अल्पमत में इस विधेयक के पहुंचने के पहले से थी, और है। इस अल्पमत में और कमी यही आ सकती थी कि तृणमूल कांग्रेस जैसे साथी मतदान में यूपीए का साथ नहीं देते, लेकिन इससे भी मतदान में तो सरकार की हालत में कोई फर्क नहीं पडऩा था। इसलिए हम मतदान को महत्वपूर्ण नहीं मानते और हम इस कानून को महत्वपूर्ण मानते हैं जिसे लेकर देश को पिछले कई महीनों से एक ऐसे उकसावे में रखा गया है कि मानो लोकपाल आज बनेगा और कल एक बंदूक लेकर देश के सारे भ्रष्ट लोगों को 'सिंघमÓ की तरह मार डालेगा। साठ बरस में जब लोकपाल नहीं बना था तो दो-चार महीने के बाद के सत्र तक और कौन सा कहर टूट पड़ रहा था? यह ठीक है कि आज कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार की साख गटर के नीचे पहुंची हुई है, लेकिन जब बात देश के भले के एक कानून की आती है तो हम इतने संशोधनों को एक दिन के भीतर देखकर, उन पर विचार करके सदन में आधी रात तक, या अगले दो-चार दिनों में भी (अगर सत्र बचा होता तो) विधेयक को मतदान के लिए पेश करने की उम्मीद को नाजायज मानते हैं।
भारत का इतिहास गवाह है कि महत्वपूर्ण कानून जब हड़बड़ी में बनते हैं तो उनमें संशोधन अगले ही सत्र से शुरू हो जाते हैं। जिन लोगों को आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) के बनने की जानकारी है, वे बता सकते हैं कि डेढ़ सौ बरस पहले यह कानून बनाने में अंग्रेजों ने दस बरस का समय लिया था। यही वजह है कि अपनी कुछ बुराईयों के साथ ही सही, आईपीसी आज तक चली आ रही है। लोकपाल एक बहुत अलग धारणा है और इसमें लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों और जिम्मेदारियों का एक बार फिर सीमांकन हो रहा है। इस देश में अगर कोई किसान अपनी जमीन को पटवारी से नपवाना चाहता है, तो भी व्यवस्था यह है कि बारिश के कीचड़ में वह नाप नहीं होता कि कोई चूक न हो जाए। ऐसे में संसद, सरकार, अदालत और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के बीच, जांच एजेंसियों के बीच, केन्द्र और राज्य के जटिल अंतरसंबंधों के बीच एक नए लोकपाल के ढांचे जब तय करना है तो उसके लिए इस तरह की हड़बड़ी कल दिखाई गई कि मानो एक जनवरी को लोकपाल का काम सम्हाल लेना जरूरी है। किसी बड़ी इमारत को डिजाइन करते हुए जितना वक्त तैयारी में लगाया जाता है, उतनी ही बचत बाद में तोडफ़ोड़ से बचकर होती है। और हम कुछ हफ्तों या कुछ महीनों के बाद के सत्र में इस लोकपाल विधेयक पर मतदान को बेहतर समझेंगे अगर तब तक सरकार उस पर बारीकी से गौर कर सकती है। विपक्ष की कल की हड़बड़ी एक बहुत छोटी सी राजनीतिक बात का मजा लेने की थी कि सरकार का विधेयक राज्यसभा में पास नहीं हो सकता। जब देश की बात है, और जब सत्तारूढ़ पार्टियों और विपक्षी पार्टियों, इन दोनों की सरकारों की लूटपाट देश भर में जगह-जगह दिख रही है, तो जनता की सेहत पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस सदन में कौन अपना बाहुबल साबित कर पाता है। बेहतर यही है कि कल तक सरकार जिस तरह अन्ना हजारे के दबाव में हड़बड़ी में गिरते-पड़ते यहां तक पहुंची है, अब वह विपक्ष के प्रोपेगंडा के दबाव की हड़बड़ी में गिरते-पड़ते कई और किस्म की गलतियां न करे।
हमें देश के कई बड़े-बड़े नामी-गिरामी टीवी प्रस्तुतकर्ताओं और पत्रकारों की नाटकीयता पर कल तरस आ रहा था कि अपने दो-चार घंटों के बुलेटिन को नाटकीय और सनसनीखेज बनाने के लिए वे इसे जीत और हार से जोड़ रहे थे, सदन में एक सोचे-समझे हंगामे से जोड़ रहे थे और इसे सरकार की बुरी तरह की हार मान रहे थे। यह सरकार कितनी अच्छी है और कितनी बुरी है इस पर हमारी सोच को हमारे पाठक यहां पर लगभग रोजाना पढ़ते हैं। लेकिन जब तक कोई सरकार सत्ता पर बने रहने का संवैधानिक हक खो नहीं देती तब तक हम उस सरकार को सरकार की तरह काम करते देने के हिमायती हैं। राज्यसभा में कल 187 संशोधनों को देखे-समझे बिना अगर सरकार उन्हें कुछ घंटों में मान लेती या खारिज कर देती तो इसे राज्यसभा के ऐसे सदस्य अपना अपमान मानते या न मानते, हम तो इसे देश की जनता का अपमान मानते हैं। सरकार सिर्फ किसी सदन के लिए जवाबदेह नहीं है, वह देश की जनता के लिए भी जवाबदेह है, और उसे इस काम को करने के लिए जितना वक्त चाहिए वह उसे लगाना चाहिए। भारत की संसदीय राजनीति एक ऐसी तंगदिली से गुजर रही है जहां पर सदन में लोगों की कही बातें कई बार अगले दिन के अखबार की सुर्खियों से अधिक मायने नहीं रखतीं। लोकतंत्र का इतिहास ऐसी बातों को बहुत औसत बातों की तरह दर्ज करता है और ये बातें दुनिया की किसी संसद में मिसाल की तरह इस्तेमाल नहीं होतीं, बल्कि इन खबरों वाले अखबार कुछ दिनों के भीतर फिर लुग्दी बन जाते हैं।
हम सरकार की किसी शिकस्त से कल की राज्यसभा को जोडऩे के बजाय हम विपक्ष को, जिसमें वामपंथी और रामपंथी दोनों शामिल थे, इस बात के लिए हारा हुआ मानेंगे कि उन्होंने अपने ही पेश किए संशोधनों की गंभीरता को खत्म कर दिया। अरूण जेटली से लेकर सीताराम येचुरी तक, किसकी कितनी मानवीय क्षमता है कि वे सदन के चलते-चलते इतने संशोधनों पर विचार करके उनके बारे में अपना पक्ष रखकर मतदान करवा लेते? सरकार की घेराबंदी करने के लिए देश के हितों को अलग रख देना ठीक नहीं है। सरकार को तो राज्यसभा में जीतना वैसे भी मुमकिन नहीं था, विपक्ष जरूर हमारे हिसाब से अपनी एक व्यापक जिम्मेदारी से हार गया और मानो गिनती गिनकर मजा लेते रहा।

