अभूतपूर्व कोरोना और जड़ों से कटा प्रशासन

  छत्तीसगढ़ में अंधाधुंध रफ्तार से कोरोना बढ़ रहा है वह लोगों के लिए तो फिक्र की बात है ही, लेकिन वह शासन और प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती भी है। केंद्र सरकार जिस रफ्तार से कोरोना के टीके उपलब्ध करा पा रही है उसका अधिकतम इस्तेमाल छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हो भी रहा है। लेकिन पहले टीके के बाद दूसरा टीका लगना और उसके बाद एक पखवाड़े और गुजर जाने पर ही यह उम्मीद की जा सकती है कि उसका असर शुरू होगा। टीका बनाने वाले वैज्ञानिकों का भी यह निष्कर्ष है कि करीब 70 फीसदी लोगों में ही टीके का असर होगा। अभी यह भी साफ नहीं है कि यह असर कितने महीने रहेगा, लेकिन दुनिया के दवा उद्योग के सरगनाओं का यह मानना है, और दबी जुबान से यह कहना भी है, कि इसे हर बरस लगाने की जरूरत पड़ सकती है। 

हिंदुस्तान जैसा देश, या छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इस पूरे खर्च को कहां से उठा सकेंगे यह एक रहस्य की बात है। लेकिन दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि शासन और प्रशासन अपने स्तर पर इस संक्रामक रोग के फैलाव को रोकने के लिए क्या कर सकते हैं? अभी प्रशासन अपने एक सदी पुराने परंपरागत तौर-तरीकों से इसे रोकने की कोशिश कर रहा है और कहीं रात का कफ्र्यू लगाया जा रहा है तो कहीं लॉकडाउन किया जा रहा है। यह समझने की जरूरत है कि ऐसी तरकीबों से कोरोना को महज कुछ दिन आगे खिसकाया भर जा सकता है, उसे रोका नहीं जा सकता, उसे खत्म तो बिल्कुल ही नहीं किया जा सकता। 

जिस राज्य छत्तीसगढ़ को हम बहुत करीब से देखते आ रहे हैं उसमें राज्य बनने के बाद से एक बड़ा फर्क बड़ा दिखता है। और यह फर्क एक हिसाब से कोरोना की रोकथाम में भी आड़े आ रहा है। छत्तीसगढ़ में अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त के बड़े-बड़े जिले काट-काटकर छोटे कर दिए गए हैं, और उस वक्त के एक-एक कलेक्टर एसपी के काम के इलाके अब चार-पांच जिलों में भी बंट गए हैं। मतलब यह कि वे अफसर उसी कुर्सी पर बैठे-बैठे पहले से कम काम करते हैं, लेकिन वे लोगों को पहले के मुकाबले और भी कम हासिल हैं। एक वक्त था जब अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल थी, और छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा अफसर किसी एक संभाग का कमिश्नर होता था। अब राजधानी रायपुर में आ गई तो मुख्यमंत्री पिछले 20 बरस से इसी शहर में रहते हैं। छोटे-छोटे जिलों के कलेक्टर पूरे वक्त उनके प्रति जवाबदेही के साथ फोन पर रहते हैं। जिस वक्त आज के चार-पांच जिलों के इलाके के अकेले कलेक्टर रहते थे उस वक्त भी वे आम जनता को अधिक हासिल रहते थे, उनका जनता के साथ संपर्क अधिक बड़ा रहता था, अधिक गहरा रहता था, लेकिन हाल के इन दो दशकों में छत्तीसगढ़ के कलेक्टर और एसपी जैसे, इलाकों के अफसर लोगों से धीरे-धीरे कटते चले गए हैं और वह धीरे-धीरे सूरजमुखी के फूलों की तरह सत्ता की ओर चेहरा किए हुए अकेले उसी के प्रति जवाबदेह रह गए हैं। नतीजा यह हुआ है कि जनता के बीच उनकी जो पैठ रहनी चाहिए थी, वह पूरी तरह खत्म हो गई है, और शायद ही कोई ऐसे कलेक्टर-एसपी रह गए हैं जो कि जनता के बीच अधिक उठते-बैठते हैं। अगर कुछ ऐसे अफसर हैं भी, तो जाहिर तौर पर उनको अपने इलाकों में बेहतर काम करने में जनसहयोग का फायदा मिलता है। प्रशासन के काम का एक बड़ा हिस्सा लोगों से संपर्क का रहना चाहिए ताकि किसी आपदा के वक्त, विपदा के वक्त, या किसी भी चुनौती के वक्त एक अफसर भी अपने स्तर पर लोगों के बीच अपनी साख से भरोसा पैदा कर सके। आज हालत यह है कि मैदानों में काम करने वाले अफसरों के लोगों से संपर्क खत्म हो गए हैं, और उनकी कही बात का कोई असर भी नहीं रह गया है। वे लोगों से बात नहीं कर सकते, वे उन्हें आदेश दे सकते हैं, जो कि लोकतंत्र में एक आखिरी रास्ता रहना चाहिए। 

जहां तक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का सवाल है, उनका भी हाल पूरी तरह से चुनाव केंद्रित और सत्ता केंद्रित होकर रह गया है। आज कोरोना को देखते हुए जनता को जो सावधानी बरतनी चाहिए थी, वह सावधानी केवल प्रशासन के आदेश से लादी जा सक रही है, कोई ऐसे स्थानीय नेता नहीं दिखते जो कि खुद होकर शहर की सड़कों पर निकल पड़ें और जिनकी बात मानकर भीड़ छंट जाए, लोग वक्त पर दुकानें बंद करने लगें। छत्तीसगढ़ की राजधानी वाला यह शहर रायपुर गवाह है कि एक वक्त यहां पर एक एडीएम और एक सीएसपी हुआ करते थे, और वे अपने स्तर पर आंदोलनों से भी निपट लेते थे, म्युनिसिपल के अवैध कब्जा विरोधी अभियान को भी चला लेते थे। अभी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सम्पादकों से ऑनलाइन बातचीत की तो उन्होंने खुद कहा कि वे लॉकडाउन के खिलाफ हैं, लेकिन जनता इससे कम किसी बात पर नियम-निर्देश मानने को तैयार नहीं है। 

यह जिम्मेदारी प्रशासन की नहीं है, यह शासन की जिम्मेदारी है कि जिलों के प्रशासन, जिलों की पुलिस को एक बार फिर जनता से जोड़ा जाए। कायदे की बात तो यह है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और दूसरे राजनीतिक दलों, सामाजिक नेताओं को भी यह काम करना चाहिए, लेकिन पूरा प्रदेश यही सूरजमुखी के खेतों सरीखा होकर रह गया है। एक बार फिर प्रशासन को जनता से जोडऩे की जरूरत है, और इसके ठोस रास्ते निकाले जाने चाहिए। न सिर्फ प्रशासन बल्कि आज के शासन में भी कुछ स्तरों पर यह कमी आ गई है जिससे न तो अफसरों या मंत्रियों तक जनता की दिक्कतों और सुझावों की बात पहुंच पाती, न ही जनता की सोच का राज्य के शासन-प्रशासन में कोई फायदा मिल पाता मिल पाता। छत्तीसगढ़ एक बड़े राज्य का छोटा सा हिस्सा रहने के बाद अपने आपमें एक राज्य तो बन गया, लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त उसका शासन-प्रशासन जनता से जितना जुड़ा हुआ था, वह अब नहीं रह गया। आज कोरोना के संक्रमण को रोकने की बात हो, कोरोना मौतों की बात हो, कोरोना वायरस के टीके की बात हो, इन सबमें जनता के बीच प्रशासन के संपर्क कम होने का नुकसान हो रहा है। यह जरूर है कि कुछ प्रमुख संगठनों के नेताओं से बंद कमरे की बैठक के बाद उनसे शासन को आइसोलेशन केंद्र बनाने में मदद मिली है, लेकिन संगठनों के पदाधिकारियों से परे आम जनता के बीच शासन और प्रशासन की सीधी पहुंच साफ-साफ घटी हुई दिखती है। इस निष्कर्ष के खिलाफ शासन और प्रशासन के लोग बहुत सी मिसालें दे सकते हैं, लेकिन उन्हें बंद कमरे में आत्ममंथन करना चाहिए कि आज जनता के बीच उनका कितना उठना-बैठना रह गया है, और अपने ही इलाके की जनता को हालात की गंभीरता समझाने के लिए पुलिस की गाडिय़ों पर मशीनगन तैनात करके फ्लैग मार्च निकालने जैसा अलोकतांत्रिक काम करना पड़ रहा है। 

(Daily chhatisgarh)

चीनी नौजवानों से कुछ सीखकर वसीयत करें..

 चीन की खबर है कि वहां लोग कोरोना के खतरे के चलते बड़ी संख्या में अपनी वसीयत रजिस्टर करवा रहे हैं। चीनी कानून के मुताबिक 18 बरस से ऊपर के कोई भी नागरिक वसीयत कर सकते हैं और एक फीस देकर उसे रजिस्टर भी करवा सकते हैं। बुजुर्गों के लिए वसीयत रजिस्टर करवाना सरकार की तरफ से मुफ्त है। पिछले बरस कोरोना फैलने और लोगों के मरने को देखते हुए चीनी नौजवानों में भी बड़ा डर फैला हुआ है और वे अपने मां-बाप से लेकर अपने बच्चों तक की देखभाल के हिसाब से वसीयत कर रहे हैं। नौजवानों के लिए वसीयत रजिस्टर करना सस्ता नहीं है, इसके लिए उन्हें करीब तीन हजार डॉलर की फीस देनी पड़ती है जो कि सवा दो लाख रुपये के बराबर होती है, इसके बावजूद नौजवान बड़ी संख्या में वसीयत रजिस्टर करवा रहे हैं।

 
इसी अखबार में बीच-बीच में हम कभी मजाक के अंदाज तो कभी गंभीरता से यह सलाह देते आए हैं कि लोगों को अपनी बारी के आने के पहले अपनी वसीयत कर देनी चाहिए, और लेन-देन का हिसाब भी चुकता कर देना चाहिए। इन कामों में वसीयत करना ही सबसे सस्ता है और हिंदुस्तान में तो दो-चार हजार रुपये में ही वसीयत रजिस्टर हो सकती है। जिन लोगों को अपने पर कोरोना का खतरा नहीं दिख रहा है उन्हें भी यह समझना चाहिए कि अच्छी भले चलते-फिरते लोग भी कोरोना से परे की बीमारियों से कभी भी खत्म हो जाते हैं, और आम से लेकर खास तक सभी किस्म के लोग सडक़ हादसों के भी शिकार हो जाते हैं। इसलिए महज कोरोना की वजह से नहीं जिंदगी पर हमेशा छाई रहने वाली एक अनिश्चितता की वजह से भी लोगों को परिवार में बंटवारा, जमीन-जायदाद के विवाद, लेन-देन, जमा करके रखी हुई या छुपाई हुई दौलत, इन सबकी एक वसीयत कर जाना चाहिए ताकि बाद में अगली पीढ़ी के बीच उसे लेकर सिर-फुटव्वल की नौबत न आए, और बच्चों के रिश्ते आपस में ठीक बने रहें। दुनिया की कड़वी हकीकत यह है कि बहुत से मां-बाप अपने बच्चों के बीच कोर्ट-कचहरी में जिंदगी बर्बाद करने का सामान छोडक़र जाते हैं। लोगों को अपने रहते-रहते कानूनी जिम्मेदारियां पूरी कर देनी चाहिए ताकि बाद में उनके हिस्से का यह काम वकीलों और जजों के सिर पर न आए। 

दरअसल इंसानी फितरत ही ऐसी रहती है कि वह अपना बुरा होने की कल्पना नहीं करती। उसे लगता है कि सडक़ हादसा किसी और का होगा, कोरोना या दूसरी बीमारी भी किसी और को होगी, और उनकी मौत तो चिट्ठी लिखकर तीन महीने का वक्त देकर आएगी। नतीजा यह निकलता है कि लिखने वाले लेखक भी जरूरी बातों को वक्त रहते लिखना जरूरी नहीं समझते और फिर वह लिखना कभी हो ही नहीं पाता। जब उनका वक्त आता है, तो वह कोई वक्त नहीं देता। 
चीन के लोग कई मायनों में कारोबारी कामयाबी के अलावा दुनिया भर में फैलकर अपना बेहतर कॅरियर बनाने के लिए जाने जाते हैं। चीन के पेशेवर लोग और वहां के छोटे-बड़े कारोबारी पिछले एक पीढ़ी में ही कामयाबी की सीढ़ी पर चढक़र आसमान तक पहुंचे हुए हैं। शायद इसीलिए वे अपने ताजा-ताजा हासिल को लेकर अधिक जिम्मेदारी दिखा रहे हैं, और नौजवानी में ही वसीयत कर रहे हैं। एक परंपरागत हिंदुस्तानी परिवार में तो परिवार के मुखिया के गुजर जाने के बाद जब मृत्यु संस्कार पूरे निपट चुके रहते हैं, तब आम तौर पर परिवार मुखिया की तिजोरी, आलमारी, या संदूक खोलते हैं और देखते हैं कि क्या-क्या छूटा हुआ है। इसके बाद शुरू होता है अदालती झगड़े का सिलसिला जो कि अगली पीढ़ी तक चलने की संभावना ही अधिक रहती है। 

यह सिलसिला इसलिए खराब है कि इससे देश की अदालतों पर एक अवांछित बोझ बढ़ता है जिसे कि टाला जा सकता था। इसके अलावा वारिसों के बीच जितना तनाव खड़ा हो जाता है वह उनकी अगली पीढ़ी तक भी जारी रह सकता है, और हमने पहले भी यहां लिखा था कि भाईयों के बीच जब दीवार उठती है, तो जरूरत से काफी अधिक ऊंची उठती है।

न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि तमाम जगहों पर लोगों को वसीयत की औपचारिकता अपने सेहतमंद रहते हुए, और किसी खतरे के आने के पहले ही कर लेनी चाहिए। जो लोग ऐसा इंतजाम कर लेते हैं वे हो सकता है कि अपने लिए बेहतर वृद्धाश्रम का इंतजाम कर लें, या फिर परिवार के भीतर ही वारिसों से बेहतर सम्मान पा लें। हर हिसाब से यह काम समय रहते कर लेना चाहिए। जिस तरह भारत सरकार ने एक आधार कार्ड की व्यवस्था की, परिवारों के लिए राशन कार्ड की व्यवस्था की, लोग अपने दस्तावेज ऑनलाइन रख सकें इसके लिए डिजिलॉकर मुफ्त में उपलब्ध कराया, उसी तरह सरकार को वसीयत मुफ्त बनवाने का विकल्प भी उपलब्ध करवाना चाहिए इससे देश की अदालतों पर बोझ घटेगा और पारिवारिक-समरसता बनी रह सकेगी।  (Daily chhatisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 9 अप्रैल 2021


 

लॉकडाऊन के बीच बेबसी में घरवापिसी का विकल्प क्या?

  हिंदुस्तान में जिस रफ्तार से कोरोना बढ़ रहा है, और एक-एक करके बहुत से राज्य लॉकडाऊन कर रहे हैं, पूरे देश में मजदूरों के बीच भगदड़ मची हुई है। जो मजदूर अपने शहर में काम कर रहे हैं, उन्हें तो उम्मीद है कि रियायती या मुफ्त सरकारी अनाज के भरोसे उनके परिवार जिंदा तो रह लेंगे, लेकिन जो मजदूर दूसरे प्रदेशों में काम कर रहे हैं, उनके मन से पिछले बरस वाली दहशत जा नहीं रही है, और वे अपने प्रदेशों के लिए रवाना हो रहे हैं। कहीं वे रेलगाडिय़ों पर हैं, तो कहीं सडक़ों पर सवारी ढूंढ रहे हैं कि कैसे घर लौटें। 

हिंदुस्तान में ऐसे असंगठित और प्रवासी मजदूरों की हालत में पिछले बरस के भयावह तजुर्बे के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कोई सुधार नहीं लाया गया है। और बेबस मजदूर बेहतर मजदूरी की तलाश में दूसरे प्रदेशों में तो जाएंगे ही। यह बात अकेले हिंदुस्तान पर लागू नहीं होती है, दुनिया के बहुत से देशों में गरीब पड़ोसी देशों से रोजाना लाखों मजदूर सरहद की चौकी पार करके काम करने जाते हैं। भारत में तो मजदूर न सिर्फ दूसरे प्रदेशों में काम करने जाने के आदी हैं, बल्कि सैकड़ों बरस से मजदूर फिजी, मॉरिशस जैसे कई देशों में जाकर काम करते आए हैं। आज खाड़ी के हर देश में दक्षिण भारत के तकनीकी-कामगार बड़ी संख्या में काम करते हैं, और केरल जैसे राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी-मजदूरों से आता है। वैसे भी प्रवासी मजदूरों के बारे में यह माना जाता है कि वे जब अपनी जगह से निकलकर बाहर जाते हैं, तो वे अधिक मेहनत करते हैं, अधिक काम करते हैं क्योंकि उन पर अपनी स्थानीय रिश्तेदारियों को निभाने का कोई दबाव नहीं रहता है। ऐसे मजदूर बाहर जाने के लिए एकदम से बेबस भी नहीं रहते, बल्कि अमूमन वे बेहतर मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं, और वहां हर दिन अधिक से अधिक घंटे काम करके कमाते हैं, और लौटकर या तो कर्ज चुकाते हैं, या थोड़ी सी जमीन खरीद लेते हैं, या मकान बना लेते हैं। इस तरह मजदूर कमाते तो बाहर हैं लेकिन वेे अपने गृह राज्य की अर्थव्यवस्था में हर बरस कुछ न कुछ जोड़ते हैं। चूंकि ये मजदूर पूरी तरह असंगठित हैं, इसलिए किसी मुसीबत के वक्त उनकी कोई योजनाबद्ध मदद नहीं हो पाती है, या शायद यह कहना अधिक सही होगा कि सरकारें उनकी अधिक परवाह नहीं करती है।

यह बात समझने की जरूरत है कि कोरोना या इस किस्म की कोई दूसरी संक्रामक-महामारी जाने कब तक लॉकडाऊन की नौबत लेकर आएगी। इसलिए अब सरकार और कारोबार, इन दोनों को अपने-अपने स्तर पर ऐसे प्रवासी मजदूरों के बारे में सोचना चाहिए कि उन्हें मजबूरी में लौटने से कैसे रोका जाए, कैसे उनके लिए कामकाज के प्रदेश और शहर में ही जिंदा रहने, पेट भरने, और इलाज पाने का इंतजाम किया जाए। देश के बचे-खुचे मजदूर कानूनों में भी मजदूरों के बच्चों की देखभाल तक का इंतजाम है, लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ भी नहीं है। हाल के बरसों में उदार अर्थव्यवस्था के नाम पर सबसे संगठित मजदूर-तबकों के हक भी खत्म किए गए हैं, इसलिए हमारी यह सलाह पता नहीं केंद्र सरकार के किसी काम की है या नहीं, लेकिन राज्य सरकारें तो अपने स्तर पर महामारी और लॉकडाऊन के लंबे भविष्य के खतरे से निपटने की योजनाएं बना सकती हैं। ऐसी हर नौबत पर मजदूरों की गांव या घरवापिसी बहुत अच्छी नौबत नहीं है, क्योंकि उससे उनके उत्पादक हफ्ते या महीने भी खराब होते हैं, और बीमारियों के फैलने का खतरा भी रहता है। इसलिए ऐसे हर राज्य को ऐसा आपदा प्रबंधन करना चाहिए कि लॉकडाऊन में प्रवासी मजदूर अपने काम के शहरों में ही किस तरह हिफाजत से रखे जाएं। हमको मालूम है कि यह सलाह देना आसान है, इस पर अमल एक नामुमकिन किस्म की चुनौती रहेगी क्योंकि आज जब किसी प्रदेश में अस्पतालों में बिस्तर बचे नहीं हैं, तब कौन सा प्रदेश चाहेगा कि प्रवासी मजदूरों के इलाज का अतिरिक्त बोझ उस पर आए। लेकिन यहीं पर इंसानियत को दखल देना होगा, देश में बची-खुची, थोड़ी-बहुत साख वाली अदालतों को दखल देना होगा ताकि काम की जगह पर जिंदा रहने का इंतजाम तय किया जा सके।

लॉकडाऊन से हिंदुस्तान जैसे सबसे गरीब मजदूरों वाले देश में करोड़ों लोगों के सामने भुखमरी से जरा ही कम बुरी नौबत आ रही है। आज 21वीं सदी में भी केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर भी लोगों को बस जिंदा रहने लायक अनाज दे पा रही हैं, पिछले बरस तो हजार-हजार किलोमीटर का वापिसी-सफर भी मजदूरों को पैदल ही तय करना पड़ा था। इस देश के बड़े-बड़े राष्ट्रीय प्रबंधन संस्थानों से निकले हुए गे्रजुएट नौजवान दुनिया की सबसे बड़ी कई कंपनियों को संभाल रहे हैं। अगर सरकारों में राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो ऐसी कोई वजह नहीं है कि ऐसे प्रबंधन-विशेषज्ञ जानकार लोग  इस देश के प्रवासी मजदूरों के लायक कोई कामयाब योजना न बना सकें। कोई प्रदेश भी ऐसी पहल कर सकता है, और केंद्र सरकार को तो करना ही चाहिए। आगे-आगे देखें कि किसके मन में कितना दर्द है।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 8 अप्रैल 2021


 

योगी सरकार की नीयत और कार्रवाई हाईकोर्ट की फटकार पाकर खारिज

  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी उत्तरप्रदेश की योगी सरकार के घोर साम्प्रदायिक दिखने वाले दर्जनों मामलों को खारिज करते हुए सरकार को बुरी तरह फटकार लगाई है। यूपी में एनएसए, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत दर्ज 120 मामलों में से 94 को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया ह और कई आरोपियों को रिहा भी किया है। इनमें से अधिकतर मामले मुस्लिमों के खिलाफ बनाए गए थे, जिनमें गाय को मारने से लेकर किसी भीड़ में मौजूद होने तक कई किस्म के जुर्म दर्ज किए गए थे। हाईकोर्ट ने पुलिस के बनाए ऐसे मामलों को बाद में जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी पर भी कड़ा हमला किया है और कहा है कि ऐसा लगता है कि डीएम ने दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया है। अदालत ने यह खुले तौर पर पाया और कहा है कि सरकार ने आरोपियों के मामलों की सुनवाई में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई ताकि वे जेलों में बंद पड़े रहें, जबकि इनके खिलाफ कार्रवाई करने में अफसरों ने असाधारण जल्दबाजी दिखाई थी। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के लिए बने सलाहकार बोर्ड के सामने इनके मामलों को रखा भी नहीं गया। एक प्रमुख अंगे्रजी अखबार, इंडियन एक्सपे्रस की एक रिपोर्ट से ये बातें निकलकर सामने आई हैं कि पिछले तीन बरसों में योगी सरकार ने मुस्लिमों के खिलाफ बड़ी संख्या में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम का इस्तेमाल किया गया जिसमें से अधिकतर मामलों में हाईकोर्ट ने या तो केस खारिज किए, या लोगों को रिहा किया और अधिकतर मामलों में अफसरों के रूख को फटकार के लायक पाया। 

तीन बरस में ऐसे करीब सवा सौ मामलों की अलग-अलग चर्चा यहां संभव नहीं है, लेकिन इस पूरे दौर में उत्तरप्रदेश से आने वाली खबरों से यह साफ दिखता ही था कि वहां सरकार और उसकी एजेंसी, पुलिस का रूख किस हद तक साम्प्रदायिक हो चुका था। अब देश के कानून में एक बड़ी कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम बनाया गया और जैसा कि इसके नाम से जाहिर है यह राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा होने पर इस्तेमाल के लिए है। लेकिन देश भर में राज्य सरकार या जिला पुलिस इस कानून का मनमाना बेजा इस्तेमाल करते आई हैं। कई बार तो खुद पुलिस की कार्रवाई में लिखा होता है कि कोई व्यक्ति जिले की कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन गया है इसलिए उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा रही है। जब सत्ता और पुलिस की मनमानी और गुंडागर्दी में साम्प्रदायिकता और जुड़ जाती है तो वह अल्पसंख्यकों को इस देश का नागरिक भी महसूस नहीं होने देती। हाल के बरसों में ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं जिनमें दस-बीस बरसों से जेलों में बंद बेकसूर मुस्लिमों को अदालत ने बाइज्जत बरी किया है, यह एक अलग बात है कि इस दौरान इनके परिवार तबाह हो चुके रहते हैं, और एक पूरी पीढ़ी उनके बिना या तो जवान हो चुकी रहती है, या मर चुकी रहती है। देश में उत्तरप्रदेश सरकार के साम्प्रदायिक रूख के मामले में अव्वल है। वहां जानवरों की तस्करी, गौवंश को मारना, गोमांस खाना, जैसे आरोप लगाकर किसी की भी भीड़त्या भी की जा सकती है और कानूनी कार्रवाई तो की ही जा सकती है, फिर चाहे उसका हश्र वही हो जो कि अभी करीब सवा सौ मामलों का हाईकोर्ट पहुंचकर हुआ है।

हमारा ख्याल है कि हिंदुस्तान के राज्यों के मातहत काम करने वाली पुलिस, या कि दिल्ली जैसे राज्य में केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली पुलिस को जब तक उसकी ऐसी साजिशों के लिए सजा देना शुरू नहीं होगा, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे। राज्यों की सत्ता और वहां की पुलिस के बीच मुजरिमों के गिरोह से भी अधिक मजबूत भागीदारी बन जाती है, और दोनों ही पक्ष सत्ता और कानून का बेजा इस्तेमाल करके कमाने में जुट जाते हैं। पुलिस और राजनीति का यह भागीदारी-माफिया किसी भी लोकतांत्रिक-सिद्धांत से अछूता रहता है।

उत्तरप्रदेश की यह मिसाल तो वहां की सरकार की साम्प्रदायिकता को भी उजागर करने के काम की है, लेकिन देश के बाकी प्रदेशों को भी यह सोचना चाहिए कि पुलिस का बेजा इस्तेमाल सत्ता के लिए सहूलियत का तो हो सकता है, लेकिन वह अपने प्रदेश के भीतर ही कई किस्म की बेइंसाफी की खाईयां भी खोद देता है। केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने पिछले कई बरसों में जेएनयू से लेकर शाहीन बाग तक, और दूसरे कई आंदोलनों तक केंद्र सरकार की मर्जी की कार्रवाई की, और बार-बार अदालतों में मुंह की खाई, फटकार खाई। यह सिलसिला लोकतंत्र के भीतर पुलिस को वर्दीधारी गुंडा बनाने वाला है और आज से दशकों पहले इसी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अवध नारायण मुल्ला ने पुलिस को वर्दीधारी गुंडा करार दिया था। तब से अब तक कई पार्टियों की सरकारें उत्तरप्रदेश में आई-गईं, लेकिन एक बार मुजरिम बन चुकी पुलिस वक्त के साथ-साथ और खूंखार मुजरिम ही बनती चली जा रही है, चाहे वह उत्तरप्रदेश की साम्प्रदायिक पुलिस हो, चाहे वह बस्तर की मानवाधिकार कुचलने वाली पुलिस हो। इस देश में पुलिस के बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाने का संवैधानिक समाधान अगर नहीं निकाला जाएगा, तो लोगों का इंसाफ के सिलसिले की इस पहली कड़ी पर जरा भी भरोसा नहीं रह जाएगा।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 7 अप्रैल 2021


 

एक मुश्किल चौराहे पर खड़ी छत्तीसगढ़ सरकार, और छलांग लगाता कोरोना

  छत्तीसगढ़ में कोरोना की वजह से जो नौबत आज आ खड़ी हुई है, उसमें सरकार एक चौराहे पर खड़ी दिख रही है, और बेहतर रास्ता कौन सा है यह तय करना आसान नहीं है। अभी-अभी खत्म हुई छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल की बैठक अधिक तैयारी के इरादे के साथ खत्म हुई है और सरकार ने हालात गंभीर होने की बात इस तैयारी के बयान के साथ ही एक किस्म से मान ली है। व्यापारी प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद आज शाम तक राजधानी रायपुर और कुछ दूसरे शहरों में लॉकडाऊन की घोषणा के आसार हैं। जाहिर है कि इस रफ्तार से बढ़ते कोरोना के साथ तो जिंदगी चल नहीं सकती, इसलिए उसे कुछ दिनों के लिए स्थगित करके घरों में कैद रखा जाए। प्रशासन के सामने यह भी एक बड़ी चुनौती रहेगी कि लॉकडाऊन के बीच कैसे हर शहर में रोज हजारों कोरोना-टेस्ट किए जाएंगे, और कैसे हजारों वैक्सीन लगाई जाएंगी।

बीते कल चौबीस घंटों में करीब दस हजार नए कोरोना पॉजिटिव मेडिकल जांच में पाए गए हैं, और लोगों का अंदाज यह है कि इससे दर्जनों गुना कोरोना पॉजिटिव लोग होंगे लेकिन वे नौकरी जाने, मजदूरी जाने के डर से जांच नहीं करा रहे हैं। ऐसे भी बहुत से लोग होंगे जो कि मेडिकल जुबान में असिम्प्टोमेटिक (लक्षणविहीन) होंगे और इसलिए वे किसी जांच के लिए पहुंच ही नहीं रहे हैं। प्रदेश भर में कोरोना जांच केंद्रों पर जो अंधाधुंध भीड़ लगी है, वहां पहुंचकर भी बहुत से लोग लौट जा रहे हैं कि अब तक अगर कोरोना नहीं लगा होगा, तो भी यहां लग जाएगा। अस्पतालों में बिस्तर नहीं बचे हैं, और छोटे से छोटे निजी अस्पताल में भी कोरोना वार्ड के एक हफ्ते का बिल डेढ़ लाख रुपये तय कर दिया गया है। बड़े अस्पताल और भी बड़ा बिल बना रहे हैं, मरीजों का ऑक्सीजन स्तर जब तक एक निर्धारित सीमा से ऊपर नहीं पहुंच रहा है, उन्हें छुट्टी नहीं दी जा रही है, और खर्च की कोई सीमा नहीं रह गई है। चारों तरफ सरकारी इंतजाम इस कदर चुक गया है कि सुबह से देर दोपहर तक कई जगहों पर कोरोना वार्ड में खाना नहीं पहुंच रहा है। 

इन बातों से परे आज छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत यह है कि यह अपनी आबादी के कई गुना अधिक आबादी वाले प्रदेशों से कई गुना अधिक कोरोना संक्रमण वाला प्रदेश हो गया है, और अब तक के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में पचास हजार से अधिक सक्रिय कोरोना पॉजिटिव अभी हैं। इनमें से अधिकतर घरों पर ही अलग रखे गए हैं, लेकिन जब लोगों के लापरवाह मिजाज को देखा जाए, तो यह बात अविश्वसनीय लगती है कि मास्क तक से परहेज करने वाला यह प्रदेश घरों पर सावधानी से अलग बैठे रहेगा और परिवार के बाकी लोगों के लिए खतरा नहीं बनेगा। 

लेकिन आज सबसे बड़ी फिक्र लॉकडाऊन को लेकर है कि अलग-अलग शहरों या जिलों को किस तरह बंद किया जाए ताकि लोगों का संपर्क एक-दूसरे से टूटे और कोरोना की लंबी-लंबी छलांग बंद हो, या धीमी पड़े। पिछले दो दिनों के आंकड़े देखें तो छत्तीसगढ़ में पांच अपै्रल को करीब 75सौ कोरोना पॉजिटिव मिले थे जो कि छह अपै्रल को बढक़र करीब दस हजार नए कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। यह अविश्वसनीय किस्म की और हक्काबक्का करने वाली नौबत है। दुनिया की किसी सरकार की पूरी ताकत भी इस रफ्तार से बढऩे वाले कोरोना संक्रमण से नहीं जूझ सकती और छत्तीसगढ़ को कड़ा और कड़वा फैसला लेना ही होगा।

एक अलग मोर्चा वैक्सीन का चल रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों में कोरोना के टीके लगाने की रफ्तार अलग-अलग है। महाराष्ट्र में जहां पर कि देश की सबसे खराब हालत है, वहां अगले तीन दिनों के लिए ही टीके बचे हैं, और राज्य सरकार का कहना है कि जिन्हें पहले टीके लग चुके हैं, उन्हें भी लगाने के लिए दूसरा टीका नहीं बचेगा। छत्तीसगढ़ में भी कल से बिलासपुर के निजी अस्पतालों को टीके देना बंद कर दिया गया था, और ताजा हालत आगे सामने आएगी। टीकों की कमी अगर हो जाएगी तो कुछ महीनों बाद भी कोरोना पर काबू पाने की उम्मीद एक सपना साबित होगी। एक सौ 30 करोड़ आबादी के इस देश में अब तक महज कुछ करोड़ लोगों को ही टीके लगे हैं, और उनमें भी कम लोगों को ही दो टीके लगे हुए एक पखवाड़ा हो चुका है जिसके बाद उसका असर माना जाता है। 

किसी भी प्रदेश में संक्रमण को रोकना पहली नजर में उसकी अपनी जिम्मेदारी मानी जाती है, और टीकों की सप्लाई केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन उनको लगाना राज्य सरकार का ही काम है। यह नौबत किसी भी राज्य के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती की है जिसमें शासन और प्रशासन के बड़े अफसरों से लेकर छोटे कर्मचारियों तक की समझ-बूझ और क्षमता कसौटी पर चढ़ रही है। निर्वाचित राजनीतिक नेता सरकार की मशीनरी का कैसा इस्तेमाल करते हैं यह बहुत बड़ी चुनौती उनके सामने है।

फिर जनता के सामने भी यह बहुत बड़ी चुनौती है कि किसी लॉकडाऊन की नौबत में वह कमाए क्या, और खाए क्या। राज्य सरकारें या केंद्र सरकार गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों तो जिंदा रहने के लिए मुफ्त अनाज दे सकती हैं, और संपन्न तबके को बैंक की किश्त पटाने में समय की कुछ छूट मिल सकती है, सरकारी नौकरी के लोगों को भी तनख्वाह की गारंटी है, लेकिन असंगठित कर्मचारियों और रोजगार पर जिंदा रहने वाले छोटे-छोटे कारोबारियों के लिए कोई भी लॉकडाऊन मरने जैसी नौबत ला देता है। किसी भी राज्य सरकार के सामने ऐसे बड़े तबके का ख्याल रखना भी एक असंभव सी चुनौती है, और देखना होगा कि छत्तीसगढ़ या किसी दूसरे राज्य की सरकार किस तरह अपने लोगों के काम आती है, उनका साथ देती है।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 6 अप्रैल 2021


 

बस्तर को बंदूकों से परे एक संवेदनशील प्रशासन की भी जरूरत है...

  बस्तर में हुए ताजा नक्सल हमले में 22 जवानों की शहादत पर राज्य और केंद्र सरकारें हिली हुई हैं। इन सरकारों ने न तो मुआवजा देने में कोई कमी की है, और न ही नक्सलियों के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई छेडऩे की घोषणा करने में कोई देर की है। ऐसा हमला हो जाने के बाद ये दोनों सरकारें जो-जो कर सकती थीं, उन्होंने तकरीबन तमाम काम किए हैं। अब महज यह बाकी रह गया है कि बस्तर जिस बुरी तरह नक्सल प्रभावित है, उस प्रभाव के पीछे की वजहों को देखा जाए, और उन्हें दूर किया जाए। 

यह कुछ मुश्किल काम भी है। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से, तीन दशक से भी अधिक हो चुके हैं कि बस्तर में नक्सलियों का डेरा है, और वहां पिछले बीस बरस में तो हर बरस औसतन सौ से अधिक नक्सल-मौतें होती ही हैं। ये तीन दशक भोपाल और रायपुर की राजधानियों के भी रहे हैं, और कांगे्रस और भाजपा की सरकारों के भी। लेकिन आदिवासियों के जिस अंतहीन शोषण, और उन पर राज करने वाले शासन-प्रशासन, राजनीतिक ताकतों, और तरह-तरह के माफिया की वजह से नक्सलियों को बस्तर में दाखिला मिला था, और जमीन मिली थी, वह सब कुछ तो अब भी जारी है। इस बुनियादी नाकामयाबी और खतरे की बात भी किए बिना सिर्फ बंदूकें बढ़ाकर बस्तर से नक्सलियों को खत्म करने की बात एक हसरत अधिक हो सकती है, हकीकत नहीं। जब किसी पेड़ की जड़ों में ही कोई बीमारी लगी हो, तो उसके पत्तों और फलों पर दवा छिडक़कर भला क्या हासिल किया जा सकता है? 

बस्तर में सरकारी मशीनरी और सरकारी कामकाज में जो परंपरागत भ्रष्टाचार लंबे समय से बैठा हुआ है, गरीब आदिवासियों के नाम पर निकली रकम का जो बेजा इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है वह भी बुनियादी दिक्कत का एक हिस्सा है। दिक्कत का दूसरा, अधिक खतरनाक हिस्सा आदिवासियों का शोषण है। पिछले बरसों में, खासकर भाजपा के निरंतर 15 बरस के राज में बस्तर के आम आदिवासियों के न्यूनतम मानवाधिकारों को भी जिस तरह कुचलकर रख दिया गया था, और मुजरिमों से भी बदतर पुलिस अफसरों ने वहां आतंक के नंगे नाच के कई बरस पेश किए थे, उसने बस्तर के आदिवासियों के बीच नक्सलियों के एजेंडा की विश्वसनीयता बढ़ाने का ही काम किया था। जिस तरह गांव के गांव पुलिस जला रही थी, बेकसूरों को गोली मार रही थी, आदिवासी महिलाओं से बलात्कार हो रहे थे, ये बातें उस वक्त के विपक्ष की कांगे्रस पार्टी की तोहमतें ही नहीं थीं, ये बातें सुप्रीम कोर्ट तक जाकर खड़ी रहीं हैं। लेकिन मजाल है कि हिंदुस्तानी लोकतंत्र ऐसे अंतहीन और धारावाहिक जुर्म और जुल्म के जिम्मेदार लोगों को छू भी ले! इसी का नतीजा है कि अभी जब नक्सलियों ने 22 जवानों को मारा, तो उसके दो दिन पहले ही बस्तर पुलिस के एक छोटे अफसर ने अपने दोस्तों सहित एक नाबालिग आदिवासी लडक़ी से बलात्कार किया था। यह शहरी, संपन्न, शिक्षित, और सुरक्षित लोगों के लिए तो सिर्फ पुलिस रिपोर्ट की बात हो सकती है, लेकिन बस्तर में जुल्म के ऐसे सिलसिले से निपटने के लिए नक्सली भी मौजूद हैं। जिन आदिवासियों ने पुलिस जुल्म के, और सरकारी-अनदेखी के कई दशक देखे हैं, उनके सामने एक अलग किस्म के, लोकतंत्र से परे के, इंसाफ का जरिया भी आसपास मौजूद है नक्सलियों की शक्ल में। इसलिए अगर राज्य या केंद्र की सरकार, या आधा दर्जन और नक्सल प्रभावित प्रदेशों की सरकारों को नक्सल हिंसा खत्म करनी है तो वर्दीधारी-सरकारी जुल्म और जुर्म के सिलसिले को पहले खत्म करना होगा। 

छत्तीसगढ़ के बस्तर के इस ताजा नक्सल हमले को लेकर एक यही बात सूझती है जिसे न राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा है, और न ही केंद्र से आए हुए गृहमंत्री ने। हो सकता है कि इस हमले के बाद के ताबूतों के बीच इस किस्म की कोई बात कहना बेमौके की बात होती, लेकिन अब जब बस्तर में शासन-प्रशासन दूसरे काम में भी लगेंगे, और राजनीतिक ताकतें भी तरह-तरह के कानूनी और गैरकानूनी धंधों में लगेंगी, तो राज्य सरकार को यह सोचना चाहिए कि बस्तर में सरकार की साख कैसे बनाई जाए? यह काम राज्य सरकार के मौजूदा ढांचे के बस का नहीं है क्योंकि वह बस्तर में आदतन शोषण को ही प्रशासन मानते आया है। आदिवासी इलाकों के लिए उनकी संस्कृति और परंपराओं की समझ रखने वाले गैरसरकारी जानकार लोगों को लाकर बस्तर में शासन-प्रशासन की खामियों की शिनाख्त करवानी चाहिए। वैसे भी संविधान में बस्तर को लेकर या दूसरे अधिसूचित इलाकों को लेकर शासन की एक अलग व्यवस्था और प्रणाली साफ-साफ लिखी गई है। इन सबको ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार को बहुत ईमानदार नीयत से एक संवेदनशील प्रशासन कायम करने की कोशिश करनी चाहिए। देश और दुनिया के बहुत से ऐसे समाजशास्त्री हैं जो कि छत्तीसगढ़ सरकार को एक संवेदनशील व्यवस्था सुझा सकते हैं, और ऐसा किए बिना संवेदनाशून्य नेता-अफसर बस्तर के प्रशासन को बेहतर नहीं बना सकते, वहां से नक्सलियों को खत्म नहीं कर सकते। इतना जरूर है कि हिंदुस्तान की सरकार की ताकत बहुत बड़ी है, और वह 25-50 हजार सुरक्षाकर्मी भेजकर बस्तर को और बुरी तरह रौंद सकती है, लेकिन क्या उससे बस्तर के लोगों का दिल भी जीता जा सकेगा? फिर आज छत्तीसगढ़ की कांगे्रस सरकार पर एक नैतिक जिम्मेदारी भी है कि पिछली भाजपा सरकार के वक्त का जुल्म का बरसों का सिलसिला खत्म किया जाए जो कि उस वक्त कांगे्रस ही उठाती थी। जानकार लोगों का यह भी कहना है कि कांगे्रस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी छत्तीसगढ़ के बस्तर की चर्चा होने पर बार-बार यह पूछते हैं कि वह बदनाम अफसर कहां है, उसे कोई काम तो नहीं दिया है? जाहिर है कि कांगे्रस हाईकमान के दिमाग में भी बस्तर के जुल्म के इतिहास की बात दर्ज है। ऐसे में राज्य सरकार को राज्य और सरकार से परे के जानकार और आदिवासियों के लिए हमदर्दी रखने वाले लोग लाकर बस्तर के एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था बनवानी चाहिए। और अधिक सुरक्षाकर्मी भेजना सरकार के हाथ में तो है, लेकिन कल देश भर में दर्जन भर जगहों पर ताबूत पहुंचने पर जैसा हाहाकार मचा है, वैसी मानवीय त्रासदी की कीमत पर ही सरकार की हथियारबंद कार्रवाई जारी रह सकती है। सरकार को एक संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता भी दिखानी चाहिए और बस्तर को शोषण और भ्रष्टाचार से मुक्त प्रशासन देने की एक मौलिक कोशिश करनी चाहिए जो कि नक्सल-विरोधी हथियारबंद-मुहिम के मुकाबले बहुत अधिक कठिन भी होगी।

(Daily Chhattisgarh)