जंकफूड का मिला एक और नया खतरा, करता है याददाश्त कमजोर...

 17 दिसंबर 2022

 

ब्राजील में अभी हुए एक वैज्ञानिक शोध में यह पता लगा है कि फास्टफूड या जंकफूड कहे जाने वाले डिब्बा और पैकेट बंद सामान या बाजार में मिलने वाले बर्गर के दर्जे के खानपान से लोगों की याददाश्त कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है। आठ बरस तक दस हजार से अधिक औरत-मर्दों पर किए गए इस अध्ययन में यह पाया गया कि ऐसे अल्ट्रा प्रोसेस्ड खानपान वाले लोगों में याददाश्त कमजोर होने के मामले ऐसा कम से कम खाने वाले लोगों से 28 फीसदी अधिक थे। इस अध्ययन से यह भी साफ होता है कि मानसिक स्वास्थ्य को बनाने मेंं खानपान की एक भूमिका है। दूसरी तरफ एक अलग रिसर्च का नतीजा यह है कि किसी भी किस्म की कसरत लोगों में रोकी जा सकने वाली बीमारियों को रोकने की अकेली सबसे बड़ी तरकीब है। कसरत या किसी और किस्म से बदन की मेहनत से आंतों से लेकर दिमाग तक असर पड़ता है, और जिसे इंसान मन कहते हैं, वह मन भी जोश से भरता है।

ऐसे अलग-अलग बहुत से रिसर्च-नतीजे हैं और दो बातों को लेकर कोई मतभेद नहीं हो सकता कि जंकफूड किस्म के जितने खानपान हैं, उनसे सेहत को अपार नुकसान पहुंचता है, दूसरी तरफ खेलकूद, कसरत, या पैदल-सैर से  लोगों की सेहत को बहुत फायदा पहुंचता है। एक दूसरी बात यह है कि ऐसा नुकसान या ऐसा फायदा, ये दोनों ही बातें लोगों की अगली पीढिय़ों तक पहुंचती हैं, और अच्छी या बुरी आदतें विरासत की शक्ल में आगे बढ़ती हैं। ये दोनों ही बातें आज फिक्र करने की इसलिए हैं कि पैकेट और डिब्बों में बंद, और टेलीफोन पर ऑर्डर करने से घर पहुंचने वाला बाजारू खाना बढ़ते चल रहा है। लोग पकाने का वक्त या सहूलियत न रहने से भी ऐसा करते हैं, और जुबान के शौक की वजह से भी ऐसी चीजों को मंगाना पसंद करते हैं जिन्हें घर पर पकाना आसान नहीं है। फिर बाजार को अपने ग्राहक बांधकर रखने होते हैं, इसलिए स्वाद को बढ़ाने के लिए इतने किस्म की चीजों को इस हद तक डाला जाता है, कि जिससे सेहत के चौपट होने की गारंटी सरीखी रहती है। इन दिनों संपन्न परिवारों के बच्चे बचपन से ही ऐसे खानों के शिकार हुए जा रहे हैं, और इसके खतरे की तरफ सरकार और समाज की जागरूकता बिल्कुल भी नहीं है। और परिवार भी समाज से प्रभावित होते हैं, और इस तरह का खानपान बड़ों से लेकर छोटों तक जमकर बढ़ते चल रहा है, और इसके साथ-साथ ही इन सबकी आने वाली जिंदगी में कई किस्म की ऐसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ते चल रहा है जिन्हें कि आसानी से रोका जा सकता था।

एक तरफ तो नुकसानदेह खानपान को घटाने की जरूरत है, दूसरी तरफ सेहतमंद जीवनशैली को अपनाने की जरूरत है। बिना किसी खर्च के लोग खाली हाथों कुछ देर कसरत कर सकते हैं, कुछ देर पैदल चल सकते हैं, कुछ देर योग या प्राणायाम कर सकते हैं। इनमें एक धेला भी खर्च नहीं होता, लेकिन लोगों की काम करने की क्षमता बढ़ती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, और अधिक काम करने का उत्साह भी बढ़ता है। अब यह बात निर्विवाद रूप से, वैज्ञानिक तथ्यों से साबित हो चुकी है कि खेलकूद या कसरत से दिमाग में हार्मोन रिलीज होते हैं जो लोगों को खुशमिजाज भी बनाते हैं, और उनकी जिंदगी सुखी करते हैं। बचपन और जवानी के समय से अगर लोग खेलना-कूदना, कसरत और पैदल चलना शुरू कर देते हैं, तो उनकी जिंदगी गंभीर बीमारियों से बचने की गुंजाइश बढ़ जाती है, और बुढ़ापा शर्तिया अधिक आरामदेह हो जाता है।

हिन्दुस्तान मेंं केन्द्र सरकार की तरफ से फिटइंडिया नाम का एक अभियान कुछ बरस पहले छेड़ा गया था, और वह झाड़ू लगाने के सफाई अभियान की तरह आया-गया हो गया। अब कोई उसकी चर्चा भी नहीं करते। अब न लोगों को फिट रहने के तरीके सुझाने पर कोई मेहनत दिखती, और न ही खराब खाने से सावधान करने का कोई अभियान दिखता। नतीजा यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहरों में पैदल चलने के लिए तालाबों के जो किनारे थे, जो मैदान और बगीचे थे, उन पर धड़ल्ले से अवैध निर्माण हो रहे हैं, और खानपान के बाजार वहां खड़े किए जा रहे हैं। लोगों के लिए खुली जगहें म्युनिसिपल और सरकार के लिए आखिरी प्राथमिकता, या नाजायज औलाद की तरह हो गई हैं, और इंच-इंच का भ्रष्ट बाजारू इस्तेमाल भ्रष्ट कमाई का बड़ा जरिया हो गया है। जिस जगह लोग सपरिवार घूम सकते थे, अब वहां लोग सपरिवार बाजारू खानपान ही कर सकते हैं।

