30 अक्टूबर 2026
देखते ही देखते छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना की एक और सालगिरह आ गई। यह रजत जयंती वर्ष पूरा गुजर गया, और अब वर्तमान साय सरकार का कार्यकाल आधा होने के साथ ही राज्य अगले चुनाव की तरफ धीरे-धीरे बढ़ चला है। 25 बरस किसी राज्य की जिंदगी में न बहुत अधिक होते हैं, और न ही बहुत कम। इसलिए छत्तीसगढ़ को इस मौके पर पलटकर एक नजर यह जरूर देखना चाहिए कि वह कहां से कहां तक पहुंचा है, और फिर आगे देखकर सफर बढ़ाना चाहिए क्योंकि अगला मूल्यांकन चुनाव में तो होगा ही, लेकिन सरकारों और पार्टियों से परे यह करीब 25 बरस बाद होगा जब देश आजादी की सौवीं सालगिरह मना रहा होगा। पिछले बरस भी इन पहलुओं को लेकर बहुत से विश्लेषण हुए थे, लेकिन कब तक राज्य की भाजपा सरकार के कार्यकाल को बहुत समय नहीं हुआ था, और चुनावी घोषणापत्र की कुछ सबसे बड़ी बातों पर अमल ही मूल्यांकन का एक बड़ा पैमाना था। अब महतारी वंदन योजना के तहत प्रदेश की अधिकतर शादीशुदा महिलाओं को मिलने वाले हजार रूपए महीने इन सबका हक बन चुके हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह राशन और बिजली की रियायत एक चुनाव के बाद अगले चुनाव में वोटरों के लिए कोई मुद्दा नहीं रहतीं। इसलिए राज्य को अगले दो बरस में सरकार और सत्तारूढ़ दल से बेहतर और असरदार प्रदर्शन की उम्मीद रहेगी।
हम आज जब पिछली सालगिरह के बाद के इस एक बरस का मूल्यांकन करना चाहते हैं, तो बस्तर में नक्सल हिंसा का खात्मा इस राज्य के इतिहास की सबसे बड़ी घटना लगती है। न सिर्फ इस सरकार की उपलब्धि, बल्कि राज्य बनने के बाद से इस हिंसक उग्रवाद का खात्मा, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ दूसरे राज्यों से भी इसका खत्म होना एक असाधारण घटना रही। जब यह राज्य बना था, तो अविभाजित मध्यप्रदेश से विरासत में नक्सल हिंसा मिली थी, और छत्तीसगढ़ की सरकारों की कम या अधिक कोशिशों के बावजूद कुछ भी कारगर साबित नहीं हुआ था। हर बरस सैकड़ों जवान मारे जाते थे, और सैकड़ों ग्रामीण आदिवासी भी। ऐसा लहूलुहान बस्तर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की घोषित की गई 31 मार्च 2026 की तारीख के पहले इस हैरतअंगेज तरीके से नक्सल हिंसामुक्त हो जाएगा, इस पर अधिक लोगों को भरोसा नहीं था। लेकिन जिस अंदाज में नक्सल नेताओं से बातचीत हुई, साथ-साथ सुरक्षाबलों ने घेरेबंदी करके मुठभेड़ भी जारी रखी, उसका मिलाजुला असर बस्तर की शांति की शक्ल में सामने आया। आज दशकों के बाद बस्तर गोलियों और धमाकों से इतना आजाद हो चुका है कि पिछले दो-चार दिनों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां के सैकड़ों नेताओं की सुरक्षा घटाई जा रही है। अब बस्तर में किसी की जिंदगी पर भी पहले सरीखा खतरा नहीं मंडरा रहा है, बल्कि बेहतर यह कहना होगा कि कोई भी खतरा नहीं मंडरा रहा है।
यह नौबत बस्तर के विकास के लिए एक ऐतिहासिक संभावना लेकर आई है। जाने किस भरोसे से अमित शाह ने यह घोषणा की है कि बस्तर देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनेगा, जिस तरह नक्सल हिंसा खत्म हुई, उसी तरह अगर यह दूसरी घोषणा भी पूरी होती है, तो यह छत्तीसगढ़ के लिए दूसरी ऐतिहासिक घटना होगी। साथ ही आज सालगिरह के मौके पर यह राज्य सरकार, यहां की सरकारी मशीनरी, और बस्तर के सारे ही नेताओं के लिए चुनौती का एक मौका भी है कि हिंसा खत्म होने के बाद का वहां का शून्य विकास की जो चुनौती पेश कर रहा है, उसमें कौन-कौन क्या कर सकते हैं? हम इन आशंकाओं को बढ़ाना नहीं चाहते कि बस्तर की खदानों को निजी कारोबारियों के हवाले कर दिया जाएगा। जहां पर नक्सली नहीं थे, वहां पर भी खदानों का निजीकरण एक नियमित प्रक्रिया रही, और यह देश-प्रदेश में किसी भी सरकार के रहते हुए जारी रही। इसलिए सत्ता के खिलाफ इस आरोप को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना हमेशा से चलते रहा है। अगर किसी इलाके में खनिज हैं, तो वे पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाए बिना अगर निकाले जा सकते हैं, तो कोई भी सरकार उस तरफ आगे बढ़ेगी। बस्तर के विकास के