अन्ना का यह फिलहाल-अंत भारतीय लोकतंत्र के हित में


29 दिसंबर 2011
विशेष संपादकीय
अन्ना का यह फिलहाल-अंत भारतीय लोकतंत्र के हित में

अन्ना हजारे ने भारत के लोकतंत्र के लिए, यहां के संविधान के लिए, यहां की संसद के लिए जो हिकारत दिखाई, लोगों के बीच इस देश के संस्थानों के खिलाफ जो अनास्था बोई और रात-दिन खाद-पानी देकर उस फसल को लहलहाने का भी काम किया, वह सब जनता को थका देने वाला था। एक वक्त ऐसा था जब एक तबके ने इस देश के लोगों को भड़का कर अयोध्या की तरफ रवाना कर दिया था और बाबरी मस्जिद को गिरवा दिया था। लेकिन दोबारा आज धर्मान्धता को, साम्प्रदायिकता को राजनीतिक मकसद से उस तरह कोई फिर इस्तेमाल कर सके, ऐसी कोई कल्पना भी नहीं करता, खुद मंदिरमार्गी भी नहीं करते। ऐसा ही तजुर्बा इमरजेंसी का रहा, और इस देश में कोई दोबारा वैसे दौर की कल्पना नहीं कर सकता। अन्ना हजारे ने भी देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन के नाम पर जो मनमानी की, नेताओं और अफसरों के सारे तबके को, संसद को जिस तरह से गालियां दीं, उनका एक न एक दिन इस देश की अमनपसंद जनता के बर्दाश्त से बाहर होना ही था, और वह बहुत जल्द हो गया। अन्ना के साथ एक दूसरी दिक्कत यह रही कि वे जिस लोकतंत्र और जनता की बात हर सांस के साथ बोल रहे थे, उसी जनता को उन्होंने तानाशाही के अपने साम्राज्य रालेगान सिद्धी में अपने गुलामों की तरह रखा। वहां उन्होंने पंचायत के चुनाव नहीं होने दिए, शराब पीने वालों को मंदिर में कसम दिलाने और खंभे से बांधकर कोड़े लगाने जैसे कानून बनाकर लागू किए, लोगों का टीवी पर मनोरंजन धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया और महिलाओं के बारे में घोर अपमान की जुबान का इस्तेमाल किया। उनकी जिस ताजा बात को लेकर अभी लोग हक्का-बक्का हैं, उसमें उन्होंने मुंबई के अनशन के माईक से ही कहा है- बांझ औरत प्रसूता की वेदना को क्या समझेगी?

यह बात इस देश में शोषण का शिकार चली आ रहीं महिलाओं के लिए पुरूष प्रधान समाज की आम हिकारत का ही एक सुबूत है। हमने दर्जन भर से अधिक बार इस जगह इस बात को लेकर अन्ना की आलोचना की है कि उन्होंने लोकपाल मसौदा कमेटी में सरकार के न्यौते पर अपने जिन सदस्यों को रखा, उनमें एक भी महिला नहीं थीं। वैसे तो उसमें एक भी दलित नहीं था, एक भी अल्पसंख्यक नहीं था और समाज के या तथाकथित सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों के रूप में पांचों कुर्सियों पर अन्ना की टोली का कब्जा पूरी तरह अलोकतांत्रिक और गांधी विरोधी था। लेकिन हम उस बात पर अभी नहीं जा रहे आज हमारी तकलीफ बिना संतान वाली किसी महिला पर अन्ना हजारे के ऐसे घटिया बात को लेकर है। एक महिला जिसे प्राकृतिक कारणों से कोई संतान नहीं हुई है, वह परिवार और समाज के बीच वैसे भी लोगों के ताने और उनकी हिकारत का शिकार होती ही है। इस बात को भारत जैसे समाज में हर कोई अच्छी तरह जानता है। और रात-दिन बोलने वाले अन्ना हजारे जितने बुजुर्ग और अनुभवी को तो यह बात अपने बचपन से ही देखने मिली होगी कि बेऔलाद औरत को एक गाली की तरह कैसे भारतीय समाज इस्तेमाल करता है। ऐसी ही अनगिनत बातों का नतीजा यह रहा कि देश की जनता का अन्ना हजारे के प्रति सम्मान कम होते-होते अब इस कदर घट गया कि वह मुंबई जैसे महानगर में कुछ हजार पर टिक गया। लोगों को याद होगा कि किस तरह अन्ना हजारे ने एक विचलित या प्रचारप्रेमी नौजवान द्वारा शरद पवार पर हमला करने पर खुशी जाहिर की थी। मानो उनकी वह वीडियो क्लिप उनके लिए पर्याप्त आत्मघाती नहीं थी, उन्होंने उसके बाद कई बार उस हमले को न्यायोचित ठहराने की कोशिश की और यहां तक कहा कि शरद पवार और उनके लोग उस थप्पड़ का बुरा क्यों मान रहे हैं? अपने गांव में अपने कद और अपनी शोहरत के आतंक तले तानाशाही चलाने वाले अन्ना हजारे को यह बात ठीक लग सकती है कि सरकार से नाराज या असहमत लोग सरकार को चला रहे लोगों पर हमले करें, लेकिन इस देश की हमारी समझ यह कहती है कि यहां की जनता हिंसक नहीं है और वह अभी भी उकसावे और भड़कावे के दौर में कभी चूक कर देने के अलावा लगभग हमेशा ही शांत रहती है। और कम से कम अन्ना हजारे जैसे महत्वोन्मादी, आत्मकेन्द्रित, तानाशाह और सिद्धांतों को लेकर पूरी तरह बेईमान के भड़कावे में वह बहुत लंबे समय तक नहीं रह सकती थी। इतिहास, और पिछले एक बरस का इतिहास इस बात का गवाह है कि अन्ना हजारे के सारे हमले सिर्फ केन्द्र सरकार और कांग्रेस पार्टी तक सीमित रहे। अपने ही साथी जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में कर्नाटक के भाजपा मुख्यमंत्री को हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार से जब जोड़ा गया तब भी अन्ना हजारे का मुंह एक बार भी भाजपा के किसी राज के किसी भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं खुला। इतना ही नहीं देश में दूसरी जगहों पर दूसरी पार्टियों के राज में होती बेईमानी पर भी उन्होंने अपना मुंह बंद रखा। और जिस अंदाज में छोटे बच्चों ने जनमोर्चा के दिनों में गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है, के नारे लगाए थे, उसी अंदाज में अन्ना हजारे लोकपाल विधेयक को लेकर लगातार राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर हमले करते रहे। देश ने यह साफ-साफ देखा कि सोनिया गांधी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे की बातों को जिस तरह हफ्तों तक घंटों-घंटों सुना, और उसके बाद हर बार अन्ना की टोली बैठक से निकलकर सरकार को गालियां बकती रही, वह भी लोगों को, हमारे हिसाब से, निराश करने वाली बात थी। अन्ना हजारे ने इस विशाल देश की विविधता को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए अपने आंदोलन को, और उसके पहले की भी अपनी पूरी सोच को, पूरी तरह हिन्दूवादी रखा जिसमें कि अल्पसंख्यकों की, दलितों और आदिवासियों की, महिलाओं की कोई जगह नहीं थी। वे बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे घोषित रूप से हिन्दू विचारधारा के ही लिए काम करने वाले लोगों के साथ भागीदारी करते हुए देश भर के नेता बनने में लगे रहे।
 
अन्ना हजारे आज तक एक घोषणा को किए चल रहे हैं कि आने वाले चुनावों में वे कांग्रेस पार्टी के खिलाफ प्रचार करेंगे। यह उनका लोकतांत्रिक हक है कि वे क्या करेंगे, वे और उनकी टोली के लोग पिछले महीनों में ऐसा कर भी चुके हैं। और ऐसी चुनावी राजनीति में भागीदार होकर, कांग्रेस के खिलाफ एक साजिश चलाकर अन्ना हजारे ने जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी। जिनको राजनीति करना है उन्हें खुलकर राजनीति में आना चाहिए और भाड़े के भोंपुओं की तरह, गांधी टोपी की आड़ लेकर ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए। अन्ना हजारे के दो बड़े साथियों, किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल ने अपने निजी चाल-चलन में जिस तरह की बेईमानी की है, उसने भी लोगों की हमदर्दी को इस आंदोलन से दूर किया। किरण बेदी पूरी बेईमान और जालसाजी से अपने कार्यक्रमों में आने-जाने के लिए अधिक भाड़ा वसूलती रहीं और केजरीवाल सरकार को बकाया चुकाने से बचते रहे, और आखिरी में उन्होंने शहादत के अंदाज में वह काम किया जो कि किसी भी ईमानदार को बिना कानूनी घेरे के बरसों पहले खुद होकर करना चाहिए था।
 
हम इसे अन्ना का स्थायी अंत नहीं मानते, लेकिन यह आज की तारीख में उनके करिश्मे का फिलहाल अंत दिख रहा है। बहुत से लोग राख के ढेर से दोबारा उठकर खड़े होते हैं, और कल के दिन अन्ना हजारे भी भीड़ के बादशाह बन जाएं तो हम वैसी अविश्वसनीय लगती संभावना से इंकार नहीं करते। लेकिन आज इस अन्नातंत्री आंदोलन का यह हाल होना इस देश के लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात है और भावनात्मक उकसावे से बाहर आकर अब लोग यह सीखने की कोशिश करें कि किसी जननायक को क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

हुसैन को याद रखने की जरूरत


26 दिसंबर 2011
आजकल
हुसैन को याद रखने की जरूरत

पुराने कानूनों और नई टेक्नालॉजी ने दुनिया के साथ-साथ भारत के लिए कई किस्म की नई चुनौतियों खड़ी कर दी हैं। अमरीका जैसे कुछ देश जिन्होंने टेक्नालॉजी बदलने की रफ्तार से ही कानून भी बदल लिए, वे भी आज इन कानूनों के कई पहलुओं से रोज जूझ रहे हैं। इंटरनेट ने लोगों की जिंदगी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहुत से ऐसे नए पहलू जोड़े हैं जिनके बारे में कुछ बरस पहले तक मीडिया का एकाधिकार सा बने रहने की वजह से कभी सोचने की नौबत नहीं आई थी। अब बहुत मामूली से खर्च के साथ कोई भी व्यक्ति इंटरनेट पर जाकर वहां अपने मन की बहुत किस्म की बातें लिख सकते हैं, दूसरे लोगों को महान या घटिया बता सकते हैं। इस नई आजादी ने कल तक अखबारों के संपादक नाम की एक सेंसरशिप को खत्म कर दिया है और अब लोग सीधे-सीधे दूसरे लोगों तक पहुंच जाते हैं, पल भर में, सभी सरहदों को चीरकर।

