बलात्कार की समस्या रातोंरात नहीं घट सकती, बहुत काम करना होगा

संपादकीय
18 दिसंबर 2019

बलात्कार, और उसके बाद हत्या की खबरों से बुरी तरह गिरे हुए उत्तरप्रदेश की एक खबर है कि वहां अपनी नाबालिग बेटी से बलात्कार करने वाले पिता को एक फास्ट ट्रैक कोर्ट से पांच दिनों में उम्रकैद सुना दी गई। पुलिस ने इसे जांच और मुकदमे की कामयाबी माना है। दूसरी तरफ दिल्ली राज्य की महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल छह महीने में अदालत से बलात्कार-मामलों में फांसी की मांग करते हुए आमरण अनशन पर बैठीं, और तेरह दिन बाद उनकी खराब सेहत को देखते हुए उन्हें जबर्दस्ती अस्पताल में भर्ती किया गया। इन खबरों के बीच अभी सुप्रीम कोर्ट से यह खबर आ रही है कि सात बरस पहले के दिल्ली के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार कांड में मौत की सजा पाए एक आरोपी की सजा घटाने की अपील सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। 

अभी देश भर में बलात्कार की घटनाएं इतनी हो रही हैं, और उसके बाद शिकायत करने पर लड़की या महिला को जलाकर मार दिया जा रहा है, या गोलियां मार दी जा रही हैं, या शिकायत के पहले ही हत्या कर दी जा रही है, और पूरे देश में अलग-अलग पार्टियों के लोग उन्हें अधिक कड़ी सजा देने की मांग कर रही हैं। आमतौर पर समझदारी संतुलित बात करने वाले जया बच्चन ने भी संसद में कहा कि बलात्कारियों को भीड़ के हवाले कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश पर देश के उन तमाम जिलों में ऐसी विशेष अदालतें भी बनाई जा रही हैं जहां पर बच्चों के साथ बलात्कार या यौन शोषण के सौ से अधिक मामले दर्ज हैं। आज देश में माहौल बलात्कारी को बहुत तेजी से सजा दिलवाने, कड़ी से कड़ी सजा दिलवाने, फांसी दिलवाने या उसे बधिया बनाने का है। ऐसे माहौल के बीच जांच करने वाली पुलिस भी बहुत अधिक दबाव में है, और अपने जिम्मे के बाकी तमाम किस्म के मामलों को किनारे धरकर सिर्फ बलात्कार से संबंधित मामलों पर पूरी ताकत लगाने का काम भी किया जा रहा है। राजनीति के लोग कुछ समय पहले तक बलात्कार को लेकर जितने बेहूदे बयान देते थे, उस पर काबू हुआ है, और उत्तरप्रदेश के सबसे चर्चित बलात्कारी, भाजपा के विधायक कुलदीप सेंगर को बलात्कार के जुर्म में कुसूरवार ठहराया जा चुका है, और दो दिनों बाद उसे सजा सुनाई जाएगी। 

लेकिन यह बात समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान की पुलिस और यहां की न्यायपालिका के मौजूदा हाल के चलते अगर बलात्कार के मामलों में अंधाधुंध रफ्तार से काम करने का सिलसिला शुरू होगा, तो हो सकता है कि बहुत से बेकसूर भी उसमें सजा पा जाएं, और फिर उनकी अपीलों पर बड़ी अदालतों का बड़ा वक्त खर्च हो। भारत में पुलिस की जांच क्षमता और पुलिस के मौजूदा भ्रष्टाचार को अनदेखा करके सिर्फ कानून बनाकर कोई समय सीमा तय कर देना ठीक नहीं होगा। इसी तरह अदालती सुनवाई में भी ऐसा करना खतरनाक साबित हो सकता है। ये दोनों ही काम होने तो चाहिए, लेकिन इनके लिए एक ढांचा विकसित करना होगा जिससे कि जांच पुख्ता हो सके, मुकदमे की कार्रवाई बिना मक्कारी के तेज चल सके, और इंसाफ हो सके। वैसे भी आज बलात्कार के बाद हत्याओं का सिलसिला जितना बढ़ गया है, उसके पीछे भी बलात्कारियों की ऐसी सोच हो सकती है कि जब कड़ी सजा होनी ही है, तो फिर गवाह और सुबूत क्यों छोड़े जाएं। जब कोई चर्चित मामला खबरों में आता है, तो विचलित और मुखर भीड़ के नारे न तर्कसंगत हो सकते, न न्यायसंगत हो सकते, इसलिए संसद और विधानसभाओं को, पुलिस और अदालतों को इनके दबाव को बर्दाश्त करते हुए बेहतर रास्ते ही ढूंढने चाहिए जो कि टिकाऊ भी हों। देश के कानून और यहां की न्याय व्यवस्था में ऐसा नहीं हो सकता कि बलात्कार, या बच्चों से बलात्कार, या सामूहिक बलात्कार के मामलों को निचली अदालतों के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट सुनने लगे, और आनन-फानन फैसला होकर फांसी हो जाए। लोकतंत्र लचीला, खर्चीला, और धीमा सिलसिला रहता है, और इसकी रफ्तार को एकदम से बढ़ाकर इसे पटरी से उतारने का खतरा ही लिया जा सकता है। पुलिस और अदालत के ढांचे को सुधारने के साथ-साथ देश में यह माहौल बनाने की जरूरत है कि जो राजनीतिक दल बलात्कारियों का स्वागत करते हैं, उन पर किसी किस्म की कानूनी रोक लग सके। पार्टियों पर भी लग सके, और बलात्कार जैसे आरोपों में गिरफ्तार लोगों पर भी लग सके। इसी सिलसिले में इस कानून को बनाने पर भी विचार करना चाहिए कि बलात्कारी की संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा उसकी गिरफ्तारी के साथ ही जब्त किया जाए, और उसके मामले के आखिरी फैसले के साथ उसे बलात्कार की शिकार महिला को दिया जाए, या राजसात करके निर्भया फंड जैसे किसी काम में लाया जाए। बलात्कारी को कैद या फांसी काफी मानना ठीक नहीं है, और अगर उसकी संपन्नता है, तो उसे भी जुर्माने के तौर पर तुरंत जब्त किया जाना चाहिए। देश की यह विकराल हो चुकी समस्या रातोंरात नहीं घट सकती, और इसके लिए ठंडे दिमाग से कई पहलुओं पर काम करना जरूरी है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर

भूपेश सरकार का पहला साल, तेजरफ्तार फैसलों का सैलाब

संपादकीय
17 दिसंबर 2019

छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार के एक बरस पूरे होने पर एक सीमित जगह में इस कार्यकाल पर लिखना थोड़ा मुश्किल इसलिए है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकारी काम में ओवरटाईम करते दिखते हैं, और पन्द्रह बरस के विपक्षी तेवरों को उन्होंने ज्यों का त्यों बरकरार रखा है, और अब हमले करने को राज्य सरकार नहीं है, तो उन्होंने मोदी सरकार, भाजपा, और आरएसएस पर सबसे तीखे हमले करने वाले कांगे्रसी मुख्यमंत्री का खिताब बड़ी मेहनत से कमा लिया है। लेकिन यह सालगिरह पूरी कांगे्रस सरकार की है, और मुख्यमंत्री से परे भी राज्य स्तर पर समूचे कामकाज का एक मूल्यांकन किया ही जाना चाहिए। 

भूपेश सरकार ने चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक धान की खरीदी का एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड-दाम बनाकर, और किसानीकर्जमाफी करके प्रदेश में एक ऐसा माहौल खड़ा किया है जिसके चलते मुख्यमंत्री अभी दो दिन पहले यह दावा करते दिखे कि इस एक बरस में प्रदेश में एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है। इसके साथ-साथ एक बात जो उन्होंने बार-बार दुहराई है कि छत्तीसगढ़ में कर्जमाफी, फसल के बढ़े हुए दाम, धान बोनस, और वनोपज के अधिक दामों से अर्थव्यवस्था पटरी पर है, और बाजार में मंदी का असर इस प्रदेश में नहीं हुआ है। यह सरकार की एक बड़ी लागत से हुआ है। किसानकर्जमाफी से लेकर फसल के बढ़े दाम तक सरकार पर जो बोझ पड़ा है उसका आगे चलकर क्या असर होगा यह तो वक्त बताएगा, लेकिन यह बात भी जगजाहिर रही है कि राज्य में रमन सरकार भी विधानसभा के पहले यही करनी चाहती थी, लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इसकी साफ मनाही कर दी थी। भूपेश बघेल प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष की हैसियत से पिछले बरसों में पार्टी संगठन को जिस मजबूती से चला रहे थे, और उन्होंने विधानसभा चुनाव का पूरा अभियान जितने योजनाबद्ध और संगठित तरीके से चलाया था, उससे वे देश में किसी भी राज्य के चुनाव में हाल के बरसों का कांगे्रस का सबसे कामयाब नतीजा ला सके थे। उसका असर यह हुआ कि वे छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री बनने के बाद से राजनीतिक, सामाजिक, सरकार, और संगठन के मोर्चो पर एक बेधड़क नेता की तरह काम कर रहे हैं, और शपथ के पहले उनके सामने जो बड़ी चुनौतियां थीं वे धीरे-धीरे खत्म हो गई दिखती हैं। 