सरकारों को बड़े खर्च वाले संगठित काम अच्छे लगते हैं। लोगों में खानपान और सेहत की जागरूकता से सरकारों में बैठे लोगों को कुछ नहीं मिलना है। लेकिन सार्वजनिक जगहों पर बर्बाद खानपान वाले बाजार बसाने में सत्तारूढ़ लोगों को खासी कमाई होती है। दूसरी तरफ लोगों के इलाज के लिए जब सरकारें निजी अस्पतालों को या स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को सैकड़ों करोड़ का भुगतान करती हैं, तो उसमें भी सत्ता को कमाई होती है। लोगों से सेहतमंद खाने को कहना, और सेहतमंद जिंदगी गुजारने को कहने से किसी की कोई कमाई नहीं होती। इसलिए सरकार से कोई उम्मीद करना बेकार है। वह तो खुली जगहों को कांक्रीट का जंगल बनाती चलेंगी, और बेचती चलेंगी। लोगों को खुद ही अपने बीच, अपने-अपने दायरे में सेहतमंद खानपान और सेहतमंद जिंदगी को बढ़ावा देना होगा। पहले खुद फिट, फिर परिवार, और फिर आसपास का संसार। इनमें से कोई भी बात अंतरिक्ष विज्ञान जैसे रहस्य की नहीं है। अपनी ही पिछली पीढिय़ों को देखें तो बड़े बुजुर्ग यह सब करते आए हैं, इनसे जिंदगी किफायती भी रहती है, सेहतमंद भी रहती है। और जैसा कि अभी इस नये अध्ययन से पता लगा है कि जंकफूड खाने वालों की याददाश्त भी कमजोर हो रही है। और किसी चीज की न सही कम से कम इस नई बात की तो परवाह करें, क्योंकि याददाश्त नहीं रहेगी तो जिंदगी कैसी मुश्किल होगी इसे देखने के लिए आसपास कुछ बुजुर्ग मरीजों को देखा जा सकता है। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

बच्चों के बलात्कारी बनने के जिम्मेदार कौन? पोर्नोग्राफी या सेक्स शिक्षा की नामौजूदगी?

 16 दिसंबर 2022

 

हर कुछ हफ्तों में बलात्कार में शामिल नाबालिगों पर लिखना पड़ता है। अब कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस ने तेजी से बलात्कार और हत्या का एक ऐसा मामला सुलझाया जिसमें पड़ोस के तेरह बरस के लडक़े ने आठ बरस की बच्ची से बलात्कार किया, और फिर उसका गला घोंटकर मार डाला। पुलिस जांच में किसी सीसीटीवी कैमरे में इन दोनों को साथ जाते देखा गया, और फिर छानबीन में यह लडक़ा पकड़ में आया। यह अपने परिवार के लोगों के मोबाइल फोन पर पोर्नो फिल्में देखा करता था, और मानो उसी के असर से उसने असल जिंदगी में उसी किस्म का जबरिया सेक्स किया, और फिर छोटी बच्ची को मार डाला। पुलिस की दी गई जानकारी में यह भी पता लगा है कि इस बलात्कारी लडक़े का पिता भी अपनी सगी नाबालिग बेटी के साथ रेप के मामले में तीन बरस तक जेल में बंद था, और एक महीना पहले ही जेल से छूटकर आया है। जाहिर है कि इन बरसों में इस लडक़े ने अपने पिता के जुर्म को परिवार के भीतर ही देखा था, सजा को भी देखा था, लेकिन उसे जुर्म तो शायद प्रेरणा मिल गई, पिता को मिली सजा से उसे सबक नहीं मिला। एक मासूम बच्ची की जिंदगी चली गई, और यह नाबालिग लडक़ा अगले कई बरस के लिए सजा काटने चले गया।

हिन्दुस्तान में ऐसे मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं जिनमें मोबाइल फोन पोर्नोग्राफी देखकर बच्चे इस तरह से बलात्कार करें। वैसे तो पूरे देश से इस किस्म की हिंसा और ऐसे जुर्म की खबरें आती ही रहती हैं, लेकिन कल का यह मामला छत्तीसगढ़ में उजागर हुआ है इसलिए यह याद आया कि पिछले पखवाड़े ही छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में दस साल की एक बच्ची फांसी पर टंगी मिली। जब उसकी जांच की गई तो पता लगा कि उसके साथ बलात्कार भी हुआ था, अड़ोस-पड़ोस में जांच हुई तो पास के एक नाबालिग लडक़े को पकड़ा गया जिसने बताया कि वह मोबाइल पर अश्लील वीडियो देखते रहता था, और उसने पड़ोस में इस छोटी लडक़ी को पकडक़र रेप किया, और फिर बात खुल जाने के डर से उसकी हत्या करके उसे चुनरी से फांसी पर टांग दिया था। एक पखवाड़े में सौ किलोमीटर के भीतर ठीक ऐसा ही यह दूसरा मामला तकरीबन उसी उम्र के बच्चे का किया हुआ मिला है। और यह तो ऐसा मामला है जिसमें कत्ल की वजह से बात सामने आ गई, वरना घर-परिवार, पड़ोस-रिश्तेदार के भीतर ऐसे मामले बड़ी संख्या में होते हैं, और उन्हें सामाजिक बदनामी के डर से दबा दिया जाता है। लोगों को याद होगा कि अभी चार दिन पहले ही देश के मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ ने कहा है कि बच्चों से बलात्कार के मामलों में परिवारों को सामने आकर पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यह बात पूरी दुनिया पर लागू होती है कि अगर ऐसे अपराधी बच जाते हैं, तो वे दूसरे बच्चों के साथ भी इसी तरह का जुर्म तब तक करते रहते हैं जब तक कि वे पकड़ा नहीं जाते हैं। इसलिए किसी मामले को आसपास के संबंधी होने की वजह से दबा देने का मतलब और बच्चों को वैसे ही खतरे में डालना होता है।