भारत सरकार ने एक ताजा नोटिस इंटरनेट की बहुत सी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों को देकर कहा है कि वे वहां से आपत्तिजनक सामग्री हटाएं। दूसरी तरफ दिल्ली की एक अदालत ने अभी दो दिन पहले ही ऐसा ही एक नोटिस इन वेबसाइटों को दिया है जो मोटे तौर पर पश्चिमी दुनिया से चलती हैं, और समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग देशों के प्रतिबंध झेलने की आदी हैं। फेसबुक, ट्विटर और इसी किस्म की दूसरी बहुत सी वेबसाइटें लोगों के बीच बातचीत, विचार-विमर्श और गाली-गलौज का रिश्ता मुहैया कराती हैं। पिछले एक बरस में भारत की सरकार को अपने भ्रष्टाचार के खिलाफ जितने किस्म के आंदोलन झेलने पड़े उनमें जनमत को तैयार करने और बात को फैलाने में इन वेबसाइटों ने खासी मदद की। नतीजा यह है कि सरकार इन पर लोगों की लिखी बातों से नाखुश है। लेकिन बात महज इतनी नहीं है। बिना किसी रोक-टोक के जब लोगों को अपनी किसी भी तरह की दिल-दिमाग की हालत के चलते लिखने और नेट पर डाल देने की सहूलियत है, और जब तक कोई कानूनी जांच न हो तब तक लोगों को एक यह छूट भी मिली हुई है कि वे बेनामी, गुमनामी के साथ, किसी नकली नाम से भी यह काम कर सकते हैं, तो नतीजा यह कि लोग किसी की वल्दियत पर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो किसी की मां के चाल-चलन की बात कर रहे हैं।

हमारा अपना अनुभव यह रहा है कि यह बेकाबू आजादी जितना भला कर रही है उतना ही एक ऐसा बुरा भी कर रही है जिसके खिलाफ किसी किस्म की कानूनी कार्रवाई इस टेक्नालॉजी के बेसरहद होने से मुमकिन भी नहीं है। भारत की सरकार अगर किसी वेबसाइट को रोक भी देगी, तो दुनिया के बहुत से देशों ने ऐसा करके देख लिया है, उससे कुछ नहीं थमता। तो ऐसे में इस मर्ज का इलाज क्या है?

दरअसल इंटरनेट लोगों को बिना अपनी शिनाख्त उजागर किए लिखने की एक ऐसी छूट देता है जो कि अब तक किसी ऐसे सार्वजनिक शौचालय के दरवाजे के भीतर की तरफ ही हासिल होती थी। उसमें भी पहले और बाद में उसी शौचालय में जाने वाले लोग तो यह अंदाज लगा ही सकते थे कि यह किसने लिखा होगा, लेकिन इंटरनेट पर जहां भारत के ही करोड़ों लोग हैं, और जहां बेचेहरा बने रहने की पूरी सहूलियत हासिल है वहां पर पखाने की इस दरवाजे के भीतर लिखने वाले का अंदाज भी लगाना मुमकिन नहीं है। कहने को तो यह भी है कि कम्प्यूटर, इंटरनेट और फोन पर भेजा गया एक शब्द भी इतनी जानकारियों के साथ दर्ज होता है कि उसे तलाश कर अदालत में साबित किया जा सकता है। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन के बिना ओर-छोर के अंतहीन फैले हुए बरगद के पेड़ पर टहलती हुई लाखों चीटियों में से किसी एक चींटी को कैसे तो कोई तलाशेगा और फिर कैसे उसके पदचिन्ह अदालत में साबित करेगा? कैसे कोई समंदर में रेत के एक कण को पहचानकर उसे कानून के कटघरे तक ले जाएगा? यह काम डॉन को पकडऩे से भी मुश्किल है।
दूसरी बात यह कि अभिव्यक्ति की जिस स्वतंत्रता को लेकर कानून अपने आपमें अभी कमजोर है, एक-एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट तक बहस गई हुई है, ऐसे में करोड़ों लोगों की रोजाना की अभिव्यक्ति को पुलिस या कोई दूसरी जांच एजेंसी कब तक पकड़ते रहेगी और अदालतों में लगी हुई मामलों की कतारों में ऐसे मामलों को कब जगह मिलेगी? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे लोगों के अपने सम्मान, अपने निजी जीवन के हक, एक की धार्मिक भावनाएं और दूसरे की धार्मिक भावनाएं, एक के नैतिक मूल्य और दूसरे के नैतिक मूल्य, इन सबमें इतने किस्म की विविधता है, टकराव है कि कोई भी दूसरे की कही हुई बात को अपना अपमान मान सकते हैं, और अपने हक का दावा कर सकते हैं। दूसरी तरफ जो कहने वाले लोग हैं, लिखने और इंटरनेट पर डालने वाले लोग हैं उनके अपने ये तर्क हो सकते हैं कि अभिव्यक्ति की यह उनकी अपनी स्वतंत्रता है।

कहने के लिए भारत का मौजूदा, और नया-नया, सूचना तकनीक कानून इतना कड़ा है कि वह लोगों को छपी हुई बातों के मुकाबले, इंटरनेट पर डाली गई बातों के लिए अधिक आसानी से अधिक कड़ी सजा दिला सकता है। लेकिन सवाल यह है कि पहले से बोझ तले टूटी कमर वाली जांच एजेंसियों और अदालतों के पास ऐसे नए मामलों के लिए वक्त कहां से निकलेगा? कहने के लिए सरकार के पास पानी की जांच करने के लिए सहूलियत है, लेकिन अगर देश भर के हर नदी-तालाब के पानी की जांच हर हफ्ते करवाई जाए तो क्या इन प्रयोगशालाओं से कोई नतीजे निकल सकेंगे? इसलिए हम इस मौजूदा हाल को किसी आसान इलाज के लायक नहीं समझते। हम यहां पर अपनी तरफ से कोई बात इसलिए सुझाना नहीं चाहते क्योंकि दुनिया के लोगों की अभिव्यक्ति की जरूरतें अलग-अलग हैं। हमें तो आए दिन, या रोज-रोज लिखने का मौका मिल जाता है, जिन लोगों को तकलीफ हमसे ज्यादा है और कहने को जगह कहीं नहीं हैं, वे लोग अपनी भड़ास को, अपनी शिकायत या तकलीफ को अगर इंटरनेट पर नहीं निकालेंगे तो वह भड़ास उनके मन के भीतर इक_ा हो-होकर किसी अलग किस्म का धमाका करेगी।

