आज का यह संपादकीय अदम गोंडवी की कलम से

28 अक्टूबर 2021

 

एक जाने-माने शायर अदम गोंडवी के गुजरने से भी उनकी मौत नहीं हुई। अपनी लिखी बातों को लेकर वे हिंदुस्तान के बहुत तकलीफजदा लोगों की आवाज बनकर हमेशा बने रहेंगे। उनकी गज़लें और उनके शेर किसी दूसरे शायर से अलग, पूरी तरह लोगों के दुख-दर्द से उपजे हैं और दो-दो लाइनों में तकलीफ को इस कदर साफ-साफ बयां करना हमारे लिए भी आसान नहीं है। कमोबेश इसी किस्म की बातें हम आए दिन इस कॉलम में लिखते हैं और आज हमें यह लग रहा है कि हम एक दिन में इतनी जगह में इतनी बातें और किस तरह कह सकते हैं, बजाय अदम गोंडवी को यह जगह दे देने के। हम उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हैं और जुड़े हुए हैं, इसलिए आज का संपादकीय उन्हीं का लिखा हुआ है।

सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है।
कोठियों से मुल्क के मेयार को मत आंकिये
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है।
सत्ताधारी लड़ पड़े है आज कुत्तों की तरह
सूखी रोटी देखकर हम मुफ्लिसों के हाथ में!
जो मिटा पाया न अब तक भूख के अवसाद को
दफन कर दो आज उस मफ्लूज पूंजीवाद को।
बूढ़ा बरगद साक्षी है गांव की चौपाल पर
रमसुदी की झोपड़ी भी ढह गई चौपाल में।
जिस शहर के मुन्तजिम अंधे हों जलवामाह के
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है।
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
रोशनी वो गांव तक पहुंचेगी कितने साल में।
——
आजादी का वो जश्न मनाएं तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
——
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।
——
ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब
जि़न्दगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया
——
ज़ुल्फ़-अंगड़ाई-तबस्सुम-चाँद-आईना-गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब
पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है पढ़े दिल की किताब
——
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
ये वन्दे-मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
——
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
——
सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
——
बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरखान को
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
——
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
——
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ्ऩ है जो बात, अब उस बात को मत छेडि़ए
गऱ ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेडि़ए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेडिय़े
छेडिय़े इक जंग, मिल-जुल कर गऱीबी के खिलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेडि़ए

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर 2021


 

हिंदुस्तान में पेगासस के इस्तेमाल की जांच का सुप्रीम कोर्ट का शानदार फैसला, अब दूध का दूध...

27 अक्टूबर 2021

 

इजराइली जासूसी घुसपैठिया स्पाइवेयर पेगासस के भारत में इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका पर आज अदालत का बहुत महत्वपूर्ण फैसला आया है। इस फैसले के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की देखरेख में अदालत ने विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई है जो भारत में पेगासस के इस्तेमाल की जांच करेगी कि इसका इस्तेमाल हुआ है या नहीं, और अगर हुआ है तो किस कानून के तहत, किन लोगों के खिलाफ इससे घुसपैठ की गई है। इस तरह के बहुत से पहलुओं को लेकर अदालत ने बड़ा साफ-साफ आदेश दिया है, और यह आदेश इस सुनवाई के दौरान अदालत में भारत सरकार द्वारा दिए गए तर्कों को खारिज करते हुए सामने आया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की एक बेंच ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र कर देने से ही केंद्र सरकार इस जांच से नहीं बच सकती। सुनवाई के दौरान भारत सरकार कोई भी जवाब देने से बार-बार कतराती रही कि उसने इसका इस्तेमाल किया है या नहीं। सरकार का तर्क था कि ऐसी कोई भी जानकारी देना कि वह किस निगरानी या घुसपैठ सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करती है, उससे आतंकियों को सरकार के तरीकों की जानकारी मिलेगी और उससे वे चौकन्ने भी हो सकते हैं। लेकिन केंद्र सरकार के वकील के यह सारे तर्क मुख्य न्यायाधीश ने खारिज कर दिए और कहा कि अदालत को राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलुओं को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है, और वह केवल यह पता लगाना चाहती है कि क्या पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल करके नागरिकों को निशाना बनाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला देश में नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में एक बड़ा फैसला है। अदालत ने जिन बातों की जांच करने के लिए कहा है उनमें यह भी है कि क्या भारत के नागरिकों के फोन या दूसरे उपकरणों पर मौजूद जानकारी पाने के लिए, उनकी बातचीत सुनने के लिए, या किसी और मकसद से पेगासस का इस्तेमाल किया गया? अदालत ने यह भी जांच करने कहा है कि अगर ऐसा स्पाइवेयर हमला हुआ है तो किन लोगों पर हुआ है? अदालत ने यह भी कहा कि जब भारत के नागरिकों ने 2019 में पेगासस का इस्तेमाल करके उनके व्हाट्सएप अकाउंट हैक करने की जानकारी मीडिया की रिपोर्ट में दी थी, तो उसके बाद से सरकार ने क्या कदम उठाए या क्या कार्यवाही की थी? अदालत ने यह भी जानने के लिए कहा है कि किसी भी राज्य सरकार, केंद्र सरकार, या किसी केंद्रीय और राज्य एजेंसी ने पेगासस का इस्तेमाल किया है, और अगर किया है तो किस कानून, नियम, और वैध प्रक्रिया के तहत ऐसा किया है? अदालत ने इस एक्सपर्ट कमेटी से यह सिफारिश भी मांगी है कि कैसे इस देश में नागरिकों की निजता के अधिकार पर हमले को रोका जा सकता है कैसे नागरिकों के उपकरणों की अवैध निगरानी के संदेह पर शिकायत के लिए एक तंत्र विकसित किया जा सकता है, कैसे साइबर सुरक्षा को बढ़ाया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का आज का यह फैसला जनहित याचिका लेकर अदालत पहुंचने वाले कई लोगों के साथ-साथ देश के तमाम नागरिकों को राहत देगा जिसमें पेगासस के हमले से अब तक प्रभावित न होने वाले लोग भी हैं। अदालत में  याचिका लगाने वाले कई ऐसे पत्रकार भी थे जिनको अभी उन पर पेगासस के हमले की जानकारी नहीं थी, लेकिन जिन्होंने व्यापक मीडिया हित में, और जनहित में याचिका लगाई थी। आज का यह फैसला केंद्र सरकार के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दे रहा है और यह फैसला साफ-साफ कह रहा है कि केंद्र सरकार केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क देकर न्यायिक जांच से दूर नहीं हो सकती। उसने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसी डरावनी नहीं हो सकती कि अदालतें इसका नाम लेने भर से दूर हट जाएं। चूँकि मुख्य न्यायाधीश सहित दो अन्य न्यायाधीशों की बेंच ने यह फैसला दिया है, तो ऐसी गुंजाइश कम दिखती है कि इसके खिलाफ केंद्र सरकार किसी पुनर्विचार याचिका में जाए और केंद्र सरकार को अपनी किसी निगरानी को अदालती जांच-पड़ताल से बाहर रखने की कोई राहत मिल सके। अदालत का रुख बिल्कुल साफ है कि शासन द्वारा केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का आव्हान करने से अदालत मूकदर्शक नहीं बन जाती है। फैसले में यह भी लिखा गया है कि भारत सरकार का अदालत में पेगासस के इस्तेमाल पर किसी बात की पुष्टि करने से बहुत स्पष्ट इनकार, पर्याप्त नहीं है, और अदालत ने याचिकाकर्ताओं की रखी गई सामग्री पर विचार और जांच की जरूरत कही है। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ताओं के द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच के लिए उनके तर्क मंजूर करने के अलावा अदालत के पास और कोई विकल्प नहीं है।

