संपादकीय
29 जुलाई 2014
भारत में हिंदुत्व और एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भयानक आक्रामक अंदाज में मीडिया से लेकर अदालत तक अभियान चला रहे दीनानाथ बत्रा देश में अज्ञान बिखेरने में लग गए हैं। उन्होंने एक-दो बड़े प्रकाशकों को कानूनी धमकी देकर हिंदुत्व के इतिहास पर लिखी एक-दो किताबों को नष्ट करवा दिया, और उसके बाद मोदी सरकार आने पर उनका वह उत्साह कई गुना और बढ़ गया। आज जिस तरह वे काल्पनिक बातों को ऐतिहासिक तथ्य बताते हुए प्रचारित कर रहे हैं, जिस तरह अंग्रेजी के खिलाफ एक अभियान चला रहा हैं, जिस तरह भारत की मौजूदा संस्कृति को खत्म करके केक के पहले के दिनों में वे ले जाना चाहते हैं, उससे न तो इस देश की इज्जत बढऩे वाली है, न भाजपा की, और न मोदी सरकार की। यह हिंदुस्तान की 21वीं सदी है, और आज दुनिया भर में जो प्रवासी भारतीय मोदी और भाजपा के दोस्त और शुभचिंतक हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या सिर्फ संस्कृत से काम चलाकर वे प्रवासी भारतीय बन सकते थे? क्या वे कुछ कमाकर मोदी और भाजपा को चंदा भेज सकते थे?
लेकिन एक प्रकाशक रहे दीनानाथ बत्रा को आज गुजरात की सरकार में अपनी किताबों को बढ़ावा देने के लिए एक माहौल मिल गया है, और वे पूरे देश की शिक्षानीति को बदलने में जुट गए हैं, पूरे देश के इतिहास को शोले फिल्म के जेलर के अंदाज में एक साथ सबके-सब बदल डालूंगा कहते हुए कल्पना को इतिहास बनाने पर आमादा हैं। उनकी बातें विज्ञान से परे हैं, इतिहास से परे हैं, आज के हिंदुस्तान की सामाजिक हकीकत से परे हैं, सच से परे हैं, और संभव से भी परे हैं। इसलिए वे आज समझदार हिंदुस्तानियों के बीच मखौल का सामान बन गए हैं, और उनकी हरकतों से आज की दुनिया में भारत की इज्जत बढऩे नहीं जा रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने ऐसे समर्थकों और शुभचिंतकों से उन्हें खुद को और देश को हो रहे नुकसान के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। आज वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नहीं हैं, आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं।
29 जुलाई 2014
भारत में हिंदुत्व और एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भयानक आक्रामक अंदाज में मीडिया से लेकर अदालत तक अभियान चला रहे दीनानाथ बत्रा देश में अज्ञान बिखेरने में लग गए हैं। उन्होंने एक-दो बड़े प्रकाशकों को कानूनी धमकी देकर हिंदुत्व के इतिहास पर लिखी एक-दो किताबों को नष्ट करवा दिया, और उसके बाद मोदी सरकार आने पर उनका वह उत्साह कई गुना और बढ़ गया। आज जिस तरह वे काल्पनिक बातों को ऐतिहासिक तथ्य बताते हुए प्रचारित कर रहे हैं, जिस तरह अंग्रेजी के खिलाफ एक अभियान चला रहा हैं, जिस तरह भारत की मौजूदा संस्कृति को खत्म करके केक के पहले के दिनों में वे ले जाना चाहते हैं, उससे न तो इस देश की इज्जत बढऩे वाली है, न भाजपा की, और न मोदी सरकार की। यह हिंदुस्तान की 21वीं सदी है, और आज दुनिया भर में जो प्रवासी भारतीय मोदी और भाजपा के दोस्त और शुभचिंतक हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या सिर्फ संस्कृत से काम चलाकर वे प्रवासी भारतीय बन सकते थे? क्या वे कुछ कमाकर मोदी और भाजपा को चंदा भेज सकते थे?
लेकिन एक प्रकाशक रहे दीनानाथ बत्रा को आज गुजरात की सरकार में अपनी किताबों को बढ़ावा देने के लिए एक माहौल मिल गया है, और वे पूरे देश की शिक्षानीति को बदलने में जुट गए हैं, पूरे देश के इतिहास को शोले फिल्म के जेलर के अंदाज में एक साथ सबके-सब बदल डालूंगा कहते हुए कल्पना को इतिहास बनाने पर आमादा हैं। उनकी बातें विज्ञान से परे हैं, इतिहास से परे हैं, आज के हिंदुस्तान की सामाजिक हकीकत से परे हैं, सच से परे हैं, और संभव से भी परे हैं। इसलिए वे आज समझदार हिंदुस्तानियों के बीच मखौल का सामान बन गए हैं, और उनकी हरकतों से आज की दुनिया में भारत की इज्जत बढऩे नहीं जा रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने ऐसे समर्थकों और शुभचिंतकों से उन्हें खुद को और देश को हो रहे नुकसान के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। आज वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नहीं हैं, आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं।

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