ऐसी ही एक और सालगिरह का कितना जश्न मनाया जाये?


14 अगस्त 2012
संपादकीय
आजादी की एक और सालगिरह आकर खड़ी हो गयी है। हर बरस मानो वह मुंह चिढ़ाने आ जाती है। गांवों से लेकर शहरों तक जगह-जगह गाँधी और नेहरू को याद किया जायेगा, आजादी के आन्दोलन के भगत सिंह और बाकि लोगों को भी याद किया जायेगा, और देश अगले दिन से फिर उसी रफ्तार से, उसी ढर्रे पर चलने लगेगा। आज़ादी पर उन लोगों का हक बने रहेगा जिनके हाथ में किसी भी किस्म की ताकत है, राजनीति, सरकार, पैसों, या किसी और किस्म की ताकत। लेकिन जिनके पास कोई ताकत नहीं है, वे लोग आजादी के मायनों से दूर पड़े रहेंगे।
कहने को तो सबके हक बराबरी के हैं, लेकिन एक खरबपति कारखानेदार की जमीन की जरूरत या हवस के मुकाबले उस जमीन के असल मालिक गरीब किसान की कोई आजादी है? खदानों से लेकर आसमानी लहरों तक पर अगले सैकड़ों बरसों के लिए काबिज हो जाने वाले लोगों के मुकाबले इस कुदरती दौलत के असल मालिकों की कोई आजादी है? हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में अमीर की मर्जी के मुकाबले गरीब की कोई आजादी है? यह पूरा सिलसिला अदना लोगों को आजादी का अहसास कराते रहने, उसके झांसे में रखने का है। जिस तरह कोई महाराज या बापू अपने प्रवचन में लोगों को स्वर्ग का अहसास करते रहते हैं, उसी तरह साल में दो चार बार हिन्दुस्तानी लोगों को आजादी का अहसास कराया जाता है। 
लेकिन हिन्दुस्तानी जम्हूरियत की बदहाली इतनी है कि चुनी हुई सरकार के मुकाबले आज लोग ऐसे हवाई नारों को सर पर बिठाने लगे हैं, जिन पर सिर्फ नासमझ लोगों को भरोसा होना चाहिए था। जब लोकतंत्र की जवाबदेह सरकार, अदालत, संसद, सब बेअसर और नकामयाब होने लगें, तो फिर लोग नारों को सर पर पोथी की तरह सजा लेते हैं, और नारों की राह से जन्नत पहुँचने पर भरोसा करने लगते हैं। आज दिल्ली में एक भगवा बाबा जिस हिकारत के साथ यह मुनादी कर रहा है कि वह चाहे तो इस मुल्क के प्रधानमंत्री तो लाल किले से कल झंडा फहराने से रोक सकता है, और इस चुनौती पर भी देश को गुस्सा नहीं आ रहा, तो इसका मतलब यह नहीं कि बाबा पर देश का भरोसा है, इसका मतलब यह है कि जनता का सरकार पर, प्रधानमंत्री पर से भरोसा खत्म हो गया है। आज आजादी की सालगिरह के मौके पर यह एक बड़ी नाकामयाबी है कि तानाशाह अन्ना-बाबा के फतवों को लोग सुन रहे हैं। जैसे मोदी की साम्प्रदायिकता उनके बेहतर राज की साख को मिट्टी में मिला देती है, जिस तरह लालू का चारा उनकी धर्मनिरपेक्षता को मिट्टी में मिला देता है, उसी तरह आज देश के सरकार के कुकर्म लोकतंत्र की साख को मिट्टी में मिलाकर अन्नातंत्र-बाबातंत्र को एक विकल्प बना रहे हैं। 
यह सिलसिला भयानक है। एक तरफ देश के बहुत बड़े हिस्से में नक्सल पाँव पसार चुके हैं, सरहद के सूबों में अलग खतरे खड़े ही हुए हैं, और ऐसे में दिल्ली पर किसी को भरोसा नहीं है। अन्ना के लोग जिस अंदाज में देश की संसद को एक-मुश्त गालियाँ बक रहे हैं, अदालतों पर लोगों को इन्साफ का भरोसा नहीं है, ऐसे में किस आजादी की सालगिरह हम मानाने जा रहे हैं? इस देश में लोगों में समझ का दीवाला निकला हुआ है, राजनीतिक दल चाहते भी यही हैं कि लोगों की समझ कम ही रहे। हिंदुस्तान का लोकतंत्र चुनावों की निरंतरता के मामले में जरूर कामयाब है, और हर पांच बरस में चुनावी उम्मीदवारों को यह आजादी रहती है कि वे मनचाहे भुगतान पर मनचाहे वोट खरीद सकें, वोटरों को आजादी रहती है कि वे मनचाहे रेट पर अपने वोट बेच सकें। और लोकतंत्र को आजादी रहती है कि वह अपने-आपको जिंदा और तरक्की करता बता सके। 
ऐसी ही एक और सालगिरह का कितना जश्न मनाया जाये?




फ्रीडम को इस कदर फ्री मान लेना गांधी-नेहरू ने कभी सोचा भी न होगा...


13 अगस्त 2012
हरियाणा का कांगे्रस सरकार का गृहमंत्री अपनी एक भूतपूर्व कर्मचारी की प्रताडऩा-आत्महत्या के बाद से फरार है। वैसे तो तकनीकी रूप से यह मंत्री निर्दलीय निर्वाचित होकर आया था, लेकिन वह कांगे्रस सरकार में मंत्री बनाया गया। इस बारे में अखबार और टीवी रंगे पड़े हैं, इसलिए यहां पर हम उससे जुड़ी तमाम बातों को दुहराना जरूरी नहीं समझते, लेकिन क्या अपने कल तक के गृहमंत्री की आज की फरारी पर इस पार्टी की महिला अध्यक्ष की चुप्पी काफी है? जिस दिल्ली में सोनिया गांधी रहती हैं, उसी दिल्ली में यह महिला खुदकुशी को बेबस हुई, और उसने जिसे जिम्मेदार ठहराया है, कल तक वह बाहुबली मंत्री और कारोबारी, माफिया सरगना जैसे अंदाज वाला नेता मजे में फरार है।  पुलिस उसके घरों पर छापे मार रही है और मानो एक राष्ट्रीय पार्टी, और हरियाणा में सत्तारूढ़ कांगे्रस का इससे कोई लेना-देना ही नहीं है। 
हो सकता है कि कानूनी रूप से कुछ कहना कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी की मजबूरी न हो, लेकिन क्या नैतिक रूप से, सामाजिकता के रूप से, और जिस बोलचाल की जुबान में इंसानियत कहा जाता है (जो कि इंसानियत की पूरी तस्वीर के मुकाबले एक अद्र्धसत्य से कुछ नहीं), उसके हिसाब से सोनिया गांधी को एक महिला की ऐसी दुर्गति करने वाले अपने मवाली-मंत्री को लेकर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए? 
दरअसल आज सरकार और राजनीतिक दलों की तमाम सोच कानूनी जिम्मेदारी पर आकर रूक जाती है। अगर कोई बात उनकी कानूनी जिम्मेदारी नहीं है, और उनके लिए दिक्कत वाली है, तो वहां वे जेब से एक घिसा-पिटा तर्क निकालकर पेश कर देते हैं कि कानून अपना काम करेगा। यहां पर सवाल यह है कि देश का कौन सा कानून किसी पार्टी को या किसी सरकार को उसके किसी शिकार से माफी मांगने से रोकता है? उसे मुआवजा देने से रोकता है? यही हाल पिछले दिनों नारायण दत्त तिवारी को लेकर सामने आया जब वे एक निजी इंसान के रूप में बरसों तक अदालती लड़ाई लडऩे और एक मां-बेटे को बदनाम करने का काम करते रहे, और आखिर में जाकर वे उस बच्चे के बाप साबित हुए। इस मामले को भी दिल्ली में बैठी कांगे्रस ने मुंह बंद करके देखा।
अब सवाल यह उठता है कि जब अदालत तक किसी को कुकर्मी, जुल्मी या बेईमान साबित कर देती है, तब भी अगर पार्टी ऐसे लोगों के खिलाफ चुप रहती है तो उस पार्टी के सिद्धांत क्या हैं? ऐसे लोग पार्टी में बने भी रहते हैं। क्यों कांगे्रस पार्टी या ऐसी ही कोई दूसरी पार्टी अपने ऐसे लोगों से कोई जुर्माना नहीं वसूलती? क्यों उनकी जायदाद का कोई हिस्सा सार्वजनिक काम के लिए दान नहीं दिलवाती? और कुछ नहीं तो अपने नेताओं और मंत्रियों की हिंसा और ज्यादती के शिकार लोगों को मुआवजा दिलवाने जैसा बहुत साधारण समझ का प्राकृतिक न्याय यह पार्टी क्यों नहीं करती? और जब कांगे्रस किसी नेक काम को नहीं करती, तो यह बात देश की बाकी पार्टियों के सामने एक मिसाल की तरह काम आती है और बाकी पार्टियां भी फिर उसी तरह के अपने कुकर्मों को इस मिसाल के साथ सही ठहराने लगती हैं। 
पिछले दिनों मैंने कहीं पर यह भी लिखा कि कांगे्रस के राज्यसभा में मनोनीत सांसद श्रीकांत वर्मा और उनकी पत्नी वीणा वर्मा का बेटा अभिषेक वर्मा आज देश की सुरक्षा के खिलाफ दस किस्म की दलाली करते पकड़ाया है। खुद इसी यूपीए सरकार की एजेंसियां उसके खिलाफ मुकदमे चला रही हैं। ऐसे में यह पार्टी देश की जनता से इस बात के लिए माफी क्यों नहीं मांगती कि उसकी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए इस कुनबे के चिराग ने पूरे देश में अंधेरा फैलाने का धंधा चला रखा था, और कांगे्रस की या तो इस पर कोई नजर नहीं थी या फिर हथियारों के इन सौदों में, दलाली और जासूसी में उसकी भागीदारी थी।
इस देश में यह बेशर्मी हैरान कर देने वाली है कि जब बड़े-बड़े ताकतवर लोग फंसते हैं तो वे अदालत के बजाय जनता की अदालत की बात करने लगते हैं। और जब जनता की तरफ से असुविधा के सवाल उठते हैं तो नेता और पार्टी एक अलग ढाल उठा लेते हैं कि कानून अपना काम कर रहा है। 
दरअसल अंगे्रजी का एक शब्द इस देश में बहुत गलतफहमी खड़ी करता है। गलतफहमी कहें, या खुशफहमी। फ्रीडम, यानी आजादी को लोगों ने फ्री (मुफ्त) मान लिया है। यह फ्रीडम बहुत सी जिम्मेदारियों के साथ आती है, जिसमें से हर जिम्मेदारी को पूरा करवाना कानूनी की लाठी का काम नहीं होता, लोगों का खुद का काम भी होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक दल अभी-अभी आए आंकड़ों के मुताबिक सैकड़ों करोड़ का चंदा लेने वाली पार्टियां अगर इस दौलत से उन बेकसूर लोगों को कोई मुआवजा भी नहीं दे सकती, जिनके साथ इनके नेताओं ने बलात्कार किया हो, आत्महत्या को बेबस किया है, जिनकी हत्या की है, जिन बच्चों को पैदा किया है, तो इन पार्टियों को फ्रीडम के सिर्फ लड्डू ही फ्री में क्यों मिलें? चुनाव आयोग के नियम, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संसद के बनाए कानून, सब मिलकर भी किसी भी देश में तथाकथित इंसानियत को लागू नहीं करवा सकते, और लोगों से उनकी नैतिक जिम्मेदारी पूरी नहीं करवा सकते। 
लेकिन फ्रीडम इतनी फ्री नहीं रहती, उसमें कानून से परे के इंसाफ की भी उम्मीद जुड़ी रहती है। यूपीए की मुखिया होने के नाते कांगे्रस पार्टी को, और उसकी मुखिया होने के नाते सोनिया गांधी को देश को बहुत से मामलों में जवाब देना चाहिए। जिम्मेदारी से कतराना किसी को महान नहीं बनाता। इस विशाल लोकतंत्र को अपनी निरंतरता और और मजबूती के लिए दुनिया भर में इज्जत से देखा जाता है। खुद यहां के नेताओं को अपनी पार्टियों को इज्जत के लायक बनाना चाहिए। जब तक इंसान हैं तब तक किसी भी पार्टी या सरकार तले तथाकथित हैवानियत होती ही रहेगी। इससे तो बचा नहीं जा सकता, लेकिन ऐसे मौकों पर नैतिकता का यह तकाजा है कि ऐसे हैवानों के मुखिया बेकसूर होने पर भी अपने लोगों के किए की भरपाई करें, और एक प्राकृतिक न्याय की मिसाल पेश करें। 
ऐसे में इन नेताओं के भले की एक बात यहां कह सकते हैं कि इससे उनको वोटों का भी नफा ही होगा, नुकसान नहीं। 
फ्रीडम को इस कदर फ्री मान लेना गांधी-नेहरू ने कभी सोचा भी न होगा...

रामदेव अब ईमानदार


13 अगस्त 2012
संपादकीय
एक हफ्ते के भीतर देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे दो अलग-अलग, और समानांतर आंदोलन राजनीतिक हो गए, और इसी वजह से कम से कम आज उनका वजन खत्म हो गया। कांगे्रस के बड़बोले नेता पहले से अन्ना हजारे के आंदोलन की नीयत के बारे में कहते आ रहे थे, अन्ना के साथी चुनावों में कांगे्रस के खिलाफ प्रचार करना भी शुरू कर चुके थे, और अब अन्ना हजारे के खेमे से राजनीतिक दल बनाने की मुनादी हो चुकी है। उसके बाद आज बाबा रामदेव के मंच से कांगे्रस को हराने की खुली राजनीतिक घोषणा के बाद उनका हिलते हुए पारे की तरह का अस्थिर मिजाज साफ हो गया है कि यह आंदोलन अब कांगे्रस के खिलाफ ही रह गया है।  मुखौटे के इस तरह उतर जाने को हम बेहतर मानते हैं। बाबा के मंच से आज देश के एक प्रमुख साम्प्रदायिक नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इस आंदोलन को ओम और रोम के बीच का मुकाबला कहकर इस मंच के तेवर और इसका रूख भी साफ कर दिया। लेकिन कुछ हैरानी की बात यह रही कि इसी मंच से शरद यादव ने भी खासी लंबी बात कही, और ओम और रोम वाली बात के बाद कही, और उसे अनदेखा करते हुए कही। खैर, एनडीए के साथियों के ऐसे रूख से किसी सदमे की जरूरत नहीं है। 
देश को अन्ना और बाबा के आंदोलनों की राजनीति को समझने की जरूरत है। हम तो अपने पाठकों के सामने अपनी सोच को आए दिन रखते ही आए हैं कि किस तरह अन्ना-बाबा से लेकर रविशंकर तक, ये तमाम ताकतें अपने ही बीच के कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े की कर्नाटक की भाजपा सरकार के अभूतपूर्व भ्रष्टाचार को पूरी तरह अनदेखा करते हुए, सिर्फ कांगे्रस लीडरशिप की सरकार के भ्रष्टाचार पर हमला करते आई हैं। दूसरी बात किस तरह अन्ना-बाबा ने वक्त-वक्त पर गुजरात के लहू सने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ की। तीसरी बात यह कि अन्ना और बाबा के साथी किस-किस तरह के नाजायज और गैरकानूनी कामों में पकड़ाए जा चुके हैं, और उनको अनदेखा करके अपने-आपको पाक-साफ बताकर यह आंदोलन चल रहा है। चौथी बात यह कि किस तरह देश के संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ एक हिकारत पैदा करते हुए निर्वाचित संसद के काम को फुटपाथ पर करने की एक तानाशाही जिद में देश को पिछले एक बरस से लगातार झोंक दिया गया है। पांचवीं बात यह कि इन तमाम आंदोलनों के चलते इस देश का किस-किस तरह का नुकसान, अर्थ-व्यवस्था के मोर्चे पर हुआ है, और लोकतंत्र के प्रति आस्था के मामले में भी हुआ है। 
इन तमाम मुद्दों पर तिरंगे झंडों की भीड़ के बीच लगते हुए नारों के शोर में समझदारी की कोई बात नहीं हो सकती। देश की कोई एक सरकार अगर भ्रष्ट है, और है, तो उससे देश की संसदीय व्यवस्था को खत्म कर देने का तर्क खड़ा नहीं हो जाता। किसी सरकार के खिलाफ अनास्था एक बात होती है, सारे के सारे निर्वाचित लोकतंत्र को खारिज कर देने का मामला अधिक खतरनाक था, और है। और अब आने वाला वक्त इस बात का गवाह रहेगा कि अन्ना की पार्टी किस तरह के लोगों को उम्मीदवार बनाकर किस तरह से चुनाव लड़ेगी। इसी तरह बाबा का आंदोलन भी भविष्य में यह इतिहास लिखेगा कि उनके हाथ का तिरंगा झंडा और उनके आंदोलन का ओम या रोम का नारा चुनाव में किस पार्टी के भ्रष्टाचार का विरोध करेगा और किस पार्टी के भ्रष्टाचार को अनदेखा करेगा।
दुनिया का इतिहास गवाह है कि बहुत से आंदोलन जाहिर तौर पर जहां निशाना लगाते दिखते हैं, उनका निशाना रहता कहीं और है। हर चुनाव में ऐसी अनगिनत सीटें होती हैं जहां पर किसी उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाने के लिए किसी ऐसे फर्जी उम्मीदवार को खड़ा किया जाता है जिससे कि नुकसान कहीं और पहुंचे। ऐसे में आज यह बात अच्छी हुई है कि रामदेव ने भ्रष्टाचार विरोध के अपने नारे में सबसे पहला वाक्य कांगे्रस को हराने का जोड़ दिया है। इसके साथ ही अब अन्ना और बाबा पहले के मुकाबले कुछ अधिक हद तक ईमानदार हैं। 

अपने जख्मों का प्रदर्शन, बेकसूर समाज को जख्म


12 अगस्त 2012
संपादकीय
मुंबई में कल मुस्लिम समाज की एक बड़ी भीड़ इक_ा हुई थी, असम और म्यांमार में मुस्लिमों पर हुई ज्यादती का विरोध करने के लिए। लेकिन वह हिंसक हो उठी और पुलिस-मीडिया पर हमलों में जुट गई, दो लोग मारे गए, बहुत से लोग घायल हुए, कुछ गाडिय़ां जलीं, और पुलिस के मुताबिक महिला पुलिस कर्मचारियों के साथ बदसलूकी भी हुई। जब पचीस-पचास हजार लोगों की भीड़ एक धर्म तले इक_ी होती है, तो उसका बेकाबू हो जाना इसलिए हैरानी की बात नहीं होती क्योंकि कोई भी धर्म तर्कों से परे होता है और वह अपने को लेकर सामने आई बातों पर इंसाफ के पैमाने खुद तय करता है। इसलिए कभी अयोध्या में एक ढांचे को मंदिर बताकर उस पर दावा किया जाता है, तो कभी उसे मस्जिद बताकर ढहा दिया जाता है, और धार्मिक भावनाओं को अदालत से, कानून से, संविधान से ऊपर बताया जाता है। इसी तरह दुनिया में कहीं भी जब सिखों पर हमले होते हैं, तो इसी मुंबई शहर में सड़कों पर उग्र विरोध सामने आते रहा है। अब यह सिलसिला थमा है क्योंकि कुछ बरस पहले जब तलवारें लेकर सड़कों पर इस समाज के लोग उतरे थे तो शिवसेना के बाल ठाकरे ने खुलकर उसके खिलाफ चेतावनी दी थी और कहा था कि मुंबई की सड़कों पर इस तरह का उत्पात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 
किसी भी जाति या धर्म के लोग अगर अपनी भावनाएं आहत होने पर इसी तरह के हिंसक प्रदर्शन करने लगेंगे तो मुंबई के कल जैसे हालात किसी भी जगह की जिंदगी को चौपट करके रख देंगे। और एक समाज की ऐसी हिंसा के खिलाफ दूसरा कोई समाज अपनी ताकत को दिखाना अपने अस्तित्व के लिए जरूरी भी मानने लगेगा। मुंबई लगातार एक साम्प्रदायिक तनाव के बीच जीने वाला शहर है। साम्प्रदायिकता से परे भी वहां पर स्थानीय निवासियों और दूसरे प्रदेशों से आकर बसे हुए लोगों के बीच तनातनी कभी-कभार होते रहती है। ऐसे में अगर म्यांमार और असम की मुस्लिम मौतों का विरोध करने के लिए ऐसा तनाव यहां खड़ा होगा तो इससे इस समाज के लोगों का कहीं भी भला नहीं होगा। दो ही दिन पहले की बात है, अमरीका के गुरूद्वारे में सिखों की हत्या के खिलाफ जब भारत के पंजाब में कुछ सिख संगठनों ने अमरीकी झंडे जलाना शुरू किए, तो अमरीका के सिखों ने इसका विरोध किया और कहा कि इससे अमरीका में बसे हुए सिखों के लिए और फजीहत खड़ी होगी। उन्होंने कहा कि अमरीका की सरकार इस हादसे की पूरी जांच कर रही है और उस पर कड़ी कार्रवाई भी कर रही है, इसलिए अमरीका के झंडे को यहां जलाना बेतुकी और आत्मघाती बात है। 
ठीक ऐसी ही बात म्यांमार और असम को लेकर है। इन जगहों पर मुस्लिमों के खिलाफ जो हिंसा हो रही है, उसे उठाने की जगहें कुछ अलग हैं। केंद्र सरकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट में इन मुद्दों को सही जगह पर उठाया जा सकता है, और वहीं उठाना भी चाहिए। कल मुंबई में रजा अकादमी नाम के एक मुस्लिम संगठन ने इस विरोध का आयोजन किया था और इसमें मौजूद भीड़ ने मीडिया की गाडिय़ों पर तब हमले किए जब एक भाषण में असम की मुस्लिम मौतों के कमजोर कवरेज का आरोप मीडिया पर लगाया गया। इसके बाद मीडिया, पुलिस और सार्वजनिक बसों को मिलाकर दर्जनों गाडिय़ां जलाई गईं। पुलिस का यह भी कहना है कि भीड़ ने पथराव के साथ-साथ, महिला कर्मचारियों से शारीरिक बदसलूकी की, और पुलिस के कई लोगों के सिर किसी चीज से मारकर घायल किए गए। यह सिलसिला किसी एक धर्म के एक संगठन के अस्तित्व के लिए तो अच्छा हो सकता है, लेकिन उस धर्म से जुड़े समाज का ऐसी हिंसा के बाद नुकसान छोड़ कुछ नहीं होता। भारत में मुस्लिम अकेले ऐसे नहीं हैं जो भीड़ की ऐसी हिंसा के साथ जुड़े हों। पिछले बरसों में राजस्थान से लेकर उत्तर भारत तक कुछ जातियों ने आरक्षण के लिए कई तरह की हिंसा की है, दूसरे धर्मों के लोगों ने भी समय-समय पर हिंसक प्रदर्शन किए हैं। ऐसे मामलों में कई बार सुप्रीम कोर्ट का यह रूख सामने आया है कि सार्वजनिक जीवन में तबाही लाने वाले लोग बख्शे नहीं जाने चाहिए और नुकसान की वीडियो रिकॉर्डिंग देखकर उन पर कार्रवाई करनी चाहिए। हमारा भी यही मानना है कि किसी जायज मुद्दे को लेकर ही जब ऐसे नाजायज और बेकाबू, हिंसक प्रदर्शन होते हैं, तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। कल मुंबई में पुलिस की कार्रवाई इसलिए शायद कुछ नरम थी क्योंकि मुस्लिम धर्म का एक बड़ा मौका, रमजान का महीना चल रहा है। पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले जब बिहार में एक माफिया सरगना मारा गया तो उनके समर्थकों के हिंसक प्रदर्शन पर सरकार ने इसीलिए कुछ नरमी बरती थी कि उन समर्थकों की भावनाएं आहत थीं, भड़की हुई थीं। मुंबई के मुस्लिम समाज की भावनाएं भी असम या म्यांमार को लेकर आहत हैं, लेकिन अपने जख्मों का प्रदर्शन करते हुए बेकसूर समाज को जख्म पहुंचाना जिम्मेदारी का काम नहीं है। मुंबई में इस हिंसा के सुबूत रिकॉर्ड हैं, और उन्हें देखकर सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। खुद मुस्लिम समाज के प्रमुख लोगों को ऐसी हिंसा के खिलाफ खुलकर बोलना चाहिए ताकि हिंसक प्रदर्शनों के खिलाफ एक जनमत तैयार हो सके। 

एक चोरी पकड़ी गई और आसमान से जमीन पर...


संपादकीय
11 अगस्त
अमरीका में भारतीय मूल के सबसे बड़े पत्रकार फरीद जकारिया एक बड़ी शर्मनाक बात में फंस गए हैं। दुनिया की सबसे प्रमुख समाचार पत्रिका टाईम में उनके कॉलम, और सीएनएन समाचार चैनल पर उनके खास कार्यक्रम को निलंबित कर दिया गया है। उन्होंने अपने एक कॉलम में कुछ बरस पहले के एक लेख के बहुत से हिस्से, ज्यों के त्यों चोरी करके छाप लिए, और यह बात उन्हें पढऩे और देखने-सुनने वालों को सदमा पहुंचाने वाली थी। उन्होंने इसे अपनी गलती बताते हुए इसके लिए माफी मांगी है। मीडिया ने यह चोरी पूरे खुलासे से आ गई है और यह बात सदमा पहुंचाने वाली है कि इतना बड़ा एक पत्रकार अपने एक कॉलम के लिए पहले से एक बड़ी पत्रिका में छपे हुए लेख के इतने सारे हिस्से कैसे चुरा सकता है? 
फरीद जकारिया की अहमियत उनके अपनी काम की वजह से भी थी, और पिछले बरसों में अमरीका के भीतर अमरीकी समझ वाले एक बड़े मुस्लिम पत्रकार होने की वजह से भी थी। उनकी कही हुई बात, उनकी लिखी हुई बात एक मुस्लिम पत्रकार के रूप में भी देखी जाती थी, चाहे उनके मजहब का उनके कहे-लिखे से कोई लेना-देना रहा हो, या न रहा हो। मुस्लिम देशों पर अपने हमलों के चलते हुए अमरीका को इस किस्म की एक जरूरत भी थी कि वहां के कुछ प्रमुख मुस्लिम समाज के सामने अपनी बात रख सकें। पाठकों की जानकारी के लिए फरीद जकारिया भारत के एक राजनेता और इस्लामिक विषयों के विद्वान रफीक जकारिया के बेटे हैं और भारत के स्वंत्रता आंदोलन में भी ये सक्रिय रहे। भारत के मामलों पर उनकी कोई डेढ़ दर्जन किताबें बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। फरीद जकारिया की मां फातिमा जकारिया भी भारत में टाईम्स ऑफ इंडिया में अखबारनवीस रही हैं। फरीद जकारिया की भी लिखी हुई कई किताबें अमरीका में, और वहां से बाहर भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। 
आज यहां लिखने का मकसद, एक ऐसे पत्रकार के बारे में लिखना नहीं है जिसका भारत के लोगों के लिए सीधा-सीधा कोई महत्व नहीं है। बल्कि इस हादसे के बारे में लिखना है जिसने आसमान से उखाड़कर एक बहुत कामयाब नौजवान को जमीन पर पटक दिया। इस मामले से एक यह सबक लेने की जरूरत रहती है कि एक गलती किसी पर कितनी भारी पड़ सकती है। आज का जमाना कम्प्यूटर, इंटरनेट और तरह-तरह की इंटरनेट-खोज का है। लोग की बात की बात में किसी भी तरह की चोरी को पकड़ लेते हैं। हमारे ही दफ्तर में बहुत से लोग हिन्दी या अंग्रेजी में छपने के लिए अपना लिखा बताते हुए भेजते हैं, और उसके कुछ खास शब्दों से यह तलाश लेना मुश्किल नहीं होता कि वह पहले छप चुका है या नहीं। जब तक कोई चीज इंटरनेट पर नहीं आती, तभी तक वह नकल की जा सकती है। टेक्नालॉजी के इसी खतरे को देखते हुए ओसामा-बिन-लादेन ने फरारी के अपने एक पूरे दशक में फोन या इंटरनेट का इस्तेमाल ही शायद नहीं किया था।
लेकिन टेक्नालॉजी से परे यह बात भी समझने की जरूरत है कि वक्ती तौर पर वाहवाही पाने के लिए अगर कोई चोरी करके अपने नाम से कुछ छपवाते हैं, या फिल्म-कला का कोई काम करते हैं, तो उनके इस गलत काम से उनका पहले का किया हुआ सारा मौलिक काम, बिना चोरी का काम भी इज्जत खो बैठता है। इस बात को अपने बच्चों को बचपन से ही बताने की जरूरत है क्योंकि आजकल पढ़ाई-लिखाई से लेकर स्कूल के प्रोजेक्ट तक लोगों में चुराकर रख देने की सहूलियत बढ़ती जा रही है। ऐसे में कट एंड पेस्ट कहे जाने वाले आसान काम का इस्तेमाल स्कूल की क्राफ्ट फाईल से लेकर पीएचडी की थीसिस तक धड़ल्ले से होता है। लेकिन ऐसी ही चोरी का शक होने पर उसमें से कुछ शब्दों को उठाकर अगर सर्च किया जाए तो इंटरनेट पल भर में बता देता है कि चोरी कहां से हुई। 
यह बात भी मायने रखती है कि जो लोग मौलिक लिखने, या मौलिक काम करने  के बजाय चोरी में जुट जाते हैं, धीरे-धीरे उनका दिमाग और उनकी कल्पना शक्ति काम करना कम कर देते हैं। यह कुदरत का किया हुआ इंतजाम है कि इंसानी शरीर में जिन चीजों का इस्तेमाल कम रह जाता है, कुदरत उसे धीरे-धीरे घटाते चलती है। इसलिए आज इस मुद्दे पर लिखना हम महत्वपूर्ण समझ रहे हैं कि चोरी से बचने में ही समझदारी है, क्योंकि चोरी का छुपना अब नामुमकिन है। और पकड़े जाने पर आसमान से सीधे जमीन पर पटके जाते हैं। 


चचा की बात पर चर्चा


10 अगस्त 2012
संपादकीय
उत्तर प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव फिर से विवादों में हैं। एटा में एक सरकारी बैठक में अफसरों से कहा, अगर आप मेहनत करोगे तो थोड़ी बहुत चोरी कर सकते हैं। अगर मेहनत करोगे, बुद्धि लगाओगे, अगर इन्हें मीठा पानी दोगे तो चोरी कर सकते हो। शिवपाल की इस सलाह से अधिकारी भौंचक्के रह गए। बाद में शिवपाल सिंह ने यह खबर फैल जाने पर कहा कि मीडिया ने उनकी बैठक में घुसपैठ की। शिवपाल सिंह मुलायम सिंह के भाई हैं और मुख्यमंत्री अखिलेश के चाचा हैं।  दरअसल यह पहला मौका नहीं है कि भारत के किसी राज्य में मंत्री ने अफसरों से थोड़े बहुत भ्रष्टाचार के साथ भी काम करने को कहा है। इस बात में शायद भ्रष्टाचार करने को नहीं कहा गया है, काम करने को कहा गया है, और उसके उत्साह के लिए भ्रष्टाचार को अनदेखा करने जैसी एक बात दिखती है। 
सरकार को अगर करीब से देखें तो ऐसी बात आम चर्चा में रहती है कि कोई अफसर या कोई मंत्री बेईमानी करने के बाद भी काम को फुर्ती से करते हैं और उससे जनता का भला होता है, जबकि बहुत से अफसर या मंत्री ईमानदारी बरतने की कोशिश में काम करने से बचते हैं और काम हो ही नहीं पाता। एक बहुत छोटा तबका ऐसे अफसरों और मंत्रियों का भी रहता है जो कि ईमानदार भी रहते हैं और सावधानी के साथ-साथ तेजी से फैसले भी लेते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों का बजट भारत में इतना अधिक होता है कि उसमें बेईमानी करने वालों के कमाने-खाने के बाद भी सरकारी कामकाज के लिए बहुत सी रकम रहती है। बहुत से काम सबसे गरीब और कमजोर तबके के फायदे के रहते हैं, और वह बजट अगर समय पर खर्च नहीं होता तो फिर यह तबका जिंदगी का वह अरसा उस फायदे के बिना ही गुजार देता है। इसी तरह सरकार की कई योजनाएं आर्थिक-चक्र को आगे बढ़ाने वाली होती हैं, और उन पर काम न होने से देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था उतनी रफ्तार नहीं पकड़ पाती जितनी कि मुमकिन होती है। 
आज का वक्त सूचना के अधिकार, जनहित याचिका, लोकायुक्त और तरह-तरह की दूसरी शिकायतों और जांच का है। नतीजा यह है कि किसी भी किस्म के सरकारी काम में जिम्मेदार लोग फूंक-फूंककर कदम रखते हैं। खासकर ईमानदार लोग अधिक चौकन्ने रहते हैं क्योंकि उनकी किसी कमाई की नीयत नहीं रहती, और काम में कोई चूक हो जाने पर जानबख्शी की गुंजाइश भी नहीं रहती। बहुत से अच्छे अफसरों का यह मानना रहता है कि सरकार के लिए अच्छा कितना भी करें, उससे कोई भला नहीं होता, लेकिन अगर एक गलती हो जाए तो कानून उसे गलती न मानकर गलत काम मानता है और फिर उससे बचने का कोई रास्ता नहीं होता। इसलिए ऐसे अधिकारी और मंत्री कम रहते हैं जो पूरी सावधानी के साथ-साथ तेजी और ईमानदारी से काम करें। लेकिन ऐसी भी बात नहीं है कि यह मुमकिन ही नहीं होता। जो लोग ऐसा करना चाहते हैं वे इसके रास्ते भी निकाल लेते हैं। 
सरकार को करीब से देखते हुए जो एक बात बहुत सी जगहों पर सामने आती है वह ईमानदारी को एक मुश्किल खूबी बनाती है और काम होने में वह एक खामी की तरह रोड़ा भी बन जाती है। केंद्र सरकार से राज्य की योजनाओं के लिए जो हजारों करोड़ का बजट आता है, उसमें भी कहीं-कहीं राज्य से कुछ ठेकेदारों को भेजकर कमीशन देना होता है और तब वह रकम जारी होती है। यह सिलसिला कुछ उसी तरह का है कि सरकार की हर कुर्सी कुछ-कुछ रखते चलती है और नीचे की किसी कुर्सी पर कोई ईमानदार भी बैठे हैं तो भी उनको इस बेईमानी को कहीं न कहीं अनदेखा करना पड़ता है। इसलिए जो बात उत्तरप्रदेश के सत्तारूढ़ कुनबे ने सरकारी मीटिंग में कही है, उसे सरकार से वास्ता पडऩे वाले बहुत से लोग सही मानते हैं, और ऐसा सोचते हैं कि ऐसे प्रोत्साहन के बिना सरकार के काम की रफ्तार मंदी रहती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि भ्रष्टाचार किसी एक सीमा तक कानूनी बना देना चाहिए ताकि काम समय पर और तेजी से हो सकें। सरकारी अस्पतालों में इलाज से मिलने वाली फीस के एक हिस्से को डॉक्टरों और बाकी अस्पताल-कर्मचारियों में बांटने का एक फार्मूला सरकार ने बनाकर छत्तीसगढ़ में घोषित भी किया है। उत्पादकता-बोनस की तरह अगर कोई फार्मूला सरकार के सभी विभागों के लिए निकाला जा सकता है, तो उसे भी कुछ लोग ठीक मानेंगे। हमारी अभी तक की समझ इसके नफे-नुकसान का अंदाज नहीं लगा सकती, इसलिए हम इस चर्चा को छेड़ भर रहे हैं।

हिंदुस्तानी-तालिबानी हौसले और समाज-सरकार की चुप्पी


9 अगस्त 2012
संपादकीय
पाकिस्तान में सम्पत्ति विवाद के चलते एक महिला पर चाकू से हमला कर उस पर तेजाब फेंक दिया गया। इधर भारत के झारखण्ड की राजधानी रांची में कुछ जगहों पर धमकी भरे पोस्टरों में लड़कियों के जीन्स पहनने पर पाबंदी के साथ ओढनी लेकर चलने का फरमान जारी किया गया है। धमकी दी गई है कि अगर जींस पहनी लड़की दिखी तो उस पर तेजाब फेंक दिया जाएगा। भारत, नेपाल, बंाग्लादेश, अफगानिस्तान और कम्बोडिया के साथ ही पाकिस्तान महिलाओं पर तेजाब फेंकने की घटनाओं के लिए दुनिया भर में बदनाम है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनियाभर के 20 देशों में साल भर में कोई 1500 लोगों पर तेजाब फेंका जाता है इनके शिकारों में  80 फीसदी महिलाएं होती हैं।  
इन खबरों से दिल दहलने की कई वजहें हैं। उत्तरप्रदेश के एक छोटे हिस्से से अभी लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि वहां की पंचायतें, पंचायतों के तहत लड़कियों और महिलाओं की अलग बैठक, यह तय कर रही हैं कि लड़कियां जींस नहीं पहनेंगी, मोबाईल फोन का इस्तेमाल नहीं करेंगी, अकेले बाजार नहीं जाएंगी। यह रूख सिर्फ खबरों के लायक है या फिर उत्तर-भारत में पे्रम की हत्या करने वाले हरियाणा के लोगों की तरह असल में हिंसक भी हो जाएगा, यह कहना मुश्किल है। लेकिन जब इसे अधिक पढ़े-लिखे और अधिक विकसित कर्नाटक के साथ जोड़कर देखें तो लगता है कि धर्मांध और कट्टरपंथी ताकतें एक तथाकथित भारतीय संस्कृति की शुद्धता और पवित्रता के नाम पर जिस तरह के हमले वहां की नौजवान पीढ़ी पर कर रही हैं, अगर यह दीवानगी आगे बढ़ी और तेजाब फेंकने का सिलसिला यहां शुरू हुआ, तो समाज में ऐसे हमलों से बचाव कैसे हो सकेगा? हर किसी के पीछे हिफाजत के लिए पुलिस को तो लगाया भी नहीं जा सकेगा। 
इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी बात अभी चार दिन पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में फेंडशिप-डे पर सामने आई। शहर के बाग-बगीचों में सुबह से पुलिस तैनात हो गई थी, गेट को बंद कर दिया गया था और पेड़ों के बीच इस तरह से सिपाही खड़े होकर चारों तरफ निगरानी कर रहे थे कि कोई कीट-पतंग भी उस दिन दोस्ती या पे्रम का इजहार न कर सके। यह खबर और इसकी तस्वीरें आई-गई हो गईं, यह चर्चा समाज में नहीं छिड़ी कि दोस्ती रखने वाले लड़के-लड़कियों को बगीचे में घुसने से रोकना सरकार की जिम्मेदारी है, या उन पर हमला करने के लिए घूमने वाले गुंडों को रोकना? जब सरकार की सोच नफरत के बजाय पे्रम को, दुश्मनी के बजाय दोस्ती को रोकने की हो जाए, और समाज को यह खतरा समझ ही न आए, तो समाज खतरे में है। बात तेजाब तक सीधे नहीं पहुंचती। बात छोटी हिंसा से शुरू होती है और बड़ी हिंसा तक पहुंचती है। जो लोग आज लड़के-लड़कियों के सार्वजनिक बाग-बगीचों में घुसने पर भी बंदिश लगवाने में कामयाब हो गए हैं, वे लोग कल दूसरे किस्म की बंदिशों के लिए इससे अधिक हिंसा करने लगेंगे। 
छत्तीसगढ़ की पुलिस की सोच दिल्ली की पुलिस की सोच से बहुत अलग नहीं है। वहां पर जब बलात्कार की वारदातें एकदम से बढ़ीं तो पुलिस के एक आला अफसर ने बयान दिया कि रात में महिलाएं अकेले न निकलें, परिवार के किसी पुरूष के साथ ही निकलें, वे अपने कपड़ों पर भी ध्यान दें कि वे उत्तेजक न हों। जहां पर रोक लगाने की जरूरत गुंडों के लिए है, वहां पर देश की राजधानी और देश के दूसरे नंबर के सबसे बड़े महानगर में रात तक काम करने वाली दसियों लाख महिलाओं पर बंदिशों की सलाह दी जा रही है। 
जब समाज मुर्दा होने लगता है तो सामाजिक सिद्धांत भी सरकारी अफसर तय करने लगते हैं। और जब इस हक के चले जाने की समझ भी समाज को नहीं रहती, तो वह हांककर कहीं भी ले जाने वाले रेवड़ की तरह का हो जाता है। आज जब तक किसी जाति, धर्म, पेशे या ऐसे ही किसी तबके से जुड़ी हुई बात न हो, भारतीय समाज के लोग किसी भी मुद्दे पर न विचार-विमर्श करते और न ही उसे लेकर एक सार्वजनिक-सामाजिक आंदोलन छिड़ पाता। जो बहुत ही राजनीतिक मुद्दे हैं, उनसे परे सामाजिक मुद्दे अब मानो एकदम महत्वहीन मान लिए गए हैं और उन्हें थानेदारों के भरोसे छोड़ दिया गया है। 
भारत में समाज के अपनी आजादी से जीने के हक को अगर तेजाब से जलाने की तालिबानी कोशिश हो रही है, और उस पर सरकार और समाज की सेहत पर अधिक फर्क नहीं पड़ रहा है, तो फिर इस देश को तेजाब से हुए जख्मों के इलाज के लिए जगह-जगह अस्पताल बनाना शुरू कर देना चाहिए।

गरीब देश में महंगी प्रतिमाओं की हिफाजत कौन करेगा?


8 अगस्त 2012
संपादकीय
तमिलनाडु में अभी देश के दलितों के एक सबसे बड़े आदर्श और देश के एक सबसे महान नेता डॉ. भीमराव बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा का सिर कुछ लोगोंं ने तोड़ दिया और साथ-साथ एक स्थानीय दलित नेता की प्रतिमा को भी ऐसा ही नुकसान पहुंचाया। उत्तरप्रदेश में पिछले कुछ हफ्तों से मायावती की प्रतिमाएं तोड़ी जा रही हैं, और ऐसा करने वाला कम से कम एक नौजवान ऐसा है जिसने गिरफ्तारी के अदालत में यह तर्क दिया है कि मायावती की प्रतिमाएं जनता के पैसों से बर्बादी करके बनी थीं, इसलिए उसने उन्हें तोड़ा है।
प्रतिमाओं को तोडऩे और उन्हें नुकसान पहुंचाने का सिलसिला नया नहीं है। गांधी की प्रतिमाएं भी जगह-जगह खराब की जाती हैं, और कभी-कभी कोई शराबी किसी प्रतिमा से तलवार लेकर भी चले जाता है जिसे लेकर तनाव खड़ा हो जाता है। प्रतिमाओं का पूरा सिलसिला गलत है। हमारे हिसाब से देश, प्रदेश या शहर की किसी एक सुरक्षित जगह पर किसी बड़े नेता की एक प्रतिमा लगा दी जाए, तो उसे बहुत मानना चाहिए। आम तौर पर यह भी होना चाहिए कि इसके लिए जनता के बीच से पैसे इक_े किए जाएं, ताकि जनता का ऐसे बुतों से लगाव भी रहे, और उस पर मायावती की तरह सरकारी पैसे बर्बाद भी न हों। उत्तरप्रदेश में जिस हिंसक अश्लीलता के साथ मायावती ने अपनी और दूसरे दलित नेताओं की प्रतिमाएं सैकड़ों करोड़ खर्च करके स्मारकों के साथ खड़ी करवाई हैं, वह दलित-न्याय के नाम पर एक अलग किस्म की ज्यादती रही है। आज मायावती जितने किस्म के अदालती मामलों में फंसी हुई हैं, उनके फैसले के बाद अगर उनको जेल होती है तो जनता के पैसों से लगी हुई ऐसी प्रतिमाओं को क्या एक सजायाफ्ता मुजरिम की प्रतिमाओं की तरह लगे रहने दिया जाएगा? या फिर सरकारी पैसों से इन प्रतिमाओं के इर्दगिर्द जेल के दरवाजे की तरह की सलाखें और लगा दी जाएंगी? 
भारत जिस तरह के दौर से गुजर रहा है, उसमें सत्ता की राजनीति से जुड़े हुए लोगों के मर जाने के दस-बीस बरस बाद ही उनके बुत लगाने चाहिए, ताकि यह पुख्ता भरोसा हो जाए कि अपनी जिंदगी में उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। जिनके जीते-जी उनके कामकाज और उनके चाल-चलन से लोगों के मन में कोई इज्जत पैदा न हो, उनकी प्रतिमाएं जनता के पैसों से बनवाने में न्यायसंगत क्या है? जिस किसी को अपने आदर्श, अपने नेता या अपने खुद के बुत बनवाने और लगवाने का शौक हो, उनको यह भी सोचना चाहिए कि वैचारिक विविधता वाले इस देश में उन बुतों पर हमला करने की बात भी कुछ लोग सोचेंगे, और सरकारें क्या इन्हीं की हिफाजत करती रहेगी? जिनको अपने नाम को अमर करना हो, या किसी और के नाम को अमर करना हो, उनके नाम पर सच में ही समाज के काम के अस्पताल या स्कूल शुरू करने चाहिए ताकि उस लागत का इस्तेमाल हो सके। आज जहां जिसकी सत्ता होती है, वे अपनी विचारधारा के लोगों की मूर्तियां चौराहों पर लगवाने लगते हैं।  यह काम करने के बजाय उनको उस विचारधारा के विस्तार के लिए कोई दूसरा काम करना चाहिए। लोगों को मूर्तियां लगवाने का तो शौक होता है, लेकिन फिर वे प्रतिमाएं बिना तोड़-फोड़ के भी, मौसम की मार से जर्जर हो जाती हैं, और उनके आसपास कहीं घूरा इक_ा हो जाता है, तो कहीं जानवरों का डेरा बन जाता है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि किस तरह देश-प्रदेश में किसी एक ताकतवर नेता के कुनबे के बुत हर शहर में कई-कई जगह लग जाते हैं, जो कि उनका सम्मान बढ़ा सकें या नहीं, दूसरे नेताओं को सम्मान से परे रख देते हैं।
इस गरीब देश में जहां कैदियों को जेल से अदालत तक ले जाने के लिए भी पुलिस कम पड़ती है और मामले झेलते कमजोर लोग संभावित सजा से ही अधिक वक्त अदालत के इंतजार में जेल में गुजार देते हैं, उस देश में मूर्तियों को बचाने के लिए, और तोड़-फोड़ करने वालों को पकडऩे के लिए अगर पुलिस लगती रहेगी तो यह सिरे से बेवकूफी की बात होगी। किसी भी प्रतिमा को लगाते समय उसकी हिफाजत, उसकी लागत, सड़क पर उससे दिक्कत जैसी बातें तो सोच ही लेनी चाहिए, यह भी सोच लेना चाहिए कि आगे किसी डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट से प्रतिमा को तोडऩे की नौबत न आ जाए, या प्रतिमा के बगल में बच्चे की प्रतिमा और जोडऩे की नौबत न आ जाए। 

5 aug 2012







नफरत के नतीजे


संपादकीय
7 अगस्त
अमरीका के एक गुरुद्वारे में जिस तरह एक गोरे अमरीकी ने पहुंचकर अंधाधुंध गोलियां चलाकर बहुत से लोगों को मार डाला, उससे हिन्दुस्तान तो विचलित है ही, खुद अमरीका इससे सदमे में है। अमरीकी राष्ट्रपति ने वहां राष्ट्रध्वज आधा झुकाने का आदेश दिया है, और ऐसा भारत में भी नस्लीय हिंसाओं के बाद कभी हुआ याद नहीं पड़ता। अमरीका की फिक्र यह है कि वहां हर नागरिक को बहुत से हथियार खरीदने के हक हासिल हैं, और तरह-तरह की राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा की आजादी के चलते वहां कुरान को जलाना भी जुर्म नहीं माना जाता, और नफरत के कई किस्म के आंदोलन भी चलते रहते हैं। यह हत्यारा भी नवनाजीवादी बताया जा रहा है जो कि नस्ल के आधार पर दूसरों से नफरत करने वाले हिटलर की मानस संतानें मानी जाती हैं। वहां पर गोरे लोगों के प्रभुत्व के लिए जो आंदोलन चलते हैं, वे अश्वेत समुदाय के खिलाफ, गैरईसाईयों के खिलाफ बहुत किस्म से हिंसा करते हैं, और हाल के बरसों में ही कानून उन पर वहां कड़ाई कर पाया है। यह हत्यारा न्यूयॉर्क में विश्व व्यापार केन्द्र पर ओसामा बिन लादेन के विमानों के हमले के वक्त से नफरत की बातें करते आया था, और ऐसे ही एक गोरे संगीत समूह में वह सक्रिय भी था। विचारों की आजादी के चलते वहां पर नफरत की संभावना इतनी बढ़ जाती है, कि सार्वजनिक प्रदर्शन भी लगातार दिखते रहता है। और यह नस्लीय नफरत इस हत्याकांड में सिखों के खिलाफ क्यों तब्दील हुई यह तो आने वाले दिनों में पता लगेगा, क्योंकि यह हत्यारा अपने शरीर पर 11 सितंबर के आतंकी हमले को लेकर गुदने गुदवाया हुआ था। अपनी सारी आधुनिक पढ़ाई-लिखाई के बावजूद अमरीका में गुरुद्वारे पर हमले के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया इंटरनेट पर, टेलीविजन चैनलों पर देखने मिली, उससे भी दुनिया के जागरूक लोग सदमे में हैं क्योंकि वहां यह माना गया कि मुसलमानों के धोखे में सिख नाहक मारे गए। लोगों का रूख कुछ ऐसा था कि मानो मुसलमान मारे जाते तो वह ठीक होता।

अमरीका में अश्वेत लोगों से नफरत के ऐसे हिंसक आंदोलन, भारत में किसी धर्म के लोगों से नफरत, या मिसाल के तौर पर हिन्दू धर्म के भीतर दलितों से नफरत जैसे ही हैं। जिस नस्लीय नफरत के चलते गांधी को मारा गया, हिन्दुस्तान में दंगे हुए, दलितों को आज भी तकरीबन हर हफ्ते हिन्दुस्तान के किसी न किसी हिस्से में मारा जाता है, इन सब के पीछे की जो सोच है, वही सोच हिटलर की थी जिसने दस लाख से अधिक यहूदियों को उनकी नस्ल की वजह से मारा था। ऐसी ही नफरत के चलते आज भी भारत का हिन्दू समाज अपने भीतर के दलितों को बड़ी संख्या में खो चुका है और वे बौद्ध बन गए हैं, या कोई दूसरा धर्म मान चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई से ऐसी नफरत अगर कम होती तो फिर अमरीका में तो इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि वह तो एक पढ़ा-लिखा देश है। लेकिन पढ़ाई-लिखाई किसी को एक बेहतर इंसान नहीं बनाती। पढ़ाई किसी को एक कामयाब बना सकती है, संपन्न बना सकती है, लेकिन जिन्हें इंसानी खूबियां कहा जाता है, वे अगर पढ़ाई से आ जातीं, तो हिन्दुस्तान में डॉक्टर और प्रोफेसर जैसे लोग नफरत की आग फैलाने में उत्तरप्रदेश से लेकर गुजरात तक ओवरटाईम क्यों करते रहते? 
इस तरह की हालत को पैदा करने के पीछे अमरीका की सरकार और वहां का कारोबार, दोनों कुछ या अधिक हद तक जिम्मेदार हैं ही। अमरीका के अनगिनत कारोबार हिटलर की मदद करने के जिम्मेदार रहे हैं। इसकी एक लंबी फेहरिस्त खाता-बही सहित इतिहास में दर्ज है। और राजनीतिक रूप से जागरूक लोग आज भी कुछ बहुत कामयाब फैशन ब्रांड इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि वे हिटलर के हिस्से रहे हुए हैं। अमरीका ने तेल की अपनी प्यास के चलते हुए, फौजी ठिकानों को दुनिया के हर हिस्सों में कायम करने की हसरत के चलते हुए, साम्यवादी विचारधारा को खत्म करने के लिए जिस तरह से दुनिया के मुस्लिम देशों पर लगातार हमले किए, आज भी जिस तरह से वह हमले जारी रख रहा है, उसके चलते भी उसका जवाबी हमला कुछ मुस्लिमों की तरफ से दिया जाता है, और ऐसे जवाबी हमलों के जवाब में अमरीका के या दुनिया के दूसरे गोरे देशों के बहुत हिंसक नस्लवादी गिरोह हमले करना अपना हक समझते हैं। यह सिलसिला रातोंरात थम भी नहीं सकता। अमरीका का झंडा एक दिन अगर आधा झुक जाएगा तो भी उससे दुनिया की तस्वीर नहीं बदल जाएगी और नफरत का इतिहास नफरत का भविष्य बनने से भी अचानक नहीं थम जाएगा। भारत में ही हम देखते हैं कि 1984 के सिख विरोधी दंगे चाहे किसी एक नस्ल की तरफ से नहीं किए गए थे, और कांग्रेस के लोगों ने उसको हवा दी थी, आज तक वे जख्म सिख समुदाय के भीतर रिसते ही रहते हैं। इसलिए अमरीका को अपनी सोच सुधारनी होगी, ठीक उसी तरह जैसे कि भारत के भीतर कांग्रेस के नेताओं और प्रधानमंत्रियों को बार-बार सिख समुदाय से माफी मांगनी पड़ती है। इन दो हालात के बीच सीधी-सीधी कोई तुलना करना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन हम नफरत के इस सिलसिले पर बात करते हुए 1984 के कत्लों को, या 2002 के गुजरात के नस्लीय कत्लेआम को भूल नहीं सकते। जो विचारधाराएं किसी भी देश या प्रदेश में राज करती हैं, वे जब तक नफरत से दूर नहीं होंगी, नफरत दूर तक फैलेगी और किसी बूमरैंग की तरह लौटकर चोट भी करेगी।