एक पिछले पोप के गुजर जाने पर याद आती है बच्चों से बलात्कार की अनदेखी...

 1  जनवरी 2023


दुनिया के अकेले जिंदा भूतपूर्व पोप, पोप बेनेडिक्ट 95 बरस की उम्र में गुजर गए। 2013 में उन्होंने पोप रहते हुए अपनी बढ़ती उम्र और खराब सेहत का हवाला देते हुए यह पद छोड़ दिया था। ऐसा करने वाले वे 6 सौ बरस में पहले व्यक्ति थे। लेकिन इसके बाद वे रोमन कैथोलिक धर्म के मुख्यालय, वेटिकन में ही बने रहे। उनके बाद बनने वाले पोप, पोप फ्रांसिस ने दो-तीन दिन पहले ही दुनिया भर के कैथोलिक लोगों से भूतपूर्व पोप के लिए प्रार्थना करने को कहा था, जाहिर है कि उनकी हालत खराब दिख रही होगी, और आखिरी दौर में वे ऐसी अपील कर रहे थे। पोप बेनेडिक्ट न सिर्फ वेटिकन में रहते थे, बल्कि वे पोप की पोशाक भी पहनते थे, और मीडिया को इंटरव्यू भी देते थे। ईसाई धार्मिक मामलों के जानकार लोगों का यह मानना है कि एक बार पोप का पद छोड़ देने के बाद  उन्हें इस धार्मिक सत्ता से दूर भी रहना चाहिए था, और चुप भी रहना चाहिए था। खैर, इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद पिछले पोप के इस फैसले पर चर्चा नहीं है, बल्कि उन्होंने दुनिया के दूसरे जरूरी मुद्दों पर 21वीं सदी में आकर भी जो रूख दिखाया था, उस पर चर्चा करना है।

जैसा कि ईसाई धर्म में होता है, पोप बनने वाले लोग उसके पहले कई दशक पोप से नीचे के ओहदों पर रहते हैं, और अपने ऐसे ही लंबे कार्यकाल के दौरान भूतपूर्व पोप बेनेडिक्ट ने अपने पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों से निपटने में जो ढीला-ढाला रूख दिखाया था, और मुजरिमों को जिस तरह बचाया था, वह भयानक बात थी। ईश्वर का नाम लेकर मासूम बच्चों का यौन शोषण करने वाले लोगों को बचाना यौन शोषण करने से कम बड़ा जुर्म नहीं था। इसी बरस जनवरी में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह कहा गया था कि ये भूतपूर्व पोप 1977 से 1982 तक जर्मनी के म्युनिख में आर्कबिशप रहते हुए अपने पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण से वाकिफ थे, लेकिन उन्होंने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने 2004 से लेकर 2014 के बीच बच्चों के यौन शोषण और उनसे बलात्कार के मामलों में चर्च के भीतर कार्रवाई करते हुए 848 पादरियों को हटाया था, और ढाई हजार से अधिक को कुछ कम सजा दी थी, लेकिन ऐसी 34 सौ शिकायतों पर उन्होंने देश के कानून के मुताबिक कोई कार्रवाई नहीं होने दी। उन्हीं के दौर में कई ऐसे पादरी चर्च की अंदरुनी कार्रवाई से भी बच निकले जिन पर दो-दो सौ बच्चों के यौन शोषण के आरोप थे। ऐसे सभी जुर्म पर उन्होंने एक आम माफीनामा जारी करते हुए यौन शोषण के शिकार लोगों से शर्मिंदगी जाहिर करते हुए माफ कर देने की अपील की थी। जबकि इन मामलों में अदालती कार्रवाई की जरूरत थी। धर्म हर कुकर्म को छुपाने की ताकत रखता है, और रोमन कैथोलिक ईसाईयों के सबसे बड़े धर्मगुरू, पोप बनने वाले बेनेडिक्ट ने इसे सही साबित किया था। इसके अलावा उन्होंने समलैंगिक लोगों का खुलकर विरोध किया था।

सिर्फ इसी धर्म की बात नहीं है, बहुत से और धर्मों का भी यही हाल है  कि वहां हर किस्म के जुर्म खप जाते हैं। आज भी हिन्दुस्तान में अलग-अलग बहुत से धर्मों से जुड़े हुए धर्मगुरू या पादरी, या प्रचारक, या तथाकथित संत बलात्कार की सजा काट रहे हैं, और बाहर निकलकर और बलात्कार करने की हड़बड़ी में भी हैं। यह देखकर तकलीफ होती है कि आसाराम जैसा बलात्कारी जिसे देश के सबसे बड़े वकीलों के रहते हुए भी सुप्रीम कोर्ट तक ने जमानत या पैरोल के लायक भी नहीं पाया, आज भी उसका प्रचार करने के लिए उसके भक्त अपने परिवारों के नाबालिग बच्चों के साथ सडक़ों पर पर्चे बांटते दिखते हैं, जबकि आसाराम को अपने एक भक्त परिवार की नाबालिग लडक़ी से बलात्कार के जुर्म में ही सजा हुई है। ऐसी ही सजा बाबा राम-रहीम कहे जाने वाले एक और नौटंकीबाज को मिली है, जो पंजाब-हरियाणा में अपने भक्तों की बड़ी संख्या के चलते चुनाव के आसपास पैरोल पर बाहर दिखाई पड़ता है। हाल के बरसों में लगातार मुस्लिम धर्म से जुड़े हुए बच्चों और नाबालिग लड़कियों से बलात्कार करने वाले लोग पकड़ाए हैं, लेकिन धर्मों को मानने वाले लोगों का हाल यह रहता है कि वे अपने बलात्कारियों पर भी आस्था रखते हैं। धर्म के झंडों की आड़ में हजार किस्म के जुर्म चलते हैं, और लोकतांत्रिक देशों में भी सरकारें इन पर कार्रवाई करने से हिचकती हैं।

इसकी एक मिसाल छत्तीसगढ़ के इतिहास में है जब आधी सदी पहले एक मठ के महंत एक महिला से अपने अनैतिक संबंधों के चलते अपने गुंडों से एक कत्ल करवा बैठे थे, और उस वक्त के ब्राम्हण मुख्यमंत्री की छाती पर यह बात बोझ थी कि उनके सीएम रहते एक हिन्दू महंत को फांसी हो सकती है, तब उन्होंने वह केस रफा-दफा करवाया, और उस मठ-महंत से सैकड़ों एकड़ जमीन दान करवाई, जिस पर आज कॉलेज चल रहे हैं। धर्म और जुर्म की साठगांठ वेटिकन से लेकर तालिबान तक, और हिन्दुस्तान के मठों तक, सब जगह शान से चलती है, और कानून को कुचलते चलती है। दुनिया के वे देश कम जुर्म झेलते हैं जहां धर्म का बोलबाला घट रहा है, धर्म को मानने वाले लोग घट रहे हैं, नास्तिक बढ़ रहे हैं। ऐसा शायद इसलिए भी हो रहा होगा कि नास्तिकों के पास प्रायश्चित करके अपने पापों से मुक्ति पाने का विकल्प नहीं रहता है, इसलिए वे पाप कहे जाने वाले जुर्मों से दूर रहते होंगे। जिनके पास चर्च के कन्फेशन चेंबर की सहूलियत रहती है, कोई दान देकर पापों से छुटकारा पाने की आजादी रहती है, वे लोग फिर नए सिरे से पाप करने का उत्साह पा लेते हैं। इसलिए धर्म के जुर्म को गिनाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहिए। धर्म लोगों के सोचने-समझने की ताकत को जितना कमजोर कर देता है, और जुर्म करने के हौसले को जितना मजबूत कर देता है, उसकी इन दोनों खामियों को बार-बार गिनाया जाना चाहिए, ताकि किसी में समझ आने की थोड़ी सी गुंजाइश अगर बाकी हो, तो वह आ जाए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 31 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

नए साल पर भी कुछ नया नहीं सोचा, तो क्या किया?

 31  दिसंबर 2022


नए साल का मौका बहुत से नए संकल्पों का भी रहता है। लोग अपनी कुछ बुरी आदतों को छोडऩा तय करते हैं, और नए साल के पहले दिन से कुछ अच्छी आदतें पकडऩे का पक्का इरादा रखते हैं। पहला हफ्ता गुजरते न गुजरते साल भर के लिए किए गए अधिकतर संकल्प गुजर जाते हैं। जो लोग क्रिसमस और नए साल के मौके पर बच्चों की जिद में उनके लिए कुत्ते-बिल्ली लेकर आते हैं, उनकी बेरहम बिदाई भी अगले कुछ महीनों में होने लगती है, और जनवरी के बाद जल्द ही दुनिया ऐसे लावारिस पालतू जानवरों को देखती है, और इनके पुनर्वास में लगी संस्थाएं एक मुश्किल दौर से गुजरती हैं कि इतने जानवरों के लिए नए घर कहां से ढूंढे जाएं। लेकिन जिस तरह कुदरत में सालाना पतझड़ का एक दौर आता है, वैसा ही एक दौर दीवारों पर से कैलेंडर के टपकने का होता है, और नए पत्तों की तरह नए साल का कैलेंडर दीवारों पर उग आता है।

