गाय और खूंटे की सोच के दिन गए, अब दुपहिया सोचें...
19 अगस्त 2025
छत्तीसगढ़ के रायपुर में पति की हत्या करने वाली एक महिला को अदालत ने उम्रकैद सुनाई है। मामूली घरेलू विवाद में उसने पति के सिर पर लोहे की रॉड से हमला कर दिया था, और मौके पर ही वह मर गया था। अब तीन बरस बाद पत्नी, मोतिम साहू को उम्रकैद हुई है। इससे परे देशभर में जगह-जगह अनगिनत ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें घरेलू हिंसा का यह एक अभूतपूर्व पहलू उभरकर दिख रहा है कि पत्नियां भी पति को मार रही हैं। और किसी विवाद के चलते हुए, तनाव के पल में उत्तेजना से मार दिया हो, ऐसा भी नहीं, कई पत्नियां अब सोच-समझकर साजिश बनाकर, प्रेमी, भूतपूर्व प्रेमी, या भावी प्रेमी के साथ मिलकर भी पति को निपटा रही हैं। इससे जितनी जरूरत पतियों के डरने की है, उससे अधिक जरूरत पतियों और बाकी परिवार, या समाज के सावधान होने की भी है। आज ही के अखबार में छत्तीसगढ़ की एक दूसरी खबर है कि एक बहू ने ऊपर की घटना की तरह ही, लोहे के रॉड से अपनी सास को निपटा दिया क्योंकि वह उसकी गालियों और तानों से थकी हुई थी। इसीलिए हम यह चाहते हैं कि पूरे के पूरे परिवार इस बदलती हुई स्थिति को समझें कि महिला अब ऐसी अबला नहीं रह गई है कि उसे तबला समझकर ठोक दिया जाए, अब वह जवाबी हमला भी कर सकती है। अगर समाज के समझने के लिए कुछ बुरी मिसालों से कम से काम नहीं चल सकता, तो फिर नीले ड्रम की मिसाल तो सबको याद रखनी ही चाहिए। एक मासूम सा नीला ड्रम, एक बड़ा प्रतीक बन गया है, इसे महिला सशक्तिकरण का प्रतीक तो हम नहीं मानते क्योंकि महिलाओं का सशक्तिकरण तो जिंदगी के अनगिनत अहिंसक दायरों में भी हो रहा है, और देश और दुनिया को उसका फायदा भी मिल रहा है। लेकिन आज महिलाएं तरह-तरह के प्रेम-त्रिकोणों में बराबरी से हिंसा कर रही हैं, जिनसे सभी को सावधान हो जाने की जरूरत है क्योंकि अभी तक उसे महज पिटने का सामान मान लिया गया था, अब वह पीट-पीटकर जिंदगी ले भी रही है।
हम अभी औरत और मर्द के बीच हिंसा के अनुपात को लेकर बात आगे बढ़ाना नहीं चाहते, क्योंकि वह एक अलग ही विश्लेषण और बहस का एक पूरा फैमिली साइज का मुद्दा है। अभी हम किसी भी किस्म की पारिवारिक, खासकर दांपत्य जीवन की हिंसा के बारे में चर्चा करना चाहते हैं कि अब पहले के मुकाबले यह बढ़ती क्यों चल रही है, और इससे निपटने के लिए, इसके समाधान के लिए क्या किया जाना चाहिए। समाज व्यवस्था, विवाह और परिवार व्यवस्था खत्म होने वाले नहीं है, ये तो बने ही रहेंगे, इसलिए इनके अस्तित्व पर आ रही आंच से बचाव के बारे में सोचना जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है कि दुनिया के बहुत से देशों में अब लोग कई अलग-अलग वजहों से विवाह व्यवस्था से परे जा रहे हैं। लोग अधेड़ हो जा रहे हैं, और न शादियां कर रहे हैं, न प्रेम-संबंधों में पड़ रहे हैं, बल्कि उन देशों की आबादी खतरे में पड़ रही है। इसलिए हम भारत जैसे समाज में दांपत्य जीवन पर पहले के मुकाबले अधिक मंडराते हुए खतरों पर चर्चा करना चाहते हैं। एक वक्त था जब भारतीय लडक़ी को मां-बाप दान में देकर किसी भी नालायक खूंटे से बांध देते थे, जो कि अब मुमकिन नहीं रह गया है। अब लड़कियां भी पढ़ी-लिखी हैं, कामकाजी हैं, और उनकी अपनी पसंद और चाहत भी है। अक्सर ही मां-बाप खूंटा खुद पसंद करते हैं, लेकिन बाद में उनकी गाय सरीखी लडक़ी अपनी चाहत के चलते, हिंसा और गालियों के खिलाफ उस खूंटे से रस्सी छुड़ाकर निकल भी जाती हैं। और ऊपर जिन दो घटनाओं का जिक्र हमने किया है, ऐसे परिवारों से निकलकर जेल जाने के पहले वह पति या सास को अपने सींगों से निपटाकर भी जाती हैं। इसलिए आज समाज में शादी के पहले के विचार-विमर्श और परामर्श की जरूरत पहले के मुकाबले बहुत अधिक है। अब गाय और खूंटे वाला युग जा चुका है, और अब दुपहिए और मोबाइल पर चलने वाली जींस और टी-शर्ट की लडक़ी का युग आ चुका है, जिसे बंधुवा मजदूर की तरह रखना मुमकिन नहीं है।
आज मुद्दे की बात यह है कि कुंडली मिलाने के बजाय दोनों परिवारों को लडक़े-लड़कियों की मेडिकल रिपोर्ट मिलानी चाहिए कि उनमें कोई ऐसी जेनेटिक समस्या तो नहीं है जो कि आगे जाकर अगली पीढ़ी को कोई गंभीर बीमारी दे जाए। दोनों परिवारों को एक-दूसरे के लडक़े-लडक़ी के बारे में मेडिकल स्थिति का पता रहना चाहिए। इसके अलावा समाज को आज ऐसे पेशेवर परामर्शदाताओं की जरूरत है जो कि अपनी पसंद से, या कि परिवार की पसंद से शादी करने की कगार पर खड़े हुए लडक़े-लडक़ी से बात करके यह अंदाज लगा सकें कि वे स्वर्ग से एक-दूसरे के लिए बनाकर भेजे गए हैं या नहीं, या कि वे एक-दूसरे की जिंदगी को नर्क बनाने की पूरी संभावना रखते हैं?
ऐसे परामर्श के बिना होने वाली शादियों में आज जगह-जगह खतरे भी आ रहे हैं, और अगर सतह पर आने वाले खतरों के बिना ऐसी शादियां अगर टिक रही हैं, तो वे भारी तनाव और कुंठाओं से लदी हुई चल रही हैं। ऐसे बहुत से परिवार विवाहेत्तर संबंधों का खतरा भी उठाते हैं, क्योंकि इश्तेहारों के ठीक उल्टे, ऐसी जोडिय़ां मेड फॉर ईच-अदर नहीं रहतीं। फिर यह भी है कि अब दुनिया में लडक़े-लडक़ी, औरत मर्द, इन सबका उठना-बैठना इतना अधिक रहता है कि लोगों के बीच विवाह से परे के रिश्ते बनने के खतरे, या संभावना, जिस भी नजरिए से देखें, वह पहले के मुकाबले कई गुना अधिक है। फिर अब तो सोशल मीडिया ने और संचार सुविधाओं ने इतनी संभावना पैदा कर दी है कि पाकिस्तान से एक सीमा चार बच्चों को लेकर बिना भारतीय वीजा के नेपाल के रास्ते दिल्ली आकर अपने गरीब ऑनलाइन-आशिक के घर पर डेरा डाल देती है, और हिंदुस्तान इसी बात पर कॉलर खड़ी करके घूमने लगता है कि एक पाकिस्तानी महिला, एक हिंदुस्तानी पर इस हद तक फिदा है। यह एक अलग लिखने का मुद्दा है कि भारतीय राष्ट्रीय गौरव कहां पर जाकर टिक गया है, लेकिन इस पर फिर कभी।
भारत में परंपरागत तरीके से शादियां तय करने के जो पैमाने हैं, वे पेनिसिलीन की तरह आउटडेटेड हो चुके हैं, और वे एक वक्त घरों में तार से जुड़े रहने वाले बड़े-बड़े काले टेलीफोन सरीखे हैं। आज जोडिय़ां बनाने की जरूरत स्मार्टफोन जैसे पैमाने मांगती है, और लोगों को पुराने अंदाज में नए रिश्ते तय करना बंद करना चाहिए। अगर भारतीय समाज में पारिवारिक माहौल ठीक रखना है, तो अब खूंटे और गाय की सोच खत्म करना होगा, अब औरत-मर्द को किसी गाड़ी के दो चक्कों की तरह, या कि जिंदगी के हल में जुते हुए दो प्राणियों की तरह बराबरी से रहना होगा। लेकिन हजारों बरस की मर्दाना सोच यह बराबरी मुमकिन नहीं करने देती। आज शादी के रिश्ते तय करने के पहले लोगों को एक बिल्कुल नए तरीके से, नई सोच के साथ विचार-विमर्श करना होगा, वरना नीला ड्रम नाहक ही बदनाम होते रहेगा।
लोकतंत्र से सरोकार हो तो योगेन्द्र यादव को सुनें
18 अगस्त 2025
भारत के चुनाव आयोग के तौर-तरीकों को लेकर पिछले कई महीनों से लोगों में बेचैनी बनी हुई है। विपक्षी राजनीतिक दलों से परे भी योगेन्द्र यादव सरीखे गैरचुनावी राजनीतिक कार्यकर्ता या लेखक-विचारक भी बहुत परेशान हैं, और सुप्रीम कोर्ट में खुद खड़े रहकर जिरह करने की जरूरत योगेन्द्र यादव को लगी है। दरअसल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के तौर-तरीकों से लेकर इन कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों के बर्ताव, उनके फैसले, और उनकी विपक्षविरोधी हमलावर सोच हैरान करती है कि क्या यह भारत सरकार का एक विभाग ही बन गया है? हमारे पाठकों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट के बिहार चुनाव को लेकर चुनाव आयोग को दिए गए आदेश के कुछ दिन पहले ही हमने इस अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर उन्हीं बातों को उठाया था जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग को साफ-साफ निर्देश दिए। 65 लाख लोगों के नाम बिना वजह बताए वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे, और वह लिस्ट भी डिजिटल फॉर्मेट में मुहैया कराने से चुनाव आयोग ने इंकार कर दिया था। हमने इस बारे में कहा था कि इस देश में जो आरटीआई कानून लागू है, वह नाम के लिए तो राईट टू इंफर्मेशन (सूचना का अधिकार) है, लेकिन संविधान की भावना के मुताबिक, लोकतंत्र की भावना के मुताबिक वह रिस्पांसबिलिटी टू इंफॉर्म (सूचना देने की जिम्मेदारी) है। चुनाव आयोग जाने किन वजहों से 65 लाख वोटरों के नाम हटाकर भी उस बारे में जानकारी देना नहीं चाहता था, सुप्रीम कोर्ट ने उसे यह देने पर मजबूर किया है।
