सनातन और मनुस्मृति पर खुलकर चर्चा की जरूरत

 17 सितंबर 2023

 

अभी चूंकि तमिलनाडु से सनातन धर्म को लेकर एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है, इसलिए सनातन धर्म को लेकर बहुत सी अलग-अलग बातें उठ रही हैं। आज 17 सितंबर को ही तमिलनाडु के एक सबसे बड़े समाज सुधारक रामास्वामी पेरियार का जन्मदिन पड़ता है, और इस मौके पर लिखने वालों ने उन्हें जाति व्यवस्था के खिलाफ देश का एक सबसे बड़ा क्रांतिकारी करार दिया है। हालांकि पेरियार की कुछ बातें लोकतंत्र के साथ मेल नहीं भी खाती हैं, और दलितों के लिए एक अलग राष्ट्र की उनकी मांग को अतिवादी भी लिखा गया है, लेकिन जाति, धर्म, और नस्ल के भेदभाव और उनके आधार पर शोषण को उन्होंने करीब से देखा था, भुगता था, और इसीलिए वे सामाजिक संघर्ष की उस ऊंचाई तक ले जा पाए थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के पाखंड के खिलाफ इसे छोड़ा, और एक नास्तिक की तरह धर्म, जाति, लिंग, प्रजाति और भाषा इन सबके भेदभाव के खिलाफ एक लड़ाई छेड़ी, जो कि उनके जाने के दशकों बाद भी आज भी जारी है। तमिलनाडु में दलितों और महिलाओं की हालत सुधारने में उनसे बड़ा योगदान किसी का नहीं रहा। 

उनकी सोच पर चलने वाली आज की डीएमके सरकार के लोगों ने जिस तरह सनातन धर्म को बीमारी के बराबर बताते हुए उसके उन्मूलन की बात कही है, उस धर्म को उसकी हिंसक बुराइयों के साथ समझने की जरूरत है। जब इस पर बहस हम देखते हैं, तो एक धार्मिक कट्टरता के साथ सनातन पर टिके रहने की जिद वाले बहुत से सवर्ण हिन्दू दिखते हैं, लेकिन इनमें दलित-आदिवासी हिन्दू बिल्कुल भी नहीं दिखते। जाहिर है कि हिन्दुओं के बीच सनातनी व्यवस्था से निकली हुई जो मनुवादी जाति व्यवस्था है, वह हिन्दू समाज को एक तबके की तरह नहीं रखती है, और यह जाति व्यवस्था एक वजह है कि हिन्दू कहे जाने वाले अलग-अलग जातियों के तबके सनातन शब्द और मनुवादी व्यवस्था को एक नजरिए से नहीं देख सकते। जूते का तल्ला, और उसके तले कुचले जाने वाला नंगा पैर, इन दोनों का नजरिया जूते के बारे में एक सरीखा नहीं हो सकता है। इसलिए जूते के ऊपर के बदन पर सिर चढ़ा जातीय अहंकार एक अलग सोच रखता है, और जूते के तल्ले के नीचे रखे जाने वाले दलित एक अलग सोच रखते हैं। 

ऐसे में कुछ लोगों ने याद दिलाया है कि इसी बरस बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने एक नया शोध कार्य शुरू किया है जिसका नाम है- आधुनिक भारतीय समाज में मनुस्मृति को लागू करने की प्रासंगिकता/प्रयोज्यता (एप्लीकेबिलिटी)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के धर्मशास्त्र-मीमांसा विभाग ने इसी साल फरवरी में एक इश्तहार जारी करके ऐसी रिसर्च के लिए लोगों से अर्जियां बुलवाई थीं। और इसे लेकर लोगों के मन में हैरानी भी हुई थी कि डॉ.बी.आर. अंबेडकर द्वारा मनुस्मृति जलाने के करीब सौ बरस बाद अब उसे लागू करने की संभावनाओं पर शोध करवाया जा रहा है! लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान के सनातनी लोगों के बीच हिन्दू धर्म के भीतर सवर्णों की पसंद की जो मनुवादी जाति व्यवस्था है, उसके तहत शूद्रों को पूरी जिंदगी सवर्णों की सेवा करनी है, अनपढ़ रहना है। इसके साथ-साथ यह मनुस्मृति महिलाओं के खिलाफ भयानक हिंसा की वकालत करती है। 

हिन्दुस्तान आज एक लोकतंत्र हो चुका है, उसके चाहे जिस किसी धार्मिक या सामाजिक ग्रंथ में अलोकतांत्रिक बातें लिखी गई हैं, उन्हें अब इतिहास का एक दस्तावेज मानकर लाइब्रेरी में रख देना चाहिए ताकि इस देश, धर्म, और समाज की हिंसा के इतिहास को आने वाली पीढिय़ां भी जान सकें, और ऐसी हिंसा के मुआवजे के रूप में लागू की गई आरक्षण की व्यवस्था को भी समझ सकें। लेकिन इतिहास के पन्ने से परे ऐसी हिंसा का कोई भविष्य न आज है, और न ही आने वाले कल में हैं। और तो और, अब तो आरएसएस के मौजूदा मुखिया मोहन भागवत ने भी खुलकर यह कहा है कि दो हजार बरस जिनके साथ बेइंसाफी हुई है, उन्हें अगर दो सौ बरस आरक्षण मिल जाए, तो उसमें बुराई क्या है, लोगों को उन्हें ऐसा हक देने में आपत्ति क्यों होनी चाहिए? 

अब जिन लोगों को सनातन शब्द की हिफाजत करना जरूरी लग रहा है, उन्हें सनातन या हिन्दू शब्द के साथ जुड़ी हुई बाकी व्यवस्थाओं की संवैधानिकता को भी देखना चाहिए कि आज उनमें से क्या-क्या कानूनी है। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि किस तरह मुस्लिम समाज की चली आ रही  धार्मिक व्यवस्थाओं को देश की मौजूदा मोदी सरकार ने बदला है, और उसे मंजूर भी कर लिया गया है। संवैधानिक लोकतंत्र एक बड़ी साफ-साफ व्यवस्था है जिसमें कानून से टकराव होने पर जातीय या धार्मिक व्यवस्था को किनारे होना पड़ेगा। कल तक शूद्रों के साथ जो बर्ताव किया जाता था, आज वह जारी भले हो, लेकिन अगर वह अदालत में साबित किया जा सकता है, तो फिर शूद्रों पर हिंसा करने वालों को कड़ी सजा मिलना ही मिलना है। इसलिए देश में संविधान लागू होने के बाद सनातन हो, हिन्दू हो, मुस्लिम हो, या कोई और धार्मिक व्यवस्था, सामाजिक रिवाज, इनको कानून के मुताबिक ही चलना होगा। आज किसी महिला के तथाकथित चाहने पर भी उसे सती नहीं बनाया जा सकता, वरना वहां मौजूद तमाम भीड़ के लिए जेल की कैद तय है। लोग अपने पुराने रीति-रिवाज का हवाला देकर बच्चों के बाल विवाह नहीं करवा सकते, वरना उसमें गिरफ्तारी तय है। 

ऐसे में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय या बीएचयू का यह शोधकार्य भयानक है, और यह मानो उसी किस्म का है कि कोई विश्वविद्यालय शोध करवाए कि भारतीय समाज में सतीप्रथा की क्या संभावनाएं हैं। मनुस्मृति एक इतिहास के पन्ने से परे अगर आज लागू करने की बात होती है, तो वह एक जुर्म रहेगी। इसे एक विश्वविद्यालय इस तरह बढ़ावा दे, यह उस विश्वविद्यालय के लिए शर्मिंदगी की बात है, और इस कलंक के कागज पर संबंधित विभाग के मुखिया प्रो.शंकर कुमार मिश्रा के दस्तखत हैं। अगर इस विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय की सोच होती, तो वहां से इस तरह के शोध के लिए अर्जियां न बुलवाई गई होतीं। 

अब जो लोग आजादी की पौन सदी पूरी होने पर भारी जोर-शोर से इसे हिन्दू धर्म से निकले एक शब्द, अमृत नाम से आजादी का अमृत महोत्सव करार दे रहे हैं, वे लोग मनुस्मृति को एक बार फिर महिमामंडित करके उस आजादी को खत्म करने का काम भी कर रहे हैं। शूद्रों को गुलामी की जंजीरों से बांधे हुए रखने की जो वकालत मनुस्मृति करती है, उसके महिमामंडन के साथ किसी आजादी का अमृत महोत्सव नहीं मनाया जा सकता। अगर इन दोनों को साथ-साथ चलना है तो यह भारत की आजादी के खिलाफ मनुवादी सवर्णों की हिंसक आजादी की जीत होगी। सिर्फ नारों से लोकतंत्र और संविधान को स्थापित नहीं किया जा सकता। इतिहास के अन्याय को मानने, और उसे खारिज किए बिना किसी संवैधानिक व्यवस्था की बात नहीं हो सकती। इसलिए तमिलनाडु में अभी उठ खड़े हुए एक विवाद को इस बरस की शुरूआत में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इस शोधकार्य से जोडक़र देखने की जरूरत है और चूंकि देश भर में सनातन धर्म या हिन्दू धर्म पर एक हमला साबित करने की कोशिश हो रही है, इसलिए इन विवादों के हर पहलुओं पर खुलकर सामाजिक चर्चा होनी चाहिए। इसी चर्चा से लोगों के छुपे हुए दांत और छुपे हुए नाखून सामने आ पाएंगे, और उनकी शिनाख्त हो सकेगी। 

(Daily Chhattisgarh)

भ्रष्टाचार और मनमानी से बनने जा रहा टॉवर क्या आसमान में छेद करेगा?

