अंडमान के आदिवासियों के लिए ब्रिटिश संसद से निकली फिक्र


संपादकीय
7 फरवरी
भारत में आदिवासियों के बहुत पुराने समुदाय वाले अंडमान द्वीप समूह को लेकर ब्रिटिश संसद में एक प्रस्ताव पेश हुआ है। इसमें भारत सरकार से मांग की गई है कि वह अंडमान को इंसानी नुमाइश वाले पर्यटन केंद्र बनने से रोके। दरअसल पिछले कुछ हफ्तों में ब्रिटिश मीडिया से ऐसी वीडियो रिकॉर्डिंग दुनिया भर के सामने आई जिसमें अद्र्धनग्न जीने वाले इन आदिवासियों को सैलानियों के सामने नाचते-गाते पेश किया जाता है और मजदूरों जैसी मजदूरी देकर उनकी नग्न तस्वीरें उतारी जाती हैं। ब्रिटिश संसद अब भारत से यह मांग करने जा रही है कि भारत की सरकार भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश को लागू करे और इन आदिवासियों के इलाकों के बीच से निकलने वाली एक सड़क को रोके। 
इस तरह की बातों को लेकर एक दूसरा देश भारत की सरकार को अपने आदिवासियों के प्रति संवेदनशील होने की नसीहत दे, यह अपने-आपमें बहुत ही शर्म की बात है। और यहां पर हम इस नसीहत को इस बात से जोडऩा नहीं चाहते कि पश्चिमी देश खुद भी दुनिया भर के मूल निवासियों के साथ तरह-तरह की ज्यादतियां करते हैं, पूरी दुनिया के कमजोर तबकों के मानवाधिकार कुचलते हैं, देशों पर हमले करते हैं और लोकतंत्र थोपने के नाम पर सत्ता-पलट करवाकर अपनी कठपुतलियां बिठाते हैं। इस किस्म के तर्क-वितर्क और आरोप-जवाबी आरोप, किसी किनारे नहीं पहुंचाएंगे, इसलिए हम किसी और के दिखाए आइने को देखकर अपने को दुरूस्त करना बेहतर समझेंगे। 
पाठकों को याद होगा कि हॉलीवुड की एक फिल्म अवतार ने बहुत सीधे-सीधे तरीके से एक दूसरे ग्रह के मूल निवासियों पर धरती के कारोबारियों के फौजी हमले की कहानी बताई थी। आज भारत में जगह-जगह कई किस्म से बेजुबान आदिवासियों के हकों पर हमले होते हैं, और इनमें से एक बड़ा हमला उनकी संस्कृति पर हो रहा है जिसे कि पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर किया जा रहा है। नेता और अफसर, पर्यटन कंपनियां चलाने वाले कारोबारी और उनके ग्राहक कैमराधारी पर्यटक, इनके बीच शायद ही आदिवासी संस्कृति के नाजुक पहलुओं की कोई समझ रहती है। इनके परंपरागत कपड़ों और हुलिए, गहनों और साज-सज्जा, नृत्य और संगीत, घर और दीवारों की अच्छी तस्वीरें खींची जा सकती हैं इसलिए यहां तक देशी-विदेशी पर्यटकों को उसी अंदाज में लाया जाता है जिस अंदाज में कान्हा में हाथी और जिप्सी पर चढ़ाकर पर्यटकों को शेर दिखाया जाता है। कई बरस पहले छत्तीसगढ़ में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए देश भर से नामी-गिरामी लोगों को लाकर वहां तंबुओं में ठहराया गया था। यह संपादकीय लिखने वाले अखबारनवीस को भी उस वक्त इन लोगों के साथ बस्तर घूमने का मौका मिला था और वहां आंखों देखा, कानों सुना यह था कि भारत सरकार से मान्यता प्राप्त गाईड बाहरी लोगों को बता रहा था कि लोग बस्तर की आदिवासी संस्कृति को बेस्ट-कल्चर (सर्वश्रेष्ठ-संस्कृति) कहते हैं, जबकि बस्तर असल में ब्रेस्ट-संस्कृति (स्तन-संस्कृति) है। वह पर्यटकों को समझाते चल रहा था कि बस्तर में अगर किसी महिला के स्तनों को छुआ जाए तो उसका बुरा नहीं माना जाता। यह राज्य सरकार के पर्यटन विभाग के इंतजाम के तहत और भारत सरकार के लाईसेंस प्राप्त गाईड का दिया गया ब्यौरा था। इसका हमने उस वक्त भी विरोध किया था और बाद में उस गाईड पर कार्रवाई भी हुई थी।
अंडमान को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं वे भयानक हैं और वे यह भी बताती हैं कि आधुनिक लोकतंत्र की शहरों में बसी सरकारों को जंगलों में जीने वाले आदिवासियों के नाम पर भ्रष्टाचार करने में तो पूरी दिलचस्पी है, आदिवासी मुद्दों को समझने की जरा भी नहीं है। हम छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य के बारे में यह चाहेंगे कि यहां पर सरकार आदिवासी जनजीवन और संस्कृति के जानकार कुछ गैरसरकारी विद्वानों को सलाहकार बनाकर रखे और आदिवासियों के प्रति सरकारी नजरिए को इंसानियत की कसौटी पर कसने का काम करे। इसके बिना सरकारी आंकड़ों और बाजार की कमाई को बढ़ाने की नीयत से आज जो रूख आदिवासियों के साथ चल रहा है वह आने वाले बरसों में हर देश-प्रदेश में एक-एक अवतार नाम की फिल्म पैदा करते चलेगा।

पाखंडी देश के घरेलू घंटे,टीवी चैनलों के चुनिंदा रस


आजकल
6 फरवरी 12
सुनील कुमार

पाकिस्तान के एक टीवी प्रोग्राम के बारे में अभी दो हफ्ते पहले ही लिखना हुआ था जिसमें वहां समाज को सुधारने का ठेकेदार बना हुआ एक चैनल अपने कैमरे और लोगों की टीम लेकर बगीचों में पहुंचा और वहां साथ बैठे हुए लड़के-लड़कियों पर हमला सा बोल दिया और उन्हें टीवी पर दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की गई कि ये लोग समाज को तबाह करने में लगे हुए थे। 
दरअसल बाजार में जिंदा रहने के लिए टेलीविजन को जितनी किस्म की हरकतें करनी पड़ती हैं उनकी कल्पना भी किसी ने अखबारों के जमाने में नहीं की थी, जब टीवी नहीं था। लेकिन अखबारों की सहूलियत पढऩे वालों के लिए अलग होती है जहां वे पन्नों को मर्जी से पढ़ या छोड़ सकते हैं और पन्नों के भीतर भी क्या पढ़ें और क्या न पढ़ें, कब पढ़ें, बस में पढ़ें या पखाने में पढ़ें, जैसी अनगिनत सुविधा अखबार के साथ होती है, लेकिन टीवी की अपनी बेबसी यह है कि आज के सैकड़ों चैनलों में से अपने किस्म के दर्जन या आधा दर्जन चैनलों के बीच लोगों को बांधकर रखने में अगर पल भर की कमजोरी भी हुई, तो रिमोट कंट्रोल ऐसे ढीले चैनलों को पल भर में खारिज कर देता है।
यह बात सिर्फ समाचार चैनलों के बारे में हो, ऐसा भी नहीं। मनोरंजन के नाम पर चलने वाले बहुत से चैनल ऐसे हैं जिनमें रियलिटी शो के नाम पर बहुत ही हिंसक और अश्लील तरीके से, भौंड़े तरीके से, निजी जिंदगी को उधेडऩे और पेश करने की हद तक, भावनाओं को भड़काकर, नोंचकर पेश करने का काम हो रहा है। भारत में संस्कृत में जिन नौ रसों का जिक्र है उनमें से अधिकतर को बहुत बेदर्दी से इस्तेमाल करके लोगों को झंकझोरा जा रहा है। श्रृंगार, हास्य, रौद्र, करूण, वीर, अद्भुत, भय, शांत, और वीभत्स। इन नौ रसों में से चूंकि शांत में कोई सनसनी नहीं हो सकती इसलिए उसे मानो भारत के सरकारी और संसदीय चैनलों के लिए छोड़ दिया गया है। और बाकी सबको लेकर यह होड़ लगी हुई है कि कैसे लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं को टीवी के परदे के सामने उछाला जाए, छेदा जाए, कुचला जाए, निचोड़ा जाए और उसे बांध दिया जाए। 
इसके लिए अलग-अलग रस के सबसे तीखे स्वाद वाले राखी सावंत नाम के पैकेट तैयार करके लोगों की आंखों में, उनके कानों में झोंक दिए जाते हैं। एक नाम तो यहां राखी सावंत का लेना हो ही गया है, उससे परे भी बहुत से नाम ऐसे हैं जो अलग-अलग कार्यक्रमों में लाकर लोगों को एकदम पत्थर युग में ले जा रहे हैं। मनोरंजन के कार्यक्रमों पर जिंदा रहने वाले इन चैनलों को अपने मुकाबले के दूसरे चैनलों के मुकाबले अधिक हिंसक, अधिक अश्लील और अधिक फूहड़ बनकर दर्शक संख्या बढ़ाने की बेबसी भी रहती है। लतीफों का एक मजाकिया कार्यक्रम, दूसरे मजाकिया कार्यक्रमों से अधिक गंदे लतीफे पेश करके धीरे-धीरे परिवारों को इस बात के लिए तैयार कर लेता है कि दो-तीन पीढिय़ां साथ बैठकर गंदगी का एक थाली में मजा ले सकें। फिर अपनी फिल्मों के प्रचार के लिए रात-दिन टीवी में आने की जुगाड़ में लगे हुए हिंदुस्तान के सबसे बड़े फिल्मी सितारे, मनोरंजक और रियलिटी सीरियलों को इतना कड़ा मुकाबला देते चलते हैं कि टीवी को जी सिने अवार्ड में शाहरूख खान के अश्लील लतीफे का मुकाबला भी करना पड़ता है।
मुझे टीवी पर, फिल्मों में या छपे हुए पन्नों पर किसी वयस्क तस्वीर या लिखे हुए से कोई परहेज नहीं है। वयस्क का मतलब सिर्फ गंदगी हो, सेक्स का मतलब सिर्फ पोर्नोग्राफी हो, नग्न का मतलब सिर्फ अश्लील हो ऐसा भारत में ही कुछ अधिक होता है। हालांकि यह देश वात्सायन का देश है जहां बच्चों के जवान होते-होते उन्हें जिंदगी के एक महत्वपूर्ण पहलू, सेक्स के बारे में वैज्ञानिक और सामाजिक ज्ञान देने के लिए बड़ी मेहनत से किताब तैयार की गई थी। लेकिन अब वैज्ञानिकता से परे, सामाजिकता से परे जितनी गंदी और हिंसक फूहड़ता पेश होती है उसे तो बर्दाश्त कर लेने का माहौल देश में बनाया गया है, अलग से वयस्क कार्यक्रमों के लिए कोई जगह, कोई छूट नहीं है। नतीजा यह है कि एक परिवार के साथ बैठकर देखने के वक्त में बिना वयस्क के ठप्पे के वह सब कुछ दोहरे अर्थों में पेश कर दिया जा रहा है जो कि वयस्क लोगों में भी एक साथ बैठकर, एक ही पीढ़ी के कुछ रिश्तों के ही एक साथ देखने लायक होना चाहिए था।
भारत में सैकड़ों बरस से स्थापित नौ रसों में से जिसका शरबत सबसे अधिक तेजी से बिक सकता हो उसे लोगों के आंख-कान में लोटा भर-भर के डाला जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हर किस्म की बातें कही जा रही हैं, और आत्मनियंत्रण के नाम पर उनमें से कई शब्दों को टीवी प्रसारण के वक्त चुप करके लोगों का ध्यान और खींचा जाता है कि  देखों यहां पर कौन सा गंदा शब्द हो सकता है? पहेली की तरह इसे पेश करके वयस्क बनने से काफी दूर बच्चों को भी तेजी से जवान बनाया जा रहा है।
एक मूढ़ और मूर्ख की तरह इस देश को बना देने पर आमादा, एक फर्जी इतिहास का दावा करने वाले संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार भारत की कई पीढिय़ों की मानसिकता को बीमार बना ही चुके हैं। समलंैगिकता को अपराध बताना, वेश्यावृत्ति को अपराध बताना, पे्रम को अवैध बताना, जैसे बहुत से नारे हिंसक होते-होते अब पे्रमी जोड़ों को मार डालने का काम हर हफ्ते-पखवाड़े कर रहे हैं। ऐसी सोच के चलते ही भारत में वयस्क टीवी शुरू नहीं हो पा रहा है और लोगों की वयस्क मनोरंजन की जरूरत पारिवारिक टीवी के चैनलों और घंटों में ही पूरी की जा रही है। एक के बाद एक ऐसे बहुत से रियलिटी शो बढ़ते चले जा रहे हैं जो सनसनी और उत्तेजना की अलग-अलग किस्मों पर टिके हुए हैं। कुल मिलाकर बात यह है, और नौबत यहां तक आ गई है, कि मानो वात्सायन के कामशास्त्र को वयस्कों के लिए भी इस देश में जगह नहीं दी जा रही इसलिए वात्सायन का ज्ञान स्कूली किताबों के अलग-अलग पन्नों पर टुकड़ों में चुपचाप घुसा दिया जा रहा है।

सोमनाथ चटर्जी की निराशा, बहुत निराशाजनक है...



6 फरवरी 12
संपादकीय
दूरसंचार के 2जी लाइसेंस खारिज कर देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज ए.के. गांगुली के फैसले की आलोचना करते हुए लोकसभा के पिछले अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कहा है कि अदालत नीतियां तय करने के सरकार के अधिकार को नहीं ले सकतीं। उन्होंने इस फैसले को कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल बताया, उन्होंने कहा कि अब अदालत में मुद्दे किसी केस के मेरिट पर तय नहीं हो रहे, वे राजनीतिक आधार पर तय हो रहे हैं। इसके आगे सोमनाथ चटर्जी ने कहा था कि वे सरकार की नीतियों को सही या गलत नहीं बता रहे हैं, लेकिन यह सरकार का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट नीतियां तय नहीं कर सकता। इसके जवाब में जस्टिस गांगुली ने निराशा जताते हुए कहा है कि ऐसी कोई बात नहीं है, और वे सोमनाथ चटर्जी को अपनी बेंच की तरफ से यह भरोसा दिलाना चाहेंगे कि उसका फैसला कार्यपालिका के अधिकारों को लेने की किसी हसरत से नहीं दिया गया है। सोमनाथ चटर्जी इसके पहले भी अदालत से एक बार तब टकरा चुके हैं जब उन्हें एक अदालती नोटिस मिला था और उन्होंने उसका जवाब देने से भी मना कर दिया था और कहा था कि यह विधायिका के दायरे में न्यायपालिका की दखल है। 
हम सोमनाथ चटर्जी के इन दो बयानों को एक साथ तो नहीं देख रहे क्योंकि इन दोनों के मामले बिल्कुल अलग-अलग थे, लेकिन हम कार्यपालिका और न्यायपालिका के अंतरसंबंधों को लेकर आज बिल्कुल साफ महसूस करते हैं कि जहां कार्यपालिका खुलकर बेईमानी करते दिखेगी, विधायिका या देश के प्रति जवाबदेह नहीं रह जाएगी, जहां जनता के हक को लूटकर बाजार में बेचकर जेब भरने का काम कार्यपालिका को हांकने वाले लोग करेंगे, वहां पर न्यायपालिका को दखल देना ही होगा। यह दखल भारतीय लोकतंत्र में किसी भी किस्म की फौजी दखल से बहुत बेहतर होगी, है, इसलिए कि हम पड़ोस के पाकिस्तान में फौजी दखल बार-बार देख रहे हैं। अगर इस लोकतंत्र में सरकारी लूट और डकैती को रोकने का कोई भी जरिया नहीं रह जाएगा तो लोग लोकतंत्र के परे के विकल्पों के बारे में सोचने को मजबूर होंगे और ऐसे विकल्प एक तरफ तो नक्सली हिंसा जैसे हो सकते हैं, दूसरी तरफ वे फौज की बगावत जैसे भी हो सकते हैं। भारत फौजी बगावत से इसीलिए दूर है क्योंकि यहां लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के आपसी संबंध अधिकार और जिम्मेदारियों के संतुलन के साथ बनाए गए हैं। जिस दिन इस देश में आपातकाल जैसी नौबत लंबे समय के लिए आएगी, या और अधिक तानाशाही को लेकर आएगी, तो उसके साथ-साथ फौजी बगावत की जमीन भी तैयार होना शुरू हो जाएगी।
हम कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका इन तीनों में से किसी एक को सर्वोच्च मानने के बजाय, अलग-अलग मुद्दों पर, अलग-अलग मौकों पर उनकी ऐसी सर्वोच्चता को ही लोकतांत्रिक मानेंगे जिसमें कोई भी एक संस्था दूसरी दोनों संस्थाओं के प्रति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जवाबदेह रहेगी। जिस कदर भयानक भ्रष्टाचार और बेईमानी 2जी घोटाले में हुई है और प्रधानमंत्री जिस तरह खेत में खड़े बिजूके जैसे भी असरदार नहीं रहे कि वे चिडिय़ा को भी डरा सकें, तो वैसी लूटपाट को सरकार की नीतियां का नाम देना सोमनाथ चटर्जी की नासमझी है। वे वैसे तो बहुत समझदार हैं लेकिन आज इस मामले में उनका बयान जमीनी हकीकत को पूरी तरह अनदेखा करते हुए एक बहुत ही कागजी बात वाला है, जिस बात का कागज गलकर टूट रहा है। अब तो इन कागजों को बदलने की जरूरत लग रही है और वह सिलसिला कई किस्म के दबावों में देश में शुरू हो चुका है। 
लोकतंत्र के नेता जब एक ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं तो उनसे हमारी उम्मीद यह रहती है कि वे अपनी संस्था के हितों से परे लोकतंत्र के व्यापक हितों की बात करें। सिर्फ अपनी संस्था को देखना, या उससे टकराव वाली किसी दूसरी संस्था को एक अन्यायपूर्ण आलोचना के साथ देखना ठीक नहीं है। सोमनाथ चटर्जी ने सरकार की नीतियों के एकाधिकार की जो बात कही है, वह भारतीय संविधान में लूटपाट के एकाधिकार की नहीं है। जब जाहिर तौर पर इस गरीब देश को हजारों या दसियों हजार करोड़ का घाटा करके कुछ लोगों ने अपने गोदाम नोटों से भर लिए, तो फिर इसे नीतियां नहीं कहते, इसे गब्बर की असली पसंद जरूर कह सकते हैं। यह पूरा सिलसिला देश की जनता की नफरत का निशाना बना हुआ है और सोमनाथ चटर्जी की ऊंगलियां लोगों के दर्द और भूख की नब्ज पर से हट चुकी हैं। आज के माहौल में केवल सिद्धांतों की बात करना कुछ उसी तरह का है जिस तरह किसी कातिल को पकडऩे के लिए भागती हुई पुलिस की जीप को इसलिए रोकना क्योंकि उसमें नंबर प्लेट नहीं लगी हुई है। लोकतंत्र के नेताओं को कागज पर छपे शब्दों के बीच की भावनाओं को अनदेखा नहीं करना चाहिए और न ही जमीनी हकीकत को।

बारी हमारे बच्चों की भी आ सकती है


5 फरवरी 2012
संपादकीय 
अफगानिस्तान से खबर है कि वहां राजधानी काबुल में बनाए गए राहत शिविरों में ठंड से 22 बच्चे मर गए। यह वह अफगानिस्तान है जहां जमाने पहले अमरीका ने साम्यवाद खत्म करने के लिए एक युद्ध शुरू किया था और वहां से रूस के असर को खत्म करने के लिए तालिबानों को खड़ा किया था। इसी अफगानिस्तान में बरसों से चली आ रही अपनी मौजूदगी को अब खत्म करने की बात कहते हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने करीब 6 महीने पहले यह घोषणा की कि वहां पर अमरीका का अभियान कामयाब और पूरा हो गया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगले 15 महीनों में अमरीकी फौजें वहां से हटा ली जाएंगी। 
एक विचारधारा को खत्म करने के लिए अमरीका ने कई देशों में अपनी फौजें भेजीं, और कई देशों में हत्याएं करवाईं, सत्ता पलटवाई। मध्यपूर्व के देश अमरीका को तरह-तरह से भुगत रहते हैं और चाहे अमरीका का यह हमला इस्लाम वाले देशों पर किसी मजहब की वजह से न भी है, दुनिया के मुसलमानों को एक बड़े तबके के भीतर अमरीका के बारे में इस्लाम विरोधी होने की तस्वीर बनी हुई है। अमरीका के प्रति मुसलमानों के अविश्वास का हाल यह है कि कुछ बरस पहले भारत के उत्तरप्रदेश में मुस्लिम समुदाय के भीतर पोलियो ड्रॉप्स का विरोध किया गया क्योंकि लोगों के बीच यह अफवाह फैल गई थी कि मुस्लिम बच्चों को अमरीका से आए हुए इन टीकों का ऐसा असर होने वाला है कि आगे वे मां-बाप न बन सकें। ऐसे माहौल के बीच अमरीका उन देशों को मंझधार में छोड़कर निकल जा रहा है जहां उसके हमले के बाद, उसकी फौजी दखल के बाद स्थानीय सरकारें खत्म हो गईं और वहां पर स्थानीय लोगों में अपनी सरकार बनाने की ताकत भी खत्म हो गई। अमरीका ने लोगों को चाहें दवाओं से नाकाबिल न बनाया हो, उसने अपनी फौजी डिजाइनों से लोगों को नाकाबिल बनाने में कोई कसर नहीं रखी है।
किसी देश की भीतरी दिक्कतों को खत्म करने के नाम पर और वहां पर लोकतंत्र लाने के नाम पर दुनिया के इस सबसे बड़े हमलावर गुंडे देश ने हजारों अरब रूपयों जैसे खर्च किए और खुद अमरीका की जांच रिपोर्ट कहती है कि इसमें बहुत बड़ा हिस्सा अमरीकी भ्रष्टाचार में ही चले गया। यहां यह बात भी समझने की जरूरत है कि दुनिया भर में हमले और युद्ध को बढ़ावा देने में हथियारों के कारखानेदारों और सौदागरों की सीधी-सीधी दिलचस्पी होती है और आतंक खड़ा करने से लेकर, झगड़े खड़े करने तक का काम इन कारखानेदारों के एजेंट जमीन से लेकर संसदों तक करते चलते हैं। अफगानिस्तान में अभी जिन करीब दो दर्जन बच्चों के ठंड से मर जाने की खबर आई है, उस तरह के बच्चे फिलीस्तीन में आए दिन इजरायली हमलों से मरते हैं, इराक में मरते ही आए हैं और अब अमरीकी विमान ईरानी बच्चों को इसी तरह मारने के लिए नक्शे लेकर बैठे हैं। आज अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत जिस कदर बेजुबान हो गया है, उसके चलते कोई इस बात को भी उठाने वाला नहीं बचा है कि लाखों परमाणु हथियारों के जखीरे पर बैठे हुए अमरीका को यह हक किसने दिया कि वह ईरान को परमाणु हथियार बनाने से भी रोके? ताकतवर चाहे जिसकी गाय खोलकर ले जाए, चाहे जिसकी लुगाई को उठाकर ले जाए, चाहे जिसकी जमीन पर कब्जा कर ले, पत्थर युग से चली आ रही इस व्यवस्था को 21वीं सदी के लोकतंत्र के ढकोसले के भीतर देखना हो तो अमरीका द्वारा अपने फौजी विमानों से जगह-जगह लोकतंत्र बरसाने का नाटक देखना चाहिए।
दुनिया भर में अमरीकी दखल के बाद मारे जाते हर बच्चे की जिम्मेदारी अमरीका पर है। और इनमें से बहुत से परिवार ऐसे होंगे जो अपने इन बेकसूर लोगों की मौतों को कभी भूल नहीं पाएंगे और उनकी नफरत, उनके जख्म अमरीका को पूरी जिंदगी के लिए खतरे से घेरकर रखेंगे। यह खतरा अमरीका की फौजी सरकार ने इतने महंगे खर्च के साथ खरीदा है कि अमरीका के भीतर समझदार और अमनपसंद लोगों का तबका अपनी सरकार से इस बात के लिए नफरत करता है। लेकिन जर्मनी में हिटलर, गुजरात में मोदी जिस तरह जीतकर आते हैं, मतदाताओं के वैसे ही तबके की वजह से अमरीका में हमलावर राष्ट्रपति बुश दुबारा जीतकर आ गया था। हम इस बात पर हर कुछ हफ्तों बाद इसलिए चर्चा छेड़ते हैं क्योंकि आज जिस अमरीकी साजिश की वजह से, हमले की वजह से बेकसूर अफगान बच्चे ठंड में मर रहे हैं, किसी अमरीकी हमले के बाद हिंदुस्तान के बच्चे भी उसी तरह मारे जा सकते हैं।