कल चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस के बाद एक वीडियो में योगेन्द्र यादव ने जिस तरह अपने सदमे को बखान किया है, उसे हर जिम्मेदार लोकतांत्रिक नागरिक को सुनना और समझना चाहिए। चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट के बाहर, और सुप्रीम कोर्ट के भीतर भी, दोनों जगह एक पेशेवर गवाह की तरह धूर्तता की बातें करते आया है, और वह सुप्रीम कोर्ट में तकनीकी आड़ ले रहा था कि उसे हटाए गए नाम बताने की कोई कानूनी बंदिश नहीं है। लोकतंत्र में जनता के पैसों पर पलने वाली संवैधानिक संस्था जब जनता के बुनियादी हकों के खिलाफ इस तरह की लुका-छिपी खेलने पर उतारू हो जाती है, तो लोकतंत्र के बच पाने की संभावना घटती चलती है। राहुल गांधी के बयानों पर इस चुनाव आयोग के पल भर के भीतर ही जारी किए जाने वाले बयानों को देखें, तो लगता है कि वह कोई अतिसक्रिय राजनीतिक विरोधी है जो कि व्यापक महत्व के कुछ चुनावी-लोकतांत्रिक मुद्दों पर विचार करने के पहले भी उन्हें खारिज कर रहा है, और लोकसभा में विपक्ष के नेता की कही गई सार्वजनिक बातों पर विचार भी करने के पहले उन्हें माफी मांगने की चेतावनी दे रहा है।
हम केन्द्रीय चुनाव आयोग, या केन्द्रीय चुनाव आयुक्त के लिए देश में पिछले कुछ बरसों से इस्तेमाल किए जा रहे संक्षिप्त नाम, केंचुआ के इस्तेमाल से अपने को बचाकर चल रहे थे क्योंकि रेंगने इस प्राणी के लिए रीढ़ की हड्डी कहीं जरूरी नहीं है, और जानवरों की दुनिया में भी केंचुआ को कोई संवैधानिक विशेषाधिकार, सहूलियत, और सुरक्षा हासिल नहीं है। इसलिए प्रकृति ने जिसे अपनी व्यापक डिजाइन के तहत बिना रीढ़ का बनाया है, उसका इस्तेमाल कुछ इंसानों को कोसने के लिए करना ठीक नहीं है। इसलिए हमने केन्द्रीय चुनाव आयुक्त को कभी केंचुआ कहकर नहीं बुलाया है। लेकिन कल जिस तरह चुनावी राज्य बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव सहित वहां के गठबंधन-दलों की मतदाता अधिकार यात्रा शुरू होने के मौके पर चुनाव आयोग ने एक बेमौसमी प्रेस कांफ्रेंस की, वह पूरी तरह से एक राजनीतिक हरकत लग रही थी। और ऐसा भी नहीं कि लोग दो और दो चार की गिनती जानते नहीं हैं, लोगों ने पूरी तरह से यह समझ लिया कि प्रेस कांफ्रेंस के यह दिन और वक्त क्यों छांटे गए। फिर इस प्रेस कांफ्रेंस में आयोग से जितने सवाल किए गए, उनमें से किसी भी संवेदनशील सवाल का जवाब देने से चुनाव आयुक्त बचते रहे। कुछ सवालों को सीधे-सीधे छोडक़र आगे किसी और को सवाल करने कह दिया गया, और यह एक अनोखी प्रेस कांफ्रेंस रही जिसमें दिए तो जाने थे सवालों के जवाब, लेकिन अपने वक्तव्य से परे चुनाव आयोग सारे सवाल तैरते छोड़ गया। अगर जवाब ही नहीं देने थे, तो यह प्रेस कांफ्रेंस की क्यों गई थी? यह साफ जाहिर होता है कि बिहार में विपक्षी राजनीतिक यात्रा को देखते हुए विपक्ष के उठाए मुद्दों का वजन घटाने की एक कोशिश ही यह प्रेस कांफ्रेंस थी, और इसके अंत में कुल एक बात साबित हुई कि विपक्ष और कुछ पत्रकारों के सवाल इतने लाजवाब थे कि आयोग के पास उनका जवाब देने की कोशिश की गुंजाइश भी नहीं थी।
योगेन्द्र यादव ने अपने ताजा वीडियो में कहा है कि वे 40 बरस से चुनाव आयोग को देखते आ रहे हैं, और उन्होंने आज तक कभी भी इस आयोग को इतना कमजोर नहीं पाया था, और कल की प्रेस कांफ्रेंस में तो आयोग साफ-साफ झूठ बोल रहा था। उन्होंने बहुत लंबे बयान में झूठ के इस आरोप का खुलासा भी किया है, और हम इस कॉलम में उनकी पूरी बात लिख नहीं सकते, वह खासी लंबी है, और जिन लोगों को लोकतंत्र से सरोकार है, वे सोशल मीडिया पर उसे ढूंढ सकते हैं। फिलहाल तो चुनाव आयोग के अपने इस दशकों से चले आ रहे नीतिगत फैसले के बारे में सोचने की जरूरत है कि जिस राज्य में जिस बरस चुनाव होने वाले हैं, उस बरस मतदाता-सूची का व्यापक रिवीजन नहीं किया जाएगा। अभी बिहार में ऐसी कौन सी आग लगी हुई थी कि चुनाव आयोग को 65 लाख लोगों के नाम हटाने पड़े, और किनके नाम हटाए, यह डिजिटल फॉर्मेट से छुपाने भी पड़े! सुप्रीम कोर्ट के भीतर और बाहर, हर जगह चुनाव आयोग अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। ऐसे में लोगों को याद पड़ता है कि इस देश में टी.एन.शेषन नाम का एक चुनाव आयुक्त हुआ करता था जिसने एक इंटरव्यू में मजाकिया लहजे में कहा था कि वह सुबह के नाश्ते में राजनेताओं को खाता है। जहां तक हमारी जानकारी है, दुनिया के किसी भी देश में, किसी भी तबके में, केंचुओं को खाने का कोई चलन नहीं है। आखिर में चुनाव आयोग ने मुश्किल सवालों से बचने के लिए दौडक़र भारतमाता के पल्लू के पीछे छिपने की कोशिश की। पोलिंग बूथ के आखिरी के घंटों के वीडियो सार्वजनिक करने की मांग पर उसने कहा कि मां-बहन-बेटी के वीडियो देना क्या सही रहेगा?
जिन महिला वोटरों के वीडियो-फोटो खुद चुनाव आयोग जारी करता है, आयोग की इजाजत से मीडिया रात-दिन दिखाता है, उनसे भला महिलाओं की इज्जत को जोडऩा एक संवैधानिक संस्था को शोभा देता है?
अपूरित हसरतों के हिंसक कुंठाओं में बदलने से...
17 अगस्त 2025
छत्तीसगढ़ के बगल ओडिशा में कुछ बरस पहले एक शादी के तोहफे में पार्सल-बम भेजकर दूल्हे का कत्ल करने वाले एक भूतपूर्व कॉलेज प्रिंसिपल को अभी मई के महीने में उम्रकैद हुई है। 56 बरस के पुंजीलाल मेहर ने 26 बरस के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर को शादी के कुछ दिन बाद यह पार्सल भेजा था जिसे खोलते ही नवविवाहित नौजवान और उसकी चाची तुरंत मारे गए थे, और उसकी पत्नी बुरी तरह जख्मी हो गई थी। यह हमला पेशेवर जलन की वजह से किया गया था, और यह पार्सल छत्तीसगढ़ के रायपुर में बुक किया गया था। अब कल छत्तीसगढ़ में एक ऐसा दूसरा पार्सल बम पकड़ाया है जिसमें एक पति को रास्ते से हटाने के लिए उसकी पत्नी से एकतरफा मोहब्बत करने वाले एक नौजवान ने भयानक विस्फोटकों वाला बम बनाकर भेजा था। होम थियेटर के स्पीकर में विस्फोटक जिलेटिन और डेटोनेटर भरकर इसे तैयार किया गया था, और इसे बिजली से जोड़ते ही विस्फोट हुआ रहता, और अकल्पनीय धमाका और नुकसान होता। ऐसा बम बनाने और उसे भेजने में शामिल सात लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यह बम इंटरनेट पर तकनीक देखकर बनाया गया था, और इसके लिए एक खदान से बड़े ऊंचे दर्जे का विस्फोटक चुराया गया था। एक शादीशुदा मुस्लिम महिला की पत्नी से एकतरफा मोहब्बत करने वाले 20 बरस के विनय वर्मा ने यह साजिश रची, और परमेश्वर वर्मा, गोपाल वर्मा, घासीराम वर्मा, दिलीप ढीमर, गोपाल खेलवाड़, और खिलेश वर्मा इस साजिश में उसके साथ जुट गए। किसी महिला के पीछे लगकर उसके पति को मारने की ऐसी भयानक साजिश की भी पिछली कोई मिसाल याद नहीं पड़ती है, और एक सिरफिरे की मदद करने को इतने दूसरे लोगों ने अपनी-अपनी जिंदगियां इस तरह झोंक दीं, यह भी लोगों में एक बेमिसाल बेवकूफी का सुबूत है। लगता है कि रोज अखबारों में छपने वाले दर्जनों समाचारों से भी लोग सबक नहीं लेते हैं, और यह मान बैठते हैं कि विस्फोट की ऐसी भयानक साजिश पूरी हो जाने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पाएगी। यह तो गनीमत कि पार्सल मिलने पर ऐसे होम थियेटर सिस्टम के स्पीकर का सामान्य से बहुत अधिक वजन इस इलेक्ट्रिशियल पति को खटक गया, और जांच करने पर वह किसी खदान को उड़ा देने लायक विस्फोटक निकला, जाने कितनी जिंदगियां बच गईं।
इस मुद्दे पर लिखते हुए अलग-अलग कई पहलू सूझ रहे हैं। पहली बात तो यह कि एक शादीशुदा महिला से ऐसी एकतरफा मोहब्बत कई किस्म से जानलेवा और खूनी हो सकती है। दूसरी बात यह कि ऐसी नाजायज चाहत लोगों की अक्ल पर पूरी तरह से इतना मोटा पर्दा डाल सकती है कि वे ऐसी साजिश तैयार करें, और एक सिरफिरे तथाकथित आशिक के साथ उसके आधा दर्जन और दोस्त भी ऐसे फिल्मी कत्ल में भागीदार बनने को तैयार हो जाएं। आज जब हर छोटा-बड़ा जुर्म पकड़ में आ ही जाता है, तब इतनी बड़ी साजिश बनाकर कत्ल करने की कोशिश करने वाले को यह भी समझ नहीं आया कि जिस महिला से चाहत का दावा वह करता है, वह महिला भी तो ऐसे किसी बड़े विस्फोट में मारी जा सकती थी। फिर बचे आधा दर्जन लोग मानो किसी रोमांचक पर्यटन पर साथ जाने को तैयार हो गए हों, वे सब भी दस-बीस बरस जेल में काटने की हरकत में भागीदार हो गए! ऐसे लोगों को देखकर ही सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की यह बात सही लगती है कि 90 फीसदी हिन्दुस्तानी बेवकूफ होते हैं। अभी गिरफ्तार ये सातों लोग शर्तियां तौर पर इस 90 फीसदी में शामिल हैं, हालांकि आंकड़ों को 90 फीसदी तक पहुंचाने में लोगों का मतदाता का रूख भी काम आता होगा, और जाति-धर्म के नाम पर जुर्म करने का रूख भी।
खैर, हम आज की बात को इसी किस्म की एकतरफा मोहब्बत तक सीमित रखें, तो यह बात जाहिर है कि भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा तरह-तरह की कुंठाओं में जीता है। अधिकतर लोगों को अपनी पसंद के विपरीत सेक्स के लोगों के साथ उठने-बैठने, जीने-रहने का मौका नहीं मिलता, जबकि वे फिल्मों और टीवी में वैसी ही जिंदगी देख-देखकर उसकी हसरत पाल चुके रहते हैं। अपूरित हसरतें कुंठाओं में बदलती हैं, और कुंठाएं जाने कब हिंसा के बाड़े में दाखिल हो जाती हैं। इसलिए कई जगह इकतरफा मोहब्बत करने वाले तथाकथित आशिक निराश होने के बाद राह चलते उस लडक़ी या महिला को चाकू भोंक देते हैं, उसके चेहरे पर तेजाब फेंक देते हैं। इससे कुछ अहिंसक दर्जे के लोग सिर्फ अच्छे दिनों के फोटो-वीडियो को फैलाकर ही हिंसा को लगाम लगा देते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में जब अधिकतर आबादी को अपनी विपरीत सेक्स, या कि सेम-सेक्स की पसंद के साथ रहने का आसान मौका नहीं मिलता, तो उनकी कुंठाएं कई मामलों में हिंसा में तब्दील हो जाती हैं।
इसके अलावा एक और बात भारतीय समाज में है। खासकर हिन्दू समाज में, जहां पर कि विवाह को जन्म-जन्म का बंधन मान लिया जाता है, और हाल ही में हाईकोर्ट के जजों ने भी हिन्दू विवाह धारणा के इस पहलू को एक फैसले में लिखा था। ऐसे समाज में तलाक या किसी और तरह से अलग होना बहुत आसान नहीं रह जाता है, और लोग परिवार या समाज के दबाव में रिश्तों को भरी हुई बोरी की तरह बाकी जिंदगी ढोने के लिए मजबूर रहते हैं। ऐसे रिश्तों में भी, उनसे छुटकारा पाने के लिए पति, पत्नी, प्रेमी, और/या प्रेमिका के बीच किसी तरह के त्रिकोण में जान लेना या देना चलते ही रहता है। और फिर अगर रहस्य, रोमांच, और खूनखराबे से भरपूर ऐसी कहानी में मानो कोई कसर रह गई हो, ऐसा सिरफिरा और एकतरफा आशिक भी कहानी में एक बड़ा किरदार बनकर दाखिल हो जाता है, और एक पति को रास्ते से हटाने के लिए वह खासा खतरनाक विस्फोटक-विशेषज्ञ भी बन जाता है।
ऐसा लगता है कि 90 फीसदी से भी अधिक हिन्दुस्तानी परले दर्जे के मूरख रहते हैं, और वे यह मानकर चलते हैं कि पुलिस दुनिया की सबसे मूर्ख जांच एजेंसी है, जो कि उन तक पहुंच ही नहीं पाएगी। इनकी बजाय तो जो पेशेवर मुजरिम रहते हैं, वे और कुछ नहीं, तो सामान्य समझबूझ का इस्तेमाल तो करते ही हैं, और ऐसी बेवकूफी के जुर्म नहीं करते। जिस विस्फोट से खदान की चट्टानें चकनाचूर हो जाती हैं, वैसा विस्फोटक बनाकर इस साजिश संग उसे भेजना कि उससे पति मर जाए, और पत्नी अपने हाथ लग जाए, यह जस्टिस काटजू के निष्कर्ष का सबसे बड़ा आधार रहा होगा। खैर, मुजरिमों के बेवकूफ और मंदअक्ल होने का हमें अधिक अफसोस नहीं है, अगर वे बहुत ही धूर्त और अक्लमंद होते तो समाज के लिए वे अधिक बड़ा खतरा रहते, और पुलिस के लिए अधिक बड़ी चुनौती। यह तो अच्छा ही है कि वे उतने होशियार नहीं हैं, और इसीलिए ऐसे सात विस्फोटक-विशेषज्ञ अब एक-दो दिन में ही पुलिस की गिरफ्त में हैं। लोगों को अपने परिवार के, और आसपास के लोगों को इस घटना के ऐसे सबक बताने भी चाहिए कि जुर्म करके पुलिस से बच पाना केवल डॉन के लिए 11 मुल्कों में कुछ हद तक मुमकिन हो सकता है, बाकी सारे मुजरिमों को जस्टिस काटजू की पुलिस तेजी से गिरफ्तार कर ही लेती है।
कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ, रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ...
