गरीबी पर सत्ता और सदन में संवेदनशीलता अब पहले की तरह नहीं

10 जनवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ विधानसभा में राज्य सरकार की तरफ से तैयार सालाना अभिभाषण राज्यपाल पढ़ते हैं, और इसमें राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की चर्चा रहती है। इस पर विपक्ष को सरकार की आलोचना का मौका मिलता है और फिर सरकार भी आलोचना का जवाब देती है। कल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ऐसे ही जवाब में  अपनी सरकार की गरीब हितैषी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन योजनाओं का मजाक उड़ाने का अधिकार किसी को भी नहीं है। छत्तीसगढ़ का गरीब आदमी चावल बेचकर शराब नहीं पीता। कुछ लोग अगर यह कहते हैं कि एक रूपए किलो चावल लेकर  गरीब लोग अपनी आमदनी शराब खर्च में कर देते हैं, तो ऐसा कहने वाले उन गरीबों का मजाक उड़ाते हैं, उन्हें जनता कभी माफ  नहीं करेगी।
दरअसल यह बात न सिर्फ छत्तीसगढ़ में है, और न सिर्फ एक रूपए किलो चावल को लेकर है। गरीबों को मिलने वाली रियायत ताकतवर और संपन्न तबकों के मुंह में खुशबूदार चावल के बीच आए कंकड़ की तरह खटकती है। लोग समझते हैं कि इससे गरीब लोग कामचोर हो जाते हैं, सरकार की रोजगार योजनाओं, जनकल्याण की योजनाओं का फायदा अर्थव्यवस्था को सीधे नहीं मिल पाता। दरअसल हिन्दुस्तान में ही नहीं, सारी पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में इंसानों को एक आंकड़े की तरह देखने और इस्तेमाल करने की बुनियादी सोच रहती है। और ऐसे में किसी इंसान के पेट में सरकारी लागत से कितना जा रहा है, और उस इंसान से अर्थव्यवस्था में कितना योगदान मिल रहा है, इसका हिसाब करते हुए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के केलकुलेटर दुनिया के देशों को यह हुक्म देते हैं कि उनको खेती और खाने पर रियायतों को कितना कम करना है, तभी उनको अंतरराष्ट्रीय कर्ज मिल सकेंगे। 
ये सारे आंकड़े मशीनी होती जा रही उस दुनिया के हिसाब से तैयार होते हैं जिनमें इंसानों की गिनती सिर्फ गिनती के लिए होती है, एक जिंदगी की तरह नहीं। ऐसे में जब अभी कुछ बरस पहले तक ही छत्तीसगढ़ जैसे इलाकों से भूख से मौतों की खबरें आती थीं, तो उसे लेकर विधानसभा से लेकर संसद तक हल्ला होता था। लेकिन आज जब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में फसल की खरीदी की सरकारी जिम्मेदारी, और अनाज पर गरीब का हक, इन दोनों को बढ़ाते हुए कुल मिलाकर गरीबों का भला जब होता है, तो संपन्न और शहरी तबका उसके मायने नहीं समझ पाता। जिस राज्य में गरीबों को पीढ़ी दर पीढ़ी आधे पेट खाकर ही सोना पड़ता था, जहां पर कुपोषण की वजह से पीढिय़ों से लोगों को कमजोर बन जाना एक नियति बनी हुई थी, वहां पर आज अगर राज्य सरकार के बजट के बहुत थोड़े से हिस्से से आधी गरीब आबादी के सामने से भूख खत्म हो गई है, तो ऐसी योजनाओं का मजाक उड़ाना एक हिंसा है। 
शहरी बिल्डरों और कारखानेदारों को आज छत्तीसगढ़ में पहले जैसी मजदूरी पर मजदूर नहीं मिलते। लेकिन जब लोगों के काबू से सोने का रेट बाहर है, हवाई सफर की टिकटों का दाम बाहर है, जब पेट्रोल और डीजल का दाम उनके काबू से बाहर है, तो फिर गरीब के खून और पसीने के दाम को वे क्यों काबू में रखना चाहते हैं? आज मजदूर न मिलने, या शराबखोरी बढऩे की शिकायत वे लोग करते हैं जो कि आज बाजार के नीति-सिद्धांतों के मुताबिक मांग और आपूर्ति के आधार पर अधिक मजदूरी देना नहीं चाहते। गरीब को चावल सस्ता मिलता है तो वह अपनी कमाई से दारू पी लेता है, यह एक बहुत ही गैरगरीब सोच है। अगर कोई गरीब ऐसा करता भी है, तो दारू पीने का उसका हक उतना ही है, जितना कि किसी अमीर का है। और छत्तीसगढ़ में आज अगर पूरे परिवार का, बच्चों का पेट भरना शुरू हुआ है, कुपोषण कम हुआ है, शिशु मृत्यु दर घटी है, सेहत के बाकी पैमाने अगर बेहतर हुए हैं, तो इसकी वजह गरीबों को मिलने वाला रियायती अनाज है। केन्द्र सरकार की रोजगार योजनाओं, और राज्य सरकार के अमल को मिलाकर अगर गरीब को अपने आसपास पहले से अधिक रोजगार मिल रहा है, प्रदेश के बाहर बेबसी में मजदूरी करने जाना अब पहले के मुकाबले बहुत कम हुआ है, तो कम से कम इंसान की तरह जीने का उसका ऐसा हक आज उसे कुछ या अधिक सीमा तक मिल रहा है। 
छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में दो बार के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पार्टी को अगर तीसरी बार सत्ता पर लेकर आए हैं, तो उसके पीछे बहुत सी दूसरी वजहों के साथ-साथ एक बड़ी वजह यह भी है कि प्रदेश के गरीबों की जिंदगी पिछले दस बरसों में बहुत बदल गई है। चुनाव में जीत-हार की और दूसरी वजहें तो आती-जाती रहती हैं, लेकिन हमारा चुनाव के पहले भी यही मानना था कि सबसे गरीब का सबसे अधिक साथ डॉ. रमन सिंह को मिलेगा, और राज्य में भाजपा की जीत के आंकड़ों में सबसे बड़ा योगदान इसी बात का था। यह छत्तीसगढ़ का भरे पेट वाला गरीब ही था जिसने अपनी पूरी ताकत से भाजपा के हार के खतरे को पीछे धकेल दिया। 
हमारा मानना है कि गरीब का हक देश और प्रदेश के प्राकृतिक साधनों पर नहीं दिया जा रहा, और ताकतवर तबके उसका हक लूट ले रहे हैं। जंगल से लेकर जमीन तक, और खेतों से लेकर पानी तक, खदानों से लेकर आसमान तक, सत्ता जिन चीजों को मनमानी रियायतों पर खरबपतियों को बेचती है, उसमें इन चीजों के साथ-साथ गरीब की धड़कनें भी बिक जाती हैं। जिस तरह देश की संसद और विधानसभाओं में करोड़पतियों और अरबपतियों का अनुपात बढ़ते चल रहा है, उससे जाहिर है कि इतनी गरीबी को लेकर सत्ता और सदन में संवेदनशीलता पहले की तरह की अब नहीं रह गई है। ऐसे में कोई भी पार्टी, कोई भी नेता, अगर गरीबों के भले के लिए कोई अच्छी रियायती योजना बनाते हैं, उस पर ईमानदार अमल करवाते हैं, तो यह सिर्फ इंसाफ की बात है। इसका विरोध करने वाले लोगों को अपनी सोच का खतरा समझना चाहिए।

जयराम रमेश के बताए झाड़ू के खतरे को समझे कांग्रेस, और बाकी पार्टियां

09 जनवरी 2014
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी के भीतर इस बात को लेकर बड़े मतभेद चल रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल की पार्टी, आप, का कितना वजन है। जनता से जुडऩे, जुड़े रहने पर जोर देने वाले केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि वह आम आदमी पार्टी (आप) का मजाक नहीं बनाए और आगाह किया कि यह नई पार्टी 'वाजिब मुद्दोंÓ पर राज्यों में अलग-अलग अवतार ले सकती है। उन्होंने कहा, हम आम आदमी पार्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि वे भ्रष्टाचार, राजनीति में मितव्ययिता, राजनीति में सादगी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं तो उचित मूल्यों वाले मुद्दे हैं। जयराम रमेश ने यह भी कहा कि देश में कम्युनिस्ट ही हैं जो भव्य जीवनशैली और 'धन के खुले प्रदर्शनÓ की 'बीमारीÓ से मुक्त है। जयराम रमेश ने कहा कि 'आपÓ दशावतार है। अलग-अलग राज्यों में यह पार्टी अलग अवतार ले सकती है। उनका बयान सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी की उस टिप्पणी के बाद आया है कि जिसमें उन्होंने कहा था कि आप भारतीय राजनीतिक क्षितिज से जल्द ही गायब हो जाएगी।
दूसरी तरफ भारतीय मूल के एक विख्यात लेखक और इतिहासकार सुनील खिलनानी ने एक भारतीय टीवी चैनल से बात करते हुए 'आपÓ के बारे में कहा- इसने राजनीतिक बहसों में वाकई एक नई ऊर्जा भर दी है। इसने राष्ट्रीय दलों पर यह दबाव बना दिया है कि वह खुद को दुरुस्त करे, और तीसरी बात जो कि बहुत अहम है, कि इसने नए, व्यावसायिक, सक्षम युवा लोगों को राजनीति की तरफ आकर्षित किया है, जैसा अमरीका में ओबामा ने किया।
इन बयानों को हम यहां पर खुलासे से इसलिए रख रहे हैं कि इसी सोच पर हम आज अपनी बात आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसे कि हम पिछले महीने में कई-कई बार अरविंद केजरीवाल के पार्टी के संदर्भ में लिख चुके हैं, और इस पार्टी के बनने के पहले भी बरसों से हम राजनीति में सादगी की वकालत करते आए हैं। आज अगर कांग्रेस पार्टी के भीतर जयराम रमेश की बात को सुनने वाले लोग नहीं हैं तो यह बात जाहिर है कि कल कांग्रेस की बात को देश में सुनने वाले लोग भी नहीं बचेंगे। इस नई और छोटी सी पार्टी ने आज देश के भीतर सादगी और किफायत को, ईमानदारी को चर्चा में तो ला ही दिया है, लोगों के बीच भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा हाल में बेहतरी आने की एक बहुत छोटी सी संभावना तो खड़ी कर ही दी है, और केजरीवाल सफल हों या न हों, उन्होंने देश की बड़ी-बड़ी गैरवामपंथी पार्टियों के सामंती मिजाज के खिलाफ एक जनभावना तो खड़ी करने का, उसे एकजुट करने का काम किया है। 
एक वक्त कांग्रेस पार्टी गांधी की राह पर सादगी मानती थी। दूसरी तरफ यह पार्टी नेहरू की पार्टी भी थी जिन्होंने अपनी संपत्ति देश को दे दी थी। देश की दूसरी बड़ी पार्टी जनसंघ के दिनों से आरएसएस के सादगी के रास्ते पर चलने की बात करती थी। लेकिन पिछले दशकों ने बताया है कि किस तरह कांग्रेस और भाजपा, अपने आपको दलितों की पार्टी कहने वाली बसपा, अपने को समाजवादी कहने वाले मुलायम सिंह के कुनबे, और भी बहुत सी पार्टियों और नेताओं ने अपनी काली कमाई का जिस तरह का हिंसक और नंगा नाच देश के सामने रखा है, वह भयानक है। और जो लोग अरविंद केजरीवाल की पार्टी को अभी महज एक झाड़ू समझ रहे हैं, उनको यह याद रखना चाहिए कि जनता जब-जब, जिस-जिस नेता और पार्टी का हिंसक और अश्लील वैभव-प्रदर्शन देखती है, उससे हिकारत करने लगती है। जब तक उसके पास कांग्रेस और भाजपा में से किसी एक को चुनने की बेबसी रहती है, रहती थी, तब तक उसने अपनी नफरत निकालने का कोई रास्ता नहीं देखा था। लेकिन यह तय है कि आज अरविंद केजरीवाल की शक्ल में देश में एक चर्चा खड़ी हुई है, सोच खड़ी हुई है, और यह सोच इस आदमी से परे भी जाएगी। जैसा कि जयराम रमेश ने कहा है कि आम आदमी पार्टी एक दशावतार की तरह अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग शक्ल में भी खड़ी हो सकती है, तो इसे एक सही चेतावनी मानते हुए उनकी खुद की कांग्रेस पार्टी, और बाकी तमाम दौलतमंद पार्टियों, और नेताओं को अपना तौर-तरीका सुधार लेना चाहिए। वरना एक झाड़ू बड़े-बड़े लोगों को सुधारकर रख देगा। 'आपÓ का अपना खुद का बहुत अधिक वजन जरूरी नहीं है, उसकी सोच आज के माहौल के लिए जरूरी थी, और वह सोच अब जोर पकड़ चुकी है। जिस तरह जंगल की आग फैलते चलती है, बाढ़ का पानी फैलते चलता है, उसी तरह भारतीय वोटरों की हिकारत और नफरत भी फैलते दिख रही है। 