 17 सितंबर 2023  

  

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कांग्रेसी मेयर ने यह बताया है कि शहर के बीचोंबीच म्युनिसिपल की पुरानी बिल्डिंग की जगह पर 16 मंजिल इमारत बनाई जाएगी। यह इमारत कारोबारी होगी, और भी मनोरंजन के दूसरे कारोबार यहां चलेंगे। कहा गया है कि सौ करोड़ रूपए से ज्यादा की लागत से यह इमारत शहर के सबसे व्यस्त इलाके में बनाई जाएगी। यह इलाका आज इस कदर व्यस्त रहता है कि कहीं एक दुपहिया खड़ा करने की जगह नहीं रहती, और आसपास के चौराहे, सामने की सडक़ पर ट्रैफिक उफनते रहता है। दशकों से कई बार इस सडक़ पर गाडिय़ों को बंद करवाया गया, सडक़ के एक हिस्से में एक दिन और दूसरे हिस्से में दूसरे दिन ट्रैफिक किया गया, सौ तरह के प्रयोग करने के बाद भी यहां पर आना-जाना मुहाल रहता है। लेकिन चूंकि जगह म्युनिसिपल के पास है, इसलिए अब शहर के इस सबसे व्यस्त हिस्से में 16 मंजिल कारोबारी इमारत बनाने के लिए सौ करोड़ का कर्ज लेकर काम आगे बढ़ाने की योजना है। जाहिर है कि किसी भी तरह का कंस्ट्रक्शन नेता, अफसर, और ठेकेदार, सबको बहुत सुहाता है। 

हम ऐसे किसी एक मामले पर अधिक लिखना नहीं चाहते, क्योंकि अब सत्ता की पहुंच में जमीन का जो टुकड़ा है, उसके भयानक बाजारूकरण की बात आम हो गई है। ऐसे टेंडर, ऐसे ठेके, भयानक भ्रष्टाचार से भरे रहते हैं, और सत्ता को इससे ज्यादा कुछ पसंद नहीं आता। इसलिए न सिर्फ म्युनिसिपल, बल्कि सरकार के सभी विभाग और सभी निगम-मंडल, हर किसी में जमीनों के दोहन और शोषण का गलाकाट मुकाबला चलते रहता है, और हमने तो सरकार के ही दो हिस्सों में बाजारू संभावनाओं वाले जमीन के ऐसे टुकड़ों के लिए लड़ाई देखी है। 

लेकिन आर्थिक भ्रष्टाचार हमारी आज की बात का बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है, क्योंकि इस जमीन पर न सही, किसी और जमीन पर, म्युनिसिपल न सही कोई और, भ्रष्टाचार की गगनचुंबी इमारत तो खड़ी होकर रहेगी, और उसे कोई रोक नहीं पाएंगे। लेकिन इस जमीन को लेकर हमें यह फिक्र होती है कि क्या म्युनिसिपल और प्रदेश सरकार तमाम किस्म की कानूनी और सामाजिक जवाबदेही से परे हो चुकी हैं? इनकी नजरों में देश के कानून का, शहर की जरूरत का कोई भी सम्मान रह गया है या नहीं? शहर का सबसे व्यस्त इलाका जहां चारों तरफ कुछ किलोमीटर तक सिर्फ ट्रैफिक जाम रहता है, और शहर का सबसे बड़ा प्रदूषण जहां रहता है, वहां पर लाखों वर्गफीट का यह नया निर्माण बनाना किसकी जरूरत है? कम से कम इस शहर के फेंफड़े की जरूरत नहीं है, जनता की जरूरत नहीं है, और पैसों से लबालब भरे हुए, रात-दिन फिजूलखर्ची और बर्बादी करते हुए, तालाब पाटते, और मैदान काटते हुए म्युनिसिपल को तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। लेकिन इस योजना को एक गौरव की तरह पेश किया जा रहा है, और मीडिया के मन में इसे लेकर बुनियादी जिम्मेदारी के कोई सवाल भी नहीं हैं। 

किसी शहर में खुली हवा को बने रहने देना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, ऐसी कोई भी दैत्याकार फौलादी योजना सबसे पहले घने इलाके में सांस लेना और मुश्किल करेगी, लेकिन जब शहरीकरण के फैसले योजनाशास्त्रियों और विशेषज्ञों की जानकारी के बिना राजनेता करते हैं, और उन्हें मंजूरी उनके ऊपर बैठे हुए राजनेता देते हैं, तो सवाल उठता है कि इस देश में किसी भी विशेषज्ञता की क्या जरूरत है? हर प्रदेश में सत्तारूढ़ नेता, और निर्वाचित स्थानीय नेता अगर अपनी मर्जी से तमाम विशेषज्ञ फैसले ले सकते हैं, तो फिर स्वास्थ्य मंत्री को भी एमआरआई मशीन का इंतजार किए बिना अपने लैटरपैड पर कैंसर और दूसरी बीमारियों का इलाज लिखना चाहिए। शहर के सबसे घने इलाके में 16 मंजिल की यह निहायत गैरजरूरी इमारत भ्रष्टाचार, मनमानी, और शहर के फेंफड़ों में छेद करने वाली रहेगी, और चूंकि कोई जनसंगठन इस पर आवाज उठाने वाले नहीं हैं, और तकरीबन तमाम भ्रष्ट-निर्माणों पर चूंकि सत्ता और विपक्ष दोनों अघोषित रूप से भागीदार हो जाते हैं, इसलिए शहर के अब तक खाली बचे टुकड़ों का हिंसक बाजारूकरण एक आम बात हो गई है। हम छत्तीसगढ़ राज्य में इस एक राजधानी में ही कई दर्जन ऐसी खुली जगहों को देख रहे हैं, जिन्हें बिल्कुल खुला रखना जरूरी है, लेकिन उनके आसपास के इलाकों का पर्यावरण अध्ययन करवाए बिना भी उन पर दानवाकार योजनाएं बनाई जा रही हैं, और शहर की बेहतरी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जा रहा है।