अब मोबाइल फोन तो एक हकीकत हो गई है, और किसी बच्चे की फोन तक पहुंच रोकना मुमकिन नहीं है। यह भी समझ पड़ रहा है कि परिवार के बड़े लोगों के फोन तक बच्चों की पहुंच रहती है, और अगर बड़े लोगों ने पोर्नोग्राफी देखी हुई है, तो उनके फोन में इसकी हिस्ट्री बची रहती है, और उससे खेलते बच्चों के लिए यह एक आसान रास्ता पोर्नोग्राफी तक पहुंचने का बना रहता है। फिर यह भी है कि आज दुनिया का माहौल बदलने की वजह से, बच्चों के मानसिक और शारीरिक बदलाव कमउम्र में आने की वजह से उनका सेक्स से वास्ता पहले के मुकाबले कमउम्र में पडऩे लगता है। मां-बाप को यह समझ ही नहीं आता कि उनके बच्चे अब सेक्स की तरफ देखने लगे हैं, क्योंकि जब वे उस उम्र के थे, तो उन्हें इसकी कोई समझ नहीं थी। पीढिय़ों में यह फर्क आते चल रहा है, और इसके साथ-साथ हिन्दुस्तान में एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि मां-बाप और समाज यह मानकर चलते हैं कि किसी सेक्स शिक्षा की जरूरत नहीं है। इस देश की दकियानूसी और पाखंडी ताकतों ने इसे देश की संस्कृति से जोड़ दिया है, और बात-बात पर वे झंडा-डंडा उठा लेते हैं कि भारतीय संस्कृति को बर्बाद नहीं करने दिया जाएगा। सेक्स शब्द को ही पश्चिमी मान लिया जाता है, जबकि हिन्दुस्तान के इतिहास और पौराणिक कथाओं में कई जगह ऐसा जिक्र भी है कि किसी लडक़ी की माहवारी शुरू होने के बाद उसके मां बनने के मौके को बर्बाद नहीं करना चाहिए। कन्नड़ के ज्ञानपीठ विजेता लेखक भैरप्पा के महाभारत की पृष्ठभूमि पर लिखे एक उपन्यास को देखें तो एक पिता इस बात को लेकर फिक्रमंद रहता है कि बेटी रजस्वला हो गई है, शादी नहीं हुई है, गर्भधारण का मौका बर्बाद होते जा रहा है। उस वक्त के इस चलन का भी इसमें जिक्र है कि शादी के पहले भी लड़कियां गर्भवती हो जाती थीं, और शादी के बाद वे अपने उन बच्चों के साथ पति के घर जाती थीं। इसलिए शादी के पहले, या कमउम्र में सेक्स कोई पश्चिमी बात नहीं है, यह हिन्दुस्तान में भी प्रचलित बात रही है, यह एक अलग बात है कि आज एक बेबुनियाद नवशुद्धतावादी काल्पनिक इतिहास को गढक़र सेक्स को एक अवांछित बात मान लिया गया है। जबकि इन्हीं कन्नड़ लेखक के कर्नाटक में अभी कुछ ही दिन पहले बेंगलुरू के एक निजी स्कूल में अचानक ही लडक़े-लड़कियों के स्कूल बैग जांचे गए तो उनमें कंडोम और खाने वाले गर्भनिरोधक भी निकले हैं। मुम्बई के एक प्रमुख सेक्स परामर्शदाता ने अभी एक इंटरव्यू में यह कहा कि उनके पास दस-बारह उम्र के बच्चों के ऐसे मामले आने लगे हैं जो कि उनके बीच सेक्स से जुड़े हुए हैं।

हिन्दुस्तान को इस बात की पूरी आजादी है कि वह सिर को रेत में छुपाकर हकीकत की तरफ से आंखें मूंदे रहे, और आने वाली पीढ़ी को तरह-तरह के खतरों में डालना जारी रखे। आज जहां सेक्स को जुर्म की तरह दर्ज नहीं भी करवाया जा रहा है, वहां भी कमउम्र के असुरक्षित सेक्स से गर्भ का खतरा भी बना रहता है, और दर्जनों किस्म की यौन-बीमारियों के फैलने का भी। दूसरी तरफ जिन स्कूली बच्चों के पास गर्भनिरोधक मिले हैं, वे दूसरे बच्चों के मुकाबले कुछ अधिक जागरूक हैं क्योंकि वे अपनी शारीरिक-मानसिक जरूरतों को पूरा करते हुए बीमारी और गर्भधारण से बचाव की फिक्र भी कर रहे हैं। यह बात सुनने में चाहे कितनी ही बुरी लगती हो, आज सच तो यह है कि स्कूल पार करते-करते शायद अधिकतर बच्चे किसी न किसी तरह सेक्स का तजुर्बा ले चुके रहते हैं। अब उन्हें परिवार, स्कूल, या समाज बचाव के तरीके सिखाए या नहीं, वे अपनी जरूरतें तो पूरी करते रहते हैं, और भयानक सच तो यह है कि आज अधिकतर बच्चों के पास सेक्स की किसी भी तरह की शिक्षा के नाम पर सिर्फ पोर्नोग्राफी मौजूद है, जो कि सबसे ही खतरनाक किस्म की शिक्षा है। पोर्नोग्राफी प्राकृतिक या स्वाभाविक सेक्स के बजाय बलात्कार और जबरिया सेक्स सिखाती है, और अब तो छोटे-छोटे बच्चे भी उसे सीख रहे हैं।

आज हिन्दुस्तान में जो राजनीतिक दल एक तथाकथित भारतीय संस्कृति के नाम पर वोट दुहने में लगे रहते हैं, वे सेक्स शब्द को ही जेल में डाल देने के हिमायती हैं। और ऐसे कट्टर लोगों के खिलाफ दूसरी बेहतर राजनीतिक पार्टियां भी कुछ बोलने से कतराती हैं, क्योंकि उन्हें बदचलनी बढ़ाने वाला करार दे दिया जाएगा। नतीजा यह है कि देश की शिक्षा नीति को तय करने वाले लोग किशोरावस्था में पहुंचे हुए बच्चों को भी अपने शरीर और स्वास्थ्य की सुरक्षा सीखने देना नहीं चाहते, वे इसे चरित्रहीनता और पश्चिमी संस्कृति करार दे रहे हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए क्योंकि अपनी देह से अनजान पीढ़ी सेक्स तक तो उसी तरह पहुंच जा रही है जिस तरह जानवर भी आपस में पहुंच जाते हैं, लेकिन जानवरों में कुछ भी अवांछित गर्भ नहीं होता, यौन-बीमारियों का खतरा या उससे बचाव नहीं होता, इसलिए उनमें तो काम चल जाता है, इंसानों के बच्चों में इससे खतरनाक जुर्म खड़े हो रहे हैं, और सेहत के लिए खतरे भी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 दिसंबर 2022


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दबंग की हत्या, राजनीतिक दल का था या नहीं, यह साबित करने की हड़बड़ी!

 15 दिसंबर 2022

  

कल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दिनदहाड़े खुली सडक़ पर एक दबंग की कार रोककर किसी ने उसे गोलियों से भून डाला। आधा दर्जन फायर किए गए, और कार की सीट पर बैठे हुए ही संजू त्रिपाठी नाम के इस निगरानीशुदा बदमाश की मौत हो गई। कार के सामने जिला कांग्रेस महामंत्री की तख्ती लगी हुई थी, और इस मृतक ने अपने तीन-तीन फेसबुक अकाऊंट पर अपना यही पदनाम लिखकर रखा था। जब चारों तरफ खबरों में फैला कि सत्तारूढ़ पार्टी के जिला महामंत्री की इस तरह सडक़ पर हत्या हो गई, तो जिस रफ्तार से पुलिस ने हत्यारे की तलाश शुरू की होगी, उसी रफ्तार से उसने इस बात का खंडन जारी किया कि मृतक किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ था। यह बात अपने आपमें हैरान करती है कि पुलिस कैसे किसी राजनीतिक दल, या सभी राजनीतिक दलों की तरफ से कोई सफाई दे सकती है कि मरने वाला उनका सदस्य या पदाधिकारी नहीं था? लेकिन पुलिस को एक हत्या, और सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता की हत्या में ऐसा बड़ा फर्क दिख रहा था कि वह आनन-फानन प्रेसनोट जारी कर रही थी कि मरने वाला किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं था, मानो राजनीतिक दल से परे के किसी की हत्या हो जाना कम अहमियत की बात है।

पुलिस ने आनन-फानन इस मृतक पर दर्ज दर्जनों मामलों की जानकारी जारी की कि यह पुराना आदतन अपराधी था, और इस पर तरह-तरह के हथियारबंद जुर्म करने के मामले दर्ज थे। मामलों की यह लिस्ट 40 पेज लंबी थी, और यह जाहिर है कि यह पुलिस के पास पहले से तैयार थी। अब हैरानी की बात यह है कि अगर इतने अपराधों से जुड़ा हुआ एक आदतन अपराधी अपनी महंगी और बड़ी सी कार पर जिला कांग्रेस महामंत्री की तख्ती लगाकर चल रहा है, तो भी न यह कांग्रेस को दिक्कत की बात लग रही, और न ही पुलिस को। अब कम से कम इस मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक दलों को चौकन्ना हो जाना चाहिए कि उनकी पार्टी या पदों के नाम की तख्ती लगाकर घूमने वाले लोग कैसे हैं। इस मृतक के फेसबुक पेज पर उसके जितने तरह के पोस्टर दिख रहे हैं, उन पर भी कांग्रेस के पदाधिकारी होने का बड़ा साफ-साफ जिक्र है। तो क्या कांग्रेस पार्टी जनता से इतनी कट गई है कि गुंडे-मवाली उसके नाम का इस्तेमाल करें, उसके पदाधिकारी होने का दावा करें, और उसे पता भी न चले?
यह एक मामला इस बात का भी नमूना है कि यह आदमी पदाधिकारी सचमुच था या नहीं था, यह तो अलग बात है, लेकिन अपनी गाड़ी पर ऐसी तख्ती लगाकर घूमते हुए यह अपने अपराधों के लिए एक राजनीतिक आड़ तो इस्तेमाल कर ही रहा था। इसके ऊपर जिस तरह दर्जनों गंभीर मामले दर्ज हैं, वे अपने आपमें हैरान करते हैं कि इन सबके बावजूद यह आदमी बिलासपुर में खुलेआम घूम रहा था, और हर कुछ दिनों में कोई नया जुर्म कर भी रहा था। किसी शहर में ऐसी गुंडागर्दी करने वाले मुजरिम के खिलाफ तो सत्तारूढ़ पार्टी को खुद होकर भी कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन पार्टी से अपने युवक कांग्रेस के दिनों से जुड़ा हुआ यह मुजरिम डंके की चोट पर पार्टी का पदाधिकारी बना घूमते रहा, और किसी ने यह सिलसिला नहीं रोका।
छत्तीसगढ़ के शहर-कस्बों का यह आम हाल है कि यहां न सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी, बल्कि कोई दूसरे राजनीतिक दल, सामाजिक और धार्मिक संगठन, साम्प्रदायिक संगठन, सभी तरह की तख्तियां लगाकर लोग चलते हैं, और पुलिस किसी पर भी कार्रवाई करने से बचती है। ऐसा शक्तिप्रदर्शन पुलिस को धमकाने के लिए ही रहता है, और उसका असर यहां होते दिखता है। गाडिय़ों के लिए बने कानून में ऐसी तख्तियों पर तगड़े जुर्माने का इंतजाम है, लेकिन जुर्माना करने वाला पुलिस अमला इनसे सहमकर ही रहता है। ऐसे शक्तिप्रदर्शन का नतीजा यह होता है कि राजनीतिक दलों के पदाधिकारी गुंडागर्दी करने लगते हैं, और गुंडे राजनीतिक दलों के पदाधिकारी बनने की कोशिश करते रहते हैं ताकि उन्हें किसी भी कानूनी कार्रवाई का सामना न करना पड़े। यह सिलसिला पूरी तरह खत्म होना चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि सांसद और विधायक, जज और बड़े-छोटे अफसर, सभी लोगों को तख्तियां लगाकर गाडिय़ों का हॉर्सपावर बढ़ाने का शौक रहता है, और यह आदत संक्रामक रोग की तरह बाकी लोगों में फैलती रहती है। जिन राजनीतिक दलों के लोग ऐसी तख्तियां लगाकर सड़क़ों पर शक्तिप्रदर्शन करते हैं, उन्हें जनता की नाराजगी भी मिलती है, लेकिन चूंकि सभी छोटी-बड़ी पार्टियों के लोग इस मनमानी में एक जैसे जुटे हुए हैं, इसलिए चुनाव में नुकसान का किसी को पता नहीं लगता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और कल बिलासपुर में इस हत्या के बाद जिस तरह सत्तारूढ़ पार्टी से उसका रिश्ता न होने की बात कही जा रही है, तो सभी पार्टियों को ऐसी वारदात के पहले भी मुजरिमों से अपने रिश्तों, और अपनों से मुजरिमों के रिश्तों पर गौर कर लेना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दर्जनों रंगों में से एक तबके को दिखा महज भगवा रंग!

 14 दिसंबर 2022

  

अभी कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर बेशरम रंग के बारे में काफी कुछ लिखा जा रहा है। यह शाहरूख खान और दीपिका पादुकोण के अभिनय वाली फिल्म, पठान, का एक बड़ा ही मादक फिल्माया गया गाना है। जिन लोगों को खूबसूरत शरीर को उघड़ा देखकर हीनभावना होती है, वैसे तमाम औरत-मर्दों की भावनाओं को यह गाना गहरी चोट दे सकता है क्योंकि इसमें थोक में, दर्जनों के भाव से खूबसूरत जिस्म उत्तेजक हाव-भाव दिखाते नाचते हैं, और दीपिका और शाहरूख इन दोनों के बदन देखते ही बनते हैं। जैसा कि मादकता के किसी भी मामले में हो सकता है, लोगों की सोच उसे लेकर अलग-अलग हो सकती है। नग्न बदन कुछ लोगों को अश्लील लग सकते हैं, कुछ लोगों को इस तरह के मादक और उत्तेजक डांस आपत्तिजनक लग सकते हैं। लेकिन हमारा यह मानना यह है कि खूबसूरत और गठे हुए बदनों को देखकर लोगों को आपत्ति कम होती है, रश्क अधिक होता है, और इसी जलन से हीनभावना में आकर वे इसे अश्लील करार देने लगते हैं क्योंकि खुद ऐसी अश्लीलता दिखाने लायक बदन नहीं रखते।

लेकिन बेशरम रंग नाम के इस गाने को लेकर लोगों की आपत्ति देखने लायक है। इस नाच-गाने में दीपिका ने दर्जनों पोशाकें बदली होंगी, लेकिन लोगों को उसमें से एक पोशाक से खास परहेज दिख रहा है जो कि भगवा-केसरिया जैसे रंग की है। इस रंग की बिकिनी में दीपिका की खूबसूरती देखते ही बनती है, बदन कुछ अधिक ही झांकते दिखता है, और इन्हीं पलों में वह शाहरूख की बांहों में, उसकी पकड़ में दिखती है। किसी भी फिल्म में नायक और नायिका का किरदार करने वाले लोगों के बीच यह अंतरंगता देखने लायक है, और ऐसे लोग सौंदर्यबोध के मामले में एकदम कंगाल दिखते हैं जिनको इतने खूबसूरत बदन के इतने खूबसूरत हिस्सों के बजाय गिने-चुने छोटे से कपड़ों का रंग दिख रहा है! और दिलचस्प बात यह है कि इसे शाहरूख के मजहब से जोडक़र देखा जा रहा है, और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया ऐसी आ रही है कि मानो एक मुस्लिम ने एक हिन्दू का शोषण कर लिया है। ये दोनों कलाकार शादीशुदा हैं, दोनों परले दर्जे के कामयाब हैं, दोनों की जिंदगी विवादों से परे है, और एक फिल्म के किरदारों की शक्ल में इन्होंने जो किया है वह तारीफ के काबिल है। फिर भी शाहरूख के मुस्लिम होने से, और दीपिका पादुकोण के कुछ बरस पहले जेएनयू के आंदोलन में जाने की वजह से ये दोनों ही हिन्दुस्तान के दक्षिणपंथी साम्प्रदायिक आक्रामक हिन्दुत्ववादियों के निशाने पर रहे हैं। अब इस तबके की तमाम नफरत निकलकर सामने आ रही है कि मुसलमान अपनी औरतों को किस तरह ढांककर रखते हैं, और हिन्दू औरतों को किस तरह उघाडक़र दिखा रहे हैं। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर बॉलीवुड और इस फिल्म के बायकॉट का फतवा जारी हो गया है, जो कि हो सकता है कि फिल्म के निर्माता की तरफ से एक गढ़ी गई योजना भी हो। सोशल मीडिया इसे लेकर हिन्दू-मुस्लिम, ‘पवित्र भगवे रंग’ के अपमान जैसी बातें देख रहा है। दीपिका ने इस एक गाने में दर्जनभर से अधिक रंगों की अलग-अलग बिकिनियां पहनी होंगी, लेकिन जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम किए बिना डकार नहीं आती, अपच के शिकार ऐसे लोगों को उनमें से सिर्फ भगवा रंग दिखा। अब इसी हिन्दुत्व-सेना की सबसे पसंदीदा अभिनेत्री कंगना रनौत के भी तरह-तरह की पोशाकों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर मौजूद हैं, लेकिन वह अर्धनग्नता हिन्दुत्व को ठीक उसी तरह मंजूर है जिस तरह खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर मंजूर है। बस पठान नाम की फिल्म, और एक मुस्लिम अभिनेता की बांहों में एक हिन्दू अभिनेत्री को देखकर एकदम से भगवे रंग पर हमला शुरू हो गया। यह हिन्दू-मुस्लिम मामला नहीं रहता, तो हिन्दी और हिन्दुस्तानी फिल्मों में अनगिनत खलनायक भगवे कपड़ों में रहते आए हैं, और वैसे ही कपड़ों में बलात्कार भी करते आए हैं, उनमें से किसी से हिन्दू भावनाओं को कभी चोट नहीं पहुंची।

हैरानी यह है कि आज के हिन्दुस्तान के जिस हिन्दू राज को सैकड़ों बरस बाद आया हिन्दू राज कहा जा रहा है, उसी राज के चलते हिन्दुत्व सबसे अधिक खतरे में दिख रहा है। इसके पहले हिन्दुत्व कभी इतना नाजुक नहीं रहा, न ही इतने खतरे में रहा। आज हर कुछ घंटों में हिन्दू भावनाओं पर कोई न कोई हमला मान लिया जाता है, और हिन्दू देवी-देवताओं को भी इतना कमजोर करार दिया जा रहा है कि मानो वे अपनी और अपने धर्म की हिफाजत करने लायक नहीं रह गई है। जो तबका आज विश्वगुरू बनने पर आमादा है, जो आज की अपनी ताकत के सामने चीन को भी कुछ नहीं गिन रहा है, जिसे हिन्दुस्तान इन बरसों में सोने की चिडिय़ा बनते दिख रहा है, उन लोगों का हिन्दू धर्म आज इस कदर कमजोर हो गया है कि भगवे रंग की बिकिनी से उसकी बुनियाद हिलने लगी है। अब इनमें से कोई यह बताएंगे कि हिन्दुस्तान के इतिहास में जिन सुंदरियों और अप्सराओं का चित्रण किया गया है, क्या उनमें से किसी के भगवा-केसरिया पहनने पर रोक लगी रहती थी? और संस्कृत और हिन्दी के कितने ही श्रंृगार रस साहित्य में सुंदरी के सीने पर बंधने वाले छोटे से कपड़े या चोली का जिक्र होता था? जो साम्प्रदायिक ताकतें हरा रंग देखकर सांड की तरह भडक़ती हैं, वे अब भगवे-केसरिया रंग से भडक़ रही हैं, और दीपिका के पहने दर्जनों रंगों में से बेशरम रंग उन्हें सिर्फ भगवा-केसरिया दिख रहा है, यह कैसी गजब की हैरानी की बात है।

हो सकता है कि यह पूरा सिलसिला फिल्म की शोहरत बढ़ाने की तरकीब हो, और हिन्दुत्व के झंडाबरदार लोग ऐसी किसी बाजारू साजिश में भाड़े के भोंपू बनकर सोशल मीडिया पर अपने जख्म दिखा रहे हैं। आज देश में, देश के इतिहास की सबसे मजबूत हिन्दुत्व-सरकार है, फिर भी हिन्दुत्व पर इतने बड़े-बड़े जख्म दिखना हैरान करता है। फिलहाल हमारी सलाह यही है कि लोगों को शाहरूख और दीपिका के खूबसूरत और सेहतमंद बदन देखकर यह प्रेरणा पाना चाहिए कि फिट कैसे रहा जा सकता है, फिट रहने पर कितना अधिक खूबसूरत दिखा जा सकता है, और फिट रहने पर बदन कितने किस्म के उत्तेजक और मादक करतब कर सकता है। जख्मी हिन्दुत्ववादियों को किसी वैदिक मरहम की तलाश करने दें, और इस खूबसूरत गाने की उत्तेजना का मजा उठाएं, इसमें जिन लोगों को इसके सबसे उत्तेजक पलों में बदन पर कुछ इंच के कपड़ों का रंग दिख रहा है, उन्हें अपनी आंखों का इलाज कराना चाहिए, अपने सौंदर्यबोध का भी।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 14 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

कोटा कोचिंग कारखानों में एक दिन में तीन छात्रों की आत्महत्याओं से तो जागें!

 13 दिसंबर 2022

  

राजस्थान के कोटा में संपन्न बच्चों को ऊंची पढ़ाई के दाखिला इम्तिहान के लिए तैयार करने के कारखाने चलते हैं। इन कारखानों का हाल किसी औद्योगिक शहर के इंडस्ट्रियल एरिया जैसा है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट की ऊंची पढ़ाई के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले का इम्तिहान होता है, और उसके लिए तैयारी करवाते हुए तीन से लेकर पांच बरस तक इस शहर में बच्चों के तन-मन, दिल-दिमाग का तेल निकाल दिया जाता है। कोचिंग सेंटर हॉस्टल भी चलाते हैं, ऐसी स्कूलें भी चलाते हैं जहां अपने बच्चों को फर्जी हाजिरी देकर स्कूल की इम्तिहान भी साथ-साथ पास करा दी जाए। जिस तरह किसी हिन्दू तीर्थस्थान में पंडे पूजा-पाठ, पिंडदान से लेकर दूसरी कई किस्म की पूजाओं तक के सामान तैयार रखते हैं, जजमान को ठहरा भी देते हैं, उनका रिजर्वेशन भी करा देते हैं, ठीक उसी तरह राजस्थान के कोटा में कोचिंग उद्योग चलता है जो कि मां-बाप की हसरतों को पूरा करने का तीर्थस्थान सरीखा है, और यहां पर हर बरस जाने कितने ही बच्चे आत्महत्याएं करते हैं। अभी इस पर लिखने की जरूरत इसलिए हुई कि कल ही कोटा में कोचिंग पा रहे तीन अलग-अलग लडक़ों ने अलग-अलग आत्महत्याएं की हैं। एक दिन में तीन लाशों ने लोगों को कुछ दिनों के लिए हिलाया होगा, और इसके बाद हिन्दुस्तानी मां-बाप अपने बच्चों की जिंदगी हलाकान करने में लग जाएंगे। रोज फोन करके उनसे पढ़ाई, कोचिंग, और तैयारी पूछेंगे, और उन्हें याद दिलाते रहेंगे कि मां-बाप की हसरत पूरी करना अब उन्हीं के ऊपर है। नतीजा यह होता है कि कारखानों की फौलादी मशीनों में कच्चा माल डालकर फिनिश्ड प्रोडक्ट निकालने के अंदाज में जब बच्चों को झोंका जाता है, तो उनमें से कई लोग इस तनाव को नहीं झेल पाते। लोगों को यह भी याद होगा कि आईआईटी में दाखिला पा लेने के बाद भी हर बरस वहां कई छात्र आत्महत्याएं कर लेते हैं क्योंकि वे पढ़ाई के उस स्तर के दबाव को नहीं झेल पाते।

हिन्दुस्तान में छात्र-छात्राओं की आत्महत्या की जिम्मेदारी मोटेतौर पर मां-बाप की होती है जो कि अपनी हसरतों को औलाद की हकीकत बनाने पर उतारू रहती हैं। कई परिवारों में मां-बाप गोद में खेलते अपने बच्चों का भविष्य तय करने लगते हैं कि उनमें से कौन इंजीनियर बनेगा, और किसे सीए बनाया जाएगा। देश में कुल मिलाकर चार या पांच ऐसे कोर्स हैं जिनके लिए मां-बाप में दीवानगी भरी हुई है, और इनमें से भी मर्जी से किसी एक को छांटने की छूट बच्चों को नहीं मिलती है, उन्हें मां-बाप मार-मारकर उस सांचे में ढालना चाहते हैं जो कि उन्हें पसंद है। लोगों ने चीन की कई तस्वीरों को देखा होगा जिनमें नाशपाती जैसे फल पेड़ों पर लगे हुए ही प्लास्टिक के सांचों में बंद कर दिए जाते हैं, और वे वहां से बुद्ध प्रतिमा के आकार में ढलकर ही पकते हैं। आम हिन्दुस्तानी मां-बाप की हसरतों का हाल कुछ ऐसा ही रहता है। उन्हें इस बात की परवाह नहीं रहती कि दुनिया में आगे किस-किस तरह के पेशों की संभावनाएं हैं, उनके अपने बच्चों की दिलचस्पी क्या पढऩे में है। शायद ही ऐसे कोई मां-बाप होंगे जिन्होंने अपने बच्चों को दुनिया के हजारों किस्म के पेशों में से कुछ दर्जन से भी सामना करवाया हो, उनके लायक पढ़ाई की विविधता को बताया हो। लोग अपने पड़ोस और रिश्तेदार, दफ्तर और जान-पहचान के दूसरे लोगों की पसंद, और उनके बच्चों की कामयाबी की कहानियां सुनकर अपने बच्चों को इन गिनी-चुनी चार-छह किस्म की पढ़ाई में से अपनी पसंद की किसी एक में झोंक देने के लिए जान लगा देते हैं। यही वजह रहती है कि बचपन से मां-बाप की हसरतें सुनते हुए बच्चे इस तनाव में रहते हैं कि उन्हें मां-बाप के सपनों को पूरा करना है। और फिर इन सपनों के कारखाने में जब कच्चेमाल की तरह उन्हें भेजा जाता है, तो वे पारिवारिक सम्मान के चलते उन्हें मना भी नहीं कर पाते, कारखाने की फौलादी मशीनों के दबाव को झेल भी नहीं पाते, और उनकी कुंठा, उनके तनाव का अहसास भी परिवार और समाज को तब होता है जब उनका पोस्टमार्टम होता है। मरने के पहले कोई अवसाद, कोई निराशा, खबर नहीं बन पाते, और मौतें गिनती में उतनी अधिक नहीं रहतीं कि ऐसे इंडस्ट्रियल एरिया पर देश रोक लगा दे। जीते जी ही बच्चे मर जाते हैं, टूट जाते हैं, और जिंदगी में अपनी पसंद की किसी कामयाबी के लायक भी नहीं रह जाते।

हिन्दुस्तानी मां-बाप जिस तरह अपने बच्चों पर उनके जीवनसाथी थोपने के आदी हैं, ठीक उसी तरह वे अपने बच्चों पर अपनी पसंद की पढ़ाई थोपने के आदी हैं। बच्चों को कभी बड़ा होने ही नहीं दिया जाता, और उनकी संभावनाओं को कोई मौका नहीं दिया जाता। यह सिलसिला उस वक्त भी जारी रहता है जब शादी के बाद बच्चे मां-बाप के साथ रहने लगते हैं, उस वक्त भी बहुएं कौन से कपड़े पहनें, कब और कितने बच्चे पैदा करें, बाहर नौकरी करें या न करें, जैसे तमाम फैसले घर के बुजुर्ग लेते रहते हैं। सच तो यह है कि हिन्दुस्तानी बच्चे कभी बड़े हो ही नहीं पाते, उन्हें बोन्सई पेड़ों की तरह बौना ही रखा जाता है, और अनगिनत मां-बाप ऐसे हंै जो अपने बच्चों को बिना किसी काम किए हुए, बूढ़े हो जाने तक उनका बोझ उठाने को भी तैयार रहते हैं अगर वे बच्चे दूसरे देश-परदेस जाने के बजाय उनके साथ गांव-कस्बे में रहने को तैयार हों।

हिन्दुस्तानी मां-बाप की हसरत कभी पूरी होती ही नहीं है। वे ताकत रहने पर बच्चों के मन, और कभी-कभी तन को भी मरने देने के लिए कोटा भेज देते हैं। उन्हें अपनी पसंद के पेशे या कारोबार में झोंक देते हैं। उन्हें एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में, एक जिंदा इंसान के रूप में कभी आगे बढऩे ही नहीं देते। यह पूरा सिलसिला हिन्दुस्तान को एक औसत दर्जे का देश बनाकर छोड़ रहा है। यहां के गिने-चुने उच्च शिक्षा के संस्थानों को छोड़ दें, तो बाकी हिन्दुस्तान की पढ़ाई-लिखाई, और पेशों की खूबियां बहुत ही औसत दर्जे की हैं। जेएनयू जैसे किसी संस्थान में अगर विश्वस्तर की पढ़ाई हो रही है, तो उसे साम्प्रदायिक विचारधारा के बुलडोजर से गिरा देने पर बरसों से सरकार आमादा है। बड़ी तनख्वाह वाले चार-पांच पेशों की पढ़ाई से परे अगर सामाजिक विज्ञान और उससे जुड़े बहुत से दूसरे विषयों में जेएनयू की पढ़ाई होती है, तो देश की साम्प्रदायिक विचारधारा उसे बुढ़ापे तक करदाताओं के पैसों पर पलना कहती है। उत्कृष्ट पढ़ाई के लिए ऐसी हिकारत ने देश में पेशेवर पढ़ाई के अलावा दूसरे पाठ्यक्रमों के लिए कोई सम्मान भी नहीं छोड़ा है, और औसत मां-बाप इसी माहौल के झांसे में अपने बच्चों को गिने-चुने कोर्स में झोंकते हैं।

कोटा में कल की तीन आत्महत्याओं को लेकर देश की सरकारों को भी यह सोचना चाहिए कि किस तरह स्कूली पढ़ाई के बाद बच्चों के रूझान को आंकने का कोई इंतजाम होना चाहिए ताकि उनकी निजी पसंद और उनकी क्षमता का कोई व्यावहारिक मेल सामने रखा जा सके। बच्चों के सामने तरह-तरह के विकल्प रखे जाने चाहिए, और विविधता को जिंदा रखने की कोशिश करनी चाहिए, विविधता को भी, और बच्चों को भी। स्कूल के बाद कॉलेज में किस तरह की पढ़ाई करनी है, या पढ़ाई के अलावा कुछ और करना है, यह विचार-विमर्श और संभावना-दर्शन (मार्गदर्शन नहीं) का इंतजाम किया जाना चाहिए। जो बच्चे दाखिले की ऐसी तैयारियों से जिंदा निकल जाते हैं, और आईआईटी जैसी पढ़ाई से भी जिंदा निकल जाते हैं, उनमें से कितनों की खूबियां दम तोड़ चुकी रहती हैं, इसका अंदाज लगाना न आसान है न मुमकिन है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)