ऐसे माहौल के बीच जब लोगों को अपनी-अपनी जिंदगी में कई नई चीजें तय करने का मौका मिलता है, तो नए साल के ऐसे मौके का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। संकल्प आमतौर पर इसीलिए लिए जाते हैं कि जितने वक्त तक उन्हें ढोया जा सके, ढो लिया जाए, और बाद में उन्हें सहूलियत के साथ भुला दिया जाए। लेकिन जिन लोगों के संकल्प कायम रह जाते हैं, वे लोग तो कामयाब होते ही हैं, और ऐसी कामयाबी की कोशिश में ही हर किसी को नए साल के मौके पर कुछ न कुछ तो तय करना चाहिए, और तय करने से परे भी कुछ चीजों के बारे में सोचना चाहिए। अब हिन्दुस्तान में रहते हुए आम लोग अगर रूस और यूक्रेन में से किसी एक से कोई रिश्ता याद रख पाते हैं, तो वह सोवियत संघ के समय से रूस के साथ भारत की दोस्ती है, जिसके चलते भिलाई इस्पात संयंत्र जैसे कारखाने बने हैं, और अंतरराष्ट्रीय मुसीबत के समय रूस ने जिस तरह भारत का साथ दिया था, वह भी भारत के लोगों को याद है। लेकिन वह दौर निकल गया है, और आज खुद रूस अपने इतिहास से कुछ परे-परे चल रहा है, और जिस अंदाज में वह रात-दिन यूक्रेन की नागरिक आबादी पर हमले कर रहा है, उसे अनदेखा करना ठीक नहीं है। इसलिए लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आज दुनिया का एक सबसे ताकतवर देश किस तरह एक छोटे पड़ोसी देश को खत्म करने पर आमादा है, और हिन्दुस्तानी नागरिक इसमें सीधे कोई दखल चाहे न दे सकें, उन्हें इसकी जानकारी तो रखनी चाहिए, यूक्रेन के हित में न सही, अपने खुद के हित में इस अंतरराष्ट्रीय जुल्म को समझना चाहिए। इसी तरह लोगों को यह भी समझना चाहिए कि इजराइल में आज एक कैसी कट्टरपंथी और जुल्मी सरकार बन रही है जो कि फिलीस्तीन को धरती से मिटा देने पर आमादा है। इस पर न महज फिलीस्तीनी, बल्कि दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी फिक्रमंद हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ सहित। कुल मिलाकर हमारा यह सोचना है कि नया साल निजी अच्छी और बुरी आदतों को पकडऩे और छोडऩे से परे एक सरोकार की सोच का भी रहना चाहिए जिसमें हम उन लोगों के बारे में सोचें जिनसे हमारी जिंदगी सीधी-सीधी जुड़ी हुई नहीं है। अफगानिस्तान में तालिबान नाम के दहशतगर्द आतंकी सरकार चलाते हुए अपनी महिलाओं और लड़कियों के साथ किस तरह का अमानवीय बर्ताव कर रहे हैं, इससे हिन्दुस्तान की जिंदगी पर आज तो सीधे-सीधे असर नहीं पड़ रहा है, लेकिन लोगों को इसे समझना चाहिए क्योंकि आज नहीं तो कल इन्हीं तालिबानों से हौसला पाकर दूसरे देशों में दूसरे धर्मों के लोग भी ऐसी ही तालिबानी हरकतें करेंगे, और हिन्दुस्तान इनसे अछूता नहीं रह जाएगा, आज भी अछूता नहीं है।

दुनिया पर एक नजर दौड़ाने के बाद हम हिन्दुस्तान लौटें तो यहां भी इस किस्म की ज्यादतियां कम नहीं हैं, और इस नए साल का एक संकल्प यह भी हो सकता है कि देश के कुछ लोगों पर, और कुछ तबकों के साथ होने वाले ऐसे जुल्म के बारे में हम कम से कम पढ़ेंगे तो सही, बातों को समझेंगे तो सही, और कुछ कहेंगे। कहने के लिए लोगों के पास मुफ्त का सोशल मीडिया हासिल है जिस पर कोई खर्च नहीं लगता है, महज जरा सा हौसला लगता है सच कहने के लिए, और सच का होने वाला विरोध झेलने के लिए। हिन्दुस्तान के भीतर आज अलग-अलग तबकों के साथ जितने किस्म के जुल्म चल रहे हैं, उन्हें अनदेखा करना बंद करने का एक संकल्प भी लोगों को लेना चाहिए क्योंकि इसके बिना यह लोकतंत्र अधिक लंबा नहीं चल पाएगा। इसको खत्म करने की कोशिशें तेज होती चल रही हैं, और अगर माहौल ऐसा ही रहा तो इसकी जिंदगी बहुत लंबी भी नहीं रहेगी। इसलिए जिंदा कौमों की तरह हिन्दुस्तानियों को देखने, सोचने, समझने, और मुंह खोलने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए, और नए साल का मौका यह सोचने का भी हो सकता है कि किस तरह लोग दिन का थोड़ा सा वक्त ऐसी कड़वी हकीकत को जानने और उस पर कुछ करने में भी लगाएंगे।

नए साल का मौका यह तय करने का भी हो सकता है कि लोग अपने-अपने दायरे में किस तरह कुछ लोगों को एकजुट करके कुछ नेक काम कर सकते हैं। इसी जगह दस बरस से भी पहले हमने अपने खुद का एक इरादा लिखा था कि समाज में थोड़ी-बहुत भी पकड़ रखने वाले लोग दस-दस लोगों का ऐसा समूह तैयार कर सकते हैं जो कि अपने आसपास के और दस-दस लोगों के घरों से बेकार सामान को इकट्ठा करें, और उसे जरूरतमंद लोगों के बीच बांटें। अगर कुल दस लोग कमर कस लें, और इनमें से हर कोई अपने इर्द-गिर्द के दस-दस घरों का जिम्मा ले, तो महीने में दो-चार घंटे देकर ही सौ घरों का फालतू सामान लाया भी जा सकता है, और जरूरत की जगह पर पहुंचाया भी जा सकता है। दुनिया के अलग-अलग देशों और शहरों में बहुत से लोग इसी तरह की पहल करते हैं, और उनमें से कुछ कोशिशें दुनिया की सबसे बड़ी कोशिशें हो जाती हैं। पाकिस्तान में ईधी फाउंडेशन बनाकर पूरे देश में एम्बुलेंस सेवा का जाल बिछा देने वाले एक बुजुर्ग की लोगों को याद होगी जिन्होंने भारत से किसी गलती से पाकिस्तान चली गई एक मूकबधिर लडक़ी गीता को आसरा दिया था, और उस मुस्लिम परिवार में वह अपने हिन्दू धर्म के साथ बड़ी हो रही थी, और पांच-दस बरस पहले वह हिन्दुस्तान लाई गई थी। अब कट्टरपंथ और धर्मान्ध आतंक के शिकार पाकिस्तान के भीतर अब्दुल सत्तार ईधी नाम के एक सज्जन ने 1951 में जो समाजसेवी संगठन शुरू किया था, वह न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी समाजसेवी एम्बुलेंस सेवा चला रहा है। एक अकेले इंसान की शुरू की हुई एक पहल, उसका रोपा गया एक पौधा किस तरह इतिहास का सबसे बड़ा बरगद बन सकता है और जरूरतमंदों को अपनी छांह दे सकता है यह देखने की जरूरत है।