पेगासस को लेकर हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के बहुत से देशों की सरकारों और वहां की लोकतांत्रिक संस्थाओं में खलबली मची हुई है। कुछ देशों ने औपचारिक रूप से जांच-आदेश भी दिए हैं कि क्या उसके नेताओं पर किसी और देश में पेगासस के माफऱ्त हमला किया है, और घुसपैठ की है? और कम से कम 2 देश ऐसे हैं जहां पर अलग-अलग लोगों की हत्याओं के पीछे पेगासस के इस्तेमाल की बात खुलकर सामने आई है। इन 2 लोगों को मारने के पीछे किसी देश की सरकार का हाथ बताया जा रहा है। हिंदुस्तान में लोकतंत्र की यह मांग है कि जनता की जिंदगी में राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में अगर ऐसी घुसपैठ हुई है, तो सच सामने आना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

इस गैर जिम्मेदार लोकतंत्र में गरीब आदिवासी की जगह आर्यन खान के मुकाबले कहाँ?

  26 अक्टूबर 2021



हिंदुस्तान का मीडिया पिछले 20-25 दिनों से शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की गिरफ्तारी को लेकर उफना हुआ है। रात दिन टीवी पर उसी की तस्वीर दिखती है, और अधिकतर अखबारों के पहले पन्ने पर उसका कब्जा है। एक आलीशान जहाज पर चल रही पार्टी में नशा परोसा जा रहा था, और भारत के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने उस पर छापा मारा तो बिना किसी नशे के आर्यन को भी उसी पार्टी में गिरफ्तार किया गया, और अब तक उसकी जमानत नहीं हो पाई है। बहुत से लोगों का यह मानना है कि क्योंकि शाहरुख खान ने एक-दो बरस पहले बिना नाम लिए देश के माहौल की कुछ आलोचना की थी, या देश में सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ कुछ कहा था, इसलिए उनके बेटे को निशाना बनाकर यह कार्यवाही की जा रही है। जो भी हो अगर किसी ने नशा किया है, या उसके पास से नशा पकड़ाया है, या वह नशे के कारोबार से जुड़ा हुआ मिला है तो उस पर कार्यवाही तो होनी चाहिए। फिर शाहरुख खान का बेटा होने के नाते आर्यन को हिंदुस्तान के सबसे महंगे वकीलों की सहूलियत हासिल है और आज जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं उस वक्त उसकी जमानत के लिए देश के एक सबसे महंगे वकील मुकुल रोहतगी के पहुंचने की खबर है। इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि शाहरुख खान की तमाम दौलत की मदद से उनका बेटा हिंदुस्तानी अदालतों में इंसाफ पाने की अधिक संभावना रखता है बजाए किसी गरीब फटेहाल बेबस के।

लेकिन जितने टीवी चैनल या जितने अखबार सरसरी नजर में हमारे देखने में आते हैं, उनमें आर्यन की गिरफ्तारी की खबर के पीछे दबी-छुपी हुई भी एक खबर नहीं दिखती कि कर्नाटक में 12 बरस पहले एक आदिवासी छात्र को नक्सल साहित्य रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, और उसके बूढ़े पिता को भी। अदालत ने अभी उन्हें उनके खिलाफ कोई भी सबूत न होने की वजह से रिहा किया है, और जिंदगी के इतने बरस गंवाने के बाद वे अब खुली हवा में आए हैं। लेकिन खबरों में उनका इतना भी महत्व नहीं है कि एक आदिवासी के साथ हो गई ऐसी ज्यादती को ठीक से जगह मिल सके, या मामूली जगह भी मिल सके। इससे यह पता चलता है कि देश में लोकतंत्र का क्या हाल है। जब लोकतंत्र में एक गरीब आदिवासी छात्र और उसके बूढ़े पिता के साथ हो रही ऐसी सरकारी और पुलिसिया ज्यादती के खिलाफ किसी के चेहरे पर कोई शिकन ना पड़े, तो उसका मतलब देश में ऐसी सरकारों और ऐसी अदालतों का बढ़ जाना है जहां से किसी फिल्मी सितारे के बेटे को भी हो सकता है कि बेकसूर होने पर भी इंसाफ ना मिल सके। लोकतंत्र में सबसे कमजोर और सबसे गरीब को इंसाफ न मिलने का एक खतरा यह रहता है कि धीरे-धीरे बेइंसाफी उस लोकतंत्र का मिजाज बनने लगता है। देश में लोकतंत्र के पैमाने नीचे आने लगते हैं, और अदालतों को इंसाफ का ख्याल रखना जरूरी नहीं रह जाता है।

