संपादकीय
17 मार्च 2020
सुप्रीम कोर्ट के पिछले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक किस्म का रिकॉर्ड कायम किया है। अपने कार्यकाल के आखिर में उन्होंने लगातार जिस अंदाज में ठकुरसुहाती के फैसले दिए उनसे देश वैसे भी हक्का-बक्का है। रही-सही कसर कल तब पूरी हो गई जब राज्यसभा के लिए राष्ट्रपति के मनोनीत किए जाने वाले लोगों में उनका नाम आया। भारतीय लोकतंत्र में कुछ कामों में राष्ट्रपति की बस सील लगती है, वह फैसला होता केंद्र सरकार का है। इसलिए मोदी सरकार ने उन्हें राज्यसभा में भेजने की घोषणा की, तो तुरंत लोगों को वे सारे फैसले एक बार फिर याद आए जो कि अपने आखिरी कुछ महीनों में रंजन गोगोई ने दिए थे। हर फैसला सरकार को खुश कर गया था, सरकार की सोच का था, और कानून की समझ रखने वाले लोग इस सिलसिले से हैरान भी थे। लोग रंजन गोगोई के कार्यकाल में भी उनसे इस बात के लिए हैरान थे कि उन पर जब एक मातहत छोटी कर्मचारी ने यौन शोषण का आरोप लगाया, तो देश के कानून को लात मारते हुए रंजन गोगोई ने उस शिकायत की सुनवाई की बेंच में खुद बैठना तय किया, और बैठे। यह अदालत का एक गजब का नजारा था जिसमें रंजन गोगोई कटघरे में भी, जज की कुर्सी पर भी थे, और बचाव पक्ष के वकील बनकर सवाल भी खड़े कर रहे थे। आज देश के बहुत से लोग अपनी उम्मीदों के खिलाफ जाकर भी रंजन गोगोई से उम्मीद कर रहे हैं कि वे राज्यसभा के इस मनोनयन से इंकार कर दें।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम रिटायर्ड लोगों को उनके कार्यक्षेत्र के किसी भी दफ्तर में बिठाने के खिलाफ लंबे समय से लिखते आए हैं। राज्यों में कई ऐसी संवैधानिक कुर्सियां और कई ऐसे आयोग बना दिए गए हैं जिन पर रिटायर्ड जजों, और रिटायर्ड अफसरों को बिठाया जा रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि अदालती फैसले सामने खड़े मामले के गुण-दोष को देखते हुए नहीं आ रहे, राज्य में खाली होने वाली बड़ी कुर्सी को देखते हुए आ रहे हैं। ऐसा ही हाल सरकारी ओहदों से रिटायर होने वाले अफसरों का है जो कि आखिरी के बरसों और महीनों में सत्ता की पसंद से सही-गलत हर किस्म के काम करते हैं, और बाद में अपनी छांटी हुई कुर्सी पर पहुंचकर मौत के करीब पहुंचने तक ऐश करते हैं। किसी राज्य में अदालत और सरकार हांकने वाले जजों और अफसरों को अगर ईमानदार बने रहने देना है, तो बाकी कई बातों के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि उस राज्य में उनका रिटायरमेंट के बाद का कोई मनोनयन न हो। अगर ये इतने ही काबिल हैं, तो कोई दूसरा राज्य उन्हें डोली में बिठाकर ले जाए, और उनकी ताजपोशी करे।
देश में रिटायर्ड जजों को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। कुछेक ऐसी कुर्सियां पहले से तय और घोषित हैं जिन पर सिर्फ रिटायर्ड जजों को ही बिठाया जा सकता है। लेकिन उनसे परे की कुर्सियां, चाहे वे राज्यसभा की हों, या देश के किसी प्रदेश में राज्यपाल की हो, या किसी और गैर-जज से भरी जा सकने वाली दूसरी कुर्सी हो, इन पर जजों को लाने का मतलब बाकी जजों को यह संदेश भेजना भी रहता है कि सरकार उनके रिटायर होने के बाद उन पर मेहरबानी भी कर सकती है।