लिए जितने बजट की जरूरत पड़ेगी, हो सकता है कि बस्तर की खदानों से उससे काफी अधिक मुनाफा सरकारों को मिले, और वह देश-प्रदेश के दूसरे काम भी आए। लेकिन खदानों के मुद्दे से परे भी सोचने की जरूरत है कि दशकों से जिस बस्तर के बहुत बड़े नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकार की काम की संस्कृति खत्म हो चुकी थी, वहां पर नियम-कानून के तहत काम करने की आदत कैसे शुरू हो पाएगी? अभी कुछ अखबारों की रिपोर्ट बताती हैं कि बस्तर के जंगलों में सरकारी विभाग ने किस तरह से भर्राशाही से सैकड़ों-हजारों करोड़ खर्च किए, जिस पर कोई निगरानी भी नहीं थी। ऐसी खबरें बताती हैं कि सरकारों को इन इलाकों में काम करने के लिए अधिक सावधानी सीखनी पड़ेगी। कई लोगों का यह भी मानना है कि आदिवासी इलाकों में वहां के जनप्रतिनिधि ही जनता के बड़े शोषक बन जाते हैं, इस पहचान से भी छुटकारा पाना नेताओं के लिए बेहतर होगा क्योंकि हिंसा खत्म होने के बाद लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढऩा तय है, और वे शोषकों की शिनाख्त बेहतर तरीके से कर पाएंगे।
अब बस्तर से परे बाकी छत्तीसगढ़ को देखें, तो सालगिरह के मौके पर सरकार को कमर कसकर यह देखने की जरूरत है कि जिन मौजूदा योजनाओं पर बरसों से खर्च हो रहा है, उस खर्च की कोई जवाबदेही तय हो पा रही है? आज तो हर दिन ऐसी दर्जनों खबरें आती हैं कि छोटी-छोटी सी योजना पर खर्च हुए करोड़ों रूपए फिजूल हो गए दिखते हैं, क्योंकि सारा काम ठप्प पड़ा है, इमारतें अधूरी हैं, मशीनें खराब हैं, जनता के किसी काम नहीं आ रही है। इसके बावजूद उसी ढर्रे से उसी तरह के नए कामों पर खर्च जारी है क्योंकि सरकारी अमले को नया खर्च हमेशा आकर्षक लगता है। पीछे के अधूरे कामों की जवाबदेही अगर तय नहीं होगी, तो मौजूदा सरकार को अपने आखिरी के बरस में अपने पहले के बरसों के किए गए काम मुंह चिढ़ाते खड़े रहेंगे। किसी सत्तारूढ़ पार्टी को किसी काम के होने से जितना नफा होता है, उससे अधिक नुकसान किसी अधूरे, बिगड़े हुए, या भ्रष्टाचार में डूब गए कामों से होता है। इसलिए सरकार को नई मुनादियों के साथ-साथ कड़ाई से यह भी जांचना-परखना चाहिए कि बीते बरसों में हुए काम, इस सरकार के आने के पहले की योजनाओं की भी आज क्या हालत है? चारों तरफ सरकारी कामकाज अधूरा, बंद, या बिगड़ा हुआ अगर दिखता रहेगा, तो नए शुरू होने वाले काम की साख भी कम रहेगी। भारत में चुनाव तो पांच-पांच साल के लिए होते हैं, सरकारें भी आती-जाती रहती हैं, लेकिन पिछली सरकार के कार्यकाल के काम पूरे करने, जारी रखने, सुधारने का जिम्मा भी नई सरकार पर रहता ही है। चाहे जिस सरकार ने खर्च किया हो, पैसा तो जनता की जेब का गया था, और आज वह काम आ रहा है, इसे जांचने का एक पुख्ता इंतजाम सरकार को करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि सरकारी लागत से हुए किसी भी काम की उत्पदकता की निरंतरता पर निगरानी रखना किसी भी नए काम को छेडऩे के मुकाबले अधिक जरूरी बात है।
सालगिरह के मौके पर खुशियों के जलसे तो अच्छी बात है, छत्तीसगढ़ के पास नक्सल हिंसा से मुक्त होने की एक बड़ी कामयाबी भी खुशियां मनाने के लिए है। लेकिन इसके साथ-साथ सरकार को अपने काम और राज्य को बेहतर बनाने के बारे में बड़ी गंभीरता से सोचना चाहिए। नक्सल हिंसा मोटेतौर पर बस्तर, और बाहर के कुछ आदिवासी जिलों तक सीमित थी। इसके खत्म होने की बात को पूरे प्रदेश में लोग लंबे समय तक याद नहीं रखेंगे, कम से कम वोट इससे बहुत अधिक प्रभावित नहीं होंगे। दूसरी तरफ महतारी वंदन जैसी योजनाओं का फायदा एक चुनाव में भाजपा को हो चुका है, अब तो दूसरे प्रदेशों ने इस एक हजार रूपए महीने के मुकाबले बहुत अधिक रकम भी महिलाओं को दी जा रही है, इसलिए अगले चुनाव में यह छत्तीसगढ़ की सत्तारूढ़ भाजपा के सामने भी चुनौती रहेगी। जलसों के इस मौके पर सरकार को कमर कसकर अगले दो बरस बेहतर बनाने की जरूरत है, चुनावी जीत-हार से परे भी हम तो राज्य के भले के लिए सरकारों के चौकस रहने, और जनता के पैसों के खर्च की जवाबदेही तय करने के हिमायती हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें