दीवारों पर लिक्खा है,4 अगस्त 2021


 

कोरोना की तीसरी लहर के खतरे के बीच स्कूल खोलने के खतरे

 4 अगस्त 2021

 हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रदेशों में राज्य सरकारों के फैसले से स्कूलें खुलना शुरू हो गया है। हर राज्य ने अपने-अपने हिसाब से तय किया है कि किसी एक दिन कितने फीसदी बच्चों को क्लास में बिठाया जाए, या कौन-कौन सी क्लास से शुरू की जाए, या क्लास रूम के बाहर खुले में बैठाया जाए। यह स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से प्रदेश की सरकार और शायद कहीं-कहीं पर जिले के अफसरों को भी आजादी से ऐसा तय करने का अधिकार दिया गया है। कुछ राज्यों ने यह भी तय किया है कि जिन जिलों में नए कोरोना केस एक फीसदी से भी कम सामने आ रहे हैं वहीं पर स्कूलें शुरू की जाएं। बच्चों के मां-बाप दहशत में हैं, और बच्चों के लगातार घर रहने से होने वाली तमाम किस्म की दिक्कतों के बावजूद उनको ठीक से भरोसा नहीं है कि छोटे-छोटे बच्चे शारीरिक दूरी रख पाएंगे, साफ-सफाई रख पाएंगे, और कोरोना से बच पाएंगे। इसीलिए सरकारों ने यह छूट भी दी है कि स्कूलों में कहीं भी हाजिरी जरूरी लागू नहीं की जाएगी, मतलब यह कि जो लोग अपने बच्चों को भेजना ना चाहें, वे ना भेजें, और कई राज्यों ने इसीलिए ऑनलाइन कक्षाएं जारी रखना भी तय किया है।

दूसरी तरफ निजी स्कूल चलाने वाले लोगों के सामने दिक्कत यह है कि उनके ढांचे का खर्च तो तकरीबन पूरा का पूरा हो ही रहा है। इमारत अगर बैंक कर्ज से बनी है तो उस पर किस्तें आ रही हैं, बसें अगर बैंक कर्ज से खरीदी हैं, तो उस पर किस्तें देना ही पड़ रहा है, और शिक्षक-शिक्षिकाओं और कर्मचारियों को कितना भी कम किया जाए, तनख्वाह का काफी बड़ा हिस्सा तो जा ही रहा है। फिर ऑनलाइन पढ़ाई के चलने से फीस भी पता नहीं पूरी मिल रही है या नहीं, लेकिन निजी स्कूलों को कई दूसरे तरह की कमाई भी होती है कहीं यूनिफार्म की अनिवार्यता से कमीशन मिलता है, तो कहीं निजी प्रकाशकों की किताबें अनिवार्य करके उससे कमीशन मिलता है, वह सब बंद सा हो गया है। इसलिए निजी स्कूलों को स्कूल शुरू करने की हड़बड़ी अधिक थी, और सारे प्रदेशों में ऐसे स्कूल संचालकों ने स्कूलें शुरू होने से राहत की सांस ली है। अब सवाल यह है कि क्या बच्चों को सावधानी के साथ बिठाया और लाया ले जाया जा सकेगा?

जहां कहीं भी स्कूलें शुरू हुई हैं या हो रही हैं, यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इस फैसले के साथ ही स्कूल के किसी भी किस्म के कर्मचारी एक किस्म से फ्रंटलाइन वर्कर्स हो गए हैं, जो कि अभी तक अस्पताल या स्वास्थ्य कर्मचारी ही थे, और सफाई कर्मचारी ही थे। इनके बाद पुलिस और सरकार के सीधे मैदानी ड्यूटी करने वाले नुमाइंदे इस तबके में आते थे। अब जब रोजाना सैकड़ों बच्चों से सीधा वास्ता पड़ेगा तो स्कूल के हर दर्जे के कर्मचारी भी उसी तरह खतरे में आएंगे और उनके खतरे में आने से एकमुश्त सैकड़ों बच्चे भी खतरे में आ सकते हैं। इसलिए स्कूलों को खुद ही या वहां की सरकारों को, या स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को, स्कूलों में हर किसी कर्मचारी के लिए कोरोना टीकाकरण का इंतजाम करना चाहिए और उसके बाद ही उनका बच्चों से संपर्क होने देना चाहिए। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई काफी नहीं थी जो उन्हें इस तरह अब बसों में और क्लास रूम में भीड़ के बीच धक्का-मुक्की में लाया ले जाया जाएगा?

इस बारे में कुछ एक मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से, परामर्शदाताओं से बात करने पर यह समझ में आता है कि पिछले डेढ़ बरस से अधिक वक्त से बच्चे घर बैठे हुए थे या आस-पड़ोस में भी बड़े सीमित संपर्क में आ जा रहे थे। एक सामाजिक व्यवस्था के तहत स्कूलों में अपने हमउम्र बच्चों के साथ जिस तरह का सामाजिक संपर्क उनका होता था, जो कि उनकी विकास प्रक्रिया में अहमियत रखता था, वह तकरीबन खत्म सा हो गया था। ऐसे में इन बच्चों को घर में रहते हुए क्या कोई बड़ा मानसिक नुकसान हो रहा था? इस बारे में जानकार लोगों का कहना है कि छोटे बच्चों के तो दिमाग इस तरह से तैयार रहते हैं, इतने लचीले रहते हैं, कि वह एक-दो बरस की ऐसी दिक्कतों से तेजी से उबर जाएंगे, लेकिन जो बच्चे किशोरावस्था में पहुंच रहे हैं, या अभी पहुंचे ही हैं, उनके लिए यह डेढ़ साल बड़ा भारी रहा है। इस दौरान वे शारीरिक और मानसिक फेरबदल के ऐसे दौर से गुजरते रहते हैं कि उन्हें अपने हमउम्र बच्चों के साथ मिलने-जुलने, उनके साथ बात करने, और उनसे कई मुद्दों को समझने का मौका मिलता है, जो कि घर रहते मुमकिन नहीं है। किशोरावस्था के बच्चे मां-बाप के काबू से बाहर भी निकलने के दौर में रहते हैं, लेकिन कोरोना वायरस के खतरे ने, और लॉकडाउन ने उन्हें घर में रख दिया, जो कि उनका अधिक बड़ा नुकसान हुआ, छोटे बच्चों के मुकाबले। इसलिए कुछ मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता यह मानते हैं कि किशोरावस्था के बच्चों के लिए स्कूलें शुरू होना अधिक जरूरी था और पढ़ाई के मुकाबले भी उनके व्यक्तित्व विकास के लिए उनकी उम्र की जरूरत के लिए यह अधिक जरूरी था।

