3 जुलाई 2014
संपादकीय
आज सुबह से खबर है कि दिल्ली से आगरा के बीच सबसे तेज रफ्तार ट्रेन चलने वाली है। यह ट्रेन 160 किलोमीटर की रफ्तार से चलेगी, लेकिन यह रफ्तार चीन में बरसों से चल रही तेज ट्रेनों से आधी भी नहीं है। भारत में इस बात पर जमकर चर्चा है कि बुलेट ट्रेन कब से चलेंगी, किन शहरों के बीच चलेंगी, और उनकी रफ्तार कितनी होगी। देश के महानगरों के बीच की दूरी तय करने में लोगों का कितना वक्त बचेगा इसे लेकर बड़ा जोश लोगों में है।
दरअसल यह इंसानी मिजाज है कि उसे सबसे बड़ा, सबसे ऊंचा, सबसे फैला हुआ रिकॉर्ड बड़ा सुहाता है। कहीं पर सरदार पटेल की प्रतिमा सबसे ऊंची बनाई जा रही है, तो कहीं पर कोई बांध सबसे बड़ा है, छत्तीसगढ़ में ही सतनामी समाज की आस्था के प्रतीक जैतखंभ को कुतुबमीनार से दुगुना ऊंचा बनाना शुरू हुआ था। इस तरह लोग ऐसे रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं, जिनको तोडऩा दूसरों के लिए मुश्किल हो। लेकिन क्रिकेट के जानकार इस बात को जानते हैं कि बहुत से खिलाड़ी अपने शतक को पूरा करने के लिए आखिरी के कई ओवरों में इस कदर धीमी रफ्तार से रन बनाते हैं कि कहीं वे आऊट न हो जाएं। नतीजा यह होता है कि टीम का स्कोर चौपट हो जाता है, अपना खुद का एक रिकॉर्ड बनाने के लिए। पूरी दुनिया में लोगों के साथ कुछ ऐसा ही होता है, जब ताकतवर कुर्सियों पर बैठे लोग इतिहास में अपना नाम दर्ज करने के लिए सबसे बड़ा, सबसे ऊंचा, या सबसे लंबा कुछ बनाकर जाना चाहते हैं। सबसे अच्छा करके जाने का न तो कोई पैमाना होता, और न ही उस पर गिनीज की तरफ से विश्व रिकॉर्ड का कोई सर्टिफिकेट ही मिलता है।
लेकिन हकीकत यह है कि खबरों की सुर्खियां बनने वाली ऐसी सबसे बड़ी चीजों की चकाचौंध में हर सरकारी विभाग की ऐसी बहुत सी सबसे जरूरी बातें पीछे छूट जाती हैं, जो कि जनता की जिंदगी में सबसे अधिक मायने रखती हैं। पिछली आधी सदी में हमको हिन्दुस्तानी अखबारों की ऐसी कोई सुर्खियां याद नहीं पड़तीं, जिनमें सबसे आम रेल मुसाफिर को टिककर बैठने लायक जगह भी देने की गारंटी की बात किसी ने की हो। क्या किसी रेलमंत्री ने आज तक यह घोषणा की कि देश का एक भी स्टेशन गंदा नहीं रहने दिया जाएगा, किसी भी रेल डिब्बे का एक भी शौचालय बिना सफाई नहीं रहेगा? देश की 90 फीसदी आबादी की जो बुनियादी जरूरतें हैं, उनको पूरा करना बहुत ही मुश्किल होता है, इसलिए आमतौर पर सरकार हांकते लोग अपनी नाकामी को छुपाने के लिए कुछ ऐसे चर्चित कामों को उठाते हैं, और उनकी चकाचौंध में लोगों को बुनियादी काम नहीं दिखते।
हम दूर क्यों जाएं, शहरों के म्युनिसिपल ही लें, उनकी बुनियादी जिम्मेदारी नाली, पानी, सफाई, और सार्वजनिक रौशनी है। लेकिन इन तमाम मोर्चों पर नाकामयाब रहते हुए भी म्युनिसिपल खबरों में बने रहते हैं कि वे कहीं पर दसियों लाख के स्वागत द्वार बना रहे हैं, कहीं पर इमारतें बना रहे हैं, कहीं स्टेडियम बना रहे हैं। बड़े प्रोजेक्ट की बड़ी खबरों के साये में लोग छोटी-छोटी जिम्मेदारी भी पूरी न करके, एक दूसरे गैरजरूरी पैमाने पर कामयाबी दर्ज करके, रिकॉर्ड बनाकर लोगों को झांसा देते हैं। यह साजिश बहुत सोची-समझी रहती है, क्योंकि बुनियादी जरूरतों को पूरा करना जानलेवा होता है, और बड़ी-बड़ी बातों को पेश करना बड़ा लुभावना। देश भर में खेल के मैदान खत्म होते जा रहे हैं, और हजारों करोड़ की लागत वाले अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों की मेजबानी के लिए सरकार लगी रहती है, सैकड़ों करोड़ के स्टेडियम बनाना तो हर शहर अपनी इज्जत के लिए जरूरी समझते हैं। बच्चों के खेल के बुनियादी इंतजाम न रहें और बड़े-बड़े टूर्नामेंट होते रहें, यही सत्ता की सोच रह गई है।
आज दिल्ली से आगरा की ट्रेन 90 मिनट में पहुंचे, या 120 मिनट में, इससे कितने लोगों की सेहत पर क्या फर्क पडऩे जा रहा है? इस मोर्चे से परे जो दूसरे जरूरी मोर्चे हैं, वह भारतीय रेल्वे स्टेशनों पर बदअमनी, गंदगी, बदइंतजामी, पूरे रेल्वे में भयानक भ्रष्टाचार। इनको कम भी करना आसान नहीं है। इसलिए इनको तेज रफ्तार ट्रेनों से ढांक देना बेहतर है। जिस तरह बहुत से लोग दिक्कतों को कालीन के नीचे खिसकाकर दबाकर ढांक देने के लिए जाने जाते हैं, उसी तरह देश की बुनियादी जरूरतों के ऊपर शहरी और ऊंचे तबके को खुश करने वाले रिकॉर्ड बनाकर, बाकी मोर्चों पर नाकामी को ढांक दिया जाता है। देश को अपनी प्राथमिकताएं समझना चाहिए, हिन्दुस्तान की राजधानी का एक एयरपोर्ट निजी कंपनी को देकर, बनवाकर, चलवाकर, अगर वह दुनिया के सबसे अच्छे एयरपोर्ट में से एक गिना जाता है, तो इससे सरकार की कौन सी खूबी साबित होती है? सरकार की खूबी तो तब साबित हुई रहती जब आम लोगों की जिंदगी की आम रेलगाडिय़ां, और छोटे-छोटे रेल्वे स्टेशन बेहतर बनाए गए होते। राजधानियों में आम लोगों के बस अड्डे घूरे बने रहें, और रईसों के विमानतल अगली सदी के दिखें, इसमें वाहवाही की क्या बात है? तेज रफ्तार रेलगाडिय़ां बुरी बात नहीं हैं, लेकिन भारी लागत लगाकर ऐसा करने के बजाय, बेहतर मैनेजमेंट से रेल्वे की आम बातों को बेहतर बनाना अधिक जरूरी है। ये दोनों बातें साथ-साथ भी चल सकती हैं, लेकिन इन दोनों के बीच भी प्राथमिकता तय होनी चाहिए।

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