देशभर में केंद्र सरकार और अलग-अलग प्रदेशों की एजेंसियों ने जिस तरह के मामलों को अदालतों में बढ़ावा दिया है और जिस बड़े पैमाने पर ये मामले अदालतों से खारिज हो रहे हैं, उससे भी पता लगता है कि लोकतंत्र में इंसाफ की जरूरत को ही नकार दिया जा रहा है। ऐसे में हो यह रहा है कि हर जगह सत्ता पर बैठे लोग अपनी मर्जी से चुनिंदा लोगों को परेशान करने के लिए कानूनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं और जितने समय तक किसी बेकसूर को सता सकते हैं, सताते चलते हैं, जमानत में जितनी देर कर सकते हैं उतनी देर करते हैं, और फिर आखिर में सरकारें अदालतों में मुंह की खाती हैं। लेकिन इंसाफ कहा जाने वाला यह सिलसिला इसी तरह चल रहा है और देश की सबसे बड़ी अदालत भी सब कुछ देखते हुए भी कुछ नहीं कर पा रही हैं। अदालतों का हाल तो यह है कि सरकार खाली कुर्सियों के लिए जज नहीं बना रही, और देश का मुख्य न्यायाधीश सरकार की मौजूदगी में बतलाता है कि 26 फ़ीसदी अदालतों में महिला जजों के लिए शौचालय तक नहीं है, और 16 फीसदी अदालतों में तो किसी जज के लिए शौचालय नहीं है। सरकार का न्यायपालिका के लिए यह रुख बताता है कि न्यायपालिका को गैरजरूरी मान लिया गया है, और ऐसा इसलिए किया गया है कि जांच एजेंसियों के रास्ते मनमानी को और अधिक वक्त तक जारी रखा जा सके।

लेकिन सरकार का यह सिलसिला ऐसे लोकतंत्र में कमजोर नहीं पड़ सकता जहां पर कमजोर तबके के लिए बाकी लोगों के मन में कोई रहम न हो, कोई फिकर न हो। आज देश की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों में सबसे अधिक संख्या में अल्पसंख्यक, दलित, और आदिवासी तबकों के लोग हैं, क्योंकि ये लोग वकीलों का खर्च नहीं उठा सकते, जांच एजेंसियों में जो भ्रष्ट लोग हैं उन्हें रिश्वत नहीं दे सकते, और अदालतों में जो भ्रष्ट लोग हैं उन्हें खरीद नहीं सकते, सबूतों को तोड़ मरोड़ नहीं सकते, और गवाहों को प्रभावित नहीं कर सकते। जिनके पास पैसा है वे इनमें से सब-कुछ कर सकते हैं। इसलिए आज हिंदुस्तान में इंसाफ पाने के लिए लोगों का संपन्न और सक्षम, ताकतवर और दबदबे वाला होना जरूरी है। जहां पहले कुछ घंटों से ही देश का मीडिया शाहरुख खान के बेटे के लिए बेचैन हो चला है, वहां पर अल्पसंख्यक तबके के आम और गरीब लोग 20-20 बरस जेल में कैद रहकर अदालत से बेकसूर साबित होकर बाहर निकल रहे हैं, तब तक उनके परिवार की जिंदगी खत्म हो चुकी रहती है, उनकी खुद की जिंदगी खत्म हो चुकी रहती है।

देश के नक्सल इलाकों में इसी तरह बरसों से बेकसूर आदिवासी कैद हैं, और सरकारें बार-बार यह कहती हैं कि उनके मामलों को तेजी से निपटाया जाएगा, या उन्हें छोड़ा जाएगा, लेकिन होता इनमें से कुछ नहीं है। कर्नाटक के जिस छात्र की हम बात कर रहे हैं उस कर्नाटक के बारे में अभी-अभी हमने लिखा है कि किस तरह वहां कांग्रेस, भाजपा, और जनता दल तीनों के मुख्यमंत्री रहे लेकिन यह बेकसूर आदिवासी छात्र अपने बाप सहित जेल में बंद रहा। इसलिए जेल में बंद रहा कि वह पत्रकारिता का छात्र था और उसके पास भगत सिंह की किताब सहित कुछ दूसरे लेख मिले जिनमें गांव की समस्या दूर न होने पर संसदीय चुनावों के बहिष्कार की बात लिखी हुई थी। देश का सबसे संपन्न तबका वोट डालने न जाकर वैसे भी चुनावों का बहिष्कार करता ही है, लेकिन अगर किसी ने जागरूकता के साथ इस मुद्दे को लिख रखा है, तो उसे नक्सल करार दे दिया गया। इस देश के लोगों को सोचना है कि क्या तमाम ताकत और असर हासिल रहने पर भी शाहरुख खान का बेटा अधिक हमदर्दी का हकदार है, और बरसों तक बूढ़े बाप के साथ जेल में बंद आदिवासी छात्र हमदर्दी का हकदार नहीं है? जिसकी कि कोई चर्चा भी नहीं हो रही है। यह इस देश की जनता का हाल है जिसके बीच बेबस लोगों की कोई बात नहीं होती है, और जिन्हें देश के सबसे महंगे वकील हासिल हैं, उनकी फिक्र में देश का मीडिया दुबला हुए जा रहा है।

हम कहीं भी शाहरुख खान के बेटे के जमानत के हक को कम नहीं आंक रहे हैं, लेकिन हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि इस देश में बेइंसाफी झेल रहे लोगों के बीच प्राथमिकता की लिस्ट में आर्यन खान दसियों लाख लोगों के बाद ही आ सकता है, फिर चाहे वह अखबार के पहले पन्ने पर एकाधिकार क्यों न पा रहा हो।


दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अक्टूबर 2021


 

हार की जीत, विराट ने मैदान पर पढ़ दी सुदर्शन की कहानी

  25 अक्टूबर 2021

  किसी हार में भी कोई जीत हो सकती है यह सोचना थोड़ा मुश्किल है। बहुत पहले सुदर्शन की बाबा भारती और खडग़सिंह वाली विख्यात कहानी, ‘हार की जीत’ में जरूर ऐसा था, लेकिन असल जिंदगी में बीती रात भारत और पाकिस्तान के मैच में यह देखने मिला। मैच में हिंदुस्तान खासी बुरी तरह हारने के बाद भी बहुत अच्छी तरह जीत गया। खुद पाकिस्तान में पाकिस्तान की जीत की जिस किस्म से खुशी मनाई जा रही है, उसी किस्म से सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के क्रिकेट प्रेमी इस बात की खुशी भी मना रहे हैं कि भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने मैच हारने के बाद किस तरह पाकिस्तानी कप्तान को बधाई दी, हंसते-मुस्कुराते हुए हर खिलाड़ी से गले मिले, और पूरे मैच के दौरान भी तनाव मुक्त रहे। इस पर पाकिस्तान के लोगों ने इतना सुंदर लिखा कि बस। एक महिला ने लिखा कि इतिहास इन तस्वीरों को याद रखेगा। एक दूसरे ने लिखा कि विराट कोहली बहुत अच्छे शख्स हैं जो जानते हैं कि यह खेल है युद्ध नहीं। एक खिलाड़ी ने लिखा-‘खुद एक खिलाड़ी होने के नाते मुझे यह लम्हा बहुत अच्छा लगा क्योंकि खेलना ही खेल भावना है शाबाश विराट कोहली’। एक और पाकिस्तानी ने मजाकिया लहजे में लिखा-‘विराट कोहली को अपनी टीम में शामिल होने का न्योता देने में कोई नुकसान नहीं है वह पहले से ही घुले मिले हुए हैं’। एक और ने लिखा-‘वहां भारतीय और पाकिस्तानी साथ साथ खेल रहे हैं और यहां हम बेवकूफों की तरह लड़ रहे हैं’। भारतीय कप्तान विराट कोहली ने मैच के दौरान भी एक बड़प्पन का खुशमिजाज बनाए रखा और मैच के बाद भी उन्होंने कहा कि हम हारे हैं जिसे हम मंजूर करते हैं और पाकिस्तान को जीत का श्रेय देते हैं उन्होंने वाकई हमें हर क्षेत्र में मात्र दी। कोहली ने कहा उनके बल्लेबाजों ने जिस अंदाज में बल्लेबाजी की उसने हमें कोई मौका नहीं दिया। कोहली के अलावा धोनी भी पाकिस्तानी खिलाडिय़ों से खेल भावना में अच्छे मिजाज में बात करते दिखे, और धोनी की भी तारीफ हो रही है।

भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद पर जो नफरत चलती है, और जो जंग राजधानियों में बैठकर लड़ी जाती है, और सरहद के दोनों तरफ के जो धर्मांध कट्टरपंथी लगातार एक जंग की उम्मीद करते हैं, और दुनिया के हथियारों के सौदागर इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाते चलने में भरोसा रखते हैं, और जिस तरह इन दोनों देशों के नेता कई बार अपनी घरेलू दिक्कतों को अपने वोटरों की नजरों से पीछे धकेलने के लिए दूसरे देश पर तोहमत लगाते हैं, उन सबको अगर देखें तो लगता है कि जिस तनाव का जिक्र करके क्रिकेट को रोकने की कोशिश की जा रही है, उस तनाव को तो क्रिकेट कम ही करता है। और महज क्रिकेट नहीं इन दोनों देशों के बीच लेखक, शायर, संगीतकार और कलाकार भी तनाव को कम करने में मदद करते हैं, यह एक अलग बात है कि दोनों तरफ के कट्टरपंथी अपनी हस्ती और मौजूदगी को साबित करने के लिए वक्त-वक्त पर तोहमतें लगाते हैं, हिंसा करते हैं, और सरहद पार के लोगों को भगाने की बात करते हैं। ऐसा सिर्फ पाकिस्तान में होता है ऐसा भी नहीं, हिंदुस्तान में भी मुंबई में कई बार ऐसा होता है। मुंबई में भी टीवी के रियलिटी शो में हिस्सा लेने वाले कुछ पाकिस्तानी कलाकारों को वापिस भेज दिया जाता है क्योंकि सांप्रदायिक संगठन उनके खिलाफ तनाव खड़ा करने लगते हैं।

अभी जब भारत और पाकिस्तान के बीच टी-20 का यह मैच खेला जाना तय हुआ था उस वक्त हिंदुस्तान में भाजपा के मददगार माने जाने वाले और एक कट्टर मुस्लिम राजनीति करने वाले असदुद्दीन ओवैसी ने खुलकर इस मैच का विरोध किया था, और कहा था कि जब कश्मीर में आतंकी हमलों में हिंदुस्तानी सैनिक मारे जा रहे हैं, तब हिंदुस्तानी टीम को पाकिस्तानी टीम के साथ क्रिकेट क्यों खेलना चाहिए। यह बात अपने आपको एक कट्टर राष्ट्रवादी साबित करने की कोशिश अधिक थी जिसमें अंतरराष्ट्रीय समझ-बूझ छू भी  नहीं गई थी। ओवैसी कट्टरता की बातें करने के लिए जाने जाते हैं, और मुस्लिमों के बीच अपने एक सीमित समर्थक तबके को बाकी हिंदुस्तानियों के मुकाबले अधिक राष्ट्रवादी साबित करने के लिए, अधिक बड़ा देशभक्त साबित करने के लिए, उन्होंने इस किस्म की भडक़ाने वाली बात की थी। ऐसी बात तो हिंदुस्तान के सबसे अधिक सांप्रदायिक दूसरे हिंदू संगठनों ने भी नहीं की थी, उन्होंने भी पाकिस्तान के साथ मैच के बहिष्कार का कोई फतवा नहीं दिया था जो कि ओवैसी ने दिया।

लेकिन विराट कोहली की दरियादिली और खेल भावना के इस मौके पर जब चारों तरफ सब कुछ अच्छा अच्छा लिखा जा रहा था उसके बीच भी एक गंदी बात करने से भारत के एक बड़े उद्योगपति हर्ष गोयनका नहीं चूके। हर्ष गोयनका ट्विटर पर सक्रिय रहते हैं और कई किस्म की सकारात्मक बातें भी पोस्ट करते हैं, लेकिन कल उन्होंने पाकिस्तान के टॉस जीतने के बाद यह लिखा- ‘पाकिस्तान ने टॉस जीता और यह तय किया कि वह इस सिक्के को वापस पाकिस्तान ले जाएंगे ताकि वहां की अर्थव्यवस्था सुधर सके’। यह बात एक मजाक के रूप में तो तीखा तंज हो सकती थी, लेकिन कल का मौका बड़प्पन दिखाने का था, और दोनों देशों के बीच जिसने बड़प्पन दिखाया, उसने महफिल लूटी। हर्ष गोयनका की इस बात पर एक प्रमुख पत्रकार हृदयेश जोशी ने तुरंत लिखा कि इस ट्वीट को देखकर मास्टर कार्ड का विज्ञापन याद आ रहा है जो कहता है कि कुछ चीजें पैसों से नहीं खरीदी जा सकतीं। वैसे ही गोयनका साहब के लिए तमीज किसी मास्टर कार्ड से नहीं खरीदी जा सकती।

भारत और पाकिस्तान के बीच मैच दोनों देशों में खेल की सबसे बड़ी उत्सुकता का मौका रहता है, और इससे बड़ा मैच इन दोनों देशों के लिए दुनिया में और कुछ भी नहीं होता है। ऐसे ही मौके पर खेल यह साबित कर सकता है कि वह सरहद के सारे तनाव को कम करने की ताकत रखता है। ऐसे ही मौके पर खिलाड़ी यह साबित कर सकते हैं कि वे नेताओं और फौजी जनरलों के मुकाबले बेहतर इंसान हैं। ऐसे ही मौके पर क्रिकेट का बैट न केवल गेंद को मैदान के बाहर फेंक पाता है बल्कि हथियारों के सौदागरों की तमाम किस्म की साजिशों को भी दोनों देशों से बाहर फेंकने की कोशिश करता है। ऐसे मौके एक दरियादिली और बड़प्पन दिखाने के रहते हैं, मोहब्बत दिखाने के रहते हैं, और भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने सचमुच यही एक विराट दिल कल दिखाया, जब उन्होंने हार के बावजूद पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को लिपटाकर बड़प्पन और मोहब्बत से बातें की, और हारते हुए भी उन्होंने तनाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया। यह सिलसिला जारी रखना चाहिए, सरहद के दोनों तरफ बुरे लोग भी हैं, और अच्छे लोग भी हैं, बुरे लोग दिखते अधिक हैं, लेकिन अच्छे लोग गिनती में ज्यादा हैं। ऐसे ही मौके हैं जब लोगों को दोनों देशों के बीच दोस्ती की संभावनाओं को टटोलना चाहिए जिन्हें कि वोटों के चक्कर में पड़े हुए नेता नहीं तलाश सकते। खेल भावना ने बहुत ही तंग नजरिए वाले राष्ट्रवाद को उसकी जगह दिखा दी है, और इसके लिए किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ी, झंडे-डंडे  की जरूरत नहीं पड़ी, और थोड़ी सी मोहब्बत, और थोड़ी सी दरियादिली से यह काम हो गया।  पाकिस्तान की टीम मैच जीतने की लिए, और विराट कोहली और उनकी टीम हार के बाद भी मोहब्बत का बर्ताव करने के लिए बधाई की हकदार है।

 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर 2021


 

अपने आदर्शों को लेकर पाखंडी देश

 24 अक्टूबर  2021


हिंदुस्तान में पिछले कुछ दिनों से सावरकर को लेकर एक बहस चल रही है। विनायक दामोदर सावरकर जिन्हें कुछ लोग वीर सावरकर भी कहते हैं और उन्हें वीर मानते हैं। दूसरी तरफ बहुत से दूसरे लोग हैं जिनका यह मानना है कि सावरकर अपनी जिंदगी के शुरू के हिस्से में तो स्वतंत्रता सेनानी रहे, लेकिन जैसे ही वे अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार करके अंडमान में काला पानी की सजा में भेजे गए उन्होंने तुरंत ही अंग्रेज सरकार से रहम की अपील करना शुरू कर दिया, और कुछ महीनों के भीतर उन्होंने ऐसी अर्जियां भेजना शुरू किया जो कि शायद कुल मिलकर पौन दर्जन तक पहुंचीं। इस बारे में अलग-अलग लेखों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, इसलिए उन पूरी बातों को यहां दोहराने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि आज की बात केवल सावरकर पर नहीं लिखी जा रही बल्कि इस बात पर लिखी जा रही है कि लोगों की जिंदगी को एक साथ, एक मुश्त देखकर उन पर एक अकेला लेबल लगाना कई बार मुमकिन नहीं होता है। गांधी के लिए जरूर ऐसा हो सकता था कि उनके पूरे जीवन को एक साथ देखकर भी उन्हें महात्मा लिखा जाए, लेकिन सावरकर को यह सहूलियत हासिल नहीं थी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम में शामिल रहे, लेकिन गिरफ्तारी के बाद जिस तरह उन्होंने लगातार माफी मांगी, लगातार रहम की अर्जी दायर की, और आखिर रहम मांगते हुए ही वे जेल से छूटे, और इतिहासकारों ने लिखा है कि उन्हें अंग्रेजों से हर महीने आर्थिक मदद भी मिली। अब ऐसे में जो लोग उनको वीर कहते हैं वह इतिहास के कुछ नाजुक पन्नों को कुरेद भी देते हैं जो उन्हें वीर साबित नहीं करते।

सावरकर का यह ताजा सिलसिला देश के सूचना आयुक्त उदय माहुरकर की सावरकर पर लिखी गई एक किताब के विमोचन के मौके पर शुरू हुआ जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहां कि सावरकर ने रहम की अपील गांधीजी के कहे हुए लिखी थी। बहुत से इतिहासकारों ने उसके बाद लगातार यह लिखा कि जिस वक्त सावरकर ने रहम की अर्जियां भेजना शुरू कर दिया था, उस वक्त तो गांधी से सावरकर की मुलाकात भी नहीं हुई थी, गांधी हिंदुस्तान लौटे भी नहीं थे, वह दक्षिण अफ्रीका में ही थे, उस वक्त उनका भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से भी कोई लेना देना नहीं था, और सावरकर को तो वे जानते भी नहीं थे। लेकिन इतिहास लेखन जब वक्त की सहूलियत के हिसाब से होता है तो उसमें कई तरह की सुविधाजनक बातों को लिख दिया जाता है और कानों को मधुर लगने वाले तथ्य गढ़ दिए जाते हैं। राजनाथ सिंह ने यह बात उदय माहुरकर की किताब को पढक़र नहीं कही थी क्योंकि उस किताब में इस बारे में कुछ जिक्र नहीं है, उन्होंने सावरकर पर अलग से यह बात कही।

यह सोचने समझने की जरूरत है कि जब लोगों की जिंदगी के अलग-अलग पहलू सकारात्मक और नकारात्मक, अलग-अलग किस्मों के होते हैं, उनमें कहीं खूबियां होती हैं और कहीं खामियां होती हैं, तो उनकी महानता को तय करना थोड़ा मुश्किल होता है। नायक और खलनायक के बीच में घूमती हुई ऐसी जिंदगी कोई एक लेबल लगाने की सहूलियत नहीं देती, और ऐसा करना भी नहीं चाहिए। अब जैसे हिंदुस्तान के ताजा इतिहास को ही लें, तो कम से कम दो ऐसे बड़े पत्रकार हुए जो अखबारनवीसी में नामी-गिरामी थे, जिनके लिखे हुए की लोग तारीफ करते थे, और जिनके संपादन वाले अखबार या पत्रिका की भी तारीफ होती थी, लेकिन जब अपनी मातहत महिलाओं से बर्ताव की बात थी तो इसमें से एक संपादक ने अपनी एक मातहत कम उम्र लडक़ी के साथ जैसा सुलूक किया, उससे मामला अदालत तक पहुंचा, लंबा वक्त जेल में काटना पड़ा, और बाद में अदालत से उसे बरी किया गया। हिंदुस्तान में अदालत से बरी होने का मतलब बेकसूर हो जाना नहीं होता, बस यही साबित होता कि वहां पर पुलिस या जांच एजेंसी गुनाह साबित नहीं कर पाईं।

दूसरे संपादक के खिलाफ तो दर्जनभर या दर्जनों मातहत महिला पत्रकारों ने सेक्स शोषण की शिकायतें की हैं, और वह मामला अदालत में चल ही रहा है। अब किसी व्यक्ति की अच्छी अखबारनवीसी को उसके चरित्र के इस पहलू के साथ जोडक़र देखा जाए या जोडक़र न देखा जाए? यह सवाल बड़ा आसान नहीं है क्योंकि लोगों ने इतिहास में यह भी लिखा हुआ है कि हिटलर एक पेंटर था, और जिस तरह से उसने दसियों लाख लोगों का कत्ल किया, तो क्या उसकी बनाई किसी पेंटिंग को लेकर चित्रकला के पैमानों पर उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए, या उसकी कोई बात नहीं करनी चाहिए? क्या गांधी महात्मा थे इसलिए उनके सत्य के प्रयोगों की चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या नेहरू देश के एक महान नेता थे इसलिए एडविना माउंटबेटन के साथ उनके संबंधों की चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या अटल बिहारी वाजपेई भाजपा के एक बहुत बड़े नेता थे, और जनसंघ से भाजपा तक अपने वक्त के वह सबसे बड़े नेता रहे, तो क्या उनकी जिंदगी में आई महिला के बारे में कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए? या क्या इस बात को छुपाया जाना चाहिए कि वह शराब पीते थे? या नेहरू के बारे में यह छुपाना चाहिए कि वह सिगरेट पीते थे?

