30 जुलाई 2014
संपादकीय
देश के दूसरे हिस्सों की तरह कल छत्तीसगढ़ में भी इंटरनेट के सोशल मीडिया पर देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक बातों के खिलाफ हंगामा शुरू हुआ है। गैरजिम्मेदारी से जब किसी धर्म के खिलाफ ऐसा किया जाएगा, तो उससे तनाव खड़ा होना लाजिमी है। दो दिन पहले गुजरात के भुज में मुसलमान इसी तरह तनाव में थे, और पाठकों को याद होगा कि अभी कुछ ही महीने हुए हैं जब छत्तीसगढ़ के दुर्ग में युवक कांग्रेस के एक नेता को देवी-देवताओं के खिलाफ अश्लील फेसबुक पोस्ट को लेकर गिरफ्तार किया गया था और वहां धार्मिक तनाव खड़ा हो गया था।
आज भारत में पहले धार्मिक तनाव और फिर साम्प्रदायिक टकराव खड़ा करना बहुत आसान हो गया है। इंटरनेट पर सोशल मीडिया तक लोगों की पहुंच सड़क की धूल तक पांवों की पहुंच जैसी आसान हो गई है। आज जिसके पास भी एक मोबाइल फोन है, वह ऐसी ताकत रखता है कि चार गंदी बातें लिखकर कहीं भी तनाव फैला दे। और लोग अपने मोबाइल फोन, इंटरनेट कनेक्शन, कम्प्यूटर, और सोशल मीडिया के अपने अकाउंट को लेकर आज भी इतने लापरवाह हैं कि कहीं सुनंदा थरूर को यह सफाई देनी पड़ती है कि उनके फोन से किए गए ट्वीट उनके नहीं थे, तो कहीं दिग्विजय सिंह की महिला मित्र के फोन से कई तस्वीरें इंटरनेट पर डाल दी जाती हैं। इस तरह आज का वक्त बहुत नाजुक है, टेक्नालॉजी में लोगों के हाथ में एक ऐसा हथियार दे दिया है जिससे कि वे अपने खुद के बदन को जख्मी कर सकते हैं। आज इंटरनेट पर किसी भी तरह की गैरजिम्मेदारी दिखाने वाले लोगों को पकडऩा आसान हो गया है, और देश का कानून बहुत कड़ा है। अखबारों के मामले में कानून इतना कड़ा नहीं था, जितना कि आज इंटरनेट के मामले में है। दूसरी तरफ अखबारों में लोग जिम्मेदारी के साथ काम करना जानते थे, लेकिन सोशल मीडिया का मिजाज इतना अराजक है, कि लोग वहां पर किसी भी तरह की गैरजिम्मेदारी दिखाते रहते हैं।
लेकिन यह सिलसिला कहां तक जा सकता है, इसका अंदाज लगाना नामुमकिन है। जब तक देश के भीतर जिम्मेदार और चौकस लोग ऐसे मुद्दों पर खुलकर नहीं बोलेंगे, हर तबके को बर्दाश्त नहीं सिखाएंगे, जब तक राजनीतिक दल और उनके नेता ऐसे मुद्दों पर वोट दुहना बंद नहीं करेंगे, तब तक यह हिन्दुस्तान इंटरनेट की केबलों पर नहीं बैठा है, बारूदी सुरंगों पर बैठा है। किसी भी धर्म की भावनाओं पर दूसरे ने पैर धरा, तो उसी तरह धमाका होगा जिस तरह बारूदी सुरंगों पर किसी गाड़ी के पहुंचने से होता है। यह सिलसिला बहुत ही फिक्र पैदा करने वाला है, क्योंकि भारत में आज धार्मिक भीड़ ही पूरी तरह बेदिमाग रहती है। उसमें सिर हजारों होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता। और फिर जब ऐसी भीड़ साम्प्रदायिक भीड़ में तब्दील हो जाती है, तो उससे खतरा हजार गुना बढ़ जाता है। भारत में आज अलग-अलग लोग कई तरह की साम्प्रदायिक बातें कर रहे हैं, जिनके बारे में हमने पिछले दिनों इसी जगह पर लिखा भी है। उनकी वजह से आज देश का माहौल बहुत विस्फोटक बना हुआ है, और लोग इस ताक में हैं कि कैसे दूसरों की बातों पर कानून की कार्रवाई के पहले खुद कानून हाथ में लेकर जवाबी हमला किया जाए। ऐसी सोच में कई धर्मों के लोग शामिल हैं, कई पार्टियों के लोग शामिल हैं।
हिन्दुस्तान ने साम्प्रदायिक दंगों में बहुत नुकसान झेला हुआ है। जिंदगियों का नुकसान, अपने पड़ोस के लोगों पर से भरोसा उठ जाने का नुकसान, और अर्थव्यवस्था को नुकसान। बहुत सी बातें साम्प्रदायिक दंगों के पीछे धर्म से अलग की होती हैं, और भारत का दंगों का इतिहास बताता है कि इनकी सबसे बुरी मार हाथों के हुनर वाले कारीगरों पर पड़ी है, और लाखों लोग रोजगार खो बैठे हैं। ऐसे माहौल में अमन-पसंद लोगों को घर पर चुप बैठना बंद करना होगा, और देश के लोगों की सोच को मजबूत करना होगा, कि किसी एक की शरारत, किसी एक की साजिश के चलते पूरा देश आग में न झोंक दिया जाए। राजनीतिक दलों को भी आज बैठकर इस बारे में सोचना होगा, क्योंकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किसी पार्टी को किसी एक चुनाव में फायदे का दिख सकता है, लेकिन बाद में उसके नुकसान बेकाबू हो सकते हैं।
आज के वक्त में मां-बाप को भी अपने बच्चों को सोशल मीडिया पर जिम्मेदारीसे बर्ताव सिखाना चाहिए, वरना वे जमानत और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अपना बुढ़ापा खपाने पर बेबस रहेंगे।

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