यहां पर लगे हाथों हम भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक और पहलू पर भी बात करना चाहेंगे। यहां सेंसर हो चुकी फिल्में के पर्दे पर पहुंचने के पहले ही उनके खिलाफ अदालतों में मामले दर्ज होने लगते हैं, किसी की तस्वीर को लेकर मामला चलने लगता है तो किसी गाने को हटाने की मांग होने लगती है। धर्मों को लेकर सामाजिक तनाव इतना है कि खुलकर उस बारे में बात नहीं हो सकती और एक बहुत ही सतही जुर्म की तरह, एक थाने के स्तर पर ही किसी के लिखे के खिलाफ, किसी के कहे के खिलाफ यह जुर्म दर्ज हो जाता है कि उसने किसी और की धार्मिक भावनाओं को आहत पहुंचाई है। हजारों ईश्वरों वाले भारत जैसे देश में किसी एक के धार्मिक अधिकार भी किसी दूसरे की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले हो सकते हैं। एक धर्म पूरी तरह अहिंसा पर चलता है और उसके लोग यह दावा कर सकते हैं कि दूसरे धर्म के लोग जब बलि या कुर्बानी देते हैं, तो अहिंसा की उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुंचती है। किसी धर्म या आध्यात्म के तहत महिलाओं से भेदभाव की व्यवस्था हो सकती है, और कोई दूसरा धर्म यह कह सकता है कि उनके देश में ऐसा भेदभाव उनकी धार्मिक भावना को आहत करता है। आज योरप के कई देशों में यह हो भी रहा है। मुस्लिम महिलाओं के बुर्के के खिलाफ फ्रांस और कुछ दूसरी जगहों पर जिस तरह के कानून बन रहे हैं उन्हें मुस्लिम अपने धार्मिक अधिकारों के खिलाफ मान रहे हैं और दूसरे लोग उसे अपने देश की संस्कृति के खिलाफ मान रहे हैं। तो ऐसे टकराव इंटरनेट के बिना भी चलते हैं जहां पर कि लोगों के चेहरे हैं, उनकी शिनाख्त है।

भारत के मौजूदा हाल में हमें कुछ बहुत ही खतरनाक किस्म की साम्प्रदायिक या आतंकी बातों के अलावा, इंटरनेट पर अधिक रोक-थाम की गुंजाइश इसलिए नहीं दिखती क्योंकि इस बात पर मतभेद बने रहेगा कि क्या आपत्तिजनक है, और क्या नहीं। लेकिन अभी भारत की सरकार ने और एक अदालत ने यह बात इंटरनेट कंपनियों से कही है, और अब करोड़ों लोग उत्सुकता से यह देख रहे हैं कि आपत्तिजनक और अभिव्यक्ति की कौन सी परिभाषाएं लागू होती हैं। दुनिया का अब तक का अनुभव तो यह रहा है कि कुछ बहुत हिंसक, बहुत आतंकी और बच्चों के सेक्स-शोषण जैसे जाहिर तौर पर पहचाने जा सकने जुर्म तो एजेंसियों के घेरे में आ जाते हैं लेकिन छोटी-मोटी गाली-गलौज और छोटा-मोटा चरित्र हनन रोकने के लायक माना नहीं जाता। लायक न मानने के यहां पर हमारे दो मतलब हैं, एक तो यह कि उन्हें इतनी अहमियत नहीं दी जाती कि उसे रोकने की कोशिश हो, दूसरी बात यह कि उसे रोकना कानूनी-तकनीकी रूप से मुमकिन ही न हो।

भारत में जो लोग आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजा लेना चाह रहे हैं, ले रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि हजार बरस पहले हिन्दुओं की बनाई नग्न प्रतिमाओं की तरह की कुछ पेंटिंग्स बनाने की वजह से मकबूल फिदा हुसैन को इस किस्म के इतने कानूनी मुकदमे झेलने पड़े कि बची जिंदगी सैकड़ों अदालतों में फेरे लगाने के बजाय उन्होंने इस देश को ही छोड़ देना बेहतर समझा। उन्हें तो दुनिया के कई देशों में जगह मिल गई, लेकिन बाकी लोगों की कही छोटी-छोटी बातों पर भी अगर उन्हें अदालतों में इस तरह खड़ा कर दिया जाएगा तो वे कैसे जिंदा रह पाएंगे? और यह काम बहुत मुश्किल भी नहीं है। अपनी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचने के तर्क के साथ ही लोग अगर देश भर की हर जिला अदालत में किसी एक के खिलाफ मामले दर्ज करेंगे तो अब कोई कितने जिलों में हर पेशी पर जा पाएगा? हम किसी भी नए कानून के बनाए जाने के पहले मौजूदा कानूनों पर अमल की नाकामयाबी पर सोच-विचार बेहतर समझते हैं। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें आज के कानून का इस्तेमाल न कर पाने वाले नालायक लोग नए कानूनों को बनाने की बात करते हैं ताकि उनकी आज की कमजोरियां, आज के कानून की कमजोरियां साबित की जा सकें।

इंटरनेट पर लोगों की लिखने की आजादी अब एक ऐसी हकीकत है जो वापिस नहीं जा सकती। एक संभावना ने जन्म जब ले लिया, तो फिर उसे मां के पेट में डाला नहीं जा सकता। अब वह कितनी अच्छी है और कितनी बुरी, उसके साथ किस तरह का बर्ताव किया जाए और कैसे निपटा जाए, यही बात हो सकती है और सच तो यह है कि आज इंटरनेट बिना किसी मां-बाप के, बिना किसी पालने वाले के, अपने आप पलने वाला माध्यम बन चुका है और उस पर नामुमकिन रोक-टोक की कोशिश भारत की आज की सरकार को ऐसा बताती है मानो उसके पास लुकाने-छुपाने को बहुत कुछ है।

हमारा यह मानना है कि इंटरनेट पर हमले उन्हीं लोगों पर होते हैं जो जिंदगी में कुछ बने हुए हैं। ऐसे लोग वहां पर झूठ का पर्दाफाश कर सकते हैं बजाय अदालतों के। लेकिन कुछ मामलों में अगर बदनीयत हमलावर कानून तोड़ते हुए कुछ लिखते हैं, तो वे अपनी मुसीबत का सामान खड़ा कर रहे हैं। अधिकार और जिम्मेदारी को मिला-जुलाकर ही देखा जा सकता है और ऐसा कुछ भी करते हुए हुसैन को याद रखना चाहिए।

लोकपाल और अब उसके बाद


28 दिसंबर 2011
संपादकीय
लोकपाल और अब उसके बाद

लोकसभा में लोकपाल विधेयक जिस मामूली फेरबदल के साथ कल बहुमत से मंजूर हो गया वह एक किस्म से सरकारी की कामयाबी रही और दूसरे किस्म से वह इस मायने में भाजपा की अगुवाई वाले विपक्षी खेमे के लिए नाकामयाबी रही कि इस लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की यूपीए की पहल को विपक्ष ने खारिज कर दिया। एक तरफ यूपीए सरकार चार दशकों से चली आ रही लोकपाल चर्चा को एक किनारे तक पहुंचाने वाली दर्ज हो गई और दूसरी ओर यह भी दर्ज हो गया कि इन दशकों में चार बार गैरकांगे्रसी सरकार भी केंद्र पर काबिज रहीं लेकिन उस वक्त लोकपाल नहीं बन पाया। कल का दिन यूपीए के नाम इसलिए लिखा जाना है क्योंकि उसके खिलाफ एक राजनीतिक अभियान छेडऩे वाले अन्ना हजारे कल अपनी बीमार हालत के बावजूद अनशन में देश में अकेले से पड़ गए और मुंबई-दिल्ली में अनशन की मौजूदगी जनता के बदले हुए तेवर का एक संकेत भी है। कल का दिन यूपीए, और खासकर कांगे्रस के लिए राहत का रहा होगा क्योंकि कोई आधे-पौन बरस में शायद यह पहला मौका रहा जब यूपीए अपने किसी काम में इस तरह कामयाब हुई।

कल लोकसभा की कार्रवाई में जब लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने वाली बात को भाजपा की सुषमा स्वराज के संशोधन के साथ खारिज किया गया तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पल भर में इसे राहुल गांधी की शिकस्त के रूप में दर्ज किया और कुछ इस तरह की हवा बांधने की एक कोशिश हुई कि यह बहुत बुरी हार है। एक तरफ तो कांगे्रस को इस बात के लिए गुनहगार ठहराया जा रहा था कि वह मजबूत लोकपाल बनाना नहीं चाहती। दूसरी तरफ जब लोकपाल को, चुनाव आयोग की तरह, एक संवैधानिक दर्जा देने की बात हुई तो सबसे मुखर चल रहे भाजपाई और वामपंथी पीछे हट गए। इसमें कांगे्रस की भला क्या हार हुई, जिसके बारे में यह भी कहा जाता रहा है कि वह एक मजबूत या असरदार लोकपाल लाना ही नहीं चाहती। या तो उसकी यह नीयत कामयाब हो गई, या फिर मजबूती की मांग करता विपक्ष नाकामयाब हो गया। एक ही तस्वीर के आगे-पीछे के दो पहलू एक साथ चस्पा करके कांगे्रस की कमजोरी का सुबूत नहीं बताए जा सकते। हमारा बहुत साफ मानना है कि लोकपाल को अगर संवैधानिक दर्जा दिया जाता तो शायद वह अधिक ताकतवर, अधिक आजाद होता लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि इसके लिए कांगे्रस के पास लोकसभा में वोट कम थे और भाजपा सहित कुछ और विपक्षी दलों ने वोटों की अपनी ताकत से इस राय को खारिज कर दिया। यह तो ठीक है कि गिनती को जुटाना विधेयक लाने वाली सरकार का काम होता है, भाजपा ने यही तर्क दिया है, लेकिन विपक्ष के इस तर्क के साथ-साथ उसके नाम के साथ अब यह भी चस्पा हो गया है कि उसने लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का विरोध किया।