17 अगस्त 2025
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभी चार दिन पहले बहुमंजिली इमारतों में सांसदों के लिए बने हुए 184 फ्लैट्स का उद्घाटन किया है, और इनके वीडियो देखकर लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई हैं। दिल्ली जैसे एक सबसे महंगे महानगर के, एक सबसे महंगे रिहायशी इलाके में पांच-पांच हजार वर्गफीट के ऐसे एक-एक फ्लैट के फोटो-वीडियो देश की जनता को हक्का-बक्का कर रहे हैं। देश की एक फीसदी आबादी भी पांच हजार वर्गफीट के फ्लैट, या मकान में कभी पांव भी नहीं रख पाती। पांच-पांच बेडरूम, दो-दो दफ्तर, और इसी दर्जे की बाकी सहूलियतों वाली ऐसी ऑलीशान बसाहट में रहकर सांसद अपने इलाकों की समस्याओं के बारे में अधिक शांतचित्त से सोच पाएंगे। अब सांसद के अपने धर्मसंकट, और मानसिक विरोधाभास के बारे में भी सोचना चाहिए जिनके इलाकों में गांव-गांव में स्कूलों की कहीं छत गिर रही है, तो कहीं इमारत। कहीं पुल गिर रहे हैं, तो कहीं सडक़ बह जा रही है। कहीं तो बादल फटने से पूरे गांव बह गए हैं, तो कहीं सरकारी योजनाओं में आधा-आधा दर्जन आईएएस अफसरों की गिरफ्तारी से दहशत में आए बाकी अफसर काम ही करना नहीं चाहते हैं। ऐसे विकराल संसदीय क्षेत्रों से आए हुए सांसदों से भला यह उम्मीद तो नहीं की जाती कि वे नई दिल्ली स्टेशन के भीड़भरे प्लेटफॉर्म पर धक्के खाते हुए शांतचित्त से सोच-विचार कर पाएंगे। इसके लिए पांच हजार वर्गफीट का एकदम ही आलीशान दर्जे का फ्लैट जरूरी है जिसके भीतर भी हो सकता है कि चक्कों वाले पहिए वाले स्केट्स पर आवाजाही होती होगी।
कुछ सांसदों से पूछने पर पता लगा कि दिल्ली में सांसदों के लिए विशेष आवास योजनाएं दशकों से चली आ रही हैं, पहले दो या तीन बेडरूम वाले फ्लैट बने थे, फिर तीन या चार बेडरूम वाले, और अब ताजा उद्घाटन पांच बेडरूम वाले फ्लैट्स की इमारतों का हुआ है जिनके नाम देश की नदियों के नाम पर कृष्णा, गोदावरी, कोसी, और हुगली रखे गए हैं। करीब 45 बरस पहले दिल्ली में रायपुर के गांधीवादी-सर्वोदयी सांसद केयूर भूषण के मकान में रहने का मौका कुछ हफ्तों के लिए मुझे भी मिला था। उस वक्त वे मकान साधारण थे, लेकिन करीब आधी सदी पहले का तो वह सभी कुछ साधारण था। अब देश के अलग-अलग हिस्सों में जिस तरह गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है, तब वे सडक़ और एम्बुलेंस तक पहुंच पा रही हैं, अधिकतर हिस्सों में इलाज की कमी है, और पढ़ाई के साधन सीमित या कमजोर हैं। आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने अभी हफ्ते भर पहले ही एक सार्वजनिक कार्यक्रम में इस बात पर बड़ा अफसोस जाहिर किया है, कि लोगों को जिन दो चीजों की सबसे अधिक जरूरत रहती है, वह पढ़ाई और इलाज दोनों ही लोगों की पहुंच के बाहर हैं। ऐसे में सांसदों के ये नए फ्लैट, उनके मतदाताओं को कैसे लगेंगे, इसका अंदाज लगा पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है।
दुनिया के कुछ दूसरे देशों के बारे में पढऩे की कोशिश की, तो पता लगा कि ब्रिटेन में सांसदों को संसद के पास बड़े छोटे-छोटे फ्लैट दिए जाते हैं, या किराया भत्ता दिया जाता है। दुनिया के सबसे संपन्न माने जाने वाले महादेश अमरीका की राजधानी वाशिंगटन डी सी में सांसदों के लिए कोई फ्लैट नहीं है, और न ही उन्हें कोई किराया भत्ता मिलता। वे दूसरे सांसदों के साथ किराए के कुछ साझा कमरों में रह लेते हैं, या अपने दफ्तर में ही सो जाते हैं। कुछ के बारे में कहा जाता है कि वे कार में भी रात गुजार लेते हैं। फ्रांस में सांसदों को पेरिस में रहने के लिए भत्ता दिया जाता है, लेकिन कोई सरकारी मकान नहीं मिलता। जर्मनी में सांसदों को सिर्फ किराया भत्ता मिलता है, और वे खुद मकान ढूंढते हैं। इन तमाम देशों के मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति आय मूंगफली के छिलकों सरीखी है। अमरीका में प्रति व्यक्ति आय करीब 80 हजार डॉलर सालाना है, और सांसद की तनख्वाह इससे करीब दोगुना है। ब्रिटेन में प्रति व्यक्ति आय करीब 52 हजार डॉलर है, और सांसद का सालाना वेतन सवा लाख डॉलर से कुछ कम, यानी करीब 2.3 गुना। अब भारत को एक नजर देखें? यहां प्रति व्यक्ति आय 27 सौ डॉलर है, और सांसद के सालाना वेतन-भत्ते, और सहूलियतें करीब 50-60 हजार डॉलर! आम जनता के मुकाबले सांसद पर 20 गुना से अधिक औसत खर्च! चैटजीपीटी की मदद से अलग-अलग देशों में प्रति व्यक्ति आय, और वहां के सांसदों के वेतन-भत्तों के अनुपात को देखने पर बड़ी दिलचस्प तस्वीर बन रही है। ब्रिटेन में नेता जनता से 2.3 गुना अधिक पाते हैं, अमरीका में भी ठीक यही अनुपात है। कनाडा में 3.4 गुना, और जापान में भी 4 गुना तक ही सीमित है। यूक्रेन में 1.5 गुना, तुर्की में 3.7 गुना, और पाकिस्तान में करीब 15 गुना। भारत में जनता की औसत आय के मुकाबले सांसद की तनख्वाह 17-18 गुना, भत्तों सहित मिलाने पर 20 गुना, और सारी सहूलियतों को गिनने पर भारतीय सांसद भारत की जनता की औसत कमाई से 68 गुना अधिक महंगे पड़ रहे हैं।
फिर भारत में यह बात भी समझने की जरूरत है कि देश की राजधानी में बंगले या मकान से परे, अपने प्रदेश की राजधानी, या अपने चुनाव क्षेत्र में सांसद अलग से मकान-बंगले रखते हैं। इन सबकी लागत पता नहीं 68 गुना में शामिल है, या फिर उससे बाहर है। कोई हैरानी नहीं है कि कई पार्टियां लोगों को सांसद बनाने के लिए दर्जनों करोड़ रूपए लेने की चर्चाओं से घिरी रहती हैं। भारत में नेताओं, खासकर निर्वाचित या मनोनीत सांसदों और विधायकों के शान-शौकत देखकर शायर अकबर इलाहाबादी का यह शेर याद पड़ता है- कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ, रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ।
हर हाथ साइबर औजार, और जुर्म की सुनामी का हमला...
16 अगस्त 2025
बच्चों से लेकर अधेड़ लोगों तक की जिंदगी मेें मोबाइल फोन की दखल जितनी बढ़ गई है, उसके खतरे अभी कम से कम भारत जैसे देश में न सरकार समझ रही है, और न ही समाज। और जब समाज में कोई चलन बढ़ निकलता है, तो एक के देखादेखी दूसरे के हाथ में भी मोबाइल फोन आ जाता है, और कई तरह की गतिविधियां भी एक-दूसरे को देखते हुए बढऩे लगती हैं। इनमें मोबाइल गेम खेलना सबसे अधिक खतरनाक है, लेकिन बहुत छोटे बच्चे जो कि कोई गेम खेल नहीं पाते, वे भी कार्टून फिल्म या कोई और फिल्म देखे बिना खाना नहीं खाते। बच्चे किशोरावस्था में पहुंचने तक परिवार के किसी मोबाइल फोन पर पोर्नो फिल्म देखना शुरू कर देते हैं, या उनके पास अपने फोन आ जाते हैं, और अब तो हाल यह है कि पोर्नो फिल्मों के कुछ खास एक्टर-एक्ट्रेस किशोर-किशोरियों के पसंदीदा कलाकार बनने लगे हैं, और इस बारे में कहीं-कहीं पर चर्चा भी इंटरनेट पर दर्ज हो रही है। इससे परे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर लोगों के जो भावनात्मक रिश्ते बन रहे हैं, वे असल जिंदगी के रिश्तों को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। और इन सबसे ऊपर एक और खतरा इन दिनों मंडरा रहा है, कई तरह के साइबर-मुजरिम स्मार्टफोन के रास्ते लोगों की जिंदगी में घुस रहे हैं, उन्हें ठग या लूट रहे हैं, उन्हें साइबर-सेक्स के जाल में फंसा रहे हैं, और ब्लैकमेल कर रहे हैं। भारत के बाहर के नंबरों से काम करने वाले, और कर्ज देने वाले सैकड़ों एप्लीकेशन भारत सरकार अब तक बंद कर चुकी है, और हजारों नए एप्लीकेशन रात-दिन लोगों को ऐसी शर्तों पर कर्ज देते हैं कि उनके पूरे फोन हैक कर लेते हैं, और कर्ज से दस गुना वसूली के बाद भी उन्हें ब्लैकमेल करना जारी रहता है। आज म्यांमार और कम्बोडिया जैसे देशों में बंधुआ कर्मचारियों को कैद करके हजार-हजार लोगों के कॉल सेंटर चलाए जा रहे हैं, जिनका काम भारत के लोगों को लूटने के अलावा और कुछ नहीं है।
स्मार्टफोन के हिमायती लोग उसके हजार किस्म के फायदे भी गिना सकते हैं, जो कि हम खुद भी इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जैसा कि किसी भी दुधारी तलवार के साथ होता है, उससे आप दूसरे सामान भी काट सकते हैं, और साथ-साथ आपका हाथ कटने का खतरा भी रहता है। इसी तरह स्मार्टफोन की लत, और उसके बाद उसके मार्फत मुजरिमों के तरह-तरह के जाल में फंसने का सिलसिला लोगों को बुरी तरह डुबा दे रहा है। दूसरे किसी भी आधुनिक तकनीक के औजार की तरह स्मार्टफोन भी एक औजार ही है, और इंटरनेट भी, लेकिन जब तक इनके इस्तेमाल के साथ जिम्मेदारी लोग समझेंगे, तब तक वे अपने दिल-दिमाग, और परिवार के रूपए-पैसे सबको बहुत तबाह कर चुके रहेंगे। इसलिए हम हर कुछ दिनों में इस मुद्दे के अलग-अलग पहलुओं पर लिखते भी हैं, और अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर बोलते भी हैं।
अभी पिछले ही हफ्ते हमने छत्तीसगढ़ में राखी पर घर आई बहन के देर रात तक मोबाइल देखने वाले भाई को रोकने पर इसी जगह लिखा था, और उस छोटे भाई ने मायके लौटी बड़ी बहन का कत्ल ही कर दिया था। मानो वह घटना काफी नहीं थी तो उसके बाद छत्तीसगढ़ के ही बलौदाबाजार में एक नाबालिग स्कूली छात्रा ने मोबाइल पर अधिक समय बर्बाद करने से रोकने वाले अपने गरीब दादा को कुल्हाड़ी से काटकर मार डाला। तीसरी खबर इसी प्रदेश के बिलासपुर जिले के एक गांव की है जहां एक पखवाड़े से लापता 13 बरस के एक लडक़े की लाश एक बंद पड़े, खंडहर स्कूल में सड़ी हुई मिली है। उसका गायब मोबाइल फोन जब अचानक शुरू हुआ, तो पुलिस को निगरानी में पता लगा, और जांच में यह पता लगा कि उसी समाज का उसका एक बालिग दोस्त ही कातिल है। उसने उम्र में काफी छोटे इस दोस्त से गेम खेलने के लिए मोबाइल मांगा था, और न मिलने पर उसका गला घोंटकर उसे मार डाला। एक पखवाड़े के भीतर ये तीन कत्ल मोबाइल को लेकर ही हमारे एकदम आसपास हुए हैं।
अब सवाल यह उठता है कि आज जो बिल्कुल ही छोटे बच्चे, दो-चार साल की उम्र से मोबाइल की लत में पड़ गए हैं, वे जब बड़े होंगे, तो उनका क्या होगा? वे तो अभी से इस नशे के शिकार हो गए हैं, उनके पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की समझ भी मोबाइल फोन और सोशल मीडिया से प्रभावित होगी, वे पोर्नो भी आगे-पीछे पा ही जाएंगे, वे आंखों और दिल-दिमाग पर बुरा असर झेलने लगेंगे, बाहर की दुनिया से उनका खेलकूद का रिश्ता घटने लगेगा, और धीरे-धीरे वे हर किस्म के साइबर-जुर्म का शिकार बनने का खतरा भी उठाने लगेंगे। एक तरफ हजारों साइबर-मुजरिम उनके फोन पर ऑनलाईन सट्टेबाजी, या क्रिप्टोकरेंसी में पूंजीनिवेश जैसे झांसे और सपने दिखाने लगेंगे, दूसरी तरफ ऑनलाईन कर्ज देने वाले लोग ऐसे ही मौकों पर कर्ज देने को तैयार रहेंगे जिन्हें लेकर लोग रातों-रात करोड़पति बनने के अपने सपनों के लिए दांव लगा सकें। इसके साथ-साथ जैसा कि साइबर-मुजरिम धड़ल्ले से कर रहे हैं, वे लोगों को सेक्सटॉर्शन में फंसाकर उनके बैंक-खाते खाली कर लेंगे, और उन्हें खुदकुशी तक के लिए मजबूर कर देंगे। यह पूरा सिलसिला एक मोबाइल फोन के नशे, और गैरजिम्मेदार इस्तेमाल के इर्द-गिर्द घूमता है। लोगों को यह समझना होगा कि टेक्नॉलॉजी की सहूलियतों से परे उसके खतरे क्या-क्या हैं। और लोग जब कर्ज देने वाली कंपनियों को अपने पूरे फोन की पहुंच दे देते हैं, तो वे अपने परिवार, और अपने दोस्तों की निजता को भी खत्म कर देते हैं।
यह सिलसिला लगातार बढ़ते चल रहा है, लोगों के हाथ में टेक्नॉलॉजी रॉकेट सरीखी तेज रफ्तार से आती जा रही है, लेकिन लोगों में समझ और जिम्मेदारी पैदल रफ्तार से आ रही है। पुलिस और जांच एजेंसियों की अपनी एक क्षमता है, और ठगे हुए, लुटे हुए लोगों को इस क्षमता पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए कि दुनिया भर में बिखरे हुए मुजरिमों को हिन्दुस्तान की पुलिस कॉलर पकडक़र घसीटकर ले आएगी। दुनिया के अधिकांश देश इस तरह के साइबर-जुर्म के मामले में भारत की जांच एजेंसियों की पहुंच से अमूमन परे हैं। इसलिए भारत सरकार अगर चाहे तो हर मोबाइल फोन, हर लैपटॉप या डेस्कटॉप, और हर डेटापैक पर एक अतिरिक्त टैक्स लगाकर साइबर-जागरूकता को तेजी से बढ़ाए, वरना आर्थिक अपराधों में नुकसान झेलने के अलावा, समाज में लोगों के बीच निजी किस्म के जुर्म भी तेजी से बढ़ते जा रहे हैं।