अब दूसरी तरफ देखें तो कांगे्रस पार्टी ने अपने कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों को राज्यसभा भेजा था। जस्टिस बहरूल इस्लाम इंदिरा के कार्यकाल में राज्यसभा सदस्य बने थे, फिर वे इस्तीफा देकर गुवाहाटी हाईकोर्ट के जज बने, और फिर एक अभूतपूर्व फैसले के तहत उन्हें रिटायरमेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। उन्होंने बिहार सहकारी बैंक घोटाले केस में वहां के कांगे्रसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को बरी करने वाला फैसला दिया था, और फिर सुप्रीम कोर्ट से इस्तीफा देकर कांगे्रस टिकट पर राज्यसभा चले गए। यह पूरा सिलसिला लोगों को अब ठीक से याद नहीं है, लेकिन यह न्यायपालिका के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। एक दूसरा मामला कांगे्रस पार्टी के नाम लिखा हुआ है जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का। वे 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच करने वाले आयोग के अकेले सदस्य थे। उनकी जांच रिपोर्ट को हिंदुस्तानी थलसेना के जनरल जगजीत सिंह अरोरा ने दंगों के शिकारों के खिलाफ पूर्वाग्रह से भरी हुई कहा था। रिपोर्ट में कांगे्रस पार्टी को क्लीनचिट दी गई थी। बाद में उन्हें 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का पहला अध्यक्ष बनाया गया, और 1998 में कांगे्रस ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। इसलिए आज जब रंजन गोगोई को राष्ट्रपति की सील से राज्यसभा में मनोनीत किया जा रहा है, तो वह इन पिछली दो मिसालों की वजह से कांगे्रस से कुछ भी कहने का नैतिक हक छीन रहा है।
अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपने जजों को इस तरह प्रभावित करने की कोशिशों या ऐसे खतरों वाली संवैधानिक व्यवस्था पर खुद होकर जब कुछ नहीं सोच रहा, तो सरकार और संसद से तो किसी तरह की उम्मीद की भी नहीं जा सकती। आज रंजन गोगोई पर पहला पत्थर कौन चलाए? कम से कम कांगे्रस के तो हाथ बंधे हुए हैं, और कांगे्रस के ऐसे पुराने फैसलों में जो दूसरी पार्टियां चुप रही होंगी, उनका भी आज बोलने का हक नहीं रह गया है। जगन्नाथ मिश्र के पक्ष में फैसला देकर राज्यसभा जाना अच्छा, और मोदी सरकार की पसंद के फैसले देकर राज्यसभा में जाना बुरा कैसे हो सकता है? केंद्र और राज्यों को ऐसे बुनियादी सुधार की जरूरत है, लेकिन सरकारें अपनी बदनीयत छोड़ेंगी, यह उम्मीद फिजूल की होगी। ऐसे में इन राजनीतिक दलों से परे आम लोगों को भी ऐसा जनमत खड़ा करना होगा जिससे ऐसे जजों के लिए शर्मिंदगी खड़ी हो सके और देश की संवैधानिक व्यवस्था में एक बुनियादी मरम्मत की जा सके।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
संपादकीय
16 मार्च 2020
बुरा वक्त कई जरूरी बातों को सोचने का वक्त, मौका, और वजह देता है। अब जैसे आज चारों तरफ इंसानी जिंदगी कोरोना की दहशत और चौकन्नेपन से घिर गई है, तो बहुत से लोग यह भी सोच रहे हैं कि उन्हें कोरोना हुआ तो क्या होगा? कई लोग सोशल मीडिया पर यह सवाल भी उठा रहे हैं कि अगर कोरोना-वार्ड में चौदह दिनों तक कैद रहना पड़ा तो वे क्या करेंगे? कुछ लोगों ने यह दिलचस्प सवाल खड़ा किया है कि ऐसे चौदह दिनों में वे किसके साथ रहना चाहेंगे? अब ऐसा सवाल परिवारों और जोड़ों के बीच एक लड़ाई भी खड़ी कर सकता है, अगर लोग सच बोलना तय करें। वैसे जिंदगी का तजुर्बा इंसानों को इतना तो सिखा ही देता है कि इंसानी मिजाज अधिक सच के लिए बना हुआ नहीं है, और यह भी एक बड़ी वजह है कि भाषा सच के साथ मुच जोड़कर सचमुच लिखती है क्योंकि खालिस सच न पच पाता है, न बर्दाश्त हो पाता है। लेकिन इस मजाक से परे अगर सचमुच ही यह सोचें कि जिंदगी में ऐसा वक्त आ ही गया कि कोरोना ने संक्रामक रोग अस्पताल पहुंचा दिया, और वहां से लौटना न हो पाया, तो उसके लिए अभी से क्या-क्या तैयारी करनी चाहिए।
वैसे तो इंसानी मिजाज इस खुशफहमी में जीने का आदी भी रहता है कि बुरा तो दूसरों के साथ ही होगा, और उन्होंने तो कुछ इतना बुरा किया हुआ नहीं है कि उन्हें कोरोना पकड़ ले। लेकिन ऐसी सोच के बीच भी कम से कम कुछ लोगों को तो यह आशंका सताती होगी कि उन्हें या परिवार के किसी और को अगर कोरोना या ऐसा कोई दूसरा वायरस जकड़ेगा तो क्या होगा, और वे क्या करेंगे? इस किस्म की आशंका जिंदगी में जरूरी भी रहती है ताकि लोग यह सोच सकें कि अगर यह नौबत आ ही गई, और वे अस्पताल से नहीं लौटे, तो कौन-कौन से काम बकाया हैं जिन्हें अभी कर लेना ठीक होगा, और कौन-कौन से ऐसे नेक काम हैं जिनको किए बिना लोग उनको किसी अच्छी बात के लिए याद नहीं कर पाएंगे? ये दोनों ही बातें सोचना जरूरी है क्योंकि लोग अपने बुरे की सोच नहीं पाते हैं, और अपने अच्छे दिनों में जिम्मेदारियों को पूरा कर नहीं पाते हैं, या करने की सोचते ही नहीं हैं।
यह मौका जब लोगों का भीड़-भड़क्के में आना-जाना कम हो रहा है, जब कारोबार कम हो रहा है, जब मामूली सर्दी-खांसी भी लोगों को घर बिठा दे रही है, जब निहायत इमरजेंसी-सफर ही किया जा रहा है, तो हर किसी के पास आज खासा वक्त है। कोरोना ने लोगों की वक्त की फिजूलखर्ची घटा दी है, और जरूरी कामों के लिए कुछ वक्त मुहैया करा दिया है, और कुछ वजहें भी। ऐसे में लोगों को बाहर कम से कम लोगों से मिलने, कम से कम मटरगश्ती करने की एक ऐसी मजबूरी भी है जो उन्हें अपने घर या अपने कमरे में कैद करके रख रही है, और इस मौके का फायदा उठाकर लोग कम से कम अपने कागजात और अपने कबाड़ छांट सकते हैं, और जिंदगी के बकाया कामों को पटरी पर ला सकते हैं। लोग मर्जी की किताबें पढ़ सकते हैं, मर्जी की फिल्में देख सकते हैं, और मर्जी का संगीत सुन सकते हैं। लोग अपनी मर्जी के लोगों के साथ रह सकते हैं, क्योंकि फिजूल के लोगों के साथ उठना-बैठना डॉक्टरी सलाह से सीमित हो चुका है।
अंग्रेजी में कहा जाता है कि हर काले बादल के किनारे पर चांदी सी चमकती एक लकीर भी होती है। लोग अपनी जिंदगी के इस कोरोना-दौर में ऐसी सिल्वर-लाईनिंग देख सकते हैं, और उसका फायदा उठा सकते हैं। बीमारी की दहशत में आए बिना भी अपनी वसीयत कर सकते हैं, जमीन-जायदाद के कागज निपटा सकते हैं, घर में बंटवारा करना हो तो कर सकते हैं, और जिनसे दुश्मनी हो उनसे माफी मांग सकते हैं, या उनको माफ कर सकते हैं। किसी ने लिखा भी है कि अपनी जिंदगी को इस तरह बेहतर बनाया जा सकता है कि कुछ को माफ कर दिया जाए, और कुछ से माफी मांग ली जाए। कोरोना ने आज सभी को ऐसी वजहें दी हैं कि जिनसे मोहब्बत है, और उन्हें पर्याप्त शब्दों में यह बात कही नहीं जा रही है, तो पिटने का डर छोड़कर ऐसी बात कर ही लेनी चाहिए, और किसी नापसंद से ऐसी बात सुननी पड़े, तो उसे पीटना छोड़कर उसे माफ कर देना चाहिए।
अभी किसी ने वॉट्सऐप पर एक मजेदार बात लिखकर भेजी है कि छत्तीसगढ़ के एक स्कूली बच्चे से किसी ने पूछा कि स्कूल की छुट्टी क्यों हो गई है? तो उसका जवाब था- कोरोना तिहार चल रहा है। बात सही है कि अब गर्मी और दीवाली की सिमट गई छुट्टियों के मुकाबले जब अचानक बिन मांगे एक पूरे पखवाड़े की ऐसी छुट्टी मिल जाए, तो वह कोरोना-देवता के त्योहार से कम क्या गिना जाए?
काम-धंधे, नाते-रिश्तेदारी, आवाजाही, और आवारागर्दी से लेकर गप्पबाजी तक, इन सबसे एक पखवाड़े की जो छुट्टी मिली है, उसमें लोगों को अपनी जिंदगी की हमेशा ही लेट चलने वाली ट्रेन को पटरी पर ले आना चाहिए, और लेट को रिकवर करके एक पखवाड़े बाद के प्लेटफॉर्म पर गाड़ी समय पर पहुंचाना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
संपादकीय
15 मार्च 2020
कोरोना के शिकार योरप के सबसे बदहाल देश इटली की खबर है कि वहां अस्पतालों की इलाज की ताकत चुक गई है, और पूरे देश में लोगों से घर के भीतर रहने कहा गया है। इटली का यह हाल देखते हुए ही अमरीका ने तकरीबन पूरे ही योरप से लोगों का अपने यहां आना बंद कर दिया है, और सिर्फ ब्रिटेन के लोगों को कड़ी मेडिकल जांच के बाद आने की छूट दी है। इटली एक विकसित और संपन्न देश है, इसलिए ऐसी किसी महामारी के लिए उसकी कोई बड़ी तैयारी नहीं थी। आमतौर पर संक्रामक रोग गरीब देशों में अधिक होते हैं, और तेजी से फैलते हैं, लेकिन इस बार चीन के बाद इटली की बारी है, और वह देश इलाज के इतने ही दिनों में बुरी तरह से थक और टूट चुका है।
अब खबर यह है कि वहां के अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने की जगह नहीं बची है, और डॉक्टरों को यह समझ नहीं आ रहा है कि किसे बचाएं किसे छोड़ें। ऐसे में इटली में सरकार की तरफ से ऐसे निर्देश जारी हुए हैं जिनमें डॉक्टरों और नर्सों से कहा गया है कि इमरजेंसी की हालत में वे यह तय करें कि किसे बचाया जा सकता है, और किसी नहीं बचाया जा सकता है। सीमित इलाज से कौन सी जिंदगी बच सकती है, और किसे महज लंबा खींचा जा सकता है। ऐसे में कहा गया है कि यह फैसला लेना होगा कि इलाज के लायक कौन हैं? डॉक्टरों पर यह दबाव है कि जिन बूढ़े लोगों को बचाना मुमकिन नहीं दिख रहा, और जिनकी जिंदगी वैसे ही कम ही बची है उन पर मेहनत न करें।
हुआ यह है कि कोरोना का असर 50 साल से ऊपर के लोगों पर अधिक हो रहा है। बच्चे और जवान, अधेड़ तक इसकी मार से बेअसर सरीखे हैं, लेकिन उम्रदराज लोग अपनी दूसरी बीमारियों के चलते इसके जल्द शिकार हो रहे हैं। बड़ी उम्र में बाकी बीमारियों की वजह से वैसे भी जटिलताएं बहुत बढ़ जाती हैं, इलाज के दौरान दबाव बहुत बढ़ जाता है, और सीमित चिकित्सा सुविधा का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्ग मरीजों को बचाने में लगता है, उससे बहुत कम मेहनत से जवान मरीजों को बचाया जा सकता है। लोगों को यह बात हैवानियत की लग सकती है कि किसी मरते हुए मरीज को छोड़ा कैसे जाए, लेकिन यह बात कुछ उसी किस्म की है कि किसी विमान पर कुल एक पैराशूट हो, और मुसाफिर कई हों, तो गिरते विमान से किस एक को बचाया जाए? या लोग आपसी बातचीत में अपने बच्चों से ही प्यार भरी मजाक में यह जानना चाहते हैं कि वे सबसे अधिक प्यार किससे करते हैं?
कुछ ऐसे ही बात डॉक्टरों के सामने उस वक्त आ जाती है जब एक बिस्तर हो, और दस मरीज हों। एक इंजेक्शन हो, और दस मरीज हों। ऐसे में डॉक्टर करे तो क्या करे? एक ही इंजेक्शन को बांटकर दस लोगों को लगाना तो बेअसर होगा, इसलिए लगाना किसी एक को ही है। ऐसे में सबसे बुजुर्ग को बचाया जाए जिसकी कि जिंदगी थोड़ी ही बाकी है, या सबसे जवान को बचाया जाए जिसकी जिंदगी सबसे लंबी बाकी है? यह फैसला बहुत ही मुश्किल है, और हमारा अंदाज है कि दुनिया के कोई भी डॉक्टर ऐसे फैसले की नौबत में घिरना चाहते नहीं होंगे। लेकिन आज इटली में ऐसी ही नौबत आ गई है। हम तो हिन्दुस्तान जैसे देश के बारे में इलाज की ताकत चुक जाने की बात सोचते थे जहां पर सरकारी भ्रष्टाचार अस्पतालों को बेहाल करके रखता है, जहां गरीबी की वजह से संक्रमण फैलने का खतरा बहुत अधिक रहता है। लेकिन इटली के बारे में ऐसा सोचा नहीं था। फिर भी जब ऐसी नौबत आ गई है तो वहां के डॉक्टर क्या करने जा रहे हैं?
इसका जवाब इतना मुश्किल भी नहीं है अगर हम आईने में अपनी बदशक्ल देखने का हौसला जुटा सकते हैं। हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों कमाऊ और नौजवान लोग हैं जिन्होंने अपने बूढ़े मां-बाप को जीते-जी मरने सरीखी हालत में छोड़ रखा है। ये लोग अपने बच्चों, अपनी अगली पीढ़ी का तो ख्याल रखते हैं, लेकिन अपनी पिछली पीढ़ी, अपने मां-बाप के जिंदा या मुर्दा रहने की जिन्हें परवाह नहीं है। ऐसे ही लोगों की वजह से वृद्धाश्रम चलते हैं, और ऐसे ही लोगों की वजह से बूढ़े मां-बाप बंद घरों में मर जाते हैं, और उनकी लाशें महीनों बाद मिलती हैं। दुनिया का रिवाज ही कुछ ऐसा है। बरसों पहले जापान की एक फिल्म आई थी जो कि वहां के अकाल के दौर पर बनी थी। उस फिल्म में जब बूढ़े लोग उत्पादक नहीं रह जाते हैं, तो सीमित अनाज के बेहतर इस्तेमाल के लिए लोग अपने बुजुर्गों को ईश्वर दिखाने के नाम पर एक पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहां से उन्हें नीचे फेंक देते हैं। गांव के बुजुर्गों को इस बात का अहसास रहता है कि ईश्वर को देखकर कोई भी वापिस नहीं आते हैं। फिल्म में एक बूढ़ी मां, या बूढ़े बाप को पहाड़ी से नीचे फेंकने का ऐसा भयानक नजारा है जिसमें नीचे धकेलकर जब गिराया जाता है, तो वे अपने जवान लड़के के पैर पकड़कर लटके रहते हैं, और बेटा उन्हें लात मार-मारकर नीचे गिराता है। जब जिंदगी के साधन सीमित रह जाते हैं, तो लोग अपनी उस खूबी को खो बैठते हैं जिसे बोलचाल की भाषा में इंसानियत कहा जाता है। लोगों को एक दूसरी सच्ची घटना याद होगी कि एक मुसाफिर विमान एक बर्फीली पहाड़ी पर गिर जाता है, और उसके बहुत से मुसाफिर बच जाते हैं। बाद में कुछ खाने को नहीं रहता, तो वे अपने बीच के मरे हुए लोगों का गोश्त खाने लगते हैं।
इटली में जो हो रहा है वह बहुत तकलीफदेह, और बहुत हैवानियत वाला जरूर लग रहा है, लेकिन हकीकत यही है कि लोगों के पास एक रोटी हो, और आखिरी कौर के लिए मरते हुए अपने खुद के बच्चे हों, और खुद के मां-बाप हों, तो लोग बच्चों को ही बचाएंगे क्योंकि उनकी जिंदगी लंबी बाकी है। जिनको यह बात अटपटी लग रही हो, वे अपने को ऐसी नौबत में सोचकर कोई फैसला तो लेकर देखें...!
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
संपादकीय
14 मार्च 2020
दुनिया भर में आज कोरोना को लेकर जिस तरह का खतरा खड़ा हुआ है, ऐसा इसके पहले किसी दूसरे मौके पर याद नहीं पड़ता। लेकिन इसके साथ-साथ इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए जिस दर्जे की सावधानी बरती जा रही है, वैसी सावधानी भी पहले कभी याद नहीं पड़ती। दूसरे कई देशों पर कोरोना की मार अधिक बुरी हुई है, चीन, दक्षिण कोरिया, ईरान, और इटली में मौतें सैकड़ों में हैं, चीन में तो हजारों में हैं, और हिन्दुस्तान में मौत का खाता अभी खुला ही है। अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पहली बार किसी खतरे को गंभीरता से लिया है, और पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी है। जिस न्यूयार्क में हर कदम पर कदम पड़ते दिखते थे, वहां सड़कें और सब-वे खाली पड़े हुए हैं। वहां के बड़े-बड़े स्टोर में लोग सामान अधिक से अधिक उठाते हुए एक-दूसरे से मारपीट भी कर रहे हैं। भारत चूंकि साफ-सफाई के मामले में लापरवाह देश है, इसलिए यहां पर न तो कोई तैयारी अधिक दिख रही है, न ही लोगों में उतनी दहशत दिख रही है। फिर भी भारत में सरकारों ने खतरे को गंभीरता से लिया है।
अलग-अलग प्रदेशों में कोरोना के फैलने को रोकने के लिए अलग-अलग किस्म की तैयारी दिखाई है, और कई बरस बाद शायद यह अकेला ऐसा मुद्दा है जिस पर केन्द्र और राज्यों के बीच कोई टकराव नहीं हुआ है, और राज्यों ने केन्द्र की सलाह को तुरंत ही मान लिया है। बहुत से राज्यों में इस पूरे महीने के लिए स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं, हॉस्टल खाली करवा लिए गए हैं, मेले-ठेले पर रोक लगा दी गई है, कांफ्रेंस-सेमीनार, टूर्नामेंट-भर्ती कैंप सब पर इस महीने के लिए तो रोक लग ही गई है। जैसा कि हिन्दुस्तान में हर खतरे और समस्या के मामले में होता है, कोरोना से बचाने के लिए भी कहीं दस रूपए में झाड़ा उतारा जा रहा है, तो कहीं ताबीज बनाकर दी जा रही है। अब चीन से आए कोरोना को अगर हिन्दी, और बाकी हिन्दुस्तानी भाषाएं पढऩा आता होता, तो फिर डॉक्टरों की जरूरत ही नहीं रहती, और कोरोना खुद ही ऐसे इश्तहारों को पढ़कर हॅंसते-हॅंंसते मर गया होता। आज ही एक दिलचस्प तस्वीर मिली है जो कि ऐसे अंधविश्वासों से ठीक उल्टी है, और छत्तीसगढ़ के एक मंदिर में पुजारी भगवान की आरती उतारते हुए भी मास्क लगाए हुए हैं। हालत यह है कि हिन्दी-हिन्दुस्तान में भी मास्क, वायरस, और सेनेटाइजर जैसे अंग्रेजी शब्द अंग्रेजी में ही अधिक समझे जा रहे हैं, इनका हिन्दी ढूंढने की कोशिश भी भाषा के कट्टर लोगों ने नहीं की है।
केरल ने दूसरे राज्यों के मुकाबले कुछ अधिक तैयारी की है, और जाहिर है कि राज्य अधिक पढ़ा-लिखा होने से वहां पर ये बातें लागू भी करना आसान है। वहां की सरकार ने राज्य के जिन लोगों को मेडिकल जांच होने तक अपने घरों में रहने का आदेश दिया है, उन परिवारों को पका हुआ खाना पहुंचाया जा रहा है। इसके अलावा स्कूलें बंद की गई हैं, इसलिए स्कूली बच्चों को भी दोपहर का खाना घर पर पहुंचाया जा रहा है। हिन्दुस्तानी की जमीनी हकीकत यह है कि गरीब बच्चों में से अधिकतर ऐसे हैं जो स्कूल के दोपहर के भोजन की वजह से पेट भर खा पाते हैं, और अगर यह पूरा महीना स्कूल बंद रहती है, तो उनके खानपान पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। बिहार ने स्कूली बच्चों के भोजन का पैसा उनके बैंक खातों में डालना तय किया है ताकि परिवार अपना इंतजाम खुद कर सके। देश के बाकी राज्यों को भी अपने स्कूली बच्चों की फिक्र करते हुए उनका इंतजाम करना चाहिए, और जरूरत हो तो ऐसे हर परिवार को राशन दुकानों से अतिरिक्त राशन देना चाहिए ताकि गरीब चूल्हों पर अधिक बोझ न पड़े।
कुछ राज्यों में सिनेमाघरों को बंद करवा दिया गया है क्योंकि वहां सीमित और बंद जगह में अगर कोरोना वायरसग्रस्त लोग पहुंचें, तो वह एक बड़ी दिक्कत हो सकती है। कई राज्यों में अब तक ऐसा नहीं हुआ है, और उन्हें इस खतरे, और इस बचाव के बारे में सोचना चाहिए। इससे अलग, छत्तीसगढ़ में एक अजीब सी मांग सामने आई है कि सरकार स्कूल-कॉलेज, लाइब्रेरी-जिम के साथ-साथ शराब दुकानों को भी बंद करे क्योंकि वहां पर लोगों की भारी भीड़ लगती है। यह बात सही है क्योंकि लोग सीमित संख्या में रह गई दुकानों पर असीमित संख्या में भीड़ लगाते हैं, और आज छत्तीसगढ़ में ऐसे किसी वायरस के संक्रमण का एक बड़ा खतरा ऐसी शराबी-भीड़ को हो सकता है। अब रोज शराब पीने के आदी लोगों के लिए यह मुमकिन नहीं होगा कि वे पूरे महीने बिना शराब के रहें। वैसे भी राज्य में पड़ोसी राज्यों से आई हुई शराब गाडिय़ां भर-भरकर पकड़ा रही है, इसलिए दारू दुकानों को बंद करने का मतलब सरहद से तस्करी बढ़ाना भी होगा। इसलिए दिन में 11 घंटे खुलने वाली शराब दुकानों पर लगने वाली अंधाधुंध भीड़, धक्का-मुक्की, और मारपीट को घटाने के लिए सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि क्या दुकानों के खुलने के घंटे बढ़ाए जा सकते हैं, ताकि ऐसी बड़ी भीड़ न लगे? यह बात एक अलोकप्रिय राय लग सकती है, लेकिन लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए कई किस्म के कड़वे, अवांछित तरीके भी इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं। अगर दुकानें सुबह और जल्दी खुलें, और देर रात तक चलती रहें, तो इन पर भीड़ घटेगी, और अधिक घंटों में फैल जाएगी।
फिलहाल न सिर्फ सरकार को, बल्कि समाज और परिवार को भी बहुत सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि कोरोना के इलाज का भी कोई बड़ा इंतजाम हिन्दुस्तान में नहीं है, न ही इसकी कोई अधिक दवाएं बनी हैं, और न ही साल-दो साल इससे बचाव के टीके आते दिख रहे हैं। ऐसे में सावधानी मेें ही समझदारी है, और वैसी समझदारी में ही जिंदगी है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM