31 अक्टूबर 2026
भारत की महिला पहलवान मनीषा भानवाला ने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल जीतकर नया इतिहास रचा। वे ऐसी पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। इसके आखिरी एक-दो मिनटों का वीडियो देखने लायक है जिसमें मनीषा पूरी ताक़त के साथ कुश्ती की चटाई पर मजे से घूम रही थी, और उसके सामने की अमरीकी खिलाड़ी दोनों हाथों को घुटने पर टेककर झुकी हुई थी, वह खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। हरियाणा की मनीषा ने हरियाणा की और बहुत सी महिला खिलाडिय़ों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा लिया है, लेकिन इस बार उसने अपने खेल में देश में सबसे ऊपर की जगह दर्ज करा ली है, और इस मुकाबले में तो पूरी दुनिया में।
इस कामयाबी को देखकर हमने कुछ ढूंढने की कोशिश की कि हरियाणा के मिट्टी-पानी में ऐसा क्या है कि वहां से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए इतने खिलाड़ी निकलते हैं। कुछ आंकड़ों को देखें, पेरिस के इस पिछले ओलंपिक में भारत के 117 खिलाडिय़ों में से 24 अकेले हरियाणा के थे, करीब 20.5 फीसदी। और हरियाणा की आबादी देश की आबादी की 2 फीसदी ही है। आबादी के अनुपात में हरियाणा ने 10 गुना अधिक खिलाड़ी उगले हैं। इसी ओलंपिक में हरियाणा के बगल के पंजाब को देखें, तो वहां के 19 खिलाड़ी थे। ये दोनों राज्य मिलकर भारतीय दल का 36 फीसदी थे। पंजाब की आबादी देश की आबादी की कुल सवा दो फीसदी के करीब है। इस तरह पंजाब-हरियाणा के खिलाड़ी सबसे आगे रहे। अब राज्य की सरहद के भीतर की बात अगर देखें, तो इन दोनों राज्यों में लोगों की क़द-काठी बहुत से दूसरे राज्यों के लोगों के मुकाबले अधिक रहती है। यह एक बहुत बड़ा शारीरिक कारण हो सकता है। देश की सरहद के इस हिस्से के लोगों की क़द-काठी ऐसी क्यों हैं इसके इतिहास में अगर जाएंगे तो हो सकता है कि कुछ लोगों को अप्रिय लगने वाले कुछ डीएनए तथ्य सामने रखना पड़े। लेकिन उससे परे हम इन दोनों राज्यों में खिलाडिय़ों के महत्व पर एक नजर डालें, तो लगता है कि एक तरफ तो हरियाणा लड़कियों और महिलाओं की जींस और उनके मोबाइल फोन पर पाबंदी लगाने वाली खाप पंचायतों के लिए भी जाना जाता है, लेकिन दूसरी तरफ कुश्ती की पोशाक में लड़कियों को खेलने की इजाजत देने में हरियाणा देश में सबसे आगे है। फिर लगे हुए इन दोनों राज्यों को देखें तो इनमें खेलों की एक बड़ी पुरानी मजबूत स्थानीय परंपरा है, गांव-गांव में अखाड़े रहे हैं, कस्बों में ईनामी मुकाबले होते हैं, और बहुत से परिवार यह मानते हैं कि किसी एक बड़े खिलाड़ी के निकल जाने से परिवार का भला भी हो सकता है। इसलिए वहां नई पीढ़ी को खेलने का अधिक हौसला और मौका भी दिया जाता है।
लेकिन थोड़ा सा और आगे चलें तो एक समाचार वेबसाइट, द क्विंट ने एक विश्लेषण किया था जिसमें 2023 के एशियाई खेलों के व्यक्तिगत स्पर्धाओं के पदक विजेताओं के राज्यों का आबादी के आधार पर विश्लेषण किया गया था। इनमें हरियाणा सबसे आगे था, और उसके बाद मणिपुर, तेलंगाना, पंजाब और केरल भी अच्छे अनुपात वाले राज्यों में थे। लेकिन यह हिसाब-किताब सिर्फ 2023 के एशियाई खेलों के आधार पर था। अगर हम सभी अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत के अलग-अलग राज्यों की ताक़त, या वहां के खिलाडिय़ों की ताक़त को देखें, तो हरियाणा कुश्ती, मुक्केबाजी, हॉकी, एथलेटिक्स, और शूटिंग में बहुत मजबूत है। मणिपुर अपनी छोटी सी आबादी के अनुपात में फ़ुटबॉल, वेटलिफ्टिंग, मुक्केबाजी, और हॉकी में खासी उल्लेखनीय कामयाबी वाला राज्य है। पंजाब हॉकी, एथलेटिक्स, कुश्ती, और शूटिंग में मजबूत है। केरल भी एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, और वॉलीवॉल जैसे कुछ खेलों में मजबूत है। मिज़ोरम और गोवा छोटे-छोटे राज्य होने के बावजूद फुटबॉल में मौजूदगी रखते हैं। तमिलनाडु शतरंज में सबसे अधिक चैंपियन पेश करने वाला राज्य है, लेकिन इसके साथ-साथ वह एथलेटिक्स, हॉकी और शूटिंग में भी मौजूदगी रखता है। महाराष्ट्र शूटिंग, कुश्ती, बैडमिंटन, क्रिकेट, जैसे कई खेलों में आगे है।
अब हम उन राज्यों को देखें जिनमें आबादी तो अच्छी-खासी है, लेकिन खेलों के मामले में जो तकऱीबन ठन-ठन गोपाल हैं। बिहार और उत्तरप्रदेश में इक्का-दुक्का खिलाडिय़ों को छोड़ दें तो आबादी के अनुपात में उसकी खेल और खिलाड़ी सफलता तकऱीबन जीरो है। इन दोनों राज्यों में कई हरियाणा और कई पंजाब समा सकते हैं, अकेले यूपी में 4 हरियाणा और 4 पंजाब आ सकते हैं, बिहार में भी दो हरियाणा और दो पंजाब आ सकते हैं, लेकिन इनका खेलों से कोई लेना-देना नहीं दिखता है। मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है, और छत्तीसगढ़ के अलग होने के पहले वह और भी बड़ा था। लेकिन इन दोनों ही राज्यों में अंतरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों का तकऱीबन अकाल है। किसी एक ओलंपिक, या एशियाई, राष्ट्रमंडल खेलों में कभी-कभार इन राज्यों से एक खिलाड़ी का नाम आ जाता है, लेकिन कुल मिलाकर इनकी हालत कमजोर है। एक दिलचस्प बात यह है कि देश में जिन दो राज्यों में फुटबॉल का सबसे पुराना इतिहास रहा है, उनमें, बंगाल और गोवा में अब राष्ट्रीय टीम के लायक़ खिलाड़ी घटते चले गए हैं। ओडिशा, बंगाल, कर्नाटक, आंध्र-तेलंगाना, जैसे और कई राज्य हैं जो कि अलग-अलग क्षमताओं के हैं, लेकिन वहां से खिलाड़ी अधिक नहीं निकल पाए। ओडिशा ने एक राज्य के रूप में देश की हॉकी टीम के प्रायोजक की भूमिका बीते कई बरस से निभाई है, और उसके चलते यह टीम आसमान पर भी पहुंच गई है, लेकिन इसका ओडिशा को कोई घरेलू फायदा नहीं हो सका।
हम घूम-फिरकर फिर उसी हरियाणा की मिसाल पर आते हैं तो कद-काठी वाले डीएनए से परे समाज और सरकार के काबू की चीजों को देखें तो यह साफ है कि गांव-गांव तक से खेलों को मिलने वाला प्रोत्साहन खिलाड़ी पैदा करता है, और उनमें से कुछ को चैंपियन बनने तक की ताक़त देता है। समाज भी आगे बढ़ाता है, और सरकार भी। हमें लगता है कि देश के बाकी सारे राज्यों को बैठकर आईना देखना चाहिए कि हरियाणा, पंजाब, और मणिपुर से वे क्या सबक ले सकते हैं? सरकारों की दिलचस्पी बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में रहती है, जिन पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च होते हैं, लेकिन खेल के मैदानों को बाजार बना देना, उनका बाजारू इस्तेमाल करना, उनको धार्मिक और राजनीतिक कार्यक्रमों से पाटकर रखना, बच्चों के खिलाड़ी बनने की राह में एक बड़ी बाधा है। बड़े स्टेडियम में जाकर खेलने लायक़ तो वे तब ही बन सकते हैं जब वे गाँव और मोहल्ले के, स्कूलों के मैदानों पर खेलने का मौका पाएं, खेल मुकाबलों में जाने पर रोज़ खाने का भत्ता इतना रहे कि पेट भर सके, सोने के लिए दरी के बजाय गद्दा मिल जाए, स्कूलों में खेल का सामान मिल जाए, और मैदान शामियानों के गड्ढों के बिना खेलने लायक मिल जाए। बाकी प्रदेश अपने खेल प्रदर्शन को कैसे सुधार सकते हैं, इसे तो हमारी तरह की बहुत मामूली समझ रखने वाले लोग भी समझ पाते हैं, लेकिन सरकारों में बैठे हुए बड़े-बड़े दिग्गज, और खेल संघों की राजनीति पर क़ाबिज़ दानवीय ताकत रखने वाले लोग सब कुछ समझते हुए भी अपने छोटे-छोटे मतलब में व्यस्त रहते हैं। आज हरियाणा के बहाने हमें लिखने का मौका मिला है, तो लिख रहे हैं, आगे तो ताकतवर लोग बड़े समझदार हैं हीं।
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