जो भी हो, ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके बारे में जानकार लोगों के और भी विश्लेषण सामने आएंगे लेकिन फिलहाल स्कूलें शुरू होने के इस मौके पर हम इतना ही कहना चाहते हैं कि जरा सी लापरवाही भी स्कूलों को कोरोना के फैलने का एक बहुत बड़ा अड्डा बना सकती हैं, और बच्चों के मार्फत एक स्कूल भी एक दिन में सैकड़ों परिवारों तक कोरोना का खतरा पहुंचा सकती हैं। ऐसा खतरा पता लगने में कई हफ्ते लग सकते हैं और किसी शहर के आंकड़े कई हफ्ते बाद यह बतलाएंगे कि उस शहर में पॉजिटिविटी रेट बढ़ गया है, लेकिन तब तक मामला हाथ से निकल चुका रहेगा क्योंकि तब तक बच्चे आपस में एक दूसरे को कोरोना वायरस दे चुके रहेंगे, और उनके भीतर लक्षण भी आसानी से सामने नहीं आएंगे। इसलिए स्कूलों को सिर्फ पढ़ाई के लिए या बच्चों के मिलने-जुलने के लिए खोल देना काफी नहीं है, इन तमाम बच्चों के बीच कड़ी निगरानी रखना भी जरूरी है क्योंकि यह बच्चे खुद लक्षणमुक्त रहते हुए भी कोरोना को अपने परिवारों तक पहुंचा सकते हैं। अभी कोरोना की तीसरी लहर आना बाकी ही बताया जा रहा है, इसलिए भी स्कूलें बहुत खतरनाक साबित हो सकती हैं। ((Daily chhattisgarh)

ऑनलाइन गेम के नाम पर ऐसा जुआ सबको बर्बाद कर देगा

 3 अगस्त 2021

 मध्य प्रदेश के छतरपुर में अभी 2 दिन पहले 13 बरस के एक लडक़े ने खुदकुशी कर ली। उसने एक ऑनलाइन गेम खेलते हुए अपनी मां के खाते से 40 हजार रुपये गंवा दिए थे और जब मां को अपने फोन पर अकाउंट से पैसे कटने की खबर मिली तो उन्होंने बेटे को फोन पर डांटा, और खुदकुशी की एक चिट्ठी छोडक़र लडक़े ने आत्महत्या कर ली कि उसने इस खेल के चक्कर में 40 हजार रुपये बर्बाद कर दिए और उसी डिप्रेशन में वह आत्महत्या कर रहा है। इसके अलावा देश में कुछ और जगहों पर ऑनलाइन गेम में लंबी हार के बाद अलग-अलग बच्चों ने आत्महत्या की है, और दिल्ली के एक सामाजिक संगठन ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी लगाई है जिसमें ऐसे ऑनलाइन गेमों पर प्रतिबंध की मांग की गई है। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को बच्चों को ऑनलाइन गेम की लत से बचाने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने का नोटिस भी जारी किया है। उल्लेखनीय है कि अभी चार दिन पहले ही देश के दर्जनों प्रमुख अखबारों में पहले पूरे पन्ने का इश्तिहार ऐसे ही ऑनलाइन गेम का छपा था, जिसे लेकर सोशल मीडिया में लोगों ने फिक्र जाहिर की थी, और मध्यप्रदेश की यह आत्महत्या उसके बाद सामने आई है।

हिंदुस्तान में पिछले वर्षों में अर्थव्यवस्था, उदारवादी से अति उदारवादी की तरफ बढ़ चली है, और विदेशी पूंजी निवेश को तकरीबन हर दायरे में अंधाधुंध बढ़ाने की छूट दी गई है. नतीजा यह निकला है कि ऐसा पूंजी निवेश विदेश की कारोबारी-संस्कृति के साथ आ रहा है. ऑनलाइन खेल के नाम पर ऑनलाइन जुआ चल रहा है जिसमें किसी मौत तो खबरों में आ रही है, लेकिन लोगों के रात-दिन लुटने की कोई खबर खबरों में नहीं आ रही, क्योंकि इनमें हारे हुए लोग अपनी हार को अधिक उजागर भी नहीं करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि एक वक्त हिंदुस्तान का एक बड़ा हिस्सा जिस तरह रोजाना खुलने वाली लॉटरी में सट्टे का एक विकल्प ढूंढ चुका था, क्या अब घर बैठे मोबाइल फोन पर या कंप्यूटर पर अपने मां-बाप के खातों से या अपने खुद के बैंक का अकाउंट से भुगतान करके इस तरह के ऑनलाइन गेम में बच्चे-बड़े सभी लोग पैसा लगाते चलेंगे, जिसके साथ उनके सपने तो जुड़े रहेंगे, उनकी हसरतें भी जुड़ी रहेंगी, लेकिन उनकी हार इसमें तय रहेगी। पूरी दुनिया का जुए का इतिहास है कि जुआ खिलाने वाले कैसीनो या जिन देशों में ऑनलाइन सट्टेबाजी कानूनी है, वहां पर सट्टेबाजों के अलावा और कोई नहीं कमाते, अधिकतर लोग वहां से रकम गंवाकर निकलते हैं, और इसकी लत बढ़ते चलती है।

इस बारे में एक समाचार के मुताबिक दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका में कहा गया था कि इस एनजीओ को माता-पिता से कई शिकायतें मिल रही हैं, जो बच्चों के ऑनलाइन गेम खेलने की आदत से चिंतित हैं। इन गेम्स के ज़रिए बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्याएँ पैदा हो रही है। याचिका में यह भी कहा गया था कि बच्चों के आत्महत्या करने या अवसाद में जाने और ऑनलाइन गेम की लत के कारण चोरी जैसे अपराध करने की कुछ हालिया ख़बरों ने एनजीओ को याचिका दायर करने के लिए मजबूर किया। कोरोना महामारी के दौरान बच्चे पढ़ाई के लिए मोबाइल का बहुत इस्तेमाल कर रहे हैं और इसी कारण से गेम्स खेलने की आदत लग रही है। उनके मुताबिक़ समस्या उन बच्चों में ज़्यादा देखी जा रही है, जिनके माँ-बाप दोनों काम पर जाते हैं। 10 साल से 18 साल के बच्चे इसमें अधिक फँसते है और पैसे ख़र्च करते है।

यह समझना मुश्किल है कि हिंदुस्तान में ऐसी चीजों की इजाजत देने की क्या मजबूरी है एक तरफ तो यह सरकार अपने-आपको भारतीय संस्कृति की पहरेदार भी बताती है और लोगों के बीच अच्छे चाल-चलन को बढ़ावा देने का दावा भी करती है, दूसरी तरफ इस तरह की ऑनलाइन सट्टेबाजी या जुएबाजी में लोगों को डुबाने का इंतजाम करना, उसका खुला इश्तहार करना, उसे हर मोबाइल फोन और कंप्यूटर से खेलना मुमकिन बना देना, यह कहां की समझदारी है? खुदकुशी तो कम होंगी लेकिन अधिक लोग डिप्रेशन में रहेंगे, परिवारों के भीतर लोगों के संबंध खराब होंगे, और लोग अपनी जमा-पूंजी ऐसे ऑनलाइन जुए में खेल के नाम पर लुटा चुके रहेंगे। बिना देर किए हुए केंद्र सरकार को ऐसे तमाम ऑनलाइन खेल बंद करवाने चाहिए जिसकी जरूरत किसी को भी नहीं है। अगर ऐसे ऑनलाइन खेल की जरूरत लग रही है तो देशभर में जुए की फड़ में लोगों को क्यों गिरफ्तार करना  हर की रफ़्तार भी काम रहती है? और सट्टे की पट्टी लिखने वाले लोगों को क्यों गिरफ्तार करना? देश में आज वैसे भी फटेहाली में लोगों का जिंदा रहना मुश्किल हो गया है लोग किसी तरह जी रहे हैं, ऐसे में अगर कोई परिवार किसी तरह बैंक में कुछ रकम बचाकर चल रहा है और घर का कोई भी एक व्यक्ति ऑनलाइन गेम के नाम पर युवाओं में उस रकम को लुटा देगा, तो हो सकता है पूरे परिवार के मरने की नौबत आ जाए, या पूरे परिवार के जिंदा रहने की, बेहतर जिंदगी पाने की संभावनाएं खत्म हो जाएं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 अगस्त 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अगस्त 2021


 

बात की बात, 2 अगस्त


 

धार्मिक-आध्यात्मिक जगहों पर भी बने सेक्स-शोषण विरोधी कमेटियाँ

2 अगस्त 2021

 केरल के एक ईसाई पादरी की जमानत अर्जी हाईकोर्ट से खारिज होते हुए सुप्रीम कोर्ट से भी खारिज हो गई है जिसमें उसकी अपील यह थी कि उसके बलात्कार की शिकार लडक़ी अब उससे शादी करना चाहती है, और इस शादी के लिए उसे कुछ वक्त के लिए जेल से रिहा किया जाए। अदालत से इस पादरी को 20 बरस की कैद सुनाई गई थी क्योंकि उसने एक नाबालिग लडक़ी से बलात्कार किया था, जिसमें वह लडक़ी गर्भवती भी हो गई थी। अब अदालत में इस पादरी और उस लडक़ी दोनों ने यह अर्जी लगाई है कि वे शादी करना चाहते हैं और इस औपचारिकता के लिए पादरी को कैद से कुछ दिनों के लिए मुक्त किया जाए। इन दोनों ने यह तर्क भी लिया है कि बलात्कार के बाद इस लडक़ी से जो संतान हुई है, उसके अब स्कूल जाने की उम्र हो गई है, और स्कूल में अगर पिता का नाम नहीं लिखाया जा सकेगा तो उससे सामाजिक अपमान होगा। पादरी के बलात्कार की शिकार नाबालिग लडक़ी अब बालिग हो चुकी है, और शादी की उम्र की हो गई है। बच्चे की उम्र भी अभी स्कूल जाने लायक हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने जब हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ इस अपील की सुनवाई की तो उसके पूछने पर पता लगा कि पादरी 45 बरस का है और यह लडक़ी अब 25 वर्ष की हो चुकी है। हाईकोर्ट ने जेल से छुट्टी कि यह अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी थी कि सुप्रीम कोर्ट का कई मामलों का यह रुख रहा है कि बलात्कार की शिकार लडक़ी के साथ शादी करके बलात्कारी किसी तरह की रियायत नहीं पा सकते। ऐसा पहले भी देश के कई मामलों में हुआ है जहां दोनों परिवारों की सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से या लडक़ी पर नाजायज दबाव बनाकर या बलात्कार की वजह से होने वाली किसी संतान का ख्याल करके, इस तरह के प्रस्ताव रखे गए थे और यह सोचा गया था कि शादी हो जाने के बाद अदालत से फैसले में कोई रियायत मिल जाएगी।

छत्तीसगढ़ की एक अदालत में तो कई बरस पहले एक ऐसा दिलचस्प मामला आया था जिसमें बलात्कार का एक मुकदमा चल रहा था। और जिस लडक़ी ने बलात्कार की शिकायत की थी उसकी शादी बलात्कारी के साथ हो हो चुकी थी, लेकिन उसने मामला वापस लेने से मना कर दिया था, और गांव से पति-पत्नी दोनों एक साइकिल पर जिला अदालत आते थे और सुनवाई में आमने-सामने खड़े रहते थे। फिर उस मामले का क्या हुआ वह तो ठीक से याद नहीं है लेकिन भारत में जगह-जगह समाज की पंचायत में बैठकर इस किस्म के कई फैसले करवाती हैं। आज भी देश के अधिकतर राज्यों में जाति पंचायतें या समाज की पंचायतें बैठती हैं, और जो हो गया, सो हो गया, यह मानकर बलात्कारी से लडक़ी या महिला को एक मुआवजा दिलवाने का फैसला सुनाती हैं, और सामाजिक दंड के रूप में समाज को खाना खिलाने जैसा कोई और जुर्माना भी लगा देती हैं ताकि सभी लोग मजा करें। ऐसी खाप या जाति पंचायतों में लड़कियों के अधिकार की तो कोई बात ही नहीं होती, लड़कियों के परिवार की इज्जत मामले मुकदमे से और अधिक हद तक लुट जाएगी, बस यही बात होती है। यह भी बात बिल्कुल नहीं होती कि बलात्कारी की भी इज्जत ऐसे मामलों में खराब होनी चाहिए, और उसके परिवार को भी शर्मिंदगी झेलनी चाहिए। हिंदुस्तानी समाज ऐसा अजीब है कि दहेज प्रताडऩा करने वाला परिवार, दहेज हत्या करने वाला परिवार, और बलात्कार करने वाले का परिवार इन सबमें भी लोगों को रिश्ता करने में कोई परहेज नहीं दिखता है।

लेकिन केरल की इस बात पर लौटें, तो यह सोचने की जरूरत है कि एक पादरी ने एक नाबालिग बच्ची से बलात्कार करके उसे गर्भवती कर दिया, इसे लेकर चर्च के पूरे संगठन को जितनी शर्मिंदगी होनी चाहिए थी, वैसी तो कुछ भी कहीं सुनाई नहीं पड़ी। चर्च को तो अपना रुख इस मामले में भी साफ करना चाहिए कि क्या वह बलात्कार की शिकार लडक़ी से बलात्कारी की ऐसी शादी का हिमायती है? चर्च को बहुत सी बातें साफ करना चाहिए। लेकिन हम पहले कई बार लिखी गई एक बात को फिर दोहराते हैं कि धर्म को बलात्कार से कोई परहेज नहीं रहता। एक नाबालिग छात्रा से बलात्कार का आरोपी बूढ़ा आसाराम जेल में बंद है, सुप्रीम कोर्ट तक से उसे जमानत हासिल नहीं हो पाई है, अदालत से कैद पाकर वह सजा काट रहा है, लेकिन उसके भक्तजन देश भर के शहरों में उसकी तस्वीरें लगाकर झांकी निकालते हैं, उसके प्रवचन के पर्चे बांटते हैं, और अपने पूरे परिवार के बच्चों सहित ऐसी शोभायात्रा में शामिल होते हैं। धर्म के नाम पर अंधविश्वास का यह सिलसिला इतना खतरनाक है कि यह धर्म के सिम्हासनों पर बैठे हुए लोगों को भी बर्बाद कर देता है। अगर (बाबा) राम-रहीम के भक्त न होते, तो क्या किसी की मजाल थी कि राम रहीम इस तरह से बलात्कार कर पाता? अगर केरल के इस चर्च में आस्था नाम के अंधविश्वास के शिकार लोग न होते तो इस पादरी को एक नाबालिग लडक़ी के साथ इस तरह बलात्कार करने मिलता? 

धर्म और अध्यात्म से जुड़े हुए लोगों को ऐसे बलात्कार का मौका इसीलिए मिलता है कि उन्हें मानने वाले लोग अंधविश्वास से भरे रहते हैं और उनकी कोई भी बात उन्हें गलत या खराब नहीं लगती है। लेकिन जिस तरह सरकारी और निजी सभी किस्म के दफ्तरों में और कामकाज की जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए कमेटियां बनाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू किया जाता है, उसी तरह का फैसला धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों में लागू किया जाना चाहिए क्योंकि किसी भी धर्म के संस्थान सेक्स शोषण जैसे आरोपों से परे रहते हों इसकी मिसालें बहुत ही कम हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला इस एक मामले में चाहे जैसा फैसला पाए, लेकिन इस मामले की चर्चा की वजह से लोगों में एक जागरूकता आएगी और धर्म स्थानों में धार्मिक और आध्यात्मिक संगठनों में धड़ल्ले से चलने वाले सेक्स शोषण के बारे में हो सकता है कि भक्तों और अनुयायियों में थोड़ी सी जागरूकता भी आ सके, और उनके बच्चे बर्बाद होने से बच सकें।

(Daily Chhattisgarh)


दीवारों पर लिक्खा है, 1 अगस्त 2021


 

तलाक के बाद, या उसके बिना, बेहतर समाज के लिए महिला आत्मनिर्भर हो..

 1 अगस्त 2021

 सोशल मीडिया पर एक लाइन अभी पढऩे मिली कि एक दुख भरी शादी के मुकाबले बिना दुख वाला तलाक बेहतर होता है। बात एकदम खरी है और उन देशों या समाजों के लिए इसकी अधिक अहमियत है जहां पर तलाक को एक बदनाम शब्द माना जाता है। हम यहां पर ऐसे समाज के तलाक की चर्चा नहीं कर रहे जहां मर्दों को ही इसका आसान हक हासिल और औरतों को यह हक मानो मिला हुआ नहीं है, तमाम लोगों की बात कर रहे हैं, जहां पर तलाक देना दोनों के ही हक की बात होती है. वहां पर एक तकलीफ और यातना भरी हुई शादीशुदा जिंदगी को ढोने के बजाय उससे आजाद होकर अकेले होना और फिर आगे की अपनी जिंदगी को खुद तय करना किस तरह बेहतर होता है इसे समझने की जरूरत है।

हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में जब शादी के बाद लडक़ी को घर से विदा किया जाता है तो उसे रवानगी के तोहफे की शक्ल में एक नसीहत दी जाती है कि डोली मां-बाप के घर से उठ रही है, अब अर्थी ससुराल से उठना चाहिए। इसे एक अच्छी महिला होने का पैमाना माना जाता है कि वह ससुराल में मर-खप जाए, तकलीफ की जिंदगी गुजार ले, या तनाव को बर्दाश्त कर ले, लेकिन उसे छोडक़र कभी ना निकले। बहुत से भाई इस बात के हिमायती अधिक दूर तक होंगे कि लडक़ी लौटकर मां बाप के घर कभी ना आए क्योंकि मां-बाप तो अपना वक्त गुजार कर रवानगी डाल देंगे, और उसके बाद लौटी हुई बहन भाइयों की ही जिम्मेदारी रह जाएगी। उसके बाद उस बहन के अगर बच्चे हुए तो उनकी भी जिम्मेदारी भाइयों के परिवार पर आएगी, और कानून की अगर बात करें तो लडक़ी मां-बाप की दौलत में बराबरी की हकदार भी होती है, इसलिए भी हो सकता है कि भाइयों में बहन के लौटने के नाम से ही दहशत होने लगे। ऐसे में हिंदुस्तान के अधिकतर समाज में लडक़ी से ससुराल की ज्यादतियां बर्दाश्त करने की उम्मीद की जाती है। चाहे वह यातना झेलते-झेलते मानसिक रोगी ही क्यों न हो जाये, वह खुदकुशी ही क्यों न कर ले, या उसकी दहेज हत्या ही क्यों ना हो जाए. आमतौर पर लडक़ी के मां-बाप, उसके भाई इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि वह किसी तरह ससुराल में एडजस्ट हो जाए, वहां उसका तालमेल बैठ जाए।

लेकिन जब हम अपने आसपास के लोगों को देखते हैं और एक नजरी सर्वे सा करते हैं कि कौन सी लड़कियां ऐसी हैं जो तनाव को बाकी जिंदगी झेलने के बजाय, एक सीमा तक झेलने के बाद ससुराल और शादी के बंधन से निकलने की हिम्मत जुटा पाती हैं? ऐसा सोचने पर आसपास दिखता यह है कि या तो बहुत संपन्न परिवारों की ऐसी लड़कियां जिनके मां-बाप, भाई उनके साथ में खड़े हुए हैं, वे बाहर निकलने का हौसला जुटा पाती हैं, या फिर मजदूर तबके की ऐसी महिलाएं जिन्हें घर लौटने के बाद में एक कोठरी में अपनी कमाई पर जीने की हिम्मत रहती है, वह भी शादी को तोडक़र बाहर निकलने की हिम्मत दिखा पाती हैं। लेकिन इनसे परे तलाक के मामलों में बाकी महिलाओं का हौसला कुछ कम दिखाई पड़ता है, और केवल वही महिलाएं तलाक का हौसला कर पाती हैं, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहती हैं. यह निष्कर्ष किसी सर्वे पर आधारित नहीं है केवल आसपास के मामलों को देखते हुए ऐसा लगता है कि आर्थिक रूप से संपन्न महिला यातना के सिलसिले को तोडऩे का हौसला जुटा पाती है। इसलिए यह बात बहुत मायने रखती है कि शादी के पहले ही हर लडक़ी को आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जाए ताकि उसके मायके के लोग अगर उसका साथ न भी दें तो भी वह अपने दम पर जिंदा रह सके।

अपने दम पर जिंदा रह सके यह बात तो सोचने का मतलब किसी कोने से भी यह सुझाना नहीं है कि शादी के बाद लडक़ी को उसके मायके की संपत्ति में हिस्सा ना मिले या तलाक के बाद उसके पति और ससुराल से उसे बराबरी की एक जिंदगी जीने का इंतजाम ना मिले। हम इन दोनों इंतजामों के साथ-साथ यह बात सुझाना चाहते हैं कि हर लडक़ी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना उसके परिवार और समाज इन दोनों के लिए भी जरूरी है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसी सरकारें जो कि गरीब लड़कियों की शादी में सरकार की तरफ से समारोह का इंतजाम करती हैं, और घर बसाने के लिए कुछ सामानों का तोहफा भी देती हैं, उन्हें ऐसे लुभावने रस्म-रिवाज का जिम्मा उठाने के बजाय महिलाओं की आत्मनिर्भरता के बारे में कुछ अधिक सोचना चाहिए, और करना चाहिए। सोचने की जरूरत है कि किसी वजह से कोई लडक़ी या महिला अकेले रह जाए, तो उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सरकार क्या कर सकती है?

हिंदुस्तान के ही केरल जैसे प्रदेश को देखें तो वहां ना केवल पढ़ाई-लिखाई बल्कि कई किस्म की पेशेवर ट्रेनिंग का ऐसा इंतजाम है कि केरल के कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं रह जाते। पूरे हिंदुस्तान में मेडिकल ढांचे में जितने किस्म के तकनीकी काम रहते हैं, उनमें केरल से निकले हुए लोग बड़ी संख्या में दिखते हैं। उनके अलावा अंग्रेजी का डिक्टेशन लेने या अंग्रेजी टाइप करने जैसे कामों के लिए भी केरल के लोग बहुत दिखते हैं। फिर बड़ी-बड़ी मशीनों को चलाने में दिखते हैं, उनकी मरम्मत में दिखते हैं। जहां पर पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ हुनर सिखाने का इंतजाम भी होता है, वहां सभी लोग आत्मनिर्भर हो जाते हैं। हमारा यह मानना है कि एक आत्मनिर्भर समाज ही आत्मसम्मान से भरा हुआ समाज हो सकता है, और ऐसा ही समाज यातनामुक्त भी हो सकता है, क्योंकि वहां लोग मजबूरी के संबंधों को ढोने के बजाय बाहर निकलकर अपने दम पर जीने की एक संभावना तो देखते ही हैं।

हिंदुस्तान में शादी को लेकर जितने किस्म का पाखंड प्रचलन में है, वह बताता है कि कन्या का दान किया जाता है। हिंदू शादी में इस्तेमाल होने वाला यह शब्द मानो लडक़ी का दर्जा जिंदगी भर के लिए तय कर देता है कि वह दान में दी जाने वाली एक चीज है। और जिसे दान में कोई सामान मिलता है, उसे उस सामान का अधिक महत्व तो कभी समझ में आता भी नहीं है। इसके साथ-साथ हिंदू समाज में पति के जितने प्रतीकों को सुहाग के प्रतीकों के नाम पर एक महिला पर लाद दिया जाता है, उससे भी वह एक आश्रित का दर्जा पा लेती है, और उसका आत्मविश्वास, उसकी आत्मनिर्भरता इन सब को अच्छी तरह कुचल दिया जाता है। फिर समाज की मान्यताएं भी रहती हैं कि औरत के सुहागिन होकर मरने को उसकी किस्मत की बात माना जाता है। मतलब यह कि औरत अपने पति की मरते तक सेवा करें और उसके मरने के साथ ही उसके प्रतीकों को उतार हिंदुस्तान में शादी को लेकर जितने किस्म का पाखंड प्रचलन में है कामा वह बताता है की कन्या का दान किया जाता है। हिंदू शादी में इस्तेमाल होने वाला यह शब्द मानव लडक़ी का दर्जा जिंदगी भर के लिए तय कर देता है कि वह दान में दी जाने वाली एक चीज है। और जिसे दान में कोई सामान मिलता है उसे उस सामान का अधिक महत्व तो कभी समझ में आता भी नहीं है। इसके साथ साथ हिंदू समाज में पति के जितने प्रतीकों को सुहाग के प्रतीकों के नाम पर एक महिला पर ला दिया जाता है उससे भी वह एक आश्रित का दर्जा पा लेती है और उसका आत्मविश्वास उसकी आत्मनिर्भरता इन सब को अच्छी तरह कुचल दिया जाता है। फिर समाज की मान्यताएं सी रहती हैं की औरत के सुहागिन होकर मरने को उसकी किस्मत की बात मानी जाती है। मतलब यह की औरत अपने पति कि मरते तक सेवा करें और उसके मरने के साथ है ही उसके प्रतीकों को उतार दे, तोड़ दे, और पोंछ दे।

एक महिला के दिमाग में यह बैठा दिया जाता है कि शादी सात जन्मों का संबंध रहता है। इसलिए वह एक जन्म के बाद भी इस बंधन से आजाद होने की नहीं सोच पाती। ऐसी मानसिकता के बीच जरा भी हैरानी की बात नहीं रहती कि कोई महिला पूरी जिंदगी शादीशुदा जिंदगी की यातनाओं को ढोते हुए मर-खप जाती है, और शायद ही कभी अपने मां-बाप के घर पर दोबारा अपना हक पाने के लिए लौट पाती है। आर्थिक आत्मनिर्भरता से परे एक लडक़ी के सामाजिक और पारिवारिक का हक पर भी खुलकर बात होनी चाहिए और इस सोच को जगह-जगह कुचलना चाहिए कि मां-बाप के घर से बस डोली ही निकलती है, और अर्थी तो ससुराल से ही निकलेगी।

हिंदुस्तान के कानून में लडक़ी को मां-बाप की दौलत पर बराबरी का हक दिया गया है, और शादी के खर्च या दहेज को इस हक का विकल्प मान लेना नाजायज बात तो होगी। यह समझने की जरूरत है कि समाज में प्रचलित इस धारणा को भी जगह-जगह धिक्कारना चाहिए कि दहेज के साथ लडक़ी का हक देना पूरा हो जाता है। मां-बाप लडक़ी की शादी पर खर्च अपनी शान शौकत के लिए करते हैं। और दहेज लेना-देना तो वैसे भी जुर्म के दर्जे में आता है और इस सिलसिले को खत्म करना जरूरी है। कोरोना और लॉकडाउन के पूरे दौर में शादियों में 25-50 लोगों का ही बंधन रहा, और वैसे में भी लोगों ने शादियां कर दीं, समारोह कर दिए।

इसलिए अब एक कानून बनाकर प्रदेश सरकारों को भी अतिथि नियंत्रण लागू करना चाहिए ताकि लड़कियों के मां-बाप पर दिखावे की शान-शौकत का जलसा करने का बोझ भी ना रहे। ऐसा करके कानून एक ऐसा माहौल खड़ा करने में मदद कर सकता है जिसमें लड़कियों के नाम पर खर्च दिखाने के लिए शानशौकत की दावत दर्ज कर ली जाए, जिनसे उस लडक़ी को अपनी किसी मुसीबत के वक्त कोई मदद तो मिलती नहीं है। इसलिए लडक़ी के हक और उसकी आत्मनिर्भरता के मुद्दे पर समाज में व्यापक चर्चा जरूरी है, अलग-अलग कई मंचों पर इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए, और ऐसी बात जब अधिक होती है तो वह नीचे तक भी उतरती है. सामाजिक मंचों को ऐसी बहस छेडऩी चाहिए ताकि लोगों के दिल-दिमाग में बैठे हुए पुराने ख्यालात निकल भी सकें, और नई कानूनी बातें घुस भी सकें।

हिंदुस्तान जैसे समाज में लडक़ी और महिला की आर्थिक आत्मनिर्भरता को उनके बुनियादी मानवाधिकार मानना चाहिए। और उनकी ऐसी आत्मनिर्भरता उनके बच्चों की परवरिश के लिए भी एक बेहतर नौबत रहती है, जब बच्चे रिश्तेदारों से किसी मदद के मोहताज नहीं रहते, और अपनी मां की कमाई पर अच्छे से जिंदा रह सकते हैं. ऐसा समाज ही एक बेहतर समाज भी बन सकता है जिसमें एक महिला आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो, और आत्मविश्वास से भरी हुई हो।

(Daily Chhattisgarh)

आस्थावान लोगों को अपने भले के लिए कुछ सवाल सोचने चाहिए

 1 अगस्त 2021

 सोशल मीडिया पर वैसे तो बहुत किस्म की बहसें दिलचस्प रहती हैं, लेकिन एक बहस उनमें बड़ी खास रहती है जो कि आस्थावान, धर्मालु लोगों, और नास्तिक लोगों के बीच चलती है। ये धर्मालु लोग उन लोगों से अलग हैं जिन्हें हिंदुस्तान में हाल के वर्षों में भक्त कहा जाने लगा है। एक वक्त हिंदुस्तान में भक्त या भगत का बहुत अलग मतलब होता था। भक्त सूरदास कहा जाता था, या भगत नाम से भी कई संतों को पहचाना जाता था। इन दिनों जो भक्त दर्जे के लोग हैं, आज की यह बात उनके बारे में बिल्कुल भी नहीं है। आज की बात आस्थावान, धर्मालु और धार्मिक लोगों के बारे में है, जिन्हें किसी एक समय भक्त कहा जाता था, अब भक्त नाम का विशेषण उनसे छीन लिया गया है। लेकिन नास्तिक तो कल भी नास्तिक थे, आज भी नास्तिक हैं, और आने वाले कल भी शायद उनका यही नाम जारी रहेगा क्योंकि इसे छीनने वाले कोई नहीं रहेंगे। अभी ट्विटर पर एक महिला ने ईश्वर के बारे में लिखा कि मैं उसकी आराधना करती हूं, और वह मेरा मार्गदर्शन करता है। कई बार वह मेरी कई प्रार्थना पर तुरंत ही जवाब देता है, जैसे कि मुझे एक बारीक धार वाले एक औजार की जरूरत थी, और मैंने उससे प्रार्थना की, और मैं एक विदेश में एक पहाड़ी और निर्जन इलाके में थी, लेकिन फिर भी 30 मिनट में मुझे वह औजार वहां मिल गया। इसके जवाब में एक जाहिर तौर पर नास्तिक दिखने वाले व्यक्ति ने लिखा कि यह ईश्वर बड़े-बड़े जनसंहार अनदेखा करता है और तुम्हें एक औजार पहुंचाता है!

आस्थावान लोगों की दुनिया ही कुछ अलग होती है। मोटे तौर पर आस्थावान और धर्मालु लोग किसी न किसी धर्म को मानने वाले ऐसे लोग रहते हैं जो धार्मिक रीति-रिवाज का भी पालन करते हैं, धर्मस्थलों पर आते-जाते हैं, धार्मिक त्यौहार मानते हैं, और ईश्वर की उपासना करते हैं। इनके बीच आपस में तौर-तरीकों को लेकर कुछ फर्क हो सकता है लेकिन इनके बीच मोटे तौर पर एक बात एक सी ही रहती है कि इन्हें कानून या विज्ञान, इन सबसे अधिक भरोसा ईश्वर पर रहता है। हिंदुस्तान में भी हम देख चुके हैं कि किस तरह बाबरी मस्जिद को गिराने के वक्त लगातार यह नारा हवा में कुछ बरस गूंजते रहा कि आस्था पर कानून का कोई बस नहीं चल सकता, आस्था कानून से ऊपर होती है, वैसी ही दिमागी हालत में लोगों को लाकर बाबरी मस्जिद को गिराया गया था। लेकिन ऐसा सिर्फ हिंदू धर्म और हिंदुस्तान में होता हो ऐसा भी नहीं है। सिखों के सबसे पवित्र कहे जाने वाले स्वर्ण मंदिर में संत कहे जाने वाला भिंडरावाले जिस तरह हथियारबंद आतंकी गिरोह चला रहा था और जिस तरह वे स्वर्ण मंदिर से बाहर जाकर थोक में हत्याएं करके वापस आकर वहीं रहते थे, उस पूरे खूनी सिलसिले पर धर्म का कोई बस नहीं चला था, और उस दौर में सिख धर्म को देश के कानून से ऊपर मान लिया गया था।