इसलिए नए साल के इस मौके पर हम लोगों को बस उन बातों को याद दिला रहे हैं जो कि उन्हीं के बीच के, उन्हीं के सरीखे आम लोगों ने कभी शुरू की थी, और जो कोशिशें बढक़र कभी बाबा आम्टे बनीं, कभी मदर टेरेसा बनीं, और कभी रेडक्रॉस जैसी संस्था बनी। लोगों को नेक काम की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए। नेक काम शुरूआत में कुछ महत्वहीन से दिखते हैं, चर्चा से परे रहते हैं, लेकिन जब वे पनपते हैं, तो दूर-दूर तक उनकी हरियाली का खूबसूरत नजारा दिखता है, और खूब सारे लोगों को उनकी छांह मिलती है, उसके फल मिलते हैं। इसलिए चाहे खून देने जैसी छोटी पहल हो, चाहे अंगदान करने जैसे दानपत्र भरने हों, ऐसे बहुत से कामों के बारे में सोचना चाहिए, आसपास के लोगों से उसकी चर्चा करनी चाहिए, और अपने बीच उनकी संभावनाएं देखनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

शीशे के घरों में सेलोफिन का तौलिया लपेटे विवेक अग्निहोत्री को तगड़ा जवाब

30  दिसंबर 2022


सोशल मीडिया के आने के पहले जिंदगी इतनी दिलचस्प कभी नहीं थी। मीडिया के नाम पर एक वक्त सिर्फ अखबार थे, फिर रेडियो-टीवी जुड़ गए, और कई दशक बाद इंटरनेट पर डिजिटल मीडिया विकसित हुआ। लेकिन इंटरनेट पर सोशल मीडिया के आते ही जिस तरह से आम लोगों को एक लोकतांत्रिक अधिकार मिला, आवाज मिली, उससे दुनिया की पूरी तस्वीर बदल गई। एक वक्त किसी शहर के चार अखबारों को काबू में करके, इश्तहार या रिश्वत देकर वहां की किसी भी खबर को दबाया जा सकता था। आज हिन्दुस्तान जैसे देश में भी हर शहर-कस्बे में सोशल मीडिया पर दसियों हजार या लाखों लोग हैं, और किसी भी बात को छुपाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं रह गया। आज तो अगर दर्जन भर किस्म के अलग-अलग धर्मों के ईश्वर भी मिलकर चाहें कि किसी बात को दबवा लें, तो सोशल मीडिया पर लाखों नास्तिक भी मौजूद हैं जो कि ईश्वरों के दबाव का जिक्र करते हुए भी उनकी अनचाही खबरों को पल भर में चारों तरफ फैला देंगे। लेकिन इस सोशल मीडिया से उन लोगों के लिए खासी दिक्कत खड़ी हो गई है जो कि कुछ अरसा पहले किसी और संदर्भ में अलग किस्म की बात करते आए हैं, और आज अपने मतलब से या बदले हुए माहौल को देखते हुए उससे ठीक उल्टी बात कर रहे हैं। लोग उनकी पुरानी उल्टी को सोशल मीडिया पर ढूंढकर आज उनके मुंह पर मल दे रहे हैं।

ऐसा ताजा हादसा कश्मीर फाईल्स नाम की फिल्म के निर्माता-निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री के साथ हुआ जिन्होंने फिल्म पठान के विरोध में एक वीडियो पोस्ट किया था। उनकी यह पोस्ट भारत के हिन्दुत्ववादियों के अभियान का हिस्सा थी जो कि अभिनेता शाहरूख खान की वजह से उनकी बांहों में दिख रही अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की भगवा-केसरिया बिकिनी को हिन्दू धर्म का अपमान करार दे रहे हैं। विवेक अग्निहोत्री सोशल मीडिया पर रात-दिन हिन्दुत्ववादी-राष्ट्रवादी आंदोलनकारी की तरह लगे रहते हैं, और उनकी इस पोस्ट के बाद लोगों ने आनन-फानन सोशल मीडिया से ही विवेक अग्निहोत्री की बेटी मल्लिका की अपनी पोस्ट की हुई तस्वीरें निकालकर लगा दीं जिनमें वे भगवा कलर के बिकिनी टॉप में समंदर के किनारे अपनी तस्वीरें खिंचवाकर पोस्ट कर रही हैं। विवेक अग्निहोत्री के पोस्ट किए हुए वीडियो में दीपिका का बिकिनी-डांस देखकर एक बच्ची रोते हुए कह रही है कि इतनी अश्लीलता आप लोग लाते कहां से हो। यह सवाल दिलचस्प हो सकता था लेकिन लोगों ने विवेक अग्निहोत्री का एक पुराना वीडियो निकालकर पोस्ट किया जिसमें उन्होंने हेट-स्टोरी नामक फिल्म बनाते समय फिल्मों में महिला के बदन को दिखाने के महत्व का लंबा-चौड़ा बखान किया था, और ऐसे मादक नजारों का जश्न मनाने के लिए कहा था। उनका यह लंबा वीडियो माइक पर उनकी कही हुई बातें हैं जिसमें उन्होंने महिला के बदन को खूबसूरत बताते हुए उसे पर्दे पर दिखाने की लंबी-चौड़ी हिमायत की थी। अब आज जब वे एक, दर्जनों दूसरे रंगों सहित भगवा-केसरिया बिकिनी में दिखने वाली दीपिका के बहाने शाहरूख का नाम लिए उन पर हमला कर रहे हैं, तो यह सोशल मीडिया की ही ताकत है कि वह पल भर में विवेक अग्निहोत्री की दोगली बातों का भांडाफोड़ कर रहा है। और मजे की बात यह है कि टीवी से लेकर अखबारों तक और डिजिटल से लेकर दूसरे किस्म के मीडिया तक, ये सब सोशल मीडिया की ऐसी पोस्ट को अपनी खास खबरें बना रहे हैं। मीडिया मालिकों और मीडिया के लिए काम करने वाले तथाकथित पत्रकारों को काबू में करने वाली ताकतों के लिए सोशल मीडिया एक बुरे ख्वाब की तरह है जिस पर कोई काबू नहीं पाया जा सकता। फेसबुक जैसे कुछ बिकाऊ माध्यमों से ऐसे काबू के सौदे जरूर हो सकते हैं, लेकिन उसके बावजूद कई दूसरे सोशल मीडिया हमेशा ही लोगों के लिए मौजूद रहेंगे, और लोग उनका लोकतांत्रिक इस्तेमाल करते ही रहेंगे। सोशल मीडिया की इस ताकत को कम नहीं आंकना चाहिए कि वह पहाड़ से निकलने वाली एक नदी की तरह है जिसके पानी का बहाव बेकाबू रहता है। और यही बेकाबूपन उसे कुछ हद तक अराजक और बहुत हद तक लोकतांत्रिक बनाकर चलता है।

पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे मौके सामने आए हैं जब भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकतों ने दूसरों पर हमले किए, और कुछ घंटों के भीतर उन ताकतों की पुरानी बातों की कतरनें, उनके वीडियो निकालकर लोगों ने पोस्ट करना शुरू कर दिया। आज तो सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग सचमुच ही शीशे के घरों में रह रहे हैं, और उन्हें दूसरों पर पत्थर चलाने के पहले यह याद रखना चाहिए कि जो लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं वे मानो पारदर्शी सेलोफिन का तौलिया लपेटे रहते हैं, और लोगों की पहुंच के भीतर रहते हैं। एक मामूली डांस को अश्लील बताने वाले विवेक अग्निहोत्री का महिला-देह की नग्नता की बड़ी लंबी वकालत देखने लायक है, और सोशल मीडिया पर लोगों को ढूंढकर इसे देखना चाहिए कि तिलक लगाया हुआ यह पाखंड किस दर्जे का है। हम सोशल मीडिया की इस अराजक ताकत के लोकतांत्रिक महत्व को गिनाना चाहते हैं कि जब संगठित कारोबार की तरह चलने वाले मीडिया घराने बिक जाते हैं, बड़े-बड़े नामी-गिरामी तथाकथित पत्रकार हर महीने कुछ राजनीतिक ट्वीट करने का लाखों रूपया भुगतान पाते हैं, तब अराजक सही, लोकतांत्रिक सोशल मीडिया यह साबित करता है कि ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है...।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

धरती से इंसानों की जंग कहां ले जाकर छोड़ेगी?

  29  दिसंबर 2022


पिछले हफ्ते केन्द्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया कि वह देश के 81 करोड़ से अधिक गरीब लोगों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत एक बरस तक मुफ्त राशन दिया जाएगा। सरकार की तरफ से गरीबों के कुछ और दूसरे तबकों को बहुत रियायती रेट पर अनाज दिया जाता है। कोरोना लॉकडाउन के समय से केन्द्र सरकार किसी न किसी तरह से सबसे गरीब लोगों को मुफ्त या रियायती राशन देते आ रही थी, और यह अगले एक बरस तक उसी का विस्तार है। इस पर केन्द्र के करीब 2 लाख करोड़ रूपये एक बरस में खर्च होंगे। भारत में गरीबी और अनाज के इस हाल को दुनिया के कुछ दूसरे हिस्सों से जोड़कर देखने की भी जरूरत है क्योंकि धरती नाम के इस गोले पर दुनिया के तमाम देश नक्शे की सरहदों से परे भी कई तरह से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। आज दुनिया में मौसम की मार के साथ अनाज को जोड़कर देखने की जरूरत है, और इससे भारत हमेशा अछूता रह जाएगा यह सोचना भी खुशफहमी होगी।

फिलीपींस बहुत अधिक दूर भी नहीं है, और वहां पर एक के बाद एक लगातार आए समुद्री तूफानों ने अरबों-खरबों की फसल तबाह कर दी है। तूफानी बाढ़ की वजह से 10 लाख के करीब घरों को नुकसान पहुंचा है या वे तबाह हो गए हैं, साथ ही सवा 4 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल भी तबाह हुई है। नतीजा यह हुआ है कि महंगाई वहां सिर चढ़कर बोल रही है, और वहां के बहुत से शहरों में लोग पेट भरने के लिए भीख मांग रहे हैं। आज ही सुबह बीबीसी पर एक रिपोर्ट थी कि वहां एक कामकाजी परिवार की महिला अपने बच्चों को तीन वक्त की जगह अब दो वक्त खाना दे पा रही है, और कुछ दिन बाद एक वक्त भी खाना मिल पाएगा या नहीं इसका ठिकाना नहीं है। अनाज की कमी से चीजों के भाव आसमान पर पहुंच रहे हैं, और फिलीपींस अपना बहुत सारा अनाज आयात करता है जो कि अब आसान नहीं रह गया है। दुनिया की ब्रेड बॉस्केट कहा जाने वाला यूक्रेन रूसी हमले का शिकार हो गया है, और वहां से मौजूदा अनाज भी बहुत कम निकल पाया है, और आगे तो आबादी, खेत, फसल, ढांचा, सभी कुछ रूसी हमले से तबाह हो चुका है। ऐसे में आगे जाकर वहां भी फसल दुनिया का पेट कितना भर पाएगी इसका कोई ठिकाना नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्यान्न संगठन का कहना है कि दुनिया में 19 देशों पर भूख की मार सबसे अधिक है जिनमें अफगानिस्तान, इथियोपिया, नाइजीरिया, सोमालिया, दक्षिण सूडान, और यमन की हालत बहुत ही खराब है।

अब जंग से लेकर मौसम की मार तक, इन तमाम चीजों को जोड़कर अगर देखा जाए तो मौसम की मार ही सबसे अधिक बेकाबू है जिस पर आने वाले कई बरसों तक दुनिया की कोई ताकत काबू नहीं कर सकती। किसी जंग को तो कुछ मध्यस्थ देश रोक सकते हैं, लेकिन आज दुनिया भर में जो मौसम की सबसे बुरी मार (वेदर एक्स्ट्रीम) पड़ रही है, उससे जूझने का कोई शॉर्ट-कट नहीं है। आज अमरीका जिस तरह बर्फबारी को देख रहा है, उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। दसियों लाख लोग बिना बिजली के अपने घरों में कैद हैं, सड़कों पर लोग कारों में जमकर मर गए हैं, या मरकर जम गए हैं। बड़े-बड़े प्रदेशों में बिजली ठप्प है, और इतनी बुरी बर्फबारी को अमरीका में बॉम्बसाइक्लोन कहा जा रहा है। अब दुनिया के सबसे विकसित देश का ढांचा भी कुदरत की ऐसी मार से जरा भी नहीं जूझ सकता है। दूसरी तरफ अफ्रीका के कुछ देशों में पिछले कई बरस से लगातार जितना भयानक सूखा पड़ रहा है, उसने जानवर और इंसान दोनों का जीना मुहाल हो चुका है। पूरे-पूरे देश बगल के देशों की तरफ खिसक रहे हैं कि किसी तरह खाना और पानी मिल जाए। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही हिन्दुस्तान के बगल के पाकिस्तान में ऐसी भयानक बाढ़ आई जैसी किसी ने कभी देखी-सुनी नहीं थी। पूरे के पूरे प्रदेश बाढ़ में डूब गए, सड़क और पुल बह गए, और इमरजेंसी राहत पहुंचाने वाले हेलीकाप्टरों के उतरने के लिए भी सूखी जगह नहीं बची थी। दसियों लाख लोग बेघर हो गए थे, भूखे रह रहे थे। कुल मिलाकर बात यह है कि सूखे और बाढ़ से परे, बर्फबारी, और टिड्डी दल के हमले से परे बहुत सी ऐसी और नौबतें हैं जिनसे फसल तबाह होती है। हिन्दुस्तान में ही अभी गेहूं की पिछली फसल के दौरान जब पौधों पर अन्न के दाने विकसित होते हैं, ठीक उसी समय इतनी भयानक लू चली कि उत्तर भारत में गेहूं की फसल खूबी और वजन दोनों पैमानों पर बर्बाद हुई। और इस मौसम में ऐसी लू की किसी ने कल्पना नहीं की थी।

आज दुनिया को यह समझने की जरूरत है कि लोगों के पास आज अगर किसी तरह खाना जुट रहा है, तो जरूरी नहीं है कि यह अनाज हमेशा मिलते ही रहेगा। मौसम की मार फसलों को बहुत दूर तक बर्बाद कर रही है, और उस पर इंसानों का कोई रातोंरात का काबू भी नहीं हो सकता। आज हर बरस दुनिया में एक-दो जगहों पर मौसम के बदलाव के खतरों से जूझने के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहे हैं, उनमें अधिकतर देशों के बड़े नेता पहुंच रहे हैं, मौसम विज्ञानी और पर्यावरण शास्त्री इक_ा हो रहे हैं, पर्यावरण आंदोलनकारी इन मौकों पर खतरों को गिनाते हुए सभा भवनों के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन दुनिया के देश अपने प्रदूषण मेें कटौती को अपनी घरेलू आबादी के बीच अलोकप्रिय मानते हुए उस पर तेजी से कटौती की बात नहीं कर रहे हैं। न तो कोयले से बनने वाली बिजली में कटौती हो पा रही है, और न ही निजी इस्तेमाल वाली बड़ी-बड़ी कारों की बढ़ती हुई गिनती की रफ्तार किसी तरह घट पा रही है। लोगों की संपन्नता उन्हें धरती की साधन-सुविधाओं के अनुपातहीन इस्तेमाल का हक दे रही है, और उस पर कोई देश कोई काबू करना नहीं चाह रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि धरती पर गिनी हुई आबादी के बीच खपत इतनी अधिक हो चुकी है कि वह उनसे सैकड़ों या हजारों गुना अधिक गरीब आबादी की खपत को भी पीछे छोड़ चुकी है। ऐसी इंसानी बेलगाम खपत के चलते ही धरती के पर्यावरण में इतना बदलाव आ रहा है कि जगह-जगह एक्स्ट्रीम वैदर की मार इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है।

हम इसे अनाज से जोड़कर इसलिए देख रहे हैं कि इंसान की पहली जरूरत खाने और पानी की रहती है। हवा तो वे प्रदूषित लेना सीख चुके हैं, पानी भी गंदा रहे तो भी काम चला लेते हैं, लेकिन अगर अनाज ही नहीं रहेगा, तो क्या होगा? अभी तो दुनिया केवल एक जंग झेल रही है, हो सकता है कि रूस का यूक्रेन पर हमला बढ़कर रूस और नाटों देशों के बीच जंग में तब्दील हो जाए, और वैसे में दुनिया के और भी बहुत से खेत खत्म हो जाएंगे, अनाज और घट जाएगा। अमरीकी वैज्ञानिक संस्था नासा का एक अध्ययन कहता है कि दुनिया के मौसम में बदलाव से दस बरसों के भीतर ही फसलों पर बहुत बुरा असर देखने मिल सकता है। यह अध्ययन बताता है कि मक्के की फसल 24 फीसदी तक घट सकती है, और उत्पादन में ऐसी गिरावट पूरी दुनिया को भूख से बदहाल कर सकती है। मौसम में बदलाव से अगर भुखमरी और बढ़ी, तो दुनिया के सबसे गरीब और अकालग्रस्त देश बाकी दुनिया की रहम पर अगर जिंदा रह गए तो भी बहुत होगा, लेकिन वहां की आबादी दान पर मिले अनाज पर महज जिंदा रहने से अधिक कुछ भी नहीं कर पाएगी।

आज के अनाज की कमी को देखते हुए, गरीबी और मौसम की मार को देखते हुए सभी लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि मौसम के बदलाव में इजाफा करने के बजाय किस तरह किफायत बरती जा सकती है ताकि धरती और अधिक तबाह न हो।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 दिसंबर 2022


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दीवारों पर लिक्खा है, 28 दिसंबर 2022


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सलमान खुर्शीद ने बकवास की लीज रिन्यू करवा ली...

  28  दिसंबर 2022


कांग्रेसियों में एक बड़ी खूबी है, जब कभी पार्टी में कुछ अच्छे दिन आते हैं, तो उसकी खुशी में बनाई जा रही खीर में फिनाइल डालने के लिए कोई न कोई कांग्रेसी इस तरह से दौड़कर आगे आते हैं, मानो उन्हें किसी विरोधी पार्टी ने सुपारी दे रखी है। अब चारों तरफ राहुल गांधी की भारत जोड़ो पदयात्रा का असर दिखाई दे रहा था, और उत्तरप्रदेश से आने वाले कांग्रेस के एक बड़े नेता सलमान खुर्शीद ने कल राहुल गांधी की भगवान राम से किसी तरह की एक तुलना की। ऐसी नाजायज बात पर भाजपा का यह हक बनता था कि वह इसे चाटुकारिता की पराकाष्ठा कहे। यह एक अलग बात है कि पिछले कई बरस से देश भर में जगह-जगह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना अलग-अलग भगवानों से करने का सिलसिला चले आ रहा है, और उसे रोकने के लिए न तो मोदी की तरफ से कभी कुछ कहा गया, और न ही भाजपा ने ऐसी नाजायज चापलूसी का कोई विरोध किया। लेकिन राहुल और मोदी के बीच एक बड़ा फर्क है। मोदी लगातार चुनावी कामयाबी पाने वाले नेता हैं, और वे अपनी पार्टी को आसमान पर ले गए हैं, और राहुल की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी ने चुनावों में सब कुछ खोया ही है। अब आज की चर्चा में हम चुनावी कामयाबी या नाकामयाबी से जुड़े हुए दूसरे पहलुओं पर बात करना नहीं चाहते कि कामयाबी किस कीमत पर मिली, या नाकामयाबी के पीछे क्या साम्प्रदायिकता से परे रहना एक वजह रही। अभी हम उस चर्चा को अलग छोडऩा चाहते हैं, और इस पर आना चाहते हैं कि कांग्रेस आज जिस दौर से गुजर रही है, उस दौर में जब पार्टी में कुछ अच्छा होते दिख रहा है, जब राहुल गांधी अपने पैरों पर चलकर एक अलग किस्म की कामयाबी और शोहरत तक पहुंच रहे हैं, दो दिन पहले ही हमारी इसी जगह पर लिखी हुई तारीफ के हकदार बन रहे हैं, तब कांग्रेस पार्टी के एक बड़े मुस्लिम नेता राम से उनकी तुलना करके भाजपा को हमले का एक नायाब मौका दे रहे हैं।


हमने कुछ अरसा पहले यह भी लिखा था कि धर्म और पुराण की मिसालों को लेकर कोई भी राजनीतिक दल भाजपा से नहीं जीत सकते। भाजपा की तो बुनियाद ही इन्हीं कहानियों पर टिकी हुई है, और उसके अखाड़े में जाकर उसे कोई क्या परास्त कर लेगा। ऐसे में अगर सलमान खुर्शीद को खालिस चापलूसी भी करनी थी, तो भी उन्हें राम-रहीम से दूर रहना चाहिए था। उनका नाम आते ही यह याद पड़ता है कि साल भर पहले अपनी एक किताब को बढ़ावा देने के कार्यक्रम में सलमान खुर्शीद ने हिन्दुत्व की चर्चा करते हुए उसकी तुलना दुनिया के सबसे खूंखार इस्लामी-आतंकी संगठन आईएसआईएस से की थी। यह बात इतनी भयानक थी कि उस वक्त कांग्रेस पार्टी में रहे एक दूसरे बड़े मुस्लिम नेता गुलाम नबी आजाद ने इसे तथ्यात्मक रूप से गलत, और गलत बयान करार दिया था। सलमान खुर्शीद के उस बयान को लेकर भाजपा ने राहुल गांधी पर हल्ला बोला था, और कांग्रेस पर यह तोहमत लगाई थी कि यूपी चुनाव के पहले वह मुस्लिमों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। इस बयान के 13 महीने बाद सलमान खुर्शीद ने मानो बकवास की सालाना लीज रिन्यू करवाने के लिए एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम तनाव के बीच राम का नाम लेकर पदयात्रा की कामयाबी का राम-नाम-सत्य करने का काम किया है। सलमान खुर्शीद एक कामयाब वकील रहे हैं, और उन्हें अपनी महारत का इस्तेमाल कानूनी मामलों में करना चाहिए, और हिन्दू-धार्मिक मामलों को छूना बंद करना चाहिए।

अब जब चापलूसी की पराकाष्ठा पर बात हो ही रही है, तो हम एक दूसरे पहलू पर भी बात करना चाहते हैं जो कि राहुल गांधी से ही जुड़ा हुआ है। राहुल जब दिल्ली की सात डिग्री की सर्द हवा में एक टी-शर्ट में घूम रहे हैं, भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों की खुली समाधियों पर तेज हवा के बीच वैसे ही खड़े हैं, तो यह बहस भी छिड़ गई है कि वे ऐसा कैसे कर पा रहे हैं? बात हैरानी की तो है, लेकिन चापलूसों ने इसका बखान करने के लिए उन्हें संत करार देना शुरू कर दिया है, कोई प्रशंसक सोशल मीडिया पर उन्हें योगी लिख रहे हैं, तो कोई उन्हें ऊंचे दर्जे का सन्यासी लिख रहे हैं। फिर जिन चापलूसों को कुछ और मेहनत करनी है, वे किसी समाधि स्थल पर बैठे शॉल लपेटे हुए अमित शाह की फोटो के साथ राहुल गांधी की टी-शर्ट वाली फोटो जोड़कर तुलना कर रहे हैं। कुल मिलाकर बिना चापलूसों के यह टी-शर्ट राहुल को एक अलग रौशनी में पेश कर रही थी कि पदयात्रा की आग से गुजरकर वे तपकर मजबूत हुए हैं, लेकिन इस टी-शर्ट को लेकर मोदी और शाह के गर्म कपड़ों की खिल्ली उड़ाना परले दर्जे की बेवकूफी है, और इसकी भरपाई राहुल गांधी को करनी पड़ रही है या करनी पड़ेगी। जिन चापलूसों ने दस-बीस किलोमीटर का सफर भी राहुल के साथ पैदल तय नहीं किया होगा, उन्होंने राहुल की पदयात्रा की शोहरत और उन्हें मिल रही वाहवाही को तबाह करने का काम जरूर किया है।

किसी भी नेता, संगठन, या पार्टी को अपने चापलूसों को काबू में रखना चाहिए। ऐसे लोगों के बजाय वे आलोचक काम के रहते हैं जो कि नेता या संगठन की खामियों को उजागर करने का काम करते हैं। मोदी की स्तुति में हर-हर महादेव की तर्ज पर हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा देने वालों के बजाय भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोग बेहतर हैं जो कि अपनी पार्टी, और पार्टी की सरकार की खामियों पर खुलकर बोलते हैं। चापलूसों ने इंदिरा गांधी को भी इमरजेंसी के पहले से गड्ढे में गिरना शुरू कर दिया था, और इमरजेंसी के दौरान वे इंदिरा को पाताल तक ले गए थे। चापलूसों ने इंदिरा इज इंडिया जैसा नारा दिया था, और संजय गांधी की चप्पलें उठाई थीं। आज राहुल गांधी अपने परिवार के एक सबसे साहसी व्यक्ति की तरह लगातार लोगों के बीच एक गैरचुनावी मकसद से देश के इतिहास की सबसे लंबी पदयात्रा कर रहे हैं। उनकी आज की कामयाबी में कांग्रेस पार्टी के किसी और नेता का कोई भी योगदान नहीं है। पार्टी के चापलूसों को राहुल की इस मुहिम को चौपट करने से परे रहना चाहिए। कांग्रेस पार्टी के लिए बेहतर यही होगा कि उसकी तरफ से अपने नेताओं के लिए यह सलाह जारी हो जाए कि वे धर्म की मिसालों से परे रहें। बिना चापलूसी के राहुल आज अधिक कामयाब हैं, और उन्हें राम बताना, या उन्हें टी-शर्ट में एक योगी बताना बंद होना चाहिए।

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