मध्यप्रदेश के समय में हमने पढ़ा-सुना था कि इंदौर में कोई एक इंजीनियर या आर्किटेक्ट पति-पत्नी सरकार की जनविरोधी नीतियों और योजनाओं के खिलाफ आवाज उठाते थे। अब अधिकतर प्रदेशों में यह मुमकिन इसलिए नहीं रह गया है कि अधिकतर आर्किटेक्ट या इंजीनियर सरकारी योजनाओं से जुड़े रहते हैं, और ऐसी आवाज उठाना उनके लिए हितों का टकराव रहेगा। फिर भी हमारा यह मानना है कि जनता के बीच से कुछ लोग ऐसे निकल सकते हैं जो कि हाईकोर्ट जाकर ऐसी योजनाओं के खिलाफ पीआईएल लगाएं, और उस पीआईएल के लिए मजबूत जमीन तैयार करने को पहले से ऐसी योजनाओं वाली सरकारी संस्थाओं को नोटिस भेजना शुरू करें, सूचना के अधिकार में जानकारी मांगें, और उनमें खामियां निकालकर, उन्हें जनहित के खिलाफ साबित करते हुए अदालत जाएं। निर्वाचित कुर्सियों पर अच्छे या बुरे कैसे लोग पांच बरस के लिए आते हैं, और उन्हें किसी शहर या प्रदेश को हमेशा के लिए बर्बाद करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। छत्तीसगढ़ की इस राजधानी में राज्य सरकार का इंजीनियरिंग कॉलेज तो है ही, केन्द्र सरकार का एनआईटी भी है। हमारा यह भी मानना है कि बिना किसी राजनीतिक नीयत के सिर्फ छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों के ज्ञान और उनकी समझ के लिए इस शहर की तमाम सार्वजनिक खाली जगहों का एक अध्ययन होना चाहिए कि वहां शहर और समाज की भलाई में क्या बनना चाहिए, और क्या-क्या नहीं बनना चाहिए। वैसे तो राज्य सरकार अगर जिम्मेदार हो, तो उसे ऐसी किसी भी दैत्याकार और विनाशकारी सोच के पहले जानकारों से राय लेनी चाहिए। इस देश के आईआईटी और आईआईएम के लोग पूरी दुनिया में जाकर वहां की सबसे कामयाब कंपनियां चलाते हैं, लेकिन लगता है कि हिन्दुस्तान को उनकी विशेषज्ञता की कोई जरूरत नहीं है। छत्तीसगढ़ प्रदेश बनने के बाद से अब तक खनिज कमाई की वजह से इसमें जरूरत से ज्यादा पैसा रहा, और राजधानी बन गए इस शहर में जरूरत से अधिक भ्रष्ट योजनाएं बनती ही रहीं। अब यह समय आ गया है कि जागरूक लोगें के किसी जानकार संगठन को जिनका कि सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें सार्वजनिक हित के ऐसे मुद्दों पर सरकार के सामने विरोध दर्ज करना चाहिए, और फिर जैसी कि उम्मीद है, उसके अनसुने रहने पर अदालत जाना चाहिए। किसी भी शहर या प्रदेश के लोग अपनी आने वाली पीढिय़ों को दमघोंटने वाला धुआं विरासत में देकर जाएं, तो उन्हें 25-50 बरस बाद लिखे जाने वाले इतिहास में गैरजिम्मेदार मुजरिम ही लिखा जाएगा। जब लोगों के पास शिकायत करने और अदालत तक जाने का विकल्प है, तब तक सत्ता की ऐसी दानवाकार मनमानी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

एंकरों का बॉयकॉट पूरी तरह लोकतांत्रिक

 16 सितंबर 2023  

  

‘इंडिया’ गठबंधन के एंकर-बहिष्कार की खबर देश के मीडिया की सबसे बड़ी खबर है। इस पर कल हम अपने यूट्यूब चैनल पर खासा बोल चुके हैं, लेकिन अखबार पढऩे वाले लोगों के लिए इस पर लिखना भी जरूरी है। देश के टीवी-समाचार उद्योग ने इस विपक्षी बहिष्कार को लोकतंत्र पर हमला कहा है, और इसकी निंदा की है। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक की तरह टीवी-समाचार उद्योग को भी यह हक है कि वह अपना धंधा अपनी मर्जी से चलाए, और जब सरकार उस पर मेहरबान रहे, सरकार का चेहरा देखकर चलने वाला कारोबार उस पर मेहरबान रहे, तो फिर उसे विपक्ष की कोई फिक्र होनी भी क्यों चाहिए? आज ऐसा लगता है कि जिन 14 नामी-गिरामी (?) एंकरों का सार्वजनिक बहिष्कार किया गया है, वे एक तरफ तो विपक्ष के इस फैसले का विरोध करते हुए अपने आपको पत्रकार साबित करने में भी लग गए हैं, इसके अलावा सत्ता के साथ अपनी बातचीत में वे इसे अपनी शहादत का सुबूत भी बता रहे होंगे कि सत्ता का साथ देने की वजह से उनकी कुर्बानी दी जा रही है। टीवी-समाचारों के बहुत से लोगों को यह मलाल हो रहा होगा कि इस फेहरिस्त में उनका नाम नहीं है जबकि वे भी पूरी ताकत से नफरत फैलाने में लगे रहते हैं, वे भी आपस में और विपक्ष के दोस्तों से यह सवाल पूछ रहे होंगे कि उनकी तपस्या में क्या कमी रह गई थी? 

यह बहिष्कार इसलिए हुआ है कि ये कुख्यात एंकर लगातार नफरत की बातें फैला रहे थे, सरकार के पक्ष में, और विपक्ष को नीचा दिखाने के लिए एक एजेंडा चला रहे थे, पड़ोसी पाकिस्तान के साथ युद्धोन्माद का एक एजेंडा बढ़ा रहे थे, देश के भीतर अलग-अलग तबकों के बीच बहुत बुरी तरह टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे। इनका बहिष्कार काफी पहले से कर दिया जाना चाहिए था, पता नहीं राजनीतिक  दलों को इस फैसले पर पहुंचने में इतना वक्त क्यों लगा। दूसरी तरफ यह बड़ा और कड़ा फैसला ‘इंडिया’ की मजबूती की एक और परख रहा कि 26 पार्टियों ने यह फैसला लिया है। हमारे हिसाब से बिना गठबंधन बने भी ऐसे किसी मुद्दे पर विपक्ष को एक साथ होना चाहिए था क्योंकि देश के टीवी-समाचार मीडिया का जितना संगठित कार्यक्रम विपक्ष को नीचा दिखाने का चल रहा था, उसका एक अहिंसक विरोध पहले ही होना था। जो समाचार-टीवी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से 9 बरस में भी एक सवाल भी नहीं कर पाए, सत्ता से असुविधा के कोई सवाल करने की जिनकी हिम्मत नहीं है, वे सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के एक प्रकोष्ठ की तरह विपक्ष पर टूटे पड़े रहते हैं, इसलिए विपक्षी पार्टियों को पहले ही ऐसी संगठित साजिश का शिकार बनने से इंकार कर देना था। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इसी जगह लगातार यह बात लिखते आए हैं कि देश के अखबारों को अपने पुराने नाम, प्रेस, पर लौट जाना चाहिए, और देश की आज की मीडिया नाम की विशाल छतरी के नीचे से हट जाना चाहिए। अखबारों और टीवी-समाचारों का चरित्र बिल्कुल अलग है, काम के तौर-तरीके, रीति-नीति, परंपराएं, सब कुछ एकदम अलग है। ऐसे में सबको एक साथ मीडिया बुलाया जाना अखबारों की इज्जत के खिलाफ है जिनके बीच कुछ अखबार जरूर गोदी मीडिया का दर्जा पा चुके हैं, लेकिन अभी भी बहुत से अखबार ईमानदारी से निकलते हैं। अखबारों का मिजाज ऐसा है कि वहां ईमानदार बने रहने की संभावना कुछ हद तक तो चलती है। एक वक्त था जब अखबारों को प्रेस नाम से ही जाना जाता था, और आज फिर उसी चीज की पहल करनी चाहिए। कल टीवी-समाचार उद्योग के संगठन का जो बयान सामने आया, जिसमें विपक्ष के बहिष्कार के फैसले को अलोकतांत्रिक बताया गया, और चैनलों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ कहा गया, वह बयान अपने आपमें इस बात का सुबूत है कि टीवी-समाचार उद्योग जिस हद तक लोकतंत्र-विरोधी हो चुका है, साम्प्रदायिक हो चुका है, उसका एजेंडा जिस तरह युद्धोन्मादी है, उसने इनमें से किसी भी बात की परवाह नहीं की है, और न इनमें से किसी बात को माना है। ऐसे में जिस तरह देश के और कोई भी कारोबारी संगठन अपने लोगों को बचाने के लिए एकजुट रहते हैं, उसी तरह की एकजुटता टीवी-समाचार उद्योग में दिख रही है। इसका पत्रकारिता के किसी नीति-सिद्धांत से कोई लेना-देना नहीं है, और न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से। आज जब देश का सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह कह रहा है कि टीवी किस तरह एक तनाव खड़ा कर रहे हैं, बार-बार चेतावनी दे रहा है, तो उस पर ऐसे एसोसिएशन ने कुछ भी नहीं किया। आज जब दर्जन भर से अधिक लोगों के बहिष्कार का गांधीवादी फैसला लिया गया है, तो उसे टीवी-समाचार उद्योग ज्यादती करार दे रहा है। 

हमारा यह मानना है कि न सिर्फ टीवी, बल्कि अखबारों में भी, वेबसाइटों पर भी जो लोग लगातार और स्थाई रूप से बेईमानी करते हैं, उनसे बात करने से लोगों को मना करना चाहिए। ऐसा बहिष्कार किसी भी तरह से उन माध्यमों के किसी अधिकार के खिलाफ नहीं है, बल्कि लोगों के अपने अधिकारों के तहत लिया गया फैसला है। आज अगर कहीं पर कोई शराब पार्टी होती है, और किसी व्यक्ति को शराबियों के बीच बैठने से परहेज है, और वह उस न्यौते पर वहां जाने से इंकार कर देता है, तो यह शराबियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला नहीं है। ‘इंडिया’ गठबंधन ने न तो और लोगों से इन एंकरों की बहिष्कार की बात कही है, और न ही इन एंकरों के चैनलों का अभी बहिष्कार किया है। यह इन पार्टियों का बुनियादी हक है कि वे किन कार्यक्रमों में जाएं, और किनमें नहीं। कल के दिन वे कुछ चैनलों का भी बहिष्कार करते हैं, तो भी वह अलोकतांत्रिक नहीं होगा। हमारा तो यह मानना है कि देश में लगातार साम्प्रदायिक हिंसा भडक़ाने में लगे हुए कुछ ऐसे चैनल हैं जिनका पूरी तरह से बहिष्कार होना चाहिए, जो कि ‘इंडिया’ गठबंधन ने अभी नहीं किया है। ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने वाले चैनलों पर कोई भी कार्रवाई करना नहीं चाहती है, जबकि उसके कानून बहुत कड़े बने हुए हैं। ऐसे में लोगों की उम्मीद सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से हो सकती है कि वह सीधे-सीधे इन चैनलों के लाइसेंस कैंसल करे, इनके प्रसारण पर रोक लगाए, इनकी सम्पत्ति जब्त करके साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों के बीच बांटे। लोकतंत्र के तहत अगर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है, तो उसका मतलब उस स्वतंत्रता का इस्तेमाल लोकतंत्र को खत्म करना नहीं हो सकता। यह बात एकदम ही साफ रहनी चाहिए कि  इस तरह के जितने अधिकार हैं ये लोकतंत्र रहने तक ही हैं, और अगर इनका इस्तेमाल समाज में नफरत फैलाने में किया जा रहा है, देश की राजनीति में एक झूठा संतुलन दिखाने में किया जा रहा है, तो किसी गठबंधन से परे देश के कानून को भी इसका नोटिस लेना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

मुजरिमों के चुनाव लडऩे पर रोक सिर्फ कुछ बरस क्यों? ताउम्र क्यों नहीं?

 15 सितंबर 2023  

  

दोषी सांसदों और विधायकों के चुनाव लडऩे पर रोक की एक अपील पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है, और उसके नियुक्त किए गए न्यायमित्र वकील विजय हंसारिया ने कोर्ट को सुझाया है कि अदालत से सजा पाने पर सिर्फ एक सीमित समय के लिए चुनावी रोक को ताउम्र करना चाहिए। उन्होंने अदालत को कहा है कि चुनाव लडऩे की अयोग्यता को सीमित करने का कानून संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ है। अदालत में यह जनहित याचिका ऐसे बहुत से दूसरे मामले दायर करने वाले एक चर्चित वकील अश्वनी उपाध्याय ने लगाई हुई है, इस याचिका में एमपी-एमएलए के आपराधिक मुकदमों की जल्द सुनवाई की मांग भी की गई है। अदालत ने अपनी मदद के लिए एक सीनियर वकील विजय हंसारिया को न्यायमित्र बनाया है जो कि इस मामले में जजों को अपनी राय देते रहते हैं, उनके माध्यम से जजों को इस मुद्दे को बेहतर समझने में आसानी होती है। वे इस मामले में डेढ़ दर्जन से ज्यादा रिपोर्ट दे चुके हैं, और अभी उन्होंने देश भर में एमपी-एमएलए अदालतों में चल रहे मामलों का अध्ययन करके बताया है कि इन मामलों में होने वाली प्रगति की रिपोर्ट हर महीने हाईकोर्ट में जमा होनी चाहिए, और हाईकोर्ट यह निगरानी करें कि सुनवाई तेजी से हो। आज इस वक्त सुप्रीम में इस मामले की सुनवाई चल रही होगी, लेकिन हम अदालत के रूख को जाने बिना इस मुद्दे पर अपनी राय लिख रहे हैं। 

हिन्दुस्तान की राजनीति जुर्म से इस बुरी तरह लदी हुई है कि सांसदों-विधायकों के जुर्म पर अगर कोई कड़ी रोक लगाई जाए तो उसका समर्थन करना चाहिए। अब इस रोक को लगाते हुए यह भी याद रखना होगा कि कुछ लोगों को यह सांसदों और विधायकों के संवैधानिक या लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ लगेगा। हमारा यह मानना है कि भ्रष्टाचार या किसी संगीन जुर्म के मामलों में तो जिंदगी भर की रोक लगाने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन अगर किसी सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान कोई जुर्म दर्ज होता है, या कि राहुल गांधी किस्म के किसी मानहानि मामले में कोई सजा होती है, तो उसमें जिंदगी भर चुनाव लडऩे पर रोक जायज नहीं होगी। हत्या, बलात्कार, संगठित व्यापक भ्रष्टाचार, सरकारी ओहदे का बेजा इस्तेमाल, मनी लॉंड्रिंग जैसे मामलों में जिंदगी भर की रोक लगाना नाजायज नहीं होगा। अगर भारतीय लोकतंत्र से मुजरिमों को कम करना है, तो कड़ी कार्रवाई के बिना यह मुमकिन नहीं है। आज तो यह जाहिर तौर पर दिखता है कि जो बलात्कारी दिख रहे हैं, उनका भी देश की विधानसभाओं और संसद में सम्मान होता है, और वे आज भी एक सांसद के विशेषाधिकार भंग होने के हक के हकदार बने हुए हैं। 

संगीन जुर्म के मुजरिमों पर अगर जिंदगी भर चुनाव लडऩे पर रोक लगती है, तो उससे भी वे अपनी पार्टी के नेता तो बने ही रह सकते हैं। अभी तक ऐसी कोई कानूनी रोक नहीं है कि सजायाफ्ता लोग राजनीतिक दलों में न रहें। यह पार्टियों की अपनी पसंद है कि वे कितने मुजरिम अपने पर लादना चाहती है, अपनी गोद और अपने सिर पर बिठाना चाहती है। अभी इस समाचार को हम देख रहे हैं तो न्यायमित्र ने अदालत को बताया है कि बलात्कार, ड्रग्स, या आतंकी गतिविधियों या भ्रष्टाचार के मामलों में भी सजा होने पर चुनाव लडऩे पर रोक रिहाई के बाद कुल 6 साल के लिए है। ऐसे मामलों की शिनाख्त की जानी चाहिए, जुर्म की कुछ धाराओं को तय करना चाहिए, और गंभीरता के आधार पर इस रोक को आजीवन किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति के पास ऐसे संगीन जुर्म के बाद चुनाव लडऩे से परे और भी बहुत काम हो सकते हैं, और पार्टियों के पास भी अपने चहेते और पसंदीदा मुजरिमों के अलावा और बहुत से लोग चुनाव लडऩे लायक हो सकते हैं। हर पार्टी को अपने गैरमुजरिमों को मौका देना चाहिए, क्योंकि पार्टी के नेताओं और सदस्यों में से चुनाव लडऩे के मौके तो गिने-चुने लोगों को ही मिल पाते हैं। जिस व्यक्ति को एक बार कोई संगीन जुर्म करने की फुर्सत रहती है, उसे चुनाव न लड़ाकर कुछ और वक्त देना चाहिए ताकि वे लोग दूसरे काम कर सकें, और चाहें तो कोई और जुर्म भी कर सकें। इस बात को पार्टियों से परे मुजरिमों की निजी जिंदगी तक भी ले जाना चाहिए कि वे निर्दलीय उम्मीदवार होकर भी चुनाव न लड़ सकें। 

अभी अदालत में चल रही इस याचिका की सारी संभावनाएं हमें ठीक से नहीं मालूम है, लेकिन राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन के नियम भी ऐसे बनाने चाहिए कि ऐसे सजायाफ्ता लोग उसके ओहदों पर न रह सकें। अभी शायद ऐसी रोक नहीं है। सजायाफ्ता मुजरिमों पर रोक बढऩी चाहिए। और अगर वे आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो ऐसी सजा के बाद उन्हें संसद या विधानसभाओं से मिलने वाली पेंशन भी बंद होनी चाहिए, क्योंकि जुर्म की कमाई अगर उनकी बाकी जिंदगी के लिए काफी है, तो जनता का पैसा उन पर क्यों बर्बाद किया जाए। हमने देश के अलग-अलग हिस्सों से, खासकर उत्तर भारत से ऐसे गैंगस्टरों के मामले अभी देखे हैं जो अलग-अलग कई पार्टियों से चुनाव लडक़र संसद और विधानसभाओं में पहुंचते रहे। उनका जुर्म का साम्राज्य देखकर लगता है कि उन्हें मुम्बई में दाऊद के मुकाबले कोई गिरोह चलाना था। लेकिन ऐसे लोग अलग-अलग पार्टियों से अलग-अलग वक्त पर सांसद और विधायक बनते रहे हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। राजनीति का आपराधिकरण बढ़ते-बढ़ते अपराध का राजनीतिकरण हो चुका है। अधिकतर पार्टियों को अपने ताकतवर, जीतने वाले, और इलाकों में दबदबा रखने वाले मुजरिमों से कोई परहेज नहीं दिखता। इसलिए अदालत को ही दखल देकर चुनावी पात्रता, और पार्टियों में ओहदों पर रोक लगानी होगी। यह किस तरह के जुर्म पर किस सीमा तक लगे, यह आगे बहस के लायक है, और यह जाहिर भी है कि अदालत में तमाम पहलू सामने आएंगे, हमने तो आज इस मुद्दे पर सिर्फ अपनी मामूली समझ सामने रखी है, जो कि अब तक की जानकारी पर आधारित है।  

(Daily Chhattisgarh) 

भाषा की सेवा पर आमादा यह गजब का पाखंडी देश

 14 सितंबर 2023  

  

आज हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, और लोगों की भावनाएं सोशल मीडिया पर बिखर रही हैं। शायद स्कूल-कॉलेज में इस मौके पर हिन्दी के गुणगान के बहुत से कार्यक्रम होंगे, और अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने हिन्दी की सेवा, हिन्दी की महिमा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा जैसी शब्दावली के साथ छपे हैं। भाषा को लेकर साल में एक दिन भावनात्मक होने के बाद अगले दिन से अधिकतर लोग उस भाषा के मनचाहे इस्तेमाल में जुट जाते हैं जिनमें हो सकता है कि भाषा के गर्व के लायक कुछ न हो। सोशल मीडिया पर इसी हिन्दी का इस्तेमाल करके जब महिलाओं का चरित्र हनन किया जाता है, बलात्कार और कत्ल की धमकी दी जाती है, जब क्रिकेट खिलाडिय़ों के बच्चों से बलात्कार की बातें लिखी जाती हैं, जब साम्प्रदायिक नफरत के तमाम बुलबुले हिन्दी में ही बने रहते हैं, और उफनते रहते हैं, तो वह किसी भाषा के मूल्यांकन का अधिक सही मौका रहता है। हिन्दी की सेवा करने वाले लोग सेवा की बात करते हुए अमूमन सरकारी या किसी संस्था के मेवे पर नजर रखते दिखते हैं कि किसी कार्यक्रम में मौका मिल जाए, और भाषा की साख बाकी लोगों की हरकतों से चौपट होती रहती है। 

हिन्दी को मातृभाषा बताने वाले लोग इसकी कितनी सेवा करते हैं यह उन मौकों पर साबित होता है जब वे मां-बहन की गालियां इसी भाषा में देते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि आपकी मातृभाषा वही होती है जो कि आप सडक़ पर गाली बकने की हसरत रहने पर मन के भीतर, या कई बार जुबान से भी, दूसरों को देते हैं। किसी भाषा का गौरव इन दिनों दुनिया की सडक़ और उसका फुटपाथ बने हुए सोशल मीडिया पर तय होते चलता है जहां किसी भाषा में उसे भी सही न लिखने वाले लोग नफरत का सैलाब फैलाते चलते हैं। फिर भाषा का गौरव तय होने की कुछ और जगहें भी रहती हैं। जब कुछ नेताओं, अफसरों, शराब कारोबारी-समाजसेवियों, पत्रकारों के सम्मान और अभिनंदन में एक अनोखी शब्दावली का इस्तेमाल होता है। ऐसे-ऐसे विशेषणों का इस्तेमाल होता है जिन पर खुद सम्मान के पात्र को भरोसा न हो,  खुद उसे लगे कि यह तो कुछ ज्यादा ही हो रहा है, तो भाषा के वैसे इस्तेमाल से भी भाषा का सम्मान तय होता है। तथाकथित पढ़े-लिखे, और तथाकथित जागरूक लोगों की जुबान से जब समाज के कमजोर लोगों, महिलाओं, दलितों और आदिवासियों, आरक्षित वर्ग के लोगों, और वकील न कर पाने वाले जानवरों के लिए अपमान की बातें निकलती हैं, तो उससे भी उनकी भाषा का सम्मान तय होता है। 

इस तरह किसी भाषा का कोई दिन मनाना एक किस्म का पाखंड है, अगर उस भाषा के सम्मान और उसकी सेवा का दावा करने वाले लोग उस भाषा में चल रहे भाषा के अन्याय, और उस भाषा के हिंसक इस्तेमाल के खिलाफ आवाज न उठाएं। किसी भाषा में, सौ फीसदी शुद्धता के साथ मां-बहन की गाली दी जा सकती है, तो क्या उससे भाषा की शुद्धता का सम्मान बढ़ जाता है, किसी भाषा में दूसरी भाषा बोलने वाले लोगों को काटकर फेंक देने के फतवे दिए जा सकते हैं, और उनका व्याकरण सही भी हो सकता है, लेकिन क्या उससे भाषा का सम्मान बढ़ता है? ऐसे हजार सवाल हैं। हमारा यह देखा हुआ है कि हिन्दी भाषा में सैकड़ों बरस से चले आ रहे कहावत-मुहावरों में सामाजिक अन्याय भरा पड़ा है, हिंसा ही हिंसा है, घोर जातिवाद है जो कि मनुवाद के मुताबिक तय किया गया है, लेकिन इसके खिलाफ कोई सोच आंदोलन नहीं बन पाती हैं। आज भी जब लोग इसकी सेवा करने, और इसे मां बताने में लगे हुए हैं, तब भी भाषा को लेकर सामाजिक चेतना और जागरूकता पर कोई चर्चा नहीं होती। जब तक भाषा की हिंसा पर बात नहीं होगी, भाषा में गहरे बैठी हुई सामाजिक असमानता पर बात नहीं होगी, क्या भाषा का कोई सम्मान हो सकता है? ऐसे पढ़े-लिखे लोग भी भला किस काम के जो कि अपनी पसंदीदा भाषा की हिंसा को मानने, और फिर उसे हटाने में दिलचस्पी न रखते हों? ऐसे लोग नवरात्रि के नौ दिनों में देवीपूजा के बाद असल जिंदगी में कन्या भ्रूण हत्या करने वाले लोग सरीखे होते हैं। ऐसे लोगों से तो वे अनपढ़ लोग बेहतर हैं जिन पर किसी भाषा की हिंसा हटाने की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। अपने आपको भाषा का सेवक कहने वाले लोग, उस भाषा के प्रेमी, मातृभाषा की संतान बनने वाले लोग अगर उस भाषा में भरे हुए कलंक को हटाने में दिलचस्पी नहीं रखते, तो वे उस भाषा का कोई भला नहीं करते, वे सिर्फ एक सालाना पाखंड करते हैं। 

आज हिन्दुस्तान के तथाकथित हिन्दी प्रेमियों के बीच अंग्रेजी को लेकर सबसे अधिक चिढ़ या जलन दिखती है कि अदालत, सरकार, और उच्च शिक्षा से लेकर कारोबार तक अंग्रेजी का बोलबाला है। अब तो अंग्रेजों को कोसना बंद हो जाना चाहिए क्योंकि आजादी मिले पौन सदी हो चुकी है। इस दौरान अगर हिन्दी भाषा को चाहने वाले लोगों ने अपने आपको दुनिया के मुकाबले तैयार नहीं किया है, तो इसकी कोई तोहमत हिन्दी पर तो डाली नहीं जा सकती। हिन्दी का इस्तेमाल करने वाले लोग इसे बढ़ाने की बात को एक नारे की तरह तो लगाते हैं, लेकिन फिर पूरी दुनिया की संभावनाओं को देखते हुए अंग्रेजी की तरफ बढ़ जाते हैं। सत्ता चला रहे लोगों को यह मालूम है कि आज अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा अंग्रेजी है, कम्प्यूटरों पर काम, विज्ञान और टेक्नालॉजी की भाषा अंग्रेजी है। जिस तरह दुनिया के बहुत से गैरअंग्रेजी देश अपनी भाषाओं में हर काम करने लगे हैं, उस तरह का हिन्दुस्तान में मुमकिन इसलिए नहीं है कि हिन्दी इस देश की ही अकेली भाषा नहीं है। इस देश में हिन्दीभाषियों के मुकाबले गैरहिन्दीभाषी आबादी अधिक कामयाब है, वह कारोबार में, उच्च शिक्षा और विज्ञान में अधिक सफल है। बाहर की दुनिया में जाकर कामयाब होना भी हिन्दी वालों के मुकाबले गैरहिन्दी वालों के लिए अधिक आसान है क्योंकि उनके मन में अंग्रेजी के लिए वैसी कोई नफरत नहीं है जैसी कि बहुत से कट्टर हिन्दीप्रेमियों के मन में रहती है। नतीजा यह निकलता है कि हिन्दीभाषी लोग अपनी भाषा की सीमित संभावना को थामकर बैठे हैं, उसकी शुद्धता के लिए उतने ही कट्टर हुए बैठे हैं जैसी कट्टरता शुद्धता को लेकर हिटलर की थी, और इसीलिए दुनिया में ऐसे शुद्धतावादियों के लिए एक शब्द लिखा जाने लगा है, ग्रामर-नाज़ी। रक्त शुद्धता के दुराग्रही लोगों की तरह लोग भाषा शुद्धता पर भी उतारू रहते हैं, और उन्हें यह समझ ही नहीं पड़ता कि हर बरस दुनिया भर के अलग-अलग भाषाओं के हजारों शब्दों को अपनी डिक्शनरी में मिला लेने वाली अंग्रेजी कहां से कहां पहुंच गई है। 

आज अगर अंतरराष्ट्रीय संबंध और कारोबार, विज्ञान और टेक्नॉलॉजी, उच्च शिक्षा और राजनीति की भाषा अगर अंग्रेजी रह गई है, तो हिन्दी पर टिके रहने की जिद कई पीढिय़ों की संभावनाओं को खत्म कर चुकी है, और करती रहेगी। लोगों को भाषा की सेवा करने की जिद छोड़ देनी चाहिए, भाषा को किसी सेवा की जरूरत नहीं रहती। वह महज एक औजार रहती है, और उसमें लिखी किताब को अगर नोबल पुरस्कार मिलता है, तो उसका सम्मान बढ़ता है, और उसमें लिखी सोशल मीडिया पोस्ट पर अगर मां-बहन की गालियां लिखी जाती हैं, तो ऐसी मातृभाषा का भी सम्मान खत्म होता है। जिनको मातृभाषा की सेवा करने की जिद है, उन्हें अपनी भाषा से हिंसा और बेइंसाफी को खत्म करने के लिए सार्वजनिक रूप से, सोशल मीडिया पर खुलकर सामने आना होगा, वरना मातृभाषा को मां-बहन की गालियां पड़ती रहेंगी। 

(Daily Chhattisgarh) 

किसी समझौते के अंगने में नैतिकता का क्या काम है?

13 सितंबर 2023  

  

राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध इन्हें लेकर कोई भी भविष्यवाणी करना ठीक नहीं रहता। इन दोनों की अजीब खूबियां और खामियां रहती हैं, और हैरतअंगेज हमबिस्तर बनते रहते हैं। अब यह किसने सोचा था कि सोते-उठते जो बाल ठाकरे कांग्रेस को गालियां देते थे, उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन में सरकार बनाएगी। सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने के मुद्दे पर कांग्रेस छोडऩे वाले एनसीपी के नेता कांग्रेस के करीबी हो जाएंगे। ऐसे ही अभी जब अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन वियतनाम पहुंचे, और वियतनामी राष्ट्रपति वो वान थुओंग के साथ उन्होंने बड़े रणनीतिक समझौते पर दस्तखत किया तो लोगों को याद आया कि अमरीका के साथ सबसे लंबी जंग तो इसी वियतनाम की हुई थी, इसी वियतनाम को अमरीकी फौजों ने बरसों तक रौंदा था, उस दौरान वियतनाम चीन के करीब था, और आज अमरीका और वियतनाम का यह रणनीतिक समझौता एक किस्म से चीन की फौजी ताकत के मुकाबले खड़े किए जा रहे एक अमरीकी मोर्चे का हिस्सा है। आज की पीढ़ी को यह बात याद नहीं होगी कि किस तरह 1954 से 1975 तक वियतनाम पर अमरीकी हमला हुआ था और अमरीका ने इसे वियतनाम के उत्तर और दक्षिण हिस्सों के बीच जंग की तरह दिखाया था। वियतनामी जमीन पर इन दोनों हिस्सों के पीछे चीन और अमरीका थे। बीस बरस चली इस जंग के बाद वियतनामी समाज में एक ऐसी पूरी पीढ़ी ही खड़ी हो गई थी जो कि वियतनामी लड़कियों से अमरीकी सैनिकों के जबर्दस्ती या मर्जी के रिश्तों से पैदा हुई थी। लोगों को याद होगा कि वियतनाम युद्ध की वह भयानक तस्वीर अमरीकी नापाम बम के हमले से बिना कपड़ों के भागती हुई बच्ची की थी। लेकिन उन तमाम यादों से उबरकर आज अमरीका और वियतनाम के बीच यह ऐतिहासिक समझौता हुआ है। इसी तरह हिन्दुस्तानी राजनीति में कई ऐसे समझौते हो रहे हैं, होते रहते हैं जिन्हें कहने वाले अनैतिक कह सकते हैं, लेकिन वे सत्ता पर आने के लिए, सत्ता पर काबिज रहने के लिए किए जाते हैं, और उनके साथ किसी तरह की नैतिकता जुड़ी नहीं रह गई है। नैतिकता दरअसल भारतीय राजनीति, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जंजीरों से बांधकर पीछे के कमरे में कैद कर दी गई है। 

अमरीकी राष्ट्रपति अभी जी-20 सम्मेलन में दिल्ली आए, तो कई दिनों तक यह खबर रही कि वे भारत में मीडिया के सवालों का जवाब देना चाहते थे, लेकिन भारत सरकार ने इससे पूरी तरह असहमति जताई, और ऐसे सवाल-जवाब नहीं हो पाए। इसके तुरंत बाद यह खबर भी आई कि जो बाइडन वियतनाम पहुंचते ही मीडिया से बात करेंगे, जो कि किसी भी पश्चिमी या विकसित लोकतंत्र के लिए एक अनिवार्य बात सरीखी है। मीडिया से लगातार और बार-बार बात करना ही लोकतंत्र के जिंदा होने का पहला संकेत माना जाता है। भारत सरकार की तरफ से अमरीकी सरकार की कही गई बातों का कोई खंडन भी नहीं किया गया कि उसने जो बाइडन को मीडिया से बात करने से नहीं रोका था। ऐसे में यही माना जाना चाहिए कि खबरें सही थीं, और पहला मौका लगते ही हनोई पहुंचते ही उन्होंने मीडिया के सवालों का जवाब दिया जिनमें भारत में मीडिया की आजादी, और दूसरे कई किस्म की स्वतंत्रता के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इन मुद्दों पर बात की है, जैसी कि वे दुनिया में सभी जगह करते हैं। दूसरी तरफ अमरीका की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि उसने वियतनाम के दौरे के बाद जो बयान जारी किया है उसके 26 सौ शब्दों में कुल 112 शब्द वियतनाम में मानवाधिकारों के बारे में हैं। वियतनाम में मानवाधिकार का बुरा हाल बताया जाता है, और वहां सरकार के आलोचकों को धमकी, प्रताडऩा, और जेल तक का सामना करना पड़ता है। हर किस्म के मीडिया पर सरकार का काबू है, लेकिन जो बाइडन ने इस बारे में कुछ नहीं कहा। जाहिर तौर पर इसलिए कि वियतनाम से समझौते के बाद अमरीका चीन के एक सबसे करीबी रहे देश के साथ भागीदारी कर रहा है, और चीन के एकदम पड़ोस में भी पहुंच गया है। दुनिया के इस हिस्से में यह एक फौजी कामयाबी है, और इसे नैतिकता के किसी भी पैमाने की वजह से नहीं रोका जाता। 

हमने कुछ अरसा पहले यह लिखा भी था कि देशों के विदेश मंत्रालयों में बाहर एक तख्ती लगी रहती है कि नैतिकता बाहर छोडक़र आएं। वही होता भी है। जिस यूक्रेन को बड़ी उम्मीद थी कि जी-20 सम्मेलन में उस पर रूसी हमले के खिलाफ कोई मजबूत बात होगी, उसने अपनी निराशा जाहिर की है, लेकिन उस पर ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है। देश, जिनमें चीन से लेकर अमरीका तक शामिल हैं, उनमें से कोई भी अभी यूक्रेन के साथ जी-20 के बयान में नहीं थे। जबकि अमरीका नाटो के हिस्सेदार के रूप में रूस के खिलाफ हमलावर है, और चीन अंतरराष्ट्रीय मंच पर रूस का हिमायती माना जा रहा है। लेकिन जी-20 जैसे कोई भी दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन देशों के बीच की जमीनी हकीकत किसी भी नैतिकता को दूर रखती है। 

ठीक ऐसे ही भारत जैसे देश की राजनीति को देखें तो पार्टियों और नेताओं को अपनी नैतिकता, नीति और सिद्धांत, गठबंधन की बैठकों में बाहर रखकर आने के लिए कहा जाता है। कल के दुश्मन आज दोस्त हो जाते हैं, और आज के दोस्त कल दुश्मन। इसीलिए कुछ समझदार लोग कहते हैं कि नेताओं के कार्यकर्ताओं को आपसी रिश्ते बर्बाद नहीं करने चाहिए क्योंकि उनके बीच गठबंधन तो कभी भी हो जाते हैं, और कार्यकर्ता कटुता ढोते रह जाते हैं। भारत में आज इंडिया नाम के विपक्षी गठबंधन की सीटों पर तालमेल की पहली बैठक है। यहीं से इस गठबंधन की अग्निपरीक्षा शुरू होने जा रही है, क्योंकि बंदरगाह पर बंधे जहाज तो हर जगह महफूज दिखते हैं, जब समंदर की लहरों और तूफानों से उनका सामना होता है, तभी उनकी मजबूती पता लगती है। ‘इंडिया’ की मजबूती और उसकी संभावनाएं आज की इस बैठक के बाद ही परखना शुरू होगा, और आज से ही इस गठबंधन में दरार पडऩे का एक खतरा भी खड़ा हो सकता है। एक साथ बैठकर लंच और डिनर करना अलग बात होती है, उसमें तो कांग्रेस और केजरीवाल सब भाई-भाई दिखते रहे, आज जब चुनावी सीटों के बीच बंटवारे की बात आएगी, तो हो सकता है कि सुई की नोंक जितनी जमीन देने के बजाय महाभारत शुरू हो जाए। आगे-आगे देखें होता है क्या। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 सितंबर 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बड़े भ्रष्ट अफसरों को हासिल हिफाजत सुप्रीम कोर्ट से खत्म

12 सितंबर 2023  

  

सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला दिया है कि केंद्र सरकार के ज्वाइंट सेक्रेटरी या उसके ऊपर के अफसर के खिलाफ कोई जुर्म कायम करने या कार्रवाई करने के लिए उसे सरकार से कोई इजाजत लेने की जरूरत नहीं है। पहले सरकार में बैठे बड़े अफसरों ने अपने-आपको सीधी कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए इस तरह की व्यवस्था करवा रखी थी, और अभी आए इस फैसले में पांच जजों की बेंच ने यह साफ किया है कि 2003 में दिए गए ऐसे आदेश के बाद कार्रवाई से बचे हुए तमाम लोगों पर भी यह अदालती फैसला लागू होगा। इस तरह यह कड़ा फैसला न सिर्फ अफसरों से एक नाजायज हिफाजत छीन रहा है बल्कि सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों के हाथ मजबूत कर रहा है। अफसरों ने सरकार से अपने लिए ऐसी हिफाजत का नियम 2003 में करवा लिया था, वही रद्द कर दिया गया है। 

हम सिर्फ इस फैसले को लेकर लिखना नहीं चाह रहे हैं, बल्कि सरकारों के भीतर अपने पसंदीदा लोगों के भ्रष्टाचार को लेकर जिस तरह का व्यापक और मजबूत बर्दाश्त आम हो चला है, उसके खिलाफ लिखना चाह रहे हैं।  आज चारों तरफ केंद्र से लेकर प्रदेश सरकारों तक, और स्थानीय संस्थाओं से लेकर अद्र्धशासकीय संस्थाओं तक सत्ता के मन में अपने चहेते भ्रष्ट लोगों के लिए इतनी मोहब्बत है जितनी कि अनारकली के लिए सलीम के दिल में भी नहीं थी। जब हजारों में से दो-चार मामले उजागर हो ही जाते हैं, और संसद या विधानसभा में सरकार को मजबूरी में जांच के लिए हामी भरनी पड़ती है, या किसी अदालती आदेश से जांच करवानी पड़ती है, तो सरकारें अपने चहेते भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगाने पर आमादा दिखती हैं। यह जगह-जगह देखने में आता है कि जो पूरी तरह भ्रष्ट लोग हैं, उनको बचाने के लिए सरकारें जांच एजेंसियों के साथ मिलकर साजिश करती हैं, मामलों को कमजोर करती हैं, और भ्रष्ट अफसरों को ऊंची से ऊंची कुर्सियों पर बैठाती हैं, और उन्हें रिटायर होने के बाद भी तमाम नियमों को तोड़ते हुए फिर तरह-तरह से कुर्सी पर बनाए रखती है। केंद्र सरकार का काम करने का तरीका राज्यों से कुछ अलग रहता है, वहां पारदर्शिता और कम रहती है, और वहां नीतिगत फैसलों में चुनिंदा लोगों को फायदा पहुंचाने के काम उतनी जल्दी उजागर नहीं होते, जितनी जल्दी राज्यों में सामने आ जाते हैं। शायद भारत सरकार के काम में पारदर्शिता उतनी अधिक नहीं रहती है जितनी राज्यों में रहती है। अभी जिस दर्जे के अफसरों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, उन्होंने अपने-आपको आम सरकारी कर्मचारियों और अफसरों के ऊपर एक अलग दर्जा बनाकर उसमें हिफाजत से बिठा रखा था, यह सवर्ण किस्म की सोच भी इस फैसले से खत्म होती है।

हमारा तो अनुभव यह भी रहा है कि सरकार के परले दर्जे के संगठित भ्रष्टाचार की साजिश में शामिल मुजरिम अफसरों पर मुकदमे की नौबत जब आ भी जाती है, तब भी सरकार मुकदमे की इजाजत देने से कन्नी काटते रहती हैं, और भ्रष्ट अफसर की जिंदगी पहले खत्म हो जाती है, इजाजत तब तक नहीं आती। यह जनता के पैसों की लूट के अलावा और कुछ नहीं है। न तो सरकार से किसी जांच की इजाजत की जरूरत रहनी चाहिए, और न ही मुकदमा चलाने के लिए। आज ऐसे कई स्तरों पर मामलों को अटकाया जाता है, और सबसे भ्रष्ट लोग सबसे ताकतवर कुर्सियों पर बैठकर राज करते हैं। सुप्रीम कोर्ट का कल का यह फैसला चाहे भारत सरकार के संयुक्त सचिव और ऊपर के अफसरों को लेकर आया हो, लेकिन यह बात समझने की जरूरत है कि इस फैसले की भावना इसके शब्दों से ऊपर जाकर देश भर में सभी सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर लागू होती है, और देश भर की अदालतों को इस फैसले को समझना भी चाहिए जहां पर दसियों हजार सरकारी अधिकारी और कर्मचारी तरह-तरह की तकनीकी आड़ लेकर अपने खिलाफ कार्रवाई रूकवाकर बैठे हैं। चूंकि यह संविधान पीठ का फैसला है इसलिए इसे आसानी से चुनौती भी नहीं दी जा सकती, और यह खुद सुप्रीम कोर्ट के अब तक के छोटी बेंचों के दिए गए प्रतिकूल फैसलों पर भी लागू होगा। 

हमारा मानना है कि कई जगहों पर सत्तारूढ़ दल और विपक्ष इन दोनों की मेहरबानी भ्रष्ट लोगों पर रहती है, और दोनों की गिरोहबंदी भ्रष्ट अफसरों को बचाने में लग जाती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की संभावनाओं को देखकर देश के जनसंगठनों और आरटीआई एक्टिविस्ट को चाहिए कि अपने-अपने इलाके के भ्रष्ट लोगों पर सरकारी मेहरबानियों के खिलाफ सवाल करें, और जनहित याचिका के माध्यम से अदालतों का ध्यान खींचें। नेता और अफसर भारतीय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के लिए इस हद तक एक हो गए हैं कि उनकी भागीदारी को तोडऩा बड़ा मुश्किल है। फिर भी इस देश का इतिहास बताता है कि जब कभी कुछ ईमानदार लोगों ने कमरकसी है तो इस गठजोड़ को वे तोड़ भी पाए हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि देश के कई राज्यों में भ्रष्टाचार के मामलों में मुख्यमंत्रियों को भी हटना पड़ा है, और राजनारायण नाम के एक जिद्दी नेता की कोशिशों से इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध करार हुआ था। इसलिए लोगों को हौसला नहीं छोडऩा चाहिए, और भ्रष्टाचार के खिलाफ नेताओं और अफसरों की गिरोहबंदी के खिलाफ अदालतों का इस्तेमाल करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखकर उसकी व्यापक संभावनाओं को टटोलना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 11 सितंबर 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दान और मदद के लिए जेब नहीं, नीयत जरूरी

11 सितंबर 2023  

  

देश की एक सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी एलएंडटी के मुखिया अनिल मणिभाई नाइक इस कंपनी में 58 बरस काम करने के बाद अब 81 बरस की उम्र में यहां से हट रहे हैं। न तो यह कंपनी अधिक चर्चा में रहती, और न ही अनिल नाइक का नाम अधिक जाना हुआ है। लेकिन उनके बारे में कुछ बातें जानना हिन्दुस्तान के उन लोगों के लिए दिलचस्प हो सकता है जो किसी मामूली कामयाबी के बाद शान-शौकत की जिंदगी जीने लगते हैं। गुजरात में एक शिक्षक पिता के घर पैदा होने के बाद उन्होंने परिवार में गांधी के आदर्शों पर चलना सीखा। इंजीनियर बनने के बाद मुम्बई आकर लार्सन एंड टुब्रो कंपनी में काम करना शुरू किया। पिछले 21 बरस में उन्होंने एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली, हर दिन 15 घंटे काम किया। कुछ लोगों के लिए यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि उनके कार्यकाल में ही इस कंपनी का मार्केट कैप चार हजार करोड़ से बढक़र 4.1 लाख करोड़ रूपए हो गया। 670 रूपए महीने पर नौकरी शुरू करने वाले नाइक को अभी महज छुट्टियां न लेने के एवज में 19 करोड़ रूपए मिले हैं। अभी उनकी संपत्ति चार सौ करोड़ से ज्यादा है, और 2016 में उन्होंने अपनी 75 फीसदी संपत्ति दान दे दी थी। 2022 में 142 करोड़ रूपए दान दिए थे। और निजी जिंदगी की सादगी ऐसी है कि वे कंपनी की बोर्ड मीटिंग में भी टी-शर्ट पहनकर चले जाते हैं, उनके पास कुल आधा दर्जन शर्ट, 3 सूट, और दो जोड़ी जूते हैं। उन्होंने जिंदगी में कभी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल नहीं किया, और कोई डिजिटल भुगतान नहीं किया। अपने दादा और पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए वे अधिक से अधिक दान देने में भरोसा करते हैं। कंपनी में उनका उतना सम्मान है कि वे आने वाले कई बरस तक इस कंपनी के मझले दर्जे के लोगों के मार्गदर्शक और सलाहकार का काम करते रहेंगे। कारोबारी दुनिया में कंपनी की साख इतनी अच्छी है कि अनिल नाइक को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था। 

किसी कारोबारी के बारे में इस कॉलम में लिखने के अधिक मौके नहीं आते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में कई ऐसे बड़े कामयाब कारोबारी हैं जिन्होंने कानून तोड़े बिना बड़ी कमाई की है, और उसका बड़ा हिस्सा दान भी किया है। अनिल नाइक एलएंडटी में वेतनभोगी मुखिया रहे, और जाहिर है कि अडानी-अंबानी जैसे लोगों के मुकाबले वे दौलत के मामले में कुछ भी नहीं थे, लेकिन अपनी कुछ सौ करोड़ की जायदाद का एक तीन चौथाई हिस्सा दान में देकर उन्होंने एक नई मिसाल कायम की है। देश में कुछ और ऐसे उद्योगपति-कारोबारी रहे। एचसीएल के संस्थापक शिव नाडर ने 2022 में 1161 करोड़ रूपए दान दिए। विप्रो के अजीम प्रेमजी ने 484 करोड़ रूपए दान दिए। मुकेश अंबानी ने 411 करोड़ और कुमार मंगलम बिड़ला ने 242 करोड़ दान दिए। इसके बाद सुष्मिता और सुब्रत बागची (213 करोड़), राधा और एनएस पार्थ सारथी (213 करोड़), गौतम अडानी (190 करोड़), अनिल अग्रवाल (165 करोड़), नंदन निलेकेणि (159 करोड़), और अनिल नाइक (142 करोड़) दानदाताओं की टॉपटेन की लिस्ट में आते हैं। 

न सिर्फ अधिकांश संपत्ति को दान दे देना, बल्कि सादगी से जीना, यह एक बड़ी और अलग किस्म की मिसाल है। आज पैसे कमाने के मामले में अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, और धोनी अनिल नाइक के मुकाबले कई गुना बड़े होंगे, लेकिन उनका दान अमूमन सुनाई नहीं देता। अडानी और अंबानी का जितना बड़ा साम्राज्य है, उसके मुकाबले उनका दान भी ऊंट के मुंह में जीरे सरीखा है। ऐसे में अमरीका के कुछ उद्योगपतियों की याद आती है जिनमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स  और वारेन बफे जैसे लोग हैं जिन्होंने अपनी आधी संपत्ति दान करने की घोषणा की है, और उसे वे तरह-तरह की समाजसेवा में करते चल रहे हैं। बहुत से कामयाब कारोबारियों का यह मानना है कि दौलत कमाने का अपना एक मजा रहता है लेकिन एक सीमा के बाद उस दौलत को दूसरों में बांटने का एक मजा रहता है। अभी भारत में आर त्याग राजन की एक खबर सामने आई जिन्होंने श्रीराम फाइनेंस नाम से भारत के ट्रक-ट्रैक्टर, और दूसरी गाडिय़ां खरीदने वाले लोगों को बिना किसी गारंटी फाइनेंस करना शुरू किया था, और अब 86 बरस की उम्र में वे अपना घर और एक कार छोडक़र बाकी सारी कंपनी कर्मचारियों के बीच बांट दे रहे हैं। उन्होंने पूरी जिंदगी कमजोर तबके के लोगों को लोन दिया, और अब 6 हजार करोड़ से अधिक की कंपनी वे कर्मचारियों में बांट दे रहे हैं। गारंटी न दे पाने वाले छोटे लोगों को लोन देने का उनका तजुर्बा हमेशा अच्छा रहा, और उनकी कंपनी भी लगातार आगे बढ़ती चली गई। 1974 में शुरू यह कंपनी अपने क्षेत्र की एक सबसे कामयाब कंपनी है, और बहुत अमीर परिवार में बड़े होने के बाद भी वे वामपंथी-समाजवादी सोच के साथ छोटे लोगों को खतरा उठाकर लोन देने का कारोबार करते रहे। वे पूरी जिंदगी बड़ी सादगी से रहे, और अभी भी उनका कहना है कि उनके कोई अधिक खर्च नहीं है। वे एक छोटे से घर में रहते हैं, 6 लाख रूपए की मामूली कार में चलते हैं। वे एक मोबाइल फोन भी नहीं रखते। उनकी कंपनी में आज एक लाख से अधिक कर्मचारी हैं, और बिना गारंटी वाले लोगों को कारोबारी गाडिय़ों के लिए कर्ज देना जारी है, और श्रीराम समूह में अब 30 अलग-अलग कंपनियां हैं। 

इन कुछ मिसालों को सामने रखने का एक मतलब यह भी है कि जो लोग अंधाधुंध खर्च और शान-शौकत के पीछे भागते हैं, वे यह बात भी समझ लें कि जिंदगी में शान-शौकत का महत्व एक हद तक ही रहता है, और असल शान की बात सादगी में रहकर लोगों के काम आना है। जिन लोगों के पास दूसरों को दान करने लायक नहीं है, वे भी सादगी में रहकर दूसरों के कुछ न कुछ काम तो आ ही सकते हैं। दूसरी तरफ जिनके पास कुछ है, वे अनिल नाइक या अजीम प्रेमजी से अपनी तुलना किए बिना अपनी क्षमता से लोगों के काम आ सकते हैं। बात सोच की रहती है, आकार की नहीं। किसी जायदाद का आकार बहुत बड़ा हो, लेकिन दान की नीयत बहुत छोटी हो, और वह भी सिर्फ पीएम केयर्स जैसे फंड के लिए पैदा होती हो, तो फिर यह आज की यह बात उन लोगों के लिए नहीं है। यह बात उनके लिए है जो आज की अपनी सीमित क्षमता के बीच भी दूसरे जरूरतमंद लोगों की छोटी-छोटी मदद कर सकते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)