कश्मीर को लेकर प्रशांत भूषण की पार्टी पर हमले से जुड़े पहलू

08 जनवरी 2014
संपादकीय
देश के एक बड़े वकील, मानवाधिकार कार्यकर्ता, और अब आप के एक प्रमुख राजनेता, प्रशांत भूषण पर कुछ महीने पहले भी एक उग्र हिन्दू संगठन के लोगों ने हमला किया था, जब उन्होंने कश्मीर को लेकर कुछ बयान दिए थे। अभी फिर कश्मीर पर उनके बयान को लेकर एक तनाव खड़ा किया जा रहा है, और दिल्ली में सत्तारूढ़ इस पार्टी के दफ्तर पर आज फिर उन्हीं हिन्दू कार्यकर्ताओं ने हमला किया है। किसी भी धर्म, जाति, आध्यात्मिक संगठन, या राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोग जब हमले पर उतारू होते हैं, तो यह जाहिर रहता है कि उनके पास तर्क खत्म हो चुके हैं। ऐसे ही हिन्दू संगठन संस्कृति रक्षा के नाम पर, नैतिकता कायम करने के नाम पर कर्नाटक में भी नौजवान पीढ़ी पर हिंसक हमले करके अपनी मौजूदगी देश भर में दर्ज करा चुके हैं। और अब उत्तर भारत में वे प्रशांत भूषण पर यह दूसरा हमला कर चुके हैं। 
लेकिन आज हम यहां पर न तो सिर्फ ऐसे हमलों पर बात शुरू करके, उसी पर खत्म करना चाहते, और न ही हम कश्मीर के मुद्दे पर बात को ले जाना चाहते हैं। कश्मीर का मुद्दा एक जटिल मुद्दा है, और उससे जुड़े हुए पहलुओं पर पहले खासे लंबे लेख की जरूरत है, उसके बाद ही उस पर हमारे विचार हमारे पाठकों के काम के हो सकते हैं। फिलहाल आज हम यहां पर इन दो मुद्दों से थोड़ा सा हटकर, किनारे के एक मुद्दे पर बात करना चाहते हैं कि कश्मीर को, या कि बांग्लादेश, गोवा हो, या कि सिक्किम, ऐसे बहुत से मौके और मुद्दे रहते हैं जिनमें सही या गलत, संवैधानिक या असंवैधानिक, ये बातें एक किनारे रखकर दुनिया के किसी भी देश को अपने व्यापक हितों को देखना पड़ता है। यहां पर हम कश्मीर के लोगों के हक को अनदेखा करते हुए यह बात नहीं कर रहे हैं, और न ही वहां के ऐतिहासिक समझौते के खिलाफ कोई बात कर रहे हैं। हमारी कुल जमा बात यह है कि किसी देश के व्यापक हित कई बार नैतिकता से, कानून से, और ऐतिहासिक समझौतों से परे भी रहते हैं, और उनको देखते हुए ही कई बार फैसले लिए जाते हैं। 
अब बांग्लादेश को बनाने की बात करें, तो बहुत से अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर लोग उस फौजी कार्रवाई के खिलाफ भी तर्क दे सकते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में पाकिस्तान के इन दो हिस्सों को, एक-दूसरे से अलग करके बांग्लादेश बनवाकर अपने फौजी फायदे का भी एक काम किया था, और बिना कहे भी भारत इसे अपनी कामयाबी मानता है, और इसके लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को उस वक्त शायद दुर्गा भी कहा था। इसी तरह सिक्किम का भारत में विलय, या कि कश्मीर के कई मुद्दों पर किसी कार्रवाई में देर, या कि देश के भीतर भी कुछ मुद्दों पर कार्रवाई न करना, एक किस्म की कार्रवाई होती है। सरकार चलाना, और दूसरे देशों के साथ रिश्ते रखना, अपनी सरहदों को महफूज रखना, और अपने लोगों की जिंदगियों को बचाकर रखना, इसके लिए दुनिया का हर देश बहुत किस्म के अनैतिक समझौते करता है, और भारत ऐसे फैसलों में दूसरे देशों से खासा पीछे भी रहता है। 
दुनिया के देशों की बीच की आज की राजनीति, कूटनीति, और फौजी रणनीति, बाजार और कारोबार के हित, अपने नागरिकों के अस्तित्व के मुद्दे, इन सबको देखते हुए देशों के फैसले एकदम काले और सफेद नहीं रहते। वे सलेटी से रहते हैं, और कहीं पर उनका रंग गाढ़ा होता है, और कहीं पर हल्का। इसलिए कश्मीर पर अलग-अलग सरकारों का अलग-अलग वक्त के रूख, और अलग-अलग विचारधाराओं के आंदोलनकारियों के रूख के बीच कई बार टकराव हो सकता है, या यह कहना बेहतर होगा कि हमेशा ही एक टकराव बने रहता है, और इसमें जायज या इंसाफ जैसा कोई साफ-साफ एक रूख शायद मुमकिन भी नहीं हो सकता। इसलिए जिन लोगों को देश के व्यापक हितों की फिक्र है, उनको जिम्मेदारी के साथ भी ऐसे मुद्दों को छेडऩा चाहिए, और जिम्मेदारी के साथ ही ऐसे मुद्दों का विरोध करना चाहिए। आने वाले महीनों में चुनाव को देखते हुए सड़कों पर कूटनीति और देश की अंतरराष्ट्रीय नीति, देश की फौजी जरूरत, इन सबको नारों में तय करने की कोशिश होगी, और वह खतरनाक होगी। इसलिए हर तबके को कुछ जिम्मेदारी से, कुछ सब्र से काम लेना चाहिए, और जुबान की किफायत का ख्याल रखना चाहिए।

Bat ke bat

8 Dec 2014

देश-समाज में कोई कार्रवाई बिना प्रतिक्रिया नहीं रहती

07 जनवरी 2014
संपादकीय
पाकिस्तान से काम कर रहे आतंकी संगठन लश्कर के शक में हिन्दुस्तान में गिरफ्तार कुछ संदिग्ध आतंकियों जांच एजेंसियों को बताया है कि उन्होंने मुजफ्फरनगर के दंगों का बदला लेने के लिए दंगा राहत शिविरों के लोगों से संपर्क किया था। दूसरी तरफ कल ही यह खबर भी मिली थी कि छत्तीसगढ़ में आतंक से जुड़े होने के शक में जो लोग पकड़ाए हैं, उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी से पूछताछ में यह कुबूला है कि बोधगया में जो आतंकी धमाके किए गए थे, वे पड़ोसी देश म्यांमार में बौद्ध समुदाय के लोगों द्वारा सरकार के संरक्षण में वहां के मुस्लिम समुदाय के व्यापक जनसंहार का बदला लेने के लिए किए गए थे। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि बोधगया पर आतंकी हमले के तुरंत बाद हमने इसी जगह संपादकीय में लिखा था- ''...इतने अंदाज के लिए किसी बहुत बड़े फार्मूले की जरूरत नहीं पड़ती है और साधारण समझ यह कहती है कि धार्मिक आधार पर जब कभी जानलेवा हमले होते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया भी होती है। गुजरात में गोधरा हत्याओं के बाद के दंगों के पीछे सरकारी बढ़ावा चाहे जितना रहा हो, गोधरा से आहत हुआ हिंदू समुदाय इतना भड़का हुआ था कि सरकारी छूट या बढ़ावा मिलते ही उसने खूब कत्लेआम किया था। पिछले कुछ महीनों में जितने बड़े पैमाने पर म्यांमार में सरकार और बौद्ध समुदाय के हाथों मुस्लिम मारे जा रहे थे, उसकी ऐसी कोई प्रतिक्रिया हो सकती थी...ÓÓ
लोगों को यह भी याद होगा विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी मुजफ्फरनगर दंगा पीडि़तों से संपर्क में है। उस वक्त राहुल के बयान को लेकर बड़ा बवाल हुआ था। उस वक्त बवाल की एक वजह यह भी थी कि राहुल गांधी ने अपने बयान में यह कहा था कि उनको यह बात खुफिया एजेंसियों के अफसर से पता लगी थी, और उस पर यह सवाल उठा था कि उनको किस हैसियत से खुफिया जानकारी मिल सकती थी। खैर चुनावों के बीच वह बात आई-गई हो गई थी, लेकिन आज कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी के उस बयान की याद ताजा करते हुए कहा था कि उस वक्त का वह बयान आज सही साबित हो रहा है। 
दरअसल चीजों की प्रतिक्रिया होती ही होती है। भारत और उसके अड़ोस-पड़ोस के देशों के ऐसे जटिल और घने अंतरसंबंध हैं कि धर्म और जाति, क्षेत्रीयता और राजनीतिक सोच, कई किस्म से सरहद के एक तरफ की प्रतिक्रिया दूसरी तरफ भी होती है। देश के भीतर भी होती है, और देश के बाहर भी। और ऐसा सिर्फ हिन्दुस्तान के साथ होता हो यह भी नहीं। मुस्लिम देशों में अमरीका और उसके गिरोह के देश जो फौजी हमले करते हैं और लाखों बेकसूरों को मारते हैं, तो उसका आतंकी जवाब पश्चिमी देशों को भी वक्त-वक्त पर मिलते रहता है। स्वर्ण मंदिर पर ऑपरेशन ब्लूस्टार की प्रतिक्रिया में इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, और उसकी प्रतिक्रिया में देश में जगह-जगह सिख विरोधी दंगों में हजारों जानें गई थीं। इसके बाद श्रीलंका में तमिल टाइगर्स के खिलाफ हिन्दुस्तानी फौज भेजने की प्रतिक्रिया राजीव गांधी की हत्या की शक्ल में सामने आई थी। बाबरी मस्जिद गिराने की प्रतिक्रिया मुंबई हमलों की शक्ल में दाऊद इब्राहिम के वक्त हुई थी, गोधरा में ट्रेन के मुसाफिरों को जिंदा जलाने की प्रतिक्रिया गुजरात के मुस्लिमविरोधी दंगों की शक्ल में हुई थी।  हम देश के भीतर भी देखते हैं कि जब मुंबई में शिवसेना या राज ठाकरे उत्तर भारतीय लोगों के खिलाफ कुछ कहते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया बाकी देश में भी होती है। 
इसलिए आज अगर मुजफ्फरनगर के दंगों की प्रतिक्रिया खड़ी करने के लिए दंगों के शिकार लोगों के बीच कोई आतंकी संगठन घुसपैठ करने की कोशिश करता है तो उसमें हैरानी की कोई बात नहीं होगी। ऐसी प्रतिक्रियाओं के लिए भारत एक देश नहीं है, यह एक क्षेत्रीय केन्द्र है, जो कि चारों तरफ से अलग-अलग जातियों, धर्मों, और राजनीतिक विचारधाराओं से घिरा हुआ है। देश के राजनीतिक नक्शे की सरहद भारत को बाकी देशों से अलग-थलग नहीं कर सकती। इसलिए हिन्दुस्तान को न सिर्फ अपने देश के भीतर राष्ट्रीय एकता और सद्भाव के एक माहौल की जरूरत है, बल्कि पड़ोसी देशों के साथ भी उसके रिश्ते ऐसे होने चाहिए कि वहां भी वह एकता और सद्भाव को बढ़ावा दे सके, और वहां का माहौल ठीक रहने पर ही, भारत का घरेलू माहौल ठीक हो सकता है। कोई राहत शिविर जख्मों को ठीक नहीं कर सकते। लोकतंत्र में जरूरत यह है कि जख्मों की नौबत न आए, और जख्मों को कुरेदकर वोट बटोरने की कोशिशें न हों। समुदायों के टकराव में अगर आंख के बदले आंख निकालने का सिलसिला चलते रहेगा, तो एक दिन पूरी दुनिया ही अंधी बच जाएगी।