आज भी अफगानिस्तान में तालिबान यही काम कर रहे हैं वह शरीयत का नाम लेकर अपनी मर्जी के इस्लामी कानून लोगों पर लाद रहे हैं, और लोगों को थोक में मार रहे हैं। हिंदुस्तान के ठीक बगल के म्यांमार में बौद्ध धर्म के लोग सत्ता और ताकत में हैं, पिछले कुछ वर्षों से वहां से लगातार जिस तरह मुस्लिम रोहिंग्या लोगों को भगाया गया और जिस तरह उन्हें दुनिया के कई देशों में जाकर शरण लेनी पड़ी, वह एक मिसाल है कि बौद्ध धर्म के भगवाधारी लोगों के बीच भी हिंसा की कोई कमी नहीं है। इटली की माफिया फिल्म देखें या माफिया का इतिहास पढ़ें तो उनमें से कोई भी नास्तिक नहीं थे। वह बात-बात में सीने पर क्रॉस बनाने लगते थे, इतवार को चर्च जाते थे, और पूरी तरह धर्मालु लोग थे और पूरी तरह हिंसक भी थे। जिस अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा नागासाकी पर बम गिराकर लाखों लोगों को मार डाला था, उस अमेरिका के तमाम राष्ट्रपति बाईबिल पर हाथ रख कर ही शपथ लेते हैं, और जाहिर है कि उनमें से हर कोई धर्मालु ईसाई रहे हैं, लेकिन वैसे ही धर्मालु ने जापान पर बम गिराने का, वियतनाम में फौजियों को भेजने का, 20 बरस से अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजियों को बनाए रखने का, इराक पर हमला करने का, सीरिया पर हमला करने का फैसला लिया। इसलिए कोई धर्म किसी को कोई गलत काम करने से कभी नहीं रोक पाया है।

दूसरी तरफ यह ईश्वर को धर्मालु लोग छोटी-छोटी बातों के लिए तमाम श्रेय देते हैं। उस ईश्वर को भी न तो कभी बलात्कार से बच्चियों को बचाना सूझता, न किसी फौजी तानाशाह के हाथों से लोगों को बचाना सूझता। यह तो आस्थावान लोग हैं जो कि हर बात को ईश्वर की मर्जी ठहरा देते हैं, लोगों का जब कुछ बुरा होता है तो उन्हें पिछले जन्म के पाप का फल भुगतना बतला देते हैं, लेकिन वह ईश्वर को न तो किसी अनदेखी का गुनहगार ठहराते, और न ही ईश्वर से सवाल करते कि जब दुनिया में इतने बड़े-बड़े जुर्म हो रहे थे तो वह क्या कर रहा था? जब जर्मनी में हिटलर 10 लाख से अधिक लोगों को मार रहा था तो ईश्वर क्या कर रहा था? और हिटलर के हाथों मारे जाने वाले यहूदियों के देश इजराइल का आज जब बेकसूर फिलिस्तीन पर रात-दिन हमला होता है तो वह ईश्वर क्या करता है ? ईश्वर का यह सिलसिला लाजवाब है, बेजवाब है, किसी को कोई जवाब इसलिए नहीं मिल सकता कि ईश्वर जिंदा तो है नहीं, और जो लोग उसके प्रतिनिधि बनकर लोगों और ईश्वर के बीच एक कड़ी बने रहते हैं, वे ईश्वर से किसी भी सवाल करने का हौसला पस्त ही करते रहते हैं। ईश्वर के लिए प्रतिनिधि ऐसे हैं कि इनके चर्च में बच्चों से पादरी सेक्स करते रहते हैं, और चर्च का ढांचा उसे बचाता रहता है। और क्योंकि ईश्वर के बारे में यह कहा जाता है कि वह सर्वत्र है, सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है, इसलिए हम यह मानते हैं कि बच्चों से बलात्कार करते हुए पादरियों को रोकने के लिए वह ईश्वर भी कुछ नहीं करता। वह महज दीवार पर टंगे रहता है। यह ईश्वर और जगह पर भी कुछ नहीं करता। हिंदुस्तान के हिंदू मंदिरों में जब देवदासी प्रथा चलाकर महिलाओं को सेक्स के लिए इस्तेमाल किया जाता था, तब भी ईश्वर ने कोई दखल नहीं दी। जब दक्षिण भारत में अभी एक सदी पहले तक महिलाओं को अपनी छाती ढंकने के लिए टैक्स देना पड़ता था, तब भी ऐसा टैक्स वसूलने वालों से ईश्वर ने कभी कोई सवाल नहीं किया था। लोगों को अपने आसपास की दुनिया देखनी चाहिए कि उनके पास उनके आसपास कैसे-कैसे जुर्म हो रहे हैं, कैसी कैसी ज्यादती हो रही है, और क्या उनके इलाके में हर 100-200 मीटर पर मौजूद मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च में बैठे ईश्वर क्या किसी बुरे काम को रोक रहे हैं? आस्थावान लोगों को खासकर अपने ईश्वर से ऐसे सवाल करने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)