हिंदुस्तान एक पाखंडी देश है यहां पर लोग अपने आदर्श के बारे में किसी ईमानदार मूल्यांकन को बर्दाश्त नहीं करते। वे जिसे महान व्यक्ति या युगपुरुष मानते हैं, उसके बारे में किसी खामी की चर्चा सुनना नहीं चाहते। लेकिन हाल के वर्षों में हिंदुस्तान में एक नया मिजाज सामने आया है कि जिन लोगों को लोग नापसंद करें, उनके इतिहास और चरित्र के बारे में झूठी बातें गढक़र उन्हें तरह-तरह से, खूब खर्च करके, और खरीदे गए लोगों से चारों तरफ फैलाया जाए। किसी एक देश में किसी फैंसी ड्रेस में गांधी बना हुआ कोई आदमी किसी विदेशी महिला के साथ डांस कर रहा है तो उसे एक चरित्रहीन महात्मा गांधी की तरह पेश करने में हजारों लोग जुटे रहते हैं। अपनी बहन को गले लगाए हुए नेहरु की तस्वीर को चारों तरफ फैलाकर उन्हें बदचलन साबित करने की कोशिश में लोग लगे रहते हैं। ऐसे लोग अपने किसी पसंदीदा के बारे में एक लाइन की भी नकारात्मक सच्चाई सुनना नहीं चाहते, उस पर भी खून-खराबे को तैयार हो जाते हैं। लेकिन जो नापसंद हैं उनके बारे में गढ़ी गई झूठी बातें भी फैलाने के लिए वे अपनी रातों की नींद हराम करते हैं।

झूठ के ऐसे सैलाब के बीच यह जरूरी रहता है कि इतिहास का सही इस्तेमाल हो, लोगों का सही मूल्यांकन हो, लोगों की खूबियों के साथ-साथ उनकी खामियों की चर्चा से भी परहेज न किया जाए, और किसी व्यक्ति को एक बिल्कुल ही बेदाग प्रतिमा की तरह पेश न किया जाए, क्योंकि गढ़ी गई प्रतिमा ही बेदाग हो सकती है, असल जिंदगी में तो इंसान पर कई किस्म के दाग लगे हो सकते हैं, जो कि कुदरत का एक हिस्सा हैं, कुदरत के दिए हुए बदन का एक हिस्सा, या कुदरत के दिए हुए मिजाज का एक हिस्सा।

सावरकर को लेकर जो लोग इतिहास के कड़वे हिस्से से परहेज कर रहे हैं, उनको लोकतंत्र की लचीली सीमाओं को समझना चाहिए जहां पर गांधी और नेहरू जैसे लोगों की कमियों और खामियों का भी जमकर विश्लेषण हुआ, और नेहरू के खिलाफ तो जितने कार्टून उस वक्त बनते थे, उनमें से कई मौकों पर वे कार्टूनिस्ट को फोन करके उसकी तारीफ भी करते थे। आज का वक्त ऐसा हो गया है कि नेहरू के मुकाबले बहुत ही कमजोर और खामियों से भरे हुए छोटे-छोटे से नेता उन पर बने हुए कार्टून पर लोगों को जेल डालने की तैयारी करते हैं। लोकतंत्र की परिपच्ता आने में हिंदुस्तान में हो सकता है कि आधी-एक सदी और लगे क्योंकि अब तो लोग यहां पर बर्दाश्त खोने लगे हैं, सच से परहेज करने लगे हैं, झूठ को गढऩे लगे हैं, और बदनीयत नफरत को फैलाने लगे हैं।

यह पूरा सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और मानव सभ्यता के विकास की घड़ी के कांटों को वापिस ले जाने वाला भी है। सभ्य समाज और लोकतांत्रिक समाज को अपना बर्दाश्त बढ़ाना चाहिए, उसे लोगों के व्यक्तित्व और उनकी जिंदगी के पहलुओं को अलग-अलग करके देखना भी आना चाहिए और किसी का मूल्यांकन करते हुए इन सारे पहलुओं को साथ देखने की बर्दाश्त भी रहनी चाहिए। जो सभ्य समाज हैं वहां पर इतिहास लोगों को आसानी से शर्मिंदा नहीं करता। और जहां हिटलर जैसे इतिहास से शर्मिंदगी होना चाहिए तो वहां पूरा का पूरा देश, पूरी की पूरी जर्मन जाति शर्मिंदा होती है, और उससे मिले हुए सबक से वह सीखती है कि उसे क्या-क्या नहीं करना चाहिए। हिंदुस्तान में लोगों के कामकाज से लेकर माफीनामे तक को लेकर जो लोग मुंह चुराते हैं, वो इतिहास की गलतियों को भविष्य में दोहराने की गारंटी भी कर लेते हैं।

भगत सिंह की किताब अगर नक्सल होने का सुबूत है, तो अंग्रेज राज ही क्या बुरा था?

 24 अक्टूबर 2021

 

कर्नाटक की एक जिला अदालत से अभी एक आदिवासी नौजवान को उसके बूढ़े पिता के साथ बरी किया गया है जिन्हें पुलिस ने नक्सलियों से संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया था। इस आदिवासी छात्र के हॉस्टल के कमरे से जिन किताबों को जप्त करके उस पर नक्सली होने का आरोप लगाया गया था, उनमें भगत सिंह की लिखी एक किताब भी थी। उसके पास अखबारों की कुछ कतरनें भी थीं, और एक चिट्ठी लिखी हुई थी कि जब तक गांव को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती हैं, तब तक संसद के चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए। अब 32 बरस का हो गया यह नौजवान अपने पिता के साथ 9 बरस तक चले इस मुकदमे के बाद बरी किया गया क्योंकि पुलिस कुछ भी साबित नहीं कर सकी और उसके पास कोई सबूत नहीं था। जबकि मामले को दायर करते हुए पुलिस ने इस आदिवासी छात्र के मोबाइल फोन से नक्सलियों की मदद करने और राजद्रोह का अपराध करने की बातें कही थीं, लेकिन इसके मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स तक पुलिस ने अदालत में पेश नहीं किए। देश में बेकसूरों को कुचलने के लिए जो यूएपीए नाम का एक बहुत ही कड़ा कानून इस्तेमाल किया जा रहा है, उस कानून के तहत यह मामला चलाया गया था, और यह गरीब आदिवासी परिवार अपने 9 बरस खोने के बाद अब खुली हवा में सांस ले रहा है। लेकिन अदालत ने इन्हें सिर्फ बरी किया है, इन्हें बाइज्जत बरी नहीं किया है, इसलिए अब ये फिर ऊंची अदालत जा रहे हैं, ताकि उन्हें बाइज्जत बरी किया जाए। फैसले में अदालत ने यह तक लिखा कि चुनाव के बहिष्कार का आह्वान करने की जो चिट्ठी है, तो उसे पत्रकारिता के छात्र ने इसलिए लिखा क्योंकि नेताओं ने उस आदिवासी गांव के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा नहीं किया था, और इसे पढऩे पर यह आसानी से कहा जा सकता है कि इस पत्र में स्थानीय लोगों की मांगें हैं।

हिंदुस्तान की सरकारों को इस तरह के कानून बहुत अच्छे लगते हैं जिनमें लोगों के मौलिक अधिकारों को कुचला जा सकता है, उन्हें जमानत पाने से भी रोका जा सकता है, और बरसों तक बिना किसी सुनवाई के, बिना किसी ठोस सुबूत के उन्हें जेलों में बंद करके रखा जा सकता है। यह सारा कानूनी इंतजाम अंग्रेजों के वक्त किया गया था ताकि हिंदुस्तानियों को अदालतों के ढकोसले से भी कोई राहत ना मिल सके, और आजाद हिंदुस्तान की काली सरकारों ने भी इन गोरे कानूनों को और अधिक कड़ा बनाकर जारी रखा और अपने ही लोगों की असहमति को कुचलने का काम किया। हिंदुस्तान में किसी को कुचलना हो तो उसके घर से नक्सलियों के बारे में एक किताब का बरामद होना काफी रहता है. पता नहीं संसद की लाइब्रेरी में नक्सलियों के बारे में किताबें हैं या नहीं, सुप्रीम कोर्ट की लाइब्रेरी में नक्सलियों की किताबें हैं या नहीं। लोकतंत्र से असहमति रखने की किताबें भी अगर किसी को 9 बरस तक जेल में डालने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल की जा रही है, तो इस पर धिक्कार है। और कर्नाटक के बारे में यह बात समझने की जरूरत है कि यह 2012 में दर्ज मामला है, और तबसे लेकर अब तक वहां पर भाजपा, कांग्रेस, जनता दल, इन सभी की सरकारें रहीं, इन तीनों पार्टियों के मुख्यमंत्री रहे लेकिन एक गरीब आदिवासी छात्र को उसके बूढ़े बाप के साथ जेल में फंसाकर रखा गया और वे अदालत के धक्के खाते रहे।


हिंदुस्तान में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो या किसी भी गठबंधन की, उन्होंने कभी ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों को हटाने के बारे में कोई कोशिश नहीं की। जब जो सत्ता में रहते हैं उन्हें ऐसा चाबुक पसंद आता है, उन्हें ऐसी हथकड़ी पसंद आती है, जिसे असहमत लोगों के हाथों पर डाला जाए, उन्हें असहमति की जुबान छीन लेने के औजार पसंद आते हैं, और इसलिए हिंदुस्तान में ऐसे भयानक कानून और कड़े बनाए जा रहे हैं। 1967 में बनाया गया यूएपीए कानून 2019 में मोदी सरकार ने संसद में एक संशोधन करके और कड़ा कर दिया, और उसमें कई किस्म की धाराएं जोड़ दीं जिसमें जांच एजेंसियों और मुकदमा चलाने वाली एजेंसी पर से जिम्मेदारी हटा दी गई, और बेकसूर नागरिकों के अधिकार और घटा दिए गए। लोकतंत्र में कानून की जो बुनियादी जरूरतें रहती हैं उन सबको घटाते हुए कानून को इतना कड़ा कर दिया गया है कि जिसके खिलाफ यह इस्तेमाल हो उसके बचने की कोई गुंजाइश न रहे, और 10-20 बरस बाद जाकर हिंदुस्तान के कुछ मुसलमान अगर आतंक के आरोपों से निकलकर बाहर आ रहे हैं तो उनकी जिंदगी भी क्या जिंदगी बच जाती है?

20-20, 25-25 बरस तक लोग जेलों में कैद रहे आतंक के मुकदमे झेलते रहे और आखिर में बिना किसी सबूत के उनको छोड़ देना पड़ा क्योंकि सुबूत कभी था ही नहीं। लोगों को केवल खुली जमीन से हटाने और इसे दूसरे लोगों के लिए एक धमकी की तरह इस्तेमाल करने की नीयत केंद्र सरकार की भी रही, राज्य सरकारों की भी रही, और इनसे शायद ही कोई पार्टी बची रही। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक, और ममता बनर्जी से लेकर दूसरे क्षेत्रीय दलों के मुख्यमंत्रियों तक इन सबने ऐसे कानूनों को एक ताकतवर हथियार की शक्ल में पाया, और उसका जमकर इस्तेमाल किया। दिक्कत यह है कि देश के सुप्रीम कोर्ट तक ने इन कानूनों के अलोकतांत्रिक होने के बारे में कोई फैसले नहीं दिए, और सरकारें मनमर्जी से इनका इस्तेमाल कर रही हैं।

(Daily chhattisgarh)