बलात्कार के बाद महिला से सत्ता का जुबानी बलात्कार

28 जुलाई 14
संपादकीय
देश भर में जगह-जगह कहीं नेता और कहीं अफसर बलात्कार को लेकर गैरजिम्मेदारी के बयान देते आ रहे हैं, और कोई ऐसा पखवाड़ा नहीं गुजरता जब हमें इसके बारे में लिखना न पड़ता हो। लेकिन उत्तरप्रदेश में अभी एक फिर मामला ऐसा आया जिसमें वहां की अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, एक महिला अफसर, ने बिना किसी जरूरत के अचानक प्रेस कांफ्रेंस लेकर कैमरों के सामने यह बयान दिया कि जिस महिला के साथ बलात्कार के बाद हत्या की बात खबरों में है, उसके साथ बलात्कार नहीं हुआ। इस बयानबाजी के चार दिन बाद फोरेंसिक जांच रिपोर्ट आती है कि उस महिला के साथ न सिर्फ बलात्कार हुआ था, बल्कि सामूहिक बलात्कार हुआ था। इसके पहले ही उत्तरप्रदेश में बलात्कार के मामलों में समाजवादी पार्टी की सरकार ने पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अफसरों से बलात्कार की आशंका का खंडन करवाते हुए बयान जारी करवाए, और फिर वे खंडन जांच में झूठे साबित हुए। पाठकों को हमारा कई बार यह लिखा हुआ याद होगा कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने किस तरह एक बलात्कार के बाद उसे झूठा करार दिया था, और बाद में उन्हीं की पुलिस ने उस शिकायत को सही पाया था। 
अलग-अलग बहुत से राज्यों में नेता और अफसर ऐसी गैरजिम्मेदार बयानबाजी में लगे रहते हैं, लेकिन जब उत्तरप्रदेश की एक सबसे बड़ी महिला पुलिस अफसर बिना किसी जरूरत ऐसा औपचारिक खंडन जारी करती है, तो हम उसके महिला होने को भी अनदेखा नहीं कर सकते और ऐसा लगता है कि राज्य सरकार ने एक महिला के मुंह से वैसा खंडन जारी करवाकर खबरों को ठंडा करने की कोशिश की थी। हमारा यह मानना है कि महिलाओं के साथ सेक्स हिंसा के मामलों में अगर जिम्मेदार ओहदों पर बैठे हुए लोग गैरजिम्मेदारी के बयान देते हैं, या सच को छुपाने और दबाने वाले झूठ बोलते हैं, तो ऐसे लोगों पर अदालत को खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए, और ऐसे कुछ लोगों को अगर सजा मिल सके, तो उससे बाकी लोगों को सबक मिल सकेगा। 
आज भारत में महिलाओं की जो हालत है, उसे देखते हुए शिकायत करने का हौसला जुटाने वाली महिला की नीयत पर शक करना भी एक हिंसा है। शिकायत पर पूरी जांच के बाद सुनवाई के दौरान अदालत ने महिला की नीयत पर भी विचार हो सकता है, लेकिन जांच शुरू भी नहीं हुई, और महिला के खिलाफ ही अगर सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोग बयान देने लगते हैं, तो हम इसे बहुत ही हिंसक बात मानते हैं। आज भारत में महिला आयोग से लेकर मानवाधिकार आयोग तक, और कम उम्र के बच्चों के साथ होती हिंसा के मामलों में बाल आयोग तक अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहे हैं, वरना ऐसी बयानबाजी के खिलाफ ये संवैधानिक आयोग खुद होकर नोटिस जारी कर सकते थे। दरअसल संवैधानिक कुर्सियों पर जहां-जहां लोगों को मनोनीत करने की व्यवस्था है, सत्ता अपने अनुकूल लोगों को वहां बिठाती है, और फिर वैसे बैठाए गए लोग अहसानों का बदला चुकाने के लिए चुप्पी अपनाते हैं। 
हमारा यह मानना है कि ऐसे माहौल में मीडिया भी सिर्फ सतह पर तैरते हुए तथ्यों को लिख देने से आगे बढ़कर ऐसे गैरजिम्मेदार खंडनों और बयानों पर लोगों से तीखे सवाल कर सकता है, और उसे अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने के लिए ऐसा करना भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे कुछ चुुनिंदा बयानों को लेकर उस पर खुद ही मामला शुरू करके कुछ आला अफसरों को, मंत्रियों और ओहदेदार लोगों को कटघरे में बुलाना चाहिए, तो ही इस देश में हिंसक सिलसिला कुछ थम सकता है। 

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