इंटरनेट के पहलुओं को पढऩे-सीखने की जरूरत


4 फरवरी 2012
संपादकीय 
लता मंगेशकर ने इंटरनेट पर लोगों से कहा है कि वे जिंदा हैं और उनकी सेहत या जिंदगी के बारे में फैलाई जा रही अफवाहों पर लोग भरोसा न करें। इस खबर से कल दिल्ली की एक घटना याद पड़ती है जिसमें फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के घर खाना पकाने वाले रसोइए ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर इस तख्ती के साथ अनशन शुरू किया है कि वे अभी जिंदा हैं। उसके रिश्तेदारों ने उसे मरा बताकर जमीन-जायदाद को हड़प लिया है। लता मंगेशकर के बारे में अफवाह से कुछ हड़पने की तो गुंजाइश नहीं थी, लेकिन ट्विटर, फेसबुक, ब्लैकबेरी मैसेंजर और मुफ्त में एसएमएस पहुंचाने वाली कुछ और सेवाओं पर बात की बात में लता के न रहने की बात फैलती चली गई।
हमें भी अलग-अलग विचारधाराओं के सक्रिय लोग आए दिन कई तरह की सूचनाएं इंटरनेट पर कहीं न कहीं से भेजते हैं। इनमें से बहुत सी सिरे से झूठी होती हैं और वे किसी को बदनाम करने के लिए पूरी बदनीयत से भेजी जाती हैं। जब ऐसे लोगों को कहा जाता है कि उनकी भेजी जानकारी गलत है तो फिर वे एकदम से यह गिनाने लगते हैं कि उन्हें वह खबर या तस्वीर कहां से मिली थी। कम्प्यूटर, फोन और संचार तकनीक ने टेक्नॉलॉजी को जितना आसान कर दिया है उतना ही मुश्किल इस लालच को कर दिया है कि लोगों तक किसी ईमेल, एसएमएस, या तस्वीर को कैसे बांटा जाए। जिनकी समझ जितनी कम होती है, वे उतनी ही अधिक रफ्तार से बिना जांचे-परखे चीजों को बांटने में जुट जाते हैं। जैसे-जैसे समझ बढ़ती है, लोग सत्य और तथ्य की कसौटी पर उन बातों को कसते हैं जो उन्हें मिली हैं और जिन्हें वे आगे बढ़ाना चाहते हैं।
पिछले कई बरसों से हम लगातार देख रहे हैं कि साम्प्रदायिक और धर्मांध ताकतें झूठ को फै लाने में सबसे आगे रहती हैं।भारत में आज तक का ऐसा सबसे बड़ा प्रयोग या हादसा उस वक्त हुआ था जब तकरीबन पूरे देश में करोड़ों लोगों ने कुछ घंटों के भीतर फैलाई गई इस अफवाह पर आंखें बंद करके भरोसा कर लिया था कि गणेश प्रतिमाएं दूध पी रही हैं। वह शायद कुछ लोगों का सोच-समझकर किया गया एक प्रयोग था कि धार्मिक अफवाह किस रफ्तार से फैलाई जा सकती है। जिस तरह से भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने से निकली जहरीली मिक गैस फैली थी उसी तरह आज कोई अफवाह फैलती है। अफवाहों से लोगों का एक-दूसरे पर भरोसा घटता है और गलत जानकारी से बहुत से मौकों पर एक तबके में दूसरे तबके के खिलाफ नफरत फैलती है। इसी को रोकने के लिए हमें जब कभी, जब कहीं कोई गलत जानकारी दिखती है तो वह किसी चूक की वजह से गलत रह गई हो, या किसी साजिश की तरह झूठ से ही बनाई गई हो, उन सबके बारे में हम लोगों को सावधान करते भी चलते हैं।
टेक्नॉलॉजी ने एक पल में किसी लिखे हुए को या किसी अनजान के हाथों छेडख़ानी से बदली गई तस्वीरों, गढ़ी गई खबरों को सैकड़ों-हजारों लोगों तक आगे बढ़ाने के काम को इतना आसान कर दिया है कि लोग गंदगी को अपने दोस्तों की पूरी लिस्ट में परोसते चलते हैं। हमारा ख्याल है कि स्कूलों की बड़ी कक्षाओं में और कॉलेज में अब इंटरनेट-संस्कृति को कुछ हद तक पढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ-साथ वयस्क होते जाने वाले नौजवानों को भी इंटरनेट पर सच-झूठ सही-गलत के फर्क और खतरों को समझाने की जरूरत है। दुनिया के कई दूसरे देशों की तरह भारत में भी सूचना तकनीक से जुड़े कानून इतने कड़े हैं कि वे किसी भी कमसमझ या लापरवाह को जेल में डाल सकते हैं। जिन लोगों का दूसरे देशों के साथ वास्ता पड़ता है, वे लोग भी यह याद रख सकते हैं कि किस तरह इंडोनेशिया से एक नास्तिक ने जब फेसबुक के अपने पन्ने पर जब यह लिखा कि ईश्वर नहीं है तो उसे गिरफ्तार करके उसके खिलाफ ईशनिंदा विरोधी कानून के तहत मुकदमा चलाया जा रहा है जिसमें शायद मौत की सजा का भी प्रावधान है।
हम इसी अखबार में छोटी सी बात में बहुत बार पाठकों को सचेत करते हैं कि इंटरनेट पर या अपने फोन पर उन्हें मिले किसी झूठे, या दुर्भावना भरे संदेश, छेडख़ानी से बनाई गई तस्वीर को वे बिना जांच-परखे आगे बढ़ाते हैं तो वे अदालती कार्रवाई का खतरा उठाने के साथ-साथ अपनी साख को भी दांव पर लगा देते हैं। किसी झूठ को फैलाने के लिए अपनी साख को दांव पर लगाने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि झूठ तो आगे-पीछे उजागर हो ही जाता है, उनकी बर्बाद हुई साख नहीं लौटती। इसलिए आसान टेक्नॉलॉजी के साथ अधिक जिम्मेदार होना जरूरी है, और आज संचार तकनीक से गहरे तक जुड़ी हुई जिंदगी को देखते हुए लगता है कि इससे जुड़े हुए तमाम पहलुओं को कहीं न कहीं पढ़ाने-सिखाने की जरूरत है।

2 जी फैसला: जनता के हित की जीत



3 फरवरी 2012
संपादकीय 
2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए यूपीए सरकार के जारी किए हुए सभी स्पेक्ट्रम लाईसेंस रद्द कर दिए, और स्पेक्ट्रम बांटने के लिए नीलामी करने का तरीका अपनाने की सलाह दी। एक बेहद हाईप्रोफाईल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले पर, देश के अलग-अलग तबकों में जैसी प्रतिक्रिया होनी थी, हो रही हैं। यूपीए सरकार अपने बचाव में कह रही है कि अदालत ने तो एनडीए सरकार की नीति को गलत ठहराया है, हमारे खिलाफ कुछ नहीं कहा।  विपक्ष सरकार से इस्तीफा मांग रहा है, ट्राई अदालत की लताड़ खाकर अपना खोखला बचाव कर रहा है, सरकार के आला वकील कह रहे हैं  कि 70 लाईसेन्स अवैध होने की बात तो हमने पहले ही कही थी। लेकिन इस फैसले पर जनता के दिल की बात जस्टिस ए के गांगुली ने देश की सबसे बड़ी अदालत में अपनी नौकरी के आखिरी दिन कही- कि अदालतें  जनता की खातिर हर काम करने को मजबूर की जा रही है,  नागरिकों के मां के पेट में आते साथ ही उनकी हिफाजत करने से लेकर उसके अंतिम क्रियाकर्म तक, हर काम का बोझ अदालतें उठा रही हैं। जस्टिस गांगुली ने अपने विदाई समारोह में कहा-हम  वह तमाम समस्याए  सुलझा रहे हैं जिन्हें सरकार या तो सुलझा नहीं पाती, या सुलझाना नहीं चाहती। उनकी यही बात 2- जी घोटाले पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले की खुश्बू है कि सर्वोच्च  न्यायालय ने, दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र में जनता की आवाज़ सुनी, जिसे सुनने से केन्द्र सरकार आखिरी दम तक इंकार कर रही थी। अदालत ने अपने फैसले में ही कहा है कि अगर संवैधानिक  पदों पर रह चुके ,और व्यापक जनहित के प्रति अपना फर्ज अदा करने वाले कुछ जागरुक नागरिकों, और स्वच्छ प्रशासन के लिए संघर्ष कर रहे एनजीओ ना होते, तो देश कभी नहीं जान पाता कि सत्ता और पैसे की ताकत वाले, और व्यवस्था से छेड़छाड़ कर सकने वाले किस तरह दुर्लभ प्राकृतिक संसाधन लूट लेते हैं।
    पिछले कुछ महीनों से जनहित याचिकाओं के प्रति अदालतों ने कई कारणों से सख्त रवैया अख्तियार किया हुआ था, ऐसे में सुब्रमण्यम स्वामी, और प्रशांत
भूषण की इस जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ताकत और पैसे के राज के बीच खुद को बेसहारा और लाचार पा रही जनता के बहुत से ज़ख्मों पर मरहम की तरह है, जब प्रजातंत्र के बाकी खंबे अपने काम में चूक करते दिखाई दे रहे हैं। कहीं मंत्री जेल में है तो कहीं मुख्यमंत्रियों के जेल में जाने
लायक काम है, तो कही राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पद पर बैठे लोगों के सेक्स स्केंडल सामने आते हंै ऐसे में न्यायपालिका ने जनहित याचिका पर यह फैसला देकर लोकतंत्र में जनता की ताकत को दोबारा उस ऊंचाई पर बैठाया है, जहां से मनमाने तरीके से स्पेक्ट्रम आबंटित कर के राजा टोली, और उसे आखिरी दम तक बचाती रही सरकार ने उसे लात मार कर गिरा दिया था।  इस मुद्दे पर सरकार ने जगह-जगह , बार- बार अधिकार क्षेत्र की बात उठाई चाहे, स्पेक्ट्रम आबंटन नीति पर कानून और वित्त मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र की बात हो या नीतिगत मामलों में कार्यपालिका के क्षेत्र में न्यायपालिका के दखल का मुद्दा। लेकिन अदालत ने 2- जी मामले में फैसला देते वक्त यह साफ कर दिया कि अगर कार्यपालिका अपना काम ढंग से नहीं करेगी, तो जनता के आगे उसका
ऐसा कोई अधिकार क्षेत्र नहीं बचेगा जिसमें दखल नहीं किया जा सकेगा।  हालांकि यह  फैसला जनता को न्यायपालिका की जवाबदेही के मामले में भी ऐसा ही रवैया अख्तियार करने के उसके अधिकार के लिए भी उसे जागरुक करेगा लेकिन दोनों ही हालात यह  लोकतंत्र के लिए बहुत खुश होने की बात है  दिलचस्प बात यह है कि इसी दिन अहमदाबाद में गुजरात उच्च न्यायालय ने मोदी के सद्भावना मिशन पर सरकारी तिजोरी से खर्च  करने के बारे में दायर एक जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा है कि सरकारी तिजोरी का पैसा कैसे खर्च करना है यह उच्च न्यायालाय तय नहीं कर सकता, चुनी हुई सरकार को अपनी बुद्धि के हिसाब से यह तय करने का अधिकार मिला हुआ है। एक ही दिन में दो जनहित याचिकाओं पर
इस तरह के दो फैसले यह भी साबित करते हंै कि अगर  सही तथ्यों के साथ, सभी पहलुओं पर सोच-समझकर जनहित याचिका दायर की जाए, तो जनता का पक्ष जीत सकता है, लेकिन जनहित के नाम पर अदालतें अपना वक्त खराब नहीं करने वाली। कल के दिन अदालतों में  "पीआईएल एक्टिविज़म" के साथ ही ज्युडीसियरी एक्टिविज़म" की भी एक नई मिसाल सामने आई है जो आखिरकार जनता के फायदे में ही है। यह फैसला केवल कार्यपालिका के लिए ही एक  सीख नहीं है कि ताकत के
बूते वह देश की सम्पत्ति के साथ जैसे चाहे नहीं बरत सकती, बल्कि जनता के लिए भी एक सीख है कि अगर उसे सत्ता की ताकत से टकराना है तो अपनी बात कैसे , कितनी मजबूती से सामने रखनी चाहिए। भूषण पिता-पुत्र इस देश में जनहित याचिकाओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते हंै, और अर्से से न्यायपालिका में पारदर्शिता के लिए लड़ रहे हंै। न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने के लिए अवमानना का मुकदमा भी झेल रहे हैं। इस सबके बीच उनकी और उनके समर्थकों की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा फैसला इस बात का भरोसा दिलाता है कि जनता की उम्मीद देश में पूरी तरह टूटी नहीं है।
यह मामला ऊंचे पदों पर काम कर रहे, या काम कर चुके ऐसे लोगों के लिए भी एक सीख है जो सच के साथ खड़े होना चाहते हंै, देश के लिए अपना फर्ज अदा करना चाहते हैं। ऐसे मौकों पर जब कुछ मु_ीभर दौलतमंदों, ताकतवर लोगों के लिए जनता के हित कुचले जा रहे हों, उसकी आवाज़ बेशर्मी से दबाई जा रही हो ,तो उन्हें ऐसी जनहित याचिकाओं के साथ खड़ा होना चाहिए, इससे ऐसी कोशिशों को मजबूती मिलती है। यह सच है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में बार-बार कहा कि कि उसे याचिका की मंशा से मतलब नहीं, वह सिर्फ तथ्यों से प्रभावित होता है, लेकिन यह भी सच है कि सुब्रमण्यम स्वामी और भूषण पिता-पुत्र को इस मामले में  कई पूर्व सूचना आयुक्तों, सतर्कता आयुक्तों, आला पुलिस अफसरों का जैसा सहयोग मिला, उसने उनके पक्ष को मजबूती और विश्वसनीयता दोनों देने में अहम भूमिका निभाई और ऐसी लड़ाई लडऩे के लिए खड़े लोगों के लिए जो हौसला बहुत ज़रूरी है उसे मज़बूत किया। इन तमाम लोगों का इस लड़ाई में अपनी तरह से यह योगदान अहम था जिसकी लाज इस फैसले ने रखी है।
ऐसे समय में जब चुनी हुई सरकार , संविधान के जरिये मिले अपने अधिकारों का गलत फायदा उठाने में लगी हो, उसे चुनकर कुर्सी पर बैठाने वाली जनता को हर तरह से अपमानित करने में जुटी हो, जनता के हक में ऐसे लोगों का सामने आना उसका हौसला बढ़ाता है। इस देश में यह सिर्फ प्रशांत भूषण, उनके पिता या सुब्रमण्यम स्वामी की ही जिम्मेदारी नहीं है कि वह अदालत के जरिये सरकार को जनता के हक में सही रास्ते पर रखे, ऐसे हर उस इंसान को इसमें अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए जो अपनी सामाजिक, प्रशासनिक हैसियत, अनुभव और परिस्थिति के कारण ऐसा कर पाने लायक हैं। इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते वक्त कपिल सिब्बल ने कहा कि इसमें सरकार की बुराई नहीं की गई, लेकिन यह फैसला कदम-कदम पर सरकार द्वारा इस मामले में दिखाए गए अहंकार पर चोट करता है। इसकी एक मिसाल सर्वोच्च अदालत का सरकार की यह दलील खारिज करना है कि एक आम नागरिक किसी  भ्रष्ट  जनसेवक के खिलाफ अभियोग लगाने के लिए प्रधानमंत्री से सीधे सम्पर्क नहीं कर सकता। यह फैसला जनता और सरकार दोनों को बताता है कि इस देश में एक आम नागरिक के अधिकार सरकार के आगे क्या मायने रखते हैं, और एक जनहित याचिका कैसे उसे उसका यह अधिकार दिला पाने की ताकत रखती है।
यही नहीं, सर्वोच्च  न्यायालय के इस फैसले ने 2- जी और उसके बाद एक के बाद दूसरे घोटाले उजागर कर रहे कैग को भी राहत दी, जो  भ्रष्टाचार  के खिलाफ इस लड़ाई में अपनी संवैधानिक भूमिका के कारण शामिल है। सरकार और उसके नुमाइंदों से अलग-अलग मंचों पर तरह-तरह के हमले झेल रही कैग, और सरकार ने जिसे अपनी कठपुतली बनाकर रखने की कोशिश करती दिखी है उस सीवीसी को भी इस फैसले से जीने लायक ऑक्सीजन मिलेगी। अब चूंकि अदालत ने नीलामी के जरिये 2- जी स्पेक्ट्रम बांटने का आदेश दिया है, देश को यह भी पता लग जाएगा कि एक लाख 76 हजार करोड़ के नुकसान का कैग का आंकड़ा कितना गलत था, और 2- जी आबंटन से देश को हुए शून्य नुकसान का कपिल सिब्बल का दावा कितना सही। 122 लाईसेंसों का रद्द होना केवल दूर संचार विभाग की नाकामी ही नहीं जताता, सर्वोच्च न्यायालय ने एक-एक मंत्रालय और विभाग की भूमिकाओं का जिक्र करते हुए इस फैसले के जरिये सरकार के हर तबके से हर स्तर पर सवाल करने का देश के आम नागरिक का अधिकार उसके हाथों में थमा दिया है। एक राजनीतिज्ञ होने के नाते सुब्रमण्यम स्वामी की यूपीए गठबंधन से अपनी शिकायतें हो सकती हंै, लेकिन वकील न होते हुए भी उन्होंने  सामजिक संगठनों, भूषण पिता-पुत्र और जागरुक नागरिकों का साथ ले कर जिस हौसले से 2- जी मामला अदालत में लड़ा, सर्वोच्च न्यायालय ने उसे शर्मिन्दा नहीं किया। हंस की तरह नीर क्षीर अलग-अलग करते हुए राजनीतिक मकसदों को अलग करके, इस देश की जनता की,  और इंसाफ पाने के एक बहुत ताकतवार औजार जनहित याचिका की अहमियत पूरी तरह साबित कर दी है।

छोटी सी बात


3 फरवरी 2012
छोटी सी बात
किसी जगह जाकर ठहरे हों, तो वहां से रवाना होने के पहले कमरे की अलमारी दराज़, दरवाजों के पीछे, ठीक से देख लें। किसी सामान को भूल जाने के बाद उसे वापिस पाना मुश्किल होता है। इन दिनों चार्जर भूल जाने जैसे बहुत से मामले होते हैं। इनसे बचने का एक आसान रास्ता होता है, सामान पैक करने के लिए उनकी जगह अपने बैग, सूटकेस में  तय कर लें। घर से रवाना होते हुए ले जाने वाले सामानों की लिस्ट भी हमेशा तैयार रखें। सफऱ के सारे सामानों को एक जगह भी रखना चाहिए, और हर सामान को एक दिन पहले इक_ा कर लेना ठीक होता है।  नए शहर में पहुंचकर उन सामानों पर पैसे बर्बाद होते हैं, जो घर पर पड़े हुए हैं।

छोटी सी बात




छोटी सी बात
सफर में, सिनेमाघर में, या किसी शोरगुल भरी दावत में आपको लोगों के करीब रहकर बात करनी होती है। वैसे वक्त के लिए आपके कपड़ों या आपके मुंह से बदबू तो नहीं आ रही? साफ़-सफाई का इतना ख्याल रखें।