हम अभी तुरंत ही लोकपाल के मौजूदा ढांचे पर बात करना जरूरी इसलिए नहीं समझते क्योंकि अभी इसकी तकनीकी बारीकियां सामने आएंगी, विधेयक के पारित होने के बाद संशोधनों सहित एक नया मसौदा सामने आएगा और उसका अधिक जानकार लोग विश्लेषण करेंगे। फिर अभी राज्यसभा से इस विधेयक को गुजरना है और वहां पर हमारा ऐसा ख्याल है कि कांगे्रस के सामने इसके पक्ष में बहुमत जुटाना बड़ी चुनौती न रहकर, यह भाजपा के सामने बड़ी चुनौती रहेगी कि वह इसका समर्थन करे या इसका विरोध करे। इसका विरोध करने के बाद भाजपा जनता के बीच क्या जवाब दे सकेगी यह सोचना हमारे लिए कुछ मुश्किल है। इसलिए आज राज्यसभा से अगर यह विधेयक पास होकर कानून बन जाता है तो उसके बाद ही उन बारीकियों पर हमारा राय देना ठीक होगा जिनके बारे में अंगे्रजी जुबान में यह कहा जाता रहा है कि डेविल इज इन द डिटेल्स... (गड़बड़ी तो खुलासे में होती है)। लेकिन आज हम लिखना यह चाहते हैं कि पिछले कई महीनों से यूपीए सरकार जिस बात के लिए बाबा-अन्ना-श्रीश्री जैसे लोग कोसे चले जा रहे थे, और इन तीनों की राजनीतिक डिजाइनों से फायदा पाने वाली भाजपा बहुत खुश चल रही थी, आज उसके हाथ से लोकपाल का मुद्दा छिन गया और अब उसे उत्तरप्रदेश चुनाव के लिए भी एक नया मुद्दा ढूंढना होगा। दूसरी बात यह रही कि दिल्ली की मीडिया के बहुत से विश्लेषकों ने पिछले कुछ दिनों में यह बात लिखी, और कल भी संसद की कार्रवाई के बाद चल रहे विश्लेषण में यह बात कही कि लोकपाल के मुद्दे पर भाजपा का सरकारी रूख का अंधा विरोध करना कुछ ऐसा आभास पैदा करता है कि मानो अब भाजपा को दुबारा सत्ता में आने की फिक्र नहीं है। वह अन्ना-बाबा की फरमाईश पर इतने किस्म की अव्यवहारिक बातों को मानते और बढ़ावा देते हुए यहां तक पहुंच गई है कि सरकार चलाने की नौबत आने पर उसे खासी दिक्कत हो सकती है। और यह बात हम ऐसी किसी दिक्कत को ध्यान में रखकर नहीं छेड़ रहे। सुधार का कोई भी कानून किसी भी सरकार के लिए परेशानी खड़ी करता ही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि मौजूदा सरकार की परेशानी बढ़ाने के लिए सत्ता का अनुभवी विपक्ष कई ऐसी फरमाईशों को मानने को तैयार हो जाए जो कि लोकपाल को एक दानव सा ताकतवर बनाकर रख दे जो कि लोकतंत्र के बाकी पायों पर भारी पडऩे लगे। एक तरफ तो भाजपा और वामपंथी कुछ इस तरह की मांग करते हुए अन्ना के मंच पर चले गए, और दूसरी तरफ भाजपा के राज्य उत्तराखंड के लोकायुक्त विधेयक की कमजोरियां कल संसद में कांगे्रस ने उजागर कीं। कांगे्रस ने जब उत्तराखंड का लोकायुक्त कानून पढ़कर बताया तो भाजपा भी चुप रह गई क्योंकि उसमें मुख्यमंत्री के खिलाफ तभी कुछ हो सकता है जब उस पर सौ फीसदी सहमति हो। इसके अलावा भी बहुत सी बातें सत्ता की बेईमानी को बचाने के हिसाब से रखी गई हैं।

कुल मिलाकर हम यही कहेंगे कि भाजपा और वामपंथियों ने इस मोर्चे पर साझेदारी से जो कुछ किया उसका कोई फायदा उन्हें नहीं मिल पाएगा बल्कि उनके कहने और करने का फर्क स्थापित हो गया। दूसरी तरफ लोकपाल में आगे चलकर जितने किस्म के संशोधनों की जरूरत पड़ेगी वे होते चलेंगे जैसा कि इसके पहले के भी कई कानूनों में होते आया है। आज देश को जंतर-मंतर और रामलीला से खड़े किए गए इस हव्वे से उबरने की जरूरत है कि यह देश भ्रष्टाचार में डूब चुका है। ऐसी निराशा और ऐसी भड़ास के साथ कोई काम नहीं चलता। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई बहुत से मोर्चो पर बहुत किस्म से जारी रहनी चाहिए और उसके लिए देश के मौजूदा कानून और नए बनने जा रहे लोकपाल का पूरा इस्तेमाल लोगों को करना चाहिए, बजाय भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर एक तानाशाही को, एक अराजकता को स्थापित करने के।

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पार्टी व्हिप में बंधे सांसद और संविधान सभा वाला इतिहास


27 दिसंबर 2011
विशेष संपादकीय
पार्टी व्हिप में बंधे सांसद और संविधान सभा वाला इतिहास

भारतीय संसद में अगले कुछ दिनों में लोकपाल और कुछ दूसरे मुद्दों पर जो बात होनी है, उसे लेकर आज चाहे कोई पार्टी यह कहे कि वह अपने पत्ते संसद में खोलेगी, संसद की यह आने वाली बहस कितनी अहमियत की होगी इसे लेकर एक बड़ा शक पैदा होता है। सत्ता और विपक्ष ये दो खेमे अपनी-अपनी गिनती की ताकत का इस्तेमाल करते हुए वहां पर अपने सांसदों के लिए फतवे जारी करेंगे ताकि वोटों की, आम हो चली, खरीद-फरोख्त न हो और पार्टियों की नीतियों के मुताबिक वोट डलें। न सिर्फ वोट बल्कि वोट से पहले की बहस भी पार्टी की नीतियों के आधार पर ही सांसद वहां पर करते हैं और भारत के संसदीय लोकतंत्र में मतदाता का चुनाव कुछ हद तक नाकामयाब हो जाता है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि लोग पार्टी के निशान पर एक प्रत्याशी को वोट देते हैं। यह वोट पार्टी को दिया हुआ भी होता है, और प्रत्याशी को दिया हुआ भी। संसद या विधानसभाओं में जब पार्टी व्हिप जारी होता है और लोग पार्टी के कहे मुताबिक किसी मुद्दे पर किसी एक तरफ वोट डालते हैं तो मतदाताओं का प्रत्याशी का चुनाव वहां बेमायने हो जाता है और सिर्फ पार्टी का फैसला मतदान में वोट डालता है।
 
