सौ बीमारी का एक इलाज, गर्व !
14 अगस्त 2021
हिंदुस्तान में गर्व करने के मौके बड़ी आसानी से आ जाते हैं। एक मौका टलता नहीं कि दूसरा खड़ा रहता है। अब जैसे कल आजादी की सालगिरह। जाहिर है कि किसी भी मुल्क को जब सैकड़ों बरस की गुलामी से आजादी मिली, एक के बाद दूसरे विदेशी हमलावर के कब्जे से छुटकारा मिला, तो मुल्क का अपने पर गर्व करना एक जायज हक की बात थी। यह एक अलग बात है कि करीब पौन सदी पहले जो आजादी मिली उस आजादी को खत्म करने में आज कोई कसर नहीं रखी गई है, और उस दिन 15 अगस्त 1947 को गर्व इस बात का था कि मुल्क आजाद हो रहा था, आज गर्व इस बात का है इस मुल्क के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जा रहे हैं, धर्म के नाम पर टुकड़े, जाति के नाम पर टुकड़े, पैसे के नाम पर टुकड़े, खानपान और पहनावे के नाम पर टुकड़े। और मजे की बात यह है कि इस पर भी गर्व है। पौन सदी पहले जो एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाया गया था, उस देश में आज गर्व से यह कहने के लिए कि कोई एक तबका हिंदू है, लोगों को यही राष्ट्रीय गौरव हासिल हो गया है। दूसरे लोगों को मार-मारकर, सडक़ों पर भीड़ की शक्ल में पीटकर और मार डालकर भी अगर उनसे अपने ईश्वर का नाम लिवाया जा रहा है, तो अपनी इस आजादी पर, और दूसरों की उस बेबसी पर लोगों को गर्व है। और गर्व का यह सिलसिला थम नहीं रहा है। गर्व से कहो हम हिंदू हैं का यह गर्व बढ़ते-बढ़ते इतना खूनी हो गया है कि जिस ईश्वर को इस हिंदू धर्म का प्रतीक बना लिया गया है वह खुद ही शर्म से डूब रहा है कि यह किन लोगों के बीच वह फंस गया है। फिर भी उसे फंसाकर भी लोग गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं और अपनी इस आजादी पर उन्हें खूब गर्व है। गर्व का यह सिलसिला अपनी आजादी का कम है और दूसरों की गुलामी पर कुछ अधिक है।
आज ऐसा नहीं कि लोगों की अपनी खुद की जिंदगी में तकलीफ कम है, लेकिन जब लोग देखते हैं कि जिन्हें उनका दुश्मन बताया जाता है, जिन्हें विधर्मी और विदेशी खून से उपजा हुआ बताया जाता है, वे जब अधिक तकलीफ में दिखते हैं, तो अपनी तकलीफ जाते रहती है। गर्व कुछ तो उनकी तकलीफ अधिक देखने का अधिक है। और फिर कुछ गर्व इन बातों का भी है कि अपना ईश्वर आज सब पर हावी है, अपना झंडा सबसे बड़े डंडे में लगा हुआ है। लोग गर्व करने के लिए दूसरों के खिलाफ नफरत को भी जोडऩे की एक बड़ी ताकत की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। नफरत ने लोगों को इतना जोड़ लिया है कि वह अपने इसी जोड़ पर फिदा है और दूसरों को सबक सिखाने पर आमादा है। यह कैसा गौरव है जिसे जिंदा रहने के लिए पड़ोस में कोई एक दुश्मन देश लगता है, क्योंकि दुश्मन के बिना यह गर्व जिंदा नहीं रह पाता। जिसे अपने देश के भीतर भी एक दुश्मन मजहब की जरूरत पड़ती है क्योंकि उसके बिना, उससे नफरत के बिना, अपना धर्म इतने बड़े गर्व का सामान नहीं बन पाता है, जितने बड़े गर्व की जरूरत लोगों को लग रही है। इसलिए एक दुश्मन देश और एक नापसंद धर्म, इन दो पर यह गर्व खड़े रह पाता है, लेकिन इनके बिना वह अदालत के कटघरे में एक मासूम गवाह की तरह फर्श पर बिछने लगता है।
यह सिलसिला देश के लोगों को अपनी तकलीफ भुलाने में मदद भी करता है। जब पेट्रोल-डीजल खरीदना अपने बस में नहीं रह गया, जब इलाज कराना और बच्चों को अच्छा पढ़ाना अपनी मर्जी में नहीं रह गया, अपने बस में नहीं रह गया, तो फिर वैसे में एक झूठा गर्व तमाम किस्म की तकलीफों पर मरहम की तरह लगाने के काम आता है। जब मन गर्व से भर जाता है तो उस फूलकर कुप्पा हुए जा रहे मन में किसी तकलीफ और मलाल की जगह ही नहीं रह जाती। गर्व ऐसे कई मौकों पर लोगों को तकलीफ भुलाने में मदद करता है, झूठी खुशी पाने में मदद करता है, दूसरों को नीचा दिखाने में मदद करता है, और अगर कोई दूसरी वजह ना रहे तो दूसरों के नीचे दिखने की वजह से अपने आपको ऊंचा पाने के एहसास में भी मदद करता है।
लोगों को आज हिंदुस्तान की हालत को देखते हुए बहुत सी बातें समझ में नहीं आ रही है, लेकिन फिर भी उन्हें यह लग रहा है क्यों उन्हें गर्व के साथ जीना है। यह सिलसिला किसी देश के इतिहास में रहा हो, या ना रहा हो, वैसे काल्पनिक इतिहास को याद कर-करके, उस पर गर्व करते हुए जीना बड़ा आसान काम रहता है। लोगों को याद होगा कि जब नोटबंदी हुई थी, और उसमें गर्व के लायक कुछ नहीं मिल रहा था, तो एटीएम पर लगी कतारों को कारगिल के बर्फ में 6 महीने ड्यूटी करने वाले सैनिकों से जोडक़र एक गर्व का सामान जुटा लिया गया था। आज हिंदुस्तान का भाला फेंकने वाला एक नौजवान ओलंपिक से गोल्ड मेडल लेकर लौटता है, उस पर गर्व करना तो जायज है, लेकिन उसकी मेहनत में जब देश के खेल संगठनों ने, और देश की सरकार ने हाथ नहीं जुटाया था, तो उस जिम्मेदारी को उठाना तो भारी-भरकम काम होगा, तुरंत ही उसके भाले को इतिहास के महाराणा प्रताप के भाले से जोड़ देना एक आसान काम रहता है। और महाराणा प्रताप के उस भाले की तारीफ में किसी कविता की चार लाइनें और ढूंढकर उस पर भी गर्व किया जा सकता है। यह एक और बात है कि इतिहास के इस दौर में हिंदुस्तान के राजाओं की कहां-कहां शिकस्त हुई थी, और कैसे-कैसे हिंदुस्तान के राजा मुगलों की शरण में जाकर बचे थे, या जिन्होंने अंग्रेजों के पिट्ठू बनकर रहना मंजूर किया था, उसे याद करेंगे तो आज के गर्व का दूध फट जाएगा। इसलिए खटास की वैसी बातों को याद करना बेकार रहता है, और इतिहास के टुकड़ों में से कुछ चुनिंदा कतरे छांटकर उन पर गर्व कर लेना ठीक रहता है। आज नीरज चोपड़ा की तैयारी में भारत सरकार ने खानपान तक की मदद नहीं की थी यह सोचने से देश को गर्व करने में कुछ दिक्कत हो सकती है। लेकिन राणा प्रताप के भाले पर लिखी गई कविता को याद करना बेहतर है क्योंकि राणा प्रताप भारत सरकार से कोई खानपान का भत्ता भी तो नहीं मानते !
इसलिए हिंदुस्तान में आज ताकत का मनमानी इस्तेमाल करने की इजाजत रखने वाले तमाम तबकों को गर्व करने की बहुत सी वजह हैं, और जिन लोगों को 1947 में मिली आजादी को आज खो देना पड़ा है, ऐसे तबकों को यह मान लेने की काफी वजह हैं कि उन्हें हिंदुस्तान में किसी बात पर गर्व करने का भी कोई हक हासिल नहीं है।
यह ध्यानचंद का सम्मान हुआ है, या हथियार सरीखा इस्तेमाल?
13 अगस्त 2021
अभी जब देश के सबसे बड़े खेल सम्मान का नाम राजीव गांधी के नाम से हटाकर मेजर ध्यानचंद के नाम पर किया गया तो सोशल मीडिया पर मोदी के आलोचकों ने काफी कुछ लिखा। अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल खेल कांप्लेक्स में जिस स्टेडियम का नाम पटेल के नाम पर चले आ रहा था, उसे पिछले बरस नरेंद्र मोदी के नाम पर किया गया, उस समय भी यह बात जमकर उठी थी लेकिन अभी तो लोगों ने और अधिक तल्खी से याद किया और कहा कि अगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर कुछ रखना ही था तो उस स्टेडियम का नाम मोदी ने अपने नाम पर क्यों रखवाया जहां उनकी खुद की पार्टी की सरकार है, जहां का क्रिकेट एसोसिएशन उनके अपने कब्जे में हैं, उसी स्टेडियम का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखवा दिया जाता। खैर, यह तो सरकार की अपनी मर्जी की बात होती है, लेकिन अब जब एक बार फिर ओलंपिक में भारतीय हॉकी खबरों में आई तो उस वक्त फिर मेजर ध्यानचंद का नाम चला। आधी सदी से यह मांग चली आ रही है कि मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिया जाए लेकिन इस मांग को किनारे रख दिया गया है। पिछले ही बरस की बात है, मेजर ध्यानचंद के जन्म की 115वीं सालगिरह थी और अनगिनत भूतपूर्व और मौजूदा हॉकी खिलाडिय़ों ने मिलकर यह मांग की थी कि उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न दिया जाए, लेकिन मोदी सरकार चुप रही उसने ऐसा नहीं किया। और तोहमत के लिए तो कांग्रेस है ही, कि उसने इतने समय में मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न क्यों नहीं दिया था?अधिक पुरानी बात न करें और हाल के बरसों को देखें जब एक गैरकांग्रेसी इंद्र कुमार गुजराल साल भर के लिए प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने इस एक साल में बहुत से लोगों को भारतरत्न दिया। इनमें गुलजारी लाल नंदा, अरूणा आसफ अली, एपीजे अब्दुल कलाम, एमएस सुब्बूलक्ष्मी, और चिदंबरम सुब्रमण्यम, इतने लोग थे। गुजराल के तुरंत बाद अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री बने जो पूरी तरह से भाजपा के थे, और एनडीए सरकार के मुखिया थे, उन्होंने अपने कार्यकाल में जयप्रकाश नारायण, अमर्त्य सेन, गोपीनाथ बोर्दोलोई, रवि शंकर, लता मंगेशकर, और बिस्मिल्लाह खान को भारत रत्न से सम्मानित किया। इसके बाद एनडीए की दूसरी सरकार बनी, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और इस कार्यकाल में मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजपेई, प्रणब मुखर्जी, भूपेन हजारिका, और नानाजी देशमुख को भारत रत्न दिया गया। मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल भी आ गया, और यह सरकार तो बड़ी रफ्तार से बड़े-बड़े फैसले लेने को जानी जाती है, लेकिन ओलंपिक के दो वक्त में भी मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की कोई चर्चा भी नहीं हुई बल्कि पिछले बरस खिलाडिय़ों की मांग पर भी सरकार का कोई रुख सामने नहीं आया। अब राजीव गांधी के नाम पर रखा गया खेल का सबसे बड़ा सम्मान उनके नाम से हटाकर मेजर ध्यानचंद के नाम पर कर दिया गया, लेकिन इसके बाद भी ऐसा नहीं हुआ कि इस मौके पर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न की घोषणा हुई हो। कुल मिलकर देखें तो राजीव गाँधी का अपमान करने में मेजर ध्यानचंद को हथियार की तरह इस्तेमाल कर लिया गया।
हिंदुस्तान में जो नामकरण का सिलसिला अटपटा है और फिर नामों को बदलने का सिलसिला तो और भी बदमजा है। बहुत सी पार्टियों की सरकारें नाम बदलने का यह काम करती हैं और ऐसा इसलिए भी होता है कि नामकरण भी वैसी ही राजनीति दिखाते हुए किए जाते हैं, और बाद में उन्हें बदलना एक अलग किस्म की राजनीति रहती है। ऐसा भाजपा ने भी बहुत किया है, कांग्रेस ने भी बहुत किया है, इसलिए हर किसी की मिसालें बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यह समझने की जरूरत है कि नाम रखते हुए भी सोचा जाना चाहिए और हटाते हुए भी सोचा जाना चाहिए। फिर भी हम आज यहां पर नामकरण और दोबारा नामकरण पर नहीं लिख रहे हैं, हम इस बात पर लिख रहे हैं कि राजीव गांधी का नाम हटाने की बात तो ठीक है लेकिन मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न क्यों नहीं दिया जा रहा है? यह तो मोदी सरकार के हाथ की बात थी और ओलंपिक में हॉकी के जिस खेल को मोदी ने रात-रात जागकर देखा है, टीवी के परदे के सामने खड़े रहकर देखा है, उस हॉकी के खेल के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का सम्मान अगर इस सरकार को सचमुच ही करना है, तो राजीव गांधी का नाम मिटा कर क्यों किया गया? मोदी अपने नाम के स्टेडियम के नाम को ध्यानचंद के नाम पर रखते और उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा करते? ऐसे में ही लोगों को याद पड़ता है कि अरुण जेटली के नाम पर भी दिल्ली के एक ऐतिहासिक स्टेडियम का नाम रख दिया गया। जैसा कि हमने हाल के बरसों में भारतरत्न पाने वालों के नाम गिनाए हैं कि अगर इच्छाशक्ति थी तो इंद्र कुमार गुजराल ने एक बरस के प्रधानमंत्री रहते हुए पांच भारतरत्न दे दिए, और अटल बिहारी वाजपेई ने 6 बरस प्रधानमंत्री रहते हुए पांच भारतरत्न दिए। देने के लिए तो मोदी ने भी पांच भारत रत्न अपने पिछले कार्यकाल में ही दे दिए हैं, लेकिन मेजर ध्यानचंद की बारी वहां पर नहीं आई। मेजर ध्यानचंद को मौका दिया गया तो राजीव गांधी की स्मृतियों को हटाकर उस कुर्सी को खाली करके ध्यानचंद को वहां बैठा दिया। क्या यह सचमुच यही मेजर ध्यानचंद का सम्मान हुआ है? जिस देश में सचिन तेंदुलकर जैसे कारोबारी खिलाड़ी को अभी कुछ ही बरस पहले, सबसे कम उम्र में भारत रत्न दे दिया गया, वहां पर मोदी के 6 वर्षों में भी भारतरत्न के लिए ध्यानचंद का नाम नहीं आया !
गांधी से ग्रेटा थनबर्ग तक, सादगी की नसीहतों पर अमल कैसे हो?
12 अगस्त 2021
गांधीवादी किफायती जिंदगी को अगर देखें तो यह लगेगा कि आज की अर्थव्यवस्था की बुनियाद उससे हिल जाएगी। लोग पैदल या साइकिल से चलने लगेंगे, छोटी-छोटी आवाजाही के लिए कारों का इस्तेमाल कम हो जाएगा, सडक़ों पर गाडिय़ों की भीड़ घटेगी, और पैदल चलने वाले या साइकिल चलाने वाले लोग प्रदूषण पैदा नहीं करेंगे तो हवा साफ करने वाली मशीनों की बिक्री घट जाएगी, गाडिय़ां कम चलेंगी तो ऑटोमोबाइल की कंपनियों का भट्टा बैठ जाएगा, पेट्रोलियम कम बिकेगा, और लोग सेहतमंद भी रहेंगे। सोशल मीडिया में पैदल और पैडल के फायदे गिनाते हुए लोग यह भी गिनाते हैं कि इससे नुकसान किस-किसका होगा। सेहतमंद लोग देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख देते हैं, न महँगे इलाज की जरूरत पड़ती, न बड़े अस्पतालों की, न कसरत की मशीनों की, और न उन्हें जिम जाना पड़ता। ऐसे लोग देश की अर्थव्यवस्था में कुछ भी नहीं जोड़ पाते, न किसी चीज की बर्बादी करते, ना खुद बर्बाद होते। दूसरी तरफ महज बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में चलने वाले लोग, रेस्तरां का फास्ट फूड खाने वाले लोग, कुल मिलाकर अस्पतालों को चलाते हैं, उनका खुद का आकार हर बरस बदल जाता है, तो उनकी वजह से फैशन उद्योग भी चलता है। और पैदल और पैडल में भी सबसे खतरनाक पैदल लोग रहते हैं क्योंकि वे तो साइकल तक नहीं खरीदते और साइकिल उद्योग भी नहीं चलता।सोशल मीडिया पर हल्के फुल्के मिजाज में लिखी गई ऐसी गंभीर बातों के साथ-साथ एक दूसरी बात को भी समझने की जरूरत है। अभी दो दिन पहले ही यूरोप की सबसे चर्चित पर्यावरणवादी आंदोलनकारी किशोरी ग्रेटा थनबर्ग का एक बयान सामने आया है जिसमें उसने अंधाधुंध मार्केटिंग करने वाले फैशन उद्योग की आलोचना की है कि वह लोगों के बीच गैरजरूरी फैशन को बढ़ावा देता है। और ग्रेटा ने यह बात कहने के लिए एक फैशन मैगजीन वोग को दिए हुए एक इंटरव्यू का इस्तेमाल किया जिसमें उसने कहा कि पर्यावरण की बर्बादी के लिए और मौसम की तरह-तरह की इमरजेंसी आने के लिए फैशन उद्योग बहुत हद तक जिम्मेदार है। फैशन उद्योग हर कुछ महीनों में फैशन बदलकर लोगों को नए कपड़े और सामान खरीदने के लिए उकसाते रहता है। ग्रेट ने यह कहा कि वह कभी नए कपड़े नहीं खरीदती, अगर जरूरत भी रहती है तो पुराने कपड़ों के बाजार से इस्तेमाल होने के बाद बिकने वाले पुराने कपड़े ही खरीदती है, और जान-पहचान के करीबी लोगों से कपड़े उधार लेकर भी अपना काम चला लेती है 18 बरस की ग्रेटा थनबर्ग स्वीडन की एक किशोरी है और पर्यावरण को लेकर अपने आंदोलन की वजह से वह खबरों में भी रही। पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बावलेपन की हद तक जाकर ग्रेटा थनबर्ग पर हमला करते थे जिसका मजा लेते हुए ग्रेटा अमेरिका की पर्यावरण विरोधी नीतियों को उजागर करते रहती थी।
इन दो अलग-अलग बातों को अगर देखें तो इनका एक दूसरे से बहुत सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन दोनों ही बातें पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी हैं। एक तो यह कि लोग एक सेहतमंद जीवनशैली इस्तेमाल करें जिसमें वे पैदल और पैडल पर अधिक निर्भर करें। यह जरूरी है। इसके साथ ही यह भी समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान से हजारों मील दूर किस तरह एक संपन्न यूरोपियन देश स्वीडन में एक किशोरी उन्हीं जीवनमूल्यों को बढ़ावा दे रही है जिन्हें गांधी ने अपनी जिंदगी में इस गरीब हिंदुस्तान में बढ़ाया था. आज अगर यह सोचें कि क्या हिंदुस्तान में कोई लडक़ा या लडक़ी अपने किशोरावस्था में पर्यावरण को लेकर ऐसी जागरूकता की बात कर सकते हैं, तो गांधीवादी होने का दावा करने वाले परिवारों में भी ऐसे कोई बच्चे नहीं मिलेंगे। इसलिए गांधीवादी किफायत न सिर्फ धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी है, बल्कि गांधी के किस्म की आत्मनिर्भरता लोगों की सेहत के लिए भी जरूरी है। यह एक अलग बात है कि आज दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह से फिजूलखर्ची पर टिक गई है, वह अर्थव्यवस्था जरूर डांवाडोल होने लगेगी।
आज हिंदुस्तान में किसी संपन्न तबके के बच्चों को तो छोड़ ही दें, औसत दर्जे की कमाई वाले परिवारों में भी बच्चे धरती को बचाने के लिए बाजार से पुराने कपड़े खरीदें या यार दोस्तों से उधार में लेकर पहन लें ऐसा किसी ने देखा-सुना भी नहीं होगा। इसलिए ग्रेटा की बातों को ग्रेट मानना भी जरूरी है और उनको गांधी के नजरिए से देखना भी जरूरी है. यह भी समझना जरूरी है कि किस तरह आज का फैशन उद्योग लोगों को गैरजरूरी खरीदारी के तरफ धकेलता है और फैशन को बार-बार बदल कर लोगों को ग्राहक बनाए रखता है, समर्पित ग्राहक।
वैसे तो देश और दुनिया में चर्चित बहुत से फिल्मी और खिलाड़ी सितारों को देखें तो उनकी एक अपील भी गैरजरूरी फैशन खपत को घटा सकती है, लेकिन घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? यही सारे फिल्म और क्रिकेट के सितारे ऐसे हैं, जो तमाम किस्म की फैशन के इश्तहार करते हैं, उनको बढ़ावा देते हैं। अब अगर अमिताभ बच्चन ही यह कहने लगें कि वे तो पिछले 15 वर्षों से एक ही पतलून पहन रहे हैं, या उन्होंने तो पिछले 5 बरस से कोई नया सूट सिलवाया नहीं है, तो उनके खुद के पेट पर लात पड़ेगी। इसलिए जो लोग मॉडलिंग और बिक्री को बढ़ावा देने के ऐसे धंधे की कमाई पर नहीं टिके हुए हैं, उन लोगों को खुलकर सादगी, और फैशन की बात करनी चाहिए। अब कनाडा का प्रधानमंत्री अगर किसी मौके पर अपने रंग-बिरंगे मोजों के रंग, या उन पर छपी हुई डिजाइन को लेकर अपने सामाजिक सरोकार के प्रदर्शन पर वाहवाही पाता है, तो दुनिया के और भी बहुत से नेता और दूसरे चर्चित व्यक्ति फैशन की बर्बादी घटाने के लिए इस तरह के बयान दे सकते हैं। बहुत छोटी-छोटी बातों को देखें तो फेसबुक कंपनी का नौजवान मालिक मार्क जुकरबर्ग अधिकतर वक्त सलेटी रंग की मामूली टी-शर्ट और जींस में ही दिखता है। उसे किसी मौके के लिए कपड़े छंाटने में भी अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती क्योंकि उसने इन्हीं रंगों के, ऐसे ही डिजाइन के यही कपड़े 4-6 जोड़ी रखे हुए हैं। ऐसे चर्चित लोग भी अगर किफायत को लेकर कोई आंदोलन शुरू करेंगे तो उसका धरती पर बड़ा असर पड़ सकता है लेकिन सवाल यह है कि जिस फेसबुक पर रात-दिन फैशन के इश्तहार आते हैं, क्या वहां पर धंधा मार नहीं खायेगा? इसलिए बहुत से लोग जो सीधे-सीधे मॉडलिंग से जुड़े हुए नहीं है वे लोग भी इश्तहार की कमाई से तो जुड़े हुए हैं। देखें इन्हीं के बीच से कोई रास्ता ऐसा निकल सकता है क्या, जिसमें चर्चित लोग गांधी या ग्रेटर थनवर्ग की तरह किफायत और सादगी को बढ़ावा दे सकें। जिस वक्त चीन में अकाल की नौबत थी और लोगों के पास काम नहीं था, खाना नहीं था, उस वक्त वहां औरत-मर्द सभी के लिए एक ही किस्म की पतलून और वैसा ही कोट, और वह भी एक ही रंग के, लागू कर दिए गए थे ताकि लोग फैशन में बर्बाद ना हों। आज भी सरकार और समाज में जिम्मेदार लोगों को यह देखना चाहिए कि जिंदगी कैसे अधिक किफायती हो सकती है, और कैसे हम धरती पर अधिक बड़ा बोझ बनने से बचें।
सांवलिया सेठ मंदिर के चढ़ावे को देख मजदूर भी कुछ सीखें...
11 अगस्त 2021
जाने कैसे खबरों में और सोशल मीडिया में पिछले 4 दिनों से एक मंदिर की ऐसी तस्वीरें लगातार घूम रही हैं जिनमें ईश्वर के लिए आया हुआ चढ़ावा गिना जा रहा है। दर्जनों लोग बैठकर नोटों को अलग कर रहे हैं, सिक्कों को अलग कर रहे हैं, उनके बंडल बनाते जा रहे हैं। कुछ खबरें ताजा हैं, कुछ तस्वीरें और आंकड़े पिछले सालों के भी हैं। कुल मिलाकर मध्यप्रदेश-राजस्थान की सरहद पर राजस्थान के हिस्से के इस मंदिर में हर महीने करोड़ों का चढ़ावा आने की खबरें पिछले वर्षों में लगातार आ रही हैं। देश का प्रमुख मीडिया, देश के प्रमुख अखबार, सभी जगहों पर आंकड़ों के साथ इस मंदिर की कमाई का जिक्र है, और उसकी तस्वीरें भी हैं। अब यह जगह कोई बहुत बड़ा तीर्थ स्थान नहीं है जहां पर तिरुपति या नाथद्वारा या स्वर्ण मंदिर या अजमेर शरीफ की तरह बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। लेकिन सांवलिया सेठ का यह मंदिर कई मायनों में बड़ा चर्चित है। और जैसा कि सांवले रंग से समझ में आ जाना चाहिए यह कृष्ण का एक मंदिर है। कृष्ण के अनगिनत रूपों में से एक रूप उनके सांवले रंग की वजह से सांवलिया सेठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। अब इस मंदिर में इतने चढ़ावे की एक वजह यह भी है यह पूरा इलाका अफीम की गैरकानूनी खेती का इलाका माना जाता है और अफीम तस्कर परंपरागत रूप से इस मंदिर के भगवान को अपना भागीदार बनाकर चलते हैं। जब कभी वे अफीम की कोई बड़ी खेप बाहर भेजते हैं, तो हिस्सा देने पहुंचते हैं और चढ़ावे में नोटों के साथ-साथ अफीम भी डाली जाती है। हर महीने अमावस्या को दान पेटी खोली जाती है तो उसमें से करोड़ों रुपए निकलते हैं जो कि जाहिर तौर पर अफीम तस्करों के दिए गए दान की वजह से इतनी बड़ी रकम बन पाते हैं। इस बात को उस इलाके के तमाम लोग अच्छी तरह जानते हैं यह बात खबरों में आती रहती है, इसलिए यह हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोई साजिश भी नहीं है। ये खबरें बड़े धर्मालु हिंदुओं के मालिकाना हक वाले अखबारों और मीडिया में आती हैं, और अफीम को चूंकि काला सोना कहा जाता है इसलिए सांवलिया सेठ को भी काले सोने का देवता कहते हैं।लोगों को याद होगा कि दक्षिण भारत के विख्यात तीर्थस्थान तिरुपति में भी वहां के देवता को उनके मानने वाले लोग अपने व्यापार में भागीदार मानकर चलते हैं और फिर चाहे उनका व्यापार शराब का ही क्यों ना हो, वे अपने बही-खातों में ईश्वर के नाम का हिस्सा दिखाते हुए उतनी रकम को दान में तिरुपति ट्रस्ट को हर बरस भेजते रहते हैं. उनकी आस्था उन्हें यह भरोसा दिलाती है कि ईश्वर की भागीदारी की वजह से उनका कारोबार खूब पनपेगा। और यह बात बहुत गलत भी नहीं है क्योंकि ऐसे भागीदार लोगों के धंधे में बरकत से ईश्वर का खुद का भी फायदा बढ़ता है, और यही वजह है कि व्यापारी अधिक कामयाब होते हैं, मजदूर बमुश्किल मजदूरी कमा पाते हैं, और बीच के लोग जो कि अधिक चढ़ावा नहीं दे पाते जो कि मुफ्त का लड्डू प्रसाद के रूप में पाकर ही प्रसाद पा सकते हैं, प्रसाद को खरीद नहीं सकते हैं, उनकी जिंदगी भी जस की तस चलती रहती है वह आखिर ईश्वर को किस चीज में भागीदार बना सकते हैं?
जिन लोगों ने गॉडफादर फिल्म देखी होगी या मारियो पूजा की लिखी हुई कहानी पढ़ी होगी, उन्हें पता होगा कि किस तरह दुनिया के सबसे खूंखार मुजरिम और माफिया सरगना अपने दिल की गहराइयों से ईसाई धर्मावलंबी रहते हैं, सुख-दुख के तमाम मौकों पर चर्च जाते हैं, इतवार को चर्च जाते हैं, एक-दूसरे को कत्ल की साजिश चर्च और कब्रिस्तान में करते हैं। लेकिन किसी का ईश्वर उन्हें किसी जुर्म से नहीं रोकता, किसी जुर्म की कमाई से नहीं रोकता। ईश्वर ने अगर जुर्म की कमाई से किसी को रोका होता तो भला मुंबई का एक बड़ा माफिया सरगना और एक सबसे बड़ा तस्कर मस्तान कैसे हाजी बना होता? हाजी तो लोग एक तीर्थ करने के बाद, हज करने के बाद ही बन पाते हैं, और मस्तान जब हाजी बन गया तो जाहिर है कि उसके पीछे भी ईश्वर की मर्जी रही होगी।
ईश्वर और काले कारोबार का यह पूरा सिलसिला दुनिया में कहीं भी एक-दूसरे के साथ कोई टकराव नहीं रखता। हमने दुनिया के सैकड़ों धर्मस्थानों के बारे में पढ़ा है, दर्जनों को रूबरू देखा भी है। किसी एक में भी ऐसी कोई तख्ती नहीं लगी है कि जुर्म करने वाले और पापी यहां पर ना आएं, ईश्वर के सामने ना पड़ें, पाप की कमाई से यहां दान ना दें। सच तो यह है कि जब बड़े से बड़े चर्चित धर्मस्थान पर बड़े-बड़े चर्चित मुजरिम पहुंचते हैं, तो उनके स्वागत के लिए उस जगह के, उस धर्म के पुजारी खड़े रहते हैं। वह तमाम लोगों की भीड़ को चीरते हुए ऐसे मुजरिमों को लेकर ईश्वर तक जाते हैं और फिर जितनी देर ईश्वर और मुजरिम एक दूसरे को देखना चाहते हैं, उतनी देर ये पुजारी बाकी लोगों की भीड़ को रोककर रखते हैं। अलग-अलग धर्मों में रिवाज थोड़ा सा कम-अधिक फर्क वाला हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर बात यह है कि दुनिया का एक भी धर्म पाप की काली कमाई से कोई परहेज नहीं करता। धर्म स्थानों पर यह तो लिखा दिखता है कि यहां दलित भीतर ना आएं, महिलाएं भीतर ना आएं, गैरहिंदू भीतर ना आएं, लेकिन जिस मंदिर से यह चर्चा हमने शुरू की है, सांवलिया सेठ के उस मंदिर में भी ऐसी किसी तख्ती की चर्चा पिछले कई बरस की खबरों में हम न ढूंढ पाए कि क्या वहां पर अफीम तस्करों के लिए आने की कोई मनाही है? क्या वहां पर अफीम की कमाई दान में न देने या दान पेटी में अफीम न डालने की कोई अपील है? ऐसा कुछ भी नहीं है।
जो धर्म अपने भीतर के इंसानों को अछूत और सछूत तो जैसे तबकों में बांटकर चलता है, उस धर्म में भी कोई भी नोट, कोई भी सिक्का, कोई भी गहने, कुछ भी अछूत नहीं हैं. और तो और अफीम की डली और अफीम की पोटली भी अछूत नहीं है। ईश्वर का यह हैरान करने वाला दरबार रहता है जहां किसी मुजरिम के लिए कोई मनाही नहीं है जहां किसी जुर्म की कमाई से कोई परहेज नहीं है। और तो और यह भी याद पड़ता है कि मदर टेरेसा ने भी अपने अनाथ आश्रम के बच्चों के लिए दुनिया के कुछ ऐसे लोगों से दान लिया था जिन्हें मुजरिम माना जाता था। अब जब ईश्वर को ही परहेज नहीं है, तो ईश्वर का नाम लेकर अनाथ बच्चों को जिंदा रखने का काम करने वाली मदर टेरेसा कैसा परहेज निभा सकती है? इसलिए जिस पैसे को प्रवचनकर्ता हाथों का मैल करार देते हैं, उस पैसे के बारे में एक भ्रष्ट नेता, अधिक बेहतर तरीके से, अधिक सच्चाई के साथ बता सकता है कि पैसा खुदा तो नहीं है, लेकिन खुदा से कम भी नहीं है। बात एकदम सही है, किसी धर्मस्थल की ऐसी हिम्मत हमने आज देखी-सुनी तो दूर, कहानी में भी नहीं पढ़ी है जहां पर यह लिखा गया हो कि इस जगह पर मुजरिमों और पापियों के आने पर रोक है, और जुर्म की काली कमाई दान में डालने पर रोक है।
ईश्वर को तस्करों से लेकर तमाम किस्म के मुजरिमों तक की भागीदारी अच्छी लगती है. अफीम के धंधे में भागीदारी से भी उसे कोई परहेज नहीं है। धर्म में जिनकी दिलचस्पी है उन्हें धर्म की बारीकियों को जानना चाहिए। अगर ईश्वर सिर्फ नेक काम करने वाले, पुण्य करने वाले लोगों का दान मंजूर करने लगेगा तो उसे दिन में दो बार अपनी प्रतिमा से निकलकर पास के गुरुद्वारे में लंगर खाने के लिए जाना पड़ेगा। ईश्वर समझदार है, व्यावहारिक है इसलिए वह किसी किस्म की कमाई को बुरा नहीं मानता और दो नंबर के धंधे में भी अगर उसे भागीदार बनाकर रखा जाता है तो वह उनको भी बरकत देता है। मनरेगा के मजदूरों को जरूर अपनी मजदूरी बढ़वाने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि उन्होंने किसी ईश्वर को अपनी मजदूरी की कमाई में भागीदार बनाया हुआ नहीं है। मजदूरों को भी अफीम तस्करों से दो नंबरियों से लेकर 10 नंबरियों तक से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है, क्योंकि वह सीख नहीं पाए हैं इसीलिए हाड़-मांस जलाते हुए रात-दिन मेहनत करते हैं, और आधा पेट खाकर सोते हैं। ईश्वर के तौर-तरीके अलग किस्म के हैं और वहां पर एक अलग ही भाषा चलती है, उस भाषा में पार्टनरशिप-डीड लिखवाना मजदूरों को आना चाहिए।
उस बन्दूकप्रेमी अमरीका से लेकर नफरतप्रेमी हिंदुस्तान तक के खतरे
10 अगस्त 2021
कई बरस पहले अमरीका के एक स्कूल में एक सिरफिरे समझे जा रहे नौजवान ने गोलियों से दर्जनों बच्चों को भून दिया था। इस हत्यारे से जुड़ी हुई जो खबरें आई थीं उन पर भारत के लोगों के सोचने का भी एक पहलू है। इस अमरीकी नौजवान की मां को बंदूकों से बहुत मोहब्बत थी और वह अपने बेटों को पास की एक शूटिंग-रेंज पर ले जाया करती थी, जहां पर कि बंदूकों के शौकीन बहुत से लोग प्रैक्टिस के लिए आया करते थे। और वह बंदूकों के अपने संग्रह के बारे में भी लोगों से फख्र के साथ बात किया करती थी। दो दिन पहले जब वह अपने बेटों के हाथों मारी गई, तब उसी की बंदूक उसके खिलाफ इस्तेमाल हुई और इसके बाद वह बेटा इसी मां के स्कूल जाकर वहां छब्बीस और लोगों को मार बैठा। हर कुछ महीनों में अमरीका में ऐसी वारदात होती ही रहती हैं।