वक्त रहते नींद टूटे तो गनीमत



संपादकीय
2 फरवरी 2012
एम्स में भर्ती बच्ची फलक की जि़ंदगी के लिए लड़ाई हार की कगार पर पहुंची दिख रही है। पुलिस को उसे अस्पताल तक लाने वाली नाबालिग लड़की के बारे में रौंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत पता चली है। एक नाबालिग लड़की को किस तरह उसके पिता ने घर से बाहर निकलने, अपने खाने पीने का इंतजाम आप करने पर मजबूर किया, ताकि वह एक बूढ़े आदमी से शादी कर ले। किस तरह लड़कियों को कथित रूप से वेश्यावृत्ति में धकेलने की कोशिश कर रहे पति-पत्नी में से पति ने उसके साथ लगातार बलात्कार किया, और किस तरह वह दो वक्त की रोटी  के लिए यह सब बर्दाश्त करती रही। अखबार अब कह रहे हंै कि इतना कहने पर भी पुलिस यह कहने से कतरा रही है कि यह पति-पत्नी लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेलने के लिए देशभर में सक्रिय गिरोह का हिस्सा है या नहीं। दिल्ली में ही अपनी औलादों के घर से निकाल देने के बाद पार्क में रहने को मजबूर 80 बरस की एक वृद्ध महिला के साथ हुई क्रूर छेड़छाड़  के मामले में अदालत ने  सुझाया कि क्या इसे भी बलात्कार नहीं कहा जाना चाहिए? और जैसे इतना ही काफी नहीं था, तो पश्चिम बंगाल में 6-7 महीने की बच्ची को ट्रेन में छोड़कर कोई उतर गया। दिल दहलाने वाली यह खबरें दुनिया की ताकत बनने जा रहे इस देश का के असली चेहरा उजागर करती हंै। अगर किसी को फिर भी कोई शुबहा रह जाता हो तो इस चेहरे पर चढ़ी मेकप की पर्त के नीचे की बदसूरती खरोंचकर दिखाने का काम संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट और केन्द्रीय स्वासथ्य मंत्रालय की रिपोर्ट कर रही है।  यूएन की रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चियों के पैदा होने के लिए भारत  दुनिया की सबसे डरावनी जगह है(फलक और उसे लाने वली लड़की की कहानी देखने के बाद वैसे भी इसमें किसे शक रह जाएगा?) जहां बच्चियों को चुन चुनकर कोख में मार डाला जाता है, बीमार बच्चियों के इलाज पर कोई खर्च से बच सके तब तक बचने की कोशिश की जाती है, उनमें से बहुतों को  भरपूर ढंग से खाना नहीं दिया जाता, बीमारियों से बचाने टीके भी नहीं लगवाए जाते। भारत बच्चियों के खिलाफ अपनी संवेदनहीनता में इतना आगे बढ़ चुका है कि यहां जीव विज्ञान का यह जाना माना सच भी झूठा पड़ रहा है कि लड़कियां शारीरिक रूप से लड़कों के मुकाबले ज्यादा मजबूत होती हैं। शिशु मृत्यु में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की ज्यादा तादाद के बारे में इस तथ्य का जि़क्र करते हुए यू एन की रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कों के मुकाबले ज्यादा बच सकने लायक होने पर भी अगर लड़कियां उनके मुकाबले ज्यादा मर रही हंै, तो यह जितनी दिख रही है, उससे ज्यादा चिंता की बात है। लेकिन क्या एक देश के रूप में हम यूएन की रिपोर्ट की यह चेतावनी समझ पाने लायक संवेदनशील है? क्या एक के बाद दूसरी रिपोर्टों से भी हमारे कानों पर जू रेंग रही है? क्या यह हमारी चिंता का विषय भी बन पाया है?  
फलक, उसे लाने वाली किशोरी, और बलात्कार जैसी घटना की शिकार 80 बरस की बेसहारा बूढ़ी, यह तीनों खौफनाक जुल्मों का शिकार उसी दिल्ली में हुर्इं, जहां एक महिला मुख्यमंत्री पद पर पिछले कई सालों से बैठी है, जहां देश की सबसे ताकतवर महिला सोनिया गांधी रहती और काम करती है। जहां गरीबों,आम आदमी के लिए काम करने का दम भरने वाली सरकार  पिछले दस बरसों से काबिज है।  हम इस बात की तरफ ध्यान खींचने के लिए यह बातें कर रहे हैं कि नामी राजनीतिज्ञों की मौजूदगी का असर समाज और प्रशासन की संवेदनशीलता पर कितना है?  इस बात की तरफ ध्यान दिलाने के लिए कर रहे हंै कि देश के बहुत बड़े, कद्दावर नेताओं की हस्ती कुछ अहम् सामाजिक मुद्दों पर जाकर कितनी बेअसर हो चुकी है। यू एन की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बच्चियों की स्थिति जितनी चिंताजनक हालत में है, उसे देखते हुए केवल जन जागरण अभियानों से बात नहीं बनने वाली, सरकार को ठोस काम करने होंगे। लेकिन जनजागारण अभियान भी देश भर में कहां मौजूद है? जन संगठनों के काम सतही स्तर पर ही रह गए हैं। ताज्जुब होता है कि अन्ना हजारे की एक हकाल पर हजारों की भीड़ को घर से निकाल सड़कों पर ला देने वाले इस देश में कोई जनसंगठन ऐसी बुराइयों के खिलाफ जनता को इस तरह  कैसे नहीं जगा पाता कि सरकार को डर लगे। हरियाणा में स्त्री,  बेटियों को कोख में मारने के खिलाफ और लड़कियों के समर्थन में बहुत से अभियानों की खबरें आती हैं, लेकिन ऑनर किलिंग में बेरहमी से लड़कियों के कत्ल की खबरें भी तो आना कम नहीं होती?और ऐसी खबरें भी आती हैं कि किस तरह बड़े नामी नेता ऑनर किलिंग के हामी दबंगों के पैरों में सिर झुकाने पहुंचते रहे हैं।
हमारी समझ से इस समस्या पर एक साथ कई तरफ से हमला करने की जरूरत है अकेले जन जागरण या अकेले कानून पर अमल से बात नहीं बनेगी। देश में कमज़ोरों की हालत, वह जहां भी हंै जिस भूमिका में हैं बहुत ज्यादा चिंता के लायक बनी हुई है। ऐसे तमाम लोग, जो कानून को अपने हिसाब से तोडऩे मरोडऩे की ताकत नहीं रखते फलक जैसी हालत में पहुंचने के डर में जीते हैं - शारीरिक रूप से ना सही तो सामाजिक, मानसिक रूप से, मानवीय मानदंडों को देखते हुए। गरीब, लाचार, कानून तक पहुंच ना रखने वाले, अपने आसपास के लोगों की असंवेदनशीलता का शिकार, व्यवस्था से बेजार, हर कोई फलक जैसे एम्स पहुंचाया नहीं जाता, और हालात का शिकार हो कर गुमनाम मौत मर जाता है, या जिंदा लाश की तरह जीता है। क्या तरक्की का यही पहलू लेकर हम दस फीसदी विकास का सपना देखते हैं? क्या इतना ही काफी है? एक हिट बॉलीवुड फिल्म का हताश पुलिस अफसर हीरो एक डायलॉग कहता है- अगर पुलिस तय करले, तो कोई मंदिर से एक चप्पल भी चुरा नहीं सकता। मुंबइया फिल्म का डायलॉग होते हुए भी यह उतना नाटकीय नहीं, जितना सच है। यहां हमारा निशाना पुलिस नहीं, वह व्यवस्था है जिसमें तय करने का माद्दा नहीं है। अभी कल ही हमने अपने अखबार के पन्नों पर देश की एक बहुत नामी पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट  छापी, जिसमें बताया गया है कि किस तरह छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी राजनीतिक इच्छा शक्ति से उस पीडीएस योजना को दोबारा शान से खड़ा कर दिया, जिसे देश भर में खत्म कर देने की दलीलें दी जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों के लिए पीडीएस है उनमें से 97 फीसदी तक छत्तीसगढ़ में यह सक्षमता के साथ पहुंचाई जा रही है। इसकी बहुत सी खामियां तकरीबन दूर कर ली गई हैं। एक अकेले छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार के राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने का यह नतीजा है कि आज देश भर में गरीबों को उनके हक से वंचित रखने की कोशिशों के  खिलाफ लोग बोल पा रहे हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति एक ऐसी दवा है जो हमारी व्यवस्था को डस रही बहुत सी बीमारियों का इलाज है। यही राजनीतिक इच्छा शक्ति कमज़ोरों, गरीबों विकलांगों, बच्चों, बूढ़ों, पिछड़ों की हिफाज़त करने में दिखाने की जरूरत है। खुद छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की एक ताजा रिपोर्ट में यह बात साफ नजर आती है। मितानिन कार्यक्रम को बढ़ावा देकर ग्रामीण इलाके में शिशु मृत्यु दर में कमी करने में कामयाब छत्तीसगढ़ में, शहरी इलाकों में शिशु मृत्यु राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है, बल्कि बहुत बुरी हालत में है।
यह सच है कि हर बात के लिए सरकार का मुंह नहीं ताका जा सकता, लेकिन देश को चलाने की जिम्मेदारी का एक हिस्सा समाज को सही रास्ते पर बनाए रखना भी है। फलक का किस्सा सामने आने पर केन्द्र सरकार के मंत्री देह शोषण के लिए देश में बच्चों के व्यापार पर चिंता जाहिर करते हंै, लेकिन उनकी इस चिंता में, ऐसे व्यापार को आंख तरेरने में उनका नाकाम रहने का सच भी शामिल है। यह एक जाना माना सच है कि बहुत से गैर कानूनी काम कुछ नेताओं की सरमाएदारी में चलते हैं, लेकिन एक गैर कानूनी काम को राजनीतिक संरक्षण देने वाले यह नेता, और उनकी तरफ से आंखे मूंदने वाले उनके दल यह इत्मीनान ना रखे, कि इस गैर कानूनी काम के तार दूसरे किसी गैर कानूनी काम से नहीं जुड़ेंगे, और बात घूम फिरकर उन तक ही नहीं पहुंचेगी। जब तक गलत काम करने वालों को कानून और न्यायपालिका का डर नहीं होगा, ताकतवरों का कमज़ोरों का खून चूसना जारी रहेगा। चूंकि देश में यह मंजर बद से बदतर होते जा रहा है यह मान लेना बाकी रहता है कि कानून का खौफ जरा भी नहीं रह गया है, कानून केवल  पन्नों पर रह गए है। 80 बरस की बूढ़ी बेसहारा महिला से गलत बर्ताव करने वाला युवक पुलिस की पकड़ में आ गया, फलक को लाने वाली लड़की पर जुल्म करने वाला उसका पिता, और उसे जिस्म फरोशी में धकेलने की कोशिश करने के आरोप में दो और लोगों को भी पुलिस ने पकड़ लिया, लेकिन यह जुर्म के  संवेदनहीनता के उस पेड़ की टहनियों पर लगे फल भर हैं। बात इस पेड़ की जड़ को काटने से ही बनेगी। इस काम में समाज, मीडिया को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, लेकिन सबसे ज्यादा  जिम्मेदारी प्रशासन और उसे काम करने देने लायक छोडऩे के लिए सरकार की है। यह बातें करने का समय कब का बीत भी  चुका है, अब यही बाकी रह गया है कि हमेशा के लिए सोने से पहले हमारी नींद टूटे।      

राहुल के झंडा-बैनर लिए भाजपा सड़क पर...


1 फरवरी 2012
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी ने अभी जोर-शोर से एक मुद्दा उठाया, कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए। अलग-अलग कई शब्दों में भाजपा के प्रवक्ताओं और नेताओं ने इस बात को कहा और टेलीविजन समाचार चैनलों पर इस पर बहस छिड़ी। कुछ लोगों को यह हैरानी हो सकती है कि अचानक यह बात कहां से उठी। लेकिन राजनीति के हथियारों के जानकार लोग अगर तारीखों को देखें तो आसानी से इसके पीछे की नीयत पता लग सकती है। पंजाब में मतदान के एक-दो दिन पहले ही भाजपा ने हवा से पकड़कर इस मुद्दे को चबूतरे पर खड़ा करने की कोशिश की जिसका सीधा-सीधा मतलब यह होता कि चले आ रहे एक सिख प्रधानमंत्री को हटाकर दो बरसों के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए। ऐसी बात को हवा में फैलाकर भाजपा की नीयत पंजाब में कांगे्रस को नुकसान पहुंचाने के अलावा और कोई रही हो, ऐसा हमें नहीं लगता। न तो यह लोकसभा के आम चुनाव होने जा रहे हैं और न ही यूपीए सरकार के भीतर ऐसी कोई अस्थिरता है कि जिसके चलते प्रधानमंत्री को बदलने की बात सोची भी जाए। 
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी की हजार किस्म की दूसरी खामियां हो सकती हैं, लेकिन इस बात के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तारीफ करनी होगी कि सत्ता को अपने नौसिखिए या अनुभवहीन हाथों में रखकर, खुद कुर्सी पर काबिज होकर एक खोखला मजा लेने के बजाय उन्होंने एक अच्छी छवि वाले, अनुभवी डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, इसके बाद यह फैसला सही था या नहीं, इसे तो मौजूदा इतिहास लगातार लिख ही रहा है, लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के फैसले में कोई खामी रही हो ऐसा उस फैसले के दिन तो किसी कोने से भी किसी को लगा नहीं था। यह भी ताजा इतिहास है कि किस तरह कांगे्रस सांसदों ने सोनिया गांधी को संसद भवन में पार्टी की संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री चुना था और सोनिया गांधी ने एक समझदारी और विनम्रता से अपने सिर पर रखे गए दुनिया के लोकतंत्र के इस सबसे बड़े ताज को मनमोहन सिंह के सिर पर रखा, और एक कार्यकाल पूरा होने के बाद भी उसे दूसरे कार्यकाल में कायम रखा। नेहरू-गांधी-सोनिया परिवार के अगले चिराग, राहुल गांधी यूपीए सरकार में स्वाभाविक रूप से मंत्री बन सकते थे और एक अनुभव हासिल कर सकते थे। लेकिन उन्होंने पार्टी के मोर्चे पर काम करना तय किया और सरकार में ऐसे अनुभव का मौका खोया जो कि आगे उन्हें सत्ता में आने पर अनुभवहीन करार देने के काम आएगा। ऐसे में भाजपा का यह मांग करना कि दो बरस के लिए राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए, एक कुतर्क तो है ही, यह सलाह देना भाजपा के अधिकार क्षेत्र के बाहर की बात भी है। 
यहां पर कांगे्रस को सार्वजनिक बहस में यह याद दिलाने का मौका मिल गया कि कांगे्रस के पास तो आज यूपीए के लिए एक प्रधानमंत्री काम कर ही रहा है, भाजपा के पास तो प्रधानमंत्री के पद के लिए अगले चुनाव का कोई प्रत्याशी भी साफ नहीं है। नरेन्द्र मोदी अगले प्रत्याशी हो सकते हैं या नहीं, या फिर लालकृष्ण आडवानी 2014 के लिए कसरत करके तैयार हो रहे हैं या नहीं, इसमें तो कोई बात भाजपा के भीतर ही साफ नहीं है, इसलिए एनडीए में वह साफ होगी या नहीं यह तो दूर की बात है। भाजपा के आज के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी यह साफ कर चुके हैं कि वे अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं रहेंगे। नरेन्द्र मोदी जिनको कि भाजपा के भीतर का मंदिरमार्गी, गरमपंथी तबका सबसे काबिल और संभावनाओं वाला उम्मीदवार मानता है, आज जाने किन वजहों से पार्टी के चुनाव अभियान से भी बाहर हैं। ऐसे में जरूरत तो भाजपा को अपना अगला उम्मीदवार तय करने की है, न कि चलते हुए एक सत्तारूढ़ गठबंधन में फेरबदल सुझाने की। 
पंजाब में मतदान के ठीक पहले सरदार मनमोहन सिंह को हटाकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का यह नसीहतनुमा शिगूफा, बहुत हल्का रहा। ऐसी खोखली तिकड़मों से किसी पार्टी की इज्जत नहीं बढ़ती, और हमारा अंदाज यह है कि पंजाब के मतदान पर भी ऐसी साजिश का कोई असर नहीं होगा, और वहां के नतीजे इस शिगूफे के पहले जो होने जा रहे थे, शायद वही होंगे, और फिर वे चाहे जो भी हों। कांगे्रस पर कुनबापरस्ती की तोहमत उछालने की भी यह एक कोशिश थी, लेकिन जिस दिन राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की यह कोशिश भाजपा ने की, उसी दिन वह उत्तरप्रदेश में अपने पिछले राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेटे को महासचिव बनाने से पार्टी के भीतर खड़ी हुई बगावत को झेल रही थी। यूपीए सरकार और कांगे्रस के खिलाफ मुद्दों की ऐसी कंगाली आज भाजपा के सामने आने की कोई वजह नहीं दिखती कि वह राहुल के पक्ष में झंडा-बैनर लेकर सड़क पर आ जाए।