दलबदल के अपने अलग नुकसान थे और एक वक्त हरियाणा जैसे राज्य में जब आयाराम-गयाराम की भाषा राजनीति में शुरू हुई तो दलबदल कानून बनाने की जरूरत भी लोगों को लगी। लेकिन जैसा कि हर कानून के साथ होता है, इस नए कानून के तहत पार्टी व्हिप के मुताबिक वोट डालते हुए सांसद अपने दिल और दिमाग, अपने मतदाताओं से अगर कोई सलाह-मशविरा किया हो तो, ऐसी किसी बात का ख्याल नहीं रख पाते। नतीजा यह होता है कि एक बार चुनाव हो जाने के बाद पांच बरस तक जनता की राय पूरी तरह से पार्टी के कब्जे में चली जाती है और अलग-अलग सांसदों की संभावित अलग-अलग सोच की गुंजाइश खत्म हो जाती है। संसद के भीतर होने वाली बहस में शब्दों और छोटी-मोटी बातों के फर्क को छोड़ दें तो मोटे तौर पर पहले से यह अंदाज रहता है कि कौन से सांसद क्या कहेंगे। अपनी-अपनी पार्टी की घोषित नीति, या छुपाकर रखे गए पत्तों के तहत वे चाल चलते हैं और यह बाजी पहले से अंदाज लगा लेने के लायक ही रहती है। अब सवाल यह उठता है कि इस देश की संसद में बैठे हुए लोगों की अपनी-अपनी सोच क्या उनकी पार्टी की नीति से परे, कम से कम बहस के लिए सामने नहीं आनी चाहिए? जिन लोगों ने भारत के संविधान को बनाने के लिए बनी संविधान सभा की कार्रवाई पढ़ी है वे जानते हैं कि पार्टियों की खेमेबाजी से परे कितने तरह की बातें वहां पर होती थीं और घोर ब्राम्हणवादियों से लेकर डॉ. भीमराव अंबेडकर पर, इस्लामी कट्टरपंथी सोच के लोगों से लेकर नेहरू जैसे उदार विचारों वाले नेताओं तक, कितने ही लोगों ने वहां पर खुलकर बातें नहीं की थीं? उसी का नतीजा था कि संविधान सभा की वह बहस आज भी पढऩे लायक है और आज अगर संसद की बहस को कोई सुने तो बोलने के अंदाज और लालू-लतीफों से परे कोई फलसफा वहां ऐसा सुनने नहीं मिलता जो कि पार्टी के प्रवक्ता संसद से बाहर बोल न चुके हों।
 
अभी पिछले हफ्ते ही संसद में किसी एक सदस्य ने बहस के दौरान ही यह कहा था कि लोकपाल पर पार्टियां व्हिप जारी करने के बजाय सदस्यों को अपनी अंतरात्मा की आवाज से वोट देने को देकर तो देखे, तो पता चल जाएगा कि लोकपाल को कोई नहीं चाहता। यह बात इस हिसाब से भी सही है कि जिस संसद में एक से अधिक बार कई लोग अपनी आत्मा और अपनी आवाज को कोठे पर बेचने के अंदाज में बेचते हुए रंगे हाथों पकड़ाए हुए हैं, संसद से निकाले जा चुके हैं, जेल जा चुके हैं, और संसद के विशेषाधिकार के चलते अपराध साबित हो जाने के बाद भी बचे हुए हैं, उस संसद में किसकी अंतरात्मा की आवाज पर कितना दाम चस्पा होगा इसका अंदाज कैसे लगेगा? तो इस संसद और इसके सांसदों का हाल यह है कि अगर व्हिप जारी न हो तो कांगे्रस जैसी पार्टी जितनी जरूरत हो उतनी अंतरात्माएं खरीद लेंगी, और अगर व्हिप जारी होगा तो वहां सिर्फ पार्टियों की आवाज गूंजेगी। इनके बीच का कौन सा रास्ता आसान हो सकता है यह हम नहीं जानते। लेकिन आज इस मुद्दे को छेडऩे का हमारा मकसद यह है कि संसद के बाहर जितने किस्म की बकवास लोकपाल और भ्रष्टाचार को लेकर चल रही है उससे परे इस संसद को एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी के तहत खुलकर बहस करनी चाहिए, खुलकर विचार करना चाहिए, और अगर इस संसद के, इस सरकार के अनचाहे ही एक लोकपाल बनाना अब बेबसी हो गई है तो उस लोकपाल पर बात उसी तरह होनी चाहिए जिस तरह इस संसद के पुरखे के रूप में संविधान सभा ने एक वक्त बात की थी। पार्टियों की अपनी-अपनी नीतियों और रणनीतियों का दौर लोकपाल और उससे जुड़ी बहसों के शुरू होने तक खत्म हो जाना चाहिए और उसके बाद लोकतांत्रिक ढांचे की संभावनाओं और सीमाओं के भीतर खूबियों और खामियों की चर्चा खुलकर होनी चाहिए। हम इस विधेयक को लेकर संसद के बाहर चल रही किसी टोपीधारी बदनीयत हड़बड़ी और जिद्द की बात भी संसद के ध्यान में लाने की बात नहीं करते। संसद को अपने-आपको इस बहस के शुरू होने के बाद बाहर की दुनिया से अब तक पाए गए असर को काफी मानते हुए आगे की चर्चा इस विधेयक पर करनी चाहिए वरना यह संसद संसदीय जिम्मेदारी के बजाय चुनावी-राजनीतिक मतलबपरस्ती का अखाड़ा बन जाएगी।
 
बहुत से ऐसे मौके होते हैं जब लोग या पार्टियां अपनी जीत के बजाय देश की जीत को अधिक महत्व दे सकते हैं। खेल में कई बार यह कहा जाता है कि कुछ महान खिलाड़ी अपने रिकॉर्ड की परवाह किए बिना अपनी टीम के भले के हिसाब से खेलते हैं। कुछ उसी किस्म की जरूरत हमें आज संसद में लग रही है कि इस विधेयक के पास होने या न होने से परे, अधिक महत्वपूर्ण यह है कि लोग देश के सामने एक खरी लोकतांत्रिक बहस रखें, क्योंकि देश की जनता संसद के पक्ष और विपक्ष में से किसी को ईमानदार या बेईमान जैसा दर्जा नहीं देती और देश का माहौल यह है कि संसद का एक बड़ा हिस्सा बेईमान है। इस बात को हम चाहे जनधारणा से अधिक वजनदार न भी मानें, संसद के लिए यह जरूरी है कि वह एक खोई हुई इज्जत को दुबारा पाने की कोशिश करे, और अब भी अगर उसके भीतर बैठे सांसदों, उनकी पार्टियों के मन में देश की भलाई है, तो उन्हें राजनीतिक नफे-नुकसान से परे लोकपाल बिल या भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए दूसरे मुद्दों पर संसद में बात करनी चाहिए। इस मौके पर जो लोग ओछी राजनीति करेंगे, या जो पार्टियां देश के बजाय अपनी राजनीति को अधिक महत्व देंगी वे भी रोजाना अपनी गैरजिम्मेदारी उजागर करती रहेंगी। 
देश अब संसद के भीतर कही जाने वाली बातों की राह देख रहा है।