सहमति के वयस्क देह संबंध शादी की गारंटी मानना गलत

06 जनवरी 2014
संपादकीय
दिल्ली की एक छोटी अदालत ने अभी अपने फैसले में एक बड़ी बात कही है, जो कि कानून की आखिरी सोच शायद न हो, और हो सकता है कि आगे चलकर इससे बड़ी अदालतें इस पूरी सोच को खारिज करें, लेकिन इस हकीकत को भूलना नहीं चाहिए कि जिला स्तर की अदालत का फैसला पाने में ही बहुत से लोगों की पूरी जिंदगी गुजर जाती है, और अधिकतर लोग इससे ऊपर की अदालत तक जा भी नहीं पाते हैं, इसलिए ऐसे तमाम लोगों के लिए अपनी लगभग तमाम जिंदगी जिले की अदालत का फैसला ही ताजिंदगी कायम रहता है। 
दिल्ली की एक जिला अदालत ने विवाह से पहले यौन संबंध को 'अनैतिकÓ और 'प्रत्येक धार्मिक मतÓ के खिलाफ बताते हुये कहा है कि विवाह करने के वायदे के आधार पर दो वयस्कों के लिये यौन संसर्ग का प्रत्येक कृत्य बलात्कार नहीं हो जाता है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेन्द्र भट ने यह भी कहा कि कोई महिला, विशेषकर वयस्क, शिक्षित और कार्यालय जाने वाली हो, जो विवाह के आश्वासन पर यौन संसर्ग करती है तो ऐसा ''वह अपने जोखिम पर करतीÓÓ है। न्यायाधीश ने कहा, ''मेरी राय में विवाह के आश्वासन पर दो वयस्कों के बीच होने वाले यौनाचार का प्रत्येक कृत्य अपराध नहीं हो जाता है, यदि बाद में लड़का इस वायदे को पूरा नहीं करता है।ÓÓ उन्होंने कहा, ''जब एक वयस्क, शिक्षित और ऑफिस जाने वाली महिला विवाह करने के आश्वासन पर खुद को अपने मित्र या सहयोगी के प्रति यौनाचार के लिये समर्पित करती है तो वह ऐसा अपने जोखिम पर करती है। उसे अपने इस कृत्य के बारे में समझना चाहिए और यह भी जानना चाहिए कि लड़के द्वारा अपने वायदे को पूरा करने की कोई गारंटी नहीं है।ÓÓ न्यायाधीश ने कहा, ''वह ऐसा कर भी सकता है और नहीं भी। उसे यह समझना चाहिए कि वह एक ऐसे कृत्य में संलिप्त हो रही है जो अनैतिक ही नहीं, बल्कि प्रत्येक धर्म के नियमों के भी खिलाफ है। दुनिया का कोई भी धर्म विवाह से पहले यौनाचार की अनुमति नहीं देता है।ÓÓ अदालत ने मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले एक व्यक्ति को बलात्कार के आरोप से बरी करते हुए यह टिप्पणी की ।
इस फैसले से हो सकता है कि ऊपरी अदालतें असहमत हों, लेकिन हिन्दुस्तानी जनता का एक बड़ा हिस्सा इसकी इस बात से सहमत होगा कि विवाह से पहले सेक्स अनैतिक है, और यह भी हो सकता है कि इस बड़े हिस्से में ऐसे लोग भी हों जो कि जिंदगी का ऐसा मजा उठाते रहे हों, लेकिन जब सार्वजनिक चर्चा की बात आए तो वे नैतिकता की टोपी पहनकर खड़े होना बेहतर समझते हों। दूसरी तरफ न सिर्फ आदमियों, बल्कि औरतों का भी एक बड़ा तबका इस बात का हिमायती होगा कि शादी का वायदा करके सेक्स करने वाले आदमी ने अगर बाद में शादी नहीं की, तो उसे बलात्कारी मानना ठीक नहीं होगा। क्योंकि बिना सेक्स के भी बहुत से वायदे टूट जाते हैं, और शादी का हर वायदा तो कभी पूरा होता भी नहीं। 
हम इस फैसले में विवाहपूर्व संबंधों की नैतिकता पर दी गई नसीहत का साथ नहीं दे रहे। हम लोगों के निजी जीवन के फैसलों पर धार्मिक रीति-रिवाजों को हावी करने के खिलाफ हैं, और वयस्क लोगों के बीच सेक्स एक आपसी फैसला होता है जिसका किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं हो सकता। इसलिए इस अदालत ने मसीहाई अंदाज में जो विचार लिखा है, उसका कानूनी वजन हमको कुछ नहीं दिखता, और वह आगे जाकर खारिज हो जाना तय है। लेकिन इसका दूसरा हिस्सा हमको मायने रखने वाला लगता है कि विवाह के वायदे के साथ किया गया सेक्स, वायदा पूरा न होने पर बलात्कार नहीं कहा जा सकता। यह बात असल जिंदगी में खरी लगती है, और ऐसे संबंधों में पडऩे वाले लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि शादी न होने पर सहमति वाले पिछले वयस्क संबंध बलात्कार करार देना ठीक नहीं है। महिलाओं को भारतीय समाज में एक अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा जरूरी है, लेकिन अगर इस कानूनी सुरक्षा का गलत इस्तेमाल होने लगेगा, तो उससे महिलाओं के तबके का एक नुकसान होगा। 
यह नुकसान समाज में, नौकरियों और कामकाज में, बराबरी के मौकों पर वार करेगा। अगर महिलाओं के लिए बनाए गए खास कानूनों का बेजा इस्तेमाल होगा, पुलिस के स्तर पर नतीजे निकालकर मामले दर्ज होने लगेंगे, किसी अदालत द्वारा उसकी गलत व्याख्या होगी, तो लोग, खासकर पुरूष प्रधान समाज महिलाओं को बराबरी के मौके देने से कतराने लगेगा। इसलिए हिफाजत के साथ-साथ इस जमीनी हकीकत को भी देखना होगा कि बरसों तक चले रजामंदी के वयस्क संबंधों को अगर कोई एक दिन में बलात्कार ठहराने लगे, तो ऐसे में लोगों के संबंध भी प्रभावित होने लगेंगे। दो वयस्क लोगों के बीच अगर ऐसी नौबत का खतरा रहेगा, तो हो सकता है कि समाज के भीतर वयस्क संबंधों पर इस खतरे का तनाव झलकने लगे, और लोग संबंधों से हिचकने लगें। यह बात हम सैद्धांतिक तौर पर कह रहे हैं, क्योंकि आबादी के अनुपात में, वयस्क प्रेम और देह संबंधों के अनुपात में ऐसी होने वाली रिपोर्ट या शिकायत न के बराबर है। लेकिन कानून जब चीजों की व्याख्या करता है तो वह न के बराबर होने वाले मामलों पर भी अपनी सोच सामने रखते हुए फैसले लेता है। 
हम अभी शिकायत से पहले के स्तर पर जाकर सबको यह सलाह देना चाहते हैं कि वयस्क प्रेम संबंधों, और देह संबंधों में पडऩे के पहले यह सोच और समझ लेना चाहिए कि इनमें से हर कोई संबंध शादी में तब्दील हो ही जाए, यह जरूरी नहीं है। इसलिए अदालत द्वारा सुझाई गई धार्मिक सोच से परे भी हम एक सामान्य समझबूझ को सुझाना चाहेंगे कि ऐसे संबंधों को शादी की गारंटी मानकर चलना एक नासमझी है, और जब कोई प्रेम और देह संबंधों में पड़ते हैं, तो उनको अपने फैसले ऐसी किसी नामुमकिन गारंटी की कल्पना के साथ नहीं लेने चाहिए। हम वयस्क लोगों को आपसी सहमति से किसी भी तरह के प्रेम या देह संबंध बनाने के खिलाफ कुछ नहीं सुझा रहे हैं, लेकिन ऐसे संबंधों के बाद शादी को एक अनिवार्य गारंटी मानना अपने आपको धोखा देना होगा, और शायद आगे की अदालतें भी इस निचली अदालत के इस फैसले को कायम रखेंगी। 
यह संपादकीय इतना लिख लेने के बाद अभी इंटरनेट पर मई 2013 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की जानकारी ट्विटर से मिली जिसमें दो जजों की एक बेंच ने यह लिखा था कि अगर कोई आदमी किसी महिला के साथ उसकी सहमति से सेक्स संबंध बनाता है, जिससे कि वह शादी करने का इरादा रखता है, और फिर किसी वजह से अगर वो शादी नहीं हो पाती, तो ऐसे सेक्स संबंध को बलात्कार नहीं कहा जा सकता। 

मनमोहन सिंह की पे्रस कांफे्रंस से बाकी लोगों के लिए नसीहत

5 जनवरी 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल के आखिरी महीने में अधिक से अधिक मजाक का शिकार होते जा रहे हैं। अब खबरें भी इस तरह से बनने लगी हैं, जो उनके साथ कुछ ज्यादती करती दिखती हैं। कल चारों तरफ एक खबर थी कि उनकी पे्रस कांफे्रंस के पहले उनके आसपास के सहयोगियों ने एक रिहर्सल करके सवाल पूछे ताकि प्रधानमंत्री संभावित सवालों के जवाब सोच सकें। हमारी जानकारी में न सिर्फ दुनिया के कोई भी बड़े नेता, बल्कि कोई भी अभिनेता या कारोबारी, जो भी मीडिया के सामने आने का एक बड़ा महत्वपूर्ण मौका पाते हैं, वे सभी ऐसी तैयारी करते होंगे। और अगर वे ऐसा नहीं करते होंगे, तो फिर अपने काम को जिम्मेदारी से न करने की तोहमत भी झेलने के लायक होंगे। 
प्रधानमंत्री की दूसरी आलोचना इस बात के लिए हो रही है कि उन्होंने अपने-आपको कमजोर नेता कहे जाने पर गुजरात दंगों के वक्त के वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ इशारा करते हुए कहा- 'अगर आप अहमदाबाद की गलियों में बेगुनाह लोगों के नरसंहार को प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नापने का पैमाना मानते हैं तो मैं इसमें विश्वास नहीं करता...।Ó 
मनमोहन सिंह पर लगातार यह तोहमत लगती है कि वे चुप रहते हैं। हम भी हमेशा यह लिखते हैं कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को अधिक मौकों पर, अधिक मुद्दों पर, अधिक बोलना चाहिए। अब अगर उन्होंने इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो चुकी इस हकीकत को गिनाया है, तो इसे लेकर उनको कोसना ठीक नहीं है। उन्होंने न तो मोदी को ऐसे मानव संहार का मुजरिम कहा है, और न ही कोई भद्दी जुबान इस्तेमाल की है। उन्होंने गुजरात की इन हत्याओं के वक्त वहां रहे मुख्यमंत्री की क्षमता को लेकर अपनी राय दी है, और उस क्षमता पर अगर कांगे्रस का प्रधानमंत्री अपनी राय भी न दे, तो क्या करे? उनकी पे्रस कांफे्रंस के पहले से जो लोग एक खुर्दबीन लेकर बैठे थे, और उनकी कही एक-एक बात को उनके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए चौकन्ना थे, उनको उस लंबी-चौड़ी पे्रस कांफे्रंस में वही एक लाइन हमले के लायक मिली, क्योंकि मनमोहन सिंह बहुत ही शरीफ जुबान बोलते हैं। 
दरअसल सार्वजनिक जीवन में बहुत से ऐसे मौके होते हैं, जिनमें जीत की कोई गुंजाइश ही नहीं होती। सिर्फ हार जहां तय होती है, वैसी ही एक नौबत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने आज है। इसलिए उनका खुद का यह कहना सही था कि जब इतिहास उनके बारे में लिखेगा तो शायद वह आज के मीडिया के मुकाबले कुछ अधिक रहमदिल होगा। लेकिन लोकतंत्र जहां लोगों को सत्ता पर आने, उसका बेजा इस्तेमाल करने, और फिर भी किसी सजा से बच जाने का लगभग अंतहीन मौका देता है, वहीं पर लोकतंत्र आज के माहौल में एक बेरहम जवाबदेही भी खड़ी कर चुका है। न सिर्फ मनमोहन सिंह के लिए, कांगे्रस या यूपीए के लिए, बल्कि आज सत्ता से जुड़े हर किसी के लिए अपने कामकाज के लिए अधिक जवाबदेही का माहौल है। न सिर्फ परंपरागत और संगठित मीडिया, बल्कि आज इंटरनेट की मेहरबानी से हर की-बोर्ड, हर मोबाइल फोन को एक ऐसी आवाज का दर्जा मिल चुका है, जो दुनिया भर में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकती है। और इसके साथ ही ऐसी आवाज लगातार गूंज भी सकती है, गूंजती ही है। 
मनमोहन सिंह के लिए हमारे पास कोई हमदर्दी इसलिए नहीं है क्योंकि उनके राज में उनके भ्रष्ट सहयोगियों से परे बाकी देश को दर्द ही दर्द मिला है। और दर्द देने वाले के साथ हमदर्दी की कोई वजह हो भी नहीं सकती। लेकिन उनकी पे्रस कांफे्रंस में उन्होंने एक से अधिक बार, शायद कई बार अपने कामकाज के मूल्यांकन के बारे में कहा कि इतिहास उसका मूल्यांकन करेगा। यह एक किस्म की सज्जनता और विनम्रता भी है, और दूसरे किस्म का बचाव भी है। इतिहास तो दस बरस के हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री के बारे में लिखेगा ही, यह तो तय है ही, लेकिन बहुत से सवालों के जवाब में महज इतिहास पर सब छोड़ देना कुछ उसी किस्म का लगता है, जिस तरह कानूनी कटघरे में घिरे नेता जनता की अदालत में जाने की बात करते हैं। अपने ताजा-ताजा आज, और अभी-अभी बीते कल के दस बरसों के बारे में तो मनमोहन सिंह इतिहास की आड़ नहीं लेनी थी, और कुछ अधिक साफ, कुछ अधिक ठोस जवाब देने थे।
कुल मिलाकर आज इस मुद्दे पर लिखने का हमारा मकसद यह है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों को याद दिलाएं, कि कुछ बरस पहले के मुकाबले अब उनकी जवाबदेही बढ़ चुकी है, क्योंकि अब मीडिया का विस्तार आम जनता तक हो चुका है, और उसके पास अपने हमलावर तेवरों के लिए मुफ्त का इंटरनेट-मीडिया आ गया है। मनमोहन सिंह की पे्रस कांफे्रंस काफी नर्मदिल रही, मीडिया के जो लोग वहां मौजूद थे, उन्होंने सबसे तीखे सवालों को छोड़ ही दिया, लेकिन वहां नामौजूद लोगों ने पे्रस कांफे्रंस के चलते-चलते ही ऐसे सारे सवालों को सार्वजनिक इंटरनेट पर उछाल दिया, और जनता के एक हिस्से के बीच वे सवाल पे्रस कांफे्रंस से परे भी उठ ही गए। सार्वजनिक जीवन के लोगों को ऐसी नौबत के लिए तैयार रहना चाहिए।

जब सादगी के झोंके से सामंती छतें उड़ जाएंगी

04 जनवरी 2014
संपादकीय
जब कोई खबरों में आ जाते हैं, तो उनकी छोटी-छोटी बात भी मीडिया और जनचर्चा का खासा बड़ा हिस्सा खाने लगती हैं। दिल्ली के नौजवान और नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मकान का मामला कुछ ऐसा ही है। दो दिनों से न सिर्फ अटकलें चल रही हैं, बल्कि बंगलों की तस्वीरें भी दिखाई जा रही हैं कि अरविंद केजरीवाल किस सरकारी बंगले को मुख्यमंत्री निवास बनाने जा रहे हैं, और किस दूसरे बंगले को वे अपना दफ्तर बनाने जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने यह कहना भी शुरू कर दिया था कि इतने बड़े बंगले को केन्द्रीय मंत्रियों और सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी नहीं मिलते। और यह चर्चा केजरीवाल की पार्टी आप के घोषणा पत्र के खिलाफ दिख रही थी, इसलिए इस चर्चा को लेकर इस नई पार्टी की आलोचना भी शुरू हो गई थी। लेकिन आज सुबह केजरीवाल ने यह साफ कर दिया है कि वे किसी बंगले में रहने नहीं जा रहे हैं। 
आज हम जिस पर लिखना चाहते हैं, वह एक व्यक्ति केजरीवाल नहीं है, बल्कि एक परंपरा है जिसमें लोकतंत्र को सामंतवाद की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। पूरे देश में केन्द्र सरकार या प्रदेश सरकारों के ओहदों पर बैठे हुए लोग अपने इस्तेमाल के लिए जनता की जितनी दौलत का झोंक देते हैं, वह एक ऐसी परंपरा बन चुकी है कि एक पार्टी के बाद आने वाली दूसरी पार्टी की सरकार भी उसी नक्शेकदम पर चलने लगती है। उत्तरप्रदेश में दलितों की मसीहा मायावती अपने बंगलों पर सैकड़ों करोड़ खर्च करने के आरोपों से घिरी हुई हैं, और उनके पहले और उनके बाद के मुख्यमंत्री, समाजवादी पार्टी के पिता-पुत्र, अपने गांव में एक पूरा हवाई अड्डा बनवाकर जनता के पैसों से आए दिन उड़ान भर रहे हैं।
 एक-एक मंत्री-अफसर को देखें तो उनके बंगलों पर सालाना खर्च ही करोड़ों का होता है, उन बंगलों के दाम भी दसियों करोड़ होते हैं, इससे परे गाडिय़ों के काफिले, रोजाना के दसियों हजार के खर्च भी किसी न किसी सरकारी मद से किए जाते हैं। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र के लिए तो नुकसानदेह और खतरनाक है ही, एक गरीब देश में यह सिलसिला हिंसा का भी है। हिंसा सिर्फ आतंकी बंदूकों और धमाकों से नहीं होती, जो जाहिर तौर पर गैरजानलेवा चीजें दिखती हैं, उनसे भी हिंसा होती है। जो महाराष्ट्र कुपोषण का शिकार है, वहां पर जब एक मंत्री सार्वजनिक रूप से दूध से नहाता है, तो वह भी कुपोषण से मरते हुए बच्चों के साथ हिंसा है। जब लोग पानी के टैंकरों के पास रात-रात गुजार देते हैं, तब मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर कई टैंकर पानी घास को सींचने में लगा दिया जाता है, कुत्तों को नहलाने में खर्च होता है, तो यह हिंसा से कम कुछ नहीं है। 
हम उम्मीद करते हैं कि अरविंद केजरीवाल अपनी बात पर टिके रहेंगे, और किसी बड़े बंगले में जाकर नहीं रहेंगे। उनके साथ-साथ उनके बाकी मंत्रियों को भी छोटे मकान लेकर, या निजी घरों में रहकर काम करना चाहिए, ताकि सामंतवाद से थके हुए, और उससे नफरत करते हुए देश के भीतर उम्मीद का एक झोंका आए। ऐसा करने वाले बहुत से दूसरे लोग भी रहे हैं। पुरानी मिसालें देखें, तो त्रिपुरा में वामपंथी मुख्यमंत्री एक कमरे की जिंदगी गुजारते थे, और कई लोगों के लिखे संस्मरण बताते हैं कि एक वक्त ऐसा था कि नृपेण चक्रवर्ती और उस वक्त के उनके सादगी के हिमायती मुख्य सचिव शंकरन एक-एक कमरों में रहते थे, और कुर्सी छोडऩे पर मुख्यमंत्री एक छोटी सी पेटी उठाकर रिक्शे में ही रवाना हुए थे। वामपंथी मिजाज के चलते पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बैनर्जी ने भी छोटी कार में चलना तय किया, लालबत्तियों पर उनके लिए रास्ता खाली नहीं कराया जाता था, और शायद वे छोटे से निजी मकान में, घनी और आम बस्ती के भीतर रहती हैं। 
दरअसल गांधी के इस देश में सत्ता आने के बाद लोगों के भीतर सेवाभाव जागने के बजाय जो सामंती अहंकार आ जाता है, उस सिलसिले को कहीं न कहीं तोडऩा जरूरी था। वामपंथियों ने तो एक लंबी परंपरा के तहत ऐसा हमेशा ही किया है, और दिल्ली में उनके सांसदों को मिलने वाले बंगलों में भी उनकी पार्टी के अखबारों, संगठनों, और कार्यकर्ताओं को जगह मिलती है, वामपंथी सांसदों की तनख्वाह भी पार्टी में जमा होती है और उनको उसका एक छोटा हिस्सा ही घर चलाने के लिए मिलता है। अरविंद केजरीवाल की जीत का वामपंथियों ने स्वागत किया है, खुलकर स्वागत किया है। और हमारा यह मानना है कि सादगी के जिस सिद्धांत को केजरीवाल ने सामने रखा है, ईमानदारी के जिस बर्ताव को सामने रखा है, उसकी वजह से भी वामपंथी प्रभावित हुए हैं। 
आज देश में बाकी तमाम जगहों पर सत्ता का उपभोग करने वाले लोगों को भी अपने तौर-तरीके बिना देर किए बदलना चाहिए, ऐसा न होने पर आने वाले वक्त में पार्टियों और नेताओं को कब जनता की हिकारत से कितना बड़ा नुकसान होगा, यह उनको पता भी तब चलेगा जब सादगी के झोंके से सामंती छतें उड़ जाएंगी। 

प्रधानमंत्री से जनता को सवाल पूछने के सीधे मौके की जरूरत

03 जनवरी 2014
संपादकीय

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आज सुबह की सवा घंटे से अधिक की प्रेस कांफ्रेंस बहुत कुछ नहीं निकाल पाई। इसमें उनकी कमजोरी कम है, वहां मीडिया के जिन दर्जनों लोगों को सवाल पूछने के मौके मिले, अगर उनको मर्जी के सवाल पूछने की इजाजत थी, और सवाल पहले से दाखिल नहीं करने पड़े थे, तो हम यही कहेंगे कि हिन्दुस्तानी मीडिया ने मनमोहन सिंह के साथ बड़ा रहम किया, और जलते हुए, तेजाबी मुद्दों पर उनसे तीखे सवाल नहीं किए। लेकिन जैसा कि किसी भी बड़े ओहदे पर बैठे हुए लोगों की प्रेस कांफ्रेंस में होता है, मनमोहन सिंह से भी सवाल पूछने के लिए दर्जनों लोगों की भीड़ बची हुई थी, और उनके सवाल भी देश की जनता के सामने नहीं आ पाए। इस प्रेस कांफ्रेंस के पहले से हम इसके बारे में सोच रहे थे, और इसके खत्म हो जाने के बाद भी सोच रहे हैं, तो लग रहा है कि भारत जैसे विशाल देश के प्रधानमंत्री से सवाल पूछने और जवाब पाने का सिलसिला इस एक प्रेस कांफ्रेंस के साथ थम नहीं जाना चाहिए। और आज जब इंटरनेट पर सवाल-जवाब की मुफ्त सहूलियत चुनिंदा अखबारनवीसों से परे भी लोगों को है, तो इस मौके का इस्तेमाल खुद प्रधानमंत्री को भी करना चाहिए। लोकतंत्र में लोगों के मन में सवाल बेजवाब पड़े रहें, यह ठीक नहीं है। 
हमको पौन सदी और उसके भी पहले की महात्मा गांधी की याद आती है जो कि अपने अखबारों में देश भर के लोगों से आए हुए पोस्टकार्डों पर मिले सवालों के जवाब लिखते थे। उनमें आजादी की लड़ाई से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक पर गांधी क्या सोचते थे, यह सामने आता था। आज की प्रेस कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बहुत से सवालों के जवाब में यह कहा कि उनके कामकाज पर इतिहासकार अपनी राय लिखेंगे। इतिहास तो बहुत सी चीजों को दर्ज करते ही आया है, और अब तो टेक्नॉलॉजी की मदद से इतिहास अधिक दूर तक, अधिक बारीकी से, अधिक सुबूतों के साथ चीजों को दर्ज करता है। लेकिन दुनिया में डायरी लिखने का भी एक सिलसिला चलता आया है। कल तक की कागजी डायरी ने आज ब्लॉग की शक्ल ले ली है, और अमिताभ बच्चन से लेकर लालकृष्ण अडवानी तक हर तरह के लोग अपने ब्लॉग लिखते हैं। हमको भरोसा है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद मनमोहन सिंह भी अपने संस्मरण लिखेंगे, और शायद अपनी आत्मकथा भी। लेकिन आज जरूरत यह है कि मीडिया के सतही सैलाब की सुनामी में बह जाते लोगों को इतिहास में दर्ज होने वाले लोगों से बिना मीडिया सीधे भी कुछ जवाब मिल सकें। 
आज भारत का प्रधानमंत्री कार्यालय ट्विटर जैसे सक्रिय सामाजिक मीडिया का इस्तेमाल कर ही रहा है। और वहां पर प्रधानमंत्री की तरफ से कई घोषणाएं और फैसले पोस्ट भी किए जाते हैं। उनके औपचारिक भाषण प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर भी आते हैं। लेकिन एक ऐसा सिलसिला शुरू करने की उनको जरूरत लगती है जिसके तहत लोग प्रधानमंत्री को अपने सवाल भेज सकें, और फिर वे उनमें से जिनके जवाब देना चाहें, उनको जवाब सहित वेबसाइट पर डाल सकें। इससे वह नौबत भी सुधरेगी जिसके तहत यह कहा जाता है कि भारत का मीडिया किसी एक नेता या पार्टी का हिमायती है, या किसी दूसरे नेता और पार्टी का बड़ा बुरा आलोचक है। आज जब जनता और नेता दोनों को बिना एक बिचौलिए मीडिया के, खुद एक-दूसरे से मुखातिब होने का मौका हासिल है, तो इसका इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए, जनता के राजनीतिक शिक्षण के लिए, जनमत को जानने के लिए होना चाहिए। 
यह जरूर है कि ऐसा कोई सिलसिला आरोपों से घिरी हुई सरकार के लिए, उसके नेता के लिए कुछ मुश्किल हो सकता है, लेकिन ऐसे ही सिलसिले से उस नेता को, या उसकी सरकार या पार्टी को जनता के बीच अपनी बात को बेहतर तरीके से रखने का मौका भी मिल सकता है। हमारा मानना है कि भारत की राजनीतिक दलों को, देश-प्रदेश की सरकारों को, चुनिंदा मीडिया के सवालों के जवाब के साथ-साथ, जनता से सीधे आने वाले सवालों के जवाब देने की एक परंपरा शुरू करनी चाहिए। हर पार्टी और हर सरकार अपनी वेबसाइटों पर ऐसे सवालों के लिए सहूलियत दे सकती हैं, और फिर उनमें से जवाब के लिए छांटे गए सवाल के साथ अपनी बात इंटरनेट पर डाल भी सकती है। यह लोकतंत्र सूचना के अधिकार का एक किस्म का अलिखित और अघोषित विस्तार भी होगा, और यह कानून के तहत न्यूनतम जिम्मेदारी से ऊपर उठकर सूचना देने की जिम्मेदारी की तरफ एक कदम भी होगा। 
भारतीय लोकतंत्र में आज मीडिया और सामाजिक जनजीवन, सामाजिक मीडिया, और जनचर्चाओं में बहुत से मुद्दों पर असंतुलित या अनुपातहीन चर्चा होती है। लोग मजे के लिए, कटाक्ष या व्यंग्य करने के लिए, कोसने या गाली देने के लिए, बदनाम करने या किसी की स्तुति करने के लिए नारों की तरह के ट्वीट गढ़कर उनको बात की बात में फैला देते हैं। और यह सिलसिला कभी भी कम होने वाला नहीं है। इसलिए सरकार, पार्टी, या किसी संगठन या नेता की तरफ से उनकी औपचारिक बात कहने के लिए, जनता के सामने उनका सच रखने के लिए, जिम्मेदारी से सवाल-जवाब होने चाहिए। आज की प्रधानमंत्री की पत्रवार्ता को लेकर लिखने को बहुत कुछ नहीं है, सिवाय इसके की जनता के मन में जो दर्जनों सवाल भरे हुए हैं, वे इसमें पूछे भी नहीं गए, और लोकतंत्र में किसी मध्यस्थ मीडिया के बिना भी जनता को सीधे यह मौका मिलना चाहिए।