यह एक बरस छत्तीसगढ़ में खालिस छत्तिसगढ़ी जुबान, संस्कृति, और रीति-रिवाज का साल रहा, और भूपेश बघेल ने व्यक्तिगत रूप से  छत्तिसगढ़ी जनजीवन के इन पहलुओं को इतना मजबूत किया, जितना कि पहले कभी नहीं किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि जब पूरा देश एक बहुत ही आक्रामक हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद में झुलस रहा है, जिसका निशाना देश के दूसरे तबके हैं, तब छत्तीसगढ़ का यह सांस्कृतिक-क्षेत्रवाद किसी दूसरे प्रदेश के खिलाफ नहीं है, अपने पूरे इलाके को लेकर है, और इसने प्रदेश को हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का नाम लिए बिना उसके मुकाबले आत्मगौरव का एक बड़ा मुद्दा दिया है। यह मुद्दा लोकसभा चुनाव में मोदी की सुनामी के सामने खड़ा नहीं हो पाया, लेकिन वह वक्त तकरीबन पूरे देश के एक सैलाब में बह जाने का था।

भूपेश बघेल सरकार का यह कार्यकाल बस्तर के नक्सल मोर्चे पर आदिवासियों के साथ हिंसा, हत्या-बलात्कार में कमी के लिए भी गिना जाएगा, और आदिवासियों के मुद्दों पर कुछ नई कोशिशों के शुरू होने के लिए भी। लंबे समय से उलझे हुए जटिल आदिवासी मुद्दे इस एक बरस में सुलझ को नहीं पाए हैं, लेकिन उसकी कार्रवाई शुरू हुई है। आदिवासी इलाकों को अब कम पुलिस-हिंसा झेलनी पड़ रही है, और वनोपज का बेहतर दाम मिल रहा है, कारखानों के लिए ली गई लेकिन इस्तेमाल नहीं हुई जमीन को वापिस पाने की एक उम्मीद भी आदिवासियों में बंधी है। छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों को मिले बढ़े हुए ओबीसी आरक्षण पर अदालत से चाहे रोक लगी हो, लेकिन वह एक बड़ा राजनीतिक फैसला तो है ही, जो कि आगे की अदालतों में लड़ा जाएगा। लोगों का मानना है कि भूपेश बघेल भाजपा के खिलाफ एक बहुत आक्रामक लड़ाई लडऩे के साथ-साथ किसान, खेतिहर मजदूर, और वनोपज-आश्रित आदिवासियों की जिंदगी को ऊपर लाने का एक न्यूनतम-चुनावी काम कर चुके हैं, और अब वे बाकी के फैसलों में मर्जी की छूट का राजनीतिक-हक रखते हैं। 

यह एक साल पिछले सरकार के कुछ नेताओं और कुछ अफसरों पर मामले-मुकदमे का साल भी रहा, और विपक्ष में रहते हुए जो नेता सत्ता पर गंभीर आरोप लगाते हैं, उन्हें सत्ता में आने पर उन आरोपों की जांच करवानी भी चाहिए। यह बात हम देश-प्रदेश के सभी नेताओं और सरकारों को लेकर बोलते आए हैं। भूपेश बघेल ने खुद भी अपने परिवार सहित बहुत सी जांच झेली हैं, और अब वे विपक्ष में रहते अपने लगाए आरोपों की जांच करवा भी रहे हैं। इस एक बरस में मुख्यमंत्री के स्तर पर लिए गए तबादलों के कई फैसले तेजी से बदले गए, और धीरे-धीरे यह सिलसिला काबू में आया है। आने वाले चार बरस प्रदेश में कांगे्रस सरकार को अपने घोषणापत्र के बाकी मुद्दों को लागू करने के लिए मिलने वाले हैं। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार का पहला साल विधानसभा चुनाव के बाद के लोकसभा चुनाव, और म्युनिसिपल-पंचायत चुनाव से भरा हुआ रहा है, इसलिए सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार का ध्यान भी बंटा हुआ रहा है, लेकिन भूपेश सरकार ने पहले साल में घोषणापत्र के प्रमुख और बुनियादी मुद्दों को तेजी से लागू किया है। पन्द्रह बरस के विपक्ष के बाद कांगे्रस सरकार में है, पिछले सरकार के तीन बरस के कार्यकाल में सरकार का ढांचा बहुत जम चुका था, जमा हुआ था, उसमें बड़ा फेरबदल स्वाभाविक ही था, और पहले साल में वह भी सब देखा है। आगे देखना है कि यह सरकार किस ओर, किस रफ्तार से, कितना आगे बढ़ सकती है, बढ़ती है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

झारखंड का यह चुनाव तो आकर चला जाएगा, लेकिन यह बात...

संपादकीय
16 दिसंबर 2019

नागिरकता संशोधन विधेयक के खिलाफ देश में कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन चल रहे हैं, और बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां मुख्यमंत्रियों ने यह खुली घोषणा की है कि उनके राज्य में इसे लागू नहीं किया जाएगा। वैसे यह एक अलग बहस का मुद्दा है कि संसद से बना यह कानून लागू करना या न करना क्या राज्य के हाथ में है? लेकिन वह बहस आज यहां पर फिक्र का मुद्दा नहीं है, फिक्र का मुद्दा एक दूसरी बात है कि देश भर में नागरिकता पर मंडराते खतरे को लेकर लोगों के बीच जो दहशत है, देश भर में जो अनिश्चितता है, और दसियों करोड़ लोगों की ऐसी अनिश्चिचता के खिलाफ देश के एक दूसरे बहुसंख्यक तबके में जिस तरह का उन्माद भरा उल्लास है, उन दोनों को एक साथ देखें, तो यह एक बड़ी फिक्र की बात है। कुछ जगहों पर ट्रेन और बसों के जलने को न भी गिनें, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया के छात्रों के आक्रोश को न भी गिनें, तो भी देश में एक बहुत बड़े आकार के अल्पसंख्यक तबके में दहशत को न गिन पाना तो मुमकिन नहीं है। और उत्तर-पूर्व के राज्यों में यह खासकर दिख रहा है कि जनता किस दहशत में है। दूसरी तरफ एनडीए के भीतर कल तक के, और आज के भाजपा के जो सहयोगी दल नागरिकता संशोधन को अपने दिए हुए समर्थन के बाद अब फिर से सोच रहे हैं, अपना इरादा बदल रहे हैं, उनकी सोच को भी देखने की जरूरत है। लेकिन आज यहां लिखने की वजह इन सबसे कुछ अलग है। झारखंड में विधानसभा चुनावों की एक सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंच और माईक पर से नागरिकता संशोधन के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों के बारे में कहा कि ये जो आग लगा रहे हैं, ये कौन हैं, उनके कपड़ों से ही पता लग जाता है। 

यह बात सही है कि प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री रहते हुए भी एनडीए के अगुवा हैं, और भाजपा के सबसे बड़े नेता भी हैं। किसी राज्य में जहां पार्टी की सरकार चल रही है, और चुनावों में उसके जाने का खतरा दिख रहा है, वहां पर चुनाव प्रचार के दौरान कई किस्म की उत्तेजक, भड़काऊ, या आधी और पूरी झूठ बातें कही जाती हैं। ऐसा करने वाले नरेन्द्र मोदी न पहले नेता होंगे, और न आखिरी। लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री आज देश में जलते-सुलगते कई प्रदेशों के नक्शे के बीच खड़े होकर, और दसियों करोड़ लोगों की दहशत से बात करते हुए यह कहे कि जो आग लगा रहे हैं उनके कपड़ों से ही उनकी शिनाख्त हो जा रही है, तो यह बात जितना हक्का-बक्का करती है, उससे अधिक सदमा पहुंचाती है। क्या इस विशाल और महान लोकतंत्र के एक प्रधानमंत्री को अपने कार्यकाल के छठवें बरस में एक छोटे से राज्य के विधानसभा चुनाव को जीतने के लिए देश के एक दहशत में जी रहे तबके पर ऐसा हमला करना चाहिए था? चुनाव तो आते-जाते रहते हैं, और राज्यों में किसी पार्टी की सरकारें भी आती-जाती रहती हैं, सवाल यह है कि सवा करोड़ से अधिक आबादी के इस देश के प्रधानमंत्री को क्या अपनी ही आबादी के एक हिस्से के खिलाफ ऐसी बात उस वक्त कहनी चाहिए जब देश धार्मिक और साम्प्रदायिक आधार पर अभूतपूर्व नौबत तक बांट दिया जा चुका है? प्रधानमंत्री का यह बयान उनके एक-एक शब्द पर फिदा, और दीवानगी की हद तक उनके साथ खड़े हुए करोड़ों भक्तों पर कैसा असर डालेंगे इसकी कल्पना करना क्या मुश्किल है? यह देश आज जिस हद तक अलगाव का तनाव झेल रहा है, क्या उसे और बढ़ाने का खतरा महज एक चुनाव को जीतने के लिए कोई अच्छी बात है? 

लोकतंत्र में चुनावी जीत-हार तो होती रहती है, लेकिन एक देश के प्रधानमंत्री को अपने देश के ऐसे बुरे संकटकाल में एक जिम्मेदारी पूरी तरह से छोड़ नहीं देनी चाहिए। दो दिन पहले जब प्रधानमंत्री किसी सार्वजनिक जगह पर सीढ़ी पर उलझकर गिर पड़े थे, तो बहुत से लोगों ने उसे लेकर ओछे मजाक किए थे, और दूसरे समझदार लोगों ने यह नसीहत दी थी कि देश के प्रधानमंत्री के बारे मेें लिखते हुए एक गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। उन लोगों ने ठीक नसीहत दी थी, सीढ़ी पर उलझकर गिर जाना किसी के भी साथ हो सकता है, और कोई भी लोग कमजोरी या बीमारी में चक्कर खाकर गिर सकते हैं, ऐसी नौबत का मखौल उड़ाना एक घटिया और गंदी बात है, और चाहे ताजा इतिहास में बड़े-बड़े लोगों ने भी ऐसी बात क्यों न की हुई हो। लेकिन प्रधानमंत्री के ओहदे के साथ जिस गरिमा का ख्याल रखने की नसीहत अभी हवा में तैर ही रही है, उस गरिमा को एक चुनावी आमसभा में खत्म कर देना भी कोई अच्छी बात नहीं है। आज देश का एक प्रधानमंत्री किसी धर्म से जुड़े हुए लोगों के कपड़ों की तरफ इशारा करे, कल कोई दूसरा प्रधानमंत्री किसी दूसरे धर्म के लोगों की दूसरी बातों की तरफ इशारा करे, तो फिर प्रधानमंत्री के ओहदे को मखौल से परे मानने और रखने का कौन सा तर्क जायज रह जाएगा? झारखंड का चुनावी नतीजा चाहे जो हो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम के साथ दर्ज यह बात हिन्दुस्तान की आज की तारीख में बहुत ही तकलीफदेह और नुकसानदेह है, और लोकतंत्र सब कुछ दर्ज करते चलता ही है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 16 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 15 दिसंबर

साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं..

संपादकीय
15 दिसंबर 2019

कांग्रेस के भूतपूर्व, और भावी माने जाने वाले, अध्यक्ष राहुल गांधी ने कल अपनी पार्टी को बिना किसी वजह के एक ऐसी फजीहत में डाल दिया है जिससे देश में गठबंधन की राजनीति पटरी से उतरने का एक खतरा खड़ा हो सकता है। कल देश भर से कांग्रेस के लोग मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए दिल्ली में इक_ा थे। और सोनिया, मनमोहन, प्रियंका के साथ-साथ राहुल का भी भाषण हो रहा था। संसद के भीतर भाजपा की महिला सांसद जिस हमलावर तेवरों में राहुल से माफी की मांग कर रही हैं कि उन्होंने बलात्कार को लेकर जो कहा है वह नाजायज है। संसद के भीतर की उस बात का जवाब राहुल गांधी ने पार्टी के हाल के इस सबसे बड़े मंच पर दिया, और कहा कि वे माफी नहीं मांगेंगे। यह बात उनसे परे के देश के बहुत से पत्रकार भी लिख रहे थे कि मोदी की मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में जिस हमलावर दस्ते की अगुवाई की, उस दस्ते ने राहुल की न कही हुई बातों को राहुल का कहा हुआ बताते हुए उनसे माफी की मांग की थी। बहुत से लोगों ने राहुल के बयान के वीडियो और स्मृति का लोकसभा के भीतर का राहुल का कहा हुआ बताते हुए एक बयान गिनाते हुए, स्मृति का हमलावर बयान दोनों दिखाया जिनमें जमीन आसमान का फर्क था। कई और लोगों ने बलात्कार पर मोदी का एक पुराना बयान भी पोस्ट किया है जिसमें वे वीडियो-कैमरे पर दिल्ली को भारत की रेप कैपिटल कहते हुए दिख रहे हैं। राहुल गांधी की बात सही थी कि उन्हें माफी मांगने की जरूरत नहीं है। लेकिन इस बात को अधिक जोर से कहने के लिए उन्होंने कहा- मेरा नाम राहुल गांधी है, राहुल सावरकर नहीं, मैं माफी नहीं मांगूगा। 

इस बयान के मायने इसके शब्दों से अधिक साफ हैं। वे विनायक दामोदर सावरकर पर हमला कर रहे थे जिन्होंने शायद पौन दर्जन बार अंग्रेज सरकार से माफी मांगकर जेल से छूटने की कोशिश की थी, और अंग्रेजों से वफादारी की कस्में भी खाई थीं। ऐसे सावरकर को मोदी सरकार, या भाजपा भारतरत्न देने की घोषणा कर चुकी है, और देश में एक ऐसा हिन्दूवादी तबका है जो गोडसे के मंदिर बनाने के साथ-साथ सावरकर को भारतरत्न भी देना चाहता है। ऐसे में राहुल गांधी ने अगर सावरकर के बारे में खुलकर अपनी विचारधारा सामने रखी है, तो उसमें गलत कुछ नहीं है सिवाय इसके कि सावरकर को पूजनीय मानने वाली शिवसेना की पालकी ढोकर महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ-साथ कांग्रेस भी चल रही है। अब कहारों को पालकी पर विराजमान प्रतिमाओं के खिलाफ बोलने का कितना हक होना चाहिए, इसे लेकर सवाल उठ सकते हैं। और यही बात आज महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ गठबंधन को लेकर हो रही है कि राहुल गांधी शायद शुरू से ही इस गठबंधन के खिलाफ थे, और पूरे वक्त उन्होंने अपने को इससे अछूता रखा था। लेकिन पार्टी के भीतर वे एक नेता हैं, और गठबंधन का फैसला पार्टी के दूसरे नेताओं ने किया है जिनमें राहुल की मां सोनिया गांधी भी शामिल हैं। ऐसे में अगर परिवार के भीतर इस गठबंधन पर एक गंभीर वैचारिक असहमति है, तो भी सार्वजनिक जीवन में एक गठबंधन की मर्यादा का सम्मान करना सभी भागीदारों की जिम्मेदारी रहती है। आज अगर शिवसेना गांधी या नेहरू के खिलाफ कोई बात कहे, और वह बात चाहे ऐतिहासिक रूप से सच भी हो, तो भी क्या वह गठबंधन के चलते एक जरूरी बात कही जाएगी? 

राहुल गांधी के साथ आज दिक्कत यह है कि वे टीम के बाहर हो चुके खिलाड़ी की तरह स्टेडियम की दर्शकदीर्घा में तो बैठे हैं, लेकिन पार्टी के कल के इस सबसे बड़े कार्यक्रम में वे मंच पर पार्टी के नीति-निर्धारक और कर्णधार की तरह भी बोल रहे थे, और इसमें किसी को कोई शक भी नहीं है कि वे ही पार्टी के सर्वेसर्वा हो भी सकते हैं, होंगे ही। ऐसे में वे पार्टी के सब कुछ भी हैं, और पार्टी उनके लिए कुछ भी नहीं है। वे हाल के बरसों में पार्टी के इस सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक-गठबंधन के खिलाफ रहते हुए भी इस पर कुछ कहने से बच सकते थे, और खासकर तब तो इसकी कोई भी जरूरत नहीं थी जब कल के मोदी-विरोध में सावरकर मुद्दा ही नहीं था। ऐसे में सावरकर के नाम को इस अंदाज में बेजा इस्तेमाल करना जिससे कि गठबंधन का भागीदार बुरी तरह से आहत हो, एक पूरी तरह नाजायज और गैरजरूरी बयान था। कांग्रेस लीडरशिप की दिक्कत यह है कि वह आज अपने को राहुलसहित कहे,या राहुलरहित कहे?कहने को राहुल किसी ओहदे पर नहीं है, लेकिन वे मंच पर सब कुछ हैं। बिना जिम्मेदारियों के महज अधिकार ही अधिकार का यह सिलसिला भारत जैसी जटिल चुनावी राजनीति में, और खासकर मोदी-शाह के युग में, कांग्रेस का नुकसान छोड़ और कुछ नहीं कर रहा है। या तो राहुल गांधी पार्टी के भीतर अपनी असल जगह पर औपचारिक रूप से रहें, या फिर वे पार्टी लीडरशिप के आभामंडल से परे रहें, और बिना ओहदे वाले व्यक्ति की तरह शांत भी रहें। अगर शिवसेना से गठबंधन गलत है, और हमने इसी जगह इसे पहले ही दिन अटपटा और अप्राकृतिक भी लिखा था, तो राहुल कांग्रेस लीडरशिप के सामने अपनी बात रखे, न कि कांग्रेस लीडरशिप की तरह इस अंदाज में असहमति का हमला करें। कांग्रेस अपने आंतरिक अंतरविरोधों के दौर से गुजर रही है, और वह राहुल गांधी के मामले में कोई फैसला लेने की हालत में भी नहीं है। ऐसी नौबत में आज देश में तमाम जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने की दूसरी पार्टियों और सरकारों की कोशिशें मानो काफी न हों, राहुल ने कल से नंगे-भूखे, बीमार और कुपोषित लोगों के देश में सावरकर और शिवसेना के साथ असहमति का अकेला मुद्दा छेड़ दिया है। भाजपा भला और चाहती क्या है? राहुल गांधी को बाकी कांग्रेस पार्टी के साथ अपने संबंधों को लेकर एक पारदर्शी और औपचारिक व्यवस्था रखनी चाहिए, वरना लोग जिस तरह आरएसएस को बाहर से भाजपा सरकारों पर काबू रखने वाला संगठन कहते हैं, उसी तरह राहुल गांधी को बिना किसी पद के पार्टी का सब कुछ होने वाला कहेंगे। जब राहुल ने मनमोहन सरकार से असहमति रखते हुए उसके एक प्रस्तावित अध्यादेश को प्रेस क्लब जाकर मीडिया के सामने फाड़कर फेंक दिया था, तब की यादें ताजा हैं। लेकिन एक गठबंधन में रहते हुए भागीदार शिवसेना के पूजाघर से एक तस्वीर उठाकर उसे फाड़ देना न तो गंभीर काम रहा, न परिपक्व काम रहा, न ही उससे राहुल की बात को कोई वजन मिला। उनके भाषण लेखन अगर कोई हैं, तो उनको नौकरी से निकाला जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 14 दिसंबर

इतिहास पर झूठे दावे नफा नहीं देते, नुकसान करते हैं

संपादकीय
14 दिसंबर 2019

मध्यप्रदेश के भाजपा सांसद गणेश सिंह ने दुनिया के ज्ञान में एक नई बढ़ोत्तरी की है कि संस्कृत सीखने और बोलने से शरीर में कोलेस्ट्राल नहीं बढ़ता, और डायबिटीज कंट्रोल में रहता है। अपनी ज्ञान को रिकॉर्ड में लाने के लिए उन्होंने इसे संसद में एक बहस के दौरान कहा, और यह भी कहा कि संस्कृत बोलने से नर्वस सिस्टम बेहतर रहता है। अभी अधिक वक्त नहीं हुआ है जब गोमूत्र, योग और आयुर्वेद में पूरी दुनिया की तमाम दिक्कतों का इलाज बताने वाले बाबा रामदेव के प्रमुख और अकेले सहयोगी बालकृष्ण को इलाज के लिए एक एलोपैथिक बड़े अस्पताल में भर्ती किया गया था, और इसके विरोध में रामदेव की डेयरी की गायों ने एक दिन दूध नहीं दिया था कि उनके मूत्र को इलाज का मौका नहीं दिया गया। हिन्दुस्तान आज संस्कृति, संस्कृत, योग, गोमूत्र, और गोबर को लेकर इतने तरह के दावे कर चुका है कि बाकी दुनिया के वैज्ञानिकों को एक पूरी सदी इसको जांचने-परखने में लग जाएगी। आज हिन्दुस्तान बाकी दुनिया से अपने को बेहतर और इतिहास के वक्त से ही सबसे आगे साबित करने की जिस हड़बड़ी में है, उस हड़बड़ी की राह में ऐसे दावे एक रोड़ा ही बनकर खड़े हो रहे हैं जो बेसिर-पैर के हैं, और जरूरी नहीं हैं। 
जब दुनिया के बहुत से देश हिन्दुस्तान के इतिहास की बहुत सी बातों को मानते हैं, उनके महत्व का सम्मान करते हैं, तो यह भारतप्रेमी लोगों की जिम्मेदारी भी हो जाती है कि वे इस सम्मान को बरकरार रखें। दुनिया का इतिहास दर्ज होना, और पहले दर्ज इतिहास की जांच होना अब विज्ञान और तकनीक ने आसान कर दिया है। अब किसी देश के भीतर अपने अनपढ़ और कमसमझ लोगों को तो अपने नामौजूद इतिहास का हवाला देकर एक झूठे गौरवोन्माद में डाला जा सकता है, लेकिन दुनिया के इतिहास की आंखों में धूल झोंकना उतना आसान नहीं है। इसलिए जब हिन्दुस्तान में प्लास्टिक सर्जरी के इतिहास, और विमान के इतिहास के दावे किए जाते हैं, जब नए वैज्ञानिक दावे किए जाते हैं कि गाय ऑक्सीजन छोड़ती है, तो बाकी दुनिया की नजरों में हिन्दुस्तान की उस अहमियत की इज्जत भी घटती है जो कि इतिहास में सचमुच थी। आज लाख रूपए दान करने वाले कोई दानदाता करोड़ रूपए दान करने का झूठा दावा करें, तो लाख रूपए दान से मिलने वाली इज्जत भी मिट्टी में मिल जाती है, और दानदाता के बजाय वे झूठे दावेदार की शक्ल में दर्ज हो जाते हैं। इसी तरह दुनिया के विज्ञान, दुनिया की संस्कृति में आयुर्वेद से लेकर योग तक, और शास्त्रीय संगीत से लेकर लोककलाओं तक जो योगदान भारत का रहा है, उसे बचे रहने देना चाहिए। उसे लेकर बेसिर-पैर की, और बेहूदी बातें करना, उसे लेकर झूठे दावे करना दुनिया की नजरों में भारत को गिराने के अलावा और कुछ नहीं करता। बाकी दुनिया की वैज्ञानिक सोच पर तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हिन्दुस्तान के लोग, खासकर राजनेता, किस किस्म की अवैज्ञानिक बातें करते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के भीतर के लोगों की सोच को बुरी तरह से अवैज्ञानिक, अंधविश्वासी किया जा रहा है, और एक झूठे गौरवोन्माद से ढांक दिया जा रहा है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, उन्हें यह लग सकता है कि वे भारत का एक गौरवशाली इतिहास गढ़ रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वे भारत के इतिहास की असल गौरवशाली बातों को भी अपनी बकवास से खत्म कर रहे हैं, और भारत के इतिहास को अविश्वसनीय बनाने का काम कर रहे हैं। यह सिलसिला वोटों की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए एक-दो चुनाव में काम आ सकता है, लेकिन इससे दुनिया में हिन्दुस्तान की साख जितनी खराब हो रही है, हो चुकी है, वह आसानी से उबर